ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866)
➣ ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना 1 जुलाई 1866 ई. को लंदन में दादाभाई नौरोजी द्वारा की गई थी। इसका गठन भारत से संबंधित राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक प्रश्नों को ब्रिटिश जनता तथा ब्रिटिश राजनीतिक वर्ग के समक्ष रखने के उद्देश्य से किया गया था।
➣ उस समय भारतीयों की समस्याओं पर ब्रिटेन में चर्चा तो होती थी, किंतु भारतीयों की अपनी आवाज़ को ब्रिटिश सार्वजनिक जीवन में पर्याप्त स्थान नहीं मिलता था। दादाभाई नौरोजी ने अनुभव किया कि भारत की वास्तविक परिस्थितियों को ब्रिटिश जनता एवं नीति-निर्माताओं तक सीधे पहुँचाना आवश्यक है। इसी आवश्यकता ने ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के गठन की पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ इसकी स्थापना से ठीक पहले 1865 ई. में लंदन में London Indian Society का गठन हुआ था। ईस्ट इंडिया एसोसिएशन ने आगे चलकर इसी प्रकार की गतिविधियों को अधिक व्यापक स्तर पर संगठित किया और भारत से जुड़े प्रश्नों को ब्रिटिश सार्वजनिक जीवन में उठाने का अधिक प्रभावी मंच प्रदान किया।
➣ इस प्रकार ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का स्वरूप भारत में कार्य करने वाली समकालीन राजनीतिक संस्थाओं से कुछ भिन्न था। इसका कार्य भारत में प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन चलाना नहीं, बल्कि ब्रिटेन में भारतीय हितों के पक्ष में जनमत तैयार करना था।
संस्थापक एवं प्रारंभिक स्वरूप
➣ दादाभाई नौरोजी इस संस्था के प्रमुख संस्थापक एवं प्रेरक थे। वे उस समय तक भारतीय आर्थिक एवं प्रशासनिक समस्याओं का गहरा अध्ययन कर चुके थे और उनका मानना था कि भारत की वास्तविक स्थिति को ब्रिटिश समाज के सामने तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
➣ संस्था ने प्रारंभ से ही भारतीयों और ब्रिटिश नागरिकों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। इसकी बैठकों में भारत से संबंधित विषयों पर चर्चा की जाती थी और भारतीय परिस्थितियों पर ऐसे विचार प्रस्तुत किए जाते थे, जिनके माध्यम से ब्रिटिश जनता को भारत की समस्याओं से परिचित कराया जा सके।
➣ इसकी प्रारंभिक गतिविधियों में व्याख्यान, सार्वजनिक बैठकें, राजनीतिक चर्चा तथा भारतीय प्रश्नों पर विचार-विमर्श प्रमुख थे। इन माध्यमों से संस्था ने भारत के प्रशासन, अर्थव्यवस्था तथा भारतीयों की राजनीतिक स्थिति से जुड़े प्रश्नों को ब्रिटेन में उठाने का आधार तैयार किया।
संगठनात्मक संरचना एवं सदस्यता
➣ ईस्ट इंडिया एसोसिएशन केवल भारतीयों का संगठन नहीं था। इसमें ऐसे ब्रिटिश उदारवादी भी जुड़े, जो भारत के प्रशासन में सुधार तथा भारतीयों के हितों के समर्थन के पक्षधर थे। इस कारण यह संस्था भारत और ब्रिटेन के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं बौद्धिक संपर्क मंच के रूप में विकसित हुई।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1 जुलाई 1866 ई. |
| स्थापना-स्थान | लंदन, इंग्लैंड |
| संस्थापक | दादाभाई नौरोजी |
| पूर्ववर्ती प्रयास | London Indian Society (1865) |
| प्रमुख स्वरूप | भारत से संबंधित राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक प्रश्नों पर ब्रिटेन में चर्चा एवं भारतीय पक्ष की पैरवी करने वाला संगठन |
| सदस्यता | भारतीयों के साथ-साथ भारत के प्रति सहानुभूति रखने वाले ब्रिटिश नागरिक |
| प्रमुख गतिविधियाँ | व्याख्यान, सार्वजनिक बैठकें, राजनीतिक चर्चा तथा भारतीय प्रश्नों पर जनमत निर्माण |
| विशेषता | ब्रिटेन में भारतीय हितों की संगठित पैरवी करने वाली प्रारंभिक महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक |
धन-निकासी का प्रश्न और आर्थिक राष्ट्रवाद
➣ दादाभाई नौरोजी ने ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के माध्यम से भारत की आर्थिक स्थिति और औपनिवेशिक शासन से उत्पन्न धन-निकासी (Drain of Wealth) के प्रश्न को ब्रिटिश जनता एवं राजनीतिक वर्ग के सामने उठाया।
➣ उनका तर्क था कि भारत में उत्पन्न होने वाली आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभिन्न माध्यमों से ब्रिटेन चला जाता था, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में पूँजी की कमी और गरीबी की समस्या बढ़ती थी।
➣ नौरोजी ने इस आर्थिक प्रक्रिया को केवल व्यापारिक लेन-देन का परिणाम नहीं माना, बल्कि इसे औपनिवेशिक शासन की संरचना से जोड़कर देखा। उनके अनुसार भारत के संसाधनों का एक हिस्सा ऐसा था, जो भारत में पर्याप्त आर्थिक प्रतिफल दिए बिना ब्रिटेन स्थानांतरित हो जाता था।
➣ ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का मंच नौरोजी के लिए इन आर्थिक विचारों को ब्रिटेन में प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बना। उन्होंने भारतीय गरीबी और औपनिवेशिक आर्थिक व्यवस्था के बीच संबंध को तर्क एवं तथ्यों के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास किया।
➣ इस प्रकार ईस्ट इंडिया एसोसिएशन ने भारतीय आर्थिक प्रश्नों को ब्रिटिश सार्वजनिक विमर्श में स्थान दिलाने और आर्थिक राष्ट्रवाद के प्रारंभिक विकास में योगदान दिया।
➣ आगे चलकर दादाभाई नौरोजी ने अपने आर्थिक विचारों को अधिक व्यवस्थित रूप दिया, जिनमें धन-निकासी सिद्धांत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की आर्थिक आलोचना का प्रमुख आधार बना।
ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का पतन
➣ ईस्ट इंडिया एसोसिएशन लंबे समय तक भारतीय प्रश्नों को ब्रिटेन में उठाने का महत्वपूर्ण मंच बनी रही, किंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) के उदय के बाद ब्रिटेन में भारतीय राजनीतिक गतिविधियों का स्वरूप बदलने लगा। कांग्रेस ने धीरे-धीरे एक व्यापक अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर ली और उसके प्रस्तावों एवं माँगों को ब्रिटेन में प्रस्तुत करने के लिए अधिक संगठित प्रयास प्रारंभ हुए।
➣ विशेष रूप से 1889 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति की स्थापना के बाद ब्रिटेन में कांग्रेस की राजनीतिक पैरवी को एक अधिक स्पष्ट एवं संगठित संस्थागत आधार मिल गया। इससे ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की विशिष्ट राजनीतिक भूमिका अपेक्षाकृत कम होती गई।
➣ इसका अर्थ यह नहीं था कि ईस्ट इंडिया एसोसिएशन अचानक समाप्त हो गई। बल्कि समय के साथ कांग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता, ब्रिटेन में कांग्रेस की संगठित गतिविधियों तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के व्यापक होते स्वरूप के कारण इसकी स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका पहले की तुलना में कम महत्वपूर्ण हो गई।
➣ इस प्रकार ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का महत्व मुख्यतः उसके द्वारा स्थापित उस राजनीतिक परंपरा में निहित रहा, जिसमें भारतीय नेता ब्रिटेन जाकर भारतीय प्रश्नों को ब्रिटिश जनता, संसद एवं राजनीतिक वर्ग के सामने रखते थे। बाद में यही कार्य अधिक संगठित रूप में कांग्रेस की ब्रिटिश समिति द्वारा आगे बढ़ाया गया।
➣ अतः ईस्ट इंडिया एसोसिएशन को किसी एक निश्चित घटना के कारण अचानक समाप्त हुई संस्था के रूप में देखने के बजाय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विस्तार के साथ उसकी स्वतंत्र भूमिका के क्रमशः कम होने के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
ब्रिटिश समिति की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
➣ यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, कि जब ईस्ट इंडिया एसोसिएशन पहले से ही ब्रिटेन में भारतीय प्रश्नों को उठाने का कार्य कर रही थी, तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अपनी अलग ब्रिटिश समिति की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
➣ इसका मुख्य कारण यह था कि ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का स्वरूप व्यापक था। इसमें भारतीयों के साथ-साथ ब्रिटिश सदस्यों को भी स्थान दिया गया था और भारत से संबंधित विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक प्रश्नों पर चर्चा की जाती थी। इसके विपरीत कांग्रेस को अपने बढ़ते राजनीतिक कार्यक्रम और प्रस्तावों की निरंतर एवं संगठित पैरवी के लिए ब्रिटेन में एक अधिक विशिष्ट व्यवस्था की आवश्यकता थी।
➣ ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का स्वरूप अपेक्षाकृत व्यापक था। वह भारतीय एवं ब्रिटिश सदस्यों को साथ लेकर भारत से संबंधित विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक प्रश्नों पर चर्चा करती थी।
➣ किंतु इसके विपरीत कांग्रेस को अपने बढ़ते राजनीतिक कार्यक्रम और प्रस्तावों की निरंतर एवं संगठित पैरवी के लिए ब्रिटेन में एक अधिक विशिष्ट व्यवस्था की आवश्यकता महसूस हुई।
➣ कांग्रेस की राजनीतिक माँगों को केवल सार्वजनिक चर्चाओं तक सीमित रखने के बजाय उन्हें ब्रिटिश संसद, सांसदों, राजनीतिक दलों, पत्रकारों तथा प्रभावशाली जनमत तक नियमित रूप से पहुँचाना आवश्यक था। इसके लिए एक ऐसा संगठन चाहिए था, जिसका मुख्य कार्य ही कांग्रेस के पक्ष में ब्रिटिश राजनीतिक समर्थन तैयार करना हो।
➣ इसके अतिरिक्त कांग्रेस के अधिवेशनों में पारित प्रस्तावों को ब्रिटेन में लगातार प्रचारित करने, ब्रिटिश राजनेताओं से संपर्क बनाए रखने तथा भारत से संबंधित विधायी एवं प्रशासनिक प्रश्नों पर संगठित राजनीतिक दबाव बनाने के लिए एक स्थायी संगठन की आवश्यकता थी।
➣ इस प्रकार आवश्यकता केवल भारतीय प्रश्नों को ब्रिटेन में उठाने की नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीतिक माँगों के लिए ब्रिटेन में एक समर्पित और निरंतर सक्रिय राजनीतिक मंच तैयार करने की थी। इसी आवश्यकता ने आगे चलकर कांग्रेस की ब्रिटिश समिति के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और ब्रिटिश समिति में अंतर
| आधार | ईस्ट इंडिया एसोसिएशन | कांग्रेस की ब्रिटिश समिति |
|---|---|---|
| स्थापना | 1866 ई. | 1889 ई. |
| संबंध | दादाभाई नौरोजी द्वारा स्थापित स्वतंत्र संस्था | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सीधे संबद्ध |
| प्रमुख सदस्य | दादाभाई नौरोजी सहित भारतीय एवं ब्रिटिश समर्थक सदस्य | दादाभाई नौरोजी, विलियम वेडरबर्न, विलियम डिग्बी आदि |
| मुख्य स्वरूप | भारत से संबंधित व्यापक राजनीतिक एवं आर्थिक प्रश्नों पर ब्रिटेन में चर्चा एवं पैरवी | कांग्रेस के प्रस्तावों एवं राजनीतिक माँगों की ब्रिटेन में संगठित पैरवी |
| मुख्य कार्यक्षेत्र | भारतीय प्रश्नों पर ब्रिटिश जनमत तैयार करना | कांग्रेस के पक्ष में ब्रिटिश संसद, राजनेताओं एवं जनता का समर्थन प्राप्त करना |
| विशेषता | भारत और ब्रिटेन के बीच प्रारंभिक राजनीतिक-बौद्धिक संपर्क का महत्वपूर्ण मंच | कांग्रेस की ब्रिटेन-स्थित संगठित राजनीतिक पैरवी का प्रमुख माध्यम |
➣ दादाभाई नौरोजी का संबंध दोनों संस्थाओं से था, लेकिन दोनों में उनकी भूमिका अलग थी। 1866 ई. से ही ब्रिटेन में भारतीय प्रश्नों की पैरवी करने का उनका लंबा अनुभव था। इसलिए कांग्रेस की ब्रिटेन-स्थित गतिविधियों के विस्तार के समय उनका पूर्व अनुभव और संपर्क इस कार्य के लिए विशेष रूप से उपयोगी रहा।
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