➣ गांवों एवं नगरों में मस्जिद से सम्बद्ध मकतब होते थे जिसमें प्रारम्भिक शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी।
➣ सल्तनत काल में फारसी और संस्कृत भाषा के अतिरिक्त हिन्दी, उर्दू तथा सभी प्रान्तीय भाषाओं में ग्रन्थ लिखे गए।
सल्तनत काल के साहित्य
| ग्रंथ | लेखक | भाषा | संबंधित शासक/वंश |
|---|---|---|---|
| चचनामा | अली अहमद | अरबी | सिंध विजय (मुहम्मद बिन कासिम) |
| राजतरंगिणी | कल्हण | संस्कृत | कश्मीर का इतिहास |
| तबकात-ए-नासिरी | मिनहाज-उस-सिराज जुज़जानी | फ़ारसी | गुलाम वंश |
| तारीख-ए-फिरोजशाही | शम्स-ए-सिराज अफीफ | फ़ारसी | फिरोज शाह तुगलक |
| तारीख-ए-फिरोजशाह एवं फतवा-ए-जहाँदारी | जियाउद्दीन बरनी | फ़ारसी | खिलजी एवं तुगलक वंश |
| फुतूह-उस-सलातीन | ख्वाजा अब्दुल मलिक इसामी | फ़ारसी | दिल्ली सल्तनत |
| किरान-उस-सादैन | अमीर खुसरो | फ़ारसी | कैकुबाद (गुलाम वंश) |
| मिफताह-उल-फुतूह | अमीर खुसरो | फ़ारसी | जलालुद्दीन खिलजी |
| तारीख-ए-अलाई | अमीर खुसरो | फ़ारसी | अलाउद्दीन खिलजी |
| आशिका | अमीर खुसरो | फ़ारसी | खिज्र खाँ एवं देवल रानी |
| नूह सिपहर | अमीर खुसरो | फ़ारसी | कुतुबुद्दीन मुबारक शाह |
| तुगलकनामा | अमीर खुसरो | फ़ारसी | गयासुद्दीन तुगलक |
| खजाइन-उल-फुतूह | अमीर खुसरो | फ़ारसी | अलाउद्दीन खिलजी |
| संगीत राज | राणा कुम्भा | संस्कृत | मेवाड़ |
| रागमाला | पुंडरीक विट्ठल | संस्कृत | संगीत ग्रंथ |
| ताज-उल-मासिर | हसन निजामी | फ़ारसी | कुतुबुद्दीन ऐबक |
| तारीख-ए-दिल्ली | अमीर खुसरो | फ़ारसी | दिल्ली सल्तनत |
| तारीख-ए-मुहम्मदी | मुहम्मद बिहामद खाँ | फ़ारसी | मध्यकालीन भारत |
| तारीख-ए-हिन्द | अलबरूनी | अरबी | महमूद गजनवी |
| तारीख-ए-मुबारकशाही | याह्या-बिन-अहमद सरहिन्दी | फ़ारसी | सैयद वंश |
| फुतुहात-ए-फिरोजशाही | फिरोज शाह तुगलक | फ़ारसी | फिरोज शाह तुगलक |
| तारीख-ए-यामिनी | उत्बी | अरबी | सुबुक्तगीन एवं महमूद गजनवी |
| रेहला | इब्न बतूता | अरबी | मुहम्मद बिन तुगलक |
| सियासतनामा | निजाम-उल-मुल्क तूसी | फ़ारसी | सल्जूक साम्राज्य |
| रौज़त-उस-सफ़ा | मीर ख्वान्द | फ़ारसी | मध्यकालीन इस्लामी इतिहास |
| ज़फ़रनामा | मौलाना यज़दी | फ़ारसी | तैमूर |
| तारीख-ए-सलातीन-ए-अफगान | अहमद यादगार | फ़ारसी | लोदी एवं सूरी वंश |
| मखजन-ए-अफगानी | नियामतुल्ला | फ़ारसी | अफगान वंश |
| तारीख-ए-दाऊदी | अब्दुल्ला | फ़ारसी | लोदी एवं अफगान शासक |
| बहरीन | अब्दुर्रज्जाक | फ़ारसी | विजयनगर साम्राज्य का विवरण |
| गुलज़ार-ए-अबरार | मुहम्मद गौसी | फ़ारसी | सूफी संत |
| हवास-ए-कुफियाह | काज़ी शिहाबुद्दीन दौलताबादी | फ़ारसी | बहमनी सल्तनत |
| इर्शाद-बद-उल-बयान | काज़ी शिहाबुद्दीन दौलताबादी | फ़ारसी | बहमनी सल्तनत |
| सियार-उल-औलिया | मीर खुर्द | फ़ारसी | सूफी संत |
| आइन-उल-मुल्की | आइन-उल-मुल्क मुल्तानी | फ़ारसी | दिल्ली सल्तनत |
| मुनशात-ए-महरू | आइन-उल-मुल्क सुल्तानी | फ़ारसी | दिल्ली सल्तनत |
| ब्रह्मसूत्र | बादरायण | संस्कृत | वैदिक दर्शन |
| शास्त्रदीपिका | पार्थसारथी | संस्कृत | मीमांसा दर्शन |
| प्रतापरुद्रदेव यशोभूषण | अगस्त्य | संस्कृत | काकतीय वंश |
| कृषि चरित | अगस्त्य | संस्कृत | काकतीय वंश |
| रुक्मिणी कल्याण | विद्या चक्रवर्ती | संस्कृत | दक्षिण भारत |
| नरकासुर विजय | माधव | संस्कृत | विजयनगर साम्राज्य |
| पार्वती परिणय | वामनभट्ट बाण | संस्कृत | विजयनगर साम्राज्य |
| दुर्गाभक्ति तरंगिणी | विद्यापति | संस्कृत | मिथिला |
| शंकर विजय | विद्यारण्य | संस्कृत | विजयनगर साम्राज्य |
| रामायण विलास | राजा विरुपाक्ष | संस्कृत | विजयनगर साम्राज्य |
| जाम्बवती कल्याण | कृष्णदेव राय | संस्कृत | विजयनगर साम्राज्य |
| हम्मीर रासो | सारंगधर | हिन्दी | राजपूत काल |
| हम्मीर काव्य | सारंगधर | संस्कृत | रणथम्भौर के हम्मीरदेव |
| आल्हखण्ड | जगनिक | हिन्दी | चंदेल वंश |
| विजयपाल रासो | नल्ल सिंह | हिन्दी | राजपूत काल |
| बीसलदेव रासो | नरपति नाल्ह | हिन्दी | चौहान वंश |
| चन्दायन | मुल्ला दाऊद | अवधी | प्रेमाख्यान साहित्य |
| मृगावती | कुतुबन | अवधी | सूफी प्रेमाख्यान |
| मधुमालती | मंझन | अवधी | सूफी प्रेमाख्यान |
| पद्मावत | मलिक मुहम्मद जायसी | अवधी | सूफी प्रेमाख्यान |
➣ चचनामा, फुतूह-अल-बुल्दान नामक पुस्तक से अरबों की सिंध विजय का विवरण प्राप्त होता है।
➣ भारत में कुरान का सर्वप्रथम अनुवाद सिंधि भाषा में हुआ।
फारसी भाषा में अनुवादित पुस्तकें
| संस्कृत ग्रंथ | फ़ारसी अनुवादक |
|---|---|
| महाभारत | नकीब खाँ, बदायूँनी, अबुल फ़ज़ल एवं फैज़ी |
| रामायण | बदायूँनी |
| अथर्ववेद | बदायूँनी एवं हाजी इब्राहीम सरहिंदी |
| लीलावती | फैज़ी |
| राजतरंगिणी | शाह मुहम्मद शाहबादी |
| कालियदमन | अबुल फ़ज़ल |
| नल-दमयंती | फैज़ी |
| हरिवंश | मौलाना शेरी |
| 50 उपनिषद्, भगवद्गीता एवं योग वशिष्ठ | दारा शिकोह |
स्थापत्य कला
➣ जॉन मार्शल ने सल्तनत स्थापत्य कला को हिन्दू इस्लामी कला कहा है। इसमें भारतीय स्थापत्य की क्षैतिज शैली एवं इस्लामी स्थापत्य की मेहराब-धरनी शैली का समन्वय किया गया है।
➣ भारतीय स्थापत्य की मुख्य विशेषता शहतीर/धरनी थी। इस्लामी स्थापत्य की सबसे मुख्य विशेषता थी मेहराब व गुम्बद का प्रयोग।
➣ मेहराब एवं गुम्बद मूलतः तुर्क मुसलमानों के आविष्कार नहीं थे, इसको अरबों ने रोम से ग्रहण किया था।
➣ इस्लाम में जीवित वस्तुओं का चित्रण निषिद्ध होने के कारण ज्यामितीय डिजायनों का अंकन प्रचलित था। तुर्कों ने हिन्दू अलंकरण चिन्हों जैसे घंटी, बेल, स्वास्तिक, कमल आदि का प्रयोग किया।
➣ इन इमारतों पर अलंकरण के लिये ज्यामितिक व फूलों के डिजायनों के साथ कुरान की आयतों को अरबी में लिखा जाता था। अलंकरण की यह विधि अरेबस्क कहलाती थी।
ग़ुलाम वंश स्थापत्य कला
➣ दिल्ली के रायपिथौरा किले की जगह पर ऐबक ने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई, जो भारत में बनी पहली तुर्क मस्जिद मानी जाती है। यह स्थान पहले एक जैन मंदिर था और फिर विष्णु मंदिर के रूप में इस्तेमाल हुआ। इस मस्जिद का निर्माण 1197 ई. में हुआ।
➣ इण्डो-इस्लामिक शैली की यह पहली बड़ी मिसाल थी। बाद में इल्तुतमिश और अलाउद्दीन खिलजी दोनों ने इस मस्जिद का विस्तार करवाया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने इसके खंभों पर कुरान की आयतें खुदवाईं। मशहूर मेहरौली का लौह स्तम्भ भी इसी मस्जिद के परिसर में मौजूद है — यह स्तम्भ अपनी बेजोड़ धातु-विद्या के लिए जाना जाता है, क्योंकि सदियों बाद भी इसमें जंग नहीं लगी।
➣ अजमेर में अढाई दिन का झोंपड़ा 1200 ई. में ऐबक ने बनवाया था। यह इमारत पहले एक संस्कृत पाठशाला यानी मठ हुआ करती थी। इसकी दीवारों पर चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ द्वारा रचित संस्कृत नाटक हरिकेलि के कुछ अंश भी खुदे मिलते हैं।
➣ कुतुबमीनार का काम 1197 ई. में शुरू हुआ और इसे 1232 ई. में इल्तुतमिश ने पूरा करवाया। माना जाता है कि इसका नाम सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया।
➣ कुतुबमीनार को आज यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है, और यह दुनिया की सबसे ऊँची ईंट से बनी मीनारों में शुमार है।
➣ मीनार की बालकनियाँ स्टेलेक्टाइट हनी-कोंबिंग तकनीक से मुख्य ढांचे से जोड़ी गई हैं। इसके आधार पर लगे एक शिलालेख में फजल इब्न अबुल माली का नाम दर्ज है।
➣ फिरोज तुगलक ने इसकी मरम्मत के साथ एक और (पांचवीं) मंजिल जोड़ी। फिर 1506 ई. में सिकंदर लोदी ने इसकी मरम्मत करवाई। आज इसकी ऊंचाई लगभग 234 फीट है, जो इसे दुनिया की सबसे ऊँची ईंट की मीनारों में शामिल करती है।
➣ इल्तुतमिश का मकबरा दिल्ली में 1234 ई. के आसपास बना एक एक-कक्षीय मकबरा है, जो लाल पत्थर से तैयार किया गया है। इसमें हिंदू और इस्लामी दोनों शैलियों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।
➣ इल्तुतमिश ने 1231 ई. में अपने बड़े बेटे नासिरुद्दीन का मकबरा बनवाया, जिसे भारत में बना पहला मकबरा माना जाता है।
➣ इसी वजह से इल्तुतमिश को मकबरा शैली का जनक कहा जाता है।
➣ इल्तुतमिश ने अपना मकबरा भी कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद परिसर में ही लाल बलुआ पत्थर से बनवाया था।
➣ उन्होंने बदायूँ में जामा मस्जिद और शम्सी ईदगाह बनवाई, साथ ही नागौर में अतरकीन का दरवाज़ा भी बनवाया। बाद में मुहम्मद बिन तुगलक ने इस दरवाज़े का पुनर्निर्माण करवाया।
➣ इल्तुतमिश ने अपने पुत्र की याद में दिल्ली में मदरसा-ए-नासिरी और मुइज्जुद्दीन मुहम्मद गौरी के नाम पर मदरसा-ए-मुइज्जी दिल्ली व बदायूँ दोनों जगह बनवाए।
➣ बलबन का मकबरा शुद्ध इस्लामी शैली में बना भारत का पहला मकबरा माना जाता है। इसमें पहली बार सच्ची मेहराब तकनीक अपनाई गई, जो तिकोने पत्थरों और एक मुंडेर-पत्थर के सहारे टिकी थी। यह मकबरा बलबन ने अपने जीवनकाल में स्वयं बनवाया था।
➣ बलबन ने इल्तुतमिश के श्वेत महल (कसर-ए-सफेद) के अलावा अपने पुत्र शहज़ादा मुहम्मद का मकबरा और लाल महल (कसर-ए-लाल) भी बनवाए — ये दोनों इमारतें दिल्ली में स्थित हैं।
➣ मशहूर यात्री इब्नबतूता के लेखों के मुताबिक बलबन ने दार-उल-अमन नाम की इमारत बनवाई थी, जहाँ सुल्तानों की कब्रें रखी जाती थीं।
➣ कैकूबाद ने किलूखरी महल का निर्माण शुरू करवाया था, जिसे बाद में जलालुद्दीन खिलजी ने पूरा करवाया। इस लेख को पुनर्लेखित करें ताकि कॉपीराइट संबंधी जोखिम कम हो जाए। मूल अर्थ, तथ्य और संदर्भ में कोई बदलाव न करें। भाषा को अधिक सरल, स्वाभाविक और मानव-अनुकूल बनाएं। यदि विषय से जुड़े कोई सत्यापित एवं उपयोगी तथ्य हों, तो उन्हें उचित स्थान पर जोड़ सकते हैं। HTML स्ट्रक्चर बिल्कुल वैसा ही रखें। साथ ही, अपनी तरफ से इतिहास/ के 1 या 2 प्रामाणिक और महत्वपूर्ण अतिरिक्त तथ्य (Extra Facts) उसी व्याख्या के अंदर जोड़ दो, जो इस प्रश्न से संबंधित हों। ध्यान रहे कि अतिरिक्त तथ्य बिल्कुल सही होने चाहिए।
खिलजी वंश
➣ अलाउद्दीन खिलजी के समय बनी इमारतों में इस्लामी स्थापत्य शैली का पूरी तरह पालन किया गया। इस कारण अलाउद्दीन खिलजी को गुम्बद निर्माण का जनक माना जाता है।
➣ सन् 1311 में अलाउद्दीन खिलजी ने अलाई दरवाजा बनवाया, जो कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का दक्षिणी द्वार है। यहीं पहली बार त्रिकोणीय आधार वाले पत्थरों की वैज्ञानिक तकनीक से गुंबद तैयार किया गया।
➣ इसी इमारत में पहली बार घोड़े की नाल जैसी आकृति वाली मेहराब बनाई गई थी।
➣ इतिहासकार मार्शल ने अलाई दरवाजे को इस्लामी स्थापत्य कला का सबसे बेहतरीन रत्न बताया था। यह भवन लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से बना है और इसमें कुरान की आयतें बड़े सुंदर ढंग से उत्कीर्ण की गई हैं।
➣ अलाई दरवाजा भारत की वह पहली इमारत है जिसमें पूरी तरह इस्लामी निर्माण-पद्धति अपनाई गई। इसमें चार-केंद्रीय मेहराब (चतुष्केन्द्रीय आर्च) का इस्तेमाल हुआ है।
➣ दिल्ली सल्तनत की इमारतों में संगमरमर का उपयोग सबसे पहले अलाई दरवाजे में ही देखने को मिलता है।
➣ अलाई दरवाजे की दीवारों की मोटाई लगभग 3.4 मीटर है, जिससे यह संरचनात्मक रूप से बेहद मजबूत मानी जाती है, और इसके गुंबद-निर्माण की तकनीक ने आगे चलकर तुग़लक़ और लोदी काल की इमारतों को भी प्रभावित किया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने जमातखाना मस्जिद भी बनवाई, जो अपने समय की सबसे बड़ी और पहली पूर्णतः इस्लामी शैली में बनी मस्जिद थी। यह दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के निकट स्थित है और लाल पत्थर से निर्मित है।
➣ मंगोल आक्रमणों से बचाव के लिए अलाउद्दीन ने दिल्ली में सीरी किला बनवाया, जिसके भीतर हजार खंभों वाला महल (हजार सुतून) भी शामिल था। बरनी ने सीरी को शहर-ए-नौ (नया शहर) कहा है।
➣ अलाउद्दीन ने कुतुबमीनार से दोगुनी ऊँचाई की एक मीनार, अलाई मीनार, बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन उसकी मृत्यु के बाद यह काम केवल एक मंज़िल तक ही पूरा हो सका और फिर रुक गया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने सीरी के पास एक तालाब बनवाया, जिसे हौज-ए-अलाई या हौज-ए-खास के नाम से जाना जाता है।
➣ मुबारक खिलजी के शासनकाल में मलिक काफूर ने बयाना (भरतपुर क्षेत्र) में ऊखा मस्जिद का निर्माण करवाया था।
तुगलक वंश
➣ तुगलक स्थापत्य की महत्वपूर्ण विशेषता इसकी ढलवां दीवारे (सलामी पद्धति/निप्रवण) हैं। हालांकि फिरोज तुगलक की इमारतों में ढलवां दीवारों का प्रयोग नहीं मिलता।
➣ तुगलक स्थापत्य की दूसरी विशेषता मेहराब तथा शहतीर व स्तम्भ/सरदल पद्धति के सिद्धान्तों का मिश्रण है। फिरोज तुगलक की इमारतों में यह विशेषता परिलक्षित होती है।
➣ तुगलक शासक अपनी इमारतों में महंगे लाल पत्थर के स्थान पर सस्ता आसानी से उपलब्ध मटमैला पत्थर लगाते थे। इसीलिए तुगलक कालीन इमारतों में बहुत कम अंलकरण मिलता है।
➣ गियासुद्दीन तुगलक का मकबरा दिल्ली में तुगलकाबाद किले के बाहर कृत्रिम झील के मध्य स्थित है, जो शेरशाह सूरी के मकबरे का पूर्वगामी है।
➣ गियासुद्दीन का मकबरा शिखर हिंदू वास्तुकला के प्रतीकों कलश और आमलक पर आधारित है। यह पंच भुजीय है। यह मकबरा मिस्र के पिरामिड की भांति 75° के कोण पर अंदर की ओर झुका है।
➣ ये सिरी तथा रायपिथौरागढ़ के बीच स्थापित नगर है, यह नगर चौथी दिल्ली कहलाया। 5वीं दिल्ली के रूप में एक महल बनवाया गया और उसका नाम कोटला फिरोजशाह रखा गया। टोपरा से अशोक का स्तंभ यहां स्थापित करवाया गया।
➣ गयासुद्दीन ने दिल्ली में छप्पन कोट का दुर्ग बनवाया। यह रोमन शैली में बना है।
➣ जहांपनाह नामक नगर मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा बनवाया गया है। यह वर्गाकार मकबरा है जिसके निर्माण में संगमरमर का प्रयोग हुआ है तथा दीवारों को फूल-पत्तियों की बेलों से सुसज्जित किया गया है। मकबरे के सामने पत्थर का कटहरा हिंदू वास्तुकला की संरचना है।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली में जहांपनाहनगर व तुगलकाबाद के निकट आदिलाबाद फोर्ट का निर्माण करवाया तथा बलबन के लाल महल की मरम्मत करवायी।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने 12 खम्भा महल तथा निजामुद्दीन औलिया के मकबरे का निर्माण करवाया।
➣ फिरोज ने दिल्ली में फिरोज शाह कोटला नामक नया किला बनाया तथा हौज खास के निकट मदरसा बनवाया।
➣ फिरोज तुगलक ने हौज खास में अपने प्रधानमंत्री खान-ए-जहाँ तेलंगानी (मलिक मकबूल) का अष्टभुजाकार मकबरा बनवाया। यह दिल्ली में निर्मित प्रथम अष्ट भुजाकार मकबरा है।
➣ सैय्यद वंश के शासक मुबारकशाह का मकबरा एवं मोहम्मदशाह का मकबरा भी अष्टभुजाकार है।
➣ फिरोज तुगलक ने इल्तुतमिश द्वारा निर्मित हौज-ए-शम्सी एवं अलाउद्दीन द्वारा निर्मित हौज ए अलाई का पुनर्निर्माण करवाया।
➣ फिरोजशाह की सभी इमारतों में अलंकरण लिए कमल के नमूने का प्रयोग हुआ है।
➣ वास्तुकला/निर्माण योजना में रूचि के कारण वूल्जले हेग ने फिरोज तुगलक की तुलना रोमन सम्राट आगस्टस से की है।
लोदी वंश
➣ पर्सी ब्राउन ने सैयद एवं लोदी काल को मकबरों का युग कहा है। इस समय वर्गाकार आधार पर भी अनेक मकबरों का निर्माण हुआ।
➣ लोदियों ने एक और शैली का प्रयोग किया, वह थी इमारतों को विशेषतः मकबरों को ऊँचे चबूतरे पर बनाना। कुछ मकबरे उद्यानों के मध्य में बनाये गये हैं। दिल्ली लोदी उद्यान इसका सुन्दर उदाहरण है।
➣ लोदी काल के मकबरों को दो भागों में बांटा जा सकता है- (i) सुल्तानों द्वारा बनवाये गये अष्टभुजी मकबरे और (ii) उनके अमीरों द्वारा निर्मित चतुर्भुजी मकबरे ।
➣ सिकन्दर लोदी के समय एक नई शैली की शुरुआत हुई, जिसमें एक गुम्बद के स्थान पर दो गुम्बदों (द्विगुम्बदीय) का निर्माण होता था।
➣ सिकन्दर लोदी के मकबरे में सर्वप्रथम दोहरे गुम्बद का प्रयोग हुआ है। यह मकबरा अष्टभुजाकार/अष्टकोणीय भी है।
➣ दिल्ली की मोठ मस्जिद सिकन्दर लोदी के प्रधानमंत्री मियाँ भुवा ने बनाई।
मध्यकालीन अट्टभुजाकार मकबरे
➣ अष्टभुजाकार मकबरे की शुरुआत 1368-69 ई. में दिल्ली स्थित खान-ए-जहाँ तेलंगानी के मकबरे में हुई है।
| मकबरा | निर्माता | निर्माण वर्ष |
|---|---|---|
| खाने-ए-जहाँ तेलंगानी का मकबरा (निजामुद्दीन, दिल्ली) |
जौनाशाह | 1368–69 ई. |
| मुबारक शाह सैयद का मकबरा (कोटला मुबारकपुर, दिल्ली) |
मुहम्मद शाह सैयद | 1434 ई. |
| मुहम्मद शाह सैयद का मकबरा (लोधी गार्डन, दिल्ली) |
अलाउद्दीन आलमशाह | 1444 ई. |
| सिकन्दर लोदी का मकबरा (लोधी गार्डन, दिल्ली) |
इब्राहीम लोदी | 1517 ई. |
| हसन अली खाँ का मकबरा (सासाराम, बिहार) |
शेरशाह सूरी | 1540 ई. |
| शेरशाह सूरी का मकबरा (सासाराम, बिहार) |
शेरशाह सूरी | 1545 ई. |
| इस्लाम शाह सूरी का मकबरा (सासाराम, बिहार) |
आदिलशाह सूरी | 1553 ई. |
सल्तनतकालीन इमारतें
| इमारतें | संबंधित शासक |
|---|---|
| कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद | कुतुबुद्दीन ऐबक |
| कुतुबमीनार- दिल्ली | कुतुबुद्दीन ऐबक व इल्तुतमिश |
| अढ़ाई दिन का झोपड़ा- अजमेर | कुतुबुद्दीन ऐबक |
| इल्तुतमिश का मकबरा- दिल्ली | इल्तुतमिश |
| जामा मस्जिद, बदायूं | इल्तुतमिश |
| हौज-ए-शम्सी, बदायूं | इल्तुतमिश |
| अतारकिन का दरवाजा | इल्तुतमिश |
| नासिरुद्दीन महमूद का मकबरा | इल्तुतमिश |
| सुल्तानगढ़ी का मकबरा | इल्तुतमिश |
| सीरी का किला | अलाउद्दीन खिलजी |
| हजार सितून | अलाउद्दीन खिलजी |
| लाल महल | बलबन |
| बलबन का मकबरा | बलबन |
| जमात खाना मस्जिद | अलाउद्दीन खिलजी |
| अलाई दरवाजा, दिल्ली | अलाउद्दीन खिलजी |
| जमायतखाना मस्जिद | अलाउद्दीन खिलजी |
| सीरी नगर, दिल्ली | अलाउद्दीन खिलजी |
| ऊखा मस्जिद | मुबारक खिलजी |
| हजार सितून (स्तम्भ) | अलाउद्दीन खिलजी |
| तुगलकाबाद, दिल्ली | गयासुद्दीन तुगलक |
| गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा | मुहम्मद बिन तुगलक |
| आदिलाबाद का मकबरा | मुहम्मद बिन तुगलक |
| शेख निजामुद्दीन औलिया का मकबरा | मुहम्मद बिन तुगलक |
| फिरोजशाह तुगलक का मकबरा | मुहम्मद बिन तुगलक |
| फिरोजशाह का मकबरा | जूनाशाह खानेजहाँ |
| काली मस्जिद | जूनाशाह खानेजहाँ |
| खिर्की मस्जिद | जूनाशाह खानेजहाँ |
| बहलोल लोदी का मकबरा | लोदी काल |
| सिकन्दर शाह लोदी का मकबरा | इब्राहीम लोदी |
| मोठ की मस्जिद | मियाँ भुआ |
| खान-ए-जहां तेलंगानी का मकबरा | खाने जहां जौनाशाह |
मध्यकाल में दिल्ली में स्थापित सात शहर
| शहर | संस्थापक | शहर की विशेषता |
|---|---|---|
| किला राय पिथौरा | इल्तुतमिश | दिल्ली सल्तनत की प्रारम्भिक राजधानी के रूप में विकसित किया तथा इसे प्रशासनिक केंद्र बनाया। |
| सीरी | अलाउद्दीन खिलजी | दिल्ली का दूसरा नगर; मंगोल आक्रमणों से सुरक्षा हेतु सुदृढ़ किलेबंद राजधानी। |
| तुगलकाबाद | गयासुद्दीन तुगलक | विशाल पत्थर के किले और मजबूत रक्षा व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध। |
| जहाँपनाह | मुहम्मद बिन तुगलक | सीरी और किला राय पिथौरा को जोड़कर निर्मित नया नगर। |
| कोटला फिरोज शाह | फिरोज शाह तुगलक | अशोक स्तंभ की स्थापना तथा फिरोज शाह के महल एवं प्रशासनिक भवनों के लिए प्रसिद्ध। |
| दीन पनाह | हुमायूँ | मुगल साम्राज्य की नई राजधानी के रूप में स्थापित; बाद में शेरशाह ने इसे विकसित किया। |
| शाहजहाँबाद | शाहजहाँ | पुरानी दिल्ली; लाल किला, जामा मस्जिद और चाँदनी चौक के लिए प्रसिद्ध। |
चित्रकला
➣ सल्तनत काल में चित्रकला के प्रचलन का सबसे प्रारम्भिक उल्लेख बैहाकी द्वारा लिखित गजनवियों के इतिहास में मिलता है।
➣ इस्लाम में जीवित प्राणियों के चित्र बनाना प्रतिबन्धित होने के कारण अधिकांश सल्तनत कालीन प्रारम्भिक सुल्तानों ने चित्रकला में रूचि नहीं ली।
➣ सर्वप्रथम 1947 ई. में हरमन गोइट्स ने दी जनरल ऑफ दी इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएन्टल आर्ट में अपने लेख में कहा कि दिल्ली सल्तनत के काल में चित्रकला का अस्तित्व था।
➣ सल्तनतकालीन चित्रकला के अवशेष सीरी एवं बेगमपुर के मध्य स्थित मखदूमवली मस्जिद से प्राप्त होते हैं।
➣ नियामतनामा (पाकशास्त्र का एक ग्रन्थ) एवं मिफताह उल फुजाला (फारसी शब्दकोष) से लघुचित्र प्राप्त होते हैं। नियामतनामा की खोज राबर्ट स्कैलटन ने की थी।
➣ सल्तनत कालीन चित्रकला का प्रथम उल्लेख बैहाकी द्वारा लिखित गजनवियों के इतिहास में मिलता है।
➣ फुतूह-उस-सलातीन के अनुसार इल्तुतमिश के समय में चीन के चित्रकार दिल्ली आये।
➣ शम्स-ए-सिराज अफीफ तारीख-ए-फिरोजशाही में सल्तनत कालीन चित्रकला का कुछ वर्णन देता है। उसके अनुसार फिरोज तुगलक ने यह आदेश दिया कि आरामगृहों में हिन्दू नरेशों के चित्र नहीं लगाने चाहिये।
➣ सल्तनत काल में भित्ति चित्रों (दीवारों पर बनाये गये चित्र) के निर्माण को स्वीकार किया गया।
➣ सल्तनत युग की प्रारम्भिक चित्रांकित हिन्दू-मुस्लिम पाण्डुलिपि अमीर खुसरो देहलवी की खम्सा नामक पाण्डुलिपि है।
➣ अमीर खुसरो द्वारा लिखी गयी पुस्तक नुहसिपिहर में सुन्दर चित्रित वस्त्रों का वर्णन मिलता है।
संगीत कला
➣ इस्लाम धर्म में संगीत कला वर्जित था; परन्तु भारतीय संगीत ने तुर्की शासकों पर प्रभाव डाला, जिसके फलस्वरूप बलबन उसका पुत्र बुगरा खाँ, अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक जैसे सुल्तानों ने संगीत को संरक्षण प्रदान किया।
➣ मध्यकालीन संगीत परम्परा के आदि संस्थापक अमीर खुसरो थे। सर्वप्रथम उन्होंने भारतीय संगीत में कव्वाली गायन को प्रचलित किया।
➣ खुसरो को तिलक, साजगिरी, सरपदा, औमन, घोर, सनम आदि रागों को प्रचलित करने के कारण, नायक की उपाधि प्रदान की गयी थी।
➣ अमीर खुसरो को सितार तथा तबले के निर्माण का भी श्रेय प्रदान किया जाता है। मृदंग में परिवर्तन कर तबले का आविष्कार किया गया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत के महान संगीतज्ञ गोपाल को अपने दरबार में बुलाया तथा अमीर खुसरो को संरक्षण प्रदान किया।
➣ संगीत के क्षेत्र में सबसे पुराना ग्रन्थ संगीत रत्नाकार के नाम से जाना जाता है। इसकी रचना 1210-47 ई. के बीच में शारंगदेव (देवगिरी का दरबारी संगीतज्ञ) के द्वारा की गई।
➣ गयासुद्दीन तुगलक संगीत का विरोधी था। उसने साम्राज्य में संगीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक भी संगीत प्रेमी था। उसके दरबार में 1200 गायक थे।
➣ फिरोज तुगलक के समय संगीत के शास्त्रीय ग्रन्थ रागदर्पण का फारसी अनुवाद हुआ।
➣ लोदी काल में संगीत अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ। लज्जत-ए-सिकन्दरी नामक संगीत के ग्रन्थ की रचना सिकन्दर लोदी के काल में हुई।
➣ फिरोज तुगलक के शासनकाल में संगीत के एकीकरण की प्रक्रिया अनवरत चलती रही, इसी समय शास्त्रीय रचना रागदर्पण का फारसी में अनुवाद हुआ।
➣ जौनपुर के सभी शर्की सुल्तान संगीत प्रेमी थे। हुसैन शाह शर्की ने राग ख्याल को भारतीय संगीत में सम्मिलित किया। उसके संरक्षण में संगीत शिरोमणि नामक ग्रन्थ की रचना हुई।
➣ उत्तर भारत का पहला संगीत सम्मेलन हुसैन शाह शर्की द्वारा आयोजित किया गया। हुसैन शाह शर्की ने गन्धर्व की उपाधि धारण की।
➣ ग्वालियर का राजा मानसिंह भी संगीत प्रेमी थे। मानसिंह ने मान कौतूहल नामक संगीत ग्रन्थ की रचना करवाई। उसके समय में ध्रुपद का सृजन हुआ।
➣ बहमनी शासकों में फिरोजशाह एवं महमूदशाह तथा बीजापुर के युसूफ आदिलशाह ने संगीत कला को संरक्षण प्रदान किया।
➣ इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय ने हिन्दी गीत संग्रह किताब-ए-नौरस की रचना की।
➣ अहमदनगर में चाँद बीबी भी योग्य संगीतकार थी व इस कला को संरक्षण दिया।
➣ विजयनगर दक्षिण में संगीत का प्रमुख केन्द्र था। सबसे प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय संगीत शैली का ग्रंथ रमामात्य द्वारा लिखित स्वरमेल कलानिधि है।
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