1. अमीर खुसरो का जन्म हुआ था ?
U.P.P.C.S. (Pre) 2003
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
उत्तर-(c)
अमीर खुसरो का जन्म सन् 1253 ई. में पटियाली नामक कस्बे में हुआ था, जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कासगंज (कासीरामनगर) जिले में स्थित है। उनके पिता अमीर सैफुद्दीन महमूद मध्य एशिया के लाचीन तुर्क कबीले से थे और चंगेज खान के आक्रमण के समय भारत आकर बस गए थे। खुसरो ने अपनी रचनाओं में स्वयं को “तूती-ए-हिंद” यानी हिंदुस्तान का तोता कहा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खुसरो को संगीत में सितार और तबला के आविष्कार से भी जोड़ा जाता है (यद्यपि इस पर इतिहासकारों में मतभेद है), और उन्होंने फारसी की कई काव्य विधाओं जैसे गजल, मसनवी और कसीदा को भारत में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. ‘किताब-उल-हिंद’ रचना के प्रसिद्ध लेखक का क्या नाम था ?
R.A.S/R.T.S. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
‘किताब-उल-हिंद’ (तहकीक-ए-हिंद) के लेखक अलबरूनी का मूल नाम अबू रैहान मुहम्मद इब्न अहमद अलबरूनी था, जिनका जन्म ख्वारिज्म (वर्तमान उज्बेकिस्तान) में हुआ था। वे महमूद गजनवी के साथ भारत आए और संस्कृत भाषा सीखकर भारतीय दर्शन, विज्ञान, गणित तथा सामाजिक रीति-रिवाजों का गहन अध्ययन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अलबरूनी को “भारतविद्या (Indology) का जनक” कहा जाता है, और उन्होंने अपनी पुस्तक में भारतीय जाति व्यवस्था, त्योहारों तथा खगोलशास्त्र का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया था, जो उस काल के भारत को समझने का एक प्रमुख स्रोत है।
3. अमीर खुसरो ने किसके विकास में अग्रगामी की भूमिका निभाई?
U.P. P.C.S. (Pre) 2002
U.P.P.C.S. (Pre) 2008
U.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(c)
अमीर खुसरो ने हिंदवी (खड़ी बोली के प्रारंभिक रूप) के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई और इसे फारसी के साथ मिलाकर एक नई मिश्रित काव्य-शैली विकसित की, जिसे आगे चलकर “रेख्ता” कहा गया। उन्होंने पहेलियों, मुकरियों और दो सुखनों जैसी लोकप्रिय काव्य विधाओं की भी रचना की, जो आज भी प्रचलित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी मिश्रित भाषा परंपरा से बाद में उर्दू भाषा का विकास हुआ, और इस कारण अमीर खुसरो को उर्दू साहित्य का आदि कवि (प्रारंभकर्ता) भी माना जाता है।
4. ‘तूती-ए-हिंद’ अमीर खुसरो का जन्म हुआ था-
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(c)
पटियाली, जो खुसरो की जन्मस्थली थी, गंगा नदी के किनारे स्थित एक कस्बा है और वर्तमान में कासगंज जिले का हिस्सा है। यहीं उनके पिता ने सुल्तान बलबन के शासनकाल में बसकर जीवन-यापन किया था। बाद में खुसरो दिल्ली आ गए, जहाँ उनका संबंध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया से हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खुसरो की मृत्यु के बाद उन्हें दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के निकट ही दफनाया गया, और आज भी हर वर्ष उनकी दरगाह पर उर्स का आयोजन होता है जिसमें कव्वाली गायन की परंपरा निभाई जाती है।
5. निम्नलिखित में से किसने स्वयं को ‘हिंदोस्तान का तोता’ कहा ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
उत्तर-(c)
अमीर खुसरो ने अपनी वाक्पटुता और काव्य-प्रतिभा के कारण स्वयं को “हिंदोस्तान का तोता” कहा, क्योंकि वे फारसी, अरबी, तुर्की और हिंदवी सहित कई भाषाओं में सहज रूप से रचना कर सकते थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘खजाइन-उल-फुतूह’, ‘तुगलकनामा’ और ‘नूह सिपिहर’ शामिल हैं, जो दिल्ली सल्तनत के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘नूह सिपिहर’ में खुसरो ने भारत की भौगोलिक स्थिति, भाषाओं, फलों और संस्कृति की प्रशंसा करते हुए इसे विश्व के अन्य देशों से श्रेष्ठ बताया था, जो उनके गहरे भारत-प्रेम को दर्शाता है।
6. प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो निम्नांकित में से किस बादशाह के दरबार से संबद्ध था?
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2004
उत्तर-(b)
अमीर खुसरो ने अपने करियर की शुरुआत सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के पुत्र राजकुमार मुहम्मद की सेवा से की थी। मंगोल आक्रमणकारियों के साथ हुए एक युद्ध में राजकुमार मुहम्मद की मृत्यु हो गई और खुसरो को बंदी बना लिया गया, परंतु वे भागकर पुनः दिल्ली दरबार पहुँच गए। इसके बाद वे क्रमशः बलबन, कैकुबाद, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, मुबारक शाह खिलजी, गयासुद्दीन तुगलक तथा मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल से जुड़े रहे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खुसरो ने इस प्रकार कुल मिलाकर सात या उससे अधिक सुल्तानों के शासनकाल को देखा था, और सन् 1325 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के सिंहासन पर बैठने के कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई।
7. निम्नलिखित में से किसने दिल्ली के सात सुल्तानों का शासनकाल देखा था ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
I.A.S. (Pre) 1994
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(*)
अमीर खुसरो और सूफी संत शेख निजामुद्दीन औलिया दोनों ही दीर्घजीवी थे और दोनों ने दिल्ली सल्तनत के सात या उससे अधिक सुल्तानों का शासनकाल अपनी आँखों से देखा था, इसलिए यह प्रश्न बहुविकल्पीय (दोनों सही) माना गया है। निजामुद्दीन औलिया चिश्ती सिलसिले के प्रमुख संत थे और उनकी दरगाह दिल्ली में आज भी श्रद्धा का केंद्र है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो और निजामुद्दीन औलिया के बीच गुरु-शिष्य का अत्यंत गहरा संबंध था, और दोनों की मृत्यु एक ही वर्ष (1325 ई.) में हुई थी, मात्र कुछ महीनों के अंतराल पर।
8. प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो दरबार में रहे-
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2002
उत्तर-(a)
अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में अमीर खुसरो को विशेष राजकीय संरक्षण प्राप्त था, और इसी काल में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘खजाइन-उल-फुतूह’ लिखी, जिसमें अलाउद्दीन के सैनिक अभियानों, जैसे चित्तौड़ और देवगिरि विजय, का वर्णन मिलता है। अलाउद्दीन के शासनकाल को दिल्ली सल्तनत के सैन्य विस्तार और प्रशासनिक सुधारों (बाजार नियंत्रण व्यवस्था) के लिए जाना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खुसरो ने ‘तारीख-ए-अलाई’ नामक रचना में भी अलाउद्दीन के शासनकाल की घटनाओं का उल्लेख किया है, जो उस समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने में सहायक है।
9. अमीर खुसरो किसका दरबारी कवि था ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(b)
अलाउद्दीन खिलजी (शासनकाल 1296-1316 ई.) के दरबार में अमीर खुसरो को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था और उन्हें “मलिक-उश-शुअरा” (कवियों का राजा/मुख्य कवि) की उपाधि दी गई थी। इस काल में खुसरो ने अपनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं काव्य रचनाएं लिखीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अलाउद्दीन खिलजी पहला सुल्तान था जिसने “खलीफा” की औपचारिक मान्यता के बिना स्वयं को सुल्तान घोषित किया और सिक्कों पर अपना नाम अंकित कराया, जो उसकी स्वतंत्र सत्ता की भावना को दर्शाता है।
10. अमीर खुसरो निम्नलिखित में से किसके शासनकाल से संबंधित थे?
M.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(a)
अमीर खुसरो का संबंध अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस अवधि में उन्हें अधिकतम राजकीय प्रोत्साहन मिला और उनकी साहित्यिक प्रतिभा अपने शिखर पर पहुँची। हालांकि उनका जीवनकाल कई सुल्तानों के शासन तक फैला था, फिर भी अलाउद्दीन के समय की रचनाएं इतिहासकारों के लिए सबसे प्रमाणिक स्रोत मानी जाती हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो को संगीत की ‘कव्वाली’ शैली के विकास का श्रेय भी दिया जाता है, जिसमें फारसी और भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपराओं का मिश्रण देखा जाता है, और यह परंपरा आज भी सूफी दरगाहों में जीवित है।
11. ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रयोग मध्यकालीन संस्कृत ग्रंथों में होता है।
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
मध्यकालीन संस्कृत ग्रंथों में ‘अपभ्रंश’ शब्द का उपयोग आधुनिक भारतीय भाषाओं के प्रारंभिक रूपों को संदर्भित करने के लिए किया जाता था। महाभाष्यकार पतंजलि ने संस्कृत के लोक-व्यवहार में आए विकृत रूपों को ‘अपभ्रंश’ नाम दिया था। भाषाविदों के अनुसार हिंदी, पंजाबी, मराठी, सिंधी, कश्मीरी जैसी उत्तरी भारतीय भाषाएँ अपभ्रंश की ही संतानें हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अपभ्रंश साहित्य की सबसे प्रसिद्ध रचना ‘पउमचरिउ’ (पद्मचरित) है, जो स्वयंभू द्वारा रचित है और जैन धर्म पर आधारित है। हिंदी के विकास-क्रम को इस प्रकार समझा जाता है: संस्कृत → पालि → प्राकृत → अपभ्रंश → हिंदी।
12. निम्न भाषाओं में से किस भाषा को दिल्ली सुल्तानों ने संरक्षण प्रदान किया?
R.A.S. / R. T. S (Pre) 1994
उत्तर-(c)
दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही फारसी को राजभाषा का दर्जा दिया गया और यह शासन, साहित्य तथा दरबारी संस्कृति की भाषा बन गई। मुस्लिम विजेताओं के साथ फारसी भाषा और साहित्य भारत में आई तथा यहाँ की स्थानीय परंपराओं से मिलकर इसने एक नवीन रूप धारण किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इल्तुतमिश के काल में फारसी साहित्य को विशेष प्रोत्साहन मिला और उसके दरबार में अनेक फारसी विद्वान थे। दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद मुगल काल में भी फारसी राजभाषा बनी रही — अकबर से औरंगज़ेब तक सभी शाही फरमान, भूमि अभिलेख और दरबारी इतिहास फारसी में ही लिखे जाते थे।
13. निम्नलिखित ग्रंथों पर विचार कीजिए और उनकों कालाक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए-
U.P.P.C..S. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
इन चारों ग्रंथों का सही कालानुक्रम इस प्रकार है — ‘किताब-उल-हिंद’ (अलबरूनी, 11वीं सदी), ‘पृथ्वीराजरासो’ (चंदरबरदाई, 12वीं सदी), ‘तबकात-ए-नासिरी’ (मिनहाज-उस-सिराज, 13वीं सदी), और ‘फतवा-ए-जहांदारी’ (जियाउद्दीन बरनी, 14वीं सदी)। यानी सही क्रम है: 3 → 2 → 4 → 1।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अलबरूनी महमूद गजनवी के साथ भारत आया था और उसने ‘किताब-उल-हिंद’ में भारतीय समाज, धर्म, विज्ञान और दर्शन का तुलनात्मक विवरण दिया — यह मध्यकाल का सबसे निष्पक्ष विदेशी विवरण माना जाता है। ‘पृथ्वीराजरासो’ हिंदी का पहला महाकाव्य माना जाता है।
14. ‘तबकात-ए-नासिरी’ का लेखक कौन था?
42nd Bihar P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
‘तबकात-ए-नासिरी’ की रचना मिनहाज-उस-सिराज ने की थी और इसे सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद को समर्पित किया गया था। यह 23 अध्यायों में विभाजित ग्रंथ है जिसमें मुहम्मद गोरी की भारत विजय का प्रत्यक्ष विवरण मिलता है। H.G. Raverty ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मिनहाज-उस-सिराज पहले इतिहासकार हैं जिन्होंने लिखा कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और सिक्के जारी किए — जो एक स्वतंत्र शासक की निशानी थी। यह ग्रंथ भारत में दास वंश के इतिहास का प्राथमिक स्रोत है।
15. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
I.A.S. (Pre) 2003
उत्तर-(c)
बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने हिंदी गीत संग्रह ‘किताब-ए-नौरस’ की रचना की। उन्होंने ‘नौरसपुर’ नामक नगर भी बसाया जो उनकी राजधानी बना। वे कला और संगीत के महान संरक्षक थे और हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय के प्रतीक माने जाते हैं। कव्वाली संगीत शैली के प्रारम्भिक रूप की नींव रखने का श्रेय अमीर खुसरो को दिया जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय को ‘जगद्गुरु’ और ‘अबला बाबा’ की उपाधियाँ दी गई थीं क्योंकि वे हिंदू देवी-देवताओं की स्तुति में भी गीत रचते थे। कव्वाली को अमीर खुसरो ने सूफी संत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर प्रस्तुत किया, जो आज भी उसी परंपरा में जारी है।
16. निम्नलिखित में से कौन फारसी का प्रथम कवि था, जिसने अपनी कविता में भारतीय पर्यावरण को चित्रित किया ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2017
उत्तर-(a)
अमीर खुसरो पहले फारसी कवि थे जिन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में भारतीय प्रकृति, ऋतुओं, पशु-पक्षियों और परिवेश को जीवंत रूप से चित्रित किया। वे सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य थे। खुसरो स्वयं को ‘तूती-ए-हिंद’ (हिंदोस्तान का तोता) कहते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो ने ‘नूह सिपिहर’ नामक ग्रंथ में भारत की प्रशंसा करते हुए यहाँ की भाषा, संगीत और प्रकृति को श्रेष्ठ बताया। उन्होंने तबला और सितार वाद्य यंत्रों के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया — हालाँकि इन दावों पर इतिहासकारों में मतभेद है।
7. हिंदी और फारसी दोनों भाषाओं का विद्वान था-
U.P. P.C.S. (Pre) 1990
उत्तर-(c)
अमीर खुसरो हिंदी और फारसी दोनों भाषाओं के असाधारण विद्वान थे। उन्होंने स्वयं कहा था — ‘मैं तुर्की, भारतीय और हिंदी बोलता हूँ।’ विद्वान जियाउद्दीन सज्जादी के अनुसार, भारत में फारसी भाषा के विकास की किसी भी चर्चा में अमीर खुसरो का उल्लेख किए बिना वह चर्चा अधूरी है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो ने ‘खालिक बारी’ नामक एक बहुभाषीय शब्दकोश की रचना की जिसमें हिंदी, फारसी और तुर्की शब्द एक साथ दिए गए हैं — यह भारत का प्रारंभिक बहुभाषीय शब्दकोश माना जाता है। उनके गुरु निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु के कुछ ही महीनों बाद (1325 ई.) खुसरो का भी निधन हो गया।
18. निम्न में से किसने ‘हिंदी खड़ी बोली का जनक’ माना जाता है?
U.P.P.C.S. (Mains) 2012
उत्तर-(a)
अमीर खुसरो को हिंदी खड़ी बोली का जनक माना जाता है। उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में रचनाएँ कीं और हिंदी को साहित्यिक प्रतिष्ठा दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई। उनकी पहेलियाँ, मुकरियाँ और दो-सखुन आज भी लोकप्रिय हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो की प्रसिद्ध उक्ति थी — ‘न लफ्जे हिन्दी वस्त अज फारसी कम’ अर्थात हिंदी के शब्द फारसी से किसी भी प्रकार कम नहीं हैं। उन्होंने ‘हालात-ए-कन्हैया’ नामक हिंदी रचना में कृष्ण लीला का वर्णन भी किया, जो हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक है।
19. नयी फारसी काव्य-शैली ‘सबक-ए-हिंदी’ अथवा ‘हिंदुस्तानी शैली’ के जन्मदाता थे-
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(d)
नई फारसी काव्य शैली ‘सबक-ए-हिंदी’ या ‘हिंदुस्तानी शैली’ के प्रवर्तक अमीर खुसरो थे। इस शैली में फारसी भाषा के साथ भारतीय भावनाओं, बिंबों और प्रकृति का समावेश किया गया। खुसरो ने फारसी काव्य को एक नया भारतीय आयाम प्रदान किया जो ईरानी परंपरा से भिन्न था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो ने पाँच फारसी मसनवियाँ लिखीं — ‘किरान-उस-सादैन’, ‘मिफ्तोह-उल-फुतूह’, ‘खजाइन-उल-फुतूह’, ‘देवल रानी-खिज्र खान’ और ‘नुह सिपिहर’ — जो दिल्ली सल्तनत के इतिहास के महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत हैं। वे अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि भी थे।
20. अमीर खुसरो एक______थे-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(d)
अमीर खुसरो एक साथ कवि, इतिहासकार और संगीतज्ञ तीनों थे — यह संयोग मध्यकाल में अत्यंत दुर्लभ था। उन्हें ‘तूती-ए-हिंद’ की उपाधि दी गई थी। कवि के रूप में उन्होंने हिंदी और फारसी में रचनाएँ कीं, इतिहासकार के रूप में समकालीन घटनाओं का विवरण दिया, और संगीतज्ञ के रूप में कव्वाली व ख्याल गायन को विकसित किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो का जन्म 1253 ई. में एटा (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और उन्होंने सात दिल्ली सुल्तानों का शासन देखा — बलबन से लेकर गयासुद्दीन तुगलक तक। उनकी दरगाह दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के परिसर में ही स्थित है, जहाँ आज भी हर गुरुवार को कव्वाली गाई जाती है।
21. दिल्ली का वह सुल्तान जिसने अपने संस्मरण लिखे, था-
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(d)
दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंशीय शासक फिरोजशाह तुगलक (1351–1388 ई.) ने अपना आत्मकथात्मक संस्मरण ‘फुतुहात-ए-फिरोजशाही’ नाम से लिखा। इसमें उन्होंने अपनी धार्मिक नीतियों, प्रशासनिक सुधारों और विजयों का विवरण दिया। उनका उद्देश्य स्वयं को एक आदर्श इस्लामी शासक के रूप में प्रस्तुत करना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फिरोजशाह तुगलक ने दासों का एक विशाल विभाग (दीवान-ए-बंदगान) स्थापित किया था, जिसमें लगभग 1,80,000 दास थे। उन्होंने ही सर्वप्रथम ‘नहरों के व्यापक निर्माण’ की नीति अपनाई और पाँच बड़ी नहरें बनवाईं, जो भारत में सिंचाई के इतिहास में महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं।
22. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए।
सूची-I (ग्रंथ) सूची-II (रचयिता)
A. रागमाला 1.सोमनाथ
B. रस कौमुदी 2. वेंकटरमन
C. राग विबोध 3. पुंडरीक विठ्ठल
D. चतुर्दंडी प्रकाशिका 4. श्री कंठ
कूट :
A B C D
सूची-I (ग्रंथ) सूची-II (रचयिता)
A. रागमाला 1.सोमनाथ
B. रस कौमुदी 2. वेंकटरमन
C. राग विबोध 3. पुंडरीक विठ्ठल
D. चतुर्दंडी प्रकाशिका 4. श्री कंठ
कूट :
A B C D
U.P.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(a)
इन संगीत ग्रंथों और उनके रचयिताओं का सही सुमेलन इस प्रकार है — रागमाला के रचनाकार पुंडरीक विट्ठल हैं, जो मुगल काल के प्रमुख संगीत सिद्धांतकार थे। रस कौमुदी की रचना श्री कंठ ने की। राग विबोध के रचयिता सोमनाथ हैं तथा चतुर्दंडी प्रकाशिका की रचना वेंकटरमन ने की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुंडरीक विट्ठल ने ‘सद्राग चन्द्रोदय’ और ‘नर्तन निर्णय’ जैसे अन्य महत्त्वपूर्ण संगीत ग्रंथ भी लिखे। चतुर्दंडी प्रकाशिका में दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत पद्धति (कर्नाटक संगीत) के सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन किया गया है।
23. सूची-I तथा सूची-II का सुमेल कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
सूची-I सूची-II
A. जियाउद्दीन बरनी 1. तारीख-ए-मुबारकशाही
B. हसन निजामी 2. तबकात-ए-नासिरी
C. मिनहाज-उस-सिराज 3. तारीख-ए-फीरोजशाही
D. याहिया-बिन-अहमद 4. ताजुल मासिर
5. तबकात-ए-अकबरी
कूट :
A B C D
सूची-I सूची-II
A. जियाउद्दीन बरनी 1. तारीख-ए-मुबारकशाही
B. हसन निजामी 2. तबकात-ए-नासिरी
C. मिनहाज-उस-सिराज 3. तारीख-ए-फीरोजशाही
D. याहिया-बिन-अहमद 4. ताजुल मासिर
5. तबकात-ए-अकबरी
कूट :
A B C D
U.P. P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(d)
इन इतिहासकारों और उनकी रचनाओं का सही सुमेलन इस प्रकार है — जियाउद्दीन बरनी ने फारसी भाषा में ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ की रचना की, जो दिल्ली सल्तनत के इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। हसन निजामी की कृति ‘ताजुल मासिर’ तुर्की शासन के प्रारंभिक काल का विवरण प्रस्तुत करती है। मिनहाज-उस-सिराज ने ‘तबकात-ए-नासिरी’ लिखी जो नासिरुद्दीन महमूद को समर्पित थी। याहिया बिन अहमद ने ‘तारीख-ए-मुबारकशाही’ लिखी, जो सैयद वंश के इतिहास का एकमात्र प्रमुख स्रोत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जियाउद्दीन बरनी ने ‘फतवा-ए-जहांदारी’ भी लिखी, जिसमें उन्होंने एक आदर्श इस्लामी राज्य के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। तबकात-ए-नासिरी में मिनहाज ने चंगेज खान के आक्रमणों का भी विस्तृत विवरण दिया है।
24. निम्नलिखित में से कौन-सा राजपूत राजा संगीत पर एक पुस्तक के लेखक के रूप में जाना जाता है?
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(c)
मेवाड़ के शासक राणा कुंभा (1433–1468 ई.) केवल एक कुशल योद्धा ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के विद्वान और संगीतप्रेमी भी थे। उन्होंने संगीतशास्त्र पर ‘संगीत राज’, ‘संगीत मीमांसा’ और ‘सूड प्रबंध’ जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। राणा कुंभा ने महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में चित्तौड़ में विजय स्तंभ (1440–1448 ई.) का निर्माण भी कराया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राणा कुंभा ने कुल 32 किलों का निर्माण या जीर्णोद्धार करवाया, जो राजस्थान की स्थापत्य धरोहर का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्होंने जयदेव के ‘गीत गोविंद’ पर ‘रसिकप्रिया’ नामक टीका भी लिखी।
25. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कर नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
सूची-I सूची-II
A. तारीखे हिंद 1. इब्नबतूता
B. तारीखे दिल्ली 2. मिनहाज
C. रेहला 3. अलबरूनी
D. तबकाते नासिरी 4. खुसरो
कूट :
A B C D
सूची-I सूची-II
A. तारीखे हिंद 1. इब्नबतूता
B. तारीखे दिल्ली 2. मिनहाज
C. रेहला 3. अलबरूनी
D. तबकाते नासिरी 4. खुसरो
कूट :
A B C D
U.P.P. C. S. (Mains) 2009
उत्तर-(c)
इन ग्रंथों और उनके लेखकों का सही सुमेलन इस प्रकार है — ‘तारीख-ए-हिंद’ की रचना महमूद गजनवी के समकालीन विद्वान अलबरूनी ने अरबी भाषा में की थी, जिसमें भारत की संस्कृति, दर्शन और विज्ञान का विस्तृत विवरण है। ‘तारीख-ए-दिल्ली’ अमीर खुसरो की रचना है। ‘रेहला’ मोरक्को के यात्री इब्नबतूता द्वारा लिखी गई यात्रा-वृत्तांत है, जो मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में भारत आए थे। ‘तबकात-ए-नासिरी’ मिनहाज-उस-सिराज की रचना है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अलबरूनी ने भारत की यात्रा से पूर्व संस्कृत भाषा सीखी थी, जो उन्हें भारतीय ग्रंथों को मूल रूप में पढ़ने में सहायक रही। इब्नबतूता ने दिल्ली में मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में काजी के पद पर कार्य किया और उन्हें चीन के राजदूत के रूप में भी भेजा गया था।
26. निम्नलिखित कृतियों को उनके लेखक से सुमेलित करके सही कूटों में से उत्तर चुनिए-
A. हकाइक ए हिंदी 1. इब्न मिस्काविया
B. तहजीबुल अखलाक 2. सदरुद्दीन मुहम्मद ‘औफी’
C. कुंजुल तिजार 3. अब्दुल वाहिद बिलग्रामी
D. जवामिउल हिकायात् 4. बैलक अल कबायली
कूट :
A B C D
A. हकाइक ए हिंदी 1. इब्न मिस्काविया
B. तहजीबुल अखलाक 2. सदरुद्दीन मुहम्मद ‘औफी’
C. कुंजुल तिजार 3. अब्दुल वाहिद बिलग्रामी
D. जवामिउल हिकायात् 4. बैलक अल कबायली
कूट :
A B C D
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
इन कृतियों और उनके लेखकों का सही सुमेलन इस प्रकार है — ‘हकाइक-ए-हिंदी’ के लेखक अब्दुल वाहिद बिलग्रामी हैं, जिसमें हिंदी काव्य और संस्कृति की विवेचना की गई है। ‘तहजीबुल अखलाक’ इब्न मिस्काविया की नैतिक दर्शन पर आधारित रचना है। ‘कुंजुल तिजार’ के रचयिता बैलक अल कबायली हैं। ‘जवामिउल हिकायात’ सदरुद्दीन मुहम्मद औफी की रचना है, जिसमें अनेक दिलचस्प कहानियों और ऐतिहासिक घटनाओं का संग्रह है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘जवामिउल हिकायात’ में इल्तुतमिश के दरबार का वर्णन है और इसे सल्तनत काल की सांस्कृतिक जानकारी का महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इब्न मिस्काविया 10वीं-11वीं शताब्दी के प्रसिद्ध इस्लामी दार्शनिक थे, जिन्हें इस्लामी नैतिक दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है।
27. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए-
सूची-I सूची-II
A. ताजुल मासिर 1. जियाउद्दीन बरनी
B. खजाइन-उल-फतूह 2. हसन निजामी
C. तारीख-ए-मुबारकशाही 3. अमीर खुसरो
D. फतवा-ए-जहांदारी 4. याहिया बिन अहमद सरहिंदी
कूट :
A; B; C; D
सूची-I सूची-II
A. ताजुल मासिर 1. जियाउद्दीन बरनी
B. खजाइन-उल-फतूह 2. हसन निजामी
C. तारीख-ए-मुबारकशाही 3. अमीर खुसरो
D. फतवा-ए-जहांदारी 4. याहिया बिन अहमद सरहिंदी
कूट :
A; B; C; D
U.P.B.E.O. (Pre) 2019
उत्तर-(a)
इन ग्रंथों और उनके रचनाकारों का सही सुमेलन इस प्रकार है — ‘ताजुल मासिर’ हसन निजामी की रचना है, जो कुतुबुद्दीन ऐबक और आरंभिक दिल्ली सल्तनत का विवरण प्रस्तुत करती है। ‘खजाइन-उल-फतूह’ अमीर खुसरो की फारसी गद्य कृति है, जिसमें अलाउद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों का वर्णन है। ‘तारीख-ए-मुबारकशाही’ याहिया बिन अहमद सरहिंदी द्वारा रचित है, जो सैयद वंश के इतिहास की एकमात्र प्रामाणिक कृति है। ‘फतवा-ए-जहांदारी’ जियाउद्दीन बरनी की राजनीतिक विचारों पर आधारित रचना है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो ने ‘खजाइन-उल-फतूह’ के अतिरिक्त ‘किरान-उस-सादैन’, ‘मिफ्ताह-उल-फतूह’ और ‘तुगलकनामा’ जैसी ऐतिहासिक मसनवियाँ भी लिखीं। ‘फतवा-ए-जहांदारी’ में बरनी ने उच्च कुल के मुसलमानों को ही उच्च पदों पर नियुक्त करने की वकालत की, जो उनके जाति-आधारित दृष्टिकोण को दर्शाती है।
28. निम्नलिखित में से ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ के रचनाकार कौन हैं?
M.P.P.C.S. (Pre) 2019
उत्तर-(a & b)
‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ नाम से दो भिन्न ग्रंथ प्रचलित हैं — एक जियाउद्दीन बरनी द्वारा लिखित, जो बलबन के शासनकाल से लेकर फिरोज तुगलक के प्रारंभिक वर्षों तक का इतिहास है, और दूसरा शम्स-ए-सिराज अफीफ द्वारा रचित, जो विशेष रूप से फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल पर केंद्रित है। म.प्र. लोक सेवा आयोग ने प्रारंभिक उत्तर कुंजी में केवल (b) को सही माना, किंतु दोनों ही सही उत्तर हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शम्स-ए-सिराज अफीफ फिरोज तुगलक के दरबारी इतिहासकार थे और उन्होंने यह ग्रंथ फिरोजशाह की मृत्यु के बाद लिखा। इलियट और डाउसन ने बरनी की ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ का ‘History of India as told by its own Historians’ श्रृंखला में अंग्रेजी अनुवाद किया।
29. ‘फवायदुल फवाद’ नामक पुस्तक शेख निजामुद्दीन औलिया की बातचीत का विवरण है, इसका संकलन किया था-
U.P.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(a)
‘फवाइद-उल-फवाद’ (Fawa’id ul-Fu’ad) की रचना अमीर हसन अल सिजजी ने की थी। यह चिश्ती सूफी संत शेख निजामुद्दीन औलिया की आध्यात्मिक वार्तालापों और उपदेशों का संग्रह है, जिसे ‘मल्फूजात’ साहित्य की श्रेणी में रखा जाता है। यह ग्रंथ 14वीं शताब्दी के सूफी विचार और दिल्ली की सांस्कृतिक-धार्मिक जीवन को समझने का प्रमुख स्रोत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शेख निजामुद्दीन औलिया चिश्तिया सिलसिले के सर्वाधिक प्रभावशाली सूफी संतों में से थे और उन्होंने सात दिल्ली सुल्तानों का शासनकाल देखा। अमीर हसन सिजजी स्वयं एक प्रतिभाशाली फारसी कवि भी थे और निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते थे।
30. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सुमेलित है ?
नाम ग्रंथ (संगीत)
नाम ग्रंथ (संगीत)
R.A.S./ R.T.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
दिए गए विकल्पों में केवल ‘पुंडरीक विट्ठल — रागमाला’ का युग्म सही है। पुंडरीक विट्ठल मुगलकालीन संगीतशास्त्री थे जिन्होंने रागमाला की रचना की। अन्य विकल्पों में — ‘संगीतराज’ राणा कुंभा की रचना है, न कि पंडित भावभट्ट की; ‘राग चंद्रिका’ द्वारकानाथ भट्ट (अथवा काशीनाथ शास्त्री) की रचना है, चांद खान की नहीं; और ‘राग कल्पद्रुम’ कृष्णानंद व्यास ने लिखी, न कि कुंभा ने।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुंडरीक विट्ठल ने अकबर और जहाँगीर दोनों के शासनकाल में मुगल दरबार में संगीतशास्त्री के रूप में कार्य किया और उत्तर भारतीय संगीत पर अनेक ग्रंथ लिखे। ‘रागमाला’ में विभिन्न रागों के स्वरूप, उनके गायन के उचित समय और उनसे संबंधित भावों (रस) का विस्तृत वर्णन किया गया है।
31. संगीत यंत्र ‘तबला’ का प्रचलन किया-
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(b)
13वीं शताब्दी के महान कवि-संगीतज्ञ अमीर खुसरो को ‘तबला’ और ‘सितार’ जैसे वाद्ययंत्रों के प्रचलन का श्रेय दिया जाता है। उनका पूरा नाम अबुल हसन यामिनुद्दीन खुसरो था। वे दिल्ली सल्तनत के कई सुल्तानों के दरबार में रहे और शेख निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य थे। खुसरो ने ईरानी तम्बूरे और भारतीय वीणा के संयोजन से सितार का निर्माण किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमीर खुसरो को ‘खुसरव-ए-शायरान’ (कवियों के राजा) और ‘तूती-ए-हिंद’ (भारत का तोता) जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया था। उन्होंने ‘कव्वाली’ गायन शैली को भी लोकप्रिय बनाया, जो आज भी भारतीय उपमहाद्वीप में सूफी संगीत का अभिन्न अंग है।
32. निम्नलिखित में से किस संगीत वाद्य को हिंदू-मुस्लिम गान-वाद्यों का सबसे श्रेष्ठ मिश्रण माना गया है ?
R.A.S./R.T.S. 1999
उत्तर-(d)
सितार को हिंदू-मुस्लिम वाद्य परंपराओं के सर्वोत्तम संयोजन के रूप में जाना जाता है। अमीर खुसरो ने ईरानी तम्बूरे और भारतीय वीणा को मिलाकर इस वाद्ययंत्र की रचना की। इसके अलावा उन्होंने कुछ ईरानी (पर्शियन) और भारतीय रागों का सुंदर समन्वय किया तथा इमान, जिल्फ और साजगरी जैसी नई राग शैलियाँ विकसित कीं। सल्तनत काल में भारतीय और इस्लामी संगीत परंपराओं के इस समन्वय ने एक नई मिश्रित संगीत संस्कृति को जन्म दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सितार के नाम की उत्पत्ति फारसी शब्द ‘सेह-तार’ (तीन तार) से मानी जाती है, यद्यपि आधुनिक सितार में 18 से 21 तक तार होते हैं। 20वीं शताब्दी में पंडित रविशंकर ने सितार को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई और इसे विश्व मंच पर स्थापित किया।
33. ‘कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति’ के रचयिता थे-
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(d)
मेवाड़ शासक राणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में चित्तौड़ में कीर्ति स्तंभ बनवाया था। इसके निर्माण का दायित्व शिल्पी जैता को सौंपा गया, परंतु इस स्तंभ पर अंकित प्रशस्ति की रचना अत्रि और उनके पुत्र महेश नामक कवियों ने की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह सात मंजिला स्तंभ लगभग 22 मीटर ऊँचा है और जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है। एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राणा कुंभा स्वयं भी संगीतशास्त्र के विद्वान थे और उन्होंने ‘संगीतराज’ जैसे ग्रंथों की रचना की थी।
34. चित्तौड़ का ‘कीर्ति स्तंभ’ निर्मित हुआ था शासनकाल में –
U.P.P.C.S. (Mains) 2008
U.P.P.C.S. (Pre) 2010
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
U.P.P.C.S. (Pre) 2010
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(a)
15वीं शताब्दी में मेवाड़ के शासक राणा कुंभा (1433-1468 ई.) के काल में चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कीर्ति स्तंभ का निर्माण हुआ, जो उनकी सैन्य सफलताओं का स्मारक है। राणा कुंभा एक कुशल वीणावादक भी थे और उन्हें संगीत व साहित्य का संरक्षक माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राणा कुंभा ने ही चित्तौड़ में ‘विजय स्तंभ’ का भी निर्माण कराया था, जो हिंदू शासकों के मुस्लिम आक्रमणों पर विजय का सबसे प्रसिद्ध स्मारक माना जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण भी कराया था, जो भारत की सबसे लंबी दीवारों में से एक के लिए जाना जाता है।
35. भारत में कागज का प्रयोग कब से प्रारंभ हुआ?
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
कागज के आविष्कार का सम्मान चीन को जाता है, जहां से यह तकनीक धीरे-धीरे पश्चिम और मध्य एशिया के रास्ते भारत पहुंची। भारत में कागज के प्रयोग का सबसे पुराना प्रमाण कोलकाता के आशुतोष संग्रहालय में संरक्षित ‘पंचरक्षा’ नामक पांडुलिपि है, जो 1105 ई. की मानी जाती है, जिससे 12वीं शताब्दी से कागज का प्रचलन सिद्ध होता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इससे पहले भारत में लेखन के लिए मुख्यतः ताड़पत्र (पाम लीफ) और भोजपत्र का उपयोग किया जाता था। सल्तनत काल में फिरोजशाह तुगलक के समय तक कागज का प्रयोग व्यापक रूप से प्रशासनिक कार्यों में होने लगा था।
36. प्रथम वास्तविक मेहराब किस सल्तनतकालीन स्मारक में दृशातीत् है?
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(b)
दिल्ली में किला-ए-रायपिथौरा के निकट स्थित बलबन के मकबरे में वर्गाकार कक्ष के साथ-साथ सच्ची मेहराब (true arch) तकनीक का पहली बार उपयोग देखने को मिलता है, जिसमें भार को विकेन्द्रित करने हेतु कीस्टोन का प्रयोग किया गया। इससे पहले की इमारतों में मेहराब केवल दिखावटी (कॉर्बेल्ड) होते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बलबन गुलाम वंश का सुल्तान था और उसने ‘सिजदा’ तथा ‘पैबोस’ जैसी कठोर राजदरबारी प्रथाओं को लागू किया था। सच्ची मेहराब और गुंबद निर्माण की यह तकनीक आगे चलकर अलाई दरवाजा और अन्य खिलजी-तुगलक स्मारकों में पूर्णता को प्राप्त हुई।
37. ‘अलाई दरवाजा’ का निर्माण किस सुल्तान ने करवाया ?
42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
कुतुबमीनार परिसर में स्थित अलाई दरवाजा का निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने 1311 ई. में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से कराया था। इसमें घोड़े के नाल के आकार की मेहराब और चतुष्केंद्रीय (ट्यूडर) मेहराब का प्रथम बार उपयोग हुआ, साथ ही इसका गुंबद वैज्ञानिक पद्धति से निर्मित प्रथम गुंबद माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अलाउद्दीन खिलजी ने ही ‘सिरी’ नामक दिल्ली का दूसरा नगर स्थापित किया था और उसने बाजार नियंत्रण व मूल्य नियंत्रण प्रणाली जैसे प्रशासनिक सुधार भी लागू किए थे, जो उसकी सैन्य आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु किए गए थे।
38. घोड़े के नाल के आकार की मेहराब सर्वप्रथम प्रयोग में लाई गई थी-
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित अलाई दरवाजा में पहली बार घोड़े के नाल (हॉर्सशू) आकार की मेहराब का स्थापत्य तत्व के रूप में प्रयोग हुआ, जो इंडो-इस्लामिक वास्तुकला में एक नई शुरुआत थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाना शुरू किया था, भारत में निर्मित प्रथम मस्जिद मानी जाती है और इसका निर्माण कई हिंदू व जैन मंदिरों को तोड़कर प्राप्त सामग्री से किया गया था।
39. निम्नलिखित में से किसने कुतुबमीनार के निर्माण में योगदान नहीं दिया-
U.P.P.C.S. (Pre) 2003
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
उत्तर-(c)
कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने शुरू कराया, इल्तुतमिश ने इसे आगे बढ़ाया, और बाद में फिरोजशाह तुगलक ने क्षतिग्रस्त चौथी मंजिल की मरम्मत कराकर दो नई मंजिलें जोड़ी, जिससे यह पांच मंजिला मीनार बन गई। इस पूरे निर्माण-क्रम में अलाउद्दीन खिलजी की कोई भूमिका नहीं रही।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस मीनार का नाम सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के सम्मान में रखा गया था, और यह दुनिया की सबसे ऊंची ईंटों से बनी मीनारों में से एक है, जिसकी ऊंचाई लगभग 73 मीटर है।
40. निम्न में से किस सुल्तान ने कुतुबमीनार की पांचवीं मंजिल का निर्माण कराया ?
U. P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(c)
बिजली गिरने या भूकंप से कुतुबमीनार की मूल चौथी मंजिल को नुकसान पहुंचा था, जिसे फिरोजशाह तुगलक ने अपने शासनकाल में मरम्मत कर पांचवीं मंजिल के रूप में पुनर्निर्मित किया, जो आज भी देखी जा सकती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फिरोजशाह तुगलक को सिंचाई व्यवस्था के विस्तार के लिए भी जाना जाता है; उसने यमुना और सतलुज नदियों से नहरें निकालीं और दिल्ली में कई शहरों, जैसे फिरोजाबाद की स्थापना की।
41. भारत में प्रथम मकबरा, जो शुद्ध इस्लामी शैली में निर्मित हुआ था-
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(b)
गुलाम वंश के सुल्तान बलबन ने दिल्ली में किला-ए-रायपिथौरा के निकट अपना मकबरा बनवाया, जो सच्ची मेहराब और निर्माण-तकनीक की दृष्टि से पूर्णतः इस्लामी स्थापत्य शैली का भारत में प्रथम उदाहरण माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी कालखंड में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित जमात-खाना मस्जिद को भारत की पहली पूर्णतः इस्लामी शैली की मस्जिद माना जाता है, जबकि मुगल काल में हुमायूं का मकबरा (निर्माण: 1565-72) फारसी-इस्लामी शैली के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे ताजमहल का अग्रदूत भी कहा जाता है।
42. निम्नलिखित युग्मों में से कौन सुमेलित नहीं है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद वास्तव में दिल्ली में स्थित है, अजमेर में नहीं, इसलिए विकल्प (a) का युग्म असंगत है; बाकी तीनों युग्म- जौनपुर की अटाला मस्जिद (शर्की शैली), मालवा का जहाज महल (मांडू में स्थित), और गुलबर्गा की जामा मस्जिद (बहमनी शैली, बिना मीनार के अद्वितीय गुंबददार संरचना)- सही सुमेलित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अजमेर में स्थित प्रसिद्ध मस्जिद ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ है, जिसे भी कुतुबुद्दीन ऐबक ने मंदिर की सामग्री से बनवाया था और कहा जाता है कि इसका निर्माण केवल ढाई दिनों में पूरा कर लिया गया था।
43. निम्नलिखित पर विचार करें-
1. तुगलकाबाद किला
2. लोदी गार्डेन
3. कुतुबमीनार
4. फतेहपुर सीकरी
सही कालानुक्रमिक क्रम, जिसमें इनका निर्माण हुआ है-
1. तुगलकाबाद किला
2. लोदी गार्डेन
3. कुतुबमीनार
4. फतेहपुर सीकरी
सही कालानुक्रमिक क्रम, जिसमें इनका निर्माण हुआ है-
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(b)
कालानुक्रम में सबसे पहले कुतुबमीनार (1199-1220 के मध्य निर्मित), उसके बाद गियासुद्दीन तुगलक द्वारा 1320-25 के बीच तुगलकाबाद किला, फिर लोदी वंश (1451-1526) के समय लोदी गार्डेन, और अंत में अकबर द्वारा 1571 के बाद फतेहपुर सीकरी का निर्माण हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तुगलकाबाद को बसाने के बावजूद इसे जल्द ही छोड़ दिया गया था, और किवदंती है कि सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के श्राप के कारण यह नगर उजड़ गया। लोदी गार्डेन में सिकंदर लोदी का मकबरा भी स्थित है।
44. सुमेलित कीजिए-
वास्तु शैली संबद्ध राजवंश
A. मेहराब की निचली सतह पर कमलकलि की झालर i. शर्की
B. अष्टभुजीय मकबरों का उदय ii. विजयनगर
C. स्तंभों में बोदिगोई का प्रयोग iii. खिलजी
D. झुकी हुई दीवारों के साथ विशाल मुख्य द्वार iv. तुगलक
कूट :
A B C D
वास्तु शैली संबद्ध राजवंश
A. मेहराब की निचली सतह पर कमलकलि की झालर i. शर्की
B. अष्टभुजीय मकबरों का उदय ii. विजयनगर
C. स्तंभों में बोदिगोई का प्रयोग iii. खिलजी
D. झुकी हुई दीवारों के साथ विशाल मुख्य द्वार iv. तुगलक
कूट :
A B C D
R.A.S. / R. T. S (Pre) (Re-Exam) 2013
उत्तर-(a)
खिलजीकालीन भवनों में मेहराब के नीचे कमल-कली की झालर (फ्रिंज) की सजावट दिखाई देती है, तुगलक काल में अष्टभुजाकार मकबरों की परंपरा शुरू हुई (जैसे गियासुद्दीन तुगलक का मकबरा), विजयनगर स्थापत्य में स्तंभों पर बोदिगोई (घोड़े/याली की मूर्तियों से सज्जित) शैली प्रसिद्ध है, और शर्की स्थापत्य (जौनपुर) में तिरछी (झुकी) दीवारों के साथ बड़े-बड़े प्रवेश द्वार बनाए गए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तुगलक स्थापत्य की एक अन्य विशेषता ढलवां (बैटर्ड) दीवारें हैं, जो भवनों को किलेनुमा स्वरूप देती थीं, जैसा कि तुगलकाबाद और फिरोजशाह कोटला में देखा जा सकता है।
Leave a Reply