परिचय
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना 29 अक्टूबर 1851 ई. (कुछ स्रोतों के अनुसार 31 अक्टूबर 1851 ई.) को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुई थी।
➣ यह कांग्रेस-पूर्व काल की सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली राजनीतिक संस्थाओं में से एक थी। इसने पहली बार अपेक्षाकृत संगठित रूप से भारतीयों के राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व करने का प्रयास किया।
➣ इस संस्था का गठन लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838) तथा बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843) के विलय से हुआ था।
➣ दोनों संस्थाएँ संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों के माध्यम से प्रशासनिक सुधारों तथा भारतीयों के अधिकारों की माँग कर रही थीं। समान उद्देश्यों के कारण दोनों ने मिलकर एक अधिक प्रभावशाली राजनीतिक संगठन स्थापित करने का निर्णय लिया।
➣ इस विलय के पीछे एक तात्कालिक कारण 1849 ई. में तत्कालीन विधि सदस्य जॉन इलियट ड्रिंकवॉटर बेथ्यून द्वारा प्रस्तुत कुछ विधेयकों को लेकर उत्पन्न विवाद भी माना जाता है।
➣ इन विधेयकों के कारण भारतीय नेताओं को अनुभव हुआ कि सरकार के समक्ष अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से रखने के लिए एक संयुक्त एवं सशक्त राजनीतिक संस्था की आवश्यकता है।
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का उद्देश्य केवल किसी एक वर्ग के हितों की रक्षा करना नहीं था, बल्कि भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों तथा जनहित से जुड़े प्रश्नों को संगठित रूप से ब्रिटिश सरकार एवं ब्रिटिश संसद के समक्ष प्रस्तुत करना था। इस दृष्टि से यह अपने पूर्ववर्ती संगठनों की अपेक्षा अधिक व्यापक स्वरूप वाली संस्था थी।
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसकी सदस्यता प्रारम्भ में केवल भारतीयों तक सीमित रखी गई थी। यह इसे लैंडहोल्डर्स सोसाइटी से अलग बनाती थी, क्योंकि उस संस्था में भूमि-हित रखने वाले कुछ यूरोपीय भी सदस्य बन सकते थे।
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसका नेतृत्व मुख्यतः भारतीयों के हाथों में था। इससे पूर्व की अनेक राजनीतिक संस्थाओं में यूरोपीय उदारवादी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी, जबकि इस संस्था ने भारतीय नेतृत्व को अधिक संगठित एवं प्रभावशाली रूप प्रदान किया।
➣ बाद में 1852 ई. से कुछ यूरोपीय जमींदारों के लिए भी सदस्यता का मार्ग खोल दिया गया, किन्तु संस्था का नेतृत्व भारतीयों के हाथों में ही बना रहा।
पृष्ठभूमि
➣ 19वीं शताब्दी के मध्य तक बंगाल में कई राजनीतिक संस्थाएँ कार्य कर रही थीं, किन्तु उनकी प्रभावशीलता सीमित थी। लैंडहोल्डर्स सोसाइटी मुख्यतः जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करती थी, जबकि बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी शिक्षित मध्यम वर्ग एवं यंग बंगाल समूह से प्रभावित थी। अलग-अलग कार्य करने के कारण दोनों संस्थाओं का राजनीतिक प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित था।
➣ दूसरी ओर, ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक नीतियों, न्यायिक व्यवस्था तथा भारतीयों के अधिकारों से संबंधित अनेक प्रश्न तेजी से उभर रहे थे।
➣ ऐसी परिस्थिति में यह अनुभव किया गया कि यदि दोनों संस्थाएँ एक संयुक्त संगठन के रूप में कार्य करें, तो उनकी माँगों को ब्रिटिश सरकार के समक्ष अधिक प्रभावी ढंग से रखा जा सकेगा।
➣ इसी विचार के परिणामस्वरूप 1851 ई. में दोनों संस्थाओं का विलय कर ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की गई।
➣ यह संस्था शीघ्र ही कांग्रेस-पूर्व भारत की सबसे प्रभावशाली संवैधानिक राजनीतिक संस्था बन गई और आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीतिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगी।
संगठनात्मक स्वरूप
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का मुख्यालय कलकत्ता में था, जो उस समय ब्रिटिश भारत का प्रशासनिक, न्यायिक एवं बौद्धिक केंद्र था।
➣ संस्था का संचालन एक संगठित कार्यकारिणी के माध्यम से किया जाता था, जिसमें बंगाल के प्रमुख शिक्षित भारतीय, जमींदार, विधिवेत्ता एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति सम्मिलित थे।
➣ संस्था के प्रथम अध्यक्ष राजा राधाकांत देव, उपाध्यक्ष राजा काली कृष्ण देब, प्रथम सचिव देवेन्द्रनाथ टैगोर तथा सहायक सचिव दिगंबर मित्र थे।
➣ इनके अतिरिक्त रामगोपाल घोष, पेयारी चाँद मित्र, प्रसन्न कुमार ठाकुर, कृष्णदास पाल तथा शम्भूनाथ पंडित जैसे अनेक प्रतिष्ठित भारतीय भी संस्था से जुड़े थे।
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसकी सदस्यता प्रारम्भ में केवल भारतीयों तक सीमित रखी गई थी।
➣ यही कारण है कि इसे भारतीय नेतृत्व वाली प्रारम्भिक राजनीतिक संस्थाओं में गिना जाता है। इसके सदस्य मुख्यतः शिक्षित भारतीय, जमींदार, वकील, व्यापारी तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, जो सरकार के समक्ष भारतीयों की समस्याओं एवं माँगों का संगठित प्रतिनिधित्व करते थे।
➣ 1852 ई. से संस्था ने कुछ यूरोपीय जमींदारों के लिए भी सदस्यता का मार्ग खोल दिया, किन्तु इसका नेतृत्व एवं कार्यनीति भारतीयों के नियंत्रण में ही बनी रही।
➣ एसोसिएशन का विश्वास संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण राजनीति में था। यह किसी प्रकार के उग्र आंदोलन या हिंसक विरोध के बजाय याचिकाओं, ज्ञापनों, प्रतिवेदनों तथा सार्वजनिक जनमत के माध्यम से अपनी माँगें प्रस्तुत करती थी।
➣ संस्था समय-समय पर प्रशासनिक नीतियों का अध्ययन करती, आवश्यक सुधारों के सुझाव तैयार करती तथा उन्हें ब्रिटिश सरकार एवं ब्रिटिश संसद के समक्ष भेजती थी। इसी संवैधानिक कार्यशैली ने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक राजनीतिक कार्यक्रमों को भी प्रभावित किया।
पूर्ववर्ती संस्थाओं से अंतर
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन अपने पूर्ववर्ती संगठनों की अपेक्षा अधिक संगठित एवं प्रभावशाली संस्था थी। इसने लैंडहोल्डर्स सोसाइटी तथा बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी दोनों की विशेषताओं को समाहित कर एक व्यापक राजनीतिक मंच का निर्माण किया।
| विषय | लैंडहोल्डर्स सोसाइटी | बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी | ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन |
|---|---|---|---|
| स्थापना | 1838 ई. | 1843 ई. | 1851 ई. |
| सामाजिक आधार | मुख्यतः जमींदार वर्ग | शिक्षित मध्यम वर्ग एवं यंग बंगाल | जमींदार, शिक्षित भारतीय एवं सार्वजनिक जीवन के प्रमुख व्यक्ति |
| सदस्यता | भारतीय तथा कुछ यूरोपीय भू-हितधारक | भारतीय एवं कुछ यूरोपीय उदारवादी | प्रारम्भ में केवल भारतीय (1852 से कुछ यूरोपीय जमींदार भी) |
| मुख्य उद्देश्य | जमींदारों के हितों की रक्षा | प्रशासनिक सुधार एवं भारतीय अधिकार | भारतीयों के राजनीतिक, प्रशासनिक एवं नागरिक अधिकारों का व्यापक प्रतिनिधित्व |
| विशेषता | प्रथम संगठित सार्वजनिक राजनीतिक संस्था | यंग बंगाल से प्रभावित प्रगतिशील संस्था | कांग्रेस-पूर्व काल की सबसे प्रभावशाली भारतीय राजनीतिक संस्था |
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के उद्देश्य
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का उद्देश्य केवल शिकायतें प्रस्तुत करना नहीं था, बल्कि संवैधानिक उपायों के माध्यम से भारत में प्रशासनिक एवं राजनीतिक सुधारों को प्रोत्साहित करना भी था।
- भारतीयों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों की रक्षा करना।
- ब्रिटिश सरकार एवं ब्रिटिश संसद के समक्ष भारतीयों की समस्याओं एवं माँगों को संगठित रूप से प्रस्तुत करना।
- प्रशासनिक एवं विधायी सुधारों की माँग करना तथा विधायी परिषदों में भारतीयों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रयास करना।
- न्यायपालिका एवं कार्यपालिका के पृथक्करण की माँग करना, ताकि न्यायिक व्यवस्था अधिक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र बन सके।
- नमक कर सहित अन्य करों में कमी तथा कर व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत बनाने की माँग करना।
- योग्य भारतीयों को उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अधिक अवसर दिलाने का प्रयास करना।
- याचिकाओं, ज्ञापनों एवं संवैधानिक उपायों के माध्यम से जनहित के प्रश्नों को सरकार तक पहुँचाना।
प्रमुख गतिविधियाँ
1852–53 की चार्टर याचिका
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में 1852–53 की चार्टर याचिका को विशेष स्थान प्राप्त है। जब ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर के नवीनीकरण (जो 1853 में होना था) का समय निकट आया, तब संस्था ने इस अवसर का उपयोग भारतीयों की समस्याओं एवं माँगों को ब्रिटिश संसद के समक्ष संगठित रूप से प्रस्तुत करने के लिए किया।
➣ 1852 ई. में संस्था ने ब्रिटिश संसद को एक विस्तृत याचिका भेजी, जिस पर बंगाल प्रेसिडेंसी के लगभग 6,000–7,000 निवासियों के हस्ताक्षर थे।
➣ उस समय इतनी बड़ी संख्या में हस्ताक्षरों के साथ किसी राजनीतिक याचिका का प्रस्तुत किया जाना भारतीय राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।
➣ यह याचिका 7 अप्रैल 1853 को हाउस ऑफ लॉर्ड्स में प्रस्तुत की गई। इसमें भारत के प्रशासन, न्यायपालिका, विधायिका तथा राजस्व व्यवस्था से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण सुधारों की माँग की गई थी।
➣ इस याचिका के माध्यम से ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने पहली बार संगठित रूप से यह स्पष्ट किया कि भारतीयों को केवल प्रशासन का विषय नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में भागीदार भी बनाया जाना चाहिए।
चार्टर याचिका की प्रमुख माँगें
➣ चार्टर याचिका में संस्था ने भारतीय प्रशासन को अधिक उत्तरदायी, न्यायपूर्ण एवं प्रतिनिधिक बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए। प्रमुख माँगें निम्नलिखित थीं:
- गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद का विस्तार किया जाए तथा उसमें भारतीयों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए।
- कार्यपालिका (Executive) एवं न्यायपालिका को एक-दूसरे से पृथक किया जाए, ताकि न्यायिक व्यवस्था अधिक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र बन सके।
- योग्य भारतीयों को उच्च सरकारी सेवाओं एवं प्रशासनिक पदों पर अधिक अवसर प्रदान किए जाएँ।
- नमक कर सहित अन्य करों में कमी कर कर-व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत बनाया जाए।
- प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी एवं जनहितकारी बनाया जाए।
न्यायिक सुधारों के सुझाव
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने न्यायिक व्यवस्था में व्यापक सुधारों का भी प्रस्ताव रखा। संस्था का मत था कि न्याय व्यवस्था सरल, एकरूप तथा अधिक प्रभावी होनी चाहिए।
➣ इसी उद्देश्य से संस्था ने सुझाव दिया कि सद्र दीवानी अदालत तथा सद्र निज़ामत अदालत – दोनों का विलय सुप्रीम कोर्ट के साथ कर दिया जाए। इससे न्यायिक प्रणाली में एकरूपता आएगी तथा न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी।
➣ इसके अतिरिक्त संस्था ने न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने, न्यायिक प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र बनाने तथा न्याय के प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष बल दिया।
चार्टर एक्ट, 1853 पर प्रभाव
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की सभी माँगें स्वीकार नहीं की गईं, फिर भी इसकी चार्टर याचिका का ब्रिटिश संसद पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। भारतीय प्रशासन में सुधार की आवश्यकता को गंभीरता से स्वीकार किया गया।
➣ चार्टर एक्ट, 1853 के अंतर्गत गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद का विस्तार किया गया तथा विधायी कार्यों के लिए 6 अतिरिक्त सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान किया गया। यद्यपि यह संस्था की सभी माँगों की पूर्ति नहीं थी, फिर भी इसे उसकी संवैधानिक राजनीति की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।
➣ इस प्रकार 1852–53 की चार्टर याचिका ने यह सिद्ध किया कि संगठित राजनीतिक संस्थाएँ संवैधानिक उपायों, याचिकाओं एवं जनमत के माध्यम से भी ब्रिटिश शासन की नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं। कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक इतिहास में यह ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
हिन्दू पैट्रियट समाचार-पत्र
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने अपने राजनीतिक विचारों एवं जनहित से जुड़े मुद्दों को जनता तक पहुँचाने के लिए हिन्दू पैट्रियट नामक समाचार-पत्र का उपयोग किया।
➣ यह 19वीं शताब्दी के मध्य का एक अत्यंत प्रभावशाली राष्ट्रवादी समाचार-पत्र था, जिसने ब्रिटिश शासन की नीतियों की निर्भीक आलोचना की तथा भारतीयों के अधिकारों की सशक्त वकालत की।
➣ इस समाचार-पत्र के प्रसिद्ध संपादक हरीश चन्द्र मुखर्जी थे। उनके संपादकीयों ने शिक्षित भारतीय समाज में राजनीतिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ 14 जनवरी 1858 को प्रकाशित अपने एक प्रसिद्ध संपादकीय में हरीश चन्द्र मुखर्जी ने स्पष्ट रूप से लिखा कि भारत के शासन-तंत्र में कोई भी महत्वपूर्ण परिवर्तन उन करोड़ों भारतीयों की राय जाने बिना नहीं किया जाना चाहिए, जिनके हितों को वह परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। उस समय यह विचार भारतीय प्रतिनिधित्व एवं उत्तरदायी शासन की माँग का एक सशक्त उदाहरण था।
➣ हिन्दू पैट्रियट के माध्यम से ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने भारतीयों की समस्याओं, प्रशासनिक कमियों तथा आवश्यक सुधारों को जनता और सरकार-दोनों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने का प्रयास किया।
योगदान
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन कांग्रेस-पूर्व काल की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्थाओं में से एक थी। इसने भारतीयों की राजनीतिक समस्याओं को पहली बार संगठित एवं व्यवस्थित रूप से ब्रिटिश सरकार तथा ब्रिटिश संसद के समक्ष प्रस्तुत किया।
➣ इस संस्था ने संवैधानिक राजनीति, याचिकाओं, ज्ञापनों तथा जनमत निर्माण की परम्परा को सुदृढ़ किया। आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक वर्षों में भी यही कार्यशैली अपनाई गई।
➣ संस्था ने विधायी परिषदों में भारतीय प्रतिनिधित्व, उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका के पृथक्करण तथा कर व्यवस्था में सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषयों को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में लाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
➣ 1852–53 की चार्टर याचिका के माध्यम से इसने यह सिद्ध किया कि संगठित एवं शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रयासों द्वारा भी ब्रिटिश सरकार की नीतियों को प्रभावित किया जा सकता है।
सीमाएँ
➣ यद्यपि ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन कांग्रेस-पूर्व काल की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्थाओं में से एक थी, फिर भी इसकी कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ थीं।
➣ संस्था का सामाजिक आधार मुख्यतः बंगाल के शिक्षित अभिजात वर्ग, जमींदारों, वकीलों एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों तक सीमित था। किसानों, मजदूरों तथा सामान्य जनता की इसमें प्रत्यक्ष भागीदारी बहुत कम थी। इसलिए यह व्यापक जन-आंदोलन का स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकी।
➣ इसका प्रभाव मुख्यतः बंगाल प्रेसिडेंसी तक केंद्रित रहा। यद्यपि इसकी याचिकाओं एवं ज्ञापनों की चर्चा पूरे भारत में होती थी, फिर भी यह अखिल भारतीय स्तर का संगठन नहीं बन सकी।
➣ संस्था पूर्णतः संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों पर निर्भर थी। यह ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा बनाए रखते हुए प्रशासनिक सुधारों की माँग करती थी और औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने की पक्षधर नहीं थी।
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नए राजनीतिक संगठनों तथा अधिक व्यापक जनाधार वाले आंदोलनों के उदय के साथ इसकी राजनीतिक भूमिका धीरे-धीरे कम होती गई। बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के पश्चात इसका प्रभाव और सीमित हो गया।
आगे का विकास
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने अपने प्रारम्भिक वर्षों में भारतीयों के अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों तथा संवैधानिक राजनीति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ आगे चलकर बंगाल के राजनीतिक जीवन में इसका प्रभाव बना रहा, यद्यपि समय के साथ नई राजनीतिक संस्थाओं के उदय के कारण इसकी सक्रियता घटती गई।
➣ संस्था के अंतिम चरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद मिलता है। कुछ स्रोतों के अनुसार पश्चिम बंगाल में जमींदारी उन्मूलन (1954 ई.) के बाद इसका व्यावहारिक महत्व समाप्त हो गया और यह लगभग निष्क्रिय हो गई। वहीं कुछ अन्य स्रोतों के अनुसार संस्था किसी न किसी संगठनात्मक रूप में बाद के वर्षों तक अस्तित्व में बनी रही।
महत्वपूर्ण तथ्य
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 29 अक्टूबर 1851 ई. (कुछ स्रोतों में 31 अक्टूबर) |
| स्थान | कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) |
| गठन | लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838) एवं बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843) के विलय से |
| प्रथम अध्यक्ष | राजा राधाकांत देव |
| उपाध्यक्ष | राजा काली कृष्ण देब |
| प्रथम सचिव | देवेन्द्रनाथ टैगोर |
| सहायक सचिव | दिगंबर मित्र |
| समाचार-पत्र | हिन्दू पैट्रियट (संपादक – हरीश चन्द्र मुखर्जी) |
| प्रमुख उपलब्धि | 1852–53 की चार्टर याचिका; चार्टर एक्ट, 1853 के सुधारों पर प्रभाव |
| कार्यशैली | संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण – याचिकाएँ, ज्ञापन एवं जनमत निर्माण |
| विशेषता | कांग्रेस-पूर्व काल की सबसे प्रभावशाली एवं दीर्घजीवी राजनीतिक संस्थाओं में से एक |
कालक्रम
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1838 | लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की स्थापना |
| 1843 | बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना |
| 29 अक्टूबर 1851 | दोनों संस्थाओं के विलय से ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना |
| 1852 | ब्रिटिश संसद को चार्टर याचिका भेजी गई |
| 7 अप्रैल 1853 | चार्टर याचिका हाउस ऑफ लॉर्ड्स में प्रस्तुत की गई |
| 1853 | चार्टर एक्ट, 1853 लागू; विधायी परिषद का विस्तार |
| 14 जनवरी 1858 | हिन्दू पैट्रियट में हरीश चन्द्र मुखर्जी का प्रसिद्ध संपादकीय |
▪ स्थापना – 29 अक्टूबर 1851 ई. (कुछ स्रोतों में 31 अक्टूबर), कलकत्ता।
▪ गठन – लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838) + बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843) के विलय से।
▪ प्रथम अध्यक्ष – राजा राधाकांत देव; प्रथम सचिव – देवेन्द्रनाथ टैगोर।
▪ सदस्यता – प्रारम्भ में केवल भारतीय; 1852 से कुछ यूरोपीय जमींदारों के लिए भी खुली।
▪ प्रमुख उपलब्धि – 1852–53 की चार्टर याचिका, जिसने चार्टर एक्ट, 1853 के सुधारों को प्रभावित किया।
▪ समाचार-पत्र – हिन्दू पैट्रियट (संपादक: हरीश चन्द्र मुखर्जी)।
▪ कार्यशैली – याचिकाएँ, ज्ञापन एवं संवैधानिक आंदोलन।
▪ महत्व – कांग्रेस-पूर्व काल की सबसे प्रभावशाली भारतीय राजनीतिक संस्थाओं में से एक तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए वैचारिक एवं संगठनात्मक आधार तैयार करने वाली संस्था।
ऐतिहासिक महत्व
➣ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने भारत में संगठित राजनीतिक नेतृत्व के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसने शिक्षित भारतीयों, जमींदारों, वकीलों तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों को एक साझा मंच पर संगठित किया।
➣ यह संस्था अपने पूर्ववर्ती संगठनों की तुलना में अधिक प्रभावशाली एवं दीर्घजीवी सिद्ध हुई। इसने लगभग तीन दशकों तक बंगाल के राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा भारतीयों की समस्याओं को संवैधानिक ढंग से उठाने की परम्परा को मजबूत किया।
➣ यद्यपि इसका प्रभाव मुख्यतः बंगाल तक सीमित रहा, फिर भी इसने भारतीय राजनीतिक चेतना के विकास, संवैधानिक आंदोलन की परम्परा तथा संगठित राजनीतिक संस्थाओं के विकास के लिए मजबूत आधार तैयार किया।
➣ इतिहासकारों के अनुसार, ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु (Bridge) का कार्य किया। इसकी कार्यप्रणाली, माँगों एवं संवैधानिक दृष्टिकोण का प्रभाव कांग्रेस के प्रारम्भिक नेतृत्व पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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