ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1839): स्थापना, उद्देश्य, कार्य एवं महत्व

📚 विषय सूची

परिचय

ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना 1839 ई. में लंदन (इंग्लैंड) में हुई थी। इसका उद्देश्य ब्रिटिश जनता एवं संसद को भारत की वास्तविक परिस्थितियों से अवगत कराना तथा भारत से संबंधित राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक प्रश्नों पर जनमत तैयार करना था। यह संस्था भारत के बाहर स्थापित उन प्रारम्भिक संगठनों में से एक थी, जिसने संगठित रूप से भारतीय हितों का समर्थन किया।

➣ इस संस्था की स्थापना का प्रमुख श्रेय विलियम एडम को दिया जाता है। वे मूलतः एक ईसाई मिशनरी थे, जो 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत आए थे। भारत में उनका परिचय राजा राममोहन राय से हुआ और दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता विकसित हुई। राजा राममोहन राय के उदारवादी एवं सुधारवादी विचारों से प्रभावित होकर विलियम एडम भारतीयों के अधिकारों तथा प्रशासनिक सुधारों के समर्थक बन गए।

➣ इंग्लैंड लौटने के बाद विलियम एडम ने अनुभव किया कि ब्रिटिश जनता और संसद भारत की वास्तविक परिस्थितियों से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं हैं। उन्हें यह भी लगा कि ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों एवं भारत के प्रशासन से संबंधित प्रश्नों पर ब्रिटेन में निष्पक्ष एवं तथ्यपूर्ण चर्चा होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1839 ई. में ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना की।

➣ इस संस्था की स्थापना में जॉर्ज थॉम्पसन, विलियम एडनिस तथा मेजर जनरल जॉन ब्रिग्स जैसे ब्रिटिश उदारवादी नेताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इनमें जॉर्ज थॉम्पसन विशेष रूप से प्रसिद्ध दास-प्रथा-विरोधी वक्ता थे तथा भारतीय हितों के समर्थक माने जाते थे। आगे चलकर उनका भारतीय नेताओं, विशेषकर द्वारकानाथ टैगोर, से भी घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ।

➣ संस्था की संचालन समिति के अध्यक्ष चार्ल्स फोर्ब्स थे। समिति में लॉर्ड ब्रूघम, जॉन बाउरिंग तथा प्रसिद्ध दास-प्रथा-विरोधी नेता थॉमस क्लार्कसन जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश उदारवादी भी शामिल थे। इससे स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी को ब्रिटेन के प्रभावशाली सुधारवादी वर्ग का समर्थन प्राप्त था।

➣ संस्था की प्रथम औपचारिक बैठक 6 जुलाई 1839 को फ्रीमेसन्स हॉल, लंदन में आयोजित की गई। इस बैठक में केवल ब्रिटिश सदस्य ही नहीं, बल्कि कई भारतीय प्रतिनिधि भी उपस्थित थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संस्था स्वयं को भारत और ब्रिटेन के बीच संवाद का एक साझा मंच बनाना चाहती थी।

➣ इस बैठक में टीपू सुल्तान के पुत्र प्रिंस इमामुद्दीन, मीर अफज़ल अली, करीम अली तथा पारसी व्यापारी हीरजीभॉय मरवानजी, दोराबजी मुंचरजी एवं इचंगीर नौरोजी जैसे भारतीय प्रतिनिधियों की उपस्थिति उल्लेखनीय थी। इनकी भागीदारी से यह संकेत मिलता है कि संस्था भारत से संबंधित विभिन्न वर्गों के विचारों को ब्रिटिश समाज के समक्ष प्रस्तुत करना चाहती थी।

पृष्ठभूमि

➣ 19वीं शताब्दी के तीसरे दशक तक ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन, उसकी आर्थिक नीतियों तथा भारतीयों के साथ किए जा रहे व्यवहार की ब्रिटेन में भी आलोचना होने लगी थी। ब्रिटिश संसद, उदारवादी बुद्धिजीवियों तथा सामाजिक सुधारकों के बीच यह प्रश्न उठने लगा कि भारत का शासन अधिक उत्तरदायी एवं न्यायपूर्ण होना चाहिए।

➣ दूसरी ओर, राजा राममोहन राय जैसे भारतीय सुधारकों ने ब्रिटेन में भारत से संबंधित प्रश्नों को प्रभावी ढंग से उठाया। उनके विचारों का प्रभाव अनेक ब्रिटिश उदारवादियों पर पड़ा, जिन्होंने भारत में प्रशासनिक सुधारों तथा भारतीयों के अधिकारों के समर्थन में सार्वजनिक मत तैयार करने का प्रयास किया।

➣ इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य भारत में प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन चलाना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश संसद, ब्रिटिश जनता तथा प्रभावशाली राजनीतिक वर्ग को भारत की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित कराकर उनके माध्यम से सुधारों का मार्ग प्रशस्त करना था।

वैचारिक पृष्ठभूमि

ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना केवल भारत से संबंधित राजनीतिक प्रश्नों को उठाने के लिए नहीं हुई थी, बल्कि इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि ब्रिटेन में चल रहे उदारवादी, मानवतावादी तथा दास-प्रथा-विरोधी आंदोलनों से भी गहराई से जुड़ी हुई थी।

➣ 19वीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटेन में अनेक सामाजिक सुधारक यह मानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आने वाले देशों में न्यायपूर्ण प्रशासन, मानवाधिकारों की रक्षा तथा आर्थिक सुधारों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसी विचारधारा ने भारत से संबंधित प्रश्नों को भी ब्रिटिश समाज के सामने लाने का मार्ग प्रशस्त किया।

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के अनेक संस्थापक एवं सहयोगी दास-प्रथा-विरोधी आंदोलन से जुड़े हुए थे। उनका विश्वास था कि मानव शोषण पर आधारित किसी भी व्यवस्था का विरोध किया जाना चाहिए, चाहे वह दास-प्रथा हो या औपनिवेशिक शासन की अन्यायपूर्ण नीतियाँ।

➣ इसी कारण संस्था का ध्यान केवल राजनीतिक सुधारों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह भारत में न्यायपूर्ण प्रशासन, आर्थिक सुधार, नैतिक व्यापार तथा भारतीयों के अधिकारों के पक्ष में भी जनमत तैयार करना चाहती थी।

दास-प्रथा-विरोधी आंदोलन से संबंध

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की वैचारिक जड़ें ब्रिटेन के दास-प्रथा-विरोधी आंदोलन से जुड़ी हुई थीं। इसके अनेक सदस्य पहले से ही दास-प्रथा समाप्त करने के लिए सक्रिय संगठनों से जुड़े हुए थे।

➣ संस्था की प्रारम्भिक सदस्यता का एक बड़ा भाग एबोरिजिन्स प्रोटेक्शन सोसाइटी से आया था। यह संस्था विश्व के विभिन्न उपनिवेशों में रहने वाले मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा तथा उनके साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध कार्य करती थी।

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के नेताओं का मत था कि यदि भारत की कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों का उचित विकास किया जाए, तो भारत दास-श्रम आधारित अमेरिकी कपास एवं शक्कर उत्पादन का एक नैतिक एवं वैकल्पिक स्रोत बन सकता है। इस प्रकार भारत का आर्थिक विकास मानवता एवं नैतिक व्यापार के सिद्धांतों के अनुरूप किया जा सकता है।

➣ इस दृष्टिकोण के कारण संस्था का एजेंडा केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह ब्रिटेन में चल रहे मानवतावादी एवं उदारवादी सुधार आंदोलनों का भी एक महत्वपूर्ण भाग बन गया।

संगठनात्मक स्वरूप

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का मुख्यालय लंदन में था। संस्था का संचालन एक संचालन समिति द्वारा किया जाता था, जिसमें ब्रिटेन के अनेक प्रतिष्ठित उदारवादी राजनेता, सामाजिक सुधारक, लेखक तथा भारत-हितैषी व्यक्ति शामिल थे।

➣ संस्था की सदस्यता मुख्यतः ब्रिटिश नागरिकों की थी, किन्तु इसकी गतिविधियों में भारतीय प्रतिनिधियों की भी महत्वपूर्ण भागीदारी रहती थी। कई भारतीय व्यापारी, बुद्धिजीवी तथा भारत से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति इसकी बैठकों एवं कार्यक्रमों में सम्मिलित होते थे।

➣ संस्था का उद्देश्य भारत में प्रत्यक्ष राजनीतिक संगठन खड़ा करना नहीं था, बल्कि ब्रिटेन में ऐसा जनमत तैयार करना था जो भारत के हित में प्रशासनिक सुधारों का समर्थन करे। इसलिए इसकी अधिकांश गतिविधियाँ ब्रिटिश संसद, ब्रिटिश प्रेस तथा सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से संचालित होती थीं।

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने भारतीय नेताओं एवं ब्रिटिश उदारवादी वर्ग के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य किया। इसके माध्यम से भारतीय प्रश्न पहली बार संगठित रूप से ब्रिटेन के प्रभावशाली राजनीतिक एवं बौद्धिक वर्ग तक पहुँचे।

ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के उद्देश्य

  • ब्रिटिश जनता एवं ब्रिटिश संसद को भारत की वास्तविक राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों से परिचित कराना।
  • भारतीयों के अधिकारों एवं हितों की रक्षा के पक्ष में ब्रिटेन में जनमत तैयार करना।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन की कमियों को उजागर करना तथा आवश्यक प्रशासनिक सुधारों की माँग करना।
  • भारत में न्यायपूर्ण प्रशासन, उत्तरदायी शासन तथा कानून के समक्ष समानता जैसे सिद्धांतों को प्रोत्साहित करना।
  • निजी उद्यम एवं नैतिक व्यापार को बढ़ावा देकर भारत के आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना।
  • भारत से संबंधित प्रमाणिक सूचनाओं का संग्रह कर उन्हें ब्रिटिश समाज एवं संसद तक पहुँचाना।
  • भारत और ब्रिटेन के उदारवादी नेताओं के बीच सहयोग एवं संवाद को बढ़ावा देना।

कार्यप्रणाली

ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की कार्यशैली पूर्णतः संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण थी। संस्था का उद्देश्य किसी प्रकार का आंदोलन चलाना नहीं, बल्कि ब्रिटिश जनता एवं संसद के समक्ष भारत की वास्तविक परिस्थितियों को तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर प्रस्तुत करना था।

➣ संस्था विभिन्न स्रोतों से भारत से संबंधित राजनीतिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक सूचनाएँ एकत्र करती थी। इन सूचनाओं का अध्ययन करने के बाद वह अपने विचारों को सार्वजनिक सभाओं, व्याख्यानों, पुस्तिकाओं, समाचार-पत्रों तथा ज्ञापनों के माध्यम से ब्रिटिश समाज तक पहुँचाती थी।

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का विश्वास था कि यदि ब्रिटिश जनता एवं संसद भारत की वास्तविक समस्याओं से अवगत होंगे, तो वे भारत में प्रशासनिक सुधारों का समर्थन करेंगे। इसलिए संस्था ने जनमत निर्माणको अपनी कार्यशैली का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बनाया।

➣ संस्था भारत एवं ब्रिटेन के उदारवादी नेताओं के बीच संवाद स्थापित करने का भी कार्य करती थी। इसके माध्यम से भारतीय प्रश्न पहली बार व्यवस्थित रूप से ब्रिटिश राजनीतिक वर्ग तक पहुँचे।

प्रमुख गतिविधियाँ

➣ स्थापना के बाद ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने ब्रिटेन के विभिन्न नगरों में अपने विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार प्रारम्भ किया। इसने अनेक सार्वजनिक सभाओं, व्याख्यानों एवं बैठकों का आयोजन कर भारत से संबंधित प्रश्नों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया।

1839–40 ई. के दौरान संस्था ने बोल्टन, चेस्टरफील्ड, डोनकास्टर, डरहम, लीड्स, मैनचेस्टर, न्यूकैसल तथा नॉटिंघम सहित अनेक नगरों में अपनी शाखाएँ स्थापित कीं। इन शाखाओं के माध्यम से भारत से संबंधित विषयों पर नियमित जनसभाएँ आयोजित की जाती थीं।

अगस्त 1840 में मैनचेस्टर में संस्था द्वारा एक बड़ी सार्वजनिक सभा आयोजित की गई, जिसमें भारत में प्रशासनिक सुधारों, ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों तथा भारतीयों के अधिकारों पर विस्तार से चर्चा की गई।

➣ संस्था ने ब्रिटेन के समाचार-पत्रों एवं सार्वजनिक मंचों का भी प्रभावी उपयोग किया। इसके माध्यम से भारत से संबंधित विषयों को ब्रिटिश समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास किया गया।

ब्रिटिश इंडियन एडवोकेट

➣ अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए जनवरी 1841 ई. में ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने ब्रिटिश इंडियन एडवोकेट (British Indian Advocate) नामक एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह संस्था का प्रमुख वैचारिक माध्यम था।

➣ इस पत्रिका में भारत की राजनीतिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक समस्याओं, ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों, प्रशासनिक सुधारों तथा भारतीयों के अधिकारों से संबंधित लेख प्रकाशित किए जाते थे। इसका उद्देश्य ब्रिटिश जनता को प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराना तथा भारत के पक्ष में जनमत तैयार करना था।

➣ पत्रिका के संपादन को लेकर इतिहासकारों में कुछ मतभेद मिलते हैं। कुछ स्रोतों के अनुसार इसका प्रारम्भिक संपादन विलियम एडम ने किया, जबकि अन्य स्रोतों के अनुसार बाद के समय में जॉर्ज थॉम्पसन ने भी इसके संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रमुख उपलब्धियाँ

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने पहली बार ब्रिटेन में भारत से संबंधित प्रश्नों को संगठित एवं व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक बहस का विषय बनाया। इससे भारतीय समस्याओं के प्रति ब्रिटिश समाज में जागरूकता बढ़ी।

➣ संस्था ने ब्रिटिश संसद, सामाजिक सुधारकों एवं उदारवादी नेताओं के बीच भारत के प्रशासन, भारतीयों के अधिकारों तथा आर्थिक नीतियों पर गंभीर चर्चा को प्रोत्साहित किया।

➣ इस संस्था ने भारत और ब्रिटेन के उदारवादी नेताओं के बीच सहयोग को मजबूत किया। आगे चलकर यही सहयोग भारत में नई राजनीतिक संस्थाओं के गठन के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ।

➣ यद्यपि संस्था प्रत्यक्ष रूप से भारत में कार्य नहीं कर रही थी, फिर भी उसने भारतीय प्रश्नों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने तथा भारत के पक्ष में ब्रिटिश जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

योगदान

ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने पहली बार ब्रिटेन में भारत से संबंधित प्रश्नों को संगठित एवं व्यवस्थित रूप से उठाया। इससे भारतीय प्रशासन, आर्थिक नीतियों तथा भारतीयों के अधिकारों पर ब्रिटिश समाज और संसद का ध्यान आकर्षित हुआ।

➣ इस संस्था ने ब्रिटिश जनता के बीच यह धारणा विकसित करने का प्रयास किया कि भारत केवल ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि वहाँ के लोगों के अधिकारों, कल्याण और न्यायपूर्ण प्रशासन पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।

➣ संस्था ने ब्रिटिश संसद, सामाजिक सुधारकों, पत्रकारों तथा उदारवादी नेताओं के बीच भारत से संबंधित विषयों पर व्यापक चर्चा को प्रोत्साहित किया। इससे भारत के पक्ष में एक सकारात्मक जनमत तैयार करने में सहायता मिली।

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने भारतीय नेताओं एवं ब्रिटिश उदारवादी वर्ग के बीच संवाद स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने दोनों देशों के सुधारवादी विचारकों को एक साझा मंच उपलब्ध कराया, जिससे भारत के प्रश्नों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जा सका।

➣ यद्यपि संस्था का कार्यक्षेत्र ब्रिटेन तक सीमित था, फिर भी उसके प्रयासों ने भारत में विकसित हो रहे प्रारम्भिक राजनीतिक आंदोलनों को अप्रत्यक्ष रूप से वैचारिक एवं नैतिक समर्थन प्रदान किया।

सीमाएँ

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की अधिकांश गतिविधियाँ ब्रिटेन तक ही सीमित थीं। इसलिए इसका भारतीय समाज एवं सामान्य जनता के साथ प्रत्यक्ष संपर्क अपेक्षाकृत कम था।

➣ संस्था के पास कोई राजनीतिक अथवा प्रशासनिक अधिकार नहीं थे। यह केवल जनमत निर्माण, सार्वजनिक सभाओं, प्रकाशनों एवं संवैधानिक माध्यमों द्वारा ही अपने विचार प्रस्तुत कर सकती थी।

➣ संस्था का प्रभाव मुख्यतः ब्रिटेन के उदारवादी एवं शिक्षित वर्ग तक सीमित रहा। इसके विचारों को तत्काल ब्रिटिश सरकार अथवा ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों में व्यापक परिवर्तन के रूप में लागू नहीं किया गया।

➣ भारत में इसका कोई व्यापक संगठनात्मक ढाँचा नहीं था। इसलिए यह भारतीय जनता को प्रत्यक्ष रूप से संगठित करने वाली संस्था नहीं बन सकी।

➣ समय के साथ भारत में स्थानीय राजनीतिक संस्थाओं के विकास के कारण भारत से संबंधित गतिविधियों का केंद्र धीरे-धीरे भारत की संस्थाओं की ओर स्थानांतरित होने लगा।

बंगाल शाखा एवं आगे का विकास

➣ स्थापना के कुछ वर्षों के भीतर ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने भारत से अपने संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से 1843 ई. में इसकी एक शाखा कलकत्ता (बंगाल) में स्थापित की गई। कुछ स्रोत इस शाखा की स्थापना-तिथि 20 अप्रैल 1843 बताते हैं।

➣ इस शाखा की स्थापना में जॉर्ज थॉम्पसन तथा द्वारकानाथ टैगोर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसका उद्देश्य भारत के शिक्षित वर्ग एवं ब्रिटिश उदारवादी नेताओं के बीच सहयोग बढ़ाना तथा भारतीय समस्याओं को अधिक संगठित ढंग से उठाना था।

➣ आगे चलकर यही शाखा बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के रूप में विकसित हुई, जिसने भारत में कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक गतिविधियों को नई दिशा प्रदान की। इस संस्था का विस्तृत अध्ययन इसके पृथक अध्याय में किया जा सकता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

विषय विवरण
स्थापना वर्ष 1839 ई.
स्थापना स्थान लंदन (इंग्लैंड)
मुख्य संस्थापक विलियम एडम
प्रमुख सहयोगी जॉर्ज थॉम्पसन, विलियम एडनिस, मेजर जनरल जॉन ब्रिग्स
संचालन समिति के अध्यक्ष चार्ल्स फोर्ब्स
प्रथम औपचारिक बैठक 6 जुलाई 1839, फ्रीमेसन्स हॉल, लंदन
प्रमुख प्रकाशन ब्रिटिश इंडियन एडवोकेट (जनवरी 1841 से)
बंगाल शाखा 1843 ई. (कुछ स्रोतों के अनुसार 20 अप्रैल 1843)
मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश जनता एवं संसद को भारत की वास्तविक परिस्थितियों से अवगत कराना तथा भारतीयों के पक्ष में जनमत तैयार करना।
विशेषता ब्रिटेन में भारत के हितों का संगठित रूप से समर्थन करने वाली प्रारम्भिक राजनीतिक संस्थाओं में से एक।

कालक्रम (Timeline)

वर्ष घटना
1833 राजा राममोहन राय का निधन
1839 ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना (लंदन)
6 जुलाई 1839 फ्रीमेसन्स हॉल, लंदन में प्रथम औपचारिक बैठक
1840 ब्रिटेन के विभिन्न नगरों में शाखाओं एवं जनसभाओं का विस्तार
जनवरी 1841 ब्रिटिश इंडियन एडवोकेट का प्रकाशन प्रारम्भ
1843 कलकत्ता में बंगाल शाखा की स्थापना

स्थापना – 1839 ई., लंदन।
मुख्य संस्थापक – विलियम एडम (राजा राममोहन राय के घनिष्ठ सहयोगी)।
प्रमुख सहयोगी – जॉर्ज थॉम्पसन, विलियम एडनिस एवं मेजर जनरल जॉन ब्रिग्स।
संचालन समिति के अध्यक्ष – चार्ल्स फोर्ब्स।
प्रथम बैठक – 6 जुलाई 1839, फ्रीमेसन्स हॉल (लंदन)।
प्रमुख प्रकाशन – ब्रिटिश इंडियन एडवोकेट (1841)।
बंगाल शाखा – 1843 ई.; आगे चलकर बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के विकास का आधार बनी।
मुख्य कार्य – ब्रिटिश संसद एवं जनता के समक्ष भारतीय प्रश्नों को उठाकर भारत के पक्ष में जनमत तैयार करना।
भ्रम न रखें – ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1839, लंदन) और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843, कलकत्ता) दो अलग-अलग संस्थाएँ थीं।

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