ब्रिटिश भारत में शिक्षा व्यवस्था : पाश्चात्य शिक्षा, शिक्षा नीतियाँ एवं प्रमुख सुधार

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत ब्रिटिश भारत में शिक्षा व्यवस्था
📚 विषय सूची

भारत में आधुनिक (पाश्चात्य) शिक्षा की पृष्ठभूमि

भारत की पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था

➣ ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत में शिक्षा की व्यवस्था मुख्यतः गुरुकुलों, पाठशालाओं, टोलों, मदरसों तथा मकतबों के माध्यम से संचालित होती थी।

➣ हिन्दू विद्यार्थियों के लिए गुरुकुल, पाठशालाएँ एवं टोल प्रमुख केन्द्र थे, जबकि मुस्लिम विद्यार्थियों के लिए मदरसे एवं मकतब शिक्षा के मुख्य संस्थान थे।

➣ गुरुकुलों में वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, गणित, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे, जबकि मदरसों में अरबी, फ़ारसी, इस्लामी कानून, तर्कशास्त्र तथा साहित्य की शिक्षा दी जाती थी।

➣ उस समय शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं था, बल्कि धार्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विकास करना भी था।

➣ उस समय शिक्षा का माध्यम मुख्यतः संस्कृत, अरबी, फ़ारसी तथा क्षेत्रीय भाषाएँ थीं। विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं के माध्यम से भी शिक्षा दी जाती थी, जिससे विद्यार्थी अपनी भाषा एवं संस्कृति से जुड़े रहते थे।

➣ शिक्षा व्यवस्था का संचालन मुख्यतः मंदिरों, मठों, गुरुकुलों, मदरसों, धार्मिक संस्थाओं, दानदाताओं तथा स्थानीय शासकों के सहयोग से होता था। अधिकांश शिक्षण संस्थान समाज द्वारा संचालित होते थे, इसलिए उन पर सरकारी नियंत्रण बहुत कम था।

➣ शिक्षा का स्वरूप अधिकांशतः निःशुल्क अथवा अल्प व्यय वाला था। अनेक गुरुकुलों एवं धार्मिक संस्थानों में विद्यार्थियों के भोजन, आवास तथा अध्ययन की व्यवस्था समाज एवं दानदाताओं के सहयोग से की जाती थी।

पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था की सीमाएँ

➣ यद्यपि ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत की शिक्षा व्यवस्था समृद्ध एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, फिर भी समय के साथ इसमें अनेक व्यावहारिक एवं संरचनात्मक कमियाँ दिखाई देने लगी थीं। बदलती आर्थिक, वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप यह व्यवस्था स्वयं को पर्याप्त रूप से विकसित नहीं कर सकी।

आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, इंजीनियरिंग तथा व्यावसायिक शिक्षा जैसे विषयों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता था, जिससे नई आवश्यकताओं के अनुरूप दक्ष मानव संसाधन तैयार नहीं हो पाता था।

➣ शिक्षा का प्रसार पूरे समाज में समान रूप से नहीं था। जाति, वर्ग, लिंग एवं आर्थिक स्थिति के कारण अनेक लोगों, विशेषकर निम्न वर्गों एवं महिलाओं की शिक्षा तक पहुँच सीमित थी। परिणामस्वरूप शिक्षा का लाभ समाज के सभी वर्गों को समान रूप से नहीं मिल सका।

➣ उस समय भारत में एक समान शिक्षा प्रणाली का अभाव था। विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति तथा भाषाओं का प्रयोग होता था, जिससे शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता नहीं थी।

➣ अधिकांश शिक्षण संस्थान दान, धार्मिक संस्थाओं अथवा स्थानीय शासकों के संरक्षण पर निर्भर थे। किसी सुदृढ़ सरकारी शिक्षा नीति के अभाव में शिक्षा का विस्तार सीमित रहा तथा देशभर में समान गुणवत्ता वाली शिक्षा व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी।

➣ पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था की इन सीमाओं तथा ब्रिटिश प्रशासन की आवश्यकताओं ने भारत में आधुनिक (पाश्चात्य) शिक्षा प्रणाली की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। आगे चलकर ईस्ट इंडिया कम्पनी ने प्रशासनिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शिक्षा नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।

अंग्रेजों द्वारा शिक्षा में रुचि के कारण

➣ प्रारम्भ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का मुख्य उद्देश्य भारत में शिक्षा का विकास करना नहीं, बल्कि व्यापारिक लाभ एवं अपने शासन को सुदृढ़ करना था। किन्तु समय के साथ प्रशासनिक, आर्थिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं के कारण कम्पनी ने शिक्षा के क्षेत्र में भी रुचि लेनी प्रारम्भ की।

➣ अंग्रेजों को अपने विशाल प्रशासन के संचालन के लिए ऐसे भारतीय कर्मचारियों की आवश्यकता थी, जो अंग्रेजी भाषा तथा पाश्चात्य प्रशासनिक प्रणाली से परिचित हों। इसलिए उन्होंने ऐसी शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दिया, जिससे कम खर्च में प्रशिक्षित लिपिक एवं प्रशासनिक कर्मचारी तैयार किए जा सकें।

➣ भारत में कार्यरत ईसाई मिशनरियों ने भी शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य विद्यालयों की स्थापना कर पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ ईसाई धर्म एवं यूरोपीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना था।

➣ अंग्रेजों का यह भी मानना था कि आधुनिक यूरोपीय विज्ञान, साहित्य एवं विचारधारा के माध्यम से भारतीय समाज में पाश्चात्य सोच का विकास किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का प्रमुख माध्यम बनाने का समर्थन किया।

➣ समय के साथ कम्पनी सरकार ने अनुभव किया कि शिक्षा केवल प्रशासनिक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन की दीर्घकालिक स्थिरता का भी एक प्रभावी साधन बन सकती है। परिणामस्वरूप 1813 के चार्टर एक्ट से लेकर वुड के डिस्पैच (1854) तक अनेक महत्वपूर्ण शिक्षा नीतियाँ लागू की गईं।

अंग्रेजों द्वारा शिक्षा को बढ़ावा देने का उद्देश्य मुख्यतः प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति, पाश्चात्य विचारों का प्रसार, अंग्रेजी भाषा का विकास तथा ब्रिटिश शासन को मजबूत करना था। आधुनिक शिक्षा का विस्तार भारतीय समाज के विकास से अधिक ब्रिटिश हितों से प्रेरित था।

ईसाई मिशनरियों का योगदान

➣ भारत में आधुनिक शिक्षा के प्रारम्भिक विकास में ईसाई मिशनरियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

➣ 1813 के चार्टर एक्ट के बाद उन्हें भारत में अधिक स्वतंत्रता मिली, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने विभिन्न स्थानों पर विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा मुद्रणालयों की स्थापना की।

➣ मिशनरियों का प्रमुख उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना था, किन्तु इसके साथ ही उन्होंने आधुनिक शिक्षा, अंग्रेजी भाषा तथा पाश्चात्य ज्ञान के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ उन्होंने अनेक स्थानों पर स्थानीय भाषाओं के माध्यम से भी शिक्षा की व्यवस्था की, जिससे सामान्य लोगों तक शिक्षा का विस्तार संभव हो सका।

➣ मिशनरियों ने पाठ्य-पुस्तकों के प्रकाशन, मुद्रण कला के विकास तथा विद्यालयों की स्थापना के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोग किए।

➣ विशेष रूप से बंगाल के सीरामपुर को उन्होंने अपना प्रमुख केन्द्र बनाया, जहाँ से अनेक शैक्षणिक एवं धार्मिक गतिविधियों का संचालन किया गया।

➣ महिला शिक्षा तथा निम्न वर्गों की शिक्षा के क्षेत्र में भी मिशनरियों का योगदान उल्लेखनीय रहा। यद्यपि उनका उद्देश्य धार्मिक प्रचार था, फिर भी उनके प्रयासों ने भारत में आधुनिक शिक्षा के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

➣ इस प्रकार 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक भारत में आधुनिक शिक्षा की आधारभूमि तैयार हो चुकी थी।

➣ इसके बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करना प्रारम्भ किया और 1781 में कलकत्ता मदरसा की स्थापना से लेकर मैकॉले के शिक्षा सम्बन्धी प्रस्ताव (1835) तक अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए।

प्रारम्भिक शिक्षा प्रयास

➣ भारत में आधुनिक (पाश्चात्य) शिक्षा का संस्थागत विकास 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रारम्भ हुआ।

➣ इन प्रारम्भिक प्रयासों का उद्देश्य तत्काल व्यापक जनशिक्षा प्रदान करना नहीं था, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों को भारतीय कानून एवं भाषाओं का ज्ञान कराना तथा कम्पनी शासन को सुचारु रूप से संचालित करना था। आगे चलकर यही प्रयास भारत में आधुनिक शिक्षा नीति की आधारशिला सिद्ध हुए।

कलकत्ता मदरसा (1781 ई.)

प्लासी (1757 ई.) तथा बक्सर (1764 ई.) के युद्धों के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रभाव बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में तेजी से बढ़ा। 1765 ई. में दीवानी अधिकार प्राप्त होने के बाद कम्पनी को विशाल प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था का संचालन करना पड़ा।

➣ उस समय दीवानी तथा फौजदारी न्यायालयों में मुस्लिम विधि (इस्लामी शरीयत) का व्यापक उपयोग होता था। अंग्रेज अधिकारियों को न तो अरबी-फ़ारसी भाषाओं का पर्याप्त ज्ञान था और न ही इस्लामी विधि का।

➣ इसलिए कम्पनी को ऐसे भारतीय विद्वानों, काजियों, मुफ्तियों तथा विधि विशेषज्ञों की आवश्यकता थी, जो न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्यों में सहायता कर सकें।

➣ इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने 1781 ई. में कलकत्ता मदरसा (Calcutta Madrasa / Madrasa-e-Aliah) की स्थापना की।

➣ इसका प्रमुख उद्देश्य मुस्लिम विधि एवं पारम्परिक इस्लामी शिक्षा के विद्वानों को तैयार करना था, ताकि कम्पनी प्रशासन को प्रशिक्षित अधिकारी उपलब्ध हो सकें।

स्थापना एवं प्रारम्भिक स्वरूप

➣ कलकत्ता मदरसा की स्थापना वारेन हेस्टिंग्स के व्यक्तिगत संरक्षण में हुई। प्रारम्भ में इसके संचालन का व्यय उन्होंने अपनी निजी आय से वहन किया, बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसे नियमित आर्थिक सहायता (ग्रांट) प्रदान करनी प्रारम्भ की।

➣ मदरसे की स्थापना प्रारम्भ में कलकत्ता के बो बाज़ार क्षेत्र में की गई थी। यह स्थान हेस्टिंग्स के निवास के समीप था, जिससे वे स्वयं इसकी गतिविधियों पर ध्यान दे सकते थे।

➣ इसके प्रथम प्रधानाचार्य (हेड मौलवी) मुल्ला मजद-उद-दीन थे, जिन्हें अरबी, फ़ारसी तथा इस्लामी विधिशास्त्र का उत्कृष्ट विद्वान माना जाता था।

➣ प्रारम्भिक वर्षों में यह संस्था मुख्यतः मुस्लिम अभिजात वर्ग तथा न्यायिक सेवाओं में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए स्थापित की गई थी।

पाठ्यक्रम एवं शिक्षा व्यवस्था

➣ कलकत्ता मदरसा में अरबी, फ़ारसी, इस्लामी विधिशास्त्र (फिक्ह), हदीस, तफ़्सीर, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, गणित, ज्योतिष तथा प्राकृतिक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाते थे।

➣ शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य केवल धार्मिक ज्ञान प्रदान करना नहीं था, बल्कि ऐसे विद्वानों का निर्माण करना था जो कम्पनी के न्यायालयों एवं प्रशासन में काजी, मुफ्ती, कानून विशेषज्ञ, अनुवादक तथा न्यायिक सहायक के रूप में कार्य कर सकें।

➣ इस संस्था में पारम्परिक इस्लामी शिक्षा और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप व्यावहारिक ज्ञान का समन्वय किया गया था, जिससे कम्पनी को प्रशिक्षित स्थानीय कर्मचारी उपलब्ध हो सकें।

ब्रिटिश शिक्षा नीति में स्थान

➣ कलकत्ता मदरसा को ब्रिटिश भारत की प्राच्यवादी शिक्षा नीति का प्रथम महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। प्राच्यवादियों का मत था कि भारतीयों को उनकी पारम्परिक भाषाओं एवं ज्ञान परम्परा के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए।

➣ इस नीति के अंतर्गत अंग्रेजों ने अरबी, फ़ारसी एवं संस्कृत जैसी भारतीय परम्परागत भाषाओं तथा ज्ञान-संस्कृति को संरक्षण दिया, क्योंकि प्रशासन चलाने और भारतीय समाज को समझने के लिए यह आवश्यक माना जाता था।

➣ बाद में 1791 ई. में जोनाथन डंकन द्वारा बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना भी इसी प्राच्यवादी नीति का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।

➣ आगे चलकर 1835 ई. में थॉमस बैबिंगटन मैकाले के प्रसिद्ध मैकाले मिनट के बाद अंग्रेजी माध्यम एवं पाश्चात्य शिक्षा को प्राथमिकता दी गई, जिससे शिक्षा नीति का स्वरूप प्राच्यवाद से हटकर एंग्लिसिस्ट नीति की ओर परिवर्तित हो गया।

ऐतिहासिक महत्व

➣ कलकत्ता मदरसा को ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित प्रथम महत्वपूर्ण आधुनिक शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है। इसने भारत में संस्थागत शिक्षा व्यवस्था के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इस संस्था ने कम्पनी प्रशासन को ऐसे भारतीय विद्वान उपलब्ध कराए जो स्थानीय कानून, भाषा तथा समाज से परिचित थे। इससे न्यायिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने में सहायता मिली।

➣ इतिहासकारों के अनुसार यह संस्था केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन की उस नीति का प्रतीक थी जिसके माध्यम से अंग्रेज भारतीय परम्परागत ज्ञान का उपयोग अपने प्रशासनिक हितों के लिए करना चाहते थे।

➣ आधुनिक काल में यही संस्था विकसित होकर अलिया विश्वविद्यालय, कोलकाता के रूप में स्थापित है, जो आज भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

स्थापना वर्ष 1781 ई.
संस्थापक वारेन हेस्टिंग्स
प्रथम प्रधानाचार्य मुल्ला मजद-उद-दीन
उद्देश्य मुस्लिम विधि एवं प्रशासनिक अधिकारियों का प्रशिक्षण
शिक्षा नीति प्राच्यवादी (Orientalist) नीति का प्रारम्भिक उदाहरण
वर्तमान स्वरूप अलिया विश्वविद्यालय, कोलकाता

एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (1784 ई.)

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन भारत में तेजी से विस्तार कर रहा था। प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ अंग्रेज अधिकारियों में भारतीय इतिहास, भाषाओं, धर्म, कानून एवं संस्कृति को समझने की आवश्यकता भी बढ़ने लगी।

सर विलियम जोन्स, जो कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश थे, अनेक भाषाओं के विद्वान एवं प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी थे। उन्हें प्राच्य अध्ययन में विशेष रुचि होने के कारण ओरिएंटल जोन्स भी कहा जाता है।

➣ इंग्लैंड की रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन से प्रेरित होकर उन्होंने भारत में एक ऐसी संस्था स्थापित करने का विचार रखा, जहाँ एशिया, विशेषकर भारत के इतिहास, भाषा, साहित्य, धर्म, दर्शन, विज्ञान, कानून एवं पुरातत्त्व का व्यवस्थित अध्ययन किया जा सके।

➣ इसी उद्देश्य से 15 जनवरी, 1784 ई. को कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की गई। सर विलियम जोन्स इसके प्रथम अध्यक्ष बने, जबकि तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स को इसका संरक्षक बनाया गया।

उद्देश्य एवं कार्य

➣ सोसायटी का मुख्य उद्देश्य एशियाई सभ्यता, इतिहास, साहित्य, भाषाओं, धर्म, दर्शन, कानून, कला, विज्ञान एवं पुरातत्त्व का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन करना था।

➣ संस्था का प्रयास था कि भारतीय प्राचीन ग्रंथों का संग्रह, संपादन, अनुवाद एवं प्रकाशन किया जाए, ताकि भारतीय ज्ञान-परम्परा का परिचय यूरोप के विद्वानों तक पहुँच सके।

➣ सोसायटी ने दुर्लभ पाण्डुलिपियों, अभिलेखों, सिक्कों, मूर्तियों, शिलालेखों एवं पुरातात्त्विक अवशेषों के संरक्षण और अध्ययन का भी महत्वपूर्ण कार्य किया।

प्रारम्भिक स्वरूप एवं सदस्य

➣ प्रारम्भ में सोसायटी की बैठकें कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के ग्रैंड जूरी रूम में आयोजित होती थीं। बाद में लगभग 1808 ई. में इसे पार्क स्ट्रीट, कलकत्ता स्थित अपने भवन में स्थानांतरित कर दिया गया।

➣ इस संस्था से चार्ल्स विल्किंस, हेनरी थॉमस कोलब्रुक, नैथेनियल हालहेड आदि अनेक प्रसिद्ध प्राच्यविद् जुड़े रहे, जिन्होंने भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

चार्ल्स विल्किंस ने 1785 ई. में श्रीमद्भगवद्गीता का संस्कृत से अंग्रेज़ी में पहला प्रत्यक्ष अनुवाद प्रकाशित किया, जिससे भारतीय दर्शन का परिचय यूरोप तक पहुँचा।

प्रकाशन एवं शोध कार्य

➣ सोसायटी ने 1788 ई. से अपनी प्रसिद्ध शोध-पत्रिका “एशियाटिक रिसर्चेज़” (Asiatick Researches) का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह पत्रिका प्राच्य अध्ययन के क्षेत्र में विश्व की प्रमुख शोध-पत्रिकाओं में गिनी जाती थी।

➣ इसमें इतिहास, धर्म, भाषाविज्ञान, पुरातत्त्व, भूगोल, वनस्पति विज्ञान, खगोल विज्ञान तथा भारतीय सभ्यता से संबंधित अनेक शोध-लेख प्रकाशित किए जाते थे।

सर विलियम जोन्स ने स्वयं मनुस्मृति, अभिज्ञानशाकुन्तलम् तथा गीतगोविन्द सहित अनेक संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेज़ी में अनुवाद कर भारतीय साहित्य को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।

भाषाविज्ञान में योगदान

1786 ई. में सोसायटी की तृतीय वर्षगाँठ पर दिए गए अपने प्रसिद्ध भाषण में विलियम जोन्स ने कहा कि संस्कृत, ग्रीक एवं लैटिन भाषाओं के बीच इतनी समानता है कि उनका उद्भव किसी एक समान मूल भाषा से हुआ होगा।

➣ इसी विचार ने आगे चलकर इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की अवधारणा को जन्म दिया तथा आधुनिक तुलनात्मक भाषाविज्ञान की नींव रखी।

भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व में योगदान

➣ एशियाटिक सोसायटी ने भारतीय इतिहास, प्राचीन अभिलेखों, सिक्कों, शिलालेखों तथा पुरातात्त्विक अवशेषों के व्यवस्थित अध्ययन की परम्परा विकसित की।

➣ इस संस्था द्वारा एकत्रित पाण्डुलिपियाँ एवं पुरावशेष आगे चलकर भारतीय इतिहास, धर्म एवं संस्कृति के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत सिद्ध हुए।

➣ बाद के वर्षों में भारतीय पुरातत्त्व एवं प्राच्य अध्ययन के क्षेत्र में कार्य करने वाले अनेक विद्वानों को इस संस्था के शोध से प्रेरणा मिली।

ऐतिहासिक महत्व

➣ यद्यपि एशियाटिक सोसायटी कोई शिक्षण संस्थान नहीं थी, फिर भी इसने भारत में आधुनिक प्राच्य अध्ययन की मजबूत आधारशिला रखी।

➣ इस संस्था के माध्यम से यूरोप के विद्वानों में भारतीय इतिहास, साहित्य, धर्म एवं दर्शन के प्रति गहरी रुचि उत्पन्न हुई तथा भारतीय सभ्यता को विश्व स्तर पर नई पहचान मिली।

➣ इतिहासकारों के अनुसार एशियाटिक सोसायटी ने भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण, प्राचीन ग्रंथों के अनुवाद तथा ऐतिहासिक शोध को नई दिशा प्रदान की।

1936 ई. में इसका नाम बदलकर केवल एशियाटिक सोसायटी कर दिया गया। वर्तमान में यह कोलकाता के पार्क स्ट्रीट में स्थित है तथा भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में कार्य कर रही है।

विषय विवरण
स्थापना 15 जनवरी, 1784 ई.
संस्थापक सर विलियम जोन्स
प्रथम अध्यक्ष सर विलियम जोन्स
संरक्षक (Patron) वारेन हेस्टिंग्स
शोध-पत्रिका एशियाटिक रिसर्चेज़ (1788 ई.)
महत्व भारत में आधुनिक प्राच्य अध्ययन (Orientalism) की आधारशिला।
1936 ई. नाम बदलकर The Asiatic Society रखा गया।

बनारस संस्कृत कॉलेज (1791 ई.)

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रशासन बंगाल, बिहार एवं उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों तक फैल चुका था। न्यायालयों में हिन्दुओं से संबंधित मामलों का निर्णय धर्मशास्त्रों एवं हिन्दू विधि के आधार पर किया जाता था, जिसके लिए संस्कृत के विद्वान पंडितों की आवश्यकता पड़ती थी।

जोनाथन डंकन, जो 1787 ई. से बनारस के ब्रिटिश रेजिडेंट थे, संस्कृत भाषा एवं भारतीय शास्त्रीय परम्परा के प्रशंसक थे। उन्होंने अनुभव किया कि कम्पनी प्रशासन के लिए ऐसे विद्वानों की आवश्यकता है, जो हिन्दू विधि एवं धर्मशास्त्र का गहन ज्ञान रखते हों और न्यायालयों में कानून संबंधी मामलों में सहायता कर सकें।

➣ डंकन ने इस उद्देश्य से तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड कार्नवालिस को एक संस्कृत महाविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव भेजा। प्रस्ताव स्वीकृत होने के बाद 1791 ई. में बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई।

➣ जिस प्रकार 1781 ई. में मुस्लिम विधि के अध्ययन हेतु कलकत्ता मदरसा स्थापित किया गया था, उसी प्रकार हिन्दू विधि एवं संस्कृत अध्ययन के लिए बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई।

स्थापना का उद्देश्य

➣ इस कॉलेज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य संस्कृत भाषा, हिन्दू धर्मशास्त्र एवं हिन्दू विधि (Hindu Law) का संरक्षण एवं अध्ययन करना था।

➣ कम्पनी प्रशासन ऐसे योग्य भारतीय पंडित तैयार करना चाहता था, जो न्यायालयों में हिन्दू विधि विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर सकें तथा अंग्रेज न्यायाधीशों को हिन्दू कानून की व्याख्या एवं निर्णय देने में सहायता प्रदान करें।

➣ इसके अतिरिक्त भारतीय शास्त्रीय ज्ञान, धार्मिक साहित्य एवं संस्कृत ग्रंथों के संरक्षण तथा अध्ययन को भी इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य बनाया गया।

वित्त-पोषण एवं प्रारम्भिक व्यवस्था

➣ कॉलेज की स्थापना एवं संचालन का व्यय प्रारम्भ में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा वहन किया गया तथा इसे सरकारी राजस्व से नियमित अनुदान (Grant) प्रदान किया जाता था।

➣ प्रारम्भिक वर्षों में यह संस्था बनारस के प्रमुख संस्कृत विद्वानों के मार्गदर्शन में संचालित हुई तथा यहाँ पारम्परिक भारतीय शिक्षा-पद्धति को अपनाया गया।

➣ कॉलेज के प्रथम प्रधानाचार्य (हेड पंडित) के रूप में पंडित काशीनाथ भट्टाचार्य को नियुक्त किया गया, जिन्हें संस्कृत एवं धर्मशास्त्र का प्रसिद्ध विद्वान माना जाता था।

पाठ्यक्रम एवं शिक्षा व्यवस्था

➣ कॉलेज में शिक्षा का माध्यम मुख्यतः संस्कृत था। यहाँ भारतीय परम्परा के अनुसार शास्त्रों का अध्ययन कराया जाता था।

➣ प्रमुख विषयों में वेद, वेदांत, मीमांसा, न्याय (तर्कशास्त्र), व्याकरण, धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ, ज्योतिष, अलंकारशास्त्र तथा हिन्दू विधि शामिल थे।

➣ विद्यार्थियों को केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि न्यायिक एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप हिन्दू कानून की व्याख्या करने का भी प्रशिक्षण दिया जाता था।

➣ इस संस्था में पारम्परिक गुरुकुल एवं पाठशाला प्रणाली की अनेक विशेषताओं को बनाए रखते हुए व्यवस्थित संस्थागत शिक्षा की व्यवस्था विकसित की गई।

ब्रिटिश शिक्षा नीति में स्थान

➣ बनारस संस्कृत कॉलेज प्रारम्भिक ब्रिटिश शासन की प्राच्यवादी शिक्षा नीति का प्रमुख उदाहरण था। प्राच्यवादियों का मत था कि भारतीयों को उनकी अपनी भाषाओं एवं परम्परागत ज्ञान-व्यवस्था के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

➣ इसी नीति के अंतर्गत पहले कलकत्ता मदरसा (1781 ई.) तथा बाद में बनारस संस्कृत कॉलेज (1791 ई.) की स्थापना की गई। इन दोनों संस्थाओं का उद्देश्य भारतीय परम्परागत ज्ञान को संरक्षण देना तथा कम्पनी प्रशासन के लिए स्थानीय विधि विशेषज्ञ तैयार करना था।

➣ आगे चलकर 1835 ई. में थॉमस बैबिंगटन मैकाले के मैकाले मिनट के बाद अंग्रेजी भाषा एवं पाश्चात्य शिक्षा को प्राथमिकता दी गई, जिससे प्राच्यवादी नीति का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो गया।

महत्व एवं ऐतिहासिक मूल्यांकन

➣ बनारस संस्कृत कॉलेज को ब्रिटिश भारत का प्रथम प्रमुख संस्कृत शिक्षण संस्थान माना जाता है, जिसने संस्कृत भाषा एवं भारतीय शास्त्रीय परम्परा के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इस संस्था ने अनेक विद्वान पंडित तैयार किए, जिन्होंने कम्पनी की न्यायिक व्यवस्था में हिन्दू विधि विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया।

➣ इतिहासकारों के अनुसार इस कॉलेज ने भारतीय शास्त्रीय ज्ञान, धर्मशास्त्र एवं संस्कृत साहित्य के अध्ययन को संस्थागत रूप प्रदान किया तथा ब्रिटिश शासनकाल में प्राच्य अध्ययन को नई दिशा दी।

➣ यह संस्था इस बात का भी प्रमाण है कि प्रारम्भिक ब्रिटिश प्रशासन भारतीय भाषाओं एवं पारम्परिक शिक्षा को समाप्त करने के पक्ष में नहीं था, बल्कि उन्हें अपने प्रशासनिक हितों के अनुरूप संरक्षित एवं उपयोग करना चाहता था।

वर्तमान स्थिति

➣ समय के साथ यह संस्थान गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज के रूप में विकसित हुआ।

1958 ई. में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया तथा इसका नाम संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय (वर्तमान: संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी) रखा गया।

➣ वर्तमान में यह विश्वविद्यालय संस्कृत, भारतीय दर्शन, धर्मशास्त्र एवं पारम्परिक भारतीय ज्ञान-परम्परा के अध्ययन का एक प्रमुख राष्ट्रीय केन्द्र है।

तथ्य विवरण
स्थापना 1791 ई.
संस्थापक जोनाथन डंकन
स्वीकृति लॉर्ड कार्नवालिस
प्रथम हेड पंडित पंडित काशीनाथ भट्टाचार्य
मुख्य उद्देश्य हिन्दू विधि विशेषज्ञ एवं संस्कृत विद्वान तैयार करना
शिक्षा नीति प्राच्यवादी (Orientalist) नीति का प्रमुख उदाहरण
वर्तमान स्वरूप संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी (1958 ई.)

फोर्ट विलियम कॉलेज (1800 ई.)

लॉर्ड वेलेजली ने भारत आने के बाद अनुभव किया कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के नव-नियुक्त सिविल अधिकारीभारतीय भाषाओं, कानूनों, सामाजिक परम्पराओं एवं प्रशासनिक व्यवस्था से अपरिचित होने के कारण प्रभावी ढंग से शासन नहीं कर पा रहे थे।

➣ उस समय कम्पनी के अधिकांश अधिकारी सीधे इंग्लैंड से भारत आते थे। उन्हें भारतीय समाज, स्थानीय भाषाओं तथा न्यायिक प्रणाली का पर्याप्त ज्ञान नहीं होता था, जिससे प्रशासनिक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती थीं।

➣ इन कमियों को दूर करने तथा अधिकारियों को भारत की परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से 10 जुलाई, 1800 ई. को कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई।

➣ लॉर्ड वेलेजली की योजना अत्यन्त व्यापक थी। वे इस संस्थान को ऐसा उच्च शिक्षण एवं प्रशिक्षण केन्द्र बनाना चाहते थे जहाँ भारतीय भाषाओं के साथ-साथ इतिहास, कानून, प्रशासन, अर्थशास्त्र, भूगोल, राजनीति एवं नैतिक दर्शन का भी अध्ययन कराया जाए।

इसी कारण इसे कभी-कभी ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट की संकल्पना से भी जोड़ा जाता है।

उद्देश्य एवं शिक्षा व्यवस्था

➣ कॉलेज का मुख्य उद्देश्य कम्पनी के नव-नियुक्त सिविल अधिकारियों को भारतीय प्रशासन के लिए आवश्यक व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था।

➣ अधिकारियों को फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, हिन्दी (हिन्दुस्तानी), बंगाली, मराठी, तेलुगु एवं अन्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन कराया जाता था, ताकि वे स्थानीय जनता से संवाद स्थापित कर सकें तथा प्रशासनिक कार्यों को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित कर सकें।

➣ इसके अतिरिक्त भारतीय कानून, राजस्व व्यवस्था, स्थानीय रीति-रिवाज, इतिहास तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं का भी अध्ययन कराया जाता था।

प्रशासनिक ढाँचा एवं प्रमुख विद्वान

➣ कॉलेज के प्रोवोस्ट के रूप में रेवरेंड डेविड ब्राउन की नियुक्ति की गई, जबकि लॉर्ड वेलेजली इसके संरक्षक थे।

➣ इस कॉलेज से अनेक प्रसिद्ध विद्वान जुड़े, जिनमें डॉ. जॉन बोर्थविक गिलक्राइस्ट, विलियम कैरी, हेनरी थॉमस कोलब्रुक तथा अन्य प्राच्यविद् प्रमुख थे।

जॉन गिलक्राइस्ट हिन्दुस्तानी भाषा के प्रमुख विद्वान थे। उन्होंने हिन्दी-उर्दू के व्याकरण, शब्दकोश तथा भाषा-शिक्षण की वैज्ञानिक पद्धति विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

विलियम कैरी ने बंगाली, संस्कृत तथा हिन्दी के अध्ययन को प्रोत्साहित किया तथा भारतीय भाषाओं में अनेक ग्रंथों के प्रकाशन में योगदान दिया।

भारतीय भाषाओं एवं हिन्दी गद्य के विकास में योगदान

➣ फोर्ट विलियम कॉलेज ने भारतीय भाषाओं में पाठ्य-पुस्तकों, व्याकरणों, शब्दकोशों तथा अनूदित साहित्य के निर्माण को व्यवस्थित रूप से प्रोत्साहित किया।

➣ कॉलेज के संरक्षण में अनेक भारतीय विद्वानों ने हिन्दी, बंगाली एवं अन्य भाषाओं में नई गद्य-रचनाएँ तैयार कीं। इससे भारतीय भाषाओं के आधुनिक साहित्यिक स्वरूप के विकास को गति मिली।

लल्लू लाल ने 1805 ई. में प्रेम सागर की रचना की, जिसे आधुनिक हिन्दी गद्य की प्रारम्भिक एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है।

सदल मिश्र ने नासिकेतोपाख्यान तथा सदासुखलाल ने भी हिन्दी गद्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।

➣ इस प्रकार फोर्ट विलियम कॉलेज ने खड़ी बोली हिन्दी गद्य के विकास, भाषा के मानकीकरण तथा हिन्दी साहित्य को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रकाशन एवं अनुवाद कार्य

➣ कॉलेज में भारतीय भाषाओं की अनेक पाठ्य-पुस्तकों, व्याकरणों एवं शब्दकोशों का निर्माण कराया गया। साथ ही संस्कृत, फ़ारसी एवं अन्य भाषाओं के ग्रंथों का अंग्रेज़ी तथा भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी कराया गया।

➣ इन प्रकाशनों ने न केवल कम्पनी अधिकारियों के प्रशिक्षण में सहायता की, बल्कि भारतीय भाषाओं के व्यवस्थित अध्ययन एवं विकास को भी प्रोत्साहित किया।

कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का विरोध

➣ इंग्लैंड स्थित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को लॉर्ड वेलेजली की यह व्यापक योजना अत्यधिक खर्चीली एवं उनके अधिकार-क्षेत्र से बाहर प्रतीत हुई। इसलिए उन्होंने इस कॉलेज की गतिविधियों पर आपत्ति व्यक्त की।

➣ परिणामस्वरूप 1802 ई. से कॉलेज की भूमिका मुख्यतः भाषा-प्रशिक्षण तक सीमित कर दी गई तथा व्यापक प्रशासनिक शिक्षा की योजना समाप्त कर दी गई।

➣ बाद में कम्पनी अधिकारियों के औपचारिक प्रशिक्षण के लिए इंग्लैंड में 1806 ई. में ईस्ट इंडिया कॉलेज, हैलीबरी की स्थापना की गई, जहाँ भारत भेजे जाने से पूर्व अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाने लगा।

ऐतिहासिक महत्व

➣ यद्यपि फोर्ट विलियम कॉलेज अपनी मूल योजना के अनुसार विकसित नहीं हो सका, फिर भी भारतीय भाषाओं के अध्ययन, व्याकरण निर्माण, शब्दकोश-निर्माण तथा अनुवाद साहित्य के विकास में इसका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

➣ इतिहासकार इसे आधुनिक हिन्दी गद्य के विकास का प्रारम्भिक केन्द्र मानते हैं, क्योंकि यहीं से हिन्दी में व्यवस्थित गद्य-लेखन की परम्परा को संस्थागत प्रोत्साहन मिला।

➣ इस कॉलेज द्वारा तैयार किए गए ग्रंथों एवं भाषाई अध्ययन ने आगे चलकर हिन्दी, बंगाली, उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं के आधुनिक साहित्यिक स्वरूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विषय विवरण
स्थापना 10 जुलाई, 1800 ई.
संस्थापक लॉर्ड वेलेजली
स्थान फोर्ट विलियम, कलकत्ता
प्रोवोस्ट रेवरेंड डेविड ब्राउन
प्रमुख विद्वान जॉन गिलक्राइस्ट, विलियम कैरी, लल्लू लाल एवं सदल मिश्र
मुख्य उद्देश्य कम्पनी अधिकारियों को भारतीय भाषाओं एवं प्रशासन का प्रशिक्षण देना।
1802 ई. कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने कॉलेज को मुख्यतः भाषा-प्रशिक्षण संस्थान तक सीमित कर दिया।
1806 ई. इंग्लैंड में हैलीबरी कॉलेज की स्थापना हुई।

हिन्दू कॉलेज, कलकत्ता (1817 ई.)

➣ उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कलकत्ता ब्रिटिश भारत का प्रमुख प्रशासनिक एवं बौद्धिक केन्द्र बन चुका था। अंग्रेजी भाषा, आधुनिक विज्ञान तथा पाश्चात्य शिक्षा के प्रति शिक्षित भारतीयों की रुचि निरन्तर बढ़ रही थी, जबकि उस समय उपलब्ध अधिकांश शिक्षा पारम्परिक पाठशालाओं एवं मदरसों तक सीमित थी।

➣ इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कलकत्ता के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सर हाइड ईस्ट (Sir Hyde East) ने यूरोपीय विद्वानों तथा बंगाल के प्रतिष्ठित भारतीय नागरिकों की एक बैठक आयोजित की।

➣ इस बैठक में भारतीय युवाओं को आधुनिक एवं अंग्रेजी शिक्षा प्रदान करने के लिए एक नए शिक्षण संस्थान की स्थापना का निर्णय लिया गया।

➣ परिणामस्वरूप 20 जनवरी, 1817 ई. को कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना हुई। यह भारत में आधुनिक पाश्चात्य उच्च शिक्षा के प्रारम्भिक एवं सबसे प्रभावशाली संस्थानों में से एक माना जाता है।

➣ हिन्दू कॉलेज की स्थापना में डेविड हेयर की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। वे स्कॉटलैंड के मूल निवासी, घड़ीसाज़ तथा महान समाजसेवी थे, जिन्होंने भारतीय युवाओं में आधुनिक शिक्षा के प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

➣ कॉलेज की स्थापना एवं संचालन में राधाकांत देब, बैद्यनाथ मुखर्जी, गोपीमोहन ठाकुर, रासमय दत्त तथा कलकत्ता के अनेक प्रतिष्ठित बंगाली भद्रलोक परिवारों ने आर्थिक एवं प्रशासनिक सहयोग दिया।

राजा राममोहन राय प्रारम्भिक विचार-विमर्श में सम्मिलित थे तथा आधुनिक शिक्षा के समर्थक भी थे, किन्तु उनके सामाजिक एवं धार्मिक सुधारवादी विचारों के कारण रूढ़िवादी हिन्दू नेताओं ने उन्हें औपचारिक संस्थापक समिति में सम्मिलित नहीं होने दिया। इसलिए इतिहासकार हिन्दू कॉलेज की स्थापना का प्रमुख श्रेय मुख्यतः डेविड हेयर तथा उनके सहयोगियों को देते हैं।

उद्देश्य, शिक्षा व्यवस्था एवं डेरोज़ियो का योगदान

➣ हिन्दू कॉलेज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारतीय युवाओं को अंग्रेजी भाषा, आधुनिक विज्ञान तथा पाश्चात्य ज्ञान से परिचित कराना था, ताकि वे प्रशासन, न्याय, व्यापार तथा आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर सकें।

➣ यहाँ अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य, गणित, इतिहास, भूगोल, दर्शनशास्त्र, नैतिक दर्शन, प्राकृतिक विज्ञान तथा राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। उस समय की पारम्परिक शिक्षा की तुलना में यह पाठ्यक्रम अत्यन्त आधुनिक माना जाता था तथा विद्यार्थियों में तर्कशीलता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं स्वतंत्र चिंतन को प्रोत्साहित करता था।

1826 ई. में हेनरी लुई विवियन डेरोज़ियो इस कॉलेज में अध्यापक नियुक्त हुए। वे प्रतिभाशाली शिक्षक, कवि एवं उदारवादी विचारक थे। उन्होंने विद्यार्थियों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सामाजिक सुधार के लिए प्रेरित किया।

➣ डेरोज़ियो के प्रभाव से विद्यार्थियों का एक समूह विकसित हुआ, जिसे यंग बंगाल आंदोलन कहा जाता है। इस समूह ने जाति-भेद, अंधविश्वास एवं रूढ़िवाद का विरोध करते हुए आधुनिक उदारवादी विचारों का समर्थन किया।

➣ यद्यपि इसका प्रभाव सीमित वर्ग तक रहा, फिर भी इसने बंगाल में बौद्धिक जागरण एवं सामाजिक सुधार को नई दिशा प्रदान की।

बंगाल नवजागरण एवं संस्थान का विकास

➣ हिन्दू कॉलेज ने आधुनिक शिक्षित मध्यम वर्ग के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ से शिक्षित अनेक विद्यार्थियों ने आगे चलकर शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य, प्रशासन तथा सामाजिक सुधार के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया।

➣ इतिहासकारों के अनुसार यह संस्थान बंगाल नवजागरण का प्रमुख केन्द्र था, क्योंकि यहीं से आधुनिक विचारों, वैज्ञानिक चेतना एवं आलोचनात्मक चिंतन की नई धारा विकसित हुई।

1855 ई. में हिन्दू कॉलेज के विद्यालय को अलग कर हेयर स्कूल बनाया गया, जबकि उच्च शिक्षा वाले भाग का नाम प्रेसीडेंसी कॉलेज रखा गया। आगे चलकर यह भारत के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल हुआ।

2010 ई. में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया तथा इसका नाम प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय , कोलकाता रखा गया।

ऐतिहासिक महत्व

➣ हिन्दू कॉलेज को भारत में आधुनिक पाश्चात्य उच्च शिक्षा का अग्रणी संस्थान माना जाता है। इसने भारतीय युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कशीलता एवं आधुनिक ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इस संस्थान ने केवल शिक्षित व्यक्तियों का निर्माण ही नहीं किया, बल्कि आधुनिक भारत के सामाजिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विकास तथा बंगाल नवजागरण को भी नई दिशा प्रदान की। भारतीय शिक्षा के इतिहास में इसका स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है।

तथ्य विवरण
स्थापना 20 जनवरी, 1817 ई.
स्थान कलकत्ता
स्थापना में प्रमुख भूमिका सर हाइड ईस्ट एवं डेविड हेयर
प्रमुख सहयोगी राधाकांत देब, बैद्यनाथ मुखर्जी, गोपीमोहन ठाकुर आदि
प्रमुख शिक्षक हेनरी लुई विवियन डेरोज़ियो (1826 ई.)
प्रसिद्ध आंदोलन यंग बंगाल आंदोलन
1855 ई. प्रेसीडेंसी कॉलेज
2010 ई. प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता

चार्ल्स ग्रांट एवं आधुनिक शिक्षा का समर्थन

चार्ल्स ग्रांट ईस्ट इंडिया कम्पनी में सेवा करते हुए बंगाल में वाणिज्य से जुड़े उच्च पदों पर कार्यरत रहे। भारत में रहते हुए वे इवैंजेलिकल ईसाई विचारधारा से गहराई से प्रभावित हुए, जिसने उनके सामाजिक व शैक्षणिक विचारों को दिशा दी।

➣ आगे चलकर वे ब्रिटिश संसद के सदस्य तथा कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के अध्यक्ष जैसे प्रभावशाली पदों पर भी पहुँचे, जिससे उनके विचारों को कम्पनी की नीतियों को प्रभावित करने का सीधा अवसर मिला।

1792 ई. में चार्ल्स ग्रांट ने Observations on the State of Society among the Asiatic Subjects of Great Britain शीर्षक से एक विस्तृत प्रतिवेदन तैयार कर कम्पनी के निदेशक मंडल के समक्ष प्रस्तुत किया।

➣ इस प्रतिवेदन में उन्होंने भारतीय समाज की तत्कालीन सामाजिक, नैतिक एवं धार्मिक स्थिति की कड़ी आलोचना करते हुए इसे अंधविश्वास, अज्ञानता एवं नैतिक पतन से ग्रस्त बताया।

➣ ग्रांट का मत था कि यदि भारतीयों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तर्कशीलता एवं नैतिक शिक्षा प्रदान की जाए, तो समाज में व्यापक परिवर्तन लाया जा सकता है। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया।

एंग्लिसिस्ट विचारधारा एवं मिशनरी शिक्षा का समर्थन

➣ चार्ल्स ग्रांट का दृढ़ विश्वास था कि भारत के विकास के लिए अंग्रेजी भाषा तथा पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान का प्रसार आवश्यक है। वे पारम्परिक संस्कृत, अरबी एवं फ़ारसी आधारित शिक्षा की अपेक्षा आधुनिक यूरोपीय शिक्षा को अधिक उपयोगी मानते थे।

➣ उन्होंने सुझाव दिया कि भारतीयों को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से विज्ञान, गणित, इतिहास, दर्शन, आधुनिक राजनीति एवं नैतिक शिक्षा का ज्ञान दिया जाए, जिससे वे आधुनिक विचारों से परिचित हो सकें।

➣ ग्रांट का यह दृष्टिकोण आगे चलकर एंग्लिसिस्ट विचारधारा का आधार बना। इस विचारधारा का उद्देश्य भारतीय शिक्षा में अंग्रेजी भाषा एवं पाश्चात्य ज्ञान को प्रमुख स्थान देना था।

➣ चार्ल्स ग्रांट का मानना था कि शिक्षा के प्रसार में ईसाई मिशनरी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उन्होंने भारत में मिशनरियों को कार्य करने तथा विद्यालय स्थापित करने की अनुमति देने का समर्थन किया।

➣ उनके अनुसार मिशनरी संस्थाएँ अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक सुधारों को भी बढ़ावा देंगी। यद्यपि इस विचार से सभी लोग सहमत नहीं थे, फिर भी इसने ब्रिटिश शिक्षा नीति की दिशा को प्रभावित किया।

विरोध एवं दीर्घकालिक प्रभाव

1793 ई. में चार्टर एक्ट के नवीनीकरण के समय चार्ल्स ग्रांट के सुझावों को लागू करने का प्रयास किया गया, परन्तु ईस्ट इंडिया कम्पनी के निदेशक मंडल तथा ब्रिटिश संसद ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

➣ उनका मत था कि मिशनरियों के प्रवेश एवं शिक्षा नीति में बड़े परिवर्तन से भारतीय समाज में असंतोष उत्पन्न हो सकता है।

➣ यद्यपि उनके सुझाव तत्काल लागू नहीं हुए, फिर भी चार्ल्स ग्रांट ने अपने विचारों का प्रचार-प्रसार जारी रखा और ब्रिटिश नीति-निर्माताओं को आधुनिक शिक्षा के महत्व से लगातार अवगत कराया।

➣ चार्ल्स ग्रांट के विचारों का स्पष्ट प्रभाव 1813 के चार्टर एक्ट में दिखाई देता है। इस अधिनियम द्वारा पहली बार भारत में शिक्षा के विकास के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये खर्च करने तथा ईसाई मिशनरियों को भारत में कार्य करने की वैधानिक अनुमति भी प्राप्त हुई, जिससे अंग्रेजी शिक्षा एवं मिशनरी विद्यालयों के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।

➣ चार्ल्स ग्रांट के विचारों ने भारत की शिक्षा नीति को नई दिशा दी तथा प्राच्यवादी और एंग्लिसिस्ट विचारधाराओं के बीच चल रहे विवाद में एंग्लिसिस्ट पक्ष को वैचारिक आधार प्रदान किया।

➣ आगे चलकर 1835 ई. में थॉमस बैबिंगटन मैकाले के प्रसिद्ध मैकाले मिनट में अंग्रेजी शिक्षा को जो प्राथमिकता दी गई, उसके पीछे चार्ल्स ग्रांट के विचारों का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

➣ इतिहासकार चार्ल्स ग्रांट को भारत में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा, एंग्लिसिस्ट नीति एवं मिशनरी शिक्षा के प्रमुख वैचारिक प्रवर्तकों में गिनते हैं। यद्यपि उनके सभी सुझाव तत्काल लागू नहीं हुए, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश शिक्षा नीति के भविष्य को गहराई से प्रभावित किया।

चार्टर एक्ट, 1813

1813 ई. का चार्टर एक्ट ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारिक अधिकार-पत्र के बीस वर्षीय नवीनीकरण से संबंधित अधिनियम था, जिसे ब्रिटिश संसद ने पारित किया।

➣ यह अधिनियम भारतीय शिक्षा के इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि पहली बार इसके माध्यम से शिक्षा संबंधी प्रावधानों को वैधानिक मान्यता प्राप्त हुई।

➣ इस अधिनियम द्वारा भारत में कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया, यद्यपि चाय तथा चीन के साथ व्यापार पर उसका एकाधिकार बना रहा।

➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने स्पष्ट कर दिया कि कम्पनी केवल व्यापारिक संस्था नहीं रहेगी, बल्कि भारत के प्रशासन एवं जनकल्याण संबंधी दायित्वों का भी निर्वहन करेगी। इसी कारण शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की भूमिका पहली बार विधिक रूप से स्वीकार की गई।

शिक्षा संबंधी प्रावधान एवं मिशनरियों की भूमिका

➣ इस अधिनियम की धारा 43 के अंतर्गत कम्पनी को निर्देश दिया गया कि वह अपनी वार्षिक आय में से कम से कम एक लाख रुपये भारतीयों की शिक्षा, साहित्य के पुनरुद्धार तथा विज्ञान के ज्ञान के प्रसार पर व्यय करेगी। यह भारतीय शिक्षा पर सरकारी व्यय का पहला वैधानिक प्रावधान था।

➣ यद्यपि यह राशि तत्काल व्यय नहीं की जा सकी, क्योंकि कम्पनी उस समय प्रशासनिक एवं सैन्य समस्याओं, विशेषकर तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–1819 ई.) तथा वित्तीय कठिनाइयों से जूझ रही थी।

➣ बाद में 1823 ई. में जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (GCPI) की स्थापना के बाद इस राशि का व्यवस्थित उपयोग प्रारम्भ हुआ।

➣ इस अधिनियम का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि ईसाई मिशनरियों को लाइसेंस प्रणाली के अंतर्गत भारत में प्रवेश, धर्म-प्रचार तथा विद्यालय स्थापित करने की अनुमति दी गई।

➣ इससे सेरामपुर मिशन सहित अनेक मिशनरी संस्थाओं ने विद्यालय, मुद्रणालय तथा शिक्षण संस्थान स्थापित किए और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार को गति मिली।

ऐतिहासिक महत्व

➣ यद्यपि चार्टर एक्ट, 1813 के तत्काल बाद भारत में कोई व्यापक शिक्षा व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी, फिर भी यह भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। पहली बार सरकार ने शिक्षा के विकास की जिम्मेदारी स्वीकार की तथा उसके लिए निश्चित धनराशि उपलब्ध कराने का कानूनी प्रावधान किया।

➣ इस अधिनियम ने मिशनरी शिक्षा के विस्तार, आधुनिक शिक्षा के विकास तथा शिक्षा नीति पर होने वाले वैचारिक विवादों की आधारशिला रखी।

आगे चलकर जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (1823), मैकॉले का शिक्षा संबंधी विवरण (1835) तथा वुड का डिस्पैच (1854) जैसी महत्वपूर्ण शिक्षा नीतियों का विकास इसी अधिनियम की पृष्ठभूमि में हुआ।

तथ्य विवरण
अधिनियम चार्टर एक्ट, 1813
महत्वपूर्ण धारा धारा 43
शिक्षा हेतु प्रावधान प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये
सरकारी उत्तरदायित्व शिक्षा पर सरकारी व्यय का पहला वैधानिक प्रावधान
मिशनरियों को अनुमति लाइसेंस प्रणाली के अंतर्गत शिक्षा एवं धर्म-प्रचार
प्रमुख प्रभाव प्राच्यवाद-आंग्लवाद विवाद की पृष्ठभूमि तैयार हुई
दीर्घकालिक परिणाम 1823 की GCPI, 1835 की मैकॉले नीति तथा 1854 के वुड डिस्पैच का आधार

जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (1823 ई.)

चार्टर एक्ट, 1813 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया था कि कम्पनी प्रतिवर्ष एक लाख रुपये भारतीय शिक्षा के विकास एवं साहित्य के पुनरुद्धार हेतु व्यय करेगी, किन्तु प्रारम्भिक वर्षों में विभिन्न कारणों से यह राशि प्रभावी ढंग से खर्च नहीं हो पाई थी।

➣ इसी प्रावधान को क्रियान्वित करने तथा शिक्षा-व्यय की उचित निगरानी हेतु गवर्नर-जनरल लॉर्ड एमहर्स्ट ने 1823 ई. में जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (GCPI) का गठन किया।

समिति की संरचना एवं कार्य

➣ इस समिति में दस सदस्य नियुक्त किए गए थे, जिनमें कुछ प्राच्यवादी (Orientalist) विचारधारा के तथा कुछ आंग्लवादी (Anglicist) विचारधारा के विद्वान शामिल थे।

➣ समिति का मुख्य दायित्व शिक्षा हेतु उपलब्ध सरकारी अनुदान का उचित वितरण करना, नवीन शिक्षण संस्थाओं की स्थापना पर सुझाव देना तथा शिक्षा-नीति के सामान्य निर्देशन का कार्य करना था।

➣ समिति ने अपने प्रारम्भिक वर्षों में कलकत्ता संस्कृत कॉलेज (1824 ई.) तथा आगरा कॉलेज जैसी पारम्परिक प्राच्य शिक्षण संस्थाओं की स्थापना व सहायता में सक्रिय भूमिका निभाई, तथा साथ ही पाश्चात्य विज्ञान की पुस्तकों का अनुवाद कराने का कार्य भी प्रारम्भ किया।

प्राच्यवाद बनाम आंग्लवाद विवाद (1823–1835 ई.)

1813 के चार्टर एक्ट में भारतीय शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये व्यय करने की व्यवस्था तो की गई, किन्तु यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस धनराशि का उपयोग प्राच्य (संस्कृत, अरबी एवं फ़ारसी) शिक्षा के विकास में किया जाए या अंग्रेजी माध्यम से पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार में।

➣ बाद में 1823 ई. में जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (GCPI) की स्थापना के पश्चात यही प्रश्न ब्रिटिश शिक्षा नीति का प्रमुख विवाद बन गया, जिसे प्राच्यवाद बनाम आंग्लवाद विवाद कहा जाता है।

प्राच्यवादियों का मत था कि भारतीयों को उनकी पारम्परिक भाषाओं एवं ज्ञान-परम्परा के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए। उनका विश्वास था कि संस्कृत, अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में निहित ज्ञान भारतीय समाज के लिए अधिक उपयोगी है तथा उसका संरक्षण किया जाना चाहिए।

➣ दूसरी ओर आंग्लवादियों का मत था कि भारतीयों को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से यूरोप के आधुनिक विज्ञान, साहित्य, दर्शन एवं तकनीकी ज्ञान से परिचित कराया जाना चाहिए। उनका मानना था कि इससे भारत में आधुनिक विचारों का विकास होगा तथा ब्रिटिश प्रशासन के लिए योग्य कर्मचारी भी तैयार होंगे।

➣ यह विवाद केवल शिक्षा के माध्यम का नहीं था, बल्कि इस बात का भी था कि भारत में शिक्षा का उद्देश्य भारतीय परम्पराओं का संरक्षण हो या पाश्चात्य ज्ञान का प्रसार। लगभग एक दशक तक दोनों पक्षों के बीच यह वैचारिक मतभेद बना रहा।

➣ अंततः 1835 ई. में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले के शिक्षा सम्बन्धी विवरण तथा लॉर्ड विलियम बेंटिंक के शिक्षा संबंधी संकल्प के बाद आंग्लवादी विचारधारा को सरकारी समर्थन प्राप्त हुआ और भारत में अंग्रेजी माध्यम से पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा दिया गया।

मैकॉले का शिक्षा सम्बन्धी विवरण (1835 ई.)

2 फरवरी, 1835 ई. को गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक की कार्यकारिणी परिषद के विधि सदस्य थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपना प्रसिद्ध शिक्षा सम्बन्धी विवरण प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य भारत की भावी शिक्षा नीति की दिशा निर्धारित करना था।

➣ मैकॉले का मत था कि सरकार द्वारा शिक्षा पर उपलब्ध धनराशि का उपयोग अंग्रेजी भाषा के माध्यम से यूरोपीय विज्ञान, साहित्य एवं आधुनिक ज्ञान के प्रसार में किया जाना चाहिए। उन्होंने संस्कृत, अरबी एवं फ़ारसी जैसी प्राच्य भाषाओं की अपेक्षा अंग्रेजी शिक्षा को अधिक उपयोगी बताया।

➣ मैकॉले ने अपने विवरण में यह तर्क दिया कि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीयों को आधुनिक ज्ञान से परिचित कराया जा सकता है तथा ऐसे शिक्षित भारतीयों का एक वर्ग तैयार किया जा सकता है, जो ब्रिटिश शासन एवं भारतीय जनता के बीच मध्यस्थ का कार्य करे।

➣ अपने विवरण में मैकॉले ने प्रसिद्ध रूप से कहा कि सरकार का उद्देश्य ऐसा वर्ग तैयार करना होना चाहिए, जो रक्त और रंग से भारतीय हो, किन्तु रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज हो। (Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect.)

➣ मैकॉले ने यह भी मत व्यक्त किया कि सरकार को सीमित संसाधनों का उपयोग मुख्यतः उच्च शिक्षा पर करना चाहिए। उनका विश्वास था कि शिक्षित उच्च वर्ग के माध्यम से आधुनिक ज्ञान धीरे-धीरे समाज के अन्य वर्गों तक पहुँच जाएगा। यही विचार आगे चलकर अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत का आधार बना।

➣ मैकॉले के शिक्षा सम्बन्धी विवरण ने प्राच्यवाद बनाम आंग्लवाद विवाद को निर्णायक रूप से समाप्त कर दिया तथा भारत की ब्रिटिश शिक्षा नीति को अंग्रेजी माध्यम एवं पाश्चात्य शिक्षा की ओर मोड़ दिया।

लॉर्ड विलियम बेंटिंक का शिक्षा संबंधी संकल्प (1835)

थॉमस बैबिंगटन मैकॉले के शिक्षा सम्बन्धी विवरण (2 फरवरी, 1835 ई.) के आधार पर तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने 7 मार्च, 1835 ई. को शिक्षा संबंधी संकल्प जारी किया। इसी संकल्प के साथ भारत में अंग्रेजी शिक्षा नीति को आधिकारिक रूप से लागू किया गया।

➣ इस संकल्प के अनुसार सरकार द्वारा शिक्षा के लिए उपलब्ध धनराशि का उपयोग मुख्यतः अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पाश्चात्य साहित्य, विज्ञान एवं आधुनिक ज्ञान के प्रसार पर किया जाएगा। इसके साथ ही प्राच्य भाषाओं एवं पारम्परिक शिक्षा को मिलने वाला सरकारी संरक्षण धीरे-धीरे कम कर दिया गया।

➣ इस संकल्प के परिणामस्वरूप भारत की शिक्षा नीति में निर्णायक परिवर्तन आया। सरकारी संरक्षण अब मुख्यतः अंग्रेजी माध्यम एवं पाश्चात्य शिक्षा को मिलने लगा, जबकि प्राच्य शिक्षा का महत्व अपेक्षाकृत कम होता गया।

➣ इस नीति का उद्देश्य केवल आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना ही नहीं था, बल्कि ऐसे शिक्षित भारतीयों का वर्ग तैयार करना भी था, जो ब्रिटिश प्रशासन में कार्य कर सके तथा अंग्रेजी शासन और भारतीय जनता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाए।

➣ लॉर्ड विलियम बेंटिंक के इस निर्णय ने प्राच्यवाद बनाम आंग्लवाद विवाद का अंत कर दिया और भारत में अंग्रेजी माध्यम एवं पाश्चात्य शिक्षा को ब्रिटिश शिक्षा नीति का आधार बना दिया। आगे चलकर इसी नीति ने वुड के डिस्पैच (1854) सहित अन्य शिक्षा सुधारों की दिशा निर्धारित की।

अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत

अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत के अनुसार पहले समाज के उच्च एवं शिक्षित वर्ग को अंग्रेजी माध्यम से आधुनिक शिक्षा दी जाए और फिर वही वर्ग धीरे-धीरे इस ज्ञान को समाज के अन्य वर्गों तक पहुँचाए। अर्थात् ज्ञान ऊपर से नीचे की ओर रिसता हुआ पूरे समाज में फैल जाएगा।

➣ इस सिद्धांत को सामान्यतः मैकॉले की 1835 ई. की शिक्षा नीति से जोड़ा जाता है। हालांकि इसे व्यवहार में लागू करने और आगे बढ़ाने में लॉर्ड ऑकलैंड, चार्ल्स ट्रेवेलियन तथा अन्य आंग्लवादी अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

➣ उस समय अंग्रेजों का मानना था कि सरकार के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि पूरे भारत के लोगों को एक साथ आधुनिक शिक्षा दी जा सके। इसलिए पहले समाज के एक छोटे से वर्ग को शिक्षित करना अधिक व्यावहारिक होगा। यही वर्ग आगे चलकर बाकी लोगों तक आधुनिक ज्ञान पहुँचाएगा।

सिद्धांत का उद्देश्य एवं क्रियान्वयन

➣ इस नीति का मुख्य उद्देश्य ऐसा अंग्रेजी-शिक्षित भारतीय वर्ग तैयार करना था, जो ब्रिटिश शासन और भारतीय जनता के बीच दुभाषिए का कार्य कर सके।

➣ यही कारण था कि थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपने प्रसिद्ध मैकॉले के शिक्षा सम्बन्धी विवरण (1835) में ऐसे वर्ग के निर्माण की बात कही, जो “रक्त और रंग से भारतीय, लेकिन रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज” हो।

➣ इसी सोच के आधार पर सरकार ने अपने अधिकांश शिक्षा बजट को कॉलेजों, उच्च शिक्षा और अंग्रेजी माध्यम पर खर्च किया। दूसरी ओर प्राथमिक शिक्षा, ग्रामीण शिक्षा तथा देशी भाषाओं की शिक्षा को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया।

➣ इसका परिणाम यह हुआ कि आधुनिक शिक्षा का लाभ मुख्यतः बंगाल, बम्बई और मद्रास जैसे बड़े शहरों के उच्च एवं मध्यम वर्ग तक ही सीमित रहा। ग्रामीण क्षेत्रों और सामान्य जनता तक यह शिक्षा बहुत धीमी गति से पहुँच सकी।

आलोचना एवं परिणाम

➣ यह सिद्धांत व्यवहार में सफल नहीं हो सका। अंग्रेजों ने सोचा था कि उच्च वर्ग में पहुँचा ज्ञान धीरे-धीरे समाज के सभी वर्गों तक पहुँच जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शिक्षित और अशिक्षित वर्ग के बीच की दूरी कम होने के बजाय और बढ़ गई।

➣ इस नीति की सबसे बड़ी आलोचना यह हुई कि इसने प्राथमिक शिक्षा और जनसाधारण की शिक्षा की उपेक्षा की। शिक्षा का लाभ कुछ चुनिंदा लोगों तक ही सीमित रह गया, जबकि अधिकांश भारतीय आधुनिक शिक्षा से वंचित रहे।

➣ हालांकि इस नीति का एक अप्रत्याशित परिणाम भी सामने आया। अंग्रेजों का उद्देश्य अपने प्रशासन के लिए शिक्षित कर्मचारी तैयार करना था, लेकिन यही अंग्रेजी-शिक्षित मध्यम वर्ग आगे चलकर सामाजिक सुधार आंदोलनों और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने लगा। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार की यही नीति अंततः उसके शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का आधार बन गई।

ऐतिहासिक महत्व

➣ अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत ने प्रारम्भिक ब्रिटिश शिक्षा नीति को कई वर्षों तक प्रभावित किया। इसके कारण भारत में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा का विस्तार तो हुआ, लेकिन उसका लाभ मुख्यतः सीमित वर्ग तक ही पहुँच सका।

➣ बाद में यह स्पष्ट हो गया कि केवल उच्च वर्ग को शिक्षित करने से पूरे समाज में शिक्षा का प्रसार नहीं हो सकता। इसलिए वुड का डिस्पैच (1854) ने इस नीति से अलग हटकर प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक क्रमबद्ध शिक्षा व्यवस्था, देशी भाषाओं में शिक्षा तथा जनसाधारण तक शिक्षा पहुँचाने पर विशेष बल दिया।

तथ्य विवरण
अंग्रेजी नाम Downward Filtration Theory
संबंधित शिक्षा नीति मैकॉले की शिक्षा नीति (1835 ई.)
मुख्य विचार पहले उच्च वर्ग को अंग्रेजी शिक्षा देकर उसके माध्यम से ज्ञान का प्रसार निम्न वर्ग तक करना।
सरकारी प्राथमिकता उच्च शिक्षा एवं अंग्रेजी माध्यम
उपेक्षित क्षेत्र प्राथमिक शिक्षा, ग्रामीण शिक्षा एवं देशी भाषाएँ
मुख्य परिणाम अंग्रेजी-शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय तथा राष्ट्रवादी चेतना का विकास
बाद में परिवर्तन वुड का डिस्पैच (1854) ने व्यापक एवं क्रमबद्ध शिक्षा व्यवस्था पर बल दिया।

ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास (1854–1944 ई.)

1835 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिंक द्वारा अंग्रेजी शिक्षा नीति अपनाए जाने के बाद भारत में आधुनिक शिक्षा का विस्तार प्रारम्भ हो गया। किन्तु उस समय तक शिक्षा के लिए कोई सुव्यवस्थित प्रशासनिक ढाँचा या व्यापक नीति नहीं थी।

➣ इस स्थिति को सुधारने के लिए ब्रिटिश सरकार ने समय-समय पर अनेक शिक्षा आयोगों, समितियों एवं सरकारी प्रतिवेदनों की नियुक्ति की। इन प्रयासों का उद्देश्य प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा का विकास करना, विश्वविद्यालयों की स्थापना करना तथा शिक्षा प्रशासन को अधिक संगठित बनाना था।

➣ इसके अंतर्गत वुड का डिस्पैच (1854) से लेकर सार्जेंट योजना (1944) तक लागू की गई विभिन्न शिक्षा नीतियों ने भारत की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी। इन्हीं सुधारों के आधार पर स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली का भी विकास हुआ।

वुड का डिस्पैच (1854 ई.)

1854 ई. में चार्ल्स वुड, जो उस समय बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष थे, ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के संबंध में एक विस्तृत प्रतिवेदन तैयार किया। इसे वुड का डिस्पैच (Wood’s Despatch) कहा जाता है।

भारतीय शिक्षा के इतिहास में इसे अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है तथा इसे भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा भी कहा जाता है।

➣ वुड के डिस्पैच ने 1835 ई. की मैकॉले नीति तथा अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत की सीमाओं को स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि सरकार का उत्तरदायित्व केवल उच्च वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के सभी स्तरों तक शिक्षा पहुँचाना होना चाहिए।

➣ इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि शिक्षा का माध्यम उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी तथा प्राथमिक व निम्न स्तर पर देशी भाषाएँ होनी चाहिए, जिससे प्राच्यवाद-आंग्लवाद विवाद का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत हुआ।

➣ वुड के डिस्पैच का मुख्य उद्देश्य भारत में एक संगठित एवं क्रमबद्ध शिक्षा प्रणाली की स्थापना करना था। इसमें प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा के विकास के लिए विस्तृत सुझाव दिए गए।

वुड के डिस्पैच (1854) की प्रमुख सिफारिशें

शिक्षा विभाग की स्थापना : प्रत्येक प्रांत में लोक शिक्षा विभाग (DPI) स्थापित करने की सिफारिश की गई, ताकि शिक्षा का प्रशासन व्यवस्थित रूप से संचालित किया जा सके।

विश्वविद्यालयों की स्थापना : लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित करने का सुझाव दिया गया। इसके आधार पर 1857 ई. में इन तीनों विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई।

क्रमबद्ध शिक्षा प्रणाली : शिक्षा को प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के स्तरों में व्यवस्थित करने तथा सभी स्तरों के बीच समन्वय स्थापित करने की अनुशंसा की गई।

अनुदान सहायता (Grant-in-Aid) प्रणाली : निजी एवं मिशनरी शिक्षण संस्थानों को निर्धारित शर्तों के आधार पर सरकारी आर्थिक सहायता प्रदान करने की व्यवस्था का सुझाव दिया गया।

शिक्षा का माध्यम : प्राथमिक स्तर पर क्षेत्रीय (देशी) भाषाओं तथा उच्च शिक्षा के स्तर पर अंग्रेजी भाषा को माध्यम बनाने की सिफारिश की गई।

व्यावसायिक एवं शिक्षक प्रशिक्षण : शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना तथा व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा को भी प्रोत्साहित करने की अनुशंसा की गई।

महिला शिक्षा : वुड के डिस्पैच ने पहली बार महिला शिक्षा को भी सरकारी प्रोत्साहन देने की सिफारिश की, जिससे इस क्षेत्र में आगे चलकर उल्लेखनीय प्रगति हुई।

छात्रवृत्ति व्यवस्था : योग्य विद्यार्थियों को आगे की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति (Scholarship) प्रदान करने तथा प्रतिभाशाली छात्रों को उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

➣ वुड के डिस्पैच ने भारत में शिक्षा को केवल उच्च वर्ग तक सीमित रखने के बजाय प्राथमिक से उच्च स्तर तक एक समन्वित शिक्षा व्यवस्था विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया। इसी कारण इसे भारत की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है।

कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास विश्वविद्यालय (1857 ई.)

वुड के डिस्पैच (1854) की सिफारिशों के आधार पर 1857 ई. में भारत के प्रथम आधुनिक विश्वविद्यालयों—कलकत्ता विश्वविद्यालय, बम्बई विश्वविद्यालय एवं मद्रास विश्वविद्यालय—की स्थापना की गई। ये विश्वविद्यालय लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर स्थापित किए गए थे।

➣ इन विश्वविद्यालयों का मुख्य कार्य महाविद्यालयों को संबद्धकरना, परीक्षाएँ आयोजित करना तथा डिग्रियाँ प्रदान करना था। प्रारम्भिक वर्षों में ये मुख्यतः परीक्षा लेने वाले विश्वविद्यालय थे तथा प्रत्यक्ष रूप से शिक्षण कार्य बहुत कम करते थे।

➣ इन विश्वविद्यालयों की स्थापना से भारत में उच्च शिक्षा को एक संगठित स्वरूप मिला। इनके माध्यम से अंग्रेजी भाषा, आधुनिक विज्ञान, कानून, चिकित्सा तथा अन्य पाश्चात्य विषयों के अध्ययन को व्यापक प्रोत्साहन मिला।

➣ इन संस्थानों से शिक्षित भारतीयों का एक नया वर्ग तैयार हुआ, जिसने आगे चलकर सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों, पत्रकारिता तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ बाद के वर्षों में भारत के अन्य भागों में भी विश्वविद्यालय स्थापित किए गए, किन्तु कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास विश्वविद्यालय भारतीय आधुनिक उच्च शिक्षा के विकास की आधारशिला सिद्ध हुए।

हंटर आयोग (1882–83 ई.)

1882 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन ने भारत की शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा के लिए सर विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में एक शिक्षा आयोग की नियुक्ति की। इसे हंटर आयोग अथवा भारतीय शिक्षा आयोग कहा जाता है।

➣ इस आयोग का मुख्य उद्देश्य वुड के डिस्पैच (1854) के बाद शिक्षा व्यवस्था की प्रगति का मूल्यांकन करना तथा विशेष रूप से प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए सुझाव देना था।

हंटर आयोग की प्रमुख सिफारिशें

प्राथमिक शिक्षा पर विशेष बल : आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार पर जोर दिया तथा सुझाव दिया कि इसे जनसाधारण की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाए।

स्थानीय निकायों की भूमिका : प्राथमिक शिक्षा का प्रबंधन एवं विकास जिला बोर्डों तथा स्थानीय निकायों को सौंपने की सिफारिश की गई, जिससे शिक्षा का विकेंद्रीकरण हो सके।

माध्यमिक शिक्षा का विभाजन : माध्यमिक शिक्षा को दो भागों में विभाजित करने का सुझाव दिया गया—

  • साहित्यिक (Literary): उच्च शिक्षा के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए।
  • व्यावसायिक (Vocational): रोजगार एवं व्यावहारिक जीवन की आवश्यकताओं के लिए।

निजी शिक्षण संस्थानों को प्रोत्साहन : आयोग ने Grant-in-Aid प्रणाली का विस्तार करने तथा निजी एवं स्वैच्छिक शिक्षण संस्थानों को सरकारी सहायता देने की अनुशंसा की।

महिला शिक्षा : आयोग ने महिला शिक्षा के विस्तार को प्रोत्साहित करने तथा इस दिशा में सरकारी सहयोग बढ़ाने की सिफारिश की।

➣ हंटर आयोग ने विश्वविद्यालय शिक्षा की अपेक्षा प्राथमिक शिक्षा के विकास को अधिक महत्व दिया। इसके सुझावों के आधार पर भारत में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार तथा शिक्षा प्रशासन के विकेंद्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।

भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (1902 ई.)

1902 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने भारत में विश्वविद्यालयों की स्थिति की समीक्षा करने तथा उच्च शिक्षा में सुधार के उद्देश्य से सर थॉमस रैले की अध्यक्षता में भारतीय विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की।

➣ उस समय सरकार का मानना था कि विश्वविद्यालयों में शिक्षा का स्तर गिर रहा है तथा उनके प्रशासन एवं कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। इसलिए आयोग को विश्वविद्यालयों की संगठन व्यवस्था, प्रशासन एवं शैक्षणिक गुणवत्ता का अध्ययन करने का दायित्व सौंपा गया।

भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (1902) की प्रमुख सिफारिशें

विश्वविद्यालयों का पुनर्गठन : विश्वविद्यालयों के प्रशासन को अधिक प्रभावी एवं सुव्यवस्थित बनाने की अनुशंसा की गई।

सरकारी नियंत्रण में वृद्धि : विश्वविद्यालयों के प्रशासन एवं कार्यों पर सरकार की निगरानी और नियंत्रण बढ़ाने का सुझाव दिया गया।

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार : महाविद्यालयों की मान्यता (Affiliation), परीक्षा प्रणाली तथा शिक्षण स्तर को अधिक प्रभावी बनाने की सिफारिश की गई।

अनुसंधान एवं उच्च शिक्षा : विश्वविद्यालयों में केवल परीक्षाओं तक सीमित रहने के बजाय शिक्षण एवं अनुसंधान (Teaching and Research) को भी प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया।

▪ इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1904 ई. में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (Indian Universities Act) पारित किया गया, जिसने विश्वविद्यालयों के प्रशासन एवं कार्यप्रणाली में व्यापक परिवर्तन किए।

भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904 ई.)

भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (1902) की सिफारिशों के आधार पर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने 1904 ई. में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम लागू किया। इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में विश्वविद्यालयों के प्रशासन, शिक्षण स्तर एवं कार्यप्रणाली में सुधार लाना था।

➣ इस अधिनियम के माध्यम से विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण को पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ बनाया गया। सरकार को विश्वविद्यालयों के प्रशासन, नियमों तथा नीतियों में हस्तक्षेप करने के व्यापक अधिकार प्राप्त हुए।

भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904) की प्रमुख विशेषताएँ

सीनेट का पुनर्गठन : विश्वविद्यालयों की सीनेट के सदस्यों की संख्या कम की गई तथा सरकार द्वारा मनोनीत (Nominated) सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।

सिंडिकेट को सुदृढ़ करना : विश्वविद्यालयों के दैनिक प्रशासन एवं कार्यों के लिए सिंडिकेट को अधिक प्रभावी बनाया गया।

महाविद्यालयों पर नियंत्रण : विश्वविद्यालयों को अपने संबद्ध महाविद्यालयों (Affiliated Colleges) का नियमित निरीक्षण करने तथा निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित करने का अधिकार दिया गया।

शिक्षण एवं अनुसंधान को प्रोत्साहन : विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं तक सीमित न रखकर शिक्षण एवं अनुसंधान को भी बढ़ावा देने पर बल दिया गया।

सरकारी अनुदान : विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार द्वारा आर्थिक सहायता (Grant) प्रदान करने की व्यवस्था की गई।

➣ यद्यपि इस अधिनियम से विश्वविद्यालयों के संगठन एवं शैक्षणिक स्तर में सुधार हुआ, किन्तु भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसकी आलोचना की। उनका मत था कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता (Autonomy) कम हुई तथा उन पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण अत्यधिक बढ़ गया।

सैडलर आयोग (1917–19 ई.)

1917 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने डॉ. माइकल अर्नेस्ट सैडलर की अध्यक्षता में एक आयोग की नियुक्ति की। इसे सैडलर आयोग अथवा कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग कहा जाता है।

➣ प्रारम्भ में इस आयोग का उद्देश्य कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं का अध्ययन करना था, किन्तु आयोग ने संपूर्ण भारतीय माध्यमिक एवं विश्वविद्यालय शिक्षा का व्यापक अध्ययन किया और अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

सैडलर आयोग (1917–19) की प्रमुख सिफारिशें

12 वर्ष की स्कूली शिक्षा : आयोग ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय में प्रवेश से पूर्व विद्यार्थियों को 12 वर्ष की स्कूली शिक्षा पूर्ण करनी चाहिए।

इंटरमीडिएट शिक्षा : विद्यालय एवं विश्वविद्यालय के बीच 2 वर्षीय इंटरमीडिएट (Intermediate) स्तर स्थापित करने की सिफारिश की गई तथा इसे विश्वविद्यालयों के स्थान पर पृथक इंटरमीडिएट कॉलेजों के अधीन रखने का सुझाव दिया गया।

विश्वविद्यालयों का स्वरूप : आयोग ने विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं तक सीमित न रखकर शिक्षण एवं अनुसंधान (Teaching and Research) के केन्द्र के रूप में विकसित करने पर बल दिया।

महिला शिक्षा : आयोग ने महिला शिक्षा के विस्तार तथा उनके लिए पृथक शैक्षणिक सुविधाएँ विकसित करने की अनुशंसा की।

ढाका विश्वविद्यालय : आयोग ने पूर्वी भारत में उच्च शिक्षा के विकास के लिए ढाका विश्वविद्यालय की स्थापना का सुझाव दिया। इसके आधार पर 1921 ई. में ढाका विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

माध्यमिक शिक्षा का विकास : आयोग ने माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, शिक्षक प्रशिक्षण को सुदृढ़ बनाने तथा पाठ्यक्रम को अधिक व्यावहारिक बनाने पर भी बल दिया।

➣ सैडलर आयोग ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को विद्यालय, इंटरमीडिएट एवं विश्वविद्यालय स्तरों में अधिक व्यवस्थित रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसकी अनेक सिफारिशों को आगे चलकर विभिन्न प्रांतों में लागू किया गया।

हार्टोग समिति (1929 ई.)

1929 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने सर फिलिप हार्टोग की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इसका उद्देश्य भारत की शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर प्राथमिक शिक्षा की स्थिति का अध्ययन करना तथा उसमें सुधार के उपाय सुझाना था।

➣ समिति ने पाया कि भारत में प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों के बीच में पढ़ाई छोड़ देने तथा एक ही कक्षा में बार-बार रुक जाने की समस्या अत्यधिक थी। इसलिए केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाने के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष बल दिया गया।

हार्टोग समिति (1929) की प्रमुख सिफारिशें

प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता : प्राथमिक शिक्षा का अंधाधुंध विस्तार करने के बजाय उसकी गुणवत्ता एवं प्रभावशीलता बढ़ाने की अनुशंसा की गई।

(विद्यालय छोड़ना एवं एक ही कक्षा में रुकना पर नियंत्रण : विद्यार्थियों के विद्यालय छोड़ने तथा एक ही कक्षा में बार-बार असफल होने की समस्या को दूर करने के लिए प्रभावी उपाय अपनाने पर बल दिया गया।

शिक्षक प्रशिक्षण : योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति तथा शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों को सुदृढ़ करने की सिफारिश की गई।

माध्यमिक शिक्षा : माध्यमिक शिक्षा को केवल विश्वविद्यालय प्रवेश का साधन न बनाकर उसे अधिक व्यावहारिक एवं रोजगारोन्मुख बनाने पर बल दिया गया।

विश्वविद्यालय शिक्षा : विश्वविद्यालयों में अनावश्यक भीड़ को कम करने तथा केवल योग्य विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा की ओर प्रोत्साहित करने की अनुशंसा की गई।

➣ हार्टोग समिति ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल विद्यालयों एवं विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना होना चाहिए।

वर्धा शिक्षा योजना / बुनियादी शिक्षा (1937 ई.)

1937 ई. में महात्मा गाँधी ने वर्धा (महाराष्ट्र) में आयोजित अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन में बुनियादी शिक्षा अथवा नई तालीम की योजना प्रस्तुत की। इसी कारण इसे वर्धा शिक्षा योजना भी कहा जाता है।

➣ इस योजना का मुख्य उद्देश्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना था, जो स्वावलंबी, श्रमप्रधान, व्यावहारिक एवं भारतीय जीवन-मूल्यों पर आधारित हो। गाँधीजी का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होना चाहिए।

वर्धा शिक्षा योजना की प्रमुख विशेषताएँ

निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा : 7 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की सिफारिश की गई।

मातृभाषा में शिक्षा : शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखने पर बल दिया गया, ताकि विद्यार्थी अपनी भाषा एवं संस्कृति से जुड़े रहें।

शिल्प आधारित शिक्षा : किसी उत्पादक हस्तशिल्प या कुटीर उद्योग को शिक्षा का केन्द्र बनाया जाए, जिससे विद्यार्थी पढ़ाई के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल भी सीख सकें।

श्रम का सम्मान : मानसिक एवं शारीरिक श्रम को समान महत्व देते हुए विद्यार्थियों में श्रम के प्रति सम्मान तथा आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करने पर बल दिया गया।

सर्वांगीण विकास : शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों का बौद्धिक, शारीरिक, नैतिक एवं सामाजिक विकास करना माना गया।

➣ वर्धा शिक्षा योजना के क्रियान्वयन के लिए डॉ. जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई, जिसने योजना के सिद्धांतों एवं पाठ्यक्रम का विस्तृत स्वरूप प्रस्तुत किया।

सार्जेंट योजना (1944 ई.)

1944 ई. में केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (CABE) ने सर जॉन सार्जेंट के नेतृत्व में भारत की भावी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक व्यापक योजना प्रस्तुत की। इसे सार्जेंट योजना अथवा सार्जेंट रिपोर्ट कहा जाता है।

➣ इस योजना का उद्देश्य भारत में एक दीर्घकालिक एवं समग्र शिक्षा प्रणाली विकसित करना था, ताकि देश में सभी स्तरों पर शिक्षा का विस्तार किया जा सके। यह ब्रिटिश शासनकाल की अंतिम प्रमुख शिक्षा योजना मानी जाती है।

सार्जेंट योजना (1944) की प्रमुख सिफारिशें

सार्वभौमिक शिक्षा : 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क, सार्वभौमिक एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रस्ताव रखा गया।

पूर्व-प्राथमिक शिक्षा : 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए नर्सरी एवं पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के विकास पर बल दिया गया।

माध्यमिक शिक्षा : माध्यमिक शिक्षा को 6 वर्षीय पाठ्यक्रम के रूप में विकसित करने तथा इसे शैक्षणिक एवं तकनीकी शाखाओं में विभाजित करने की सिफारिश की गई।

विश्वविद्यालय एवं तकनीकी शिक्षा : उच्च शिक्षा के स्तर में सुधार, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा के विस्तार तथा शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया गया।

प्रौढ़ शिक्षा : निरक्षर वयस्कों के लिए प्रौढ़ शिक्षा तथा साक्षरता कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की अनुशंसा की गई।

➣ यद्यपि यह योजना अत्यंत महत्वाकांक्षी थी, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध, वित्तीय संसाधनों की कमी तथा ब्रिटिश शासन के अंतिम चरण के कारण इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका। फिर भी इसकी अनेक सिफारिशों ने स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति को प्रभावित किया।

ब्रिटिश शिक्षा नीति का प्रभाव

➣ ब्रिटिश शासनकाल में लागू की गई विभिन्न शिक्षा नीतियों एवं आयोगों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, समाज, संस्कृति तथा राजनीति पर व्यापक प्रभाव डाला। आधुनिक शिक्षा के प्रसार से जहाँ एक ओर वैज्ञानिक सोच, सामाजिक सुधार एवं राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ, वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी शिक्षा नीति की कुछ सीमाएँ एवं नकारात्मक परिणाम भी सामने आए।

सकारात्मक प्रभाव

➣ ब्रिटिश शासनकाल में प्रारम्भ की गई आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने भारतीय समाज में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। यद्यपि अंग्रेजों का उद्देश्य मुख्यतः अपने प्रशासन के लिए शिक्षित कर्मचारियों का निर्माण करना था, फिर भी इस शिक्षा प्रणाली के कई दूरगामी सकारात्मक परिणाम सामने आए।

आधुनिक शिक्षा का प्रसार : अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भारत में आधुनिक विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, कानून एवं पाश्चात्य विचारधारा का प्रसार हुआ। इससे शिक्षा का स्वरूप अधिक व्यवस्थित एवं आधुनिक बना।

वैज्ञानिक एवं तर्कशील दृष्टिकोण का विकास : आधुनिक शिक्षा ने भारतीय समाज में वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता एवं विवेकपूर्ण चिंतन को प्रोत्साहित किया। लोगों ने परम्पराओं एवं सामाजिक कुरीतियों का तार्किक मूल्यांकन करना प्रारम्भ किया।

सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों को प्रोत्साहन : आधुनिक शिक्षा से प्रेरित होकर राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारकों ने सती प्रथा, बाल विवाह, जाति-भेद एवं अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन चलाए तथा महिला शिक्षा एवं विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।

शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय : अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से भारत में एक शिक्षित मध्यम वर्ग का विकास हुआ। यही वर्ग आगे चलकर प्रशासन, न्यायपालिका, पत्रकारिता, शिक्षा एवं सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा।

राष्ट्रीय चेतना का विकास : आधुनिक शिक्षा के माध्यम से भारतीयों को स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र एवं राष्ट्रवाद जैसे आधुनिक विचारों का ज्ञान हुआ। परिणामस्वरूप भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना विकसित हुई और आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक आधार प्राप्त हुआ।

पत्रकारिता एवं आधुनिक साहित्य का विकास : अंग्रेजी शिक्षा और मुद्रण तकनीक के प्रसार से समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं तथा आधुनिक भारतीय साहित्य का विकास हुआ। इन माध्यमों ने जनजागरण तथा राष्ट्रीय आंदोलन को गति प्रदान की।

आधुनिक शिक्षा संस्थानों का विकास : विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की स्थापना से भारत में संगठित शिक्षा प्रणाली का विकास हुआ, जिसका लाभ स्वतंत्रता के बाद भी देश को मिलता रहा।

नकारात्मक प्रभाव

➣ यद्यपि ब्रिटिश शिक्षा नीति ने भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रसार किया, किन्तु इसका उद्देश्य मुख्यतः ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक हितों की पूर्ति करना था। परिणामस्वरूप इस नीति के अनेक नकारात्मक प्रभाव भी भारतीय समाज एवं शिक्षा व्यवस्था पर पड़े।

प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा : ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भिक वर्षों में उच्च एवं अंग्रेजी शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया, जबकि प्राथमिक एवं जनसाधारण की शिक्षा की अपेक्षा उपेक्षा की। इससे शिक्षा का लाभ समाज के सीमित वर्ग तक ही पहुँच सका।

भारतीय भाषाओं एवं पारम्परिक शिक्षा का ह्रास : अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा मिलने से संस्कृत, अरबी, फ़ारसी तथा देशी शिक्षा संस्थानों का महत्व धीरे-धीरे कम होता गया। इससे भारत की पारम्परिक ज्ञान-परम्परा एवं शिक्षा प्रणाली को आघात पहुँचा।

क्लर्क एवं प्रशासनिक कर्मचारियों का निर्माण : शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ऐसे भारतीयों को तैयार करना था, जो ब्रिटिश प्रशासन में लिपिक (Clerk) एवं अधीनस्थ कर्मचारी के रूप में कार्य कर सकें। इसलिए शिक्षा का स्वरूप रोजगार के सीमित अवसरों तक केंद्रित रहा।

शिक्षा में असमानता : आधुनिक शिक्षा का लाभ मुख्यतः शहरी, संपन्न एवं उच्च वर्ग तक सीमित रहा। ग्रामीण क्षेत्रों, निम्न वर्गों तथा अधिकांश महिलाओं तक शिक्षा का प्रसार अपेक्षित स्तर पर नहीं हो सका।

भारतीय संस्कृति की उपेक्षा : ब्रिटिश शिक्षा नीति में भारतीय इतिहास, दर्शन, साहित्य एवं संस्कृति की अपेक्षा यूरोपीय ज्ञान एवं साहित्य को अधिक महत्व दिया गया। इससे अनेक शिक्षित भारतीयों में अपनी पारम्परिक सांस्कृतिक विरासत के प्रति उदासीनता बढ़ी।

तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा का सीमित विकास : ब्रिटिश शासन ने आधुनिक उद्योगों एवं तकनीकी संस्थानों के विकास पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप भारत में तकनीकी, वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक शिक्षा का विकास अपेक्षाकृत धीमी गति से हुआ।

स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास

➣ भारत की स्वतंत्रता के साथ ही शिक्षा व्यवस्था के विकास का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। औपनिवेशिक शासन की शिक्षा नीति के स्थान पर ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया गया, जो लोकतांत्रिक, समावेशी, वैज्ञानिक तथा राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो।

➣ इसी उद्देश्य से स्वतंत्र भारत में समय-समय पर विभिन्न शिक्षा आयोगों का गठन किया गया, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) जैसी संस्थाओं की स्थापना की गई, संविधान संशोधन किए गए तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीतियाँ लागू की गईं।

आयोग / संस्था / नीति मुख्य उद्देश्य एवं योगदान
राधाकृष्णन आयोग (1948–49) विश्वविद्यालय शिक्षा की समीक्षा करना, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना तथा शिक्षण, अनुसंधान एवं विश्वविद्यालय प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाना।
मुदालियर आयोग (1952–53) माध्यमिक शिक्षा का पुनर्गठन करना, विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, व्यावसायिक शिक्षा तथा पाठ्यक्रम में सुधार पर बल देना।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) (1953) देश के विश्वविद्यालयों के समन्वय, मानकों के निर्धारण, गुणवत्ता सुधार एवं वित्तीय सहायता की व्यवस्था करना।
NCERT (1961) विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों, शैक्षिक अनुसंधान तथा शिक्षक प्रशिक्षण का विकास करना।
कोठारी आयोग (1964–66) भारत के लिए राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत करना तथा समान अवसर, विज्ञान शिक्षा, कार्यानुभव एवं 10+2+3 शिक्षा संरचना की अनुशंसा करना।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) स्वतंत्र भारत की पहली शिक्षा नीति; समान शिक्षा अवसर, त्रिभाषा सूत्र, विज्ञान शिक्षा तथा राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना।
42वाँ संविधान संशोधन (1976) शिक्षा को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल किया गया, जिससे केंद्र और राज्य दोनों शिक्षा के क्षेत्र में कानून बना सकें।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) सर्व शिक्षा, महिला शिक्षा, अनुसूचित जाति-जनजाति एवं पिछड़े वर्गों की शिक्षा तथा व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा के विस्तार पर विशेष बल दिया गया।
संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1992) 1986 की शिक्षा नीति में संशोधन करते हुए जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP), शिक्षक शिक्षा एवं गुणवत्ता सुधार पर अधिक ध्यान दिया गया।
86वाँ संविधान संशोधन (2002) अनुच्छेद 21A जोड़कर 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) (2009) 6–14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करना तथा विद्यालयों के न्यूनतम मानकों एवं बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) 5+3+3+4 शिक्षा संरचना, बहुविषयक शिक्षा, मातृभाषा में प्रारम्भिक शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षा तथा समग्र एवं लचीली शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देना।

ध्यान दें : उपर्युक्त आयोगों, संस्थाओं एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों का यहाँ केवल संक्षिप्त परिचय दिया गया है। इनका विस्तृत अध्ययन स्वतंत्र भारत में शिक्षा विषय के अंतर्गत किया जाता है।

प्रमुख शिक्षा आयोग एवं नीतियाँ

वर्ष आयोग / नीति मुख्य उद्देश्य / विशेषता
1813 चार्टर एक्ट शिक्षा के लिए 1 लाख रुपये का प्रावधान तथा ईसाई मिशनरियों को भारत में कार्य करने की अनुमति।
1835 मैकॉले का शिक्षा सम्बन्धी विवरण अंग्रेजी माध्यम एवं पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन; आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा।
1835 लॉर्ड विलियम बेंटिंक का शिक्षा संबंधी संकल्प मैकॉले के सुझावों को स्वीकार कर अंग्रेजी शिक्षा नीति को आधिकारिक रूप से लागू किया।
1854 वुड का डिस्पैच “भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा”; DPI, विश्वविद्यालय, Grant-in-Aid, शिक्षक प्रशिक्षण एवं महिला शिक्षा पर बल।
1857 कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास विश्वविद्यालय भारत के प्रथम आधुनिक विश्वविद्यालय; लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर स्थापित।
1882–83 हंटर आयोग प्राथमिक शिक्षा, स्थानीय निकायों की भूमिका तथा माध्यमिक शिक्षा के विकास पर बल।
1902 भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (रैले आयोग) विश्वविद्यालयों की स्थिति की समीक्षा एवं सुधार संबंधी सुझाव।
1904 भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाया गया तथा प्रशासनिक सुधार किए गए।
1917–19 सैडलर आयोग 12 वर्ष की स्कूली शिक्षा, इंटरमीडिएट स्तर तथा विश्वविद्यालय सुधार की सिफारिश।
1929 हार्टोग समिति प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता, Wastage एवं Stagnation की समस्या पर बल।
1937 वर्धा शिक्षा योजना (नई तालीम) महात्मा गाँधी द्वारा प्रतिपादित; शिल्प-आधारित, मातृभाषा एवं निःशुल्क शिक्षा पर बल।
1944 सार्जेंट योजना 6–14 वर्ष तक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा तथा दीर्घकालिक शिक्षा योजना का प्रस्ताव।

महत्वपूर्ण तिथियाँ

वर्ष घटना
1781 वारेन हेस्टिंग्स द्वारा कलकत्ता मदरसा की स्थापना।
1784 सर विलियम जोन्स द्वारा एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना।
1791 जोनाथन डंकन द्वारा बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना।
1792 चार्ल्स ग्रांट ने अंग्रेजी शिक्षा के समर्थन में अपना प्रसिद्ध प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
1800 लॉर्ड वेलेजली द्वारा फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना।
1813 चार्टर एक्ट द्वारा शिक्षा के लिए 1 लाख रुपये का प्रावधान तथा मिशनरियों को कार्य करने की अनुमति।
1817 हिन्दू कॉलेज, कलकत्ता की स्थापना।
1823 जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (GCPI) की स्थापना।
1835 मैकॉले का शिक्षा सम्बन्धी विवरण तथा लॉर्ड विलियम बेंटिंक का शिक्षा संबंधी संकल्प।
1854 वुड का डिस्पैच प्रस्तुत; इसे “भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा” कहा जाता है।
1857 कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास विश्वविद्यालयों की स्थापना।
1882–83 हंटर आयोग (भारतीय शिक्षा आयोग) की नियुक्ति एवं रिपोर्ट।
1902 भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (रैले आयोग) की नियुक्ति।
1904 भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम लागू।
1917–19 सैडलर आयोग (कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग) की नियुक्ति एवं रिपोर्ट।
1929 हार्टोग समिति की नियुक्ति।
1937 महात्मा गाँधी द्वारा वर्धा शिक्षा योजना (नई तालीम) का प्रतिपादन।
1944 सार्जेंट योजना प्रस्तुत।

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