बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885 ई.)
➣ बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना जनवरी 1885 ई. में बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में फिरोजशाह मेहता, काशीनाथ त्र्यंबक तेलंग (के.टी. तेलंग) तथा बदरुद्दीन तैयबजी द्वारा की गई थी। यह कांग्रेस-पूर्व काल की पश्चिमी भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्थाओं में से एक थी।
➣ इस संस्था का गठन ऐसे समय में हुआ, जब लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियों, विशेषकर वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878) एवं आर्म्स एक्ट (1878), तथा इल्बर्ट बिल विवाद (1883) के कारण शिक्षित भारतीयों में राजनीतिक असंतोष तेजी से बढ़ रहा था।
➣ बॉम्बे प्रेसीडेंसी में इससे पूर्व बॉम्बे एसोसिएशन (1852) कार्यरत थी, किंतु समय के साथ वह निष्क्रिय हो चुकी थी। परिणामस्वरूप पश्चिमी भारत के शिक्षित भारतीयों ने एक नए एवं अधिक सक्रिय राजनीतिक संगठन की स्थापना का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन अस्तित्व में आई।
➣ इस संस्था के तीनों संस्थापक अपने समय के प्रतिष्ठित सार्वजनिक नेता थे। फिरोजशाह मेहता प्रसिद्ध अधिवक्ता एवं नगर प्रशासक थे, के.टी. तेलंग विख्यात विधिवेत्ता एवं समाज सुधारक थे,
➣ जबकि बदरुद्दीन तैयबजी बंबई उच्च न्यायालय के प्रथम भारतीय बैरिस्टरों में से एक थे। इन तीनों नेताओं ने मिलकर पश्चिमी भारत में उदारवादी राजनीतिक नेतृत्व को संगठित किया।
➣ इन तीनों नेताओं को संयुक्त रूप से बॉम्बे की त्रिमूर्ति अथवा बॉम्बे के तीन प्रकाश-स्तंभ कहा जाता है। इन्होंने संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण राजनीतिक संघर्ष की परंपरा को मजबूत किया और आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक नेतृत्व में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना तिथि | जनवरी 1885 ई. |
| स्थान | बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) |
| संस्थापक | फिरोजशाह मेहता, के.टी. तेलंग एवं बदरुद्दीन तैयबजी |
| पूर्ववर्ती संस्था | बॉम्बे एसोसिएशन (1852) |
| सामाजिक आधार | मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग, अधिवक्ता, व्यापारी, पत्रकार एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े भारतीय |
| राजनीतिक स्वरूप | उदारवादी (Moderate) एवं संवैधानिक सुधारों का समर्थक संगठन |
| विशेष पहचान | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से ठीक पूर्व पश्चिमी भारत का प्रमुख राजनीतिक संगठन |
▪ बॉम्बे एसोसिएशन (1852) और बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885) दोनों अलग-अलग संस्थाएँ थीं। परीक्षा में इनका भ्रम नहीं करना चाहिए।
▪ बदरुद्दीन तैयबजी आगे चलकर 1887 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तृतीय अध्यक्ष बने, जबकि फिरोजशाह मेहता 1890 ई. में कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
संवैधानिक राजनीति एवं प्रमुख सुधार
➣ बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन का विश्वास था कि भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति संवैधानिक, वैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों के माध्यम से ही संभव है।
➣ इसके नेताओं ने टकराव के स्थान पर तर्क, जनमत तथा संवैधानिक सुधारों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को प्रभावित करने की नीति अपनाई। यही कारण था कि यह संस्था कांग्रेस के प्रारम्भिक उदारवादी नेतृत्व की प्रमुख प्रतिनिधि मानी जाती है।
➣ संस्था के नेताओं का मानना था कि यदि भारतीयों को विधान परिषदों, स्थानीय स्वशासन संस्थाओं तथा उच्च प्रशासनिक सेवाओं में पर्याप्त अवसर दिए जाएँ, तो शासन व्यवस्था अधिक उत्तरदायी एवं न्यायपूर्ण बन सकती है। इसलिए इसने प्रशासनिक सुधारों को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का आधार बनाया।
➣ बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन ने यह भी प्रयास किया कि भारत के विभिन्न प्रांतों की राजनीतिक संस्थाएँ एक-दूसरे के साथ समन्वय स्थापित करें।
➣ इसके नेताओं का विश्वास था कि भारतीयों की समस्याओं को केवल प्रांतीय स्तर पर नहीं, बल्कि अखिल भारतीय दृष्टिकोण के साथ उठाया जाना चाहिए। यही विचार आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यशैली का महत्वपूर्ण आधार बना।
प्रमुख सुधार
- विधान परिषदों का विस्तार तथा उनमें भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।
- उच्च सरकारी सेवाओं में भारतीयों को समान अवसर एवं अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए।
- स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को अधिक अधिकार देकर प्रशासन में जनता की भागीदारी बढ़ाई जाए।
- प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से शासन व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी एवं जनोन्मुख बनाया जाए।
- भारत से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों पर ब्रिटिश सरकार एवं ब्रिटिश संसद के समक्ष भारतीयों का प्रभावी पक्ष प्रस्तुत किया जाए।
अंतर-प्रांतीय राजनीतिक सहयोग
राष्ट्रीय राजनीतिक संस्थाओं के साथ समन्वय
➣ बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन ने अपनी स्थापना के साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीयों की राजनीतिक समस्याओं का समाधान केवल प्रांतीय स्तर पर संभव नहीं है।
➣ इसलिए इसने पूना सार्वजनिक सभा, इंडियन एसोसिएशन (कलकत्ता) तथा मद्रास महाजन सभा जैसी समकालीन राजनीतिक संस्थाओं के साथ घनिष्ठ सहयोग स्थापित किया।
➣ इन संस्थाओं के बीच निरंतर संवाद एवं सहयोग के कारण प्रशासनिक सुधार, भारतीय प्रतिनिधित्व तथा विधायी परिषदों से संबंधित माँगों को राष्ट्रीय स्तर पर एक समान स्वर मिला। इससे विभिन्न प्रांतों में कार्यरत राजनीतिक संगठनों के बीच विश्वास एवं समन्वय की भावना विकसित हुई।
➣ इस सहयोग ने भारतीय राजनीति को प्रांतीय सीमाओं से ऊपर उठाकर अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही प्रवृत्ति आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की संगठनात्मक शक्ति का आधार बनी।
संयुक्त इंग्लैंड प्रतिनिधिमंडल (1885 ई.)
➣ सितंबर 1885 ई. में बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन, पूना सार्वजनिक सभा, मद्रास महाजन सभा तथा इंडियन एसोसिएशन ने संयुक्त रूप से इंग्लैंड में एक प्रतिनिधिमंडल भेजा। इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार एवं ब्रिटिश जनमत के समक्ष भारतीयों की राजनीतिक एवं प्रशासनिक समस्याओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना था।
➣ इस प्रतिनिधिमंडल में बॉम्बे की ओर से चंदावरकर, मद्रास की ओर से रामास्वामी मुदालियार तथा कलकत्ता की ओर से मनमोहन घोष ने भाग लिया।
➣ प्रतिनिधिमंडल ने विधान परिषदों में सुधार, भारतीयों के प्रतिनिधित्व में वृद्धि, उच्च प्रशासनिक सेवाओं में समान अवसर तथा अन्य प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठनात्मक विकास में योगदान
➣ बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से ठीक पूर्व पश्चिमी भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्था बन चुकी थी। इसके नेताओं ने अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन की आवश्यकता को समझते हुए कांग्रेस के गठन के प्रयासों को सक्रिय समर्थन प्रदान किया।
➣ दिसंबर 1885 ई. में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन बॉम्बे में आयोजित हुआ, तब फिरोजशाह मेहता, के.टी. तेलंग तथा बदरुद्दीन तैयबजी जैसे नेता उसके प्रमुख समर्थकों में थे। इन नेताओं ने कांग्रेस को पश्चिमी भारत के शिक्षित वर्ग का व्यापक समर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ कांग्रेस की स्थापना के बाद भी बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की भूमिका समाप्त नहीं हुई। 1886 ई. में कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन के बाद इसी संस्था की पहल पर बॉम्बे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का गठन किया गया। इसका उद्देश्य कांग्रेस के संगठन को प्रांतीय स्तर पर सुदृढ़ बनाना तथा उसकी गतिविधियों का विस्तार करना था।
➣ फिरोजशाह मेहता ने आगे चलकर 1890 ई. में तथा बदरुद्दीन तैयबजी ने 1887 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। इससे स्पष्ट होता है कि बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन केवल कांग्रेस की अग्रदूत संस्था ही नहीं थी, बल्कि उसने कांग्रेस को प्रभावशाली राष्ट्रीय नेतृत्व भी प्रदान किया।
➣ इस प्रकार बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन ने पश्चिमी भारत में कांग्रेस के संगठनात्मक आधार को मजबूत किया तथा उदारवादी राजनीति की उस परंपरा को विकसित किया, जिसने कांग्रेस के प्रारम्भिक वर्षों की कार्यशैली एवं नीतियों को गहराई से प्रभावित किया।
▪ पश्चिमी भारत में कांग्रेस के प्रारम्भिक संगठन एवं विस्तार में बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य एक झलक में
मुख्य तथ्य
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | जनवरी 1885 ई. |
| स्थान | बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) |
| संस्थापक | फिरोजशाह मेहता, के.टी. तेलंग एवं बदरुद्दीन तैयबजी |
| पूर्ववर्ती संस्था | बॉम्बे एसोसिएशन (1852) |
| राजनीतिक स्वरूप | उदारवादी (Moderate) एवं संवैधानिक सुधारों की समर्थक संस्था |
| प्रमुख सहयोगी संस्थाएँ | पूना सार्वजनिक सभा, इंडियन एसोसिएशन एवं मद्रास महाजन सभा |
| महत्वपूर्ण घटना | सितंबर 1885 में संयुक्त प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड भेजा |
| कांग्रेस से संबंध | 1885 के प्रथम कांग्रेस अधिवेशन का समर्थन; 1886 में बॉम्बे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के गठन में प्रमुख भूमिका |
| विशेषता | पश्चिमी भारत की प्रमुख कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्था तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अग्रदूत संस्थाओं में से एक |
कालक्रम
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| जनवरी 1885 | बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना |
| सितंबर 1885 | इंडियन एसोसिएशन, पूना सार्वजनिक सभा एवं मद्रास महाजन सभा के साथ संयुक्त प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड भेजा |
| दिसंबर 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में सक्रिय सहयोग |
| 1886 | बॉम्बे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के गठन में प्रमुख भूमिका |
| 1887 | बदरुद्दीन तैयबजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तृतीय अध्यक्ष बने |
| 1890 | फिरोजशाह मेहता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने |
परीक्षा नोट्स
▪ बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना जनवरी 1885 ई. में फिरोजशाह मेहता, के.टी. तेलंग एवं बदरुद्दीन तैयबजी ने की।
▪ इसे बॉम्बे एसोसिएशन (1852) से भ्रमित नहीं करना चाहिए; दोनों अलग-अलग संस्थाएँ थीं।
▪ तीनों संस्थापकों को संयुक्त रूप से बॉम्बे की त्रिमूर्ति अथवा Three Lights of Bombay कहा जाता है।
▪ सितंबर 1885 में इसने पूना सार्वजनिक सभा, मद्रास महाजन सभा एवं इंडियन एसोसिएशन के साथ मिलकर इंग्लैंड संयुक्त प्रतिनिधिमंडल भेजा।
▪ 1886 ई. में बॉम्बे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के गठन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
▪ बदरुद्दीन तैयबजी 1887 में तथा फिरोजशाह मेहता 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
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