बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843): स्थापना, उद्देश्य, कार्य एवं महत्व

📚 विषय सूची

परिचय

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना 20 अप्रैल 1843 ई. को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में की गई थी। यह कांग्रेस-पूर्व काल की प्रमुख राजनीतिक संस्थाओं में से एक थी।

➣ इसका उद्देश्य भारत की राजनीतिक, प्रशासनिक एवं सामाजिक समस्याओं को संगठित रूप से ब्रिटिश सरकार एवं जनता के समक्ष प्रस्तुत करना तथा संवैधानिक उपायों द्वारा प्रशासनिक सुधारों की माँग करना था।

➣ बंगाल में इससे पूर्व लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838) की स्थापना हो चुकी थी, जो मुख्यतः जमींदार वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करती थी। इसके विपरीत बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने शिक्षित भारतीयों एवं समाज के अन्य वर्गों की समस्याओं को भी अपने कार्यक्षेत्र में शामिल करने का प्रयास किया। इसी कारण इसे बंगाल की प्रारम्भिक राजनीतिक संस्थाओं में अधिक व्यापक दृष्टिकोण वाली संस्था माना जाता है।

➣ इस संस्था की स्थापना के पीछे सबसे महत्वपूर्ण प्रेरणा जॉर्ज थॉम्पसन थे। वे ब्रिटेन के प्रसिद्ध दास-प्रथा-विरोधी, उदारवादी विचारक तथा ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (लंदन, 1839) के प्रमुख नेताओं में से एक थे।

➣ उनका विश्वास था कि भारत में राजनीतिक एवं प्रशासनिक सुधार केवल ब्रिटेन में जनमत तैयार करने से नहीं, बल्कि भारत में भी संगठित राजनीतिक संस्थाओं के विकास से संभव हैं।

1842 ई. में द्वारकानाथ टैगोर अपने सहयोगियों चन्द्रमोहन चट्टोपाध्याय तथा परमानन्द मैत्र के साथ इंग्लैंड गए। इस यात्रा के दौरान उनका जॉर्ज थॉम्पसन के साथ निकट संपर्क स्थापित हुआ।

➣ भारत लौटने पर थॉम्पसन भी उनके साथ कलकत्ता आए और उन्होंने शिक्षित भारतीयों को संगठित कर एक नई राजनीतिक संस्था की स्थापना का विचार प्रस्तुत किया।

➣ जॉर्ज थॉम्पसन के प्रभावशाली भाषणों एवं उदारवादी विचारों ने रामगोपाल घोष, ताराचंद चक्रवर्ती, पेयारी चाँद मित्र तथा यंग बंगाल आंदोलन से जुड़े अनेक शिक्षित युवाओं को प्रभावित किया। इन्हीं के सहयोग से 1843 ई. में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना की गई।

➣ यह संस्था केवल किसी एक वर्ग के हितों तक सीमित नहीं थी। इसका उद्देश्य भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याओं का अध्ययन करना, प्रशासनिक सुधारों की माँग करना, भारतीयों के अधिकारों की रक्षा करना तथा ब्रिटिश जनता एवं संसद को भारत की वास्तविक परिस्थितियों से अवगत कराना था।

स्थापना की पृष्ठभूमि

➣ 1840 के दशक तक बंगाल में आधुनिक शिक्षा प्राप्त एक नया शिक्षित मध्यम वर्ग विकसित हो चुका था। यह वर्ग ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों का अध्ययन कर रहा था और चाहता था कि भारतीयों को प्रशासन में अधिक अवसर तथा न्यायपूर्ण व्यवहार प्राप्त हो।

➣ दूसरी ओर, लैंडहोल्डर्स सोसाइटी मुख्यतः जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही थी। शिक्षित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अनुभव करने लगा कि ऐसी संस्था की आवश्यकता है, जो केवल जमींदारों तक सीमित न होकर भारतीय समाज के व्यापक हितों का प्रतिनिधित्व करे।

➣ इसी समय ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (लंदन) और उसके नेता जॉर्ज थॉम्पसन भारत में राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने के पक्षधर थे। उनके प्रयासों तथा द्वारकानाथ टैगोर सहित बंगाल के शिक्षित नेताओं के सहयोग से 20 अप्रैल 1843 ई. को बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना हुई।

➣ इस प्रकार यह संस्था ब्रिटेन के उदारवादी सुधारकों तथा भारत के शिक्षित बुद्धिजीवियों के सहयोग का परिणाम थी। इसने भारत में संवैधानिक एवं संगठित राजनीतिक गतिविधियों के विकास को एक नई दिशा प्रदान की।

यंग बंगाल आंदोलन का प्रभाव

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के गठन पर यंग बंगाल आंदोलन का गहरा प्रभाव था। यंग बंगाल समूह मुख्यतः हेनरी लुई विवियन डिरोज़ियो के विचारों से प्रभावित उन शिक्षित युवाओं का समूह था, जो तर्कवाद, उदारवाद, आधुनिक शिक्षा, सामाजिक सुधार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक थे।

➣ इस समूह के सदस्य ब्रिटिश शासन का पूर्ण विरोध करने के पक्ष में नहीं थे, बल्कि उनका विश्वास था कि संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों द्वारा प्रशासनिक सुधारों तथा भारतीयों के अधिकारों का विस्तार किया जा सकता है। यही विचारधारा आगे चलकर बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की कार्यप्रणाली का आधार बनी।

रामगोपाल घोष, ताराचंद चक्रवर्ती, पेयारी चाँद मित्र तथा अन्य अनेक सदस्य यंग बंगाल आंदोलन से जुड़े हुए थे। इसी कारण संस्था में पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त शिक्षित मध्यम वर्ग का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

लैंडहोल्डर्स सोसाइटी से अंतर

➣ यद्यपि लैंडहोल्डर्स सोसाइटी और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी दोनों ही संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण राजनीतिक संस्थाएँ थीं, फिर भी उनके सामाजिक आधार, उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र में महत्वपूर्ण अंतर था।

विषय लैंडहोल्डर्स सोसाइटी बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी
स्थापना 1838 ई. 1843 ई.
सामाजिक आधार मुख्यतः जमींदार एवं भू-स्वामी वर्ग मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग एवं यंग बंगाल समूह
मुख्य उद्देश्य जमींदारों के अधिकारों की रक्षा भारतीयों के व्यापक राजनीतिक एवं प्रशासनिक हितों की रक्षा
कार्य का स्वरूप वर्ग-हित आधारित अपेक्षाकृत व्यापक एवं जनोन्मुखी
समकालीन पहचान धन का अभिजात्य वर्ग बुद्धि का अभिजात्य वर्ग

➣ समकालीन लेखकों ने इस अंतर को अत्यंत रोचक ढंग से व्यक्त किया। उनके अनुसार लैंडहोल्डर्स सोसाइटी जहाँ धन के अभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी, वहीं बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी को बुद्धि के अभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधि माना जाता था।

संगठनात्मक स्वरूप

➣ बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का मुख्यालय कलकत्ता में था। संस्था का संचालन एक 15-सदस्यीय कार्यकारिणी समिति द्वारा किया जाता था, जिसमें 4 यूरोपीय तथा 11 भारतीय सदस्य शामिल थे।

जॉर्ज थॉम्पसन इसके प्रथम अध्यक्ष बने। जी. एफ. रेम्फ्री (G. F. Remfry) तथा रामगोपाल घोष को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया, जबकि पेयारी चाँद मित्र इसके प्रथम सचिव बने।

➣ कार्यकारिणी के अधिकांश भारतीय सदस्य यंग बंगाल आंदोलन से जुड़े शिक्षित बुद्धिजीवी थे। इनमें ताराचंद चक्रवर्ती, दक्षिणारंजन मुखोपाध्याय, ब्रजनाथ धर, कृष्णमोहन बनर्जी, गोविंद चन्द्र सेन, चन्द्रशेखर देब, श्यामाचरण सेन तथा सतकरी दत्त जैसे प्रमुख नाम शामिल थे।

➣ संस्था में भारतीयों और यूरोपीय उदारवादियों—दोनों की भागीदारी थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य भारत एवं ब्रिटेन के उदारवादी वर्गों के बीच सहयोग स्थापित करना तथा भारतीय प्रश्नों को अधिक प्रभावी ढंग से उठाना था।

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के उद्देश्य

➣ बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का उद्देश्य केवल किसी एक वर्ग के हितों की रक्षा करना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज की राजनीतिक, प्रशासनिक एवं सामाजिक समस्याओं का अध्ययन कर उनके समाधान के लिए ब्रिटिश सरकार का ध्यान आकर्षित करना था।

  • भारत की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं का अध्ययन कर उन्हें संगठित रूप से सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना।
  • भारतीयों के अधिकारों एवं हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक माध्यमों से प्रशासनिक सुधारों की माँग करना।
  • ब्रिटिश जनता एवं ब्रिटिश संसद को भारत की वास्तविक परिस्थितियों से अवगत कराना।
  • सरकारी सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने तथा योग्य भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्त करने की माँग करना।
  • न्यायपालिका, राजस्व प्रशासन तथा अन्य सरकारी विभागों में आवश्यक सुधारों की माँग करना।
  • संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों द्वारा भारतीयों के हितों की रक्षा करना तथा सरकार और जनता के बीच संवाद स्थापित करना।
  • ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा बनाए रखते हुए भारत के सभी वर्गों के कल्याण एवं प्रगति के लिए कार्य करना।

कार्यप्रणाली

➣ बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की कार्यशैली पूरी तरह संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण थी। संस्था का विश्वास था कि प्रशासनिक सुधार हिंसात्मक संघर्ष के बजाय जनमत, याचिकाओं, ज्ञापनों तथा तार्किक संवाद के माध्यम से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

➣ संस्था विभिन्न प्रशासनिक एवं सामाजिक विषयों पर विचार-विमर्श करती थी और आवश्यकता पड़ने पर अपनी माँगों को याचिकाओं, ज्ञापनों तथा प्रतिवेदनों के रूप में सरकार के समक्ष प्रस्तुत करती थी।

➣ इसके अतिरिक्त संस्था ब्रिटिश अधिकारियों, उदारवादी नेताओं तथा ब्रिटिश जनता तक भारत की वास्तविक परिस्थितियों को पहुँचाने का भी प्रयास करती थी, ताकि भारत के पक्ष में जनमत तैयार किया जा सके।

संस्था की प्रकृति

➣ बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी अपने समय की अपेक्षाकृत उदार, प्रगतिशील एवं व्यापक दृष्टिकोण वाली राजनीतिक संस्था थी। यद्यपि यह ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा व्यक्त करती थी, फिर भी यह प्रशासनिक सुधारों, भारतीयों के अधिकारों तथा सरकारी सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की समर्थक थी।

➣ संस्था किसी क्रांतिकारी या उग्र राजनीतिक आंदोलन की समर्थक नहीं थी। उसका विश्वास था कि याचिकाओं, ज्ञापनों, जनमत निर्माण तथा संवैधानिक संवाद के माध्यम से भी प्रशासनिक सुधार प्राप्त किए जा सकते हैं। यही कारण है कि इसे कांग्रेस-पूर्व संवैधानिक राजनीतिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

➣ बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के निरंतर प्रयासों से सरकारी सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति के प्रश्न को गंभीरता से उठाया गया। माना जाता है कि इसके प्रयासों के परिणामस्वरूप भारतीयों को डिप्टी मजिस्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्त करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।

1843 से 1846 ई. के बीच संस्था से जुड़े चन्द्रशेखर देब, शिवचन्द्र देब तथा किशोरीचन्द्र मित्र जैसे सदस्य स्वयं डिप्टी मजिस्ट्रेट नियुक्त किए गए। इससे प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।

➣ संस्था ने रजिस्ट्रेशन विभाग में सुधारों की माँग भी उठाई। यद्यपि इन सुधारों का श्रेय केवल इसी संस्था को नहीं दिया जा सकता, फिर भी प्रशासनिक सुधारों के पक्ष में जनमत तैयार करने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

➣ इन प्रयासों से यह सिद्ध हुआ कि संगठित एवं संवैधानिक राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से भी प्रशासनिक सुधारों की दिशा में प्रभाव डाला जा सकता है। यही कार्यशैली आगे चलकर कांग्रेस-पूर्व अन्य राजनीतिक संस्थाओं तथा प्रारम्भिक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा भी अपनाई गई।

योगदान

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने भारत में प्रारम्भिक संवैधानिक राजनीतिक आंदोलन को संगठित स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने शिक्षित भारतीयों को पहली बार एक ऐसे मंच पर संगठित किया, जहाँ वे राजनीतिक एवं प्रशासनिक विषयों पर विचार-विमर्श कर अपनी माँगें सरकार के समक्ष रख सकते थे।

➣ इस संस्था ने यंग बंगाल आंदोलन से जुड़े शिक्षित युवाओं को राजनीतिक गतिविधियों से जोड़ने का कार्य किया। इससे बंगाल में आधुनिक राजनीतिक चेतना के विकास को गति मिली तथा शिक्षित मध्यम वर्ग सार्वजनिक जीवन में अधिक सक्रिय हुआ।

➣ संस्था ने भारतीयों के अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों तथा सरकारी सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी जैसे विषयों को संगठित रूप से उठाया। इससे ब्रिटिश प्रशासन पर इन विषयों पर विचार करने का नैतिक एवं सार्वजनिक दबाव बना।

➣ बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी ने ब्रिटिश जनता, ब्रिटिश संसद तथा भारत के शिक्षित वर्ग के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु (Bridge) का कार्य किया। इसके माध्यम से भारत की वास्तविक परिस्थितियों तथा भारतीयों की समस्याओं की जानकारी ब्रिटेन तक पहुँची।

➣ इस संस्था ने यह सिद्ध किया कि संवैधानिक उपायों, याचिकाओं, ज्ञापनों तथा जनमत निर्माण के माध्यम से भी प्रशासनिक सुधारों की दिशा में प्रभावी प्रयास किए जा सकते हैं। यही परम्परा आगे चलकर कांग्रेस-पूर्व की अन्य संस्थाओं तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक चरण में भी दिखाई देती है।

सीमाएँ

➣ यद्यपि बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का दृष्टिकोण लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की अपेक्षा अधिक व्यापक था, फिर भी इसकी सदस्यता मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग एवं यंग बंगाल समूह तक सीमित रही। किसानों, मजदूरों तथा सामान्य जनता की इसमें प्रत्यक्ष भागीदारी बहुत कम थी।

➣ संस्था का कार्यक्षेत्र मुख्यतः बंगाल तक सीमित था। इसलिए यह अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन का स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकी।

➣ संस्था पूर्णतः संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों पर निर्भर थी। उसके पास सरकार पर प्रत्यक्ष राजनीतिक दबाव बनाने अथवा जन-आंदोलन चलाने जैसी शक्ति नहीं थी।

➣ संस्था ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठावान थी और प्रशासनिक सुधारों की समर्थक थी, न कि औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने की। इसलिए इसे आधुनिक अर्थों में राष्ट्रवादी या स्वतंत्रता आंदोलन की संस्था नहीं माना जाता।

➣ 1850 के दशक तक नई राजनीतिक परिस्थितियों तथा अधिक प्रभावशाली संगठनों के उदय के कारण इसकी स्वतंत्र भूमिका धीरे-धीरे कम होती गई।

आगे का विकास

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी और लैंडहोल्डर्स सोसाइटी दोनों ही संवैधानिक राजनीतिक संस्थाएँ थीं। समय के साथ दोनों संस्थाओं के उद्देश्य अनेक विषयों पर समान होते गए, विशेषकर प्रशासनिक सुधारों, भारतीयों के अधिकारों तथा सरकार के समक्ष संगठित रूप से माँगें प्रस्तुत करने के संबंध में।

➣ इसी कारण 29 अक्टूबर 1851 ई. (कुछ स्रोतों के अनुसार 31 अक्टूबर 1851 ई.) को इन दोनों संस्थाओं का विलय कर ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की गई। इसके साथ ही बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया।

➣ इस विलय के साथ कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्थाओं के विकास का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ। ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने इन दोनों संस्थाओं के अनुभवों एवं कार्यशैली को आगे बढ़ाया। इस संस्था का विस्तृत अध्ययन उसके पृथक अध्याय में किया जा सकता है।

लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838) + बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843) = बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1851)

महत्वपूर्ण तथ्य

विषय विवरण
स्थापना तिथि 20 अप्रैल 1843 ई.
स्थान कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता)
मुख्य प्रेरणा-स्रोत जॉर्ज थॉम्पसन
प्रथम अध्यक्ष जॉर्ज थॉम्पसन
उपाध्यक्ष जी. एफ. रेम्फ्री एवं रामगोपाल घोष
प्रथम सचिव पेयारी चाँद मित्र
कार्यकारिणी 15 सदस्य – 4 यूरोपीय एवं 11 भारतीय
सामाजिक आधार मुख्यतः यंग बंगाल समूह के शिक्षित बुद्धिजीवी
मुख्य उद्देश्य भारतीयों के अधिकारों की रक्षा, प्रशासनिक सुधार तथा ब्रिटिश सरकार एवं जनता के समक्ष भारतीय समस्याओं को प्रस्तुत करना
विशेषता लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की अपेक्षा अधिक व्यापक सामाजिक आधार वाली कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्था

कालक्रम (Timeline)

वर्ष घटना
1839 लंदन में ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना
1842 द्वारकानाथ टैगोर की इंग्लैंड यात्रा एवं जॉर्ज थॉम्पसन से संपर्क
20 अप्रैल 1843 कलकत्ता में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना
1843–1846 सरकारी सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति एवं प्रशासनिक सुधारों के लिए सक्रिय प्रयास
1851 लैंडहोल्डर्स सोसाइटी के साथ विलय कर ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का गठन

स्थापना20 अप्रैल 1843 ई., कलकत्ता।
मुख्य प्रेरणा-स्रोत – जॉर्ज थॉम्पसन।
प्रथम अध्यक्ष – जॉर्ज थॉम्पसन।
प्रथम सचिव – पेयारी चाँद मित्र।
कार्यकारिणी – 15 सदस्य (4 यूरोपीय एवं 11 भारतीय)।
सामाजिक आधार – मुख्यतः यंग बंगाल आंदोलन से जुड़े शिक्षित बुद्धिजीवी।
मुख्य कार्य – प्रशासनिक सुधार, भारतीयों के अधिकारों की रक्षा तथा सरकारी सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की माँग।
विशेष पहचान – समकालीन लेखकों ने इसे “बुद्धि का अभिजात्य वर्ग” (Aristocracy of Intellect) का प्रतिनिधि कहा।
1851 ई. में लैंडहोल्डर्स सोसाइटी के साथ विलय कर ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का गठन हुआ।
भ्रम न रखेंब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1839, लंदन) और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843, कलकत्ता) दो अलग संस्थाएँ थीं; दूसरी संस्था पहली से प्रेरित होकर भारत में स्थापित की गई थी।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram