परिचय
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना 1836 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुई थी। इसे सामान्यतः भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था तथा कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संगठनों की अग्रदूत माना जाता है। इस संस्था ने भारत में संगठित एवं संवैधानिक राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ 19वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में भारतीय समाज में सामाजिक, शैक्षिक एवं बौद्धिक जागरण का वातावरण बन चुका था। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार, आधुनिक विचारों के प्रभाव तथा ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों के कारण एक ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार हुआ, जिसने पहली बार संगठित रूप से सार्वजनिक एवं राजनीतिक प्रश्नों पर विचार करना प्रारम्भ किया। इसी परिवेश में बंगभाषा प्रकाशिका सभा का जन्म हुआ।
➣ इतिहासकार डॉ. अनिल सेन ने 19वीं शताब्दी को समितियों का युग कहा है। उनका मानना है कि इसी काल में भारत में विभिन्न सार्वजनिक एवं राजनीतिक संस्थाओं का विकास प्रारम्भ हुआ और बंगभाषा प्रकाशिका सभा इस प्रक्रिया की पहली महत्वपूर्ण कड़ी थी।
➣ यह संस्था राजा राममोहन राय की 1833 ई. में हुई मृत्यु के बाद उनके सहयोगियों एवं अनुयायियों द्वारा स्थापित की गई थी। इसका उद्देश्य उनके द्वारा प्रारम्भ किए गए सामाजिक सुधार, आधुनिक शिक्षा, जनजागरण तथा संवैधानिक अधिकारों की परम्परा को आगे बढ़ाना था।
➣ ध्यान देने योग्य है कि राजा राममोहन राय ने स्वयं भारत में किसी राजनीतिक संगठन की औपचारिक स्थापना नहीं की थी। उनका योगदान मुख्यतः आधुनिक राजनीतिक चेतना, प्रेस की स्वतंत्रता, प्रशासनिक सुधारों तथा भारतीयों के अधिकारों के समर्थन के रूप में था। उनके विचारों से प्रेरित होकर ही उनके अनुयायियों ने पहली संगठित राजनीतिक संस्था के रूप में बंगभाषा प्रकाशिका सभा का गठन किया।
➣ संस्था के प्रमुख संस्थापकों में प्रसन्न कुमार ठाकुर, द्वारकानाथ टैगोर, काशीनाथ राय (कुछ स्रोतों में कालीनाथ राय चौधरी) तथा हरचन्द्र बंद्योपाध्याय आदि प्रमुख थे।
➣ विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में संस्थापकों के नामों में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं, किन्तु उपर्युक्त व्यक्तियों को इसके प्रारम्भिक नेतृत्व से संबंधित प्रमुख नाम माना जाता है।
➣ गौरीशंकर तर्कबागीश को सामान्यतः इस संस्था का प्रथम अध्यक्ष माना जाता है। कुछ इतिहासकार उन्हें संस्था का प्रमुख प्रवर्तक भी मानते हैं। सभा की प्रथम बैठक 8 दिसंबर 1836 को कलकत्ता में आयोजित हुई, जहाँ सार्वजनिक एवं प्रशासनिक विषयों पर नियमित रूप से विचार-विमर्श करने का निर्णय लिया गया।
बंगभाषा प्रकाशिका सभा नाम का अर्थ
➣ ‘बंगभाषा प्रकाशिका सभा’ नाम तीन शब्दों से मिलकर बना है— बंग (बंगाल), भाषा तथा प्रकाशिका (प्रकाशित अथवा प्रसारित करने वाली)।
➣ प्रारम्भ में इस संस्था का उद्देश्य केवल राजनीतिक विषयों तक सीमित नहीं था, बल्कि बंगला भाषा, शिक्षा, सार्वजनिक विचार-विमर्श तथा सामाजिक चेतना को बढ़ावा देना भी था।
➣ उस समय बंगला भाषा के माध्यम से शिक्षित समाज तक आधुनिक विचार पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा था। इसी कारण संस्था के नाम में भाषा और जनजागरण दोनों का समावेश दिखाई देता है। बाद के वर्षों में इसके कार्यों का स्वरूप अधिक स्पष्ट रूप से राजनीतिक होता गया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
➣ 19वीं शताब्दी के आरम्भ में भारत में आधुनिक अर्थों में कोई संगठित राजनीतिक संस्था नहीं थी। जनता की शिकायतें प्रायः व्यक्तिगत रूप से अधिकारियों तक पहुँचाई जाती थीं तथा भारतीयों के पास अपने विचार सामूहिक रूप से रखने के लिए कोई स्थायी मंच उपलब्ध नहीं था।
➣ दूसरी ओर, अंग्रेजी शिक्षा, प्रेस का विकास, पाश्चात्य उदारवादी विचारधारा तथा सामाजिक सुधार आंदोलनों के प्रभाव से शिक्षित भारतीयों में यह भावना विकसित होने लगी कि प्रशासनिक निर्णयों पर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए तथा सरकार के समक्ष भारतीयों की समस्याएँ संगठित रूप से प्रस्तुत की जानी चाहिए।
➣ इसी आवश्यकता को पूरा करने के उद्देश्य से 1836 ई. में बंगभाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना हुई। यह संस्था भविष्य में विकसित होने वाली लगभग सभी कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्थाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।
क्या यह भारत की प्रथम राजनीतिक संस्था थी?
➣ अधिकांश आधुनिक इतिहासकार बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836) को भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था मानते हैं। इसका कारण यह है कि यह नियमित बैठकों, संगठित सदस्यता, सार्वजनिक विचार-विमर्श तथा प्रशासनिक विषयों पर सामूहिक अभिमत प्रस्तुत करने वाली पहली स्थायी राजनीतिक संस्था थी।
➣ यद्यपि कुछ इतिहासकार इससे पूर्व अस्तित्व में रहे कुछ सीमित सार्वजनिक समूहों अथवा अस्थायी समितियों का उल्लेख करते हैं, किन्तु उन्हें स्थायी एवं सुव्यवस्थित राजनीतिक संगठन का स्वरूप प्राप्त नहीं था। इसी कारण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में सामान्यतः बंगभाषा प्रकाशिका सभा को ही कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संगठनों का प्रारम्भिक बिंदु माना जाता है।
पृष्ठभूमि
➣ 1813 के चार्टर अधिनियम तथा उसके बाद अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से कलकत्ता आधुनिक शिक्षा का प्रमुख केन्द्र बन चुका था। यहाँ से शिक्षित हुए युवाओं पर उदारवाद, संवैधानिक शासन, नागरिक अधिकार तथा प्रतिनिधि शासन जैसे पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का प्रभाव पड़ा।
➣ इसी काल में राजा राममोहन राय के नेतृत्व में सामाजिक एवं बौद्धिक जागरण की शुरुआत हुई। उन्होंने सती प्रथा उन्मूलन, प्रेस की स्वतंत्रता, आधुनिक शिक्षा, धार्मिक सहिष्णुता तथा प्रशासनिक सुधारों का समर्थन किया। परिणामस्वरूप भारतीय समाज में सार्वजनिक विषयों पर चर्चा करने की परम्परा विकसित होने लगी।
➣ 1833 ई. में राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने अनुभव किया कि यदि उनके विचारों को आगे बढ़ाना है तो एक ऐसे स्थायी सार्वजनिक मंच की आवश्यकता होगी, जहाँ शिक्षित भारतीय नियमित रूप से एकत्र होकर जनहित एवं प्रशासनिक विषयों पर विचार-विमर्श कर सकें। इसी आवश्यकता ने बंगभाषा प्रकाशिका सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ उस समय तक भारतीयों के पास अपनी समस्याओं को सरकार के समक्ष संगठित रूप से रखने का कोई प्रभावी माध्यम नहीं था। बंगभाषा प्रकाशिका सभा ने पहली बार इस कमी को दूर करने का प्रयास किया और शिक्षित भारतीयों को सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी का अवसर प्रदान किया।
संगठनात्मक स्वरूप
➣ सभा का मुख्यालय कलकत्ता में था, जो उस समय ब्रिटिश भारत की राजधानी होने के साथ-साथ शिक्षा, प्रेस एवं प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था। इसी कारण संस्था की अधिकांश गतिविधियाँ यहीं से संचालित होती थीं।
➣ इसके सदस्य मुख्यतः बंगाल के अंग्रेजी-शिक्षित भद्रलोक वर्ग से संबंधित थे। इनमें शिक्षाविद्, वकील, जमींदार, व्यापारी, लेखक, पत्रकार तथा सामाजिक सुधारक शामिल थे। यही वर्ग आगे चलकर भारत की प्रारम्भिक राजनीतिक गतिविधियों का नेतृत्व करने लगा।
➣ सभा नियमित अंतराल पर बैठकें आयोजित करती थी, जिनमें सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों, कानूनों, शिक्षा, न्याय व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया जाता था। इन बैठकों के माध्यम से विभिन्न विषयों पर सामूहिक मत तैयार किया जाता था।
➣ किसी विषय पर सहमति बनने के बाद संस्था उस संबंध में याचिकाएँ, ज्ञापन अथवा अन्य संवैधानिक माध्यमों से अपनी बात ब्रिटिश सरकार तक पहुँचाती थी। यही कार्यपद्धति आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक वर्षों की भी प्रमुख विशेषता बनी।
➣ यद्यपि संस्था का कार्यक्षेत्र मुख्यतः बंगाल तक सीमित था, फिर भी इसके विचारों और कार्यशैली का प्रभाव धीरे-धीरे अन्य प्रान्तों के शिक्षित भारतीयों पर भी पड़ने लगा।
बंगभाषा प्रकाशिका सभा के उद्देश्य
- ▪ भारतीयों को सार्वजनिक एवं राजनीतिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए एक संगठित मंच उपलब्ध कराना।
- ▪ ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक नीतियों, कानूनों एवं निर्णयों की समीक्षा कर उनमें आवश्यक सुधारों की माँग करना।
- ▪ भारतीय जनता की समस्याओं को याचिकाओं, ज्ञापनों एवं प्रार्थना-पत्रों के माध्यम से सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना।
- ▪ भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता, नागरिक चेतना एवं सार्वजनिक जीवन में भागीदारी की भावना का विकास करना।
- ▪ प्रशासनिक व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने तथा योग्य भारतीयों को सरकारी सेवाओं में अधिक अवसर दिलाने की माँग करना।
- ▪ बंगला भाषा, आधुनिक शिक्षा तथा बौद्धिक गतिविधियों को प्रोत्साहित कर समाज में जागरूकता फैलाना।
- ▪ सरकार और भारतीय समाज के बीच संवैधानिक संवाद स्थापित करना।
- ▪ राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए शांतिपूर्ण, वैधानिक एवं संवैधानिक उपायों को अपनाना।
कार्यप्रणाली
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा की कार्यशैली पूरी तरह संवैधानिक (Constitutional) एवं शांतिपूर्ण (Peaceful) थी। संस्था का विश्वास था कि जनमत तैयार करके तथा तार्किक ढंग से अपनी माँगें प्रस्तुत करके भी प्रशासन में सुधार लाया जा सकता है।
➣ सभा विभिन्न सरकारी नीतियों एवं प्रशासनिक निर्णयों का अध्ययन करती थी। यदि किसी नीति से भारतीय जनता के हित प्रभावित होते थे, तो संस्था उसके संबंध में अपना मत तैयार कर सरकार को ज्ञापन या याचिका भेजती थी।
➣ संस्था केवल विरोध तक सीमित नहीं रहती थी, बल्कि आवश्यक होने पर वैकल्पिक सुझाव भी प्रस्तुत करती थी, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण एवं जनहितकारी बन सके।
➣ सभा का एक महत्वपूर्ण कार्य जनमत का निर्माण भी था। यह शिक्षित भारतीयों के बीच राजनीतिक विषयों पर चर्चा को प्रोत्साहित करती थी तथा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी की भावना विकसित करती थी।
➣ बाद में लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838), बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843), ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851) और प्रारम्भिक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी काफी हद तक इसी प्रकार की याचिका एवं ज्ञापन आधारित संवैधानिक राजनीति को अपनाया। इस दृष्टि से बंगभाषा प्रकाशिका सभा को भारत में संवैधानिक राजनीतिक कार्यशैली की प्रारम्भिक प्रयोगशाला माना जाता है।
प्रमुख कार्य एवं योगदान
➣ यद्यपि बंगभाषा प्रकाशिका सभा का कार्यक्षेत्र मुख्यतः बंगाल तक सीमित था, फिर भी इसने भारत में संगठित राजनीतिक गतिविधियों की ऐसी परम्परा की शुरुआत की, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा निर्धारित की। इसका सबसे बड़ा योगदान किसी बड़े आंदोलन का नेतृत्व करना नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना का विकास तथा संवैधानिक राजनीति की नींव रखना था।
1. राजनीतिक चेतना का विकास
➣ इस संस्था ने पहली बार शिक्षित भारतीयों को सार्वजनिक एवं राजनीतिक विषयों पर संगठित रूप से विचार-विमर्श करने का अवसर प्रदान किया। इससे भारतीय समाज में यह भावना विकसित हुई कि सरकार की नीतियों पर चर्चा करना तथा उन पर अपनी राय व्यक्त करना नागरिकों का अधिकार है।
➣ उस समय तक अधिकांश भारतीय ब्रिटिश शासन को केवल शासक के रूप में देखते थे, किंतु इस संस्था ने लोगों को प्रशासनिक निर्णयों का मूल्यांकन करने तथा जनहित के आधार पर उनका समर्थन या विरोध करने की प्रेरणा दी।
2. जनमत निर्माण (Public Opinion)
➣ सभा ने सार्वजनिक बैठकों एवं विचार-विमर्श के माध्यम से जनमत निर्माण की परम्परा को प्रोत्साहित किया। विभिन्न प्रशासनिक विषयों पर चर्चा कर शिक्षित वर्ग के बीच एक साझा दृष्टिकोण विकसित किया जाता था, जिसे बाद में सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया जाता था।
➣ इस प्रक्रिया ने भारत में Public Opinion (जनमत) की अवधारणा को मजबूत किया, जो आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण आधार बनी।
3. याचिका एवं ज्ञापन की राजनीति (Petition Politics)
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा ने प्रशासनिक सुधारों एवं जनहित के विषयों पर ब्रिटिश सरकार को याचिकाएँ (Petitions), ज्ञापन (Memorials) तथा प्रार्थना-पत्र (Memorial Petitions) भेजने की परम्परा विकसित की।
➣ यद्यपि इन प्रयासों का तत्काल व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा, फिर भी भारतीयों ने पहली बार संगठित रूप से अपनी माँगें सरकार तक पहुँचाने का संवैधानिक मार्ग अपनाया। बाद में प्रारम्भिक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी इसी कार्यपद्धति का अनुसरण किया।
4. प्रशासनिक सुधारों की माँग
➣ सभा समय-समय पर ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों की समीक्षा करती थी तथा जहाँ आवश्यक होता, वहाँ सुधारों की माँग करती थी। संस्था का उद्देश्य सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि प्रशासन को अधिक न्यायपूर्ण, उत्तरदायी एवं जनहितकारी बनाना था।
➣ इसके सदस्यों का मानना था कि यदि सरकार भारतीयों की समस्याओं से अवगत होगी, तो प्रशासन में सुधार संभव होगा। इसी कारण संस्था ने संघर्ष की अपेक्षा संवाद एवं संवैधानिक उपायों को प्राथमिकता दी।
5. शिक्षित भारतीयों को सार्वजनिक मंच प्रदान करना
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा ने पहली बार शिक्षित भारतीयों को एक ऐसा मंच उपलब्ध कराया, जहाँ वे समान रूप से बैठकर प्रशासन, कानून, शिक्षा, न्याय व्यवस्था तथा अन्य सार्वजनिक विषयों पर विचार-विमर्श कर सकते थे।
➣ इसने भारतीय समाज में संगठन संस्कृति (Organisational Culture) का विकास किया। आगे चलकर इसी अनुभव का उपयोग अनेक राजनीतिक संस्थाओं एवं राष्ट्रीय संगठनों के गठन में हुआ।
6. संवैधानिक राजनीति की परम्परा की शुरुआत
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों को अपनाने की परम्परा स्थापित की।
➣ संस्था का विश्वास था कि तर्क, जनमत, याचिका एवं संवाद के माध्यम से भी शासन की नीतियों को प्रभावित किया जा सकता है। यही विचार आगे चलकर कांग्रेस के प्रारम्भिक उदारवादी (Moderate) नेताओं की राजनीतिक रणनीति का आधार बना।
सीमाएँ
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा का सदस्य-आधार मुख्यतः कलकत्ता के अंग्रेजी-शिक्षित भद्रलोक वर्ग तक ही सीमित रहा। किसानों, मजदूरों तथा सामान्य जनता की इसमें प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी, इसलिए यह व्यापक जन-आंदोलन का स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकी।
➣ यद्यपि संस्था के विचारों का प्रभाव अन्य क्षेत्रों तक पहुँचा, किन्तु इसकी अधिकांश गतिविधियाँ बंगाल तक ही सीमित रहीं। इस कारण यह अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन का रूप नहीं ले सकी।
➣ संस्था केवल याचिकाओं, ज्ञापनों एवं शांतिपूर्ण संवाद जैसे संवैधानिक उपायों पर निर्भर थी। उसके पास सरकार पर प्रभावी दबाव बनाने के लिए व्यापक जनसमर्थन अथवा संगठित जन-आंदोलन जैसे साधन उपलब्ध नहीं थे।
➣ ब्रिटिश सरकार संस्था द्वारा प्रस्तुत ज्ञापनों एवं सुझावों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं थी। परिणामस्वरूप इसकी अनेक माँगों का तत्काल कोई ठोस प्रभाव दिखाई नहीं दिया।
➣ संस्था के पास सीमित आर्थिक एवं संगठनात्मक संसाधन थे। साथ ही, उस समय भारत में राजनीतिक संगठनों की परम्परा भी प्रारम्भिक अवस्था में थी। इसलिए यह संस्था लंबे समय तक अत्यधिक प्रभावशाली रूप में सक्रिय नहीं रह सकी।
पतन के कारण
- ▪ संस्था का कार्यक्षेत्र मुख्यतः शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित रहा।
- ▪ व्यापक जनसमर्थन एवं जनसंगठन विकसित नहीं हो सका।
- ▪ ब्रिटिश सरकार की उदासीनता के कारण इसके ज्ञापनों का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा।
- ▪ बाद के वर्षों में लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838), बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843) तथा अन्य नई संस्थाओं के उदय के कारण इसका महत्व धीरे-धीरे कम होता गया।
- ▪ परिणामस्वरूप यह संस्था भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक प्रारम्भिक प्रयोग (Pioneer Institution) के रूप में अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुई, जबकि आगे की राजनीतिक गतिविधियों का नेतृत्व नई संस्थाओं ने संभाल लिया।
ऐतिहासिक महत्व
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यद्यपि यह संस्था किसी बड़े जन-आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर सकी, फिर भी इसने भारत में संगठित राजनीतिक गतिविधियों की नींव रखी।
➣ अधिकांश इतिहासकार इसे भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था मानते हैं। इसने पहली बार भारतीयों को एक ऐसा स्थायी मंच प्रदान किया, जहाँ वे सार्वजनिक एवं राजनीतिक विषयों पर संगठित रूप से विचार-विमर्श कर सकते थे।
➣ इस संस्था ने यह स्थापित किया कि जनता की समस्याओं को संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों से भी सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है। यही कार्यशैली आगे चलकर कांग्रेस के प्रारम्भिक वर्षों की प्रमुख विशेषता बनी।
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा ने भारतीयों में राजनीतिक चेतना, संगठन की भावना तथा सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का विकास किया। इसने शिक्षित भारतीयों को यह अनुभव कराया कि यदि वे संगठित होकर अपनी बात रखें, तो प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास किया जा सकता है।
➣ यद्यपि इसकी गतिविधियाँ मुख्यतः बंगाल तक सीमित थीं, फिर भी इसके विचारों एवं कार्यपद्धति ने पूरे भारत में विकसित होने वाली कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित किया।
आगे की राजनीतिक संस्थाओं पर प्रभाव
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा के गठन के बाद भारत में क्रमशः अनेक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने अपने-अपने समय में भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों तथा प्रतिनिधित्व की माँग को आगे बढ़ाया।
| संस्था | स्थापना वर्ष | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| बंगभाषा प्रकाशिका सभा | 1836 | भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था |
| लैंडहोल्डर्स सोसाइटी | 1838 | जमींदारों के हितों की रक्षा हेतु गठित संस्था |
| बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी | 1843 | भारतीयों के राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकारों के लिए कार्यरत संस्था |
| ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन | 1851 | लैंडहोल्डर्स सोसाइटी एवं बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के विलय से गठित |
| इंडियन एसोसिएशन | 1876 | अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 1885 | राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक संगठन |
➣ उपर्युक्त क्रम से स्पष्ट होता है कि बंगभाषा प्रकाशिका सभा ने भारत में राजनीतिक संगठनों के विकास की आधारशिला रखी। बाद की प्रत्येक संस्था ने किसी-न-किसी रूप में इसकी संगठनात्मक एवं संवैधानिक कार्यशैली से प्रेरणा प्राप्त की।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंध
➣ बंगभाषा प्रकाशिका सभा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच लगभग 49 वर्षों का अंतर है, किन्तु दोनों की प्रारम्भिक कार्यशैली में अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं।
- ▪ दोनों संस्थाओं ने प्रारम्भिक चरण में संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों को अपनाया।
- ▪ दोनों ने याचिकाओं, ज्ञापनों एवं प्रार्थना-पत्रों के माध्यम से सरकार तक भारतीयों की समस्याएँ पहुँचाने का प्रयास किया।
- ▪ दोनों का प्रारम्भिक नेतृत्व मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग के हाथों में था।
- ▪ दोनों का उद्देश्य प्रशासन में सुधार तथा भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना था।
➣ इस प्रकार कहा जा सकता है कि बंगभाषा प्रकाशिका सभा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उदय के लिए वैचारिक एवं संगठनात्मक आधार तैयार किया।
महत्वपूर्ण तथ्य
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| स्थापना | 1836 ई. |
| स्थान | कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) |
| प्रथम बैठक | 8 दिसंबर 1836 |
| प्रमुख संस्थापक | प्रसन्न कुमार ठाकुर, द्वारकानाथ टैगोर, काशीनाथ राय, हरचन्द्र बंद्योपाध्याय आदि |
| प्रथम अध्यक्ष | गौरीशंकर तर्कबागीश |
| प्रेरणा | राजा राममोहन राय के विचार एवं उनके अनुयायियों का प्रयास |
| कार्यशैली | संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण – याचिका, ज्ञापन एवं जनमत निर्माण |
| विशेषता | भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था (सामान्यतः स्वीकृत) |
कालक्रम (Timeline)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1833 | राजा राममोहन राय का निधन |
| 1836 | बंगभाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना |
| 1838 | लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की स्थापना |
| 1843 | बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना |
| 1851 | ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का गठन |
| 1876 | इंडियन एसोसिएशन की स्थापना |
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना |
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