| शासक (शासनकाल) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| गयासुद्दीन बलबन (1266-1287 ई.) | केंद्रीय सत्ता को मजबूत किया, लौह एवं रक्त नीति अपनाई तथा चहलगानी दल का प्रभाव समाप्त किया। |
| कैकूबाद (1287-1290 ई.) | बलबन का पौत्र था। उसके शासनकाल में सल्तनत की शक्ति कमजोर होने लगी। |
| शम्सुद्दीन क्यूमर्स (1290 ई.) | कैकूबाद का पुत्र था। उसके समय में खिलजी क्रांति हुई और गुलाम वंश का अंत हो गया। |
गियासुद्दीन बलबन (1266 – 1287 ई.)
➣ ग़यासुद्दीन बलबन इल्बारि जाति का व्यक्ति था, जिसने एक नये राजवंश बलबनी वंश की स्थापना की थी। इसका वास्तविक नाम बहाउद्दीन था। यह गियासुद्दीन बलबन के नाम से गद्दी पर बैठा।
➣ ग़यासुद्दीन बलबन ग़ुलाम वंश का नवाँ सुल्तान था। बलबन मूलतः सुल्तान इल्तुतमिश का तुर्की ग़ुलाम था। उसका जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था। दुर्भाग्यवश बलबन अपनी युवास्था में ही मंगोलों द्वारा बंदी बना लिया गया।
➣ मंगोलो ने उसे बसरा ले जाकर दास के रूप में ख़्वाजा जमालुद्दीन बसरी नाम का एक व्यक्ति को बेच दिया। लगभग 1232-33 ई. में दिल्ली लाया गया।
➣ इल्तुतमिश ने ग्वालियर को जीतने के उपरान्त लगभग 1233 ई. में बलबन को ख़रीद लिया और व दासो के दल (चालीसा) में शामिल कर लिया। अपनी योग्यता के कारण कालान्तर में बलबन राज्य की सम्पूर्ण शक्ति का केन्द्र बन गया।
➣ रजिया को अपदस्थ करने वाले षड्यंत्र में उसने भाग लिया। उसने नासिरुद्दीन महमूद को गद्दी पर बैठाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस काल में वह काफी प्रभावशाली बन चुका था। नासिरुद्दीन की मृत्यु के बाद बलबन दिल्ली का सुल्तान बना।
| शासनकाल | बलबन का पद |
|---|---|
| रज़िया सुल्तान | अमीर-ए-शिकार |
| मुइज़ुद्दीन बहरामशाह | अमीर-ए-आखूर |
| अलाउद्दीन मसूद | अमीर-ए-हाजिब |
| नसीरूद्दीन महमूद | अमीर-ए-हाजिब व नाइन |
➣ अगस्त 1249 ई. को बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरूद्दीन से कर दिया और सुल्तान ने उसे उलूग खां की उपाधि प्रदान की।
➣ 1266 ई. में नसिरुद्दीन की मृत्यु के उपरान्त अमीर सरदारों के सहयोग से ग़यासुद्दीन उपाधि धारण कर दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठा। इस प्रकार वह इल्बारि जाति का द्वितीय शासक बना।
➣ पालम बावली लेख (रचनाकार योगेश्वर पंडित) में बलबन को विष्णु का अवतार बताया गया तथा यह लिखा है कि राजा के सुशासन के कारण भगवान विष्णु समस्त चिन्ताओं को त्यागकर क्षीर सागर में शान्तिपूर्ण शयनरत हैं।
➣ गढ़मुक्तेश्वर लेख में बलबन को खलीफा का सहायक कहा गया है।
शासन-नीति
➣ बलबन जातीय श्रेष्ठता में विश्वास रखता था। इसीलिए उसने अपना संबंध फ़िरदौसी के शाहनामा में उल्लिखित तुरानी शासक के वंश अफ़रासियाब से जोड़ा और अपने पौत्रों का नामकरण मध्य एशिया के ख्याति प्राप्त शासक कैखुसरो, कैकुबाद इत्यादि के नाम पर किया। गढ़मुक्तेश्वर अभिलेख मे बलबन को खलीफा का सहायक कहा गया है।
➣ उसने प्रशासन में सिर्फ़ कुलीन व्यक्तियों को नियुक्त किया। उसका कहना था कि जब मै किसी तुच्छ परिवार के व्यक्ति को देखता हूँ तो, मेरे शरीर की प्रत्येक नाड़ी उत्तेजित हो जाती है।
➣ बलबन ने इल्तुतमिश द्वारा स्थापित 40 तुर्की सरदारों के दल का क्रूर तरीके से दमन किया तथा तुर्क अमीरों को शक्तिशाली होने से रोका।
➣ बदायूँ के गवर्नर बकबक को जनता के सामने कोड़ों से पिटवाया, अवध के शासक हैवात खाँ के भी 500 कोड़े लगवाये तथा बंगाल के तुगरिल से पराजित होने पर अमीन खाँ को अयोध्या के फाटक पर लटकवा दिया।
➣ दरबार में शराब, नृत्य एवं संगीत बन्द करवा दिया तथा दरबारियों को विशेष वस्त्र (ड्रेस कोड) पहनने का आदेश दिया। दरबार में हंसी-मजाक भी बन्द करवा दिया।
➣ अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए दरबार में गैर इस्लामी प्रथाओं की शुरुआत की, जैसे सिजदा/जमीनबोसी सिजदा (घुटने के बल बैठकर सुल्तान के समक्ष सिर झुकाना) और पायबोस (सुल्तान के पैर चूमना) जैसी ईरानी (फारसी) प्रथाएं एवं नौरोज का त्यौहार (ईरानी त्यौहार) मनाना आरम्भ किया।
➣ बलबन ने अपने विरोधियों की समाप्ति के लिए लौह व रक्त की नीति (खून का बदला खून) का अनुपालन किया। इस नीति के अन्तर्गत विद्रोही व्यक्ति की हत्या कर उसकी स्त्री एवं बच्चों को दास बना लिया जाता था।
➣ बलबन ने राज्य में दैवीय राजत्व का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इसके अनुसार,बलबन ने स्वयं नियाबत-ए-खुदाई (ईश्वर का प्रतिनिधि) तथा जिल्ले-ए-इलाही (ईश्वर की छाया) बताया।
➣ बलबन ने अपने पुत्र बुगरा खाँ को कहा कि राजा में देवत्व का अंश होता है। उसकी समानता कोई मनुष्य नहीं कर सकता।
➣ बलबन से पहले उलेमाओं का राजनीति में बड़ा महत्त्व था। लेकिन बलबन के सत्ता में आने के बाद उसने उनके दबाव एवं अनावश्यक हस्तक्षेप को खत्म करने के लिये उनसे सलाह लेना बंद कर दिया। धीरे-धीरे उनके राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक लगा दी गई।
➣ बलबन ने उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति में उच्च वंशावली को महत्व दिया एवं उलेमा को उलमा ए अखिरत तथा उलमा ए दुनिया में वर्गीकृत किया और उलमा ए अखिरत की प्रशंसा की।
➣ बलबन के समय वजीर का महत्व घट गया व नाइव का पद समाप्त हो गया। बलबन का वजीर ख्वाजा हसन बसरी था, किन्तु वह अधिक प्रभावी न बन सका क्योंकि बलबन के काल में वजीर की शक्तियाँ निम्नतम बिन्दु पर जा पहुँची।
➣ बलबन दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने अपना वसैय्या (वसीयत) घोषित किया। वसैय्या को बरनी ने संकलित किया।
➣ बलवन ने 1279 ई. में ख्वाजा नामक दीवानी अधिकारी को नियुक्त किया जो इक्तादारों पर नियंत्रण रखता था एवं उनकी आय का आकलन करता था तथा लेखा रिकॉर्ड रखता था। बलबन ने इक्ता को अपने उत्तराधिकारियों को स्थानांतरित करने पर रोक लगा दी।
राजत्व का सिद्धांत
➣ ‘राजत्व’ से तात्पर्य उन सिद्धांतों, नीतियों तथा कार्यों से है, जिन्हें सुल्तान अपनी प्रभुसत्ता, अधिकार एवं शक्ति को स्पष्ट करने के लिये अपनाता था।
➣ के.ए. निजामी के अनुसार, बलवन दिल्ली सल्तनत का एकमात्र ऐसा सुल्तान है, जिसने राजत्व के विषय में विचार स्पष्ट रूप से रखे जो निम्न है-
• दैवीय सिद्धांत का समर्थन
• शाही वंशज होने का दावा
• ईरानी आदर्शों एवं परंपराओं का पालन
➣ बरनी ने तारीख-ए-फिरोजशाही में बलबन के राजत्व सिद्धान्त की विस्तृत विवेचना की है।
मंगोलों के प्रति नीति
➣ पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त पर मंगोल आक्रमण के भय को समाप्त करने के लिए बलबन ने एक सुनिश्चत योजना का क्रियान्वयन किया।
➣ वलवन ने सम्पूर्ण सीमान्त प्रदेश को दो भागों में विभाजित किया। सुनम, समाना एवं उच्छ के प्रान्त छोटे पुत्र बुगरा खाँ को तथा मुल्तान, सिन्ध व लाहौर को बड़े पुत्र मुहम्मद खाँ को सौंपे।
➣ उसने मंगोल आक्रमण से बचाव हेतु वित्त विभाग (दीवान-ए-विजारत) को सैन्य विभाग से अलग कर नये सैन्य विभाग (दीवान-ए-आरिज) की स्थापना की।
➣ इमादुलमुल्क को दीवान-ए-अर्ज के पद पर प्रतिष्ठित किया तथा सीमान्त क्षेत्र में स्थित क़िलों का पुननिर्माण करवाया एंव प्रत्येक क़िले में एक बड़ी संख्या में सेना रखी।
➣ बलबन की अच्छी सेना व्यवस्था का श्रेय इमादुलमुल्क को ही था। बलबन ने ही सर्वप्रथम सदैव तत्पर सेना रखने की प्रथा शुरू की थी।
➣ बलवन का बड़ा पुत्र मुहम्मद खाँ 1286 ई. में तैमूर खाँ के नेतृत्व में हुए मंगोल आक्रमण का सामना करते हुए मारा गया। शाहजादा मुहम्मद को बलवन ने शहीद की उपाधि दी।
प्रमुख विद्रोह
➣ अपने शासन काल में हुए एक मात्र बंगाल का तुर्क विद्रोह, जहाँ के शासक तुगरिल ख़ाँ वेग ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था, की सूचना पाकर बलबन ने अवध के सूबेदार अमीन ख़ाँ को भेजा, परन्तु वह असफल होकर लौटा।
➣ बंगाल की तत्कालीन राजधनी लखनौती को उस समय विद्रोह का नगर कहा जाता था। तुगरिल वेग को पकड़ने एवं उसकी हत्या करने का श्रेय मलिक मुकद्दीर को मिला,मुकद्दीर की सफलता से प्रसन्न होकर बलबन ने उसे तुगरिलकुश (तुगरिल की हत्या करने वाला) की उपाधि प्रदान की।
➣ इसके अतिरिक्त बलबन ने मेवातियों (अलवर) ,दोआव, अवध वकटेहर (बुन्देलखण्ड) में हुए विद्रोह का भी दमन किया तथा दोआब एवं पंजाब क्षेत्र में शान्ति स्थापित की।
➣ इस प्रकार अपनी शक्ति को समेकित करने के बाद बलबन ने भव्य उपाधि जिल्ले-इलाही धारण किया।
सेना का संगठन
➣ बलबन ने अपनी निरंकुशता कायम रखने के लिये सेना के संगठन की ओर ध्यान दिया। अयोग्य सैनिकों को पेंशन देकर सेवा मुक्त किया। इक्ताओं के पुनर्ग्रहण का आदेश दिया।
➣ बलवन ने दीवाने अर्ज (सैन्य विभाग) की स्थापना की व इमाद- उल-मुल्क (अहमद अयाज) को सेनाध्यक्ष नियुक्त किया।
➣ बलबन से पहले तुर्की सैनिकों को सेवा के बदले जागीर देने की प्रथा प्रचलित थी, जिस कारण अधिकांश भूमि बूढ़े सैनिकों, विधवाओं तथा नाबालिगों के अधिकार में थी।
➣ बलवन ने इन लोगों के जीवित रहने तक इस भूमि पर उनका अधिकार मान्य कर दिया। मृत्यु उपरांत ये भूमि राज्य के अधीनस्थ मानी गई।
गुप्तचर विभाग का संगठन
➣ बलवन की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने का श्रेय गुप्तचर विभाग को था। पहली बार बलवन ने ही गुप्तचर विभाग की स्थापना की।
➣ गुप्तचरों की नियुक्त बलबन स्वयं करता था और उन्हें पर्याप्त धन उपलब्ध कराता था। कोई भी गुप्तचर खुले दरबार में उससे नहीं मिलता था।
➣ गुप्तचर विभाग का नाम वरीद-ए-मुमालिक तथा गुप्तचर अधिकारी को बरीद कहा जाता था।
➣ गुप्तचरों द्वारा राज्य के महत्त्वपूर्ण समाचार सुल्तान के पास पहुँचते थे। जो गुप्तचर अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करता था, उसे कठोर दंड दिया जाता था।
➣ गुप्तचरों को नकद वेतन मिलता था, वे सीधे सुल्तान के नियंत्रण में होते थे।
न्याय व्यवस्था
➣ बलबन की न्याय व्यवस्था कठोर तथा गैर-पक्षपातपूर्ण थी। अपराधियों को वह वर्वरतापूर्वक दंड देता था।
➣ सुल्तान प्रमुख अपराधों से संबंधित मामलों का न्याय स्वयं करता था। वह न्याय करने में कभी भेदभाव नहीं करता था।
➣ उसकी शासन व्यवस्था का आधार रक्त एवं लौह की नीति थी, जिसके अंतर्गत विद्रोही व्यक्ति की हत्या कर उसकी स्त्री एवं बच्चों को दास बना लिया जाता था।
पदच्युत
➣ 1250 ई. में तुर्क सरदारों ने बलबन के विरुद्ध एक षड़यंत्र रचा और बलबन को पदच्युत करवा दिया। बलबन के स्थान पर एक इमादुद्दीन रिहान की नियुक्ति हुई।
➣ पदच्युत होने के दो वर्षों के अन्दर ही बलबन अपने कुछ विरोधियों को जीतने में सफल हो गया। उसने पंजाब के एक बड़े क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करने वाले मंगोल लोगों से सम्पर्क स्थापित कर लिया।
➣ सुल्तान महमूद को बलबन के आगे आत्म समर्पण करना पड़ा और उसने रिहान को बर्ख़ास्त कर दिया गया। कुछ समय बाद रिहान पराजित हुआ और उसे मार दिया गया।
➣ अब उसने राजसी प्रतीक छत्र को भी ग्रहण कर लिया, पर इतना होने पर भी सम्भवतः तुर्क सरदारों की भावनाओं को ध्यान में रख वह सिंहासन पर नहीं बैठा।
➣ सुल्तान महमूद की 1265 ई. में मृत्यु हो गई। कुछ इतिहासकारों का मत है कि बलबन ने सुल्तान को ज़हर देकर मार दिया और सिंहासन के अपने रास्ते को साफ़ करने के लिए उसके पुत्रों की भी हत्या कर दी।
➣ 1286 ई. में बलबन का बड़ा पुत्र शाहज़ादा मुहम्मद मंगोल सेना से घिर जाने के कारण युद्ध करते हुए मारा गया।
➣ अपने प्रिय पुत्र मुहम्मद की मृत्यु के सदमे को न बर्दाश्त कर पाने के कारण 80 वर्ष की अवस्था में 1286 ई. में बलबन की मृत्यु हो गई।
➣ बरनी के अनुसार, “बलवन की मृत्यु से दुःखी हुए मलिकों ने अपने वस्त्र फाड़ डाले और सुल्तान के शव को नंगे पाँव कब्रिस्तान ले जाते समय अपने सिर पर धूल फेंके और 40 दिन का उपवास किया।”
➣ मुत्यु पूर्व बलबन ने अपने दूसरे पुत्र बुगरा ख़ाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के आशय से बंगाल से वापस बुलाया, किन्तु विलासी बुगरा ख़ाँ ने बंगाल के आराम-पसन्द एवं स्वतन्त्र जीवन को अधिक पसन्द किया और बंगाल वापस चला गया।
➣ तदुपरान्त बलबन ने अपने पौत्र (मुहम्मद का पुत्र) कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी चुना।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार के.ए. निजामी ने बलबन का उल्लेख एक अभिनेता के रूप में किया। के.ए. निजामी ने कहा है कि बलबन एक उत्तम अभिनेता था और अपने दर्शकों को आधुनिक फिल्मी सितारों की भांति मंत्र मुग्ध रखता था।
➣ डॉ. ए.वी. हबीबुल्ला ने बलबन के शासनकाल को सुदृढ़ता का युग कहते हुए उसके लिए ‘Cosnalidation’ शब्द का प्रयोग किया।
कैकुबाद (1287-1290ई.)
➣ बलवन की इच्छा अपने ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने की थी, परंतु बलबन के जीवनकाल में ही वह मंगोलों से संघर्ष करता हुआ मारा गया।
➣ अतः, बलबन ने मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया; परंतु मृत शक्तिशाली सुल्तान की यह इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी।
➣ सुल्तान के मरते ही उसके अमीर पुनः सक्रिय हो उठे। उन लोगों ने कैखुसरो को मुल्तान भेज दिया एवं उसकी जगह पर बुगरा खां के अल्पायु पुत्र कैकुबाद को सुल्तान घोषित कर दिया
➣ कैकुबाद को सुल्तान बनाने में दिल्ली के कोतवाल मलिक फखरूद्दीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसी के प्रयासों से अल्पायु कैकुबाद सुल्तान बन सका।
➣ सुल्तान को बहलाकर कैखुसरो की भी हत्या करवा दी। इस समय बलबन का पुत्र बुगरा खां (सुल्तान का पिता) बंगाल पर नासिरूद्दीन के रूप में स्वतंत्र शासक के रूप में शासन कर रहा था।
➣ कैकुबाद ने ग़ैर तुर्क सरदार जलालुद्दीन ख़िलजी को अपना सेनापति बनाया, जिसका तुर्क सरदारों पर बुरा प्रभाव पड़ा। तुर्क सरदार बदला लेने की बात को सोच ही रहे थे कि, कैकुबाद को लकवा मार गया।
➣ अफ़्रीकी यात्री इब्नबतूता ने कैकुबाद के समय में यात्रा की थी, उसने सुल्तान के शासन काल को एक बड़ा समारोह की संज्ञा दी।
क्यूमर्स (1290 ई.)
➣ तुर्की अमीरो ने कैकुबाद के नाबालिक पुत्र क्यूमर्स को गद्दी पर बिठाया। जलालुद्दीन उसका संरक्षक नियुक्त हुआ। इस दौरान कैकुबाद की भी हत्या कर यमुना नदी में फेक दिया गया।
➣ क्यूमर्स (शम्सुद्दीन) के साथ दिल्ली से बहारपुर चला गया।
➣ इससे तुर्की अमर आशंकित हो गए। उन लोगों ने कैमूर्स के साथ जलालुद्दीन को दिल्ली आने का आदेश दिया। दिल्ली की जनता भी नन्हें सुल्तान के अपहरण से जलालुद्दीन का विरोधी बन बैठी।
➣ यद्यपि जलालुद्दीन ने अनेक विरोधियों को मार डाला, तथापित जन-प्रतिरोध का ध्यान रखते हुए उसने क्यूमर्स को गद्दी पर सुल्तान के रूप में प्रतिष्ठित किया और स्वयं उसका संरक्षक बना रहा।
➣ कालान्तर में जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने उचित अवसर देखकर शम्सुद्दीन का वध कर दिया और स्वयं सुल्तान बन गया। इस प्रकार इल्बारी तुर्को का शासन समाप्त हुआ और खिलजी-वंश की सत्ता स्थापित हुई।
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