शम्शी वंश (1210-1266 ई.) : इल्तुतमिश, रज़िया एवं उत्तराधिकारी

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत शम्शी वंश (1210-1266 ई.)
📚 विषय सूची
शासक (शासनकाल) महत्वपूर्ण तथ्य
इल्तुतमिश (1211-1236 ई.) दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है; चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल चलाया।
रुक्नुद्दीन फिरोजशाह (1236 ई.) इल्तुतमिश का पुत्र; विलासी प्रवृत्ति के कारण अल्पकाल में ही पदच्युत हुआ।
रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.) दिल्ली सल्तनत की प्रथम एवं मध्यकालीन भारत की पहली मुस्लिम महिला शासक थी।
मुइजुद्दीन बहरामशाह (1240-1242 ई.) चहलगानी (तुर्की अमीरों) के प्रभाव में शासन किया, जिससे केंद्रीय सत्ता कमजोर रही।
अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-1246 ई.) अयोग्य शासन के कारण तुर्की अमीरों द्वारा गद्दी से हटा दिया गया।
नासिरुद्दीन महमूद (1246-1266 ई.) धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था; वास्तविक सत्ता उसके नायब बलबन के हाथों में रही।

शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211-1236 ई.) : दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

➣ इल्तुतमिश का अर्थ है- साम्राज्य का स्वामी। इल्तुतमिश या अलमश इल्वरी तुर्क था। उसका पिता ईलाम खां इल्बरी जनजाति का सरदार था। इल्तुतमिश शम्शी वंश का था इसलिए नये वंश का नाम शम्शी वंश पड़ा।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को खरीदने की इच्छा प्रकट की तो गौरी ने दासों के व्यापारी को आज्ञा दी कि वह इल्तुतमिश को दिल्ली ले जाए। 1197 ई. में ऐबक ने इल्तुतमिश को ख़रीदा लिया।

➣ मुहम्मद गोरी ने 1206 ई. में खोखरों के विद्रोह के समय इल्तुतमिश की असाधारण योग्यता के कारण गौरी ने ऐबक को आदेश दिया की उसे दासता से मुक्त कर दे और उसे अमीरन-उल-उमरा की उपाधि दी।

➣ दिल्ली में इल्तुतमिश शीर्घ ही कुतुबुद्दीन ऐबक का विश्वासपात्र बन गया। उसे सर-ए-जहाँदार (शाही अंगरक्षकों को सरदार) नियुक्त किया गया।

➣ इल्तुतमिश की प्रशासनिक क्षमता से प्रभावित हो कर कतुबुद्दीन ने उसे अन्य प्रशासनिक पद भी सौंपे। उसे अमीर-ए-शिकार का पद दिया गया। तदोपरान्त उसे बरन (बुलन्दशहर) का इक्ता प्रदान किया।

➣ कालांतर में उसे बदायूं का प्रशासक नियुक्त किया गया। ऐबक ने अपनी एक पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया।

इल्तुतमिश को सुल्तान-ए-आजम’, ‘अमीर-उल-उमरा’, ‘ईश्वर की भूमि का रक्षक तथा ईश्वर के सेवकों का सहायक, सिक्कों का राजकुमार, गुलामो का गुलाम, मकबरों का पितामह, न्यायप्रिय शासक एंव भारत में तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।

➣ भारत में तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश ही था। भारत में मुस्लिम प्रभुसत्ता का वास्तविक शुभारंभ इल्तुतमिश से ही होता है।

राज्याभिषेक

➣ कुतुबद्दीन ऐबक की अकस्मात् मुत्यु के कारण वह अपने किसी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर सका। अतः लाहौर के तुर्क अधिकारियों ने कुतुबद्दीन ऐबक आरामशाह (विवादित पुत्र) को लाहौर की गद्दी पर बैठाया, किन्तु वह अयोग्य साबित हुआ

➣ फलस्वरूप तुर्को सरदारों ने कुतुबद्दीन ऐबक के दामाद इल्तुतमिश, जो उस समय बदायूँ का सूबेदार था, को दिल्ली आमंत्रित कर राज्यसिंहासन पर बैठा दिया और आरामशाह को बन्दी बनाकर बाद में उसकी हत्या कर दी गयी। इस तरह ऐबक वंश के बाद इल्बारी वंश का शासन प्रारम्भ हुआ।

फ़रवरी, 1229 में बग़दाद के ख़लीफ़ा (अल मुंत सिर बिल्लाह) से इल्तुतमिश को सम्मान में खिलअत एवं प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ। ख़लीफ़ा ने उसे सुल्तान-ए-आजम (महान शासक) की उपाधि भी प्रदान की।

➣ प्रमाण पत्र प्राप्त होने के बाद इल्तुतमिश वैध सुल्तान एवं दिल्ली सल्तनत एक वैध स्वतन्त्र राज्य बन गई। इस प्रकार वह दिल्ली का प्रथम शासक था जिसने सुल्तान उपाधि धारण कर स्वतन्त्र सल्तनत (18 फरवरी, 1229 ई.) को स्थापित किया।

➣ इस स्वीकृति से इल्तुतमिश को सुल्तान के पद को वंशानुगत बनाने और दिल्ली के सिंहासन पर अपनी सन्तानों के अधिकार को सुरक्षित करने में सहायता मिली। खिलअत मिलने के बाद इल्तुतमिश ने नासिर अमीर उल मोमिनीन की उपाधि ग्रहण की।

सर्वप्रथम इल्तुतमिश ने ही सुल्तान के पद को वंशानुगत बनाया था।

विद्रोह

➣ दिल्ली का सुल्तान बनते ही इल्तुतमिश को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय राजपूत विद्रोह कर रहे थे।

➣ कुवाचा ने भी अपनी शक्ति बढ़ाकर कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया था। जालौर, रणथंभौर, ग्वालियर तथा दोआव तुकों के हाथों से निकल चूका था।

➣ दिल्ली पर मंगोलों के आक्रमण का भय था। अतः इन समस्याओं को दूर करने की दिशा में इल्तुतमिश ने कई कठोर कदम उठाए, जो निम्न हैं-

➣ इल्तुतमिश ने सर्वप्रथम कुल्बी अर्थात् कुतुबद्दीन ऐबक के समय सरदार तथा मुइज्जी अर्थात् मुहम्मद ग़ोरी के समय के सरदारों के विद्रोह का दमन किया।

➣ इल्तुमिश ने इन विद्रोही सरदारों पर विश्वास न करते हुए अपने 40 ग़ुलाम सरदारों का एक गुट या संगठन बनाया, जिसे तुर्कान-ए-चिहालगानी का नाम दिया गया। इस संगठन को चरगान भी कहा जाता है। इसमें योग्य, विश्वसनीय और प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। इस दल को उसने राजत्व का एक अंग बना लिया।

➣ दिल्ली के अमीर इल्तुतमिश को सुल्तान के रूप में मान्यता देने के लिये तैयार नहीं थे। उन्होंने सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र रचना प्रारंभ कर दिया।

इल्तुतमिश ने अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए सबसे पहले इन्हीं दिल्ली स्थित षड्यंत्रकारी अमीरों का कड़ा दमन किया।

➣ उन्होंने विद्रोही अमीरों की शक्ति को कुचलते हुए उनके ठिकानों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और सैनिक जागीरदारों (इक्तादारों) को भी अपने अधीन कर लिया।

➣ 1215 से 1217 ई. के बीच इल्तुतिमिश को अपने दो प्रबल प्रतिद्वन्द्धी एल्दौज और नासिरुद्दीन क़बाचा से संघर्ष करना पड़ा। 1215 ई. में इल्तुतिमिश ने एल्दौज को तराइन के मैदान में पराजित किया।

1217 ई. में इल्तुतिमिश ने कुबाचा से लाहौर छीन लिया तथा 1228 में उच्छ पर अधिकार कर कुबाचा से बिना शर्त आत्मसमर्पण के लिए कहा।

➣ अन्त में कुबाचा ने सिन्धु नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस तरह इन दोनों प्रबल विरोधियों का अन्त हुआ।

प्रसिद्ध सूफी संत बहाउद्दीन जकारिया ने मुल्तान एवं सिंध विजय में कुबाचा के विरुद्ध इल्तुतमिश की मदद की थी।

➣ कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद अली मर्दान (गयासुद्दीन आज़म ख़िलजी ) ने बंगाल में अपने को स्वतन्त्र घोषित कर लिया तथा अलाउद्दीन की उपाधि ग्रहण की। किन्तु दो वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।

➣ इसके बाद उसका पुत्र हिसामुद्दीन इवाज उत्तराधिकारी बना। उसने ग़यासुद्दीन आजिम की उपाधि ग्रहण की तथा अपने नाम के सिक्के चलाए और खुतबा पढ़वाया।

1225 में इल्तुतमिश ने बंगाल में स्वतन्त्र शासक हिसामुद्दीन इवाज के विरुद्ध अभियान छेड़ा। इवाज ने बिना युद्ध के ही उसकी अधीनता में शासन करना स्वीकार कर लिया, पर इल्तुतमिश के पुनः दिल्ली लौटते ही उसने फिर से विद्रोह कर दिया।

➣ इस बार इल्तुतमिश के पुत्र नसीरूद्दीन महमूद ने 1226 ई. में लगभग उसे पराजित कर लखनौती पर अधिकार कर लिया।

➣ कलान्त्तर में नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के पश्चात मलिक इख्तियारुद्दीन बल्का ख़लजी ने बंगाल की गद्दी पर अधिकार कर लिया।

➣ अन्तत: 1230 ई. में इल्तुतमिश ने इस विद्रोह को दबाया। संघर्ष में बल्का ख़लजी मारा गया और इस बार एक बार फिर बंगाल दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया।

प्रमुख सैन्य अभियान

➣ शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने सल्तनत को आंतरिक अस्थिरता से उबारते हुए राजपूत राज्यों और अन्य क्षेत्रों में अपने विस्तार के लिए कई महत्वपूर्ण अभियान किए। अभियान मुख्य रूप से उत्तरी और मध्य भारत में सल्तनत की सत्ता को मजबूत करने तथा राजपूत शक्तियों को अधीन करने पर केंद्रित रहे।

1226 ई. में इल्तुतमिश ने रणथम्भौर पर सफल आक्रमण किया। उस समय रणथम्भौर के चौहान शासक वीर नारायण थे।

➣ इस विजय के साथ-साथ इल्तुतमिश ने जालौर के चौहान शासकों से अधीनता स्वीकार करवाई और बयाना, सांभर, अजमेर तथा नागौर जैसे महत्वपूर्ण स्थानों को अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया। इन विजयों से राजस्थान के बड़े हिस्से पर दिल्ली सल्तनत का नियंत्रण स्थापित हुआ।

1227 ई. में भूताला के युद्ध में इल्तुतमिश को मेवाड़ के गुहिलौत शासक रावल जैत्रसिंह (जैत्र सिंह) ने पराजित किया। इस युद्ध का विस्तृत वर्णन जयसिंह सूरी के नाटक हम्मीर मदमर्दन में मिलता है।

नागदा (मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी) पर इल्तुतमिश की सेना ने आक्रमण किया, लेकिन जैत्रसिंह की नेतृत्व वाली राजपूत सेनाओं ने उन्हें करारी हार दी। इस पराजय के कारण इल्तुतमिश गुजरात की ओर आगे बढ़ने में असफल रहे।

रणथम्भौर को जीतने वाले प्रथम सुल्तान इल्तुतमिश ही था, जिसने दिल्ली सल्तनत को राजस्थान में मजबूत उपस्थिति दिलाई।

1227 ई. में इल्तुतमिश ने परमार वंश की राजधानी मन्दौर (मांडव्यपुर) पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1231 ई. में उन्होंने ग्वालियर के किले पर लंबा घेरा डाला।

➣ ग्वालियर के परिहार शासक मंगलदेव (मलयवर्मन) ने सशक्त प्रतिरोध किया, लेकिन लगभग 11 महीने की घेराबंदी के बाद दिसंबर 1232 ई. में किला दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया।

➣ ग्वालियर को इल्तुतमिश ने अपने विश्वसनीय सेनापति मलिक नुसरतुद्दीन तैसी को सौंप दिया, जिन्हें आसपास के क्षेत्रों (जैसे सुल्तानकोट, बयाना आदि) का इक्ता भी प्रदान किया गया।

ग्वालियर विजय के उपलक्ष्य में इल्तुतमिश ने विशेष स्मारक सिक्के (टंका) जारी किए, जिनमें उनके नाम के साथ उनकी बेटी रजिया का नाम भी अंकित था।

1233 ई. में इल्तुतमिश ने चंदेल वंश के विरुद्ध सफल अभियान चलाया। इसके बाद 1234-35 ई. में उन्होंने उज्जैन और भिलसा (विदिशा) पर आक्रमण कर परमार क्षेत्रों में सल्तनत की पकड़ मजबूत की।

➣ हालांकि, इल्तुतमिश के सभी अभियान सफल नहीं रहे। नागदा के गुहिलौतों (मेवाड़) और गुजरात के चालुक्यों के विरुद्ध उनके आक्रमण विफल रहे। राजपूत राज्यों की पहाड़ी और रणनीतिक मजबूती के कारण ये क्षेत्र सल्तनत के पूर्ण नियंत्रण में नहीं आ सके।

➣ इल्तुतमिश का अंतिम अभियान बामियान (आधुनिक अफगानिस्तान) के विरुद्ध था। वहां के शासक सेफुद्दीन हसन (या कार्लुक शासक) पर आक्रमण करने जाते समय इल्तुतमिश बीमार पड़ गए। वे दिल्ली लौट आए, लेकिन 29 अप्रैल 1236 ई. (कुछ स्रोतों में 30 अप्रैल) को दिल्ली में उनकी मृत्यु हो गई।

मंगोल नेता चंगेज खां (1221ई.)

➣ इसके शासनकाल में मंगोल नेता चंगेज़ ख़ाँ के भय से भयभीत होकर ख्वारिज्म शाह का पुत्र जलालुद्दीन मुगबर्नी वहां से भाग कर पंजाब की ओर आ गया।

➣ चंगेज़ ख़ाँ उसका पीछा करता हुए लगभग 1220-21 ई. में सिंध तक आ पंहुचा।

➣ संभवतः चंगेज खां ने इल्ततुमिश के पास अपने दूत भेजे थे कि वह मंगबरनी की सहायता न करे, अतः इल्तुतमिश ने उसकी कोई सहायता न की और जब मंगबरनी भारत से चला गया, तो इस समस्या का समाधान हो गया।

➣ इस प्रकार भारत चंगेज खां के आक्रमण से बच गया वह यूरोप की तरफ मूड गया। चंगेज खाँ स्वयं को भगवान का अभिशाप कहता था।

सिक्के

➣ इल्तुतमिश पहला तुर्क सुल्तान था, जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलवाये। उसने सल्तनत कालीन दो महत्त्वपूर्ण सिक्के चाँदी का टका (लगभग 175 ग्रेन) तथा तांबे’ का जीतल चलवाया।

➣ इल्तुतमिश ने सिक्कों पर टकसाल के नाम अंकित करवाने की परम्परा को आरम्भ किया। टको पर टकसाल का नाम लिखने की परंपरा भारत में प्रचलित करने का श्रेय इल्तुतमिश को जाता है।

➣ सिक्कों पर इल्तुतमिश ने अपना उल्लेख ख़लीफ़ा के प्रतिनिधि के रूप में किया है। उसके सिक्कों पर शिव की नंदीचौहान घुड़सवार अंकित होते थे।

➣ ग्वालियर विजय के बाद इल्तुतमिश ने अपने सिक्कों पर कुछ गौरवपूर्ण शब्दों को अंकित करवाया, जैसे शक्तिशाली सुल्तान, साम्राज्य व धर्म का सूर्य, धर्मनिष्ठों के नायक के सहायक एंव अपनी पुत्री रजिया का नाम

➣ इल्तुतमिश ने इक्ता व्यवस्था का प्रचलन किया। इक्ता एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ भूमि है। यह भूमि इक्ता तथा इसे लेने वाले इक्तादार कहलाते थे। इक्ता व्यवस्था के अंतर्गत सभी सैनिकों व गैर-सैनिक अधिकारियों को नकद वेतन के बदले भूमि प्रदान की जाती थी।

विद्वान

➣ इल्तुतमिश ने मिनहाजुद्दीन सिराज, मलिक ताजुद्दीन दबीर एवं अमीर खुसरो के पिता सेफुद्दीन को संरक्षण प्रदान किया। उसके समय नासिरी, अबुबक्र बिन मुहम्मद रूहानीनूरूद्दीन मुहम्मद मुख्य विद्वान थे। नुरूद्दीन ने लुबाव-उल-अल्बाव को लिखा।

मिन्हाज-उल-सिराज ने इल्तुतमिश को महान् दयालु, सहानुभूति रखने वाला, विद्धानों एवं वृद्धों के प्रति श्रद्धा रखने वाला सुल्तान बताया है।

अवफी ने इल्तुतमिश के ही शासन काल में जिवामी-उल-हिकायत की रचना की थी। इसी पुस्तक में सर्वप्रथम चुम्बकीय कम्पास का उल्लेख मिलता है।

स्थापत्य निर्माण

➣ इल्तुतमिश को भारत में गुम्बद निर्माण का पिता/मकबरां शैली का जन्मदाता कहा जाता है। उसने सुल्तानगढ़ी मकबरा अपने पुत्र नासिरूद्दीन महमूद की कब्र पर निर्मित करवाया।

यह भारत का प्रथम मकबरा था, इसको स्थापित करने का श्रेय इल्तुतमिश को जाता है।

➣ इल्तुतमिश ने मुहम्मद गोरी की स्मृति में मदरसा-ए-मुइज्जी व अपने पुत्र की स्मृति में नासिरी मदरसा बनवाया था। सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण समकालीन साहित्य में दिल्ली को हजराते दिल्ली कहा गया है।

➣ सन 1199 ई. में कुतुबमीनार की नींव कुतुबुद्दीन ऐबक ने रखी थी किन्तु वह इसे पुरा नहीं कर सका इसका निर्माण कार्य पुरा करने का श्रेय इल्तुतमिश को जाता है।

➣ इल्तुतमिश के सबसे बड़े पुत्र नासिरूद्दीन महमूद की मृत्यु मंगोलों से लड़ते हुए 1229 ई. में ही हो गई थी। उसकी स्मृति में इल्तुतमिश ने मदरसा ए नासिरी का दिल्ली में निर्माण करवाया।

➣ इल्तुतमिश ने नागौर (राजस्थान) में अतारकिन का दरवाजा बनवाया। मदरसा ए मुइज्जी का निर्माण भी इल्तुतमिश ने दिल्ली एवं बदायूँ में करवाया।

➣ उल्लेखनीय है दिल्ली को राजधानी बनाने वाला प्रथम सुल्तान इल्तुतमिश ही था। इससे पूर्व राजधानी लाहौर थी।

➣ इल्तुतमिश की मृत्यु 30 अप्रैल, 1236 ई. में हुई। इल्तुतमिश का मक़बरा दिल्ली में स्थित है, जो एक कक्षीय मक़बरा है।

प्रमुख तथ्य

➣ इल्तुतमिश एक न्यायप्रिय शासक था। इब्नबतूता के अनुसार उसने अपने महल के सामने संगमरमर की 2 शेरों की मूर्तियां स्थापित करायी थी जिनके गले में घंटियां लटकी हुयी थी जिनको बजाकर कोई भी व्यक्ति न्याय मांग सकता था। न्याय चाहने वाला व्यक्ति लाल वस्त्र धारण करता था।

➣ डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार इल्तुतमिश निस्सन्देह ग़ुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक था।

➣ डॉ. के.ए. निजामी के अनुसार, “ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की रूपरेखा के बारे में सिर्फ दिमागी खाका बनाया था, इल्तुतमिश ने उसे एक व्यक्तित्व, एक पद, एक प्रेरणा शक्ति, एक दिशा व एक शासक वर्ग प्रदान किया।”

➣ मिनहाज सिराज के अनुसार ऐसा गुणवान, दयालु हृदय, विद्वानों एवं धर्मोपदेशकों का आदर करने वाला सुल्तान कभी सिंहासन पर नहीं बैठा।

➣ इल्तुतमिश के शासन का मुख्य आधार विदेशी मुसलमान थे। निजामुद्दीन जुनैदी इल्तुमिश का सबसे विश्वसनीय वजीर था, जो कि ताजिक (गैर तुर्क) था।

➣ इल्तुतमिश ने 1234-35 ई. में भिलसा में हिन्दू मन्दिर तथा मालवा में उज्जैन के महाकाल मन्दिर को लूटा एवं मन्दिर को ध्वस्त कर विक्रमादित्य की मूर्ति को दिल्ली लाया।

➣ इल्तुतमिश का आरिजे ममालिक इमादुल मुल्क (अहमद अयाज) नामक गुलाम था। इल्तुतमिश ने इस दास की योग्यता से प्रभावित होकर उसे रावत-ए-अर्ज की उपाधि से सम्मानित किया।

➣ इल्तुतमिश ने ईरानी (फारसी) राजतन्त्रीय परम्पराओं को ग्रहण किया व उन्हें भारतीय वातावरण के अनुकूल समन्वित किया। इल्तुतमिश ने आदाब उस सलातीन और मआसरे उस सलातीन जैसी ईरानी राजतंत्र से सम्बन्धित पुस्तकें अपने पुत्रों की शिक्षा के लिए बगदाद से मंगवाई।

फख्रे मुदब्बिर (फक्र-अल-दीन मोहम्मद बिन मंसूर मुबारक शाह) ने इल्तुतमिश के शासन काल में राजनयिक सिद्धान्त और राजकीय संघटन की कला एवं युद्ध कला पर फारसी भाषा में ‘आदाब-उल-हर्ब’ नामक प्रथम भारतीय मुस्लिम ग्रंथ तैयार किया।

➣ इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु (30 अप्रैल, 1236 ई.) के पूर्व अपना राज्य अपनी पुत्री रजिया को सौंपने की इच्छा व्यक्त की थी। इसका कारण यह था कि उसके योग्य और बड़े पुत्र, लखनौती के शासक, नासिरूद्दीन महमूद की मृत्यु हो चुकी थी तथा छोटा पुत्र रूकुनुद्दीन फिरोजशाह एक दुर्बल और अक्षम व्यक्ति था।

➣ दुर्भाग्यवश इल्तुतमिश की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। तुर्क अमीर एक स्त्री को राज्य करते हुए देखना अपना अपमान समझते थे। इसलिए तुर्की अमीरों ने उसके पुत्र रुकनुद्दीन को गद्दी पर बैठाया।

रुक्नुद्दीन फिरोजशाह (1236 ई.) : इल्तुतमिश का अयोग्य उत्तराधिकारी

➣ अनेक तुर्क अमीरों, फिरोजशाह की माता (शाहतुर्कान) और अनेक अक्तादारों ने षड्यंत्र कर रूकुनुद्दीन फिरोजशाह को 1236 ई. में सुल्तान घोषित कर दिया गया।

➣ फिरोजशाह सुल्तान तो बन गया, परंतु वह राज्य पर नियंत्रण नहीं रख सका। वास्तविक सत्ता उसकी माँ शाहतुर्कान के हाथों चली गई। जो कि एक क्रूर महिला थी।

➣ शाह तुकांन ने इल्तुतमिश के परिवार के अन्य व्यक्तियों का दमन प्रारंभ दिया, जिससे असंतोष फैला और विद्रोह प्रारंभ हो गए। इल्तुतमिश के छोटे पुत्र कुतुबुद्दीन को अंधा करवाकर उसकी हत्या करवा दी गई।

फिरोजशाह को अपने भोग-विलास में लिप्त हो गया। प्रशासन पर नियंत्रण ढीला पड़ गया। जनता पर भी अत्याचार होने लगे। फलतः, पूरे राज्य में असंतोष एवं विद्रोह छा गया।

➣ दिल्ली में सुल्तान की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर रजिया सुल्तान लाल वस्त्र पहनकर (न्याय की मांग का प्रतीक) नमाज के अवसर पर जनता के सम्मुख उपस्थित हुई।

➣ उसने शाहतुर्कान के अत्याचारों एवं राज्य में फैली अव्यवस्था का वर्णन किया तथा आश्वासन दिया कि शासक बनकर वह शांति एवं सुव्यवस्था स्थापित करेगी।

➣ रजिया से तुर्क अमीर और अन्य व्यक्ति प्रभावित हो उठे। कुद्ध जनता ने राजमहल पर आक्रमण कर शाहतुर्कान को गिरफ्तार कर लिया एवं रजिया को सुल्तान घोषित कर दिया।

फिरोजशाह जब विद्रोहियों से भयभीत होकर दिल्ली पहुंचा तब उसे भी कैद कर लिया गया और उसकी हत्या कर दी गई। नवंबर, 1236 ई. में रजिया सुल्तान के पद पर प्रतिष्ठित हो गई।

रजिया के मामले में पहली बार दिल्ली की जनता ने उत्तराधिकार के प्रश्न पर स्वयं निर्णय लिया था।

रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.) : दिल्ली सल्तनत की प्रथम एवं एकमात्र महिला शासक

➣ रजिया दिल्ली की प्रथमअन्तिम मुस्लिम महिला शासक थी। उसने सैनिक वेशभूषा धारण की, पर्दा प्रथा छोड़कर पुरूष वेशभूषा कुबा (कोट)कुलाहा (टोपी) पहनकर दरबार में बैठती थी।

➣ उसने हाथी पर चढ़कर जनता के बीच जाना शुरू कर दिया। रजिया घोड़े पर सवार होकर युद्ध के मैदान में जाती थी।

➣ रजिया ने अपने सिक्कों पर उमदत-उल-निस्वां का विरुद धारण किया।

➣ सिंहासन पर बैठते ही रजिया ने कूटनीति से काम लिया और अमीर वर्ग में फूट डाल दी। उसने इक्ताओं/अक्ताओं में फेरबदल कर अपने हिसाब से नियुक्तियाँ कीं।

मिन्हाज सिराज इल्तुतमिश द्वारा निर्मित मदरसा ए नासिरी का शिक्षक था। रजिया ने मिन्हाज को प्राचार्य बनाया। मुहजब-उद-दीन को वजीर एंव बलबन को अमीर-ए-शिकार का पद दिया।

➣ रजिया ने अबीसिनिया निवासी एक गुलाम मलिक जलालुद्दीन याकूत को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया और उसे अमीर-ए-आखुर अर्थात अश्वशाला प्रधान के पद पर नियुक्त कर दिया। इससे अमीर वर्ग (तुर्की अधिकारी) नाराज हो गए।

➣ भटिण्डा के सूबेदार अल्तूनिया ने विद्रोह कर याकूत की हत्या कर दी तथा रजिया को बन्दी बना लिया। रजिया ने कूटनीतिक दृष्टिकोण से अल्तूनिया से शादी कर ली।

➣ इन नियुक्तियों से खफा उसके एक अमीर अल्तुनिया, जिसे रज़िया ने तबरहिंद (भटिंडा) का इक्तादार नियुक्त किया था, ने विद्रोह कर दिया जिसमें अमीर वर्ग ने उसका साथ दिया।

➣ हालांकि बाद में रजिया ने कूटनीतिक सहारा लेकर अल्तुनिया को अपने साथ मिलाने के लिये उससे शादी कर ली।

➣ रजिया जब अमीरों के विद्रोह का दमन करने राजधानी से बाहर निकली तभी जलालुद्दीन याकूत को तुर्क अमीरों ने मारकर राजधानी में मुइजुद्दीन बहरामशाह को गद्दी पर बैठा दिया।

➣ जब रजिया, अल्तुनिया के साथ राजधानी वापस लौट रही थी, तभी रास्ते में कुछ षड्यंत्रकारी डाकुओं ने उनकी हत्या (14 अक्टूबर, 1240 ई.) कर दी।

व्यक्तित्व

➣ रजिया ने लगभग 3 वर्ष 6 माह शासन किया वह अत्यंत सफल शासिका थी, जिसने रुक्नुद्दीन फिरोजशाह के समय को बिगड़ी स्थिति को संभाला।

➣ रज़िया ने स्त्री होकर भी स्त्री होने की किसी दुर्बलता का परिचय नहीं दिया। वह योग्य, शिक्षित, दयालु, कर्त्तव्य-परायण, साहसी, कुशल सैनिक और योग्य सेनापति थी। वह कौशल युक्त और कूटनीतिज्ञ भी थी।

➣ ऐसा माना जाता है कि रजिया के पतन में उसका स्त्री होना था। मिनहाज लिखता है- भाग्य ने उसे पुरुष नहीं बनाया, वरना उसके समस्त गुण उसके लिये लाभप्रद हो सकते थे। रजिया में वे सभी प्रशंसनीय गुण थे जो एक सुल्तान में होने चाहिये।

➣ एलफिंस्टन के अनुसार, यदि रजिया स्त्री न होती तो उसका नाम भारत के महान शासकों में लिया जाता।

मुईजुद्दीन बहरामशाह (1240-1242 ई.) : तुर्क अमीरों के प्रभाव में शासन करने वाला सुल्तान

➣ रजिया के पश्चात 1240 ई. में बहरामशाह सुल्तान बना, परंतु वह कुछ वर्षों तक ही गद्दी पर रह सका। वह नाममात्र का सुल्तान था। राज्य की वास्तविक शक्ति का सचालन चालीस गुलामों का दल ही करता था।

➣ शासक पर अपनी पकड़ बनाए रख के लिए तुर्की अमीरों ने नाइब अर्थात नायब-ए-मुमलकत (संरक्षक) का पद बनाया और उस पर सर्वप्रथम मलिक इख्तियारुद्दीन एतगीन को नियुक्त किया गया।

➣ कालान्तर में इख्तियारुद्दीन एतगीन की शक्ति इतनी बढ़ गई कि, उसने अपने महल के सामने सुल्तान की तरह नौबत एवं हाथी रखना आरम्भ कर दिया था, उसकी बढ़ती से आशंकित होकर बहरामशाह ने उसकी हत्या करवा डाली।

➣ एतगीन की हत्या के पश्चात बदरूद्दीन सुंकर रूमी ने नायब के अधिकार प्राप्त कर लिए। उसने बहराम की हत्या का षड्यंत्र रचा, सुल्तान की हत्या हेतु षडयंत्र रचने के कारण उसकी एवं सरदार सैयद ताजुद्दीन की हत्या कर दी गई।

➣ इन हत्याओं से तुर्की अमीर भयभीत हो उठे। उन लोगों ने सुल्तान को पदच्युत करने का षड्यंत्र रचा।

1241 ई. में मंगोल आक्रमणकारियों द्वारा पंजाब पर आक्रमण के समय रक्षा के लिए भेजी गयी सेना को बहरामशाह के विरुद्ध भड़का दिया गया।

➣ सेना वापस दिल्ली की ओर मुड़ गई और मई, 1241 ई. में तुर्क सरदारों ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर बहरामशाह का वध कर दिया।

➣ अमीर तुर्क सरदारों ने बहरामशाह के पौत्र अलाउद्दीन मसूद को अगला सुल्तान बना दिया।

अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-1246 ई.) : चहलगानी के नियंत्रण में शासन करने वाला शासक

➣ अलाउद्दीन मसूदशाह रूकुनुद्दीन फिरोज शाह का पुत्र व इल्तुतमिश का पौत्र था। मसूदशाह भी एक दुर्बल और अयोग्य व्यक्ति था। वह नाममात्र का शासक था।

➣ इसके समय में नाइब का पद ग़ैर तुर्की सरदारों के दल के नेता मलिक कुतुबुद्दीन हसन को मिला क्योंकि अन्य पदों पर तुर्की सरदारों के गुट के लोगों का प्रभुत्व था, इसलिए नाइब के पद का अब कोई विशेष महत्त्व नहीं रह गया था।

➣ शासन का वास्तविक अधिकार वज़ीर मुहाजबुद्दीन के पास था, जो जाति से ताजिक (ग़ैर तुर्क) था। तुर्की सरदारों के विरोध के परिणामस्वरूप यह पद नजुमुद्दीन अबू बक्र को प्राप्त हुआ। इसी के समय में बलबन को हाँसी का अक्ता प्राप्त हुआ।

➣ शासन का वास्तविक सत्ता वजीर मुहाजुबुद्दीन के हाथों में थी जो एक ताजिकस्तान का गैर-तुर्क था। धीरे-धीरे बलबन ही सबसे प्रमुख व्यक्ति बन गया।

मसूदशाह के समय में पुनः मंगोलों का आक्रमण हुआ। 1245 ई. में मंगोलों ने उच्छ पर अधिकार कर लिया। बलबन ने अपनी सैनिक प्रतिभा के बल पर मंगोलों को मार भगाया एव उच्छ पर पुनः अधिकार किया।

➣ बलबन के इस कार्य से जहां उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ी, वहीं अमीरों में सुल्तान मसूदशाह के प्रति ईष्या की भावना भी पैदा हुई।

➣ अन्ततः बलबन ने नसीरूद्दीन महमूद एवं उसकी माँ से मिलकर अलाउद्दीन मसूद को सिंहासन से हटाने का षडयंत्र रचा।

➣ बलबन ने षड्यंत कर मसूदशाह को गद्दी से 10 जून, 1246 ई. को हटाकर कैद कर लिया। कैदखाने में ही उसकी मृत्यु हो गई और इल्तुतमिश के प्रपौत्र नसीरूद्दीन महमूद को अगला सुल्तान बनाया।

नासिरुद्दीन महमूद (1246-1266 ई.) : बलबन के संरक्षण में शासन करने वाला सुल्तान

10 जून, 1246 ई. में युवा नासिरूद्दीन महमूद शम्सी मलिकों द्वारा सुल्तान के पद पर प्रतिस्थापित किया गया। यह इल्तुतमिश का पुत्र था।

➣ उसने तुर्की अमीरों की शक्ति का अंदाज लगाकर सारी सत्ता चालीसा के सरगना और नायव बलबन के हाथों में सौंप दी। वह नाममात्र का शासक बनकर ही संतुष्ट हो गया। फलतः, तुर्की अमीरों और सुल्तान के बीच चलता आ रहा सत्ता का संघर्ष समाप्त हो गया।

➣ इस प्रकार महमूद का शासन तुलनात्मक दृष्टि से शांतिपूर्ण रहा। इस समय सुल्तान तथा सरदारों के मध्य संघर्ष नहीं हुए। वास्तव में यह काल बलबन की शांति निर्माण का काल था।

➣ कहा गया है कि सुल्तान नसिरुद्दीन महमूद महात्वाकांक्षाओं से रहित एक धर्मपरायण व्यक्ति था। वह क़ुरान की नकल करता था तथा उसको बेचकर जीविका चलाता था।

➣ नासिरूद्दीन स्वयं कहता था मैं राज्य के धन को स्वयं की विलासिता पर खर्च नहीं कर सकता, मैं केवल राज्य का ट्रस्टी हूँ।

अक्टूबर, 1246 ई. में नसिरुद्दीन महमूद ने बलबन को उलूग ख़ाँ की उपाधि प्रदान की और इसके तदुपरान्त उसे अमीर-हाजिब बनाया गया।

अगस्त, 1249 ई. में नसिरुद्दीन महमूद के साथ बलबन ने अपनी पुत्री नासिरूद्दीन का विवाह कर दिया। यह दिल्ली सल्तनत का एकमात्र सुल्तान जिसकी केवल एक पत्नी, बलबन की पुत्री, थी।

➣ बलबन की सुल्तान से निकटता एवं उसके बढ़ते हुए प्रभाव से अन्य तुर्की सरदारों ने नसिरुद्दीन महमूद की माँ के साथ एक दल बनाया, जिसका नेता रायहान को बनाया गया।

➣ 1253 ई. में इमादुद्दीन रेहान (रायहान) को बलबन के स्थान पर नायब बनाया गया। इमादुद्दीन रेहान के नेतृत्व में भारतीय मुस्लमानों का शासन सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया गया, जो असफल रहा।

➣ अन्ततः एक समझौते के तहत नसिरुद्दीन महमूद ने रायहान को नाइब के पद से मुक्त कर पुनः बलबन (1254 ई. में) को यह पद दे दिया। कुछ समय पश्चात् रायहान की हत्या कर दी गयी।

➣ इसके दरबार में मिन्हाज-ए-सिराज रहता था। इसके द्वारा रचित तबकात-ए-नासिरी ग्रंथ में नासिरूद्दीन महमूद के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

➣ मिनहाज ने नासिरूद्दीन को दिल्ली का आदर्श सुल्तान माना है। नासिरूद्दीन अपनी साधारण आदतों के कारण दरवेश राजा के नाम से जाना जाता था।

➣ नासिरूद्दीन के शासनकाल में हलाकू नामक मंगोल आक्रमणकारी ने भारत पर आक्रमण किया जिसको बलवन ने विफल किया था।

1266 ई. में नासिरूद्दीन की अचानक मृत्यु हो गयी। वह शस्सी वंश का अंतिम शासक था। इसका कोई पुत्र नहीं था इसलिए अगला शासक गियासुद्दीन बलबन बना जिसने बलवनी वंश की स्थापना की।

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