वैदिक कालीन धर्म ग्रन्ध
| ग्रंथ / साहित्य | परिचय / प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| ऋग्वेद | सबसे प्राचीन वेद, जिसमें 10 मंडल और 1028 सूक्त हैं। देवताओं की स्तुति, आर्यों के प्रारंभिक जीवन, समाज और संस्कृति की जानकारी मिलती है। |
| यजुर्वेद | यज्ञ और कर्मकांड से संबंधित वेद। इसमें यज्ञ की विधियाँ और मंत्र दिए गए हैं। इसके दो भाग हैं — कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। |
| सामवेद | संगीत और गायन प्रधान वेद, इसके अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। भारतीय संगीत का प्रारंभिक स्रोत माना जाता है। |
| अथर्ववेद | जादू-टोना, चिकित्सा, लोकजीवन और दैनिक जीवन से संबंधित वेद। इसमें रोग निवारण और तांत्रिक मंत्रों का उल्लेख मिलता है। |
| उपवेद | वेदों से संबंधित सहायक ज्ञान। आयुर्वेद (चिकित्सा), धनुर्वेद (युद्धकला), गंधर्ववेद (संगीत) और स्थापत्यवेद (वास्तुकला) प्रमुख हैं। |
| आरण्यक | वनों में रहकर अध्ययन हेतु रचित ग्रंथ। इनमें यज्ञों की दार्शनिक व्याख्या और आध्यात्मिक चिंतन मिलता है। |
| वेदांग | वेदों को समझने हेतु सहायक शास्त्र। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष — ये छह वेदांग हैं। |
| सूत्र | संक्षिप्त नियमात्मक ग्रंथ, जिनमें सामाजिक, धार्मिक और यज्ञ संबंधी नियम दिए गए हैं। श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र प्रमुख हैं। |
| ब्राह्मण ग्रंथ | वेदों की गद्यात्मक व्याख्या करने वाले ग्रंथ। इनमें यज्ञ, कर्मकांड और धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन मिलता है। |
| उपनिषद् | दार्शनिक ग्रंथ, जिन्हें वेदांत भी कहा जाता है। आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष और ज्ञान पर विशेष बल दिया गया है। |
| स्मृति साहित्य | सामाजिक और धार्मिक नियमों पर आधारित ग्रंथ। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि प्रमुख हैं। |
| पुराण | धार्मिक कथाओं, देवताओं, वंशावलियों और प्राचीन इतिहास का वर्णन करने वाले ग्रंथ। कुल 18 महापुराण प्रसिद्ध हैं। |
| षड्दर्शन | भारतीय दर्शन की छह प्रमुख शाखाएँ — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत। |
| रामायण | महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित महाकाव्य, जिसमें भगवान राम के जीवन और आदर्शों का वर्णन है। |
| महाभारत / जयसंहिता | महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य। प्रारंभिक नाम जयसंहिता था, बाद में महाभारत कहलाया। |
| श्रीमद्भगवद्गीता | महाभारत का भाग, जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद हैं। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का उपदेश दिया गया है। |
➣ भारत का सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ वेद है। वेद का अर्थ सम्भवत: ज्ञान प्राप्त करने से है, इन्हें सहिंता व श्रुति भी कहा जाता है।
➣ उत्तर वैदिक काल का इतिहास मुख्यतः वैदिक ग्रंथों पर आधारित है, जिनकी रचना ऋग्वैदिक काल के बाद, उत्तर वैदिक काल में हुई।
➣ सभी धार्मिक ग्रन्थों, जिन्हे उत्तर-वैदिक ग्रन्थ भी कहा जाता है , की रचना उत्तरी गंगा के मैदान में लगभग लगभग 1000-500 ई.पू. में हुई मानी गई है।
➣ उत्तर वैदिक काल में सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों की रचना हुई। इसमें सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है तथा सबसे नवीनतम वेद अथर्ववेद है।
➣ वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है।
➣ ऋग्वेद संहिता सबसे पुराना वैदिक ग्रन्थ में, प्रारम्भिक वैदिक काल का सर्वाधिक वर्णन मिलता है।
➣ प्रारम्भिक काल में एक ही वेद , ऋग्वेद था। एक ही वेद में अनेकों ऋचाएँ थीं, जो वेद-सूत्र कहलाते थे।
➣ ऋग्वेद के सूक्तो को गाया जा सके इस उद्देश्य से ऋग्वेद के सूक्तों को चुनकर इसे लयबद्ध किया गया और एक संशोधित संग्रह का उदय हुआ जिसे सामवेद कहा गया।
➣ उत्तर-वैदिक काल में दो और संकलन तैयार किए गए जिन्हें यजुर्वेद संहिता और अथर्ववेद संहिता के नाम से जाना गया।
➣ वेदों को चार भागों में विभाजित करने का श्रेय महर्षि कृष्ण-द्वैपायन को दिया गया है। वेदों का व्यास (विभाग) करने के कारण इनका नाम वेदव्यास पड़ा।
| वेद | सूक्त | प्रथम द्रष्टा | अध्येता | उपवेद |
|---|---|---|---|---|
| ऋग्वेद | 1028 मंत्र | पैल | होतृ | आयुर्वेद |
| यजुर्वेद | – | वैशम्पायन | अध्वर्यु | धनुर्वेद |
| सामवेद | 1875 मंत्र | जैमिनी | उदगाता | गंधर्व वेद |
| अथर्ववेद | 6000 मंत्र | सुमन्तु | ब्रह्म | शिल्पवेद |
ऋग्वेद : सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ
➣ ऋग्वेद भारत की ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की प्राचीनतम रचना है। इसकी तिथि 1500 से 1000 ई.पू. मानी जाती है।
➣ ऋग्वेद अर्थात् ऐसा ज्ञान, जो ऋचाओं में बद्ध हो। ऋग्वेद से आर्यों की राजनीतिक प्रणाली एवं इतिहास के बारे में सर्वाधिक जानकारी प्राप्त होती है।
➣ सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद में, 10 मंडल, 1028 सूक्त (11 बालखिल्या सूक्त मिलकर ) और 10,462 मंत्र या ऋचाएं है ऋचाओं के पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहा गया है।
➣ ऋग्वेद की लिपि ब्राह्मी है जिसकी रचना सम्भवत: सप्त-सैंधव प्रदेश में हुई थी।
➣ ऋग्वेद की पांच शाखायें हैं- शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन , मांडूकायन
➣ ऋग्वेद और ईरानी ग्रन्थ जेंद अवेस्ता में समानता पाई जाती है।
➣ चौथे मण्डल के तीन मंत्रों की रचना तीन राजाओं ने की है। त्रासदस्यु, अजमीढ़ तथा पुरमीढ़।
➣ ऋग्वेद के पहले व 10वें मंडल की रचना अंत में हुयी, जिन्हे क्षेपक भी कहा जाता है जबकि दूसरे से सातवे मडल प्राचीन माने जाते है जिसे वंश मंडल (एक ही ऋषि परिवार द्वारा रचे होने के कारण) कहा जाता है
➣ ऋग्वेद का पाठ करने वाले ऋषि को होतृ कहा जाता है जिसमे कई सूक्तों में विभिन्न वैदिक देवताओं की स्तुति करने वाले मंत्र हैं।
➣ ऋग्वेद में यातुधानों को यज्ञों में बाधा डालने वाला तथा पवित्रात्माओं को कष्ट पहुँचाने वाला कहा गया है।
➣ ऋग्वेद के मन्त्रों या ऋचाओं की रचना किसी एक ऋषि ने एक निश्चित अवधि में नहीं की, अपितु विभिन्न काल में विभिन्न ऋषियों द्वारा की गयी है।
➣ ऋग्वेद के 2वें से 8वें मंडल की रचनाएँ क्रमश वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, वामदेव, अत्रि, गृत्समद व कण्व या अंगिरस ने की।
➣ ऋग्वेद के तीसरे मंडल में गायत्री मंत्र का उल्लेख है, जो देवी सावित्री को समर्पित है जिसकी रचना महर्षि विश्वामित्र ने की। यह मंडल वरुण देवता को समर्पित है।
➣ ऋग्वेद के 10वें मंडल के पुरुष सूक्त में चार वर्णो का प्रयोग हुआ है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। यह वर्ण व्यवस्था उत्तर वैदिक काल की देन है।
➣ ऋग्वेद में लोपामुद्रा, अपाला , सिकता , घोषा आदि विदुषी महिला का तथा जंगल की देवी अरण्यनी का उल्लेख भी मिलता है
➣ इसमें लोपामुद्रा प्रमुख है जो क्षत्रिय वर्ण की थी इनका विवाह अगस्त्य ऋषि से हुआ था।
➣ ऋग्वेद में इन्द्र देवता के लिए 250 ऋचाएँ व अग्नि देवता के लिए 200 ऋचाएँ का उल्लेख किया गया है।
➣ ऋग्वेद में सरस्वती नदी नदीतम अर्थात् सर्वश्रेष्ठ नदी या सबसे पवित्र नदी कहा गया है। 10वें मड़ल में गंगा का एक बार व यमुना नदी का 3 बार उल्लेख है।
➣ ऋग्वेद में 25 नदियों का वर्णन मिलता है, जिसमें सर्वाधिक बार सिंधु नदी का वर्णन मिलता है। आर्यों की सबसे प्रमुख नदी सिंधु है।
➣ सर्वप्रथम स्तूप शब्द का प्रयोग ऋग्वेद ही मिलता है।
➣ ऋग्वेद में निम्न शब्दों का उल्लेख मिलता है-
| शब्द | उल्लेख |
|---|---|
| पिता | 335 |
| जन | 275 |
| इन्द्र | 250 |
| माता | 234 |
| अश्व | 215 |
| अग्नि | 200 |
| गौ (गाय) | 176 |
| विश | 170 |
| सोम देवता | 144 |
| विदथ | 122 |
| विष्णु | 100 |
| गण | 46 |
| ब्रज गोशाला | 45 |
| कृषि | 33 |
| वरुण | 30 |
| वर्ण | 23 |
| सेना | 20 |
| ब्राह्मण | 15 |
| ग्राम | 13 |
| वृहस्पति | 11 |
| राष्ट्र | 10 |
| क्षत्रिय | 9 |
| समिति | 9 |
| सभा | 8 |
| यमुना | 3 |
| रूद्र | 3 |
| वैश्य | 1 |
| गंगा | 1 |
| राजा | 1 |
| पृथ्वी | 1 |
ऋग्वेद के प्रमुख मण्डल व उनके रचयिता
| रचयिता | मण्डल |
| द्वितीय | गृत्समद भार्गव |
| तृतीय | विश्वामित्र (गायत्री मंत्र का उल्लेख) |
| चौथा | वामदेव (कृषि सम्बंधी प्रक्रिया) |
| पाँचवाँ | अत्रि |
| छठा | भारद्वाज |
| सातवा | वशिष्ठ |
| आठवा | कण्व ऋषि व अंगिरस |
| नौवाँ | पवमान अंगिरा (सोम का वर्णन) |
| दसवाँ | क्षुद्रसूक्तीय, महासूक्तीय |
यजुर्वेद : यज्ञ एवं कर्मकाण्ड
➣ यजुष शब्द का अर्थ है- यज्ञ। यर्जुवेद सम्बन्ध मूलतः कर्मकाण्ड से है। इसकी रचना कुरुक्षेत्र में मानी जाती है।
➣ इस वेद में अनेक प्रकार के यज्ञ व हवन को सम्पन्न करने की विधियों का उल्लेख है। यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है।
➣ यजुर्वेद दो भागों में विभाजित है कृष्ण यजुर्वेद व शुक्ल यजुर्वेद। जिसमे कृष्ण यजुर्वेद की रचना गद्य व शुक्ल यजुर्वेद की रचना पद्य में हुयी है।
➣ इस वेद में ही सर्वप्रथम राजसूय तथा वाजपेय यज्ञों का वर्णन मिलता है।
➣ यज्ञ में कहे जाने वाले गद्यात्मक मन्त्रों को यजुस तथा मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को अध्वुर्य कहा गया है।
➣ यजुर्वेद में हाथियों के पालने का उल्लेख है तथा कृषि व सिंचाई का उल्लेख मिलता है।
➣ यजुर्वेद का अन्तिम अध्याय ईशावास्य उपनिषयद है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिक चिन्तन से है।
➣ यजुर्वेद में 5 प्रकार के चावल का उल्लेख है – महाब्राहि, कृष्णव्रीहि, शुक्लव्रीही, आशुधान्य और हायन।
➣ शुक्ल यजुर्वेद की शाखा को वाजसनेय तथा कृष्ण यजुर्वेद की शाखा को आपस्तम्ब संहिता भी कहा जाता है।
➣ शुक्ल यजुर्वेद की मुख्य शाखायें है- माध्यन्दिन, काण्व तथा कृष्ण यजुर्वेद इसकी 4 शाखाएँ हैं- काठक, कपिष्ठल, मैत्रेयी ,तैत्तरीय संहिता।
सामवेद : संगीत प्रधान वेद
➣ साम समन धातु से निकला है, जिसका अर्थ है लय या ताल। इस प्रकार सामवेद से तात्पर्य उस ग्रंथ से है जिसके मंत्र गाये जा सकते हैं और जो संगीतमय हों। सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था।
➣ सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं। जिनमें 99 ऋचायें मूल है जबकि शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं।
➣ सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता है।
➣ सामवेद में मंत्रो का गायन करने वाले पुरोहित का उदगाता कहा जाता है। वेदगान में केवल तीन स्वरों के प्रयोग का उल्लेख है जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित कहलाते हैं।
➣ सामदेव की तीन महत्त्वपूर्ण शाखायें हैं- कौथुमीय, जैमिनीय एवंराणायनीय।
➣ सामवेद का प्रमुख देवता सविता या सूर्य है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं, इंद्र, सोम का भी उल्लेख है।
➣ भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे भारतीय संगीत का जनक माना जाता है।
अथर्ववेद : चिकित्सा एवं तंत्र-मंत्र
➣ अथर्ववेद सबसे नवीनतम वेद है। इस वेद की रचना सबसे बाद में हुई थी। जिसे ब्रह्मवेद भी कहा जाता है।
➣ इसकी रचना लगभग 1000 ई.पू. का माना जाता है। इसमें 20 अध्याय, 731 सूक्त व 6000 मंत्र हैं। मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्म कहा जाता था।
➣ अथर्ववेद की रचना अथवर्ण तथा आगिरस ऋषियों द्वारा की गयी है। इसलिए इसको अन्य नाम अधांगिरस वेद, भी कहा जाता है।
➣ अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा। पृथ्वीसूक्त इस वेद का अति महत्वपूर्ण सूक्त है। इस कारण इसे महीवेद भी कहते हैं।
➣ अथर्ववेद में याज्ञिक अनुष्ठानों का वर्णन नहीं मिलता। इस वेद के महत्त्वपूर्ण विषय-ब्रह्मज्ञान , औषधि ,रोग निवारण, तंत्र-मंत्र व जादू टोना आदि हैं।
➣ आयुर्वेद, चिकित्सा, औषधियों आदि के वर्णन होने के कारण भैषज्य वेद भी कहा जाता है।
➣ पृथ्वीसूक्त इस वेद का अति महत्त्वपूर्ण सूक्त है। इस कारण इसे महीवेद भी कहते हैं।
➣ 13 से 20 अध्याय तक में ब्रह्मांडीय सिद्धांत (13 कांड), विवाह प्राथनाएं (अध्याय14), अंतिम संस्कार के मंत्र (अध्याय 18) और अन्य मन्त्र व जादू टोना हैं।
➣ अथर्ववेद में राजा का चयन करने के कारण , सभा व समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
➣ राष्ट्रीय भावना का सुदृढ़ प्रतिपादन सर्वप्रथम इसी वेद में हुआ है। इनके उपनिषदों में- मुण्डकोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद् तथा माडूक्योपनिषद् मुख्य हैं।
➣ इस वेद की दो अन्य शाखायें हैं- पिप्पलाद, शौनक।
➣ अथर्ववेद में कुरू के राजा परीक्षित का उल्लेख मिलता है, जिसे मृत्युलोक का देवता बताया गया है।
उपवेद : अनुप्रयुक्त वैदिक ज्ञान
| वेद | उपवेद | प्रर्वतक | विवरण |
|---|---|---|---|
| ऋग्वेद | आयुर्वेद | प्रजापति | चिकित्सा शास्त्र |
| यजुर्वेद | धनुर्वेद | विश्वामित्र | युद्ध कला |
| सामवेद | गंधर्ववेद | नारद | कला एवं संगीत |
| अथर्ववेद | शिल्पवेद | विश्वकर्मा | भवन निर्माण कला |
आरण्यक : दार्शनिक ग्रंथ
➣ ऋषियों द्वारा जगल या एकांत में रचित ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है।
➣ आरण्यक में दार्शनिक सिद्धांतों और रहस्यवाद का उल्लेख मिलता है। जैसे , आत्मा, मृत्यु, जीवन आदि का।
➣ वर्तमान में उपलब्ध 7 प्रमुख आरण्यक ऐतरेय, तैत्तरीय, माध्यन्दिन, शंखायन, मैत्रायणी, तलवकार और वृहदारण्यक है।
| वेद | आरण्यक |
|---|---|
| ऋग्वेद | ऐतरेय , शांखायन या कौषीतकि |
| यजुर्वेद | बृहदारण्यक, मैत्रायणी, तैत्तिरीय |
| सामवेद | जैमनीयोपनिषद या तवलकार |
| अथर्ववेद | कोई आरण्यक नहीं |
➣ प्रस्थानत्रयी में तीन ग्रंथ- भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र और उपनिषद् सम्मिलित हैं।
वेदांग : वेदों की सहायक विद्याएँ
➣ वेदांगों की संख्या 6 बतायी गयी है- छंद (वेद के पैर), कल्प (वेद के हाथ), ज्योतिष (वेद के आँखे), निरुक्त (वेद के कान), शिक्षा (वेद की नासिका) तथा व्याकरण (वेद के मुख)।
➣ शिक्षा – वैदिक वाक्यों के स्पष्ट उच्चारण हेतु इसका निर्माण हुआ। वैदिक शिक्षा सम्बंधी प्राचीनतम साहित्य प्रातिशाख्य है।
➣ कल्प – वैदिक कर्मकाण्डों में अर्थात वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, का वर्णन किया गया है। इसकी शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र व शुल्व सूत्र।
➣ व्याकरण – समास एवं सन्धि के नियम, नामों एवं धातुओं की रचना, उपसर्ग एवं प्रत्यय आदि के का वर्णन हैं। पाणिनि की अष्टाध्यायी प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है।
➣ निरूक्त – शब्दों की व्युत्पत्ति एवं निर्वचन बतलाने वाले शास्त्र निरूक्त कहलातें है। यास्क ने निरूक्त की रचना की थी, जो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
➣ छन्द – वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, वृहती आदि छन्दों का प्रयोग किया गया है। पिंगल का छन्दशास्त्र प्रसिद्ध है।
➣ ज्योतिष – इसमें ज्योतिष शास्त्र के विकास को दिखाया गया है। इसकें प्राचीनतम आचार्य लगध मुनि है। शुल्व सूत्र ज्यामीतिय गणना से सम्बन्धित रचना है
| वेदांग | प्राचीनतम् ग्रंथ | ग्रन्थ | पर्वतक |
|---|---|---|---|
| शिक्षा | ध्वनिशास्त्र | ऋत् | शौनक |
| कल्पसूत्र | धार्मिक आचारशास्त्र | श्रौतसूत्र, गृह्य सूत्र धर्म सूत्र, शुल्व सूत्र | आश्वलायन बौधायन |
| ज्यातिष | खगोल विज्ञान | वेदांग ज्योतिष | लगध मुनि |
| व्याकरण | व्याकरण | अष्टाध्यायी | पाणिनी |
| निरुक्त | व्युत्पत्तिशास्त्र | निरुक्त | महर्षि यास्क |
| छद | मापसिद्धांत | छंद सूत्र | पिंगल ऋषि |
सूत्र : नियम एवं विधि ग्रंथ
इस साहित्य की रचना ई.पू. छठी शताब्दी के आस-पास शुरू हुई। सूत्र ग्रंथों को कल्प कहा जाता है। ऐसे सूत्र जिनमें विधि और नियमों का प्रतिपादन किया गया है, कल्पसूत्र कहलाते हैं। ये चार प्रकार के हैं:
- श्रौत सूत्र : यज्ञ संबंधी नियमों का उल्लेख
- गृह सूत्र : मनुष्यों के लौकिक तथा पारलौकिक कर्तव्यों से संबंधित
- धर्मसूत्र : धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कर्तव्यों का उल्लेख
- शुल्व सूत्र : यज्ञीय वेदियों को नापने, उनके स्थान-चयन तथा निर्माण आदि का वर्णन
ब्राह्मण ग्रंथ : वैदिक कर्मकाण्ड व्याख्या
➣ ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात् यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ, ब्राह्मण ग्रंथ कहे गये। जो गद्य में रचित थे
➣ ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय व कौषितकी, यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ तैतरीय व शतपथ, सामवेद के पंचविश, जैमनीय, षड्विश व ताण्ड्य और अथर्ववेद का एक मात्र ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ है।
➣ शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में स्त्री को पुरूष की अर्धागिनी कहा गया है एंव इसमें जल-प्रलय की कथा और पुरूरवा-उर्वशी आख्यान मिलता है।
➣ शतपथ ब्राह्मण की रचना याज्ञवाल्क्य ऋषि ने की जबकि पंचविश ब्राह्मण ग्रंथ की रचना तांडय ऋषि ने की।
➣ सामवेद का ब्रह्माण ग्रंथ षडविश जिसकी रचना अद्भुत ब्रह्माण ने की इसमें भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति के बारे में बताया गया है।
➣ शतपथ ब्राह्मण में महाजनी प्रथा का प्रथम बार उल्लेख हुआ है।
➣ आश्रम प्रणाली का सर्वप्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।
➣ शतपथ ब्राह्मण में एक स्थान पर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ कहा गया है।
➣ ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को कृपण अर्थात दुखों का स्रोत, कहा गया है।
➣ ओम शब्द का पहली बार उल्लेख कठोपनिषद में किया गया है।
➣ शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों क्रियाओं जुताई, बुआई, कटाई तथा मड़ाई का वर्णन मिलता है।
| वेद | ब्राह्मण |
|---|---|
| ऋग्वेद | ऐतरेय, शांखायन या कौषीतकि ब्राह्मण |
| शुक्ल यजुर्वेद | शतपथ ब्राह्मण |
| कृष्ण यजुर्वेद | तैत्तिरीय ब्राह्मण |
| सामवेद | पंचविंश या ताण्ड्य , षडविंश , सामविधान , वंश , मंत्र , जैमिनीय |
| अथर्ववेद | गोपथ ब्राह्मण |
| पूर्व | साम्राज्य-सम्राट |
| पश्चिम | स्वराज-स्वराट |
| उत्तर | वैराज्य-विराट |
| दक्षिण | भोज्य-भोज |
| मध्यदेश | राज्य-राजा |
उपनिषद् : आत्मा एवं ब्रह्म ज्ञान
➣ वैदिक काल के अन्त में 600 ई.पू. के आस-पास उपनिषदों का संकलन हुआ। इन दार्शनिक ग्रन्थों ने सही मत एवं ज्ञान के मूल्यों पर जोर दिया।
➣ उपनिषदों को वेदान्त (वेदों का अन्त) भी कहा जाता है। क्योंकि इनकी रचना वैदिक साहित्य के अंत में हुई।
➣ उपनिषदों की संख्या 108 है। उपनिषदों में स्पष्ट रूप से यज्ञों तथा कर्मकांडों की निंदा की गयी है।
➣ उपनिषद शब्द की व्युत्पत्ति उप (निकट), नि (नीचे), और षद (बैठो) से है जिसका अर्थ गुरू के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना।
➣ विश्व ईश्वर है तथा ईश्वर मेरी आत्मा है। यह दर्शन उपनिषद् नामक दार्शनिक ग्रंथ में मिलता है।
➣ प्रमुख उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, कौषीतकि, मुण्डक, प्रश्न, मैत्राणीय आदि। ये वेदों से सम्बंधित हैं।
➣ उपनिषद गद्य और पद्य दोनों में हैं, जिसमें प्रश्न, माण्डूक्य, केन, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और कौषीतकि उपनिषद गद्य में हैं तथा केन, ईश, कठ और श्वेताश्वतर उपनिषद पद्य में हैं।
➣ उपनिषदों को भारतीय दर्शन का स्रोत अथवा पिता माना जाता है।
➣ वृहदारण्यक उपनिषद में पुनर्जन्म के सिद्धांत का पहली बार उल्लेख किया गया।
➣ सर्वप्रथम जावालो उपनिषद में चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ , सन्यास ) का वर्णन मिलता है।
| आश्रम | आयु | कार्य | पुरुषार्थ |
|---|---|---|---|
| ब्रह्मचर्य | 0-25 | वेदों का अध्ययन , ज्ञान प्राप्ति | धर्म व ज्ञान |
| गृहस्थ | 25-50 | भौतिक सुखों का भोग करना | अर्थ व काम |
| वानप्रस्थ | 50-75 | विरक्त जीवन , ईश्वर का ध्यांन करना | अध्यात्म ज्ञान |
| सन्यास | 75-100 | गृहत्याग कर, तपस्या | मोक्ष |
➣ कठोपनिषद में यम-नचिकेता संवाद है। जबकि वृहदारण्यक उपनिषद में गार्गी-याज्ञवलक्य संवाद का उल्लेख मिलता है।
➣ निष्काम कर्म सिद्धांत का प्रथम प्रतिपादन इषोपनिषद में किया गया।
➣ सामवेद से सम्बंधित छान्दोग्य उपनिषद् में तत्वमसि का प्रथम उल्लेख है।
➣ सबसे बड़ा उपनिषद वृहदारण्यकोपनिषद् है जिसमें अश्वमेध यज्ञ का वर्णन किया गया है।
➣ छन्दोग्य उपनिषद में देवकी पुत्र कृष्ण का तथा श्वेतकेतू व उसके पिता का संवादउल्लेख मिलता है।
➣ भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है। मुण्डकोपनिषद् में शिक्षा के विषयों में वेदांगों को भी शामिल किया गया है।
➣ राजा की उत्पत्ति का सिद्धात का वर्णन सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।
| वेद | उपनिषद |
|---|---|
| ऋग्वेद | ऐतरेयोपनिषद |
| यजुर्वेद | बृहदारण्यकोपनिषद |
| शुक्ल यजुर्वेद | ईशावास्योपनिषद |
| कृष्ण यजुर्वेद | तैत्तिरीयोपनिषद, कठोपनिषद, श्वेताश्वतरोपनिषद, मैत्रायणी |
| सामवेद | वाष्कल, छान्दोग्य , केनोपनिषद |
| अथर्ववेद | माण्डूक्योपनिषद, प्रश्नोपनिषद, मुण्डकोपनिषद |
➣ 24 बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हल का उल्लेख काठक संहिता में मिलता है।
स्मृति साहित्य : सामाजिक एवं धार्मिक नियम
➣ स्मृतियों की रचना वेदों की रचना के बाद लगभग 500ई.पू.के लगभग हुई। मुख्यत: स्मृतियां 18 मानी गयी हैं।
➣ स्मृति कोई धार्मिक ग्रन्थ नहीं थे बल्कि ऋषियों द्वारा रचित साहित्य थे। जिसमे नई परिस्थिति को देखते हुए सरल माध्यम का प्रयोग किया गया था। जिससे समाज का मार्ग दर्शन हो सके।
➣ स्मृति का नाम मुख्यत: उसके रचनाकार के नाम पर हैं। जैसे- मनु द्वारा रचित स्मृति मनुस्मृति।
➣ मनुस्मृति सबसे प्राचीन और प्रथम स्मृति है, जिसका सम्बन्ध नियम-कानून से था।
➣ स्मृति साहित्य हिन्दू धर्म के धर्मग्रन्थों जैसे पुराण, स्मृति व धर्मशास्त्र का समूह है इसमें वेद या श्रुति नहीं आते।
➣ धर्मशास्त्र में रामायण, महाभारत, गीता, पुराण सम्मलित हैं जिनकी रचना लगभग 1000 ई.पू. के बाद हुई।
➣ मनु स्मृति शुंग काल या दूसरी सदी की प्रसिद्ध रचना है जबकि नारद स्मृति गुप्तकाल से सम्बन्धित है।
➣ प्रमुख स्मृतियां – मनु ,याज्ञवल्क्य ,अत्रि ,विष्णु ,हारीत ,औशनस ,अंगिरा ,यम ,कात्यायन ,बृहस्पति ,पराशर ,व्यास ,दक्ष ,गौतम ,वशिष्ठ ,आपस्तम्ब ,संवर्त ,शंख ,लिखित ,देवल ,तातप
| मनुस्मृति | ई.पू. 200-200 ई. |
| याज्ञवल्क्य स्मृति | 100 ई.से 300 |
| नारद स्मृति | 300 ई. से 400 ई. |
| पराशर स्मृति | 300 ई. से 500 |
| बृहस्पति स्मृति | 300 ई. से 600 ई. |
| कात्यायन स्मृति | 300 ई. से 600 ई. |
पुराण : पौराणिक कथाएँ
➣ पुरा का शाब्दिक अर्थ –पुराना अथवा प्राचीन , अण शब्द का अर्थ – कहना या बतलाना अर्थात् जो अतीत के तथ्यों, सिद्धांतों, शिक्षाओं, नीतियों, नियमों और घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करे।
➣ पुराण स्मृति के अंतर्गत आते हैं जिनकी रचना वेदो के बाद हुई।
➣ पुराणों के रचनाकार महर्षि लोमहर्ष व उनके पुत्र उगनवा थे।
➣ पुराणों की संख्या 18 है, इनमें सबसे प्राचीन व प्रामाणिक पुराण मत्स्य पुराण में विष्णु दशवतार का उल्लेख है।
➣ मत्स्य पुराण में आधंसातवहन वंश, विष्णु पुराण में मौर्य वंश, वायु पुराण में गुप्त वंश का वर्णन मिलता है।
➣ प्रमुख पुराण- विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, लिङ्ग पुराण, नारद पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण,
➣ गरुड़ पुराण, मार्कण्डेय पुराण, अग्नि पुराण, पद्म पुराण, भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, वराह पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण आदि।
षड्दर्शन : भारतीय दर्शन की शाखाएँ
➣ दर्शन-शास्त्र का सामान्य अर्थ है- देखने का माध्यम या साधन।
➣ षडदर्शन दर्शन शास्त्र से सम्बन्धित हैं जिसमे 6 दर्शन अधिक प्रसिद्ध और प्राचीन हैं।
➣ ये सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के नाम से विदित है। इन दर्शनों की रचना उत्तर बौद्ध काल में हुई।
➣ न्याय दर्शन भारत के छह वैदिक दर्शनों में से एक दर्शन है। न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
➣ वात्स्यायन (कामसूत्र ग्रन्थ के रचयिता ) ने न्याय को समस्त विद्याओं का प्रदीप कहा है।
| पूर्व मीमांसा | महिर्ष जैमिनी |
| वेदान्त (उत्तर मीमांसा) | महिर्ष बादरायण |
| सांख्य दर्शन | महिर्ष कपिल |
| वैशेषिक दर्शन | महिर्ष कणाद |
| न्याय दर्शन | महिर्ष गौतम |
| योग दर्शन | महिर्ष पतंजलि |
रामायण : श्रीराम का महाकाव्य
➣ रामायण एक धर्मशास्त्र है ,जिसका विश्लेषित रूप राम का अयन है, जिसका अर्थ है राम की यात्रा। जो त्रेतायुग से सम्बंधित है।
➣ रामायण की रचना संस्कृत भाषा में महर्षि वाल्मीकि ने की। जिस के कारण महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि भी कहा जाता है। इसका अन्य नाम बाल्मीकि रामायण भी मिलता है।
➣ रामायण संस्कृत भाषा में रचित सर्वप्रथम काव्य है। प्रथम काव्य होने के कारण इसे आदिकाव्य भी कहा जाता है। रामायण 500 ई.पू. के लगभग लिखी गयी।
➣ रामायण में मूलतः 6000 श्लोक थे, जो बढ़कर 12,000 और अंततः 24,000 हो गये। जिस कारण इसे चतुर्विशती साहस्त्री संहिता कहा गया।
➣ रामायण 7 काण्डों में विभक्त है। इन सात काण्डो के नाम – बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड (युदध्काण्ड) तथा उत्तरकाण्ड है। इनमें से सबसे बड़ा अध्याय बालकाण्ड तथा सबसे छोटा किष्किन्धाकाण्ड है।
➣ सन्त तुलसीदास ने श्रीराम की पवित्र कथा को देसी भाषा में लिपिबद्ध किया। इस ग्रंथ का नाम रामचरितमानस रखा। इसे तुलसी रामायण के नाम से भी जाना जाता है।
➣ तुलसीदास जी के अनुसार सर्वप्रथम श्रीराम की कथा भगवान शंकर ने पार्वती को सुनाई। जिसे अध्यात्म रामायण के नाम से जाना जाता है।
➣ रामायण का तमिल भाषा में अनुवाद कवि कम्बन ने तथा बांग्ला भाषा में कृतिवास ने किया।
➣ रामायण का फारसी भाषा में अनुवाद अकबर काल में अब्दुल कादिर बदायूंनी ने किया।
➣ रामायण का अंग्रेजी अनुवाद सर्वप्रथम आरटीएच ग्रिफिथ ने किया।
ज्ञातव्य हो रामायण की रचना महाभारत के बाद हुई है।
महाभारत / जयसंहिता : कुरुक्षेत्र युद्ध कथा
➣ हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक , इस ग्रन्थ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। यह विश्व का सबसे लम्बा साहित्यिक ग्रंथ है।
➣ जय संहिता नाम से ज्ञात महाभारत में 8800 श्लोक थे, जो बढ़कर 24,000 और अंततः एक लाख श्लोक हो गये। जिस कारण यह शतसाहस्री संहिता या महाभारत कहलाने लगा।
➣ चूँकि महाभारत में भरत के वंशजों (कौरवों-पांडवों का युद्ध ) की कथा का वर्णन मिलता है इसलिए इस ग्रन्थ को भारत भी कहा जाता है।
➣ इसके आलावा इसमें हरिवंश पुराण (हरि या विष्णु की वंशावली) और भगवद्गीता (ईश्वर का गीत) भी सम्मिलित है। हरिवंश पुराण में ही कृष्ण एवं गोपियों के प्रेम का वर्णन है।
➣ महाभारत में कुल 18 पर्व हैं – 1. आदि पर्व 2. सभा पर्व 3. वन पर्व 4. विराट पर्व 5. उद्योग पर्व 6. भीष्म पर्व 7, द्रोण पर्व 8. कर्ण पर्व 9. शल्य पर्व 10. सौप्तिक पर्व 11. स्त्री पर्व 12. शांति पर्व 13. अनुशासन पर्व 14. अश्वमेध पर्व 15. आश्रमवासी पर्व 16. मौसल पर्व 17, महाप्रस्थानिक पर्व 18. स्वर्गारोहण पर्व।
➣ महाभारत का तमिल भाषा में अनुवाद पेरून्देवनार ने भारतम् नाम से किया जबकि बांग्ला भाषा में अनुवाद अलाउद्दीन नुशरत शाह ने किया।
➣ महाभारत का फारसी अनुवाद रज्मनामा नाम से बंदायूनी व फैजी ने किया।
श्रीमद्भगवद्गीता : कर्मयोग एवं ज्ञानयोग
➣ यह महाभारत का एक अंश है। जो महाभारत के 6वें पर्व भीष्म पर्व से लिया गया है।
➣ श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध भूमि में जो उपदेश दिए थे। उन उपदेशों को भगवत गीता नामक ग्रंथ में संकलित किया गया है।
➣ इसमें 18 अध्याय व 700 श्लोक हैं। इसे उपनिषदों का सार कहा जाता है। उपनिषदों को गौ (गाय) और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है।
➣ इसमें मोक्ष प्राप्ति के 3 मार्गो-1. कर्म, 2. ज्ञान और 3. भक्ति का सुन्दर समन्वय है। भक्ति के सिद्धान्त को सबसे पहले गीता में ही स्पष्ट रूप से निरूपित किया गया है।
➣ गीता पर टीका लिखने वाले प्रमुख मध्यकालीन विद्वान्–शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मधुसूदन सरस्वती, सन्त ज्ञानेश्वर, आदि।
➣ आधुनिक काल में भारतीय कई राष्ट्रवादी नेताओं ने भगवद्गीता पर टीकाएँ लिखीं, जैसे-बाल गंगाधर तिलक (गीता रहस्य), अरविन्द घोष (एक्सेज ऑन द गीता), महात्मा गाँधी (भगवद्गीता) है।
➣ हिन्दुओं की गीता को मुस्लिमों के कुरान व ईसाइयों के बाइबिल के समतुल्य पवित्र धर्मग्रन्थ माना जाता है।
➣ श्रीमद् भागवत गीता का सर्वप्रथम अंग्रेजी अनुवाद चार्ल्स विलकिन्स ने 1785 में किया।
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