चार्टर एक्ट, 1833 : परिचय
➣ चार्टर एक्ट, 1833 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक ऐसा अधिनियम था, जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर का नवीनीकरण करने के साथ-साथ भारत में उसके प्रशासनिक और विधायी ढांचे में एक निर्णायक परिवर्तन किया।
➣ इसे मूल रूप से Government of India Act, 1833 कहा गया था, परंतु बाद में इसका शीर्षक बदलकर Saint Helena Act, 1833 रख दिया गया।
आधिकारिक उद्धरण – 3 & । 4 Will. 4, c. 85।
➣ इसे 28 अगस्त 1833 को शाही स्वीकृति मिली और यह 22 अप्रैल 1834 से प्रभावी हुआ। इसके अंतर्गत कंपनी के भारतीय क्षेत्रों तथा उनसे प्राप्त राजस्व को 30 अप्रैल, 1854 तक कंपनी के प्रशासन में बनाए रखने का प्रावधान किया गया।
➣ यह अधिनियम भारत के संवैधानिक इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक व्यापारिक संस्था से पूर्णतः एक प्रशासनिक संस्था में बदल दिया, बंगाल के गवर्नर-जनरल के स्थान पर गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया का पद स्थापित किया, तथा पहली बार पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने की शक्ति एक ही केंद्रीय प्राधिकरण – गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल – में केंद्रित की।
➣ इसी अधिनियम के साथ गवर्नर-जनरल की सरकार को पहली बार आधिकारिक रूप से गवर्नमेंट ऑफ इंडिया तथा उसकी परिषद् को इंडिया काउंसिल कहा जाने लगा।
चार्टर एक्ट, 1833 की पृष्ठभूमि
➣ चार्टर एक्ट, 1813 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के स्वरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन शुरू हो चुका था। 1813 के अधिनियम ने भारत के साथ कंपनी के सामान्य व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया, जबकि चाय तथा चीन के साथ व्यापार पर उसका एकाधिकार अभी बना रहा।
➣ इसके परिणामस्वरूप कंपनी का पारंपरिक व्यापारिक महत्व पहले की तुलना में कमजोर होने लगा और भारत में उसके राजनीतिक एवं प्रशासनिक कार्य अधिक महत्वपूर्ण होते गए।
1. कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार का अंत और मुक्त व्यापार का दबाव
➣ 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के विस्तार के साथ मुक्त व्यापार की विचारधारा मजबूत हो रही थी। ब्रिटिश व्यापारी और औद्योगिक वर्ग भारत जैसे विशाल बाजार में कंपनी के एकाधिकार के बिना व्यापार करने की अधिक स्वतंत्रता चाहता था।
➣ 1813 के बाद भारत का सामान्य व्यापार कंपनी के लिए आरक्षित नहीं रहा, जिससे उसके व्यापारिक अधिकार काफी सीमित हो गए।
➣ हालांकि चाय तथा चीन के साथ व्यापार पर उसका विशेषाधिकार बना रहा, लेकिन ब्रिटेन में मुक्त व्यापार के बढ़ते दबाव के कारण इस शेष एकाधिकार को भी लंबे समय तक बनाए रखना कठिन होता गया।
➣ इसलिए 1833 में कंपनी के चार्टर के पुनर्नवीनीकरण के समय मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं था कि कंपनी का चार्टर आगे बढ़ाया जाए, बल्कि यह भी था कि कंपनी को एक व्यापारिक संस्था के रूप में बनाए रखने का औचित्य कितना रह गया है। इसी प्रक्रिया में 1833 के अधिनियम ने कंपनी के व्यापारिक कार्य को पूरी तरह समाप्त कर दिया और उसके स्वरूप को प्रशासनिक संस्था के रूप में बदल दिया।
2. भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण और कानूनों में एकरूपता की आवश्यकता
➣ इस समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका था और बंगाल, मद्रास तथा बंबई जैसी प्रेसीडेंसियों के माध्यम से शासन संचालित किया जा रहा था।
➣ भारत में कंपनी के बढ़ते क्षेत्रीय विस्तार के साथ ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता महसूस होने लगी जिसमें अलग-अलग प्रेसीडेंसियों के बजाय एक अधिक केंद्रीकृत शासन-ढाँचा विकसित किया जा सके।
➣ इसी के साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कानून बनाने की अलग-अलग व्यवस्थाओं को अधिक व्यवस्थित करने की आवश्यकता भी सामने आई।
➣ ब्रिटिश शासन के विस्तार के कारण ऐसी केंद्रीय व्यवस्था की जरूरत बढ़ी जिसके माध्यम से व्यापक भारतीय क्षेत्रों के लिए एकरूप कानून बनाए जा सकें।
➣ इस दिशा में 1833 का अधिनियम महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसने प्रेसीडेंसियों की विधायी शक्तियों को सीमित करते हुए गवर्नर-जनरल इन काउंसिल के हाथों में केंद्रीय विधायी शक्ति को स्थापित किया।
3. 1833 में कंपनी के चार्टर का निर्णायक पुनर्गठन
➣ चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा कंपनी का चार्टर अगले 20 वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया था, इसलिए 1833 में उसके चार्टर के पुनर्नवीनीकरण का अवसर आया।
लेकिन 1813 और 1833 के बीच कंपनी की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुका था। उसका भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हो चुका था, ब्रिटेन में मुक्त व्यापार का दबाव बढ़ रहा था और भारत में अधिक केंद्रीकृत प्रशासन तथा विधायी एकरूपता की आवश्यकता स्पष्ट हो रही थी।➣ इसलिए 1833 का अधिनियम केवल कंपनी के पुराने चार्टर का सामान्य नवीनीकरण नहीं था। इसने ईस्ट इंडिया कंपनी के शेष व्यापारिक अधिकारों को भी समाप्त कर दिया और उसके भारतीय शासन को अधिक केंद्रीकृत स्वरूप प्रदान किया।
➣ इस प्रकार कंपनी का स्वरूप एक व्यापारिक संस्था से हटकर मुख्यतः प्रशासनिक एवं राजनीतिक संस्था में बदल गया।
➣ इस अधिनियम ने आगे चलकर भारत में केंद्रीय विधायी व्यवस्था के विकास की दिशा भी मजबूत की। इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1833 कंपनी के इतिहास के साथ-साथ भारत में प्रशासनिक और विधायी केंद्रीकरण के विकास का भी एक महत्वपूर्ण चरण बना।
चार्टर एक्ट, 1833 के प्रमुख प्रावधान
ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अधिकारों की पूर्ण समाप्ति
➣ चार्टर एक्ट, 1813 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हो चुका था, लेकिन कंपनी को अभी भी चाय के व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार पर विशेष एकाधिकार प्राप्त था। इस प्रकार 1813 के बाद भी कंपनी का व्यापारिक स्वरूप पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
➣ 1813 से 1833 के बीच ब्रिटेन में मुक्त व्यापार की विचारधारा और अधिक मजबूत हुई। ब्रिटिश व्यापारी एवं औद्योगिक वर्ग चाहता था कि भारत तथा चीन जैसे बड़े बाजारों में किसी एक कंपनी का एकाधिकार न रहे और ब्रिटेन के निजी व्यापारी स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकें। इस कारण ईस्ट इंडिया कंपनी के बचे हुए व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करने की मांग भी बढ़ती गई।
➣ इसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1833 ने ईस्ट इंडिया कंपनी के शेष व्यापारिक अधिकारों को भी समाप्त कर दिया। अब कंपनी को चाय के व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार पर भी कोई विशेष व्यापारिक एकाधिकार प्राप्त नहीं रहा। इस प्रकार कंपनी का भारत तथा पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने वाला व्यापारिक स्वरूप पूरी तरह समाप्त हो गया।
➣ इसका अर्थ यह नहीं था कि कंपनी समाप्त कर दी गई। कंपनी का राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकार भारत में बना रहा। परिवर्तन केवल इतना हुआ कि अब कंपनी भारत में मुख्यतः शासन और प्रशासन चलाने वाली संस्था के रूप में कार्य करेगी, न कि एक व्यापारिक संस्था के रूप में।
➣ कंपनी के व्यापारिक कार्य समाप्त होने के बाद उसके पास मौजूद व्यापारिक संपत्तियों, माल और परिसंपत्तियों को उसके प्रशासनिक कार्यों से अलग करने की आवश्यकता भी उत्पन्न हुई।
➣ कंपनी के व्यापारिक कारोबार को समाप्त करके उसकी संपत्ति एवं आय को भारत के प्रशासनिक दायित्वों के साथ जोड़ा गया। इस प्रकार कंपनी के आर्थिक स्वरूप में एक निर्णायक परिवर्तन आया।
➣ इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि ईस्ट इंडिया कंपनी का लगभग दो शताब्दियों से चला आ रहा व्यापारिक चरित्र समाप्त हो गया और वह भारत में मुख्यतः प्रशासन संचालित करने वाली संस्था बन गई।
➣ इसलिए चार्टर एक्ट, 1833 को कंपनी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। 1813 ने कंपनी के सामान्य व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करने की शुरुआत की थी, जबकि 1833 ने उसके बचे हुए व्यापारिक एकाधिकार को भी समाप्त करके कंपनी को मूलतः एक प्रशासनिक संस्था में परिवर्तित कर दिया।
गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया के पद की स्थापना
➣ चार्टर एक्ट, 1833 से पहले भारत में सर्वोच्च कार्यपालिका का पद बंगाल का गवर्नर-जनरल था। यद्यपि पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 और बाद के अधिनियमों द्वारा बंगाल के गवर्नर-जनरल को मद्रास तथा बंबई की प्रेसीडेंसियों पर महत्वपूर्ण मामलों में सर्वोच्चता प्रदान की गई थी, फिर भी इन प्रेसीडेंसियों की अपनी अलग-अलग सरकारें और गवर्नर बने हुए थे।
➣ भारत में कंपनी के क्षेत्रों का लगातार विस्तार होने के कारण यह आवश्यकता महसूस होने लगी कि पूरे ब्रिटिश भारत के लिए एक सुदृढ़ एवं केंद्रीकृत सर्वोच्च कार्यपालिका हो। अलग-अलग प्रेसीडेंसियों की प्रशासनिक व्यवस्थाओं के कारण नीतियों में अंतर और कभी-कभी समन्वय की समस्या उत्पन्न होती थी। इसलिए भारत के शासन को अधिक एकीकृत बनाने की आवश्यकता बढ़ रही थी।
➣ इसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1833 ने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए बंगाल के गवर्नर-जनरल के पद को समाप्त करके उसके स्थान पर गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया का पद स्थापित किया। अब यह अधिकारी केवल बंगाल का नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटिश भारत का सर्वोच्च कार्यपालिका प्रमुख माना गया।
➣ इस पद पर नियुक्त व्यक्ति को भारत के सभी ब्रिटिश क्षेत्रों के नागरिक एवं सैन्य प्रशासन पर व्यापक नियंत्रण प्रदान किया गया। इस प्रकार भारत के विभिन्न हिस्सों में शासन चलाने वाली प्रेसीडेंसियों के ऊपर एक अधिक स्पष्ट एवं केंद्रीकृत सर्वोच्च सत्ता स्थापित हो गई।
➣ इस परिवर्तन के साथ मद्रास और बंबई के गवर्नरों की स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति भी पहले की तुलना में सीमित हो गई। महत्वपूर्ण प्रशासनिक नीतियों में उन्हें केंद्रीय सरकार के अधीन रहना था। इस प्रकार प्रेसीडेंसी-आधारित प्रशासन से धीरे-धीरे केंद्रीकृत शासन-व्यवस्था की ओर परिवर्तन हुआ।
➣ चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा इस पद को प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति लॉर्ड विलियम बेंटिक थे। वे पहले से बंगाल के गवर्नर-जनरल के रूप में कार्य कर रहे थे और अधिनियम के बाद भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
➣ इस परिवर्तन का व्यापक महत्व यह था कि भारत के प्रशासन में एक केंद्रीय कार्यपालिका की स्थापना हुई। अब ब्रिटिश भारत के विभिन्न क्षेत्रों को केवल अलग-अलग प्रेसीडेंसियों के समूह के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक प्रशासनिक इकाई के रूप में संचालित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1833 ने भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण को निर्णायक रूप से आगे बढ़ाया। आगे चलकर यही केंद्रीय शासन-व्यवस्था भारत में एक अधिक एकीकृत प्रशासनिक एवं विधायी ढांचे के विकास का आधार बनी।
केंद्रीय विधायी शक्ति एवं कानूनों के संहिताकरण की व्यवस्था
➣ चार्टर एक्ट, 1833 से पहले भारत में कानून बनाने की व्यवस्था पूरी तरह केंद्रीकृत नहीं थी। यद्यपि बंगाल के गवर्नर-जनरल को पहले से ही महत्वपूर्ण मामलों में मद्रास और बंबई पर सर्वोच्चता प्राप्त थी, फिर भी इन दोनों प्रेसीडेंसियों के पास अपने-अपने क्षेत्रों से संबंधित कानून एवं विनियम बनाने की कुछ स्वतंत्र शक्तियाँ थीं। इस कारण अलग-अलग प्रेसीडेंसियों में प्रशासनिक एवं कानूनी व्यवस्थाओं में एकरूपता की कमी, जटिलता और अस्पष्टता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती थीं।
➣ इसी उद्देश्य से चार्टर एक्ट, 1833 ने भारत की विधायी व्यवस्था में एक निर्णायक परिवर्तन किया। अधिनियम की धारा 43 के अंतर्गत पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने की सर्वोच्च शक्ति गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को प्रदान की गई, जिसमें पहले से प्रचलित किसी भी कानून अथवा विनियम को निरस्त करने, संशोधित करने अथवा परिवर्तित करने की शक्ति भी शामिल थी। इस प्रकार पहली बार भारत की विधायी शक्ति को व्यापक रूप से केंद्रीय स्तर पर एकत्रित किया गया।
➣ इसके परिणामस्वरूप मद्रास और बंबई की स्वतंत्र विधायी शक्तियाँ समाप्त कर दी गईं। अब वे सामान्य परिस्थितियों में अपने स्तर पर ऐसे कानून अथवा विनियम नहीं बना सकती थीं जो केंद्रीय विधायी व्यवस्था से अलग हों।
➣ केवल ऐसी अत्यावश्यक परिस्थितियों में, जब तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, वे अस्थायी रूप से कोई कानून अथवा विनियम बना सकती थीं। लेकिन ऐसे निर्णय को गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक था।
➣ इसके अतिरिक्त, प्रेसीडेंसी सरकारें केंद्रीय स्वीकृति के बिना नए पदों का सृजन अथवा किसी पद के लिए नया वेतन, भत्ता या अनुदान भी निर्धारित नहीं कर सकती थीं।
➣ धारा 43 की यह विधायी शक्ति भी पूर्णतः निरंकुश नहीं थी। इसमें कुछ स्पष्ट सीमाएँ रखी गईं – गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल सेना में विद्रोह/पलायन से संबंधित कानूनों को निरस्त, संशोधित या स्थगित नहीं कर सकता था, और न ही वह ब्रिटिश क्राउन के किसी विशेषाधिकार को प्रभावित करने वाला कोई कानून बना सकता था।
➣ इसी विधायी पुनर्गठन के साथ गवर्नर-जनरल की परिषद् में एक चौथा सदस्य (विधि सदस्य) भी जोड़ा गया (इसका पूरा विवरण आगे गवर्नर-जनरल की परिषद् में विधि सदस्य की नियुक्ति शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है)।
➣ हालांकि लॉर्ड मैकाले के अनुसार कार्यपालिका एवं विधायिका के बीच यह विभाजन अपूर्ण एवं अस्पष्ट ही रहा, जबकि तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक की दृष्टि में परिषद् मूलतः एक ही रही, जो कार्यकारी एवं विधायी दोनों क्षमताओं में कार्य करती थी। इसे भारत की संसदीय व्यवस्था के विकास की एक भ्रूण अवस्था माना जाता है।
➣ इस केंद्रीय परिषद् द्वारा बनाए गए कानूनों को केवल किसी एक प्रेसीडेंसी के स्थानीय विनियम के रूप में नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटिश भारत में लागू होने वाले केंद्रीय कानूनों के रूप में देखा जाता था, और इन्हें आगे से Acts (अधिनियम) कहा जाने लगा।
➣ हालांकि यह विधायी शक्ति पूर्णतः निरंकुश नहीं थी। गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल द्वारा बनाए गए कानूनों को ब्रिटिश संसद के सामने प्रस्तुत किया जाना था और संसद को उन्हें नियंत्रित करने, बदलने या निरस्त करने का अधिकार सुरक्षित था।
➣ इसके अतिरिक्त, कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (बोर्ड ऑफ कंट्रोल के माध्यम से) को भी गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल द्वारा बनाए गए कानून को निरस्त करने (disallow) की शक्ति प्राप्त थी। इस प्रकार भारत में केंद्रीय विधायी शक्ति बढ़ने के बावजूद अंतिम नियंत्रण ब्रिटिश संसद तथा कंपनी के उच्च नियंत्रण तंत्र के पास बना रहा।
➣ केंद्रीय विधायी शक्ति के इस केंद्रीकरण के साथ भारत में प्रचलित विभिन्न कानूनों, नियमों और न्यायिक व्यवस्थाओं को व्यवस्थित एवं एकरूप बनाने की आवश्यकता भी सामने आई।
इसी उद्देश्य से चार्टर एक्ट, 1833 ने भारत में कानूनों के संहिताकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया और प्रथम विधि आयोग की स्थापना का प्रावधान किया, जिसका उद्देश्य भारत में प्रचलित कानूनों का अध्ययन कर उनकी असंगतियों को दूर करना तथा अधिक व्यवस्थित विधिक ढाँचा तैयार करना था।➣ 1834 में प्रथम विधि आयोग का गठन किया गया और इसके प्रथम अध्यक्ष एवं सबसे महत्वपूर्ण सदस्य लॉर्ड मैकाले नियुक्त हुए। आयोग के अन्य सदस्यों में अंग्रेज़ बैरिस्टर कैमरन, मद्रास सेवा के मैकलियोड तथा बंबई सेवा के विलियम एंडरसन शामिल थे (कलकत्ता सेवा के सर विलियम मैकनॉटन ने नियुक्ति स्वीकार नहीं की)। आगे चलकर इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारतीय दंड संहिता के प्रारूप के निर्माण का कार्य हुआ।
➣ 1834 में प्रथम विधि आयोग का गठन किया गया और इसके प्रथम अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले नियुक्त हुए। आयोग के अन्य सदस्यों में जे. एम. मैकलियोड, जी. डब्ल्यू. एंडरसन तथा एफ. मिलेट शामिल थे।
➣ आयोग ने भारत में प्रचलित कानूनों का अध्ययन कर उनके व्यवस्थित संहिताकरण की दिशा में कार्य किया। आगे चलकर इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारतीय दंड संहिता के प्रारूप के निर्माण का कार्य हुआ।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1833 ने भारत में एक ओर विधायी शक्तियों का केंद्रीकरण किया और दूसरी ओर संहिताकरण की संस्थागत प्रक्रिया की नींव रखी, जिसने भारत में एक अधिक केंद्रीकृत, एकीकृत एवं व्यवस्थित विधिक-प्रशासनिक व्यवस्था के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
सरकारी सेवाओं में भारतीयों के लिए समान अवसर का सिद्धांत
➣ चार्टर एक्ट, 1833 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक सेवाओं में उच्च पदों पर यूरोपीय लोगों का प्रभुत्व था। कंपनी की कवनेन्टेड सिविल सर्विस में नियुक्तियाँ मुख्यतः कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की संरक्षण-व्यवस्था से जुड़ी हुई थीं। भारतीयों के लिए उच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंच लगभग असंभव थी और प्रशासनिक सेवा में स्पष्ट नस्ली एवं सामाजिक असमानता मौजूद थी।
➣ भारत में कंपनी का शासन जैसे-जैसे विस्तृत होता गया, वैसे-वैसे यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण होने लगा कि कंपनी के अधीन सरकारी पदों पर नियुक्ति के लिए किन आधारों को स्वीकार किया जाए। इसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1833 ने सरकारी सेवाओं के संबंध में एक महत्वपूर्ण एवं सिद्धांतात्मक परिवर्तन किया।
➣ अधिनियम की धारा 87 में यह स्पष्ट किया गया कि भारत में रहने वाले किसी भी देशज व्यक्ति अथवा ब्रिटिश क्षेत्रों में रहने वाले किसी भी प्राकृतिक रूप से जन्मे ब्रिटिश प्रजाजन को केवल उसके धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर कंपनी के अधीन किसी पद अथवा रोजगार से वंचित नहीं किया जाएगा।
➣ इस प्रावधान का अर्थ यह था कि सिद्धांततः किसी भारतीय को केवल भारतीय होने के कारण सरकारी सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता था। हालांकि इस प्रावधान को तत्काल व्यवहार में पूर्ण समानता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
➣ वास्तविक प्रशासनिक व्यवस्था में उच्च पदों पर यूरोपीय प्रभुत्व बना रहा और भारतीयों की नियुक्ति के अवसर अत्यंत सीमित रहे। इसलिए इसे समान अवसर के वैधानिक सिद्धांत की शुरुआत के रूप में समझना अधिक उचित है, न कि भारतीयों के लिए तत्काल समान प्रशासनिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के रूप में।
➣ इसी अधिनियम में कंपनी की सिविल सेवा में भर्ती को अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में भी प्रावधान किया गया। मूल विधेयक में वास्तव में एक कदम आगे बढ़कर खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर सिविल सेवा में भर्ती की व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव भी रखा गया था।
➣ परंतु कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने अपने पारंपरिक संरक्षण-अधिकार को खोने के भय से इस प्रस्ताव का प्रबल विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप यह प्रावधान व्यवहार में लागू नहीं हो सका और निष्प्रभावी रह गया।
➣ अंततः इस अधिनियम में प्रत्येक वर्ष भारत में अपेक्षित सिविल सेवा रिक्तियों का अनुमान तैयार करने और उसके आधार पर उम्मीदवारों को कंपनी के Haileybury College में प्रशिक्षण के लिए भेजने की व्यवस्था की गई।
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को प्रत्येक रिक्ति के लिए चार गुना उम्मीदवार नामित करने थे, और इन नामित उम्मीदवारों में से ही प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से अंतिम चयन किया जाना था, ताकि केवल पात्र एवं तुलनात्मक रूप से योग्य उम्मीदवार ही सेवा में आ सकें।➣ इस व्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि चार्टर एक्ट, 1833 ने सिविल सेवा की नियुक्ति-प्रणाली में योग्यता और प्रशिक्षण के तत्व को पहले की तुलना में अधिक महत्व देने का प्रयास किया।
➣ हालांकि कंपनी के डायरेक्टर्स का Patronage अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था और वास्तविक खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था बाद में चार्टर एक्ट, 1853 द्वारा लागू की गई।
➣ इस प्रकार 1833 का प्रावधान दो दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। एक ओर इसने सरकारी सेवाओं में धर्म, जन्मस्थान, वंश और रंग के आधार पर भेदभाव न करने का सिद्धांत स्थापित किया, वहीं दूसरी ओर सिविल सेवा में नियुक्ति एवं प्रशिक्षण की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में कदम उठाया। आगे चलकर यही विचार भारतीयों के लिए सरकारी सेवाओं में समान अवसर की मांग का महत्वपूर्ण आधार बना।
कंपनी की संपत्ति, भारतीय क्षेत्रों एवं राजस्व की व्यवस्था
➣ चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी व्यापारिक अधिकार समाप्त किए जाने के बाद यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया कि कंपनी की अब तक अर्जित संपत्ति, माल, धन, ऋण तथा अन्य परिसंपत्तियों का क्या किया जाए।
➣ कंपनी अब व्यापार करने वाली संस्था नहीं रहने वाली थी, इसलिए उसके व्यापारिक और प्रशासनिक संसाधनों के बीच स्पष्ट व्यवस्था करना आवश्यक था।
➣ अधिनियम ने यह व्यवस्था की कि कंपनी की वास्तविक एवं व्यक्तिगत संपत्ति, उसकी भूमि, राजस्व, किराए, लाभ, माल, धन, ऋण तथा अन्य परिसंपत्तियाँ, जो भारत के शासन से संबंधित थीं, कंपनी के पास रहते हुए भी ब्रिटिश क्राउन के लिए ट्रस्ट के रूप में रखी जाएंगी। इनका उपयोग भारत सरकार के प्रशासन के लिए किया जाना था।
➣ कंपनी को अपने पुराने व्यापारिक कारोबार को बंद करने की भी व्यवस्था की गई। उसे अपने व्यापारिक माल और उन संपत्तियों को बेचने का निर्देश दिया गया, जिन्हें भारत के शासन के लिए आवश्यक नहीं माना जाता था।
➣ साथ ही व्यापारिक शाखा से संबंधित बकाया ऋणों की वसूली तथा अनावश्यक व्यापारिक प्रतिष्ठानों को धीरे-धीरे समाप्त करने का प्रावधान किया गया।
➣ दूसरी ओर, कंपनी के ऊपर पहले से मौजूद ऋण एवं वित्तीय दायित्व भी समाप्त नहीं किए गए। कंपनी की संपत्ति और राजस्व से संबंधित व्यवस्था इस प्रकार की गई कि उसके पुराने दायित्वों को पूरा किया जा सके और भारत के प्रशासन का वित्तीय संचालन जारी रहे।
➣ चार्टर एक्ट, 1833 ने कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त कर दिए थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि कंपनी का भारत पर शासन भी समाप्त कर दिया गया। कंपनी को भारत में अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकार जारी रखने की अनुमति दी गई।
➣ अधिनियम की धारा 1 के अनुसार, कंपनी के अधीन स्थित ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र तथा उनसे प्राप्त होने वाले राजस्व को 30 अप्रैल, 1854 तक कंपनी के शासन के अधीन जारी रखा जाना था।
➣ हालांकि, कंपनी इन भारतीय क्षेत्रों और उनसे प्राप्त राजस्व को अपने निजी लाभ या व्यापारिक हित के लिए उपयोग नहीं कर सकती थी। कंपनी को इन क्षेत्रों तथा उनसे संबंधित संपत्ति एवं राजस्व को ब्रिटिश क्राउन के लिए ट्रस्ट के रूप में धारण करना था।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत कंपनी के शेयरधारकों के हितों की भी रक्षा की गई। उनके शेयरों पर 10.5 प्रतिशत वार्षिक लाभांश की व्यवस्था को सुरक्षित रखा गया, और इस भुगतान को भारत के राजस्व से अगले 40 वर्षों तक पूरा किए जाने की गारंटी दी गई। साथ ही कंपनी पर पहले से मौजूद ऋणों का दायित्व भी भारत सरकार ने अपने ऊपर ले लिया।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1833 ने ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक संस्था से मुख्यतः प्रशासनिक संस्था में परिवर्तित कर दिया। कंपनी के पास भारत का वास्तविक प्रशासन बना रहा, लेकिन उसके अधीन भारतीय क्षेत्र, संपत्ति और राजस्व अब उसके निजी व्यापारिक हितों के बजाय ब्रिटिश क्राउन के हित में माने गए।
यूरोपीय लोगों के भारत में बसने एवं संपत्ति प्राप्त करने की स्वतंत्रता
➣ चार्टर एक्ट, 1833 से पहले भारत में रहने और व्यापार करने वाले यूरोपीय लोगों की गतिविधियों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का काफी नियंत्रण था। चार्टर एक्ट, 1813 के बाद ब्रिटिश निजी व्यापारियों को भारत में व्यापार करने की अनुमति तो मिल गई थी, लेकिन भारत में उनके स्थायी रूप से बसने तथा संपत्ति प्राप्त करने के संबंध में अभी भी कई प्रतिबंध बने हुए थे।
➣ इसका प्रमुख कारण कंपनी की पुरानी नीति थी। कंपनी नहीं चाहती थी कि बड़ी संख्या में स्वतंत्र यूरोपीय व्यापारी भारत में आकर स्वतंत्र रूप से बसें और ऐसी आर्थिक तथा सामाजिक शक्ति विकसित कर लें, जिस पर कंपनी का नियंत्रण न रहे। इसलिए भारत में यूरोपीय निवासियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए लाइसेंस तथा अन्य प्रतिबंधों की व्यवस्था बनी हुई थी।
➣ लेकिन 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में ब्रिटेन में मुक्त व्यापार की विचारधारा मजबूत होने लगी थी। ब्रिटिश व्यापारी और औद्योगिक वर्ग भारत को केवल व्यापार के लिए ही नहीं,
➣ बल्कि निवेश, उद्योग तथा संपत्ति प्राप्त करने के लिए भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र मानने लगा। इसलिए भारत में यूरोपीय लोगों की आवाजाही और आर्थिक गतिविधियों पर लगे पुराने प्रतिबंधों को हटाने की मांग बढ़ने लगी।
➣ इसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1833 ने यूरोपीय लोगों के भारत में प्रवेश और आर्थिक गतिविधियों से संबंधित कई पुराने प्रतिबंधों को हटा दिया।
➣ अब उनके लिए भारत में आना, बसना, व्यापार करना तथा संपत्ति प्राप्त करना पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया। विशेष रूप से भूमि एवं अन्य अचल संपत्ति प्राप्त करने की अनुमति एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
➣ इससे ब्रिटिश निजी पूंजी को भारत में केवल व्यापार तक सीमित न रहकर भूमि, उद्योग तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों में निवेश करने का अवसर मिला। इस व्यवस्था ने स्वतंत्र यूरोपीय व्यापारियों, नील उत्पादकों तथा अन्य यूरोपीय आर्थिक हितों के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कीं।
➣ हालांकि इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत में आने वाले प्रत्येक यूरोपीय व्यक्ति को पूर्णतः बिना किसी नियंत्रण के सभी अधिकार प्राप्त हो गए थे। उन्हें कंपनी सरकार के अधीन लागू कानूनों और प्रशासनिक नियमों का पालन करना पड़ता था। परिवर्तन मुख्यतः उन पुराने प्रतिबंधों को हटाने से संबंधित था, जो उनके प्रवेश, निवास और संपत्ति प्राप्त करने की स्वतंत्रता को सीमित करते थे।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1833 ने एक ओर ईस्ट इंडिया कंपनी के शेष व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त किया, वहीं दूसरी ओर भारत में यूरोपीय निजी व्यापारियों एवं पूंजीपतियों के लिए अधिक व्यापक आर्थिक अवसर खोल दिए। इससे भारत की अर्थव्यवस्था में ब्रिटिश निजी पूंजी और व्यापारिक हितों की भूमिका आगे और बढ़ने लगी।
भारत में दास प्रथा के उन्मूलन की दिशा में प्रावधान
➣ 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में ब्रिटेन में दास प्रथा के विरुद्ध आंदोलन तेजी से मजबूत हो रहा था। ब्रिटिश संसद ने पहले ही दास व्यापार को रोकने की दिशा में कदम उठाए थे और 1833 में ब्रिटिश उपनिवेशों में दासता समाप्त करने का व्यापक कानून भी बनाया गया। इसी व्यापक वातावरण का प्रभाव भारत संबंधी नीतियों पर भी पड़ा।
➣ हालांकि भारत की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियाँ ब्रिटिश वेस्ट इंडीज से अलग थीं। भारत में दासता कई स्थानों पर स्थानीय सामाजिक संबंधों, घरेलू सेवा तथा कृषि व्यवस्था से जुड़ी हुई थी।
➣ इसलिए भारत में इसे अचानक समाप्त करने के बजाय क्रमिक एवं सावधानीपूर्ण तरीके से समाप्त करने की आवश्यकता महसूस की गई। ब्रिटिश संसद की 1833 की बहसों में भी भारत में दासता समाप्त करने के तरीके और स्थानीय परिस्थितियों को लेकर विस्तृत चर्चा हुई थी।
➣ इसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1833 के अंतर्गत भारत सरकार को दासों की स्थिति में सुधार करने तथा अंततः दास प्रथा के उन्मूलन की दिशा में आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया गया। इस प्रकार पहली बार भारत में दासता को समाप्त करने का प्रश्न ब्रिटिश भारतीय शासन की आधिकारिक नीति का हिस्सा बना।
➣ लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि चार्टर एक्ट, 1833 ने भारत में दास प्रथा को तत्काल कानूनी रूप से समाप्त नहीं किया। अधिनियम का उद्देश्य सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करने की दिशा देना था, जिसके माध्यम से दासों की स्थिति में सुधार किया जा सके और अंततः इस प्रथा को समाप्त किया जा सके।
➣ इसलिए 1833 को भारत में दासता की समाप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम माना जाना चाहिए, न कि पूर्ण कानूनी उन्मूलन का वर्ष। इसके बाद भारतीय प्रशासन में इस विषय पर विचार एवं नियम बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
➣ अंततः Indian Slavery Act, 1843 द्वारा दासता से जुड़े अधिकारों को न्यायालयों द्वारा लागू करने पर रोक लगाई गई तथा किसी व्यक्ति को दास के रूप में बेचने अथवा उसकी दासता के आधार पर उसके विरुद्ध संपत्ति संबंधी अधिकार लागू करने की व्यवस्था समाप्त की गई।
➣ इस प्रकार 1833 से 1843 के बीच भारत में दास प्रथा के विरुद्ध सरकारी नीति क्रमशः विकसित हुई। 1833 में इसके उन्मूलन की दिशा निर्धारित हुई, जबकि 1843 के कानून ने दासता से संबंधित कानूनी अधिकारों को प्रभावी रूप से कमजोर और समाप्त करने की दिशा में अधिक ठोस कदम उठाया।
बंगाल प्रेसीडेंसी के विभाजन का (अप्रभावी रहा) प्रावधान
➣ भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों के निरंतर विस्तार के साथ यह अनुभव किया जाने लगा था कि बंगाल प्रेसीडेंसी का आकार प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत विशाल हो चुका है, जिससे एक ही गवर्नर के लिए उसका कुशलतापूर्वक प्रशासन करना कठिन होता जा रहा था।
➣ इसी समस्या को दूर करने के लिए चार्टर एक्ट, 1833 में एक प्रावधान किया गया कि बंगाल प्रेसीडेंसी को विभाजित कर दो अलग-अलग प्रेसीडेंसियाँ बनाई जाएँ – फोर्ट विलियम की प्रेसीडेंसी, जिसमें बंगाल, बिहार व उड़ीसा का क्षेत्र शामिल रहता, तथा आगरा की प्रेसीडेंसी, जिसके अंतर्गत उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र आते।
➣ हालांकि व्यावहारिक कठिनाइयों तथा वित्तीय एवं प्रशासनिक कारणों से यह विभाजन तत्काल लागू नहीं किया जा सका। इस प्रावधान को स्थगित कर दिया गया और यह कभी भी वास्तविक रूप से प्रभावी नहीं हुआ। इसके स्थान पर आगरा क्षेत्र के लिए बाद में एक लेफ्टिनेंट-गवर्नर की नियुक्ति की व्यवस्था अपनाई गई (जो आगे चलकर उत्तर-पश्चिमी प्रांत के रूप में विकसित हुआ)।
➣ यद्यपि यह विशिष्ट प्रावधान व्यवहार में कभी लागू नहीं हो सका, फिर भी यह इस बात का प्रमाण है कि चार्टर एक्ट, 1833 के प्रणेता भारत के विशाल एवं विविध क्षेत्रों के प्रशासन हेतु आवश्यकतानुसार प्रांतीय पुनर्गठन की समस्या से पहले से ही परिचित थे।
➣ यह विचार आगे चलकर 1836 में उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लिए पृथक लेफ्टिनेंट-गवर्नर की नियुक्ति तथा बाद के वर्षों में अन्य प्रांतीय पुनर्गठनों का एक प्रारंभिक वैचारिक आधार बना।
सेंट हेलेना द्वीप का नियंत्रण ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित
➣ चार्टर एक्ट, 1833 के अंतर्गत ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन स्थित सेंट हेलेना द्वीप के प्रशासन में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया। यह द्वीप लंबे समय से कंपनी के नियंत्रण में था और भारत तथा यूरोप के बीच समुद्री मार्ग पर इसकी सामरिक स्थिति महत्वपूर्ण थी।
➣ कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त किए जाने के साथ ही यह प्रश्न भी सामने आया कि सेंट हेलेना जैसे सामरिक महत्व वाले क्षेत्र का नियंत्रण अब एक व्यापारिक संस्था के पास क्यों बना रहे। इसलिए अधिनियम ने सेंट हेलेना द्वीप को ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन से अलग कर ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष नियंत्रण में दे दिया।
➣ इस परिवर्तन के बाद कंपनी का सेंट हेलेना पर वह प्रशासनिक अधिकार समाप्त हो गया, जो उसे पहले प्राप्त था। द्वीप से संबंधित सरकारी प्रशासन, न्याय तथा राजस्व से जुड़े अधिकार अब कंपनी के बजाय क्राउन के अधीन आ गए।
➣ सेंट हेलेना का नियंत्रण कंपनी से हटाना केवल स्थानीय प्रशासनिक परिवर्तन नहीं था। यह व्यापक रूप से उस प्रक्रिया को भी दर्शाता था जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एवं साम्राज्यवादी अधिकारों को क्रमशः सीमित किया जा रहा था और ब्रिटिश सरकार महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिक प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित कर रही थी।
➣ इसी कारण चार्टर एक्ट, 1833 को कई बार Saint Helena Act, 1833 के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि इसका मुख्य महत्व भारत के प्रशासनिक एवं संवैधानिक परिवर्तनों से जुड़ा था, लेकिन सेंट हेलेना का हस्तांतरण भी इसके महत्वपूर्ण प्रावधानों में शामिल था।
गवर्नर-जनरल की परिषद् में विधि सदस्य की नियुक्ति
➣ चार्टर एक्ट, 1833 ने गवर्नर-जनरल की परिषद् की संरचना में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। अब परिषद् में चौथा सदस्य जोड़ने का प्रावधान किया गया, जिसे मुख्यतः विधायी कार्यों के लिए नियुक्त किया जाना था। इस सदस्य को सामान्यतः विधि सदस्य कहा गया।
➣ परिषद् के पहले तीन सामान्य सदस्य कंपनी की सेवा में रह चुके या कार्यरत व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाते थे, जबकि चौथा सदस्य ऐसे व्यक्ति में से नियुक्त किया जाना था जो ईस्ट इंडिया कंपनी का सेवक न रहा हो। उसकी नियुक्ति कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा की जाती थी, लेकिन इसके लिए ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति आवश्यक थी।
➣ इस चौथे सदस्य को परिषद् में शामिल करने का मुख्य उद्देश्य कानून निर्माण के कार्य में विशेष विधिक ज्ञान एवं पेशेवर सलाह उपलब्ध कराना था। भारत में कानूनों के बढ़ते केंद्रीकरण और संहिताकरण के लिए ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जिसे विधि का विशेष ज्ञान हो।
➣ हालांकि इस सदस्य की शक्तियाँ परिषद् के अन्य सदस्यों के समान नहीं थीं। वह सामान्य कार्यपालिका संबंधी बैठकों में परिषद् के सदस्य के रूप में बैठने या मतदान करने का अधिकारी नहीं था। उसे मुख्यतः उन बैठकों में भाग लेने और मतदान करने का अधिकार था, जिनमें कानून एवं विनियम बनाने का कार्य किया जाता था।
➣ इस प्रकार 1833 में पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद् के भीतर कार्यपालिका और विधायी कार्यों के बीच संस्थागत अंतर दिखाई देने लगा। परिषद् मूलतः वही रही, लेकिन कानून बनाने के समय उसमें एक विशेष विधि सदस्य की भूमिका निर्धारित कर दी गई।
➣ इस पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थॉमस बैबिंगटन मैकाले (लॉर्ड मैकाले) थे। वे 1834 में भारत आए और गवर्नर-जनरल की परिषद् में प्रथम विधि सदस्य के रूप में कार्य किया। आगे चलकर उन्होंने भारत में कानूनों के संहिताकरण के कार्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इस प्रावधान का महत्व इस बात में था कि कानून निर्माण को केवल सामान्य प्रशासनिक कार्य न मानकर उसमें विशेषज्ञ विधिक ज्ञान को भी शामिल किया गया। इससे भारत में केंद्रीय कानून निर्माण और आगे होने वाले कानूनों के संहिताकरण को अधिक व्यवस्थित आधार मिला।
चार्टर एक्ट, 1833 का महत्व
➣ चार्टर एक्ट, 1833 भारत के संवैधानिक एवं प्रशासनिक इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसने केवल ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर का नवीनीकरण नहीं किया, बल्कि कंपनी के स्वरूप, भारत की केंद्रीय शासन-व्यवस्था, विधायी प्रणाली तथा प्रशासनिक ढांचे में ऐसे परिवर्तन किए, जिनका प्रभाव आगे लंबे समय तक बना रहा।
1. कंपनी के व्यापारिक स्वरूप का पूर्ण अंत
➣ 1813 में कंपनी का भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हो गया था, लेकिन चाय तथा चीन के साथ व्यापार का अधिकार अभी उसके पास बना हुआ था। 1833 में इन शेष व्यापारिक अधिकारों को भी समाप्त कर दिया गया। इससे ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक चरित्र पूरी तरह समाप्त हो गया और वह मुख्यतः भारत का प्रशासन चलाने वाली संस्था बन गई।
2. भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण को मजबूती
➣ इस अधिनियम ने बंगाल के गवर्नर-जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत का गवर्नर-जनरल बना दिया। इससे भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर एक केंद्रीय कार्यपालिका की सर्वोच्चता स्थापित हुई और प्रशासनिक केंद्रीकरण को निर्णायक रूप से मजबूती मिली।
3. विधायी शक्तियों का केंद्रीकरण
➣ मद्रास और बंबई की स्वतंत्र विधायी शक्तियों को समाप्त करके पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने की शक्ति गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल में केंद्रित कर दी गई। इससे भारत में पहली बार व्यापक स्तर पर केंद्रीय विधायी व्यवस्था विकसित हुई और विभिन्न क्षेत्रों में कानूनों की एकरूपता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
4. कानूनों के संहिताकरण की नींव
➣ अधिनियम द्वारा प्रथम विधि आयोग की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके परिणामस्वरूप भारत में प्रचलित कानूनों की समीक्षा, व्यवस्था और संहिताकरण का कार्य व्यवस्थित रूप से प्रारंभ हुआ। आगे चलकर भारतीय दंड संहिता जैसे महत्वपूर्ण कानूनों के निर्माण की आधारभूमि इसी प्रक्रिया से तैयार हुई।
5. सरकारी सेवाओं में समान अवसर का सिद्धांत
➣ अधिनियम ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि किसी व्यक्ति को केवल उसके धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर कंपनी के अधीन किसी सरकारी पद से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यद्यपि इसका तत्काल व्यवहारिक प्रभाव सीमित रहा, फिर भी यह भारतीयों के लिए सरकारी सेवाओं में समान अवसर के वैधानिक सिद्धांत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
6. यूरोपीय निजी पूंजी के लिए भारत का विस्तार
➣ कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति और यूरोपीय लोगों के लिए भारत में व्यापार, निवास तथा संपत्ति प्राप्त करने के अवसर बढ़ने से भारत में ब्रिटिश निजी व्यापारियों और पूंजीपतियों की गतिविधियाँ बढ़ीं। इससे भारत की अर्थव्यवस्था में कंपनी के एकाधिकार के स्थान पर निजी ब्रिटिश पूंजी की भूमिका बढ़ने लगी।
7. कंपनी और क्राउन के संबंध में परिवर्तन
➣ कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त होने तथा उसके भारतीय क्षेत्रों एवं राजस्व को क्राउन के लिए ट्रस्ट के रूप में रखने की व्यवस्था से कंपनी की स्थिति में महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन आया। कंपनी अब मुख्यतः ब्रिटिश क्राउन के हित में भारत का प्रशासन चलाने वाली संस्था के रूप में कार्य करने लगी।
8. आधुनिक प्रशासनिक एवं विधिक व्यवस्था की आधारभूमि
➣ केंद्रीय शासन, केंद्रीय विधायिका, विधि आयोग तथा कानूनों के संहिताकरण जैसी व्यवस्थाओं ने भारत में आधुनिक प्रशासनिक एवं विधिक संस्थाओं के विकास की आधारभूमि तैयार की। आगे चलकर भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में जो अधिक एकीकृत और केंद्रीकृत स्वरूप दिखाई दिया, उसमें 1833 के अधिनियम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
9. कंपनी शासन के अगले चरण की आधारभूमि
➣ 1833 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का अस्तित्व मुख्यतः प्रशासनिक रूप में रह गया। व्यापारिक गतिविधियों से उसके अलग होने के कारण भारत में उसके शासन का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से औपनिवेशिक प्रशासन का हो गया। आगे चलकर 1858 में कंपनी शासन की पूर्ण समाप्ति और क्राउन के प्रत्यक्ष शासन की स्थापना इसी क्रमिक संवैधानिक विकास की अंतिम परिणति बनी।
चार्टर एक्ट, 1813 बनाम चार्टर एक्ट, 1833 – तुलनात्मक तालिका
चूंकि दोनों अधिनियमों में कई विषय (व्यापारिक एकाधिकार, गवर्नर-जनरल की शक्तियाँ, केंद्रीकरण, क्राउन का अधिकार) परस्पर जुड़े हुए हैं, इसलिए UPSC/PCS परीक्षा में इन दोनों के बीच confusion होना बहुत आम है। नीचे दी गई तालिका दोनों अधिनियमों के मुख्य अंतर को स्पष्ट करती है:
| विषय | चार्टर एक्ट, 1813 | चार्टर एक्ट, 1833 |
| व्यापारिक एकाधिकार | कंपनी का सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त। चाय व चीन-व्यापार पर एकाधिकार बरकरार | कंपनी के शेष व्यापारिक अधिकार (चाय व चीन-व्यापार) भी समाप्त। कंपनी का व्यापारिक स्वरूप पूर्णतः समाप्त |
| कंपनी की प्रकृति | अभी भी आंशिक रूप से एक व्यापारिक एवं प्रशासनिक संस्था | पूर्णतः एक प्रशासनिक संस्था में परिवर्तित |
| गवर्नर-जनरल का पद | गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल ही बना रहा। कोई नामकरण परिवर्तन नहीं | पद बदलकर गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया किया गया। प्रथम – लॉर्ड विलियम बेंटिक |
| विधायी शक्ति | प्रेसीडेंसियों की विधायी शक्ति यथावत। कोई केंद्रीकरण नहीं | मद्रास व बंबई की स्वतंत्र विधायी शक्ति समाप्त। सर्वोच्च शक्ति गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल (धारा 43) में केंद्रित |
| परिषद् में नया सदस्य | कोई प्रावधान नहीं | चौथा सदस्य (विधि सदस्य) जोड़ा गया। प्रथम विधि सदस्य – लॉर्ड मैकाले |
| कानूनों का संहिताकरण | कोई प्रावधान नहीं | प्रथम विधि आयोग (1834) की स्थापना। IPC के प्रारूप की आधारभूमि |
| क्राउन-प्रभुसत्ता | पहली बार स्पष्ट शब्दों में “क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता” घोषित। कंपनी मात्र प्रशासक/पट्टेदार | भारतीय क्षेत्र व राजस्व को कंपनी द्वारा क्राउन के लिए ट्रस्ट (Trust) के रूप में धारण करने की व्यवस्था |
| सरकारी सेवाओं में समानता | कोई प्रावधान नहीं | धारा 87 – धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर भेदभाव न करने का सिद्धांत |
| सिविल सेवा | Patronage कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास यथावत | खुली प्रतियोगिता का प्रस्ताव, परंतु कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध से निष्प्रभावी |
| यूरोपीय लोगों हेतु सुविधा | व्यापार की सीमित अनुमति (लाइसेंस द्वारा) | भारत में बसने व अचल संपत्ति प्राप्त करने की व्यापक स्वतंत्रता |
| दास प्रथा | कोई प्रावधान नहीं | दास प्रथा के उन्मूलन की दिशा में कदम (पूर्ण उन्मूलन नहीं। वह 1843 में हुआ) |
| प्रांतीय पुनर्गठन | कोई प्रावधान नहीं | बंगाल को फोर्ट विलियम व आगरा प्रेसीडेंसी में बाँटने का प्रावधान (स्थगित, कभी लागू नहीं हुआ) |
| अन्य क्षेत्रीय प्रशासन | कोई प्रावधान नहीं | सेंट हेलेना द्वीप का नियंत्रण कंपनी से हटाकर क्राउन को हस्तांतरित (Saint Helena Act, 1833) |
| शेयरधारक लाभांश | 10.5% निश्चित/गारंटीशुदा दर (धारा 57) | 10.5% यथावत सुरक्षित। भारतीय राजस्व से अगले 40 वर्षों तक गारंटीशुदा। कंपनी के पुराने ऋण भी भारत सरकार ने अपने ऊपर लिए |
| चार्टर/अधिकारों की अवधि | अगले 20 वर्ष (1813-1833) | भारतीय क्षेत्र व राजस्व 30 अप्रैल, 1854 तक कंपनी-प्रशासन में बनाए रखने का प्रावधान |
| प्रकृति | व्यापारिक एकाधिकार को आंशिक रूप से तोड़ने वाला अधिनियम | कंपनी को पूर्णतः प्रशासनिक संस्था बनाने वाला, केंद्रीकरण व संहिताकरण का निर्णायक अधिनियम |
याद रखने का सरल तरीका: 1813 = व्यापार में आंशिक ढील – सामान्य एकाधिकार टूटा, पर चाय-चीन व्यापार तथा कंपनी का प्रशासनिक ढाँचा यथावत रहा। 1833 = कंपनी का प्रशासनिक कायाकल्प – व्यापार पूर्णतः समाप्त, गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया, केंद्रीकृत विधायी शक्ति (धारा 43), विधि आयोग तथा धारा 87 के माध्यम से भारत को एक नए, अधिक केंद्रीकृत प्रशासनिक चरण में प्रवेश कराया गया।
चार्टर एक्ट, 1833 – भ्रम बिंदु
➣ 1813 में कंपनी का भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हुआ था, लेकिन चाय तथा चीन के साथ व्यापार का एकाधिकार बना रहा। 1833 में कंपनी के इन शेष व्यापारिक अधिकारों को भी समाप्त कर दिया गया।
➣ चार्टर एक्ट, 1833 ने ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त नहीं किया था। कंपनी का राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकार भारत में बना रहा। समाप्ति केवल उसके व्यापारिक स्वरूप की हुई थी। कंपनी का शासन अंततः 1858 में समाप्त हुआ।
➣ चार्टर एक्ट, 1833 में बंगाल को फोर्ट विलियम तथा आगरा – दो प्रेसीडेंसियों में बाँटने का प्रावधान अवश्य था, परंतु इसे तत्काल स्थगित कर दिया गया और यह कभी लागू नहीं हुआ – इसे किसी वास्तविक विभाजन के रूप में न समझें।
➣ बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल बनाने का प्रावधान 1833 में हुआ। इसके पहले पूरे ब्रिटिश भारत का सर्वोच्च पद गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया नहीं था।
➣ भारत का प्रथम गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक था। वह पहले से बंगाल का गवर्नर-जनरल था और 1833 के अधिनियम के बाद उसी पद का विस्तार होकर वह भारत का पहला गवर्नर-जनरल बना।
➣ केंद्रीय विधायी शक्ति को मजबूत करना 1833 की विशेषता थी। मद्रास और बंबई की स्वतंत्र विधायी शक्तियों को समाप्त करके कानून बनाने की शक्ति गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल में केंद्रित की गई।
➣ परिषद् में जोड़ा गया चौथा सदस्य सामान्य कार्यपालिका का पूर्ण सदस्य नहीं था। उसका मुख्य कार्य विधायी कार्यों में भाग लेना था। इसी पद पर बाद में लॉर्ड मैकाले प्रथम विधि सदस्य बने।
➣ प्रथम विधि आयोग की स्थापना का प्रावधान 1833 के अधिनियम से हुआ, जबकि आयोग का गठन 1834 में हुआ और इसके प्रथम अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले बने।
➣ सरकारी सेवाओं में धर्म, जन्मस्थान, वंश और रंग के आधार पर भेदभाव न करने का सिद्धांत 1833 में रखा गया था। इसे खुली प्रतियोगिता न समझें। सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था बाद में चार्टर एक्ट, 1853 से संबंधित है।
➣ भारतीय दंड संहिता (IPC) 1833 के अधिनियम द्वारा तत्काल लागू नहीं हुई थी। 1833 ने कानूनों के संहिताकरण की प्रक्रिया और विधि आयोग का आधार तैयार किया, जिसके बाद दंड संहिता का प्रारूप तैयार हुआ।
➣ दास प्रथा के संबंध में 1833 को भारत में दास प्रथा के पूर्ण कानूनी उन्मूलन का वर्ष नहीं मानना चाहिए। भारत में दासता से संबंधित अधिकारों को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कानून Indian Slavery Act, 1843 था।
➣ सेंट हेलेना का प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी से अलग किया गया। इसी कारण चार्टर एक्ट, 1833 को Saint Helena Act, 1833 के नाम से भी जाना जाता है।
➣ 1833 के बाद कंपनी भारत में व्यापारिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि मुख्यतः प्रशासनिक संस्था के रूप में रह गई। इसलिए 1833 को कंपनी के व्यापारिक इतिहास और प्रशासनिक इतिहास के बीच एक महत्वपूर्ण संक्रमण-बिंदु माना जाता है।
चार्टर एक्ट, 1833 – महत्वपूर्ण तथ्य
➣ चार्टर एक्ट, 1833 को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था और इसे कई बार Saint Helena Act, 1833 के नाम से भी जाना जाता है।
➣ यह अधिनियम ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक इतिहास का निर्णायक मोड़ था, क्योंकि इसके द्वारा कंपनी के सभी व्यापारिक अधिकार समाप्त कर दिए गए।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 में कंपनी का भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हुआ था, जबकि 1833 में चाय तथा चीन के साथ व्यापार का शेष एकाधिकार भी समाप्त कर दिया गया।
➣ 1833 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का स्वरूप मुख्यतः व्यापारिक संस्था से प्रशासनिक संस्था में परिवर्तित हो गया।
➣ बंगाल के गवर्नर-जनरल के पद को परिवर्तित करके गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया का पद बनाया गया।
➣ भारत का प्रथम गवर्नर-जनरल – लॉर्ड विलियम बेंटिक।
➣ गवर्नर-जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत के नागरिक एवं सैन्य प्रशासन पर व्यापक नियंत्रण प्रदान किया गया।
➣ मद्रास और बंबई की स्वतंत्र विधायी शक्तियों को समाप्त करके कानून बनाने की शक्ति को गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल में केंद्रित किया गया।
➣ गवर्नर-जनरल की परिषद् में चौथा सदस्य जोड़ा गया, जिसे मुख्यतः विधायी कार्यों के लिए नियुक्त किया जाना था।
➣ परिषद् के चौथे सदस्य को विधि सदस्य (Law Member) कहा गया। इस पद पर प्रथम नियुक्ति लॉर्ड मैकाले की हुई।
➣ प्रथम विधि आयोग की स्थापना का प्रावधान 1833 के अधिनियम से हुआ। इसका उद्देश्य भारत में कानूनों की समीक्षा, एकरूपता एवं संहिताकरण था।
➣ प्रथम विधि आयोग का गठन 1834 में हुआ और इसके प्रथम अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले थे।
➣ सरकारी सेवाओं में किसी व्यक्ति को केवल धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर पद से वंचित न करने का सिद्धांत धारा 87 से संबंधित था।
➣ 1833 में सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता लागू नहीं हुई थी। खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था बाद में चार्टर एक्ट, 1853 से संबंधित थी।
➣ यूरोपीय लोगों के लिए भारत में निवास, व्यापार तथा संपत्ति प्राप्त करने के अवसरों को अधिक व्यापक बनाया गया।
➣ भारत में दास प्रथा के उन्मूलन की दिशा में 1833 में कदम उठाया गया, लेकिन भारत में दासता का पूर्ण कानूनी उन्मूलन Indian Slavery Act, 1843 से संबंधित था।
➣ सेंट हेलेना का प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी से हटाकर ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया।
➣ कंपनी के भारतीय क्षेत्रों तथा उनसे प्राप्त राजस्व को कंपनी द्वारा क्राउन के लिए ट्रस्ट के रूप में धारण किए जाने की व्यवस्था की गई।
➣ कंपनी के भारतीय क्षेत्रों पर उसका प्रशासनिक अधिकार 30 अप्रैल, 1854 तक जारी रखने का प्रावधान किया गया था।
➣ 1833 के बाद कंपनी के भारतीय क्षेत्रों का प्रशासन कंपनी के व्यापारिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक शासन के लिए किया जाना था।
Leave a Reply