लाहौर अधिवेशन (1940) : पाकिस्तान की माँग, जिन्ना और द्विराष्ट्र सिद्धांत

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लाहौर प्रस्ताव (1940) : परिचय

➣ लाहौर प्रस्ताव (1940) मुस्लिम लीग की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसके माध्यम से मुस्लिम लीग ने पहली बार भारतीय संवैधानिक भविष्य के प्रश्न को मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की मांग से स्पष्ट रूप से जोड़ दिया।

➣ हालांकि 1940 के इस प्रस्ताव में पाकिस्तान शब्द का सीधे प्रयोग नहीं किया गया था, बाद में इसे पाकिस्तान प्रस्ताव या लाहौर प्रस्ताव के नाम से जाना गया।

➣ 1930 के दशक के अंतिम वर्षों तक भारत के भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया था कि विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदायों के राजनीतिक हितों की सुरक्षा किस प्रकार की जाए।

➣ मुस्लिम नेताओं के एक वर्ग को आशंका थी कि केवल सामान्य बहुमत पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुस्लिम समुदाय, विशेषकर मुस्लिम-बहुल प्रांतों के राजनीतिक हित, पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रहेंगे।

पृष्ठभूमि

➣ लाहौर प्रस्ताव (1940) अचानक सामने आई कोई नई मांग नहीं थी। इसके पीछे लंबे समय से विकसित हो रही मुस्लिम राजनीतिक पहचान, अलग प्रतिनिधित्व की मांग और हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक मतभेद की प्रक्रिया थी।

➣ समय के साथ यह विचार मजबूत होता गया कि मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए उन्हें अलग राजनीतिक अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए।

द्विराष्ट्र सिद्धांत का बीजारोपण

➣ भारत में द्विराष्ट्र सिद्धांत का विचार धीरे-धीरे विकसित हुआ। सर सैयद अहमद खान ने हिंदू और मुसलमानों को अलग सामाजिक और राजनीतिक समुदायों के रूप में देखने पर जोर दिया।

➣ उन्होंने कांग्रेस की राजनीति से मुसलमानों को सावधान रहने की सलाह दी। उनके विचारों को बाद में विकसित हुई मुस्लिम अलगाववादी राजनीति की शुरुआती पृष्ठभूमि के रूप में देखा जाता है।

➣ 1906 के शिमला डेपुटेशन और उसके बाद मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909) ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की।

➣ इससे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के लिए अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की धारणा को संवैधानिक आधार मिला और साम्प्रदायिक राजनीति को संस्थागत रूप मिलने लगा।

➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद मुस्लिम राजनीतिक हितों को अलग संगठन के माध्यम से उठाने की प्रक्रिया मजबूत हुई।

➣ हालांकि इस समय मुस्लिम लीग की मांग अभी सीधे अलग राष्ट्र की मांग नहीं थी, लेकिन अलग राजनीतिक पहचान और राजनीतिक सुरक्षा का विचार लगातार मजबूत होता गया।

एकता के दौर के बाद बढ़ते मतभेद

➣ भारतीय राजनीति में कुछ समय के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता का दौर भी आया। लखनऊ समझौता (1916) इस एकता का महत्वपूर्ण उदाहरण था।

इसके अंतर्गत कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल को स्वीकार किया और दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधारों के प्रश्न पर मिलकर मांग रखी।

➣ इस समझौते का तत्काल उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग को मजबूत करना था, लेकिन पृथक निर्वाचक मंडल को कांग्रेस की स्वीकृति ने मुस्लिमों को एक अलग राजनीतिक समुदाय के रूप में प्रतिनिधित्व देने की धारणा को भी मजबूत किया।

आगे चलकर सामुदायिक राजनीतिक पहचान के इसी आधार ने द्विराष्ट्र सिद्धांत के विकास के लिए अनुकूल राजनीतिक वातावरण तैयार किया।

➣ हालांकि लखनऊ समझौते को सीधे द्विराष्ट्र सिद्धांत की शुरुआत कहना सही नहीं होगा। इसे उस विचार की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने वाली महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में समझना अधिक उचित है।

पृथक निर्वाचक मंडल ने धार्मिक पहचान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने की प्रवृत्ति को संवैधानिक रूप दिया।

➣ खिलाफत और असहयोग आंदोलन (1919–22) के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता और मजबूत हुई। लेकिन यह एकता स्थायी नहीं रही और 1920 के दशक के मध्य से साम्प्रदायिक तनाव तथा दंगों की घटनाओं ने दोनों समुदायों के बीच अविश्वास को बढ़ाना शुरू किया।

➣ इसके बाद संवैधानिक प्रश्नों पर मतभेद फिर गहरे हुए। नेहरू रिपोर्ट (1928) ने संयुक्त निर्वाचक मंडल का समर्थन किया और पृथक निर्वाचन व्यवस्था को समाप्त करने का सुझाव दिया।

➣ इसके जवाब में मुहम्मद अली जिन्ना ने 1929 के चौदह सूत्र प्रस्तुत किए, जिनमें पृथक निर्वाचक मंडल, प्रांतीय स्वायत्तता और मुस्लिम हितों की संवैधानिक सुरक्षा पर जोर दिया गया।

संवैधानिक मतभेदों का बढ़ना

➣ गोलमेज सम्मेलनों (1930–32) के दौरान साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व और भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था पर चर्चा हुई, लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के बीच स्थायी सहमति नहीं बन सकी। साम्प्रदायिक पंचाट (1932) ने भी विभिन्न समुदायों के लिए अलग प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को और आगे बढ़ाया।

➣ भारत शासन अधिनियम, 1935 के बाद प्रांतीय स्वायत्तता और चुनावी राजनीति का महत्व बढ़ गया। इससे यह प्रश्न और गंभीर हो गया कि स्वतंत्र भारत में केंद्र और प्रांतों के बीच शक्ति का बँटवारा किस प्रकार होगा तथा मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के राजनीतिक हितों की रक्षा कैसे की जाएगी।

अलग राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता का विचार

➣ 1930 के दशक के अंत तक मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के एक वर्ग में यह विचार मजबूत होने लगा कि केवल अल्पसंख्यक अधिकारों और सामान्य संवैधानिक सुरक्षा से मुस्लिम राजनीतिक हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं होगी।

➣ विशेष रूप से पंजाब, बंगाल, सिंध, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान जैसे मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की भावी राजनीतिक स्थिति महत्वपूर्ण प्रश्न बन गई।

➣ अब चर्चा केवल इस बात तक सीमित नहीं थी कि मुसलमानों को कितनी सीटें मिलेंगी। प्रश्न यह भी बन गया कि मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को अपनी राजनीतिक व्यवस्था में कितना अधिकार और स्वायत्तता मिलेगी। इसी सोच ने अलग राजनीतिक इकाइयों की संभावना पर विचार को बल दिया।

➣ इस समय तक “दो अलग राजनीतिक राष्ट्र” की धारणा मुस्लिम राजनीतिक विचार में अधिक स्पष्ट रूप लेने लगी थी। इसके अनुसार हिंदू और मुसलमान केवल दो धार्मिक समुदाय नहीं, बल्कि अपने अलग इतिहास, संस्कृति, सामाजिक परंपराओं और राजनीतिक हितों वाले समुदाय हैं। यही विचार आगे चलकर द्विराष्ट्र सिद्धांत के रूप में अधिक स्पष्ट हुआ।

➣ इस बदलती राजनीतिक सोच के बीच मुस्लिम लीग के सामने यह आवश्यकता महसूस हुई कि वह भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था के बारे में अपनी मांग को स्पष्ट रूप से सामने रखे।

➣ इसी पृष्ठभूमि में मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया।

लाहौर अधिवेशन (1940)

➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का 27वाँ वार्षिक अधिवेशन 22–24 मार्च 1940 को लाहौर के मिंटो पार्क में आयोजित किया गया।

➣ अधिवेशन के अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना थे। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भारत की संवैधानिक समस्या को केवल सामान्य हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक मतभेद के रूप में नहीं देखा,

➣ बल्कि दोनों समुदायों की अलग राजनीतिक पहचान और उनके लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने मुस्लिम लीग के संगठन को पूरे भारत में मजबूत करने और मुस्लिम हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट राजनीतिक दिशा तय करने पर बल दिया।

➣ जिन्ना का मानना था कि भारत की समस्या का समाधान ऐसी संवैधानिक व्यवस्था से नहीं हो सकता जिसमें केवल संख्यात्मक बहुमत के आधार पर सत्ता का निर्धारण हो। इसलिए उन्होंने मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक हितों और संवैधानिक सुरक्षा को केंद्र में रखा।

ए. के. फज़लुल हक़ द्वारा प्रस्ताव पेश करना

➣ अधिवेशन के दूसरे दिन, 23 मार्च 1940 को बंगाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री ए. के. फज़लुल हक़ ने वह ऐतिहासिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे बाद में लाहौर प्रस्ताव या पाकिस्तान प्रस्ताव कहा जाने लगा। इसका समर्थन चौधरी खलीक़ुज़्ज़माँ ने किया।

➣ प्रस्ताव के समर्थन में पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत, बलूचिस्तान, बंगाल तथा भारत के अन्य क्षेत्रों से आए मुस्लिम लीग नेताओं ने भी अपने विचार रखे। फज़लुल हक़ ने प्रस्ताव रखते हुए मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के भविष्य और उनके राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न सामने रखा।

➣ उनके प्रस्ताव में केवल अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा की बात नहीं थी, बल्कि मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था में संगठित करने की बात कही गई जिसमें उन्हें स्वायत्त और संप्रभु इकाइयों के रूप में अधिकार प्राप्त हों।

➣ प्रस्ताव पर अधिवेशन में लंबे समय तक चर्चा हुई। अलग-अलग प्रांतों के प्रतिनिधियों ने मुस्लिम राजनीतिक भविष्य, संवैधानिक व्यवस्था और मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की स्थिति पर अपने विचार रखे।

➣ इससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रस्ताव केवल किसी एक प्रांत या नेता की मांग नहीं था, बल्कि मुस्लिम लीग के अखिल भारतीय मंच पर प्रस्तुत एक संगठित राजनीतिक प्रस्ताव बन चुका था।

➣ 24 मार्च 1940 को चर्चा के बाद लाहौर प्रस्ताव को मुस्लिम लीग ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मुस्लिम लीग ने भारत के भावी संवैधानिक ढाँचे के संबंध में मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए स्वतंत्र राजनीतिक व्यवस्था की मांग को औपचारिक रूप से अपनी नीति का हिस्सा बना लिया।

➣ प्रस्ताव में उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों के मुस्लिम-बहुल इलाकों को समूहों में संगठित कर स्वतंत्र राज्य बनाने की बात कही गई थी। बाद के वर्षों में यही प्रस्ताव लोकप्रिय रूप से पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम से जाना जाने लगा।

तथ्यविवरण विवरण
अधिवेशन मुस्लिम लीग का 27वाँ वार्षिक अधिवेशन
तिथि 22–24 मार्च 1940
स्थान मिंटो पार्क, लाहौर
अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना
प्रस्ताव पेश करने वाले ए. के. फज़लुल हक़
समर्थन चौधरी खलीक़ुज़्ज़माँ
प्रस्ताव पेश 23 मार्च 1940
स्वीकृति 24 मार्च 1940
मूल नाम Lahore Resolution
बाद का लोकप्रिय नाम Pakistan Resolution
महत्वपूर्ण तथ्य मूल प्रस्ताव में Pakistan शब्द नहीं था।

लाहौर प्रस्ताव की मुख्य बातें

➣ लाहौर प्रस्ताव, 1940 में मुस्लिम लीग ने भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था के लिए कुछ मूल सिद्धांत निर्धारित किए।

➣ प्रस्ताव ने भारत शासन अधिनियम, 1935 में प्रस्तावित संघीय व्यवस्था को मुस्लिम भारत के लिए अनुपयुक्त और अस्वीकार्य बताया तथा एक नई संवैधानिक योजना की आवश्यकता पर जोर दिया।

मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों का पुनर्गठन

➣ प्रस्ताव में कहा गया कि भारत के भौगोलिक रूप से जुड़े हुए क्षेत्रों को इस प्रकार पुनर्गठित किया जाए कि मुस्लिम-बहुल इलाके अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में संगठित हो सकें।

➣ विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भारत के उन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया जहाँ मुसलमान संख्या में बहुसंख्यक थे। आवश्यकता पड़ने पर इन क्षेत्रों की क्षेत्रीय सीमाओं में आवश्यक पुनर्समायोजन करने की बात भी कही गई।

➣ इसका उद्देश्य केवल वर्तमान प्रांतीय सीमाओं को बनाए रखना नहीं था, बल्कि मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को उनकी जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति के आधार पर नए राजनीतिक क्षेत्रों में संगठित करना था।

➣ इस प्रकार प्रस्ताव ने क्षेत्रीय पुनर्गठन को भावी संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनाया।

स्वतंत्र राज्य और स्वायत्त इकाइयाँ

➣ लाहौर प्रस्ताव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मुस्लिम-बहुल उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों को मिलाकर स्वतंत्र राज्य गठित करने की बात कही गई।

➣ मूल प्रस्ताव में Pakistan शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था और स्वतंत्र राज्य बहुवचन में लिखा गया था।

प्रस्ताव में आगे कहा गया कि इन राज्यों के भीतर शामिल संघटक इकाइयों को स्वायत्त और संप्रभु बनाया जाए।

➣ इसका अर्थ था कि प्रस्तावित राजनीतिक इकाइयों के भीतर संघटक इकाइयों को पर्याप्त स्वायत्तता और संप्रभु अधिकार प्राप्त हों। इसलिए 1940 के मूल प्रस्ताव को बाद में विकसित हुए एक केंद्रीकृत पाकिस्तान के विचार के साथ सीधे समान मानना सही नहीं होगा।

अल्पसंख्यकों के लिए संवैधानिक सुरक्षा

➣ प्रस्ताव में केवल मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की राजनीतिक व्यवस्था की बात नहीं की गई थी, बल्कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया गया।

➣ प्रस्ताव के अनुसार नए राज्यों और उनके क्षेत्रों में रहने वाले अल्पसंख्यकों के लिए पर्याप्त, प्रभावी और अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षात्मक प्रावधान दिए जाने चाहिए।

➣ इन सुरक्षात्मक प्रावधान का संबंध अल्पसंख्यकों के धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारों तथा अन्य हितों से था। साथ ही यह भी कहा गया कि इन सुरक्षा उपायों को संबंधित अल्पसंख्यकों से परामर्श करके तय किया जाए।

➣ यह प्रावधान केवल प्रस्तावित मुस्लिम-बहुल राज्यों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं था। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि भारत के उन अन्य क्षेत्रों में जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक होंगे, वहाँ मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए भी इसी प्रकार की प्रभावी और अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा होनी चाहिए।

केंद्र की शक्तियों के संबंध में विचार

➣ प्रस्ताव ने मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को अपनी संवैधानिक व्यवस्था में व्यापक अधिकार देने की दिशा में विचार रखा।

➣ मुस्लिम लीग की कार्यसमिति को आगे ऐसी संवैधानिक योजना तैयार करने का अधिकार दिया गया जिसमें संबंधित क्षेत्रों को रक्षा, विदेश मामले, संचार, सीमा शुल्क तथा आवश्यक अन्य विषयों पर अधिकार प्राप्त हो सकें।

➣ इससे स्पष्ट होता है कि लाहौर प्रस्ताव केवल तत्काल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं था, बल्कि मुस्लिम लीग ने इसमें भविष्य की संवैधानिक संरचना के कुछ मूल सिद्धांत भी निर्धारित किए थे।

➣ हालाँकि इन सिद्धांतों की अंतिम संवैधानिक रूपरेखा 1940 के प्रस्ताव में पूरी तरह स्पष्ट नहीं की गई थी।

पाकिस्तान की माँग और मुस्लिम लीग की राजनीति

➣ लाहौर प्रस्ताव (1940) के बाद मुस्लिम लीग की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया। अब उसका मुख्य राजनीतिक लक्ष्य केवल मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त करना नहीं रहा, बल्कि मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की मांग को आगे बढ़ाना बन गया।

➣ इस बदलाव ने अगले कुछ वर्षों में पाकिस्तान की मांग को मुस्लिम लीग की केंद्रीय राजनीतिक नीति बना दिया।

जिन्ना का Two-Nation तर्क

➣ लाहौर अधिवेशन में मुहम्मद अली जिन्ना ने हिंदू और मुसलमानों को केवल दो धार्मिक समुदायों के रूप में नहीं, बल्कि अलग राजनीतिक राष्ट्रों के रूप में प्रस्तुत करने का तर्क दिया।

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➣ जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में मुसलमानों को केवल अल्पसंख्यक नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया। यही तर्क आगे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के राजनीतिक विस्तार का प्रमुख आधार बना।

➣ उनके अनुसार दोनों समुदायों की धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सामाजिक रीति-रिवाज, कानून, साहित्य, ऐतिहासिक स्मृतियाँ और सांस्कृतिक परंपराएँ भी अलग थीं।

➣ उन्होंने विशेष रूप से मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों – जैसे बंगाल, पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान – का उल्लेख करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में मुसलमानों की बहुसंख्या उनके अलग राजनीतिक भविष्य का आधार है।

➣ जिन्ना का तर्क था कि ऐसी संवैधानिक व्यवस्था जिसमें केवल संख्यात्मक बहुमत के आधार पर सत्ता तय हो, मुस्लिम राजनीतिक हितों के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं देगी।

➣ उनके अनुसार हिंदू और मुसलमानों को एक ही केंद्रीय राजनीतिक व्यवस्था में केवल बहुमत और अल्पसंख्यक के संबंध में रखने से स्थायी राजनीतिक संघर्ष की संभावना बनी रहेगी।

मुस्लिम राजनीतिक पहचान का विस्तार

➣ 1940 के बाद मुस्लिम लीग ने मुस्लिम राजनीतिक पहचान को अपने संगठन का प्रमुख आधार बनाया। लीग ने विभिन्न प्रांतों में संगठन को मजबूत करने, स्थानीय मुस्लिम नेताओं को अपने साथ जोड़ने और मुस्लिम जनता के बीच पाकिस्तान की मांग को समझाने पर विशेष ध्यान दिया।

➣ स्वयं जिन्ना ने 1940 के भाषण में संगठन को मजबूत करने और पूरे भारत में मुस्लिम लीगों को संगठित करने पर जोर दिया था।

➣ इस प्रक्रिया में मुस्लिम लीग ने मुस्लिम प्रेस, राजनीतिक सभाओं, छात्र संगठनों और स्थानीय नेतृत्व का भी उपयोग किया।

➣ पाकिस्तान की मांग को केवल उच्च वर्ग के नेताओं के संवैधानिक तर्क के रूप में नहीं, बल्कि मुस्लिम जनता के भविष्य और राजनीतिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया गया।

➣ हालांकि यह समर्थन 1940 में तुरंत पूरे भारत के सभी मुस्लिम-बहुल प्रांतों में समान स्तर पर नहीं था। शोध के अनुसार पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान जैसे मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में मुस्लिम लीग को पाकिस्तान की मांग के लिए मजबूत आधार तैयार करने में अभी संगठनात्मक प्रयास करने पड़े।

पाकिस्तान की मांग का राजनीतिक विस्तार

➣ लाहौर प्रस्ताव के बाद मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को भविष्य की संवैधानिक वार्ताओं का केंद्रीय मुद्दा बना दिया। अब जब भी भारत के भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था पर चर्चा होती, लीग अपनी मांग को मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की अलग राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ती थी।

➣ इससे ब्रिटिश सरकार और अन्य भारतीय राजनीतिक दलों के सामने मुस्लिम लीग को एक स्वतंत्र संवैधानिक पक्ष के रूप में स्वीकार करना अधिक आवश्यक हो गया।

➣ इस राजनीतिक रणनीति का उद्देश्य केवल पाकिस्तान की मांग रखना नहीं था, बल्कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों की प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि संस्था के रूप में स्थापित करना भी था।

➣ इसी अवधि में मुस्लिम लीग ने यह तर्क अधिक जोर से प्रस्तुत करना शुरू किया कि यदि ब्रिटिश शासन समाप्त होने के बाद सत्ता एक ऐसे केंद्रीय ढाँचे में चली जाती है जहाँ संख्या के आधार पर बहुमत स्थायी रूप से प्रभावी रहेगा, तो मुसलमानों के राजनीतिक हित कमजोर हो सकते हैं।

➣ इसके विपरीत मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में अलग संवैधानिक व्यवस्था से वे अपनी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुसार शासन कर सकेंगे।

मुस्लिम जनता और पाकिस्तान की मांग

➣ पाकिस्तान की मांग को व्यापक जनसमर्थन दिलाने के लिए लीग ने मुस्लिम प्रेस, सार्वजनिक सभाओं, छात्र संगठनों और स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क के माध्यम से प्रचार बढ़ाया।

➣ Pakistan धीरे-धीरे एक ऐसे राजनीतिक विचार के रूप में सामने आने लगा जिसे मुस्लिम लीग भारतीय मुसलमानों की सुरक्षा और राजनीतिक आत्मनिर्णय से जोड़ रही थी।

➣ इस प्रचार में केवल धार्मिक पहचान पर जोर नहीं था। लीग ने यह भी तर्क दिया कि मुसलमानों के आर्थिक हित, प्रशासनिक भागीदारी, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए ऐसी संवैधानिक व्यवस्था आवश्यक है जिसमें उन्हें अपने बहुल क्षेत्रों में पर्याप्त राजनीतिक शक्ति प्राप्त हो।

➣ 1940 से 1945 के बीच इसी राजनीतिक प्रचार और संगठन विस्तार के परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग का आधार कई क्षेत्रों में मजबूत हुआ।

➣ 1940 के समय जो पाकिस्तान प्रस्ताव मुख्यतः संवैधानिक सिद्धांत के रूप में सामने आया था, वह कुछ वर्षों में व्यापक जनराजनीतिक मांग में बदलने लगा।

लाहौर प्रस्ताव पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया

➣ लाहौर प्रस्ताव (1940) को कांग्रेस ने भारत की राष्ट्रीय एकता और भावी संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती के रूप में देखा।

➣ कांग्रेस की मूल धारणा थी कि भारत में रहने वाले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य समुदाय मिलकर एक भारतीय राष्ट्र का निर्माण करते हैं। इसलिए किसी धार्मिक समुदाय के आधार पर अलग राजनीतिक राज्यों की मांग को कांग्रेस स्वीकार नहीं करती थी।

➣ कांग्रेस का मानना था कि मुस्लिम समुदाय की धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चिंताओं को एक संयुक्त भारतीय संविधान के भीतर पर्याप्त सुरक्षा दी जा सकती है।

➣ उसके अनुसार अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षात्मक प्रावधान, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक संस्थाओं की व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन इसके लिए भारत का विभाजन आवश्यक नहीं है।

नेहरू की प्रतिक्रिया और पाकिस्तान की मांग का विरोध

➣ 13 अप्रैल 1940 को जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर प्रस्ताव और पाकिस्तान की मांग पर अपनी स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस मांग को भारत की एकता के लिए गंभीर चुनौती माना और पाकिस्तान की योजना को स्वीकार नहीं किया।

➣ उनके अनुसार भारत की राजनीतिक समस्या का समाधान देश के विभाजन में नहीं, बल्कि स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत की स्थापना में होना चाहिए।

➣ नेहरू ने मुस्लिम लीग की उस धारणा को भी स्वीकार नहीं किया कि हिंदू और मुसलमान अनिवार्य रूप से दो अलग राजनीतिक राष्ट्र हैं।

➣ कांग्रेस की दृष्टि में धार्मिक भिन्नता अपने आप में अलग राष्ट्र होने का आधार नहीं थी। भारतीय राष्ट्रवाद का आधार साझा राजनीतिक जीवन, आर्थिक हित और स्वतंत्रता का संघर्ष था।

➣ कांग्रेस के भीतर यह भी धारणा थी कि यदि भारत को धार्मिक आधार पर अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों में बाँटा गया, तो इससे केवल वर्तमान समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि आगे भी सीमा, अल्पसंख्यक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित नई समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। इसलिए कांग्रेस विभाजन के बजाय संवैधानिक समझौते और संयुक्त भारत के पक्ष में रही।

संयुक्त भारत और संविधान सभा का विचार

➣ कांग्रेस चाहती थी कि स्वतंत्र भारत का संविधान भारतीय जनता द्वारा चुनी गई संविधान सभा के माध्यम से बनाया जाए।

➣ उसका विचार था कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था ब्रिटिश सरकार द्वारा ऊपर से तय करने के बजाय भारतीय जनता की स्वतंत्र इच्छा से निर्धारित होनी चाहिए।

➣ कांग्रेस के लिए इस संविधान सभा का उद्देश्य केवल स्वतंत्र भारत का संविधान बनाना नहीं था, बल्कि ऐसा राजनीतिक ढाँचा तैयार करना भी था जिसमें विभिन्न समुदायों के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी सुरक्षित रहें।

➣ इस व्यवस्था में मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को संवैधानिक उपायों के माध्यम से सुनिश्चित करने की बात की जाती थी।

➣ इस दृष्टिकोण का मूल आधार संयुक्त भारत और संयुक्त नागरिकता था। कांग्रेस धार्मिक पहचान के आधार पर अलग संप्रभु राज्यों के गठन के बजाय ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहती थी जिसमें सभी समुदाय एक ही भारतीय राजनीतिक ढाँचे का हिस्सा हों।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मूल मतभेद

➣ लाहौर प्रस्ताव के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मूल अंतर केवल किसी एक संवैधानिक प्रावधान को लेकर नहीं था, बल्कि भारत की राजनीतिक प्रकृति को लेकर था।

➣ कांग्रेस भारत को एक संयुक्त राष्ट्र मानती थी, जबकि मुस्लिम लीग मुस्लिमों को एक अलग राजनीतिक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर रही थी।

➣ इसी कारण दोनों के समाधान भी अलग थे। कांग्रेस संयुक्त भारत + संवैधानिक सुरक्षा के माध्यम से समस्या का समाधान चाहती थी, जबकि मुस्लिम लीग मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था को अधिक सुरक्षित मान रही थी। यही मूल वैचारिक अंतर आगे चलकर 1940 के दशक की संवैधानिक वार्ताओं में बार-बार सामने आया।

पहलू कांग्रेस का दृष्टिकोण मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण
राष्ट्र की अवधारणा भारत एक संयुक्त राष्ट्र हिंदू और मुसलमान अलग राजनीतिक राष्ट्र
मुस्लिम अधिकार संवैधानिक safeguards से सुरक्षा अलग राजनीतिक व्यवस्था को अधिक सुरक्षित मानना
भारत का विभाजन विरोध मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था
संविधान निर्माण निर्वाचित संविधान सभा मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था
मुख्य राजनीतिक आधार संयुक्त भारतीय राष्ट्रवाद मुस्लिम राजनीतिक राष्ट्रवाद

सिख नेतृत्व की प्रतिक्रिया और पंजाब का प्रश्न

➣ लाहौर प्रस्ताव के बाद पंजाब का प्रश्न सिख राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया। प्रस्ताव में मुस्लिम-बहुल उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों को अलग राजनीतिक व्यवस्था में संगठित करने की बात कही गई थी और पंजाब इसका प्रमुख हिस्सा था।

➣ इसलिए सिख नेतृत्व के सामने यह चिंता पैदा हुई कि यदि पंजाब मुस्लिम-बहुल राजनीतिक इकाई का हिस्सा बना रहा, तो भविष्य में सिखों की राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक स्थिति किस प्रकार सुरक्षित रहेगी।

➣ पंजाब में सिख आबादी महत्वपूर्ण थी, लेकिन वे पूरे प्रांत में बहुसंख्यक नहीं थे। दूसरी ओर पंजाब मुस्लिम-बहुल प्रांत था। इसलिए सामान्य बहुमत पर आधारित किसी भावी राजनीतिक व्यवस्था में सिखों को आशंका थी कि उनका राजनीतिक प्रभाव उनकी वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति की तुलना में कम हो सकता है।

➣ यही कारण था कि सिख नेतृत्व केवल धार्मिक अधिकारों की नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा की भी मांग करने लगा।

➣ सिखों की चिंता केवल विधानसभा में सीटों की संख्या तक सीमित नहीं थी। पंजाब में उनकी कृषि भूमि, नहरों से जुड़े हित, व्यापारिक गतिविधियाँ, प्रमुख गुरुद्वारे और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल भी महत्वपूर्ण थे।

➣ इसलिए किसी ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण, जिसमें मुस्लिम बहुमत स्थायी राजनीतिक शक्ति प्राप्त कर सके, सिख नेतृत्व के लिए व्यापक चिंता का विषय बन गया।

मास्टर तारा सिंह और अकाली दल की प्रतिक्रिया

➣ मास्टर तारा सिंह और अकाली नेतृत्व ने लाहौर प्रस्ताव को सिखों के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा। उनका तर्क था कि यदि पंजाब पाकिस्तान का हिस्सा बनता है, तो मुस्लिम बहुमत के अधीन सिखों के धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक हित पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रहेंगे।

➣ इसलिए उन्होंने पाकिस्तान की मांग का विरोध किया और सिखों के लिए स्पष्ट संवैधानिक सुरक्षा की मांग को आगे बढ़ाया।

➣ अकाली नेतृत्व की प्रतिक्रिया केवल कांग्रेस के साथ खड़े होने तक सीमित नहीं थी। सिख नेताओं के बीच यह चर्चा भी होने लगी कि यदि पंजाब का भविष्य मुस्लिम लीग की मांग के अनुसार तय किया जाता है, तो सिखों को अपने राजनीतिक भविष्य के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था या पर्याप्त स्वायत्तता की मांग करनी पड़ सकती है।

➣ इस प्रकार लाहौर प्रस्ताव ने सिख राजनीति में पंजाब किस प्रकार की राजनीतिक इकाई होगा? का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण बना दिया।

➣ इस समय सिख नेतृत्व का एक वर्ग अभी तत्काल पंजाब के विभाजन की मांग पर नहीं पहुँचा था। प्रारंभिक चिंता मुख्यतः इस बात पर थी कि संयुक्त पंजाब में मुस्लिम राजनीतिक प्रभुत्व की स्थिति में सिखों के अधिकार किस प्रकार सुरक्षित किए जाएँ।

➣ बाद में परिस्थितियों और संवैधानिक वार्ताओं की विफलता के साथ सिख राजनीति का रुख अधिक कठोर होता गया।

पंजाब के भविष्य का प्रश्न

➣ लाहौर प्रस्ताव के बाद पंजाब का प्रश्न केवल मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच विवाद नहीं रहा। अब सिख नेतृत्व भी पंजाब के भविष्य का स्वतंत्र राजनीतिक पक्ष बन गया।

➣ सिख नेतृत्व चाहता था कि किसी भी संवैधानिक योजना में उनकी जनसंख्या, भूमि, धार्मिक स्थलों और राजनीतिक हितों को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाए।

➣ यही कारण था कि आगे की संवैधानिक वार्ताओं में सिख प्रतिनिधित्व और पंजाब की स्थिति लगातार महत्वपूर्ण विषय बने रहे।

➣ मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग को आगे बढ़ा रही थी, कांग्रेस संयुक्त भारत की पक्षधर थी और सिख नेतृत्व इन दोनों के बीच अपने स्वतंत्र सामुदायिक हितों की सुरक्षा का रास्ता खोज रहा था।

➣ इस राजनीतिक स्थिति को देखते हुए लाहौर प्रस्ताव सिखों के लिए केवल पाकिस्तान के प्रश्न तक सीमित घटना नहीं था। इसने उनके सामने पंजाब की क्षेत्रीय अखंडता, सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य की संवैधानिक सुरक्षा का व्यापक प्रश्न खड़ा कर दिया। इसी चिंता ने अगले कुछ वर्षों में अकाली राजनीति को और अधिक सक्रिय बनाया।

पहलू तथ्य
मुख्य चिंता मुस्लिम-बहुल पंजाब में सिखों की राजनीतिक सुरक्षा
प्रमुख नेता मास्टर तारा सिंह
मुख्य राजनीतिक संगठन अकाली दल
मुख्य आशंका पाकिस्तान बनने पर मुस्लिम राजनीतिक प्रभुत्व
सुरक्षा की मांग राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक safeguards
संबंधित हित धार्मिक स्थल, भूमि, आर्थिक हित और राजनीतिक प्रतिनिधित्व
दीर्घकालीन प्रभाव पंजाब के भविष्य को लेकर सिख राजनीति का अधिक सक्रिय होना

क्रिप्स मिशन और पाकिस्तान की माँग (1942)

प्रांतों को संघ से बाहर रहने का विकल्प

➣ क्रिप्स प्रस्ताव के अनुसार युद्ध के बाद एक नया भारतीय संघ बनाया जाना था और उसके लिए संविधान तैयार करने हेतु एक संविधान-निर्माण निकाय गठित किया जाना था।

➣ लेकिन प्रस्ताव की महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि कोई भी प्रांत नए संघ में शामिल होने से इंकार कर सकता था और अपने लिए अलग संविधान बना सकता था। ऐसे प्रांत को संघ के समान संवैधानिक दर्जा प्राप्त होना था।

➣ इस प्रावधान ने मुस्लिम लीग के लिए विशेष महत्व पैदा किया। क्योंकि मुस्लिम-बहुल प्रांतों को प्रस्तावित भारतीय संघ से बाहर रहने का रास्ता मिल सकता था, इसलिए लीग के कुछ नेताओं ने इसमें पाकिस्तान की संभावित संवैधानिक दिशा देखी। लेकिन यह प्रावधान सीधे पाकिस्तान को मान्यता नहीं देता था।

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

➣ मुस्लिम लीग ने क्रिप्स प्रस्तावों को अंततः स्वीकार नहीं किया। उसका मुख्य तर्क था कि प्रस्ताव में मुस्लिम राष्ट्र और पाकिस्तान के अधिकार को स्पष्ट रूप से मान्यता नहीं दी गई थी।

➣ 2 अप्रैल 1942 को मुस्लिम लीग की कार्यसमिति ने प्रस्तावों पर विचार करते हुए कहा कि उनमें पाकिस्तान की संभावना का संकेत तो मिलता है, लेकिन मुस्लिम राष्ट्र के स्वतंत्र अस्तित्व और आत्मनिर्णय के अधिकार को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। लीग के अनुसार प्रस्ताव का मुख्य ढाँचा अभी भी एक भारतीय संघ के निर्माण पर आधारित था।

➣ 3 अप्रैल 1942 को इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के खुले अधिवेशन में जिन्ना ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम लीग का लक्ष्य पाकिस्तान है और ऐसा कोई प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता जो इस लक्ष्य की निश्चित गारंटी न देता हो।

➣ इसके बाद 5 अप्रैल 1942 को जिन्ना ने मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में क्रिप्स प्रस्तावों की विस्तृत आलोचना की। उन्होंने कहा कि प्रांतों को संघ से बाहर रहने का विकल्प देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि प्रस्ताव यह स्पष्ट नहीं करता कि ऐसे प्रांत स्वतंत्र रहेंगे या किसी अलग संघ का निर्माण करेंगे।

➣ जिन्ना की दूसरी बड़ी आपत्ति यह थी कि प्रस्ताव में मुस्लिम राष्ट्र की राजनीतिक एकता और आत्मनिर्णय के अधिकार को स्पष्ट रूप से मान्यता नहीं दी गई थी। उनके अनुसार केवल यह संभावना छोड़ देना कि कोई प्रांत संघ से बाहर रह सकता है, पाकिस्तान की मांग का स्पष्ट संवैधानिक समाधान नहीं था।

लाहौर प्रस्ताव और क्रिप्स मिशन के बीच संबंध

➣ लाहौर प्रस्ताव (1940) में मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए स्वतंत्र राज्य की बात कही गई थी। दो वर्ष बाद क्रिप्स प्रस्ताव में प्रांतों को भारतीय संघ से बाहर रहने का विकल्प दिया गया।

➣ इसलिए मुस्लिम लीग ने क्रिप्स योजना में अपने विचार की आंशिक संभावना तो देखी, लेकिन उसे लाहौर प्रस्ताव की मांग के बराबर नहीं माना।

➣ इस अंतर को समझना परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। लाहौर प्रस्ताव मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की अलग राजनीतिक व्यवस्था की मांग को सामने रखता था, जबकि क्रिप्स प्रस्ताव एक भारतीय संघ को आधार बनाते हुए प्रांतों को उसमें शामिल न होने का विकल्प देता था।

➣ मुस्लिम लीग चाहती थी कि यह विकल्प केवल प्रांतीय असहमति न होकर मुस्लिमों के स्वतंत्र राष्ट्रीय आत्मनिर्णय की स्पष्ट स्वीकृति बने।

क्रिप्स मिशन और पाकिस्तान की माँग का आगे का विकास

➣ क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद भी मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को कमजोर नहीं किया। इसके विपरीत, लीग ने इसे भारतीय संवैधानिक समस्या के स्थायी समाधान के रूप में और अधिक मजबूती से प्रस्तुत किया।

➣ जिन्ना ने अप्रैल 1942 में स्पष्ट किया कि मुस्लिम लीग की राजनीतिक दिशा में पाकिस्तान ही अंतिम लक्ष्य है।

➣ इस प्रकार क्रिप्स मिशन ने पाकिस्तान की मांग को सीधे स्वीकार नहीं किया, लेकिन उसकी योजना में प्रांतों के अलग रहने का प्रावधान एक महत्वपूर्ण संवैधानिक तत्व बनकर सामने आया।

➣ आगे की राजनीति में यही प्रश्न – क्या भारत एक संघ रहेगा और क्या किसी प्रांत को उससे अलग होने का अधिकार होगा – केंद्रीय विवादों में शामिल हो गया।

➣ इसलिए क्रिप्स मिशन (1942) का महत्व केवल इसकी विफलता में नहीं था। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय संवैधानिक समस्या में अब अलग मुस्लिम राजनीतिक व्यवस्था की मांग को नजरअंदाज करके समाधान निकालना कठिन होता जा रहा था।

शिमला सम्मेलन, कैबिनेट मिशन और पाकिस्तान की ओर बढ़ता संघर्ष (1945–46)

➣ 1945–46 तक भारत की संवैधानिक समस्या अपने निर्णायक चरण में पहुँच चुकी थी। लाहौर प्रस्ताव (1940) के बाद मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग पर लगातार जोर दे रही थी, जबकि कांग्रेस संयुक्त भारत के पक्ष में बनी हुई थी।

शिमला सम्मेलन और मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व का दावा

➣ 25 जून से 14 जुलाई 1945 तक शिमला में लॉर्ड वेवेल की योजना के आधार पर सम्मेलन हुआ। इसका उद्देश्य नई वायसराय कार्यकारिणी के गठन के माध्यम से राजनीतिक गतिरोध को कम करना था।

➣ लेकिन सम्मेलन का सबसे बड़ा विवाद यह बना कि कार्यकारिणी में मुस्लिम सदस्यों को नामित करने का अधिकार किसे प्राप्त होगा।

➣ मुहम्मद अली जिन्ना का दावा था कि मुस्लिम लीग ही भारत के मुसलमानों की एकमात्र राजनीतिक प्रतिनिधि संस्था है, इसलिए सभी मुस्लिम सदस्यों का नामांकन लीग के माध्यम से होना चाहिए।

➣ कांग्रेस इस दावे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। इस प्रश्न पर सहमति न बनने के कारण शिमला सम्मेलन असफल हो गया।

➣ शिमला की विफलता का महत्व यह था कि इससे यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद केवल संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित नहीं था, बल्कि मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कौन करेगा – यह स्वयं एक बड़ा प्रश्न बन चुका था। इस स्थिति ने आगे की संवैधानिक वार्ताओं को और कठिन बना दिया।

कैबिनेट मिशन और पाकिस्तान की मांग

➣ मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान खोजने के लिए कैबिनेट मिशन भेजा। मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने तथा सत्ता हस्तांतरण की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास किया।

➣ कैबिनेट मिशन ने पाकिस्तान की मांग को सीधे स्वीकार नहीं किया। इसके स्थान पर उसने भारत की एकता बनाए रखते हुए मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की राजनीतिक चिंताओं को समायोजित करने का संवैधानिक समाधान प्रस्तुत किया।

➣ मुस्लिम लीग ने प्रारंभ में इस प्रस्ताव में अपनी मांग के लिए कुछ संभावनाएँ देखीं, लेकिन बाद में दोनों पक्षों के बीच योजना की व्याख्या और उसके क्रियान्वयन को लेकर गंभीर मतभेद पैदा हो गए।

➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति टूटने के बाद मुस्लिम लीग ने यह निष्कर्ष निकाला कि पाकिस्तान की मांग को केवल संवैधानिक बातचीत के माध्यम से प्राप्त करना कठिन होगा।

➣ जुलाई 1946 के बाद लीग का रुख अधिक कठोर हो गया और उसने अपनी मांग के समर्थन में प्रत्यक्ष राजनीतिक दबाव बढ़ाने की दिशा अपनाई।

➣ इस प्रकार शिमला सम्मेलन की विफलता ने मुस्लिम लीग के प्रतिनिधित्व के दावे को और मजबूत किया, जबकि कैबिनेट मिशन की विफलता ने संयुक्त भारत के भीतर संवैधानिक समझौते की संभावनाओं को कमजोर कर दिया। इसके बाद राजनीति तेजी से टकराव और सांप्रदायिक तनाव की दिशा में बढ़ी।

पाकिस्तान की माँग का विस्तार और विभाजन की ओर बढ़ता भारत (1942–47)

➣ लाहौर प्रस्ताव (1940) के बाद पाकिस्तान की मांग मुस्लिम लीग की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बन गई। इसके बाद होने वाली संवैधानिक वार्ताओं में लीग लगातार मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की मांग को आगे बढ़ाती रही।

➣ क्रिप्स मिशन (1942) के प्रस्तावों में प्रांतों को भविष्य की भारतीय संघीय व्यवस्था में शामिल न होने की संभावना दिए जाने से मुस्लिम लीग को अपनी मांग के लिए एक अतिरिक्त राजनीतिक आधार दिखाई दिया।

➣ हालांकि क्रिप्स प्रस्ताव ने सीधे पाकिस्तान की स्थापना को स्वीकार नहीं किया था, लेकिन प्रांतों के अलग रहने की संभावना ने अलग राजनीतिक व्यवस्था की चर्चा को आगे बढ़ाया।

➣ 1945 के शिमला सम्मेलन और 1946 के कैबिनेट मिशन के दौरान भी भारत के भावी संवैधानिक ढाँचे को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति नहीं बन सकी।

➣ मुस्लिम लीग ने अपने को भारतीय मुसलमानों का प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि बताते हुए पाकिस्तान की मांग को बनाए रखा। दूसरी ओर कांग्रेस एक संयुक्त भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की पक्षधर रही।

➣ 1946 के बाद राजनीतिक संघर्ष और अधिक तीखा हो गया। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को जन-राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया और Direct Action जैसी कार्रवाइयों के माध्यम से अपने राजनीतिक दबाव को बढ़ाया।

➣ 1947 तक स्थिति इस स्तर पर पहुँच गई कि संयुक्त भारत के प्रश्न पर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार के बीच समझौता संभव नहीं रहा। 3 जून 1947 की योजना के बाद भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त हुआ और अंततः भारत तथा पाकिस्तान दो स्वतंत्र राज्यों के रूप में अस्तित्व में आए।

पाकिस्तान नाम किसने दिया?

➣ पाकिस्तान नाम चोधरी रहमत अली ने दिया था। उन्होंने 28 जनवरी 1933 को कैम्ब्रिज से प्रकाशित अपने प्रसिद्ध पुस्तिका Now or Never, Are We to Live or Perish Forever? में पहली बार इस नाम को राजनीतिक रूप से प्रस्तावित किया।

➣ इस पुस्तिका में उन्होंने उत्तर-पश्चिमी भारत के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए एक अलग राजनीतिक इकाई की मांग रखी थी।

➣ रहमत अली के 1933 के विचार में पंजाब, अफगानिया (उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत), कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान प्रमुख क्षेत्र थे। Pakistan नाम इन्हीं मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को एक अलग राजनीतिक मातृभूमि के रूप में प्रस्तुत करने से जुड़ा था।

➣ रहमत अली ने Pakistan शब्द को इन क्षेत्रों के नामों से जोड़कर समझाया –

अक्षर / भाग क्षेत्र
P पंजाब (Punjab)
A अफ़ग़ानिया / उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (Afghania)
K कश्मीर (Kashmir)
S सिंध (Sindh)
TAN बलूचिस्तान (Baluchistan) से लिया गया

➣ Pakistan का शाब्दिक अर्थ फारसी और उर्दू में पवित्र लोगों की भूमि या Land of the Pure बताया गया।

➣ यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 1933 में रहमत अली द्वारा प्रस्तावित Pakistan की अवधारणा और 1940 के लाहौर प्रस्ताव की राजनीतिक योजना एक जैसी नहीं थी।

➣ रहमत अली का प्रारंभिक प्रस्ताव मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी मुस्लिम क्षेत्रों पर केंद्रित था, जबकि 1940 के लाहौर प्रस्ताव में उत्तर-पश्चिमी तथा पूर्वी मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को अलग राजनीतिक इकाइयों के रूप में संगठित करने की बात कही गई थी।

➣ एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 1940 के लाहौर प्रस्ताव के मूल पाठ में Pakistan शब्द नहीं था। प्रस्ताव में स्वतंत्र राज्य की बात की गई थी।

➣ बाद में पत्रकारिता और राजनीतिक विमर्श में लाहौर प्रस्ताव को पाकिस्तान प्रस्ताव कहा जाने लगा और Pakistan नाम मुस्लिम लीग की मांग से व्यापक रूप से जुड़ गया।

➣ मुहम्मद अली जिन्ना ने स्वयं भी बाद में स्पष्ट किया था कि Pakistan शब्द मुस्लिम लीग ने मूल रूप से नहीं गढ़ा था। उन्होंने इसे लंदन में रहने वाले उन युवा मुस्लिम राष्ट्रवादियों से जोड़ा जिन्होंने उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के लिए यह नाम प्रस्तावित किया था।

➣ बाद में मुस्लिम लीग ने इसी नाम को अपनी राजनीतिक मांग के साथ स्वीकार्य रूप से जोड़ लिया। मुस्लिम लीग के लिए पाकिस्तान नाम इसलिए उपयोगी था क्योंकि यह मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की अलग राजनीतिक इकाई की मांग को एक सरल और स्पष्ट पहचान देता था।

महत्वपूर्ण तथ्य

➣ लाहौर प्रस्ताव मुस्लिम लीग के 22–24 मार्च 1940 को लाहौर में आयोजित अधिवेशन में पारित किया गया। इसे बाद में पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम से भी जाना गया।

➣ लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता मुहम्मद अली जिन्ना ने की।

➣ 23 मार्च 1940 को बंगाल के नेता ए. के. फज़लुल हक़ ने लाहौर प्रस्ताव प्रस्तुत किया और चौधरी खलीक़ुज़्ज़माँ ने इसका समर्थन किया।

➣ 24 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

➣ “पाकिस्तान” नाम का श्रेय चौधरी रहमत अली को दिया जाता है। उन्होंने 28 जनवरी 1933 को कैम्ब्रिज से प्रकाशित पुस्तिका Now or Never, Are We to Live or Perish Forever? में इस नाम को सामने रखा।

➣ Pakistan नाम को सामान्यतः Punjab, Afghania, Kashmir, Sindh और Baluchistan के नामों से जोड़कर समझाया जाता है।

➣ 1940 के लाहौर प्रस्ताव के मूल पाठ में Pakistan शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था। बाद में यही प्रस्ताव लोकप्रिय रूप से पाकिस्तान प्रस्ताव कहलाने लगा।

➣ मूल प्रस्ताव में उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भारत के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को भौगोलिक रूप से जुड़े हुए क्षेत्रों के रूप में पुनर्गठित करने की बात कही गई थी।

➣ प्रस्ताव में ऐसे क्षेत्रों को मिलाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की बात कही गई थी। प्रस्ताव के अनुसार इन राज्यों की संघटक इकाइयों को स्वायत्त और संप्रभु होना था।

➣ मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से बाहर रहने वाले मुसलमानों सहित अन्य अल्पसंख्यकों के लिए भी संवैधानिक सुरक्षा की बात प्रस्ताव में की गई थी।

➣ लाहौर प्रस्ताव के पीछे मुस्लिम लीग की मुख्य चिंता यह थी कि संख्यात्मक बहुमत पर आधारित केंद्रीय शासन में मुस्लिम राजनीतिक हित पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रहेंगे।

➣ लाहौर प्रस्ताव के बाद मुस्लिम लीग की राजनीति केवल अल्पसंख्यक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की मांग उसकी केंद्रीय नीति बन गई।

➣ कांग्रेस ने लाहौर प्रस्ताव और पाकिस्तान की मांग का विरोध किया। कांग्रेस का दृष्टिकोण था कि भारत एक संयुक्त राष्ट्र है और विभिन्न समुदायों के अधिकारों की रक्षा संयुक्त भारत के संविधान में की जा सकती है।

➣ जवाहरलाल नेहरू ने अप्रैल 1940 में पाकिस्तान की मांग का विरोध किया और इसे भारतीय एकता के लिए गंभीर चुनौती माना।

➣ सिख नेतृत्व, विशेषकर मास्टर तारा सिंह और अकाली नेतृत्व, पंजाब के मुस्लिम-बहुल राजनीतिक ढाँचे को लेकर चिंतित था। उन्हें आशंका थी कि पाकिस्तान बनने की स्थिति में सिखों के राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक हित पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रहेंगे।

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