परिचय
➣ सिख धर्म भारत के प्रमुख एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है, जिसका उद्भव 15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पंजाब क्षेत्र में हुआ। इसकी स्थापना गुरु नानक देव ने की।
➣ सिख धर्म ने मध्यकालीन भारत में व्याप्त धार्मिक कट्टरता, जाति-भेद, छुआछूत, कर्मकाण्ड तथा सामाजिक असमानता का विरोध करते हुए समानता, सेवा एवं मानव-कल्याण का संदेश दिया।
➣ सिख धर्म का विकास भक्ति आंदोलन की निर्गुण परंपरा से प्रभावित वातावरण में हुआ। इस धर्म ने हिन्दू एवं इस्लामी सूफी परम्पराओं के श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों को अपनाते हुए एक स्वतंत्र धार्मिक पहचान विकसित की।
➣ सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव थे। उनके पश्चात् कुल दस मानव गुरु हुए, जिन्होंने लगभग ढाई शताब्दियों तक सिख धर्म का नेतृत्व किया।
➣ 1708 ई. में दशम गुरु गुरु गोविन्द सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित कर मानव गुरु-परंपरा का समापन कर दिया।
सिख शब्द का अर्थ
➣ सिख शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के “शिष्य” शब्द से मानी जाती है, जिसका अर्थ है—सीखने वाला, अनुयायी अथवा शिष्य। अर्थात् सिख वह है जो गुरु की शिक्षाओं का पालन करते हुए सत्य, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलता है।
प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| एकेश्वरवाद | सिख धर्म केवल एक निराकार एवं सर्वव्यापी ईश्वर में विश्वास करता है। |
| ईश्वर की अवधारणा | ईश्वर को एक ओंकार, अकाल पुरुष, निरंकार एवं वाहेगुरु जैसे नामों से संबोधित किया जाता है। |
| समानता | जाति, धर्म, लिंग एवं ऊँच-नीच के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाता। |
| सेवा | निःस्वार्थ सेवा (सेवा) एवं मानव कल्याण को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। |
| श्रम | ईमानदारी से श्रम करके आजीविका कमाने पर बल दिया गया है। |
| साझेदारी | अपनी आय एवं भोजन को दूसरों के साथ साझा करने की शिक्षा दी गई है। |
मूल सिद्धांत
➣ सिख धर्म का मूल आधार “एक ओंकार” का सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि ईश्वर एक है, वह निराकार, अजन्मा, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी एवं सृष्टि का एकमात्र रचयिता है। सिख धर्म में ईश्वर को वाहेगुरु, अकाल पुरुष तथा निरंकार जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।
➣ सिख धर्म में मूर्ति-पूजा, अंधविश्वास, जाति-भेद, छुआछूत, ऊँच-नीच तथा निरर्थक कर्मकाण्डों का समर्थन नहीं किया गया है। इसके स्थान पर सत्य, ईमानदारी, सेवा, परिश्रम, ईश्वर-स्मरण तथा मानव-कल्याण को धर्म का वास्तविक स्वरूप माना गया है।
➣ सिख धर्म के अनुसार सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं, इसलिए जन्म, जाति, लिंग, धर्म अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाता। समानता, भाईचारा एवं मानव-सेवा को धार्मिक जीवन का अनिवार्य अंग माना गया है।
➣ सिख परंपरा में आदर्श जीवन के तीन प्रमुख आधार बताए गए हैं—नाम जपो (ईश्वर का स्मरण एवं ध्यान), किरत करो (ईमानदारी एवं परिश्रम से आजीविका कमाना) तथा वंड छको (अपनी आय एवं भोजन को दूसरों के साथ बाँटना)। इन तीनों सिद्धांतों को सिख जीवन-पद्धति का आधार माना जाता है।
➣ सिख धर्म सेवा (निःस्वार्थ सेवा), संगत, लंगर तथा परोपकार की भावना पर विशेष बल देता है। प्रत्येक सिख को समाज के कमजोर एवं जरूरतमंद लोगों की सहायता करने तथा मानव-सेवा को ईश्वर-सेवा के समान मानने की प्रेरणा दी जाती है।
➣ इस प्रकार सिख धर्म के मूल सिद्धांत केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सत्य, समानता, परिश्रम, सेवा एवं नैतिक जीवन के माध्यम से एक आदर्श समाज की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।
| सिद्धांत | अर्थ |
|---|---|
| एक ओंकार | ईश्वर एक, निराकार एवं सर्वव्यापी है। |
| नाम जपो | ईश्वर का स्मरण एवं ध्यान करना। |
| किरत करो | ईमानदारी एवं परिश्रम से आजीविका कमाना। |
| वंड छको | अपनी आय एवं भोजन को दूसरों के साथ बाँटना। |
| सेवा | निःस्वार्थ मानव-सेवा को सर्वोच्च धर्म मानना। |
| समानता | जाति, धर्म, लिंग एवं ऊँच-नीच का भेदभाव न करना। |
प्रमुख संस्थाएँ
➣ सिख धर्म के प्रारम्भिक विकास में अनेक धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन संस्थाओं ने सिख समुदाय को संगठित करने, धर्म-प्रचार करने, सामाजिक समानता स्थापित करने तथा अनुयायियों में सेवा, भाईचारे एवं अनुशासन की भावना विकसित करने में विशेष योगदान दिया।
➣ सिख गुरुओं ने इन संस्थाओं के माध्यम से जाति-पाँति, ऊँच-नीच तथा सामाजिक भेदभाव का विरोध किया और सभी लोगों को समान रूप से धर्म एवं समाज-सेवा से जोड़ने का प्रयास किया।
| संस्था | उद्देश्य / कार्य |
|---|---|
| संगत | सिख अनुयायियों की धार्मिक सभा, जहाँ कीर्तन, सत्संग, गुरु-वाणी का श्रवण तथा धार्मिक विचारों का आदान-प्रदान किया जाता था। |
| पंगत | सभी लोगों का बिना किसी जाति, धर्म या सामाजिक भेदभाव के एक पंक्ति में बैठकर सामूहिक भोजन करना। |
| लंगर | निःशुल्क सामुदायिक भोजन व्यवस्था, जिसमें सभी व्यक्तियों को समान रूप से भोजन कराया जाता है। |
| मसंद प्रथा | गुरु के प्रतिनिधियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में धर्म-प्रचार करना, संगत का संगठन करना तथा श्रद्धालुओं से स्वैच्छिक अंशदान (दसवंध) एकत्र करना। |
➣ संगत सिख अनुयायियों की धार्मिक एवं सामाजिक सभा थी, जहाँ गुरु-वाणी का प्रचार, कीर्तन तथा आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती थी। इससे सिख समुदाय में संगठन, अनुशासन एवं धार्मिक एकता को बल मिला।
➣ पंगत सामाजिक समानता का प्रतीक थी। इसमें सभी व्यक्ति बिना किसी जाति, धर्म, लिंग अथवा सामाजिक भेदभाव के एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे। इससे ऊँच-नीच एवं छुआछूत जैसी कुरीतियों को समाप्त करने में सहायता मिली।
➣ लंगर की व्यवस्था का उद्देश्य सभी लोगों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराना तथा सेवा और परोपकार की भावना को बढ़ावा देना था। आज भी प्रत्येक गुरुद्वारे में लंगर की परंपरा समानता एवं मानव-सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।
➣ मसंद प्रथा के अंतर्गत गुरु के प्रतिनिधि विभिन्न क्षेत्रों में सिख धर्म का प्रचार करते थे तथा श्रद्धालुओं से दसवंध एकत्र कर गुरु तक पहुँचाते थे। बाद में मसंदों में बढ़ते भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं के कारण गुरु गोविन्द सिंह ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया।
➣ इन संस्थाओं ने सिख धर्म को केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक संगठित, अनुशासित एवं समाज-सुधारक समुदाय के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
धार्मिक पहचान
➣ सिख धर्म की अपनी विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान है, जो इसके पवित्र ग्रंथ, पूजा-पद्धति, धार्मिक संस्थाओं तथा सेवा और समानता की परंपराओं पर आधारित है।
➣गुरु ग्रंथ साहिब, गुरुद्वारा, लंगर, संगत एवं पंगत जैसी व्यवस्थाएँ सिख धर्म की मूल पहचान हैं और इन्हीं के माध्यम से इसके सिद्धांतों एवं आदर्शों का पालन किया जाता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| धार्मिक ग्रंथ | गुरु ग्रंथ साहिब |
| पूजा-स्थल | गुरुद्वारा |
| सामूहिक भोजन | लंगर |
| धार्मिक सभा | संगत |
| समानता का प्रतीक | पंगत |
| गुरु के प्रतिनिधि | मसंद |
| कीर्तन गायक | रागी |
दसवंध
➣ दसवंध सिख धर्म की एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सामाजिक परंपरा है, जिसके अनुसार प्रत्येक सिख को अपनी आय का लगभग दसवाँ भाग (10%) धर्म, समाज एवं मानव-सेवा के कार्यों के लिए समर्पित करने की प्रेरणा दी जाती है।
➣ दसवंध का उद्देश्य केवल आर्थिक सहयोग देना नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व, सेवा-भाव तथा परोपकार की भावना को विकसित करना है। सिख धर्म में इसे निःस्वार्थ सेवा (सेवा) का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।
➣ प्रारम्भिक काल में विभिन्न क्षेत्रों में नियुक्त मसंद श्रद्धालुओं से दसवंध एकत्रित कर गुरु तक पहुँचाते थे। इस धन का उपयोग धर्म-प्रचार, लंगर व्यवस्था, गुरुद्वारों के संचालन, गरीबों की सहायता तथा जनकल्याण के कार्यों में किया जाता था।
➣ बाद में गुरु गोविन्द सिंह ने मसंदों में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं के कारण मसंद प्रथा को समाप्त कर दिया। इसके पश्चात् श्रद्धालु सीधे गुरु अथवा धार्मिक संस्थाओं को अपनी स्वैच्छिक भेंट अर्पित करने लगे।
गुरु का स्थान
➣ सिख धर्म में गुरु को ईश्वर और मानव के बीच आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना जाता है। गुरु मनुष्य को सत्य, ज्ञान, ईश्वर-भक्ति तथा सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है और उसे अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है।
➣ सिख परंपरा के अनुसार गुरु की वाणी को ईश्वर की वाणी के समान पवित्र माना गया है। इसलिए सिख धर्म में गुरु के उपदेशों का पालन करना आध्यात्मिक जीवन का आधार माना जाता है।
➣ सिख धर्म में क्रमशः दस मानव गुरु हुए, जिन्होंने लगभग ढाई शताब्दियों तक सिख समुदाय का नेतृत्व किया तथा धर्म के धार्मिक, सामाजिक एवं संगठनात्मक स्वरूप का विकास किया।
➣ 1708 ई. में दशम गुरु गुरु गोविन्द सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित कर मानव गुरु-परंपरा का समापन कर दिया। इसके बाद से सिख धर्म में किसी मानव गुरु की परंपरा नहीं रही।
➣ वर्तमान में गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं। प्रत्येक धार्मिक निर्णय, उपदेश एवं धार्मिक अनुष्ठान गुरु ग्रंथ साहिब की शिक्षाओं के अनुसार सम्पन्न किए जाते हैं।
गुरुद्वारा
➣ सिख धर्म के पूजा-स्थल को गुरुद्वारा कहा जाता है। ‘गुरुद्वारा’ का शाब्दिक अर्थ है—गुरु तक पहुँचने का द्वार। यह केवल उपासना का स्थान नहीं, बल्कि धार्मिक शिक्षा, सेवा, कीर्तन, लंगर तथा सामाजिक सहयोग का प्रमुख केन्द्र भी होता है।
➣ प्रत्येक गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतिष्ठापना की जाती है। श्रद्धालु गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेककर श्रद्धा प्रकट करते हैं तथा उसकी वाणी का श्रवण कर आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
➣ गुरुद्वारों में नियमित रूप से कीर्तन, अरदास, कथा, संगत तथा लंगर का आयोजन किया जाता है। लंगर में बिना किसी जाति, धर्म, लिंग अथवा सामाजिक भेदभाव के सभी लोगों को एक साथ बैठाकर भोजन कराया जाता है, जो समानता और भाईचारे का प्रतीक है।
➣ गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी का मधुर गायन करने वाले व्यक्तियों को रागी कहा जाता है। ये रागों के माध्यम से गुरु-वाणी का कीर्तन करते हैं, जिससे श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त होती है।
➣ विश्वभर के गुरुद्वारे सेवा, समानता, मानव-कल्याण तथा सामुदायिक सहयोग के केन्द्र माने जाते हैं। इनमें किसी भी धर्म, जाति या देश का व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के प्रवेश कर सकता है।
पाँच तख्त
➣ सिख धर्म में तख्त सर्वोच्च धार्मिक, आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक अधिकार-केन्द्र माने जाते हैं। ‘तख्त’ का शाब्दिक अर्थ सिंहासन होता है। ये वे पवित्र स्थान हैं जहाँ सिख इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं तथा जहाँ से समय-समय पर धार्मिक एवं सामुदायिक निर्णय लिए गए।
➣ वर्तमान में सिख धर्म के पाँच तख्त मान्यता प्राप्त हैं। इनमें तीन तख्त पंजाब में तथा एक-एक बिहार एवं महाराष्ट्र में स्थित है। इन सभी तख्तों का सिख धर्म में विशेष धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व है।
| तख्त | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| अकाल तख्त | अमृतसर (पंजाब) | सिखों की सर्वोच्च धार्मिक एवं सांसारिक सत्ता का केन्द्र; स्थापना गुरु हरगोविन्द ने 1606 ई. में की। |
| तख्त श्री केशगढ़ साहिब | आनन्दपुर साहिब (पंजाब) | 1699 ई. में गुरु गोविन्द सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना का स्थान। |
| तख्त श्री पटना साहिब | पटना (बिहार) | गुरु गोविन्द सिंह का जन्मस्थान। |
| तख्त श्री सचखंड हुजूर साहिब | नांदेड़ (महाराष्ट्र) | यहीं 1708 ई. में गुरु गोविन्द सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित किया तथा यहीं उनका देहावसान हुआ। |
| तख्त श्री दमदमा साहिब | तलवंडी साबो, बठिंडा (पंजाब) | गुरु गोविन्द सिंह ने यहाँ गुरु ग्रंथ साहिब का अंतिम संपादन कराया तथा इसे गुरु की काशी भी कहा जाता है। |
➣ अकाल तख्त सिखों का सर्वोच्च धार्मिक एवं सांसारिक अधिकार-केन्द्र है, जबकि हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) सिखों का सबसे पवित्र तीर्थस्थल है। दोनों अमृतसर में एक ही परिसर में स्थित हैं, परन्तु हरिमंदिर साहिब पाँच तख्तों में शामिल नहीं है।
➣ पाँचों तख्त सिख इतिहास, परंपरा एवं धार्मिक आस्था के प्रमुख केन्द्र हैं। समय-समय पर सिख समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण धार्मिक निर्णय इन्हीं तख्तों से लिए जाते रहे हैं।
दस सिख गुरु एवं उनका प्रमुख योगदान
➣ सिख धर्म के विकास में दस मानव गुरुओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। प्रत्येक गुरु ने सिख धर्म को नई दिशा प्रदान की तथा धार्मिक, सामाजिक एवं संगठनात्मक विकास में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई। यह गुरु-परंपरा लगभग 239 वर्षों (1469–1708 ई.) तक चली।
➣ जहाँ प्रथम गुरु गुरु नानक देव ने सिख धर्म की स्थापना की वहीँ अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह ने 1708 ई. में गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित कर मानव गुरु-परंपरा का समापन किया।
| क्रम | गुरु | गुरुकाल | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|---|
| 1 | गुरु नानक देव | 1469–1539 ई. | सिख धर्म की स्थापना, संगत, पंगत एवं समानता का संदेश। |
| 2 | गुरु अंगद देव | 1539–1552 ई. | गुरुमुखी लिपि का विकास एवं प्रचार। |
| 3 | गुरु अमरदास | 1552–1574 ई. | मंजी प्रथा, सामाजिक सुधार एवं लंगर व्यवस्था को सुदृढ़ किया। |
| 4 | गुरु रामदास | 1574–1581 ई. | रामदासपुर (अमृतसर) की स्थापना। |
| 5 | गुरु अर्जुन देव | 1581–1606 ई. | आदि ग्रंथ का संकलन एवं हरमंदिर साहिब का निर्माण पूर्ण कराया। |
| 6 | गुरु हरगोविन्द | 1606–1644 ई. | मीरी-पीरी सिद्धांत एवं अकाल तख्त की स्थापना। |
| 7 | गुरु हरराय | 1644–1661 ई. | सिख संगठन को सुदृढ़ किया तथा सेवा एवं करुणा की परंपरा को आगे बढ़ाया। |
| 8 | गुरु हरकिशन | 1661–1664 ई. | महामारी के समय जनसेवा; “बाला पीर” के नाम से प्रसिद्ध। |
| 9 | गुरु तेगबहादुर | 1664–1675 ई. | धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा हेतु शहादत; आनन्दपुर साहिब का विकास। |
| 10 | गुरु गोविन्द सिंह | 1675–1708 ई. | खालसा पंथ की स्थापना तथा गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित किया। |
➣ दसों गुरुओं ने केवल धार्मिक उपदेश ही नहीं दिए, बल्कि समाज-सुधार, शिक्षा, संगठन, साहित्य, सैन्य शक्ति तथा मानव-सेवा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्हीं गुरुओं के प्रयासों से सिख धर्म एक संगठित एवं स्वतंत्र धार्मिक परंपरा के रूप में स्थापित हुआ।
➣ सिख गुरुओं द्वारा स्थापित संगत, पंगत, लंगर, गुरुमुखी लिपि, आदि ग्रंथ, अकाल तख्त तथा खालसा पंथ जैसी संस्थाएँ आज भी सिख धर्म की मूल पहचान हैं।
➣ प्रत्येक गुरु के जीवन, शिक्षाओं एवं योगदान का विस्तृत अध्ययन अलग-अलग किया जाता है, क्योंकि सभी गुरुओं ने सिख इतिहास में अपनी विशिष्ट एवं अमूल्य भूमिका निभाई है।
गुरु ग्रंथ साहिब
➣ गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म का सर्वोच्च धार्मिक ग्रंथ तथा सिखों का शाश्वत गुरु है। सिख धर्म में इसे केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवित गुरु के समान सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है। प्रत्येक गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतिष्ठापना की जाती है और सभी धार्मिक अनुष्ठान इसी की उपस्थिति में सम्पन्न होते हैं।
➣ सिख धर्म के पाँचवें गुरु गुरु अर्जुन देव ने सिख गुरुओं की वाणी को सुरक्षित रखने तथा सिख धर्म के प्रामाणिक सिद्धांतों को एक स्थान पर संकलित करने के उद्देश्य से 1604 ई. में आदि ग्रंथ का संकलन कराया। यही आगे चलकर गुरु ग्रंथ साहिब के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
➣ गुरु अर्जुन देव ने इस ग्रंथ के संकलन का कार्य अमृतसर में सम्पन्न कराया। इस कार्य में उनके प्रमुख सहयोगी एवं लिपिक भाई गुरदास थे, जिन्होंने गुरु अर्जुन देव के निर्देशानुसार संपूर्ण ग्रंथ को लिपिबद्ध किया।
➣ इस ग्रंथ की पहली प्रति तैयार होने के बाद 1604 ई. में इसे हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर), अमृतसर में स्थापित किया गया। इसके प्रथम ग्रंथी के रूप में बाबा बुद्धा जी को नियुक्त किया गया।
➣ प्रारम्भिक रूप में इस ग्रंथ को आदि ग्रंथ कहा जाता था। इसमें पहले पाँच सिख गुरुओं—गुरु नानक देव, गुरु अंगद देव, गुरु अमरदास, गुरु रामदास तथा गुरु अर्जुन देव—की वाणी संकलित की गई थी।
➣ इसके अतिरिक्त इसमें विभिन्न धर्मों एवं परम्पराओं के अनेक संतों और भक्तों की वाणी भी सम्मिलित की गई है। इनमें संत कबीर, संत रविदास, संत नामदेव, शेख फरीद, संत त्रिलोचन, संत धन्ना, संत पीपा, संत बेनी, संत साधना, संत जयदेव, संत रामानन्द आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार गुरु ग्रंथ साहिब धार्मिक समन्वय, मानव समानता तथा सार्वभौमिक भाईचारे का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।
➣ बाद में सिखों के नौवें गुरु गुरु तेगबहादुर की वाणी भी इसमें सम्मिलित की गई। इसका अंतिम एवं प्रमाणिक स्वरूप गुरु गोविन्द सिंह के निर्देशन में तैयार हुआ।
➣ 1708 ई. में नांदेड़ (महाराष्ट्र) स्थित तख्त श्री सचखंड हुजूर साहिब में गुरु गोविन्द सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया तथा इसके साथ ही मानव गुरु-परंपरा का समापन कर दिया। इसके बाद से सिख धर्म में गुरु ग्रंथ साहिब ही सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु माना जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
| विषय | विवरण |
|---|---|
| प्रारम्भिक नाम | आदि ग्रंथ |
| संकलक | गुरु अर्जुन देव |
| संकलन वर्ष | 1604 ई. |
| मुख्य लिपिक | भाई गुरदास |
| प्रथम स्थापना | हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर), अमृतसर |
| प्रथम ग्रंथी | बाबा बुद्धा जी |
| अंतिम रूप | गुरु गोविन्द सिंह द्वारा गुरु तेगबहादुर की वाणी सहित |
| शाश्वत गुरु घोषित | 1708 ई., गुरु गोविन्द सिंह |
| वर्तमान स्वरूप | सिखों का सर्वोच्च धार्मिक ग्रंथ एवं शाश्वत गुरु |
खालसा दल एवं मिसल व्यवस्था
➣ बंदा सिंह बहादुर की शहादत 1716 ई. के पश्चात् सिखों पर मुगल शासन का दमन बढ़ गया। इसके बावजूद सिख समुदाय ने संगठित होकर अपने धार्मिक एवं राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखा। इसी काल में सिखों की सामूहिक संगठन-व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ हुई।
➣ इस अवधि में शरबत खालसा तथा गुरुमत्ता जैसी संस्थाओं का विशेष महत्व था। बैसाखी तथा दीपावली जैसे प्रमुख अवसरों पर अमृतसर स्थित अकाल तख्त में सिख समुदाय की सामूहिक सभा आयोजित की जाती थी, जिसे शरबत खालसा कहा जाता था।
➣ शरबत खालसा में लिए गए सामूहिक निर्णयों को गुरुमत्ता कहा जाता था। सिख समुदाय इन निर्णयों को गुरु की आज्ञा के समान मानकर उनका पालन करता था। इस व्यवस्था ने विभिन्न सिख समूहों में एकता, अनुशासन एवं सामूहिक नेतृत्व की भावना को मजबूत किया।
➣ 1748 ई. में नवाब कपूर सिंह ने सिखों को संगठित कर दल खालसा का गठन किया। इसका उद्देश्य मुगल एवं अफ़ग़ान आक्रमणों का संगठित रूप से सामना करना तथा सिख समुदाय की रक्षा करना था।
➣ दल खालसा को आगे चलकर 12 स्वतंत्र सैन्य-संघों में विभाजित किया गया, जिन्हें मिसल कहा जाता था। प्रत्येक मिसल का अपना क्षेत्र, सेना, प्रशासन तथा नेता होता था। आवश्यकता पड़ने पर सभी मिसलें एकजुट होकर बाहरी शत्रुओं के विरुद्ध संयुक्त रूप से युद्ध करती थीं।
➣ यद्यपि प्रत्येक मिसल स्वतंत्र रूप से कार्य करती थी, फिर भी सभी मिसलें सिख धर्म, गुरु परंपरा तथा सामूहिक हितों के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध थीं। यही मिसल व्यवस्था आगे चलकर सिखों की राजनीतिक शक्ति का आधार बनी।
प्रमुख सिख मिसलें एवं उनके संस्थापक
| मिसल | प्रमुख संस्थापक / नेता |
|---|---|
| सिंहपुरिया मिसल | नवाब कपूर सिंह |
| अहलूवालिया मिसल | जस्सा सिंह अहलूवालिया |
| रामगढ़िया मिसल | जस्सा सिंह रामगढ़िया |
| भंगी मिसल | हरि सिंह ढिल्लों |
| कन्हैया मिसल | जय सिंह कन्हैया |
| सुकरचकिया मिसल | चरत सिंह |
| नकई मिसल | हीरा सिंह संधू |
| शहीद मिसल | बाबा दीप सिंह |
| निशानवालिया मिसल | संगत सिंह एवं मोहर सिंह |
| करोड़सिंघिया मिसल | बघेल सिंह |
| फुलकियाँ मिसल | फूल सिंह (फूल) |
| दल्लेवालिया मिसल | गुलाब सिंह |
➣ इन 12 मिसलों में प्रारम्भिक काल में भंगी मिसल सबसे अधिक शक्तिशाली मानी जाती थी। इसका प्रभाव पंजाब के बड़े भूभाग पर था और इसकी सैन्य शक्ति भी अन्य मिसलों की तुलना में अधिक थी।
➣ समय के साथ सुकरचकिया मिसल सबसे प्रभावशाली बनकर उभरी। इसके नेता महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी कूटनीति एवं सैन्य क्षमता के बल पर विभिन्न मिसलों को एकजुट किया।
➣ 1799 ई. में महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर पर अधिकार कर उसे अपनी राजधानी बनाया। बाद में उन्होंने अधिकांश सिख मिसलों को अपने अधीन संगठित कर एक शक्तिशाली एवं सुव्यवस्थित सिख साम्राज्य की स्थापना की, जो उत्तर-पश्चिम भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बन गया।
➣ इस प्रकार मिसल व्यवस्था ने न केवल सिखों को राजनीतिक एवं सैन्य दृष्टि से संगठित किया, बल्कि आगे चलकर सिख साम्राज्य की स्थापना का आधार भी तैयार किया।
भारत सरकार ने गुरु गोविन्द सिंह के छोटे साहिबज़ादों साहिबज़ादा जोरावर सिंह एवं साहिबज़ादा फतेह सिंह के अद्वितीय बलिदान की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 26 दिसम्बर को वीर बाल दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है।
Quick Revision
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| संस्थापक | गुरु नानक देव |
| स्थापना | 15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, पंजाब |
| मानव गुरु | कुल 10 |
| अंतिम मानव गुरु | गुरु गोविन्द सिंह |
| शाश्वत गुरु | गुरु ग्रंथ साहिब |
| पूजा-स्थल | गुरुद्वारा |
| प्रमुख संस्थाएँ | संगत, पंगत, लंगर, मसंद प्रथा |
| प्रमुख सिद्धांत | एक ओंकार, नाम जपो, किरत करो, वंड छको |
| पाँच तख्त | अकाल तख्त, केशगढ़ साहिब, पटना साहिब, हुजूर साहिब, दमदमा साहिब |
| दल खालसा | 1748 ई., नवाब कपूर सिंह |
| सबसे प्रसिद्ध मिसल | सुकरचकिया मिसल (महाराजा रणजीत सिंह) |
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