मुगल प्रशासन व्यवस्था | One-Liner Practice

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत मुगल प्रशासन व्यवस्था
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मुगल शासन व्यवस्था

❑ मुगल शासन प्रणाली भारतीय तथा विदेशी (इराकी) (अब्बासिद खलीफा तथा मिस्र के फातिमी खलीफा के नियमों का अनुसरण) प्रणालियों के सम्मिश्रण से बनी थी।

❑ यह भारतीय वातावरण में अरबी-फारसी प्रणाली थी।

❑ मुगल काल की राजभाषा फारसी थी तथा दरबार में इसे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त था।

❑ मुगल काल में फारसी भाषा की दो शैलियों–भारतीय शैली एवं ईरानी शैली का विकास हुआ।

❑ इसमें भारतीय शैली का प्रवर्तक अबुल फजल था।

बाबर से लेकर औरंगजेब तक सभी मुगल शासकों ने फारसी भाषा और साहित्य को संरक्षण प्रदान किया।

❑ शासन का अधिपति बादशाह था।

❑ वह प्रधान सेनापति, न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी, इस्लाम का संरक्षक एवं जनता का आध्यात्मिक नेता होता था।

अकबरकालीन मुगल राजत्व सिद्धान्त की स्पष्ट व्याख्या अबुल फजल ने ‘आइने-अकबरी’ में की है।

अबुल फजल ने ‘राजत्व’ के सम्बन्ध में लिखा है–”राजत्व ईश्वर का अनुग्रह है, यह उसी व्यक्ति को प्राप्त होता है जिस व्यक्ति में हजारों गुण एक साथ विद्यमान हों।”

❑ अर्थात् “राजसत्ता परमात्मा से फूटने वाला तेज और विश्व प्रकाशक सूर्य की एक किरण है।”

अकबर राजतन्त्र को धर्म एवं सम्प्रदाय से ऊपर मानता था।

❑ उसने रूढ़िवादी इस्लामी सिद्धान्त के स्थान पर ‘सुलह-कुल’ की नीति अपनायी।

मुगल प्रशासन सैन्य शक्ति पर आधारित एक केन्द्रीकृत व्यवस्था थी, जो नियन्त्रण एवं सन्तुलन पर आधारित थी।

मंत्रिपरिषद् को विजारत कहा जाता था।

वकील (वकील-ए-मुतलक)बादशाह के बाद शासन प्रबंध करने वाला सबसे बड़ा राजकर्मचारी वकील था।

❑ इसे बाद में वजीर कहा जाने लगा।

❑ इसे मंत्रियों को नियुक्त करने एवं पदच्युत करने का अधिकार था।

अकबर ने बैरम खाँ के बाद इस पद को समाप्त कर इसे दीवान, मीर बख्शी, मीर समन एवं सद्र—चार अलग भागों में बाँट दिया।

दीवान या वित्तमंत्री–यह आर्थिक विषयों में बादशाह का प्रतिनिधि था।

❑ वह शाही खजाने का प्रबंध और उसके हिसाब की जाँच करता था।

कर विभाग उसके अधीन था।

अकबर के समय पहले मुजफ्फर खाँ एवं बाद में राजा टोडरमल को दीवान नियुक्त किया गया।

❑ इसके दो सहायक थे–दीवान-ए-खालसा एवं दीवान-ए-जागीरी

मीर बख्शी–सेना के सभी अधिकारियों की तनख्वाह की जाँच मीर बख्शी करता था।

❑ वह सेना में राजकीय नियमों को जारी करता था तथा घोड़ों को दागने तथा मनसबदारों के अधिकार में रहने वाले सैनिकों की संख्या निर्धारित करता था।

❑ दो अन्य बख्शी होते थे–बख्शाये हुजूर एवं बख्शाये शाहिगर्द पेशा

प्रधानकाजी–यह प्रधान न्यायाधीश था।

काजी-उल-कुजात फौजदारी मुकद्दमों का मुस्लिम विधान के अनुसार फैसला करता था।

❑ वह प्रांत, जिला तथा नगर के काजियों की नियुक्ति करता था।

❑ इसके सहायक होते थे।

मुहतसिब–इसका कर्त्तव्य था कि शरीयत में मना किए गए कार्यों को करने से लोगों को रोके तथा साधारणतः जनता की दुश्चरित्रता को रोके। इनकी नियुक्ति औरंगजेब ने की थी।

प्रधान सद्र (सद्र-उस-सुदूर) – यह धार्मिक धन-सम्पत्ति तथा दातव्य विभाग का प्रधान होता था।

कोतवाल नगर के शासन का प्रधान होता था।

❑ गाँव का मुख्य अधिकारी ग्राम प्रधान होता था, जिसे खुत, मुकद्दम या चौधरी कहा जाता था।

मनसबदारी प्रथा

मनसबदारी प्रथामुगलकालीन सेना संगठन मनसबदारी प्रथा कहलाती थी।

अकबर ने मनसबदारी प्रथा का वैज्ञानिक ढंग से यथाशक्ति संगठन किया।

❑ साधारणतः मनसब का अर्थ पद अथवा प्रतिष्ठा होता है।

अकबर के काल में सबसे कम मनसब 10 का तथा सबसे ऊँचा मनसब 10,000 का था।

अकबर के शासनकाल के अंतिम दिनों में इसे 12,000 कर दिया गया।

5,000 से ऊपर के मनसब शहजादों के लिए सुरक्षित थे।

500 से 2,500 तक के मनसबदार उमरा, 3,000 तथा उसके ऊपर के मनसबदार उमरा-ए-आजम तथा 5,000 से ऊपर के मनसबदार सवार कहलाते थे।

मनसबदारों को वेतन में नकद रकम मिलती थी।

❑ वेतन में जागीरें भी दी जाती थीं।

मनसबदार के घोड़ों को दाग लगाया जाता था।

मनसबदारों को जात एवं सवार दो दर्जे दिए जाते थे।

जात से पता चलता है कि कितनी संख्या में हाथी, घोड़े तथा सामान ढोने की बैलगाड़ियाँ किसी मनसबदार को रखनी हैं।

सवार से दर्जे का बोध होता था कि मनसबदार को कितनी संख्या में घुड़सवार रखने हैं।

❑ यदि जात एवं सवार बराबर हों तो प्रथम श्रेणी, यदि सवार जात से कम हो तो द्वितीय श्रेणी तथा यदि सवार जात से आधे से कम हो तो तृतीय श्रेणी कहा जाता था।

दु-अस्पा वह मनसबदार होता था, जिसे निर्धारित घुड़सवार के साथ-साथ उतने ही घोड़े रखने पड़ते थे।

सिह-अस्पा वह मनसबदार होता था, जिसे दुगुने घोड़े रखने पड़ते थे।

❑ यह प्रथा जहाँगीर ने प्रारम्भ की थी। सर्वप्रथम यह पद महरवत खाँ को दिया गया था।

मुगल सेना पाँच भागों में विभाजित थी–पैदल, घुड़सवार, तोपखाना, हाथी और जल सेना

पैदल सेना दो प्रकार की थी–(1) अहशाम– इनके पास तलवार एवं छोटा भाला होता था। (2) सेहबन्दी – ये फौजियों की अपेक्षा नागरिक पुलिस का कार्य करते थे।

घुड़सवार दो प्रकार के थे–(1) बरगीर – इन घुड़सवारों को साज-सामान सरकार से मिलता था। (2) सिलेदार – ये अपने घोड़े तथा अस्त्र-शस्त्र स्वयं लाते थे। इनको बरगीर से अधिक वेतन मिलता था।

मुगल तोपखाना जिन्सी तथा दस्ती नामक दो विभागों में बँटा हुआ था।

मुगल अपनी निजी जल सेना नहीं रखते थे।

नावों के निरीक्षक मीरबहाल कहलाता था।

शाहजहाँ के शासनकाल में सरकार एवं परगना के मध्य चकला नाम की एक नई इकाई की स्थापना की गई थी।

औरंगजेब के समय में असद खाँ ने सर्वाधिक 31 वर्षों तक दीवान के पद पर कार्य किया।

शेरशाह द्वारा भू-राजस्व हेतु अपनाई जाने वाली राई पद्धति का उपयोग अकबर ने भी किया था।

अकबर के द्वारा करोड़ी नामक अधिकारी की नियुक्ति 1573 ई. में की गई थी।

❑ इसे अपने क्षेत्र से एक करोड़ दाम वसूल करना होता था।

दहसाला व्यवस्था1580 ई. में अकबर ने दहसाला नाम की नवीन कर प्रणाली प्रारम्भ की।

❑ इस व्यवस्था को ‘टोडरमल बन्दोबस्त’ भी कहा जाता है।

❑ यह रैय्यतवाड़ी व्यवस्था थी, जिसमें किसान सीधे ही प्रतिवर्ष लगान देने के लिए उत्तरदायी होते थे।

❑ इस व्यवस्था का वास्तविक प्रणेता टोडरमल था।

❑ इसके अंतर्गत अलग-अलग फसलों के पिछले दस वर्ष के उत्पादन और उसी समय के प्रचलित मूल्यों का औसत निकालकर, उस औसत का 1/3 भाग राजस्व के रूप में वसूला जाता था, जो नकद रूप में होता था।

❑ इस प्रणाली में 1/10 भाग हर वर्ष वसूला जाता था, जिसे माल-ए-हरसाला कहा जाता था।

❑ इस व्यवस्था में भूमि को चार भागों में विभाजित किया गया था।

भूमि के प्रकार व कृषक वर्ग

1570–71 ई. में टोडरमल ने खालसा भूमि पर भू-राजस्व की नवीन प्रणाली जब्ती प्रारम्भ की।

❑ इसमें कर निर्धारण की दो श्रेणियाँ थीं, एक को तखशीस एवं दूसरे को तहसील कहते थे।

औरंगजेब ने अपने शासनकाल में नस्क या कनकूत प्रणाली को अपनाया और भू-राजस्व की राशि को उपज का आधा कर दिया। यह एक प्रकार की ठेकेदारी व्यवस्था थी।

कनकूत प्रणाली को ‘दानाबन्दी’ भी कहा जाता था।

मुगलकाल में कर-निर्धारण की अन्य प्रणालियाँ भी प्रचलित थीं–‘बंटाई’ अथवा ‘गल्ला बख्शी’, इसे ‘माओली’ भी कहा जाता था।

अकबर ने सूर्य की गणना पर आधारित इलाही संवत् प्रचलित किया था, जिसे फसली संवत् भी कहा जाता था।

क्षेत्रफल की इकाई बीघा मानी जाती थी।

अकबर ने भूमि की पैमाइश हेतु 1586 ई. में सिकन्दरी गज (39 अंगुल या 32 इंच) के स्थान पर इलाही गज (41 अंगुल या 33½ इंच) को प्रचलित किया था।

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का आधार चाँदी का रुपया था।

दैनिक लेन-देन के लिए ताँबे के दाम का प्रयोग होता था।

एक रुपया में 40 दाम होते थे।

❑ सबसे बड़ा सिक्का ‘शंसब’ सोने का था।

स्वर्ण का सबसे प्रचलित सिक्का इलाही था।

जहाँगीर ने अपने समय में सिक्कों पर अपनी आकृति बनवायी तथा उस पर अपना एवं नूरजहाँ का नाम अंकित करवाया।

आना सिक्के का प्रचलन शाहजहाँ ने करवाया।

मुगलकाल में रुपये की सर्वाधिक ढलाई औरंगजेब के समय हुई।

भू-राजस्व के अतिरिक्त हिन्दुओं से जजिया तथा मुसलमानों से जकात नामक कर वसूल किए जाते थे।

1564 ई. में अकबर ने जजिया की वसूली समाप्त कर दी थी।

मुगलकालीन व्यापार एवं अर्थव्यवस्था

जकात मुसलमानों से उनकी सम्पत्ति का ढाई प्रतिशत प्रतिवर्ष लिया जाता था।

मुगलकाल में सीमा शुल्क, पेशकश, वजर आदि भी प्राप्त होते थे।

सीमाशुल्क (चुंगी) की दर वस्तु के मूल्य का ढाई प्रतिशत होती थी।

❑ कालान्तर में यह दर 3.5% हो गई थी।

मुगलकाल में आयात-निर्यात पर 3.5% तथा स्वर्ण-चाँदी पर 2% कर लिया जाता था।

मुगलकाल में खाद्य पदार्थों में गेहूँ, चावल, बाजरा और दाल (पलसेती) मुख्य थे।

आगरा के निकट बयाना तथा गुजरात में सरखेज से अच्छे किस्म की नील पैदा होती थी।

भारत में तम्बाकू का प्रचलन 1604 ई. के लगभग पुर्तगालियों द्वारा हुआ था।

❑ इसी समय मक्का की उपज प्रारम्भ की गई थी।

मुगलकाल में गन्ना, कपास, नील, रेशम आदि फसलों का उत्पादन होता था, जिन्हें ‘तिजारती’ (नकदी) तथा उत्तम फसलें कहा जाता था।

मुगलकाल में थोक व्यापारियों को सेठ, बोहरा एवं मोदी कहा जाता था तथा खुदरा व्यापारियों को वानिक कहते थे।

मुगलकाल में निर्यात की वस्तुएँ थीं–नील, शोरा, अफीम तथा सूती वस्त्र

मुगलकाल में आयात की वस्तुएँ थीं–स्वर्ण, चाँदी, कच्चा रेशम, घोड़े

शोरा कोरोमंडल तट एवं बिहार में उत्पादित होता था।

मुगलकाल में सोने-चाँदी का आयात इतना बढ़ गया था कि बर्नियर ने लिखा है, “विश्व के प्रत्येक भागों में चक्कर लगाने के बाद सोना-चाँदी भारत में दफन हो जाता है।”

मुगलकाल में गाँव में रहने वाले (अस्थायी रूप से) व्यापार को बिछैती (बिछायत) कहते थे और जो गाँव तक ही अपना व्यापार सीमित रखते थे, वे सहधानी कहलाते थे।

शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में सरकार एवं परगना के मध्य ‘चकला’ नाम की एक नई इकाई की स्थापना की।

समुद्री व्यापार में संलग्न मुस्लिम व्यापारी खोजा एवं बोहरा प्रमुख थे।

मुगल बादशाह सभी आयातों एवं निर्यातों पर 3½ प्रतिशत चुंगी लेते थे।

मुगलकाल में वस्तु विनिमय का माध्यम हुण्डी था。

हुण्डी एक प्रकार का अल्पकालीन ऋण था। यह वह चिट्ठी होती थी, जिसका भुगतान एक निश्चित अवधि के बाद कुछ कटौती करके किया जाता था।

अठारहवीं शताब्दी में बंगाल एवं गुजरात में ऋण प्रदान करने की एक नई व्यवस्था प्रारम्भ हुई, जिसे ददनी (अग्रिम संविदा एवं पेशगी) कहा जाता था।

बाबर ने काबुल में चाँदी का ‘शाहरुख’ तथा कन्धार में ‘बाबरी’ मुद्रा प्रचलित की थी।

शेरशाह की मुद्रा व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी। उसने शुद्ध चाँदी का रुपया (180 ग्रेन) और ताँबे का ‘दाम’ (380 ग्रेन) प्रचलित किया था।

अकबर ने अपने शासनकाल के प्रारम्भ में ‘मुहर’ नामक स्वर्ण मुद्रा प्रचलित की थी।

एक मुहर चाँदी के नौ रुपयों के बराबर थी।

जहाँगीर ने ‘निसार’ नामक सिक्का प्रचलित किया था, जो एक रुपये के चौथाई मूल्य के बराबर था।

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