परिचय
➣ सल्तनत काल में प्रशासनिक व्यवस्था पूर्ण रूप से इस्लाम धर्म पर आधारित थी। प्रशासनिक व्यवस्था मुख्य रूप से अरबी-फ़ारसी पद्धति पर आधारित थी।
➣ कुरान में वर्णित आदर्शों (शरा) के आधार पर ही मुस्लिम राज्य का गठन हुआ था। राजपूत राज्य की तरह मुस्लिमों ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना का प्रयास नहीं किया।
➣ प्रशासन में उलेमाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। इस्लामी कानूनों की व्याख्या उलेमा करते थे एवं इनका पालन राज्य और जनता दोनों के लिए ही आवश्यक था।
ख़लीफ़ा एंव सुल्तान
➣ दिल्ली के अधिकांश तुर्की सुल्तानों ने स्वतंत्र होते हुए भी सिद्धांततः खलीफा, जो मुस्लिम-राज्य एवं इस्लामी धर्म का प्रधान होता था, की सर्वोपरि सत्ता स्वीकार की।
➣ दिल्ली के सुल्तान अपने आपको खलीफा का नायब (सहयोगी) ही मानते थे। समस्त इस्लामी राज्य का सांविधानिक प्रधान खलीफा ही माना जाता था। फिर भी दिल्ली सल्तनत के तुर्क सुल्तानों ने ख़लीफ़ा को नाममात्र का ही प्रधान माना।
➣ इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था, जिसने 1229 ई में बग़दाद के ख़लीफ़ा से प्रार्थना कर नासिर-अमीर उलमोमिनीन (खलीफा से सहायक, नायब) की उपाधि प्राप्त की थी। जबकि अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने को ख़लीफ़ा का नाइब नहीं माना।
➣ यद्दपि दिल्ली सुल्तानों में अधिकांश ने अपने को खलीफा का नायब पुकारा, परन्तु कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी ने स्वयं को खलीफा घोषित किया। यह पहला सुल्तान था जिसने स्वंय को खलीफा घोषित किया।
➣ बलबन ने यद्यपि निरंकुश राजतंत्र की स्थापना की, वह अपने को जिल्ले अल्लाह (अल्लाह का प्रतिनिधि) मानता था। उसके अनुसार पैगम्बर के पश्चात खलीफा नहीं, बल्कि सुल्तान ही सर्वशक्तिशाली व्यक्ति था। उसकी आज्ञा की अवहेलना नहीं की जा सकती थी।
➣ क़ुतुबुद्दीन मुबारक़ ख़िलजी (अलाउद्दीन ख़िलजी का पुत्र ) पहला ऐसा सुल्तान था, जिसने खिलाफा के मिथक को तोड़कर स्वयं को ख़लीफ़ा घोषित किया।
➣ मुहम्मद तुग़लक़ ने अपने शासक काल के प्रारम्भ में ख़लीफ़ा को मान्यता नहीं दी, किन्तु शासन के अन्तिम चरण में उसने ख़लीफ़ा को मान्यता प्रदान कर दी। फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने अपने सिक्कों पर ख़लीफ़ा का नाम उत्कीर्ण करवाया था।
सल्तनत काल में उत्तराधिकारी
➣ गुलाम वंश में शक्ति मुख्य रूप से तुर्की ममलूकों (गुलाम सैनिकों) के हाथ में थी। वे ही सुल्तान चुनते थे।
➣ दिल्ली सल्तनत के मुस्लिम शासकों (खासकर तुर्की मूल के) में उत्तराधिकार का कोई स्थायी या निश्चित नियम नहीं था। यह मुख्य रूप से बल-प्रभाव, सैन्य शक्ति, अमीरों/तुर्की सरदारों की सहमति और कभी-कभी वंशानुगत दावे पर निर्भर करता था।
➣ अधिकांश मामलों में सुल्तान की मृत्यु के बाद अमीरों (नोबल्स) का समूह (जिसे चालीस या कुलीन वर्ग कहा जाता था) महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
➣ इल्तुतमिश ने वंशानुगत शासन का सिद्धांत स्थापित करने की कोशिश की। उसने अपनी पुत्री रजिया सुल्तान को उत्तराधिकारी घोषित किया। यह उस समय के लिए क्रांतिकारी कदम था क्योंकि मुस्लिम समाज में महिलाओं को आमतौर पर सिंहासन पर नहीं बिठाया जाता था।
➣ हालाँकि वंशानुगत शासन का सिद्धांत पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया था। अक्सर शक्तिशाली सेना या प्रभावशाली गुट वाला व्यक्ति सिंहासन प्राप्त कर लेता था। इसी कारण दिल्ली सल्तनत में बार-बार अस्थिरता, विद्रोह और हत्याएँ होती रहीं।
सुल्तान उपाधि की शुरुआत
➣ सुल्तान की उपाधि तुर्की शासकों द्वारा प्रारंभ की गई। यह उपाधि शक्ति और स्वतंत्रता का प्रतीक थी, साथ ही अब्बासी खलीफा की नाममात्र की अधीनता स्वीकार करते हुए।
➣ महमूद ग़ज़नवी सबसे पहला शासक था जिसने सुल्तान की उपाधि धारण की। इससे पहले शासक स्वयं को अमीर या अन्य उपाधियों से पुकारते थे।
➣ कई इतिहासकारों के अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने पूर्ण रूप से सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की या उसे स्वतंत्र रूप से नहीं अपनाया।
➣ शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211–1236 ई.), जो ऐबक का दामाद था, को दिल्ली सल्तनत का प्रथम पूर्ण सुल्तान अथवा वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
➣ आधुनिक इतिहासकार सामान्यतः कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान मानते हैं क्योंकि उसने 1206 ई. में ही स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया था। किंतु स्कूल एवं प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रायः इल्तुतमिश को प्रथम सुल्तान तथा ऐबक को केवल संस्थापक बताया जाता है।
➣ खिज्र खाँ (सैय्यद वंश का संस्थापक) को छोड़कर दिल्ली सल्तनत के लगभग सभी तुर्की शासकों ने सुल्तान की उपाधि धारण की।
➣ खिज्र खाँ ने रायात-ए-आला (उच्चतम ध्वज) की उपाधि अपनाई और स्वयं को सुल्तान नहीं कहा। इसका कारण तैमूर (तिमुर) के आक्रमण के बाद सत्ता की कमजोरी तथा तिमुरिदों की नाममात्र अधीनता स्वीकार करना था।
राजत्व का सिद्धान्त
➣ इल्तुतमिश के शासनकाल के दौरान सुल्तान की स्थिति कुलीन सरदारों से बहुत ऊपर नहीं थी। वह महान तुर्की अमीरों को अपने समकक्ष समझता था तथा सिंहासन पर बैठने में संकोच करता था।
➣ बलबन ने राजत्व को अमीरों से ऊपर रखा। बलबन ने अपने पुत्र बुगरा खाँ को समझाते हुए कहा कि राजत्व में देवत्व का अंश होता है जिसकी समानता कोई मनुष्य नहीं कर सकता। सुल्तान संसार में ईश्वर का प्रतिनिधि (नायब-ए-खुदाई) है।
➣ बलबन का राजत्व प्रतिष्ठा, शक्ति, न्याय, भय, उच्च कुलीनता व रक्त की शुद्धता पर आधारित था। जबकि जलालुद्दीन खिलजी का राजत्व उदार या कल्याणकारी निरंकुशवाद पर आधारित था।
➣ सर्वप्रथम बलबन ने अपने आप को जिल्ले इलाही घोषित किया। कालांतर में अलाउद्दीन और मुहम्मद बिन तुगलक ने भी स्वयं को जिल्ले इलाही घोषित किया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुल्तान पद की गरिमा को सदा सर्वोपरि रखा। उसने राजत्व में रक्त की शुद्धता व कुलीनता के स्थान पर योग्यता व राज्यहित को सर्वोच्चता दी गई और उसके लिए सिकन्दर-ए-सानी जैसी उपाधियाँ धारण की
➣ अलाउद्दीन खिलजी की भाँति मुहम्मद बिन तुगलक भी शासन में किसी वर्ग या व्यक्ति का हस्तक्षेप पसन्द नहीं करता था। प्रारम्भ में न तो उसने अपने सुल्तान पद के लिए खलीफा से स्वीकृति ली और न ही अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित करवाया।
➣ न्याय विभाग पर उलेमा वर्ग के आधिपत्य को उसने (मुहम्मद बिन तुगलक) खत्म किया तथा योग्यता के आधार पर पद वितरित किये। हिन्दू प्रजा के साथ उसका व्यवहार सहिष्णुतापूर्ण था।
➣ फिरोज पहला सुल्तान था जिसने उलेमा को इतनी अधिक प्रधानता दी। बरनी ने फिरोज के शासन में शांति व समृद्धि के लिये उलेमा के समर्थन को जिम्मेदार माना है।
➣ लोदियों के शासनकाल में राजत्व सिद्धान्त सरदारों की समानता पर आधारित थी और ऐसी स्थिति में उनकी शासन व्यवस्था राजतन्त्रीय न होकर कुलीन तन्त्रीय थी।
➣ बहलोल लोदी के समय सुल्तान समानों में प्रथम हो गया। इससे राजत्व की प्रतिष्ठा घटी। इसके विपरीत सिकन्दर लोदी ने राजत्व पद की गरिमा को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया।
➣ अफगानों ने तुर्कों के विपरीत सुल्तान को ईश्वर की छाया (सर्वशक्तिशाली) निरंकुश राजा नहीं माना। इसका मुख्य कारण यह था कि अफगान सुल्तान को ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं मानते थे, बल्कि उसे अपने में ही श्रेष्ठ मानते थे।
➣ इस प्रकार तुर्की ने जहां वंशानुगत राजतंत्र, सुल्तान के देवत्व एवं उसकी निरंकुश सत्ता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था, वहीं अफगानों ने सुल्तान को बराबरों में सर्वश्रेष्ठ ही माना, असीम शक्ति का मालिक नहीं।
अमीर
➣ सल्तनत में सभी प्रभावशाली पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को अमीर की संज्ञा दी गई थी। अमीरों का प्रभाव सुल्तान पर होता था।
➣ सुल्तान को शासन करने के लिए अमीरों को अपने अनूकूल किये रहना आवश्यक होता था। अमीरों का प्रभाव उस समय बढ़ जाता था, जब सुल्तान अयोग्य, निर्बल या अल्पवयस्क हो।
➣ बलबन और अलाउद्दीन ख़िलजी के समय में अमीर प्रभावहीन हो गये थे। प्रायः नये राजवंश के सत्ता में आने पर पुराने अमीरों को या तो मार दिया जाता था या फिर उन्हें छोटे पद दे दिये जाते थे।
➣ मुहम्मद तुग़लक़ के काल में हुए विद्रोह में अमीरों का सर्वाधिक योगदान था। इसलिए उसने पुराने अमीरों को कमज़ोर करने की दृष्टि से मिश्रित जनजातीय अधिकार पर पदाधिकारियों की एक नई व्यवस्था स्थापित की।
➣ लोदी वंश के शासन काल मे अमीरों का महत्त्व अपने चरमोत्कर्ष पर था। इस वंश में अमीरों की शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि वे सुल्तान की नियुक्ति, अपदस्थ करने और नीतियों को प्रभावित करने में सक्षम थे।
➣ सिकंदर लोदी के समय में अमीरों का प्रभाव कुछ नियंत्रित रहा, लेकिन इब्राहिम लोदी के शासनकाल में अमीरों का महत्व चरम पर पहुँच गया। इब्राहिम ने अमीरों को कठोरता से नियंत्रित करने की कोशिश की, जिससे अमीर नाराज़ हो गए।
➣ कई शक्तिशाली अमीरों (जैसे दौलत खाँ लोदी, आलम खाँ) ने इब्राहिम के विरुद्ध विद्रोह किया और बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया। अंततः 1526 के पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी की हार और दिल्ली सल्तनत का पतन हुआ।
प्रशासनिक संरचना
➣ प्रशासनिक संरचना मिश्रित ढंग से की थी। प्रशासनिक संरचना मुख्यतः फारसी-अरबी पद्धति पर आधारित थी; किन्तु सैन्य संगठन तुर्क मंगोल पद्धति से किया गया था, जबकि हिन्दुओं की भू-राजस्व पद्धति को भी कायम रखा गया था।
➣ सुल्तान-सुल्तान शब्द का अर्थ सत्ताधारी होता है। केन्द्रीय शासन का प्रधान सुल्तान था । वह राज्य का सर्वोच्च संचालक, न्यायाधिकरण में सबसे बड़ा निर्णायक, कानून का सूत्रधार और सेनाओं का प्रधान सेनापति था।
➣ सल्तनत काल में उत्तराधिकार का कोई निश्चत नियम नहीं था, किन्तु सुल्तान को यह अधिकार होता था कि वह अपने पुत्रों में किसी एक को अपना उत्तराधिकारी चुन सकता था।
➣ दिल्ली सल्तनत में सुल्तान पूर्ण रूप से निरंकुश होता था। उसकी सम्पूर्ण शक्ति सैनिक बल पर ही निर्भर करती थी।
मंत्रिपरिषद
➣ यद्दपि सुल्तान सत्ता का केन्द्र बिंदु होता था। किन्तु उसके सहयोग के लिए विभिन्न विभागों के कार्यों के संचालन हेतु उसकी एक मंत्रिपरिषद भी होती थी, जिसे सल्तनत काल में मजलिस-ए-खलवत कहा जाता था।
➣ मजलिस-ए-ख़ास में मजलिस-ए-खलवत की बैठक हुआ करती। बार-ए-ख़ास में सुल्तान सभी दरबारियों, ख़ानों, अमीरों, मलिकों और अन्य रईंसों को बुलाता था।
➣ बार-ए-आजम में सुल्तान राजकीय कार्यों का अधिकांश भाग पूरा करता था। यहाँ पर विद्वान मुल्ला, क़ाज़ी भी उपस्थित रहते थे।
➣ मंत्रिपरिषद में 4 मंत्री महत्त्वपूर्ण थे। इन चारों विभागों की सहायता से सुल्तान शासन संचालित करता था।
| विभाग | प्रमुख |
|---|---|
| 1.दीवान-ए-विजारत (राजस्व विभाग) | वजीर |
| 2.दीवान-ए-अर्ज (सैन्य विभाग) | आरिज-ए-मुमालिक |
| 3. दीवान-ए-इंशा (शाही पत्र व्यवहार मंत्रालय) | दीवान-ए-मुमालिक |
| 4.दीवान-ए-रसालत (विदेश मंत्रालय) | सद्र-उस-सुदूर |
➣ राजकीय शक्ति पर व्यावहारिक नियंत्रण रखने हेतु केवल दो ही कारक थे- अमीर वर्ग का दबाव तथा उलेमाओं का प्रभाव।
1.दीवान-ए-विजारत (राजस्व विभाग)
➣ राज्य का प्रधानमंत्री वजीर कहलाता था। उसके कार्यालय को दीवान-ए-विजारत (राजस्व विभाग) कहते थे।
➣ प्रारम्भ में वजीर मुख्यतः सैनिक हुआ करते थे, किन्तु 14वीं सदी से वजीर राजस्व विभाग का वित्तमंत्री या सर्वोच्च अधिकारी था।
➣ सैयद सुल्तानों के काल में वित्तीय दायित्व निभाने के साथ-साथ वजीर को दूरस्थ सैन्य अभियानों में भी भेजा जाता था।
➣ इसके अधीन दीवान-ए-इसराफ (लेखा परीक्षा विभाग), दीवान- ए-विजारत (राजस्व विभाग), दीवान-ए-इमारत (लोक निर्माण), दीवान-ए-अमीर-कोही (कृषि विभाग) तथा अन्य बहुत सारे विभाग कार्यरत थे।
➣ प्रान्तों के सभी सूबेदार अपने खातों का परीक्षण भी उसी से करवाते थे। विभिन्न पदाधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार भी उसी के पास था।
➣ सकी सहायता के लिए नाइब वजीर, मुस्तका-ए-मुमालिक (महालेखा परीक्षक), मुसरिफ-ए-मुमालिक (महालेखाकार), मजूमदार (शेष राशि का हिसाब रखने वाला) और खानिज (कोषाध्यक्ष) होते थे।
➣ गजनवी के प्रारम्भिक काल में वजीर का पद सबसे ऊँचा और सम्मानित पद था। बलबन के समय वजीर की शक्तियाँ निम्नतम बिन्दु पर जा पहुंची।
➣ तुगलक काल वजीर के पद का स्वर्ण काल था। फिरोज तुगलक के समय वजीर का पद अपने चरमोत्कर्ष पर जा पहुँचा। जबकि लोदी काल में वजीर की गरिमा बहुत गिर गई।
➣ विभिन्न शासकों के समकालीन उनके वजीर-
| सुल्तान | वजीर |
|---|---|
| 1. कुतुबुद्दीन ऐबक | फख्र-ए-मुदव्विर |
| 1. इल्तुतमिश | फखरूल मुल्क इसामी, निजामुल मुल्क जुनौदी |
| 2. बलबन | ख्वाजा हसन बसरी |
| 3. रजिया, | निजामुल मुल्क जुनैदी |
| 4. जलालुद्दीन खिलजी, | ख्वाजा खातिर |
| 5. अलाउद्दीन खिलजी | नुसरत खां, मलिक काफूर ताजुलमुल्क |
| 6. मुहम्मद बिन तुगलक | ख्वाजा-जहां, अहमद अयाज |
| 7. फिरोजशाह तुगलक | खाने-जहां मकबूल |
| 8. सिकंदर लोदी एंव इब्राहीम लोदी | मियां भुआ |
2.दीवान-ए-अर्ज (सैन्य विभाग)
➣ इसे रावत ए अर्ज भी कहा जाता था। इसका प्रधान आरिज-ए-मुमालिक होता था। वह रक्षा मंत्री की भांति कार्य करता था।
➣ इसके मुख्य कार्य सैनिकों की भर्ती, उनके वेतन का निर्धारण और वितरण, सैनिकों एवं घोड़ों का हुलिया सम्बन्धी रिकार्ड, सैनिक अभियानों का आयोजन और सेना का निरीक्षण करना था।
➣ आरिज-ए-मुमालिक प्रधान सेनापति नहीं होता था। सेना का प्रधान सेनापति सुल्तान ही होता था।
➣ सर्वप्रथम बलबन ने इस पद पर अहमद अयाज (इमाद-उल-मुल्क) को नियुक्त किया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी का आरिज ए मुमालिक मलिक नासिरूद्दीन मुल्क सिराजुद्दीन था।
3. दीवान-ए-इंशा
➣ यह शाही पत्र व्यवहार का मंत्रालय था, जिसका प्रमुख दबीर-ए-खास कहलाता था।
➣ मिनहाजउद्दीन सिराज ने इस विभाग को दिवान-ए-अशरफ के नाम से सम्बोधित किया है।
➣ इस विभाग का प्रधान दीवान-ए-मुमालिक होता था। इस मंत्रालय का काम शाही घोषणाओं का प्रारूप तैयार करना, शासकीय घोषणाओं को जारी करना, प्रान्तीय गवर्नरों, अधिकारियों आदि को पत्र भेजना था।
➣ दीवान-ए-इंशा से ही सुल्तान के फरमान जारी होते थे।
4.दीवान-ए-रसालत (विदेश मंत्रालय)
➣ इसका कार्य विदेश वार्ता और कुटनीतिज्ञ सम्बन्धों की देखभाल करना था। यह काजी के फैसले के विरुद्ध अपीलों को भी सुनता था।
➣ डॉ. आई.एच. कुरैशी के अनुसार यह विभाग धार्मिक विषयों से सम्बन्धित था। सद्र इसका अध्यक्ष होता था।
| सद्र-उस-सुदूर | यह धर्म विभाग का प्रधान था। इस्लाम धर्म के कानूनों का प्रजा में प्रसार करना, उसका पालन कराना और मुसलमानों के विशेष हितों की सुरक्षा का उत्तरदायित्व उसी पर था। |
| काजी उल कुजात | यह न्याय विभाग का प्रधान। प्रायः काजी-उल-कुजात और सद्र-उस-सुदूर के पद एक ही व्यक्ति को प्रदान किये जाते थे। |
| बरीद-ए-मुमालिक | यह सूचना एवं गुप्तचर विभाग का प्रधान होता था। डाक चौकियों का प्रबन्ध भी इसी के अधीन था। |
| वकील-ए-दर | यह शाही महल और सुल्तान की व्यक्तिगत सेवाओं का प्रबन्ध करता था। |
| मुहतसिब | शहर का महत्त्वपूर्ण अधिकारी था, जो लोगों के सामान्य आचरण का रिकार्ड रखता था और नैतिक नियमों को लागू करवाता था । |
| दीवान-ए-रियासत | व्यापारियों पर विशेष ध्यान रखने के लिए अलाउद्दीन खिलजी द्वारा नियुक्त किया गया था। यह शहर के बाजारों पर नियंत्रण रखता था। माप-तौल का निरीक्षण करता था। |
प्रान्तीय प्रशासन
➣ सल्तनत को अनेक प्रान्तों में विभाजित किया गया था, जिसे इक्ता या विलायत कहा जाता था। इक्ता (अक्ता) अरबी भाषा का शब्द है।
➣ भारत में इक्ता व्यवस्था की शुरुआत मुहम्मद गोरी ने की। जबकि इल्तुतमिश ने उसे ठोस (संस्थागत) रूप प्रदान किया।
➣ प्रान्त के गवर्नर या इक्ता के प्रधान को वली, सुल्तान, नाजिम, नायब, मुक्ती या इक्तादार कहा जाता था।
➣ प्रांत में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखना उसका प्रमुख कर्तव्य था। वह भू-राजस्व की वसूली का कार्य भी देखता था।
➣ मुफ्ती अथवा वली को कुछ अधिक अधिकार थे, क्योंकि वे दूरस्थ प्रान्तों में होते थे। उन्हें सैन्य कर संग्रह तथा न्यायिक कार्य भी करने पड़ते थे।
➣ इल्तुतमिश ने इक्तादारों के एक इक्ता से दूसरे इक्ता में स्थानान्तरण की नीति अपनाई। बलबन ने उन इक्ताओं को, जिनमें राजस्व नहीं मिल रहा था, को खत्म कर दिया या खालसा भूमि में मिला लिया।
➣ बलबन ने ख्वाजा नामक अधिकारी की नियुक्ति इक्तादारों के साथ की, जिसमें आय-व्यय का सही पता लग सके व इक्तादारों के भ्रष्टाचार को रोक सकें। इस प्रकार उसने प्रान्तों में द्वैध शासन की स्थापना की।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक के समय इक्ताओं में सुल्तान का हस्तक्षेप चरम सीमा तक पहुंच गया।
➣ फिरोज तुगलक के समय भूमि अनुदान के रूप में सैनिकों को वेतन देने की प्रथा को पुनर्जीवित किया, ये भू-अनुदान वजह नाम से जाने जाने लगे एवं अक्तादारों को वजहदार कहा जाने लगा।
| केन्द्रीय शासन (कई इक्तों/प्रान्तों को मिलाकर) | सुल्तान इक्तादार (इक्तादार) |
| प्रान्त / इक्ता (कई परगनों को मिलाकर) | परगनाधिकारी |
| परगना (कई ग्राम मिलकर) | मुखिया (पटवारी, चौकीदार ) |
| ग्राम | – |
➣ प्रान्तों के अतिरिक्त कुछ केन्द्र शासित प्रदेश थे, जिनमें शिक और शहर शामिल थे। इसके प्रभावी अधिकारी शाहना (अधीक्षक) थें। यह सुल्तान द्वारा नियुक्त होते थे। इस क्षेत्र से एकत्र किया गया राजस्व सीधे केन्द्र के ख़ज़ाने में जाता था।
➣ प्रत्येक उपक्षेत्र में आमिल नाम का एक पदाधिकारी होता था, जो राजस्व इकट्ठा करके राजकोष में जमा करता था।
स्थानीय प्रशासन
➣ 14वीं सदी में सल्तनतकाल के विस्तार के कारण प्रान्तों को जिलों में बाँट दिया गया, इन्हें शिक कहा जाता था।
➣ 1279 ई. में शिकों की स्थापना बलबन ने की थी। शिक का शाब्दिक अर्थ है एक हिस्सा। शिक का शासक शिकदार कहलाता था।
➣ शिकों या जिलों को परगनों में बाँटा गया था। प्रत्येक परगने में आमिल एवं मुंसिफ जैसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी होते थे। आमिल मुख्य प्रशासनिक अधिकारी तथा मुशरिफ या मुंसिफ राजस्व विभाग का प्रधान होता था।
➣ एक शहर या सौ गाँवों के समूह का शासक अमीर-ए-सदा होता था। इब्नबतूता सदी अर्थात् सौ गाँवों के समूह का शासन की इकाई के रूप में उल्लेख करता है।
➣ शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जो स्वशासन और पैतृक अधिकारियों की व्यवस्था के अन्तर्गत थी।
➣ गाँव के मुख्य अधिकारी थे-.पटवारी (लेखाकार), चौधरी, खुत, मुकद्दम (मुखिया) जो शासन को लगान वसूल करने में मदद करते थे। मुखिया किसानों से एक छोटा सा उपकर एकत्रित करता था, जिसे किस्मत-ए-खोती कहा जाता है।
➣ अलाउद्दीन खिलजी के समय में उनसे (खुत, चौधरी, मुकद्दम) विशेष सुविधाएँ छीन ली गई थीं तथा इन्हें भू-राजस्व, गृह व चराई कर देने के लिए बाध्य किया, किन्तु गयासुद्दीन तुगलक ने इनको पूर्व प्रतिष्ठा पुनः प्रदान की।
➣ इसके अतिरिक्त गाँव में पंचायत होती थी जो शिक्षा, स्वच्छता, न्याय आदि सभी कार्य करती थी।
सल्तनतकालीन सैन्य व्यवस्था
➣ तुर्की शासन व्यवस्था मुख्यतः सैन्य शक्ति पर आधारित थी। सैन्य संगठन में तुर्क-सुल्तानों ने मंगोलों की दशमलव प्रणाली को अपनाया।
➣ सैन्य संगठन मुख्यतः तुर्की और मंगोल पद्धति पर आधारित था। सेना का प्रधान सेनापति सुल्तान होता था।
➣ सल्तनतकालीन सेना दो वर्गों में विभक्त थे-
1. हश्म-ए-कल्य (केंद्रीय सेना)
2. हश्म-ए-अतरफ (प्रांतीय सेना)
➣ इल्तुतमिश द्वारा स्थापित सेना को इश्म-ए-कल्ब (केन्द्रीय सेना) या कल्ब-ए-सुल्तानी कहा जाता था, जबकि सामंतों व प्रान्तपतियों की सेना को हश्म-ए-अतरफ़ कहा जाता था।
➣ सल्तनकालीन सेना का ढाँचा राष्ट्रीय नहीं था, बल्कि इसमें तुर्क, अमीर, ईरानी, मंगोल, अफ़ग़ान एवं भारतीय मुसलमान शामिल होते थे।
➣ सल्तनत कालीन सुल्तानों में बलबन को सैन्य विभाग की स्थापना का तथा अलाउद्दीन खिलजी को एक स्थायी सेना के गठन का श्रेय दिया जाता है।
➣ सैन्य व्यवस्था की देख-भाल का दायित्व दीवान-ए-अर्ज विभाग पर था। इसका प्रधान आरिज-ए-मुमालिक था। इसकी स्थापना बलबन ने की थी।
➣ आरिज-ए-मुमालिक सैनिकों की भर्ती एवं उनका वेतन निर्धारित करता था। सैनिकों को नगद वेतन अथवा भूमि आवंटन के लिए अपनी संस्तुति देता था।
➣ सुल्तानों की सैनिक शक्ति उनके सैनिक बल पर निर्भर करती थी। अमीर, खान व मलिक ये सब उपाधियाँ सैनिक श्रेणियाँ थीं।
➣ सल्तनत कालीन सैन्य व्यवस्था की शुरुवात इल्तुतमिश के शासन काल से होता है। इल्तुतमिश के काल में विभिन्न क्षेत्रों की सेनाएं कहलाती थीं-
| केन्द्रीय सेना | हश्म-ए-कल्च या कल्च-ए-सुल्तानी |
| प्रान्तीय सेना | हश्म-ए-अतरफ |
| शाही घुड़सवार | सवार-ए-कल्च |
| सुल्तान की व्यक्तिगत सेना | शम्सी घुड़सवार |
➣ सुल्तान के व्यक्तिगत सैनिक शम्सी घुड़सवार कहलाते थे। सैनिक दो प्रकार के होते थे-
- वजहिस या मुरतब – स्थायी सैनिक
- गैर वजहिस – अस्थायी सैनिक
➣ सैनिकों उनके कार्यों के अनुसार चार भागों में बांटा जा सकता है। प्रथम वजहिस, जो स्थायी सैनिक थे, द्वितीय ग़ैर वजहिस, जो अस्थायी थे।
➣ तृतीय – वे सैनिक होते थे, जिन्हें युद्ध के समय अस्थायी रूप से भर्ती किया जाता था। इनको युद्ध काल तक ही वेतन एवं रसद प्राप्त होता था।
➣ चतुर्थ वे सैनिक होते थे, जो मुस्लिम स्वयंसेवकों के रूप में काफ़िरों से युद्ध करते थे, इन्हें कोई वेतन नहीं मिलता था, बल्कि लूट की सम्पत्ति में हिस्सा मिलता था।
➣ सेना के मुख्यतः तीन भाग थे:-
- घुड़सवार सेना
- गजसेना
- पैदल सेना
➣ खिलजी काल से मंगोलों में प्रचलित सैनिक वर्गीकरण वाले शब्दों का प्रयोग मिलने लगा। जैसे-
- अमीर-ए-दह (दस सैनिकों का सेना नायक)
- अमीर-ए-सदा (सौ सैनिकों का सेना नायक)
- अमीर-ए-हजारा (हजार सैनिकों का सेना नायक)
- अमीर-ए-तुमन (दस हजार सैनिकों का सेना नायक)
➣ मंगोल सेना का वर्गीकरण दशमलव प्रणाली पर आधारित था और इसे ही सल्तनतकालीन सैन्य व्यवस्था में अपनाया गया है।
➣ बरनी ने इस दशमलव वर्गीकरण को दूसरे ढंग से स्पष्ट किया है। सबसे छोटी सैनिक इकाई सरखेल व सबसे बड़ी इकाई खान होती थी। खान के ऊपर केवल सुल्तान होता था। अतः खान सुल्तान के बाद सर्वोच्च सैन्य अधिकारी होता था। यह वर्गीकरण निम्न प्रकार है-
10 खान (सर्वोच्च अधिकारी)
↓
खान
10 मलिक (1,00,000 घुड़सवार)
↓
मलिक
10 अमीर (10,000 घुड़सवार)
↓
अमीर
10 सिपहसालार (1000 घुड़सवार)
↓
सिपहसालार
10 सर-ए-खेल (100 घुड़सवार)
↓
सर-ए-खेल
10 अश्वारोही
➣ खान एक आदरसूचक उपाधि होती थी। खान उच्चाधिकारी का सैन्य वर्गीकरण से कोई सम्बन्ध नहीं होता था।
➣ सल्तनत काल में बारूद की सहायता से गोला फेंकने की मशीन को मंगलीक तथा अर्राट कहा जाता था।
➣ सुल्तानों के पास नावों का एक बेड़ा होता था। नावों के बेड़ों का संचालन मीर बहर नामक अधिकारी के नेतृत्व में होता था, जिसका उपयोग सैनिक सामान को ढोने में किया जाता था।
➣ साहिब-ए-बरीद-ए-लख्कर विभाग युद्ध के समय की समस्त जानकारी राजधानी भेजता था।
➣ तले-आह एवं यज्की नामक गुप्तचर शत्रु सेना की गतिविधियों की सूचना एकत्र करता था।
➣ चर्ख (शिला प्रक्षेपास्त्रों), फलाख़ून (गुलेल), गरगज (चलायमान मंच), सबत (सुरक्षित गाड़ी) जैसे युद्ध के समय प्रयुक्त होने वाले साधनों का उल्लेख मिलता है।
सैनिक सुधार
➣ सैनिक सुधार की दृष्टि से अलाउद्दीन ख़िलजी काल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। अलाउद्दीन अपने सैनिकों को नकद वेतन देने के साथ ही 6 महीने का वेतन इनाम के दौर पर देता था।
➣ अलाउद्दीन ने घोड़ों को दागने की और सैनिकों का हुलिया रखने की प्रथा चलायी। सिकन्दर शाह लोदी ने सैनिकों के हुलिया के स्थान पर चेहरा शब्द का प्रयोग किया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों को अक्ता प्रदान करने की प्रथा को समाप्त कर दिया। एक घोड़ा रखने वाले अश्वारोही सैनिक का वार्षिक वेतन 234 टंका निश्चित हुआ और दो-अस्पा सैनिकों को 78 टंका वार्षिक अतिरिक्त प्रदान किया जाता था।
➣ अलाउद्दीन की सैन्य व्यवस्था खुसरव शाह के समय में टूटकर बिखर गयी। इसने किराये पर सैनिकों की भर्ती किया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी के बाद मुक्ती लोग अपने सैनिकों के वेतन से कुछ कमीशन काट लेते थे। ग़यासुद्दीन ख़िलजी ने इस प्रथा को समाप्त किया और वेतन रजिस्टर (वसीयत-ए-हश्म) की स्वयं जाँच करने लगा।
➣ इल्तुतमिश ने सैनिकों को वेतन के तौर पर इक्ता प्रदान करने की प्रथा आरम्भ की।
➣ अलाउद्दीन ने इक्ता प्रथा को समाप्त कर दिया था, परन्तु फ़िरोज़शाह तुग़लक़ के समय में सैनिकों को नकद वेतन के स्थान पर इक्ता देने की प्रथा पुनः प्रारम्भ कर दी गई, कालान्तर में सैनिकों का पद आनुवंशिक हो गया।
➣ फिरोज शाह तुगलक ने सैनिकों को आनुवंशिक आधार पर इस्ताएं प्रदान करके सेना का लगभग सत्यानाश कर दिया। उसने सेना में दासों को भर्ती करना प्रारम्भ कर दिया, जिसके घातक परिणाम हुए।
➣ तदोपरान्त सिकन्दर लोदी ने सैनिकों की हुलिया रखने पर बल दिया, परन्तु अब हुलिया के स्थान पर चेहरा शब्द का प्रयोग किया जाने लगा।
| पद | कार्य/विवरण |
|---|---|
| आरिज-ए-ममालिक | सैन्य विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी |
| सर-ए-जहांदार | सुल्तान के अंगरक्षकों का प्रधान |
| अमीर-ए-आखुर | अश्वशाला का अध्यक्ष |
| शहना-ए-फील | हस्ति सेना का अध्यक्ष |
| अमीर-ए-बहर | नौकाओं की व्यवस्था करने वाला अधिकारी |
| पायक | पैदल सैनिक |
| कोतवाल | दुर्ग का प्रमुख अधिकारी |
सैन्य वर्गीकरण
| वर्ग | विवरण |
|---|---|
| हश्म-ए-कल्ब | केंद्रीय सेना |
| सवार-ए-कल्ब | केंद्रीय घुड़सवार सेना |
| हश्म-ए-अतरफ | प्रांतीय सेना |
| वजाहिस | स्थायी सैनिक |
| गैर-वजाहिस | अस्थायी सैनिक |
| अमीर-ए-दह दस | 10 सैनिकों का सेनानायक |
| अमीर-ए-सदा | 100 सैनिकों का सेनानायक |
| अमीर-ए-हजारा | 1000 सैनिकों का सेनानायक |
| अमीर-ए-तुमन | 10 हजार सैनिकों का सेनानायक |
| सरखेल | 10 घुड़सवारों का प्रधान |
| सिपहसालार | 10 सरखेल या 100 घुड़सवारों का प्रधान |
न्याय एवं दण्ड व्यवस्था
➣ सल्तनत काल में सुल्तान राज्य का सर्वोच्च न्यायधीश होता था। सुल्तान न्याय का अन्तिम स्त्रोत माना जाता था।
➣ मुस्लिम क़ानून के चार महत्त्वपूर्ण स्रोत थे – क़ुरान, हदीस, इजमा एवं कयास।
| स्रोत | विवरण |
|---|---|
| क़ुरान | मुसलमानों का पवित्र ग्रन्थ एवं मुस्लिम क़ानून का मुख्य स्रोत। |
| हदीस | पैगम्बर के कार्यों एवं कथनों का उल्लेख। क़ुरान द्वारा किसी समस्या का समाधान न होने पर हदीस का सहारा लिया जाता था। |
| इजमा | मुजतहिद एवं मुस्लिम विधिशास्त्रियों को मुस्लिम क़ानून की व्याख्या का अधिकार प्राप्त था। उनके द्वारा व्याख्यायित क़ानून, जिसे अल्लाह की इच्छा माना जाता था, इजमा कहलाता था। |
| कयास | तर्क के आधार पर विश्लेषित क़ानून को कयास कहा जाता था। |
➣ काजी व मुफ्ती की मदद से मुकदमों का निर्णय होता था। मुफ्ती कानून की व्याख्या करते थे, जिसके आधार पर काजी न्याय करता था। काजी एवं मुफ्ती का पद वंशानुगत होता था।
➣ धार्मिक मुक़दमों के निर्णय के समय सुल्तान मुख्य सद्र (सभापति, अध्यक्ष) एवं मुफ़्ती की सहायता लेता था, जबकि अन्य मुक़दमों के निर्णय के समय क़ाज़ी की सहायता लिया करता था।
| काजी-ए-सूबा | दीवानी फौजदारी मामले |
| वान-ए-सूबा | राजस्व मामले |
| फिकह | इस्लामी धर्मशास्त्र |
न्याय अधिकारी
➣ सुल्तान सद्र-उस-सुदूर, क़ाज़ी-उल-कुजात आदि न्याय से संबंधित सर्वोच्च अधिकारी होता था।
➣ सुल्तान दीवान-ए-कजा तथा दीवान-ए-मजलिस भी न्याय का कार्य पूरा करता था। दीवान-मजलिस का अध्यक्ष अमीर-ए-दाद होता था।
➣ दीवान-ए-ममालिक सुल्तान को क़ानूनी परामर्श देता था। प्रान्ताख्यक्षों की सहायता क़ाज़ी या साहिब-ए-दीवान करते थे।
➣ कस्बों एवं गांवो की सहायता के माध्यम से स्थानीय पंच लोग झगड़ों का निपटारा करते थे।
➣ नगरों में शांति-व्यवस्था की स्थापना का कार्य कोतवाल के जिम्भे सौंपा गया। दिल्ली का कोतवाल बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति होता था।
➣ बलबन और अलाउद्दीन ने एक सक्षम गुप्तचर विभाग की भी स्थापना की, जो सुल्तान को प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना की सूचना देता था।
राजस्व (कर) व्यवस्था
➣ इस्लामी अर्थव्यवस्था सम्बन्धी सिद्धान्त बगदाद के मुख्य काजी अबू याकूब द्वारा लिखित किताब-उल-खराज में मिलता है।
➣ सल्तनत काल में पाँच प्रकार के कर थे-
| कर | विवरण |
|---|---|
| उश्र | मुसलमानों से लिया जाने वाला भूमिकर (5%–10%)। |
| खराज | गैर-मुसलमानों पर लगाया जाने वाला भूमिकर (उपज का 1/3 से 1/2)। |
| खुम्स | लूट, खानों तथा भूमि में गड़े खजानों से प्राप्त धन; 1/5 भाग राज्य तथा 4/5 भाग सैनिकों को मिलता था। |
| जकात | मुसलमानों पर लगाया जाने वाला धार्मिक कर (2%–2.5%)। |
| जजिया | गैर-मुसलमानों पर लगाया जाने वाला धार्मिक कर। |
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी एवं मुहम्मद तुग़लक़ लूट के समय धन का 4/5 भाग राजकोष में जमा किया जाता तथा शेष 1/5 भाग सैनिकों में वितरित कर दिया जाता सिकन्दर लोदी ने गड़े हुये खजाने में अपना हिस्सा नहीं लिया।
➣ पहले जजिया भू-राजस्व के साथ वसूल किया जाता था, बाद में फिरोज तुगलक के काल से यह पृथक् रूप से वसूला जाने लगा।
➣ स्त्रियां, बच्चे, साधु, पागल व भिखारी इस कर से मुक्त थे। फिरोज तुगलक ने ब्राह्मणों से भी जजिया वसूल किया।
➣ भारत में सर्वप्रथम जजिया मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिन्ध में 712 ई. में वसूल किया गया था।
➣ लोगों की आर्थिक स्थिति के अनुसार जजिया की तीन वार्षिक दरें थी-48 दिरहम, 24 दिरहम व 12 दिरहम।
➣ राज्य की भूमि चार भागों में विभक्त थी-
| मदद-ए-माश | दान में दी गयी भूमि। इससे कोई राजस्व नहीं लिया जाता था। परंतु अलाउद्दीन ने ऐसी भूमि को खालसा में परिवर्तित कर दिया। |
| मुक्तियों या इक्तादारों को दी गयी भूमि | इसमें प्रत्येक इक्तादार अपना ख़र्च निकालकर अधिशेष शाही ख़ज़ाने में भेज देता था। |
| अधीनस्थ हिन्दू राजाओं की अधीन भूमि | यहाँ से एक निश्चत धनराशि केन्द्र को भेजी जाती थी। |
| खालसा भूमि (राजकीय जमीन) | इसकी समस्त आय शाही कोष में सीधे जाती थी। |
➣ गैर-मुसलमानों के कब्जे में जो भूमि थी, उससे खिराज वसूला जाता था। यह उपज का 1/2 भाग या 1/10 भाग होता था। मुसलमान भूमि-कर के रूप में उशर देते थे। यह 1/5 से 1/10 भाग तक होता था।
➣ रहट कुएँ या तालाब से जल निकालने का एक यंत्र है। रहट उपकरण का जन्म एवं प्रसार मूलतः भारत के बाहर पश्चिम में हुआ। पूर्व मध्यकालीन भारतीय ग्रन्थों में इसका उल्लेख अरहर नाम से मिलता है।
➣ रहट का प्रयोग दिल्ली सल्तनत के युग में ही प्रारम्भ हुआ। रहट का प्रथम विस्तृत विवरण बाबरनामा में ( 16वीं शताब्दी में) मिलता है।
➣ तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दियों में भारतीय कृषक गेहू, जौ और चना में से की खेती करते थे। मक्का की खेती नहीं होती थी।
➣ लगान नकद और अनाज के रूप में वसूली जाती थी। सल्तनत काल में लगान निर्धारण की मिश्रित प्रणाली को मुक्ताई कहा जाता था।
➣ बंटाई लगान निर्धारित करने की एक प्रणाली थी, जिसमें राज्य की ओर से प्रत्यक्ष रूप से ज़मीन की पैदावार से हिस्सा लिया जाता था।
➣ इजारेदारी या मुकाता व्यवस्था सर्वप्रथम खालसा भूमि पर ही लागू की गई थी। इसका राजस्व आमिल नामक अधिकारी सीधे केन्द्रीय खजाने में जमा कराता था।
➣ ठेकेदारी पर राजस्व वसूली को मुक्ता (मुकाता) या इजारेदारी व्यवस्था कहा जाता था। लोदी शासकों के समय मुक्ता को वजहदार कहा जाने लगा।
➣ लोदी सुल्तानों ने अफगान सरदारों को बड़ी-बड़ी जागीरे प्रदान कीं, जिससे खालसा भूमि का क्षेत्र कम हो गया।
➣ भूमि की पैमाइश को मसाहत कहा जाता था। बिस्वा भूमि पैमाईश की मानक ईकाई थी। बिस्वा बीघा का 1/20वाँ भाग होता था।
➣ सिकन्दर लोदी ने बहुत से आबवाब समाप्त कर दिये तथा भूमि की पैमाइश के लिए गज-ए-सिकन्दरी को स्थापित किया, जिसका प्रयोग अकबर के शासन के 31 वें वर्ष तक होता रहा है।
➣ दिल्ली सल्तनत काल में मुकद्दम, चौधरी, खुत जैसे मध्यस्थ वर्ग किसानों से उपज का कुछ हिस्सा लेते थे जिसे किस्मत-ए-खोती कहा जाता था।
➣ सुल्तान के अधीनस्थ हिन्दू शासकों के अधिकार में रहने वाली भूमि रंणाका भूमि कहलाती थी।
➣ सल्तनत काल में कर नकद और अनाज दोनों रूपों में लिया जाता था। खालसा क्षेत्र में कर अनाज के रूप में लिया जाता था।
➣ अलाउद्दीन खिलजी भारत का प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने पहली बार भूमि की पैमाइश कर वास्तविक आय के आधार पर राजस्व निश्चित किया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने बकाया भू-राजस्व वसूल करने के लिये दीवान- ए-मुस्तखराज नामक विभाग की स्थापना की।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने इक्ता व्यवस्था में सुधार करते हुये वली-उल- खराज नामक नये पद का गठन करके वली एवं मुक्ता (अमीर) पद को पृथक-पृथक किया।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने सम्पूर्ण राज्य की आय-व्यय का लेखा तैयार करवाया तथा तीन वर्ष के लिए एक अन्वेषण कृषि फार्म खोला।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों को इक्ता तथा जागीरों के स्थान पर नकद वेतन देकर इक्ताओं के विस्तार पर रोक लगाई व खालसा भूमि का विस्तार किया।
➣ अलाउद्दीन ने प्रान्तों से अधिशेष भूराजस्व को इकट्ठा करने के लिये हजारों की संख्या में आमिल, मुतशर्रिफ, मुहासिल, गुमाश्ता, नवसिंद (लिपिक) एवं सरहंग नामक अधिकारी नियुक्त किये।
➣ गयासुद्दीन तुगलक ने भूमि पैमाईश को त्याग कर पुनः बटाई के आधार पर लगान वसूल किया तथा यह आदेश दिया कि भू-राजस्व एक साल में 1/10 या 1/11 ही बढ़ाया जाये।
➣ मुहम्मद विन तुगलक एवं सिकन्दर लोदी ने अलाउद्दीन की तरह भूमि की पैमाईश के आधार पर लगान लिया।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषकों को सौन्धार या तकाबी (ऋण) प्रदान किया।
➣ तकावी पर कोई ब्याज नहीं लिया जाता था। ये ऋण चौधरी एवं मुकद्दमों के माध्यम से दिया जाता था, जो ऋण के गारन्टर भी होते थे।
➣ फिरोज तुगलक ने इक्ता को पुनः वंशानुगत कर उनके स्थानांतरण पर रोक लगा दी। फिरोज ने सैनिकों को वेतन के बदले जागीर या भूमि अनुदान देना फिर शुरू किया।
➣ फिरोज तुगलक के काल में सर्वाधिक इक्ता (भूमि अनुदान) प्रदान किये गये।
➣ फिरोज तुगलक पहला सुल्तान था जिसने सिंचाई कर (हाब-ए-शर्ब) लगाया। उसने कृषि के विकास के लिए पूर्वी पंजाब में राजवाही और उलुगखानी नामक दो नहरें खुदवाई।
➣ फिरोज ने तकावी (ऋण) को अपने वजीर खान-ए-जहाँ तेलंगानी के कहने पर माफ कर दिया। उसने उलेमाओं से सलाह लेकर सिंचित भूमि पर हक-ए-शर्ब (हाब-ए-शर्ब) लिया जो आज का 10 प्रतिशत होता था।
➣ फिरोज तुगलक ने खराज, जजिया, जकात व खुम्स को छोड़कर बाकी सभी करों को हटा दिया। फिरोज ने खराज वसूलने में भी मध्यम मार्ग अपनाया।
➣ सिकन्दर लोदी ने खाद्यान्नों पर जकात हटा दिया।
➣ प्रान्तों में बहीखातों की जाँच के लिए साहिब-ए-दीवान नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई। यह केन्द्र को सूचनायें देता था।
➣ सल्तनतकाल में भू-राजस्व निर्धारण के मुख्यतः तीन तरीके प्रचलित थे-
1.बटाई
➣ जिसमें वास्तविक उपज में से राज्य के हिस्से का निर्धारण किया जाता था। बटाई प्रणाली को विभिन्न नामों से जैसे- किस्मत- ए-गल्ला, गल्ला बख्शी अथवा हासिल आदि नामों से पुकारा जाता था।
➣ बटाई तीन प्रकार की होती थी- (i) खेत बटाई, (ii) लंक बटाई, (iii) रास बटाई।
(i) खेत बटाई- खेत बटाई में खड़ी फसल से अथवा खेत बोने के तुरन्त बाद ही सरकार का हिस्सा, खेत बाँट कर निर्धारित किया जाता था।
(ii) लंक बटाई- इसके अन्तर्गत खेत काटने के बाद किसान फसल को खलिहान में लाता था, जहाँ अनाज से भूसा अलग निकाले बिना बंटवारा कर लिया जाता था।
(III) रास बटाई- इसके तहत अनाज से भूसा अलग करने के बाद लगान का निर्धारण किया जाता था।
2. मसाहत
➣ इसमें भूमि की पैमाइश के आधार पर उपज का निर्धारण किया जाता था। इस प्रणाली को अलाउद्दीन खिलजी ने प्रचलित किया था।
3. मुक्ताई-
➣ यह लगान निर्धारण की एक मिश्रित प्रणाली थी। यह हिस्सा बांट प्रणाली पर आधारित थी। यही पद्धति मुगलकाल में कानकृत कहलाता है।
आर्थिक शब्दावली
| अबवाब | अतिरिक्त या गौण कर (अलाउद्दीन ख़िलजी ने कई नए गौण कर लगाए, जिसे फिरोजशाह तुगलक ने समाप्त कर दिया, उदाहरणस्वरूप- घरई, चरई आदि) |
| फवाजिल | राजस्व अधिशेष |
| खिदमति | पराजित राजाओं से लिया गया राजस्व या कर। |
| महसूल | भू-राजस्व का अनुमान |
| हक़-ए-खोती | किसानों से लगान वसूल कर खूत, मुकद्दम व चौधरी जैसे स्थानीय अधिकारी दीवान-ए-वज़ारत में राजस्व जमा करते थे। इस परिश्रम के एवज़ में उन्हें लगान का एक भाग प्राप्त करने का अधिकार थो। |
| निर्ख-ए-फ़रमानी | राज्य द्वारा घोषित मूल्य |
| वफ़ा-एफ़रमानी | राज्य द्वारा निर्धारित पैदावार |
| इक्ता-ए-तमलिक | ऐसी बंजर भूमि जिसमें खानें पाई जाती थीं। |
| तकरात | बलबन द्वारा इक्तेदारों से जब्त भूमि |
| हक़-ए-दीवानी | राजकोषीय मांगें |
तकनीकी एवं आर्थिक विकास
➣ मध्ययुगीन भारत का आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि पर आधारित था, परन्तु उसी के साथ-साथ छोटे स्तर की अन्य आर्थिक गतिविधियों के भी संकेत मिलते हैं।
➣ रहट का पहला विस्तृत लिखित विवरण 16वीं शताब्दी के बाबरनामा में मिलता है। मलिक मुहम्मद जायसी (15वीं-16वीं शताब्दी) ने भी अवध में रहट के प्रयोग का उल्लेख किया है।
➣ इस उपकरण का जन्म एवं प्रसार मूलतः भारत के बाहर पश्चिम में हुआ। पूर्व मध्यकालीन भारत के कुछ ग्रन्थों में इसका उल्लेख अरहट नाम से मिलता है। सम्भवतः रहट का प्रयोग दिल्ली सल्तनत के युग में ही प्रारम्भ हुआ।
➣ रहट का प्रयोग गहरे कुओं से सिंचाई हेतु पानी निकालने के लिए किया जाता था।
➣ वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में चरखे का यान्त्रिक उपकरण के रूप में बहुत महत्त्व रहा है। भारत में इसका (चरखे) का पहला लिखित उल्लेख इसामी की फतूह-उस-सलातीन (1350 ई.) में मिलता है।
➣ इरफान हबीब के अनुसार चरखा प्राचीन भारत में 12वीं शताब्दी में ईरान से आया।
➣ पैर से चलने वाले चरखे का पहला चित्र मिफता ए फुजाला में है।
➣ दिल्ली सल्तनत में रेशम के कीड़े पालने एवं कालीन की बुनाई का प्रचलन शुरू हुआ। अलाउद्दीन खिलजी के समय वस्त्र क्रान्ति हुई थी।
➣ भारत में कागज पर लिखी सबसे पुरानी पाण्डुलिपि 1223-24 ई. की है तथा वह गुजरात में मिली है।
➣ तुर्कों ने भारत में 13वीं सदी में कागज निर्माण की तकनीकी का प्रसार किया। अरब में कागज निर्माण की विधि चीन से आई।
➣ इस काल का एक प्रमुख आविष्कार फिरोज तुगलक द्वारा समय-सूचक उपकरणों का प्रयोग है। इसे सल्तनत युग का जय सिंह कहा गया है।
➣ फिरोज तुगलक के शासनकाल में साबुन निर्माण कार्य शुरू हुआ। इसका उल्लेख अज्ञात लेखक की पुस्तक सीरत-ए-फिरोज शाही में मिलता है।
➣ व्हिटनी जिन या नद्दाफ या पिंजण (धूनिया) रूई निकालने का औजार था और करघा का प्रयोग तुर्कों ने शुरू किया था।
➣ बाबर भारत वर्ष को तरह-तरह के असंख्य और अनन्त कारीगरों का देश कहकर उसकी प्रशंसा करता है।
उद्योग एवं व्यापार
➣ सातवीं शताब्दी से दसवीं शताब्दी तक का युग भारत तथा अरब जगत के मध्य व्यापारिक सम्बन्धों का स्वर्णकाल कहा गया है।
➣ व्यापारियों के समूह को तुज्जार-ए-खास कहा जाता था।
➣ हिन्दुस्तान में लोदी शासक स्वयं ही एक व्यापारी थे।
➣ देश के विभिन्न भागों में व्यापारिक वस्तुओं पर कर प्राप्त करने के लिए चौकियाँ स्थापित की गयी थीं, जिसका सर्वप्रथम उल्लेख मिनहाजुद्दीन सिराज के तबकाते नासिरी में मिलता है।
➣ चार पहिए वाले रथ तथा इक्के का वर्णन भी सल्तनत काल में मिलता है। नौका निर्माण का उद्योग इस काल में काफी जोरों पर था।
| उत्पादन | क्षेत्र |
|---|---|
| रेशम | खंभात क्षेत्र (गुजरात) |
| नमक | सांभर झील |
| ऊनी सोल | कश्मीर (उच्च किस्म का ऊन तिब्बत से आयात किया जाता था) |
| वस्त्र | बंगाल व गुजरात (सोनार गाँव मलमल व कच्चे रेशम के लियेप्रसिद्ध था। |
| पान के पत्ते | धार (मालवा) |
| नील | बयाना (भरतपुर, राजस्थान) व सरखेज (आगरा) |
➣ 14वीं-15वीं सदी में भारत ने रेशम उत्पादन चीन से सीखा। सूती वस्त्र को किरपास कहा जाता था और मलमल के कपड़े को गंगाजल व शवनम कहा जाता था। सूती वस्त्रों की रंगाई के लिये दिल्ली प्रमुख केंद्र था।
➣ मध्यकाल में अनेक व्यापारिक मार्गों, सूर्य मन्दिर तथा शेख बहाउद्दीन जकारिया की खानकाह होने के कारण मुल्तान सर्वाधिक प्रसिद्ध था।
➣ देवल (गुजरात) व्यापारिक दृष्टि से समृद्ध माना गया है। यह अन्तर्राष्ट्रीय बन्दरगाह का कार्य करता था ।
➣ अन्हिलवाड़ नगर व्यापारियों के लिए तीर्थस्थान के समान था। यहाँ पर बड़ी संख्या में मुस्लिम व्यापारी रहते थे।
➣ विदेशी यात्री बार्थेमा ने विभिन्न देशों से प्रतिवर्ष खंभात आने वाले लगभग तीन सौ विदेशी जहाजों का उल्लेख किया है। खंभात का रेशम मूल्यवान वस्तुओं में से एक था, जिस पर अलाउद्दीन खिलजी ने नियंत्रण लगा दिया था।
➣ बंगाल चावल एवं रेशम के लिए प्रसिद्ध था। प्रसिद्ध चीनी यात्री माहुआन वहाँ पर रेशम के कीड़े पाले जाने का उल्लेख करता है।
➣ विभिन्न देशों से मंगाये जाने वाले व्यापारिक माल में घोड़ों का आयात सर्वोपरि था। इब्नबतूता एवं मार्कोपोलो तुर्किस्तान एवं ईरान से घोड़े के निर्यात का उल्लेख करता है।
➣ घोड़ों के बाद हथियारों का विशेष स्थान था। मुहम्मद बिन तुगलक के काल में सैय्यद अबुल हसन अल इबादी राज्य के पैसे अस्त्रों का व्यापार करता था।
➣ मध्यकाल में बनारस एक विशेष प्रकार की पगड़ियों के निर्यात के लिए प्रसिद्ध था।
➣ मार्कोपोलो ने लाहौर से इस्पात के निर्यात किये जाने का उल्लेख किया है।
➣ भारत में सूती वस्त्र उत्तम किस्म का होता था, जिसे अनेक देशों में निर्यात किया जाता था। बाबरनामा में भारतीय श्वेत वस्त्रों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है।
➣ भारत में नील का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था। लाहौर एवं बयाना नील के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। इसके अतिरिक्त जड़ी-बूटियाँ, मसाले, शक्कर आदि निर्यात किये। जाते थे।
सल्तनतकालीन कारखाने
➣ फिरोज तुगलक ने राजकीय कारखानों पर विशेष ध्यान दिया। फिरोज तुगलक के समय शाही कारखानों की संख्या 36 हो गई थी।
➣ फिरोज शाह तुगलक ने अपने 1,80,000 दासों में से 12,000 दासों को विविध शिल्प कलाओं के लिए प्रशिक्षित किया था।
➣ अफीफ इन राजकीय कारखानों को दो भागों में बाँटता है:-1. रातिबि 2. गैर-रातिबि
➣ रातिबि कारखानों में मतवख, सुतरखाना, आबदारखाना, पीलखाना आदि प्रमुख थे। जबकि गैर रातिबि में जामदारखाना (वस्त्र), रिकाबखाना (घोड़े की जीन), आलमखाना (पताका/शाही झण्डा या निशान) आदि प्रमुख थे।
➣ रातिबि कारखानों में काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन निश्चित होता था। गैर रातिबि कारखानों में वेतन अनिश्चित होता था।
➣ प्रत्येक कारखाना एक उच्चश्रेणी के मलिक के अधीन होता था। इसे मुतशर्रिफ कहते थे।
| राजकीय कारखाने | गैर राजकीय कारखाने |
|---|---|
| शमाखाना – रोशनी आदि का प्रबंधन | जामदारखाना – वस्त्रों से संबंधित |
| आबदारखाना – जल के प्रबंधन से संबंधित | |
| फर्राशखाना – फर्श के कालीन इत्यादि से संबंधित | |
| पीलखाना – गजशाला | अलमखाना – पताकाओं (शाही ध्वज) से संबंधित |
| पायगाह – अश्वशाला | जर्रादखाना – अस्त्र-शस्त्र से संबंधित |
| मतखब – रसोई | रिकाबखाना – घोड़ों की जीन से संबंधित |
| सगखाना – कुत्तों के रखने का स्थान | सिलहखाना – अस्त्र-अस्त्र का भंडार |
| शुतुरखाना – ऊँटों के रखने का स्थान | जवाहरखाना – रत्नों से संबंधित |
| तश्तदारखाना – हाथ-मुँह धुलाने के सामान से संबंधित |
सिक्के
➣ प्रारम्भ में दिल्ली सुल्तानों ने भारत में प्रचलित सिक्कों को अपनाया, इसलिए मुहम्मद गोरी के सिक्कों पर एक ओर उसका नाम तथा दूसरी ओर देवी लक्ष्मी आकृति अंकित मिली है।
➣ इसके अलावा गोरी के सिक्कों की एक ओर शिव के बैल तथा देवनागरी लिपि में पृथ्वीराज लिखा होता था।
➣ इल्तुतमिश पहला तुर्क सुल्तान था, जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलवाये। उसने सल्तनत कालीन दो महत्त्वपूर्ण सिक्के चाँदी का टका (लगभग 175 ग्रेन) तथा तांबे का जीतल चलवाया।
➣ इल्तुतमिश ने सिक्कों पर टकसाल के नाम अंकित करवाने की परम्परा को आरम्भ किया। टको पर टकसाल का नाम लिखने की परंपरा भारत में प्रचलित करने का श्रेय इल्तुतमिश को जाता है।
➣ सिक्कों पर इल्तुतमिश ने अपना उल्लेख ख़लीफ़ा के प्रतिनिधि के रूप में किया है। उसके सिक्कों पर शिव की नंदी व चौहान घुड़सवार अंकित होते थे।
➣ ग्वालियर विजय के बाद इल्तुतमिश ने अपने सिक्कों पर कुछ गौरवपूर्ण शब्दों को अंकित करवाया, जैसे शक्तिशाली सुल्तान, साम्राज्य व धर्म का सूर्य, धर्मनिष्ठों के नायक के सहायक।
➣ मुहम्मद तुग़लक़ ने सांकेतिक व प्रतीकात्मक सिक्कों का प्रचलन करवाया। उसने दोकानी नामक सिक्के का प्रचलन करवाया। सिक्के संबंधी विविध प्रयोगों के कारण ही एडवर्ड टामस ने उसे धनवानों का राजकुमार कहा है। उसने सोने का नया सिक्का चलाया, जिसे इब्नबतूता दीनार कहता है।
➣ फ़िरोज़ तुग़लक़ ने मुद्रा व्यवस्था के अन्तर्गत बड़ी संख्या में तांबा एवं चाँदी के मिश्रण से निर्मित सिक्के जारी करवाये, जिसे सम्भवतः अद्धा एवं मिस्र कहा जाता था।
➣ बहलोल लोदी ने बहलोली सिक्के का प्रचलन करवाया, जो अकबर के समय तक उत्तर भारत में विनिमय का प्रमुख साधन बना रहा।
| सिक्का | धातु | शासक |
|---|---|---|
| गदहिया | खोटे चाँदी अथवा ताँबे का सिक्का | गुजरात की वाणिज्यिक गतिविधियों में विशेष महत्वपूर्ण |
| देहलीवाल | चाँदी का सिक्का | तोमर, चौहान व गुलाम वंश के शासक |
| टंका | चाँदी का सिक्का | इल्तुतमिश |
| जीतल | ताँबे का सिक्का | इल्तुतमिश |
| दीनार | सोने का सिक्का | मुहम्मद बिन तुगलक (इब्नबतूता के अनुसार) |
| अदली | चाँदी का सिक्का | मुहम्मद बिन तुगलक (इब्नबतूता के अनुसार) |
| दोगानी | चाँदी व ताँबा मिश्रित | मुहम्मद बिन तुगलक |
| शशगनी | चाँदी का सिक्का | फिरोज तुगलक |
| अद्धा | चाँदी व ताँबा मिश्रित | फिरोज तुगलक |
| विख | चाँदी व ताँबा मिश्रित | फिरोज तुगलक |
| बहलोली | चाँदी व ताँबा मिश्रित | बहलोल लोदी |
| दिरहम | चाँदी का सिक्का | अरबों द्वारा |
| लारी | चाँदी का सिक्का | भारत के पश्चिमी तट के बन्दरगाह शहरों में लोकप्रिय |
➣ ताँबे के सिक्के को सल्तनत काल में दिरहम कहा जाता था।
सल्तनत कालीन शब्दावली
| वली अहद | उत्तराधिकारी |
| खलीफा | मुहम्मद साहब के उत्तराधिकारी एवं मुसलमानों के धार्मिक व राजनैतिक प्रधान |
| खुत्बा | इंद व जुमे (शुक्रवार) की नमाज के समय दिया जाने वाला धार्मिक प्रवचन जिसमें खुदा की स्तुति एवं पैगम्बर की प्रशंसा के बाद बादशाह का वर्णन होता था। |
| गाजी | धर्म युद्ध में विजय प्राप्त करने वाला योद्धा |
| सिजदा | घुटने के बल बैठकर सुल्तान के समक्ष सिर झुकाना |
| पयबोस | सुल्तान के पैर चूमना |
| सौन्धर | कृषकों को दिये जाने वाले तकावी ऋण |
| विजारत | मंत्रि परिषद या सम्राट के परामर्शदाता मंत्री |
| इतलाक | धनादेश पत्र (हुंडी) |
| फवाजिल | अधिशेष भूराजस्व |
| हासिल | वास्तविक प्राप्त राजस्व |
| ज़मा, महसूल | अनुमानित राजस्व |
| इदरार/इनाम | पेंशन के रूप में विद्वानों एवं धार्मिक लोगों को दिया जाने वाला कर मुक्त भूमि अनुदान से भिन्न वजीफा (Stifiend) |
| मिल्क /अमलाक/इमलाक | धर्म व दान कार्यों के लिए प्रदत्त वंशानुगत कर मुक्त भूमि अनुदान |
| औकाफ | इस्लामिक कानून में ऐसी सम्पत्ति जो धर्मार्थ। कार्यों हेतु प्रदान करने के लिए आरक्षित रखी हो । |
| मसाहत | भूमि की माप |
| इतलाकी/खालसा | शाही भूमि जिसका राजस्व सुल्तान के खजाने में सीधा जमा होता था। |
| मुक्ता या वली/वजहादर | अक्ता (इक्ता) धारक या प्रान्त का गवर्नर |
| जवाबित | राज्य नियम/धर्म निरपेक्ष नियम जो शरीअत के अलावा थे। |
| ख़त-ए-आजादी | दास मुक्ति पत्र |
| वक्फ | धार्मिक संस्थाओं को दिया जाने वाला भूमि अनुदान |
| ताजिक | एक गैर तुर्क प्रजाति/ स्वतंत्र उत्पन्न अमीर |
| वजीफा | नकद छात्रवृत्ति |
| नाविसंद | लिपिकार |
| मवास | विद्रोही गाँव या क्षेत्र जहाँ से बल प्रयोग द्वारा राजस्व वसूली की जाती थी। |
| मकतव | मुस्लिम प्राथमिक शिक्षण संस्थान |
| मदरसा | मुस्लिम उच्च शिक्षण संस्थान |
| रैयत | साधारण प्रजा/किसान |
| अकलीम | राज्य / प्रान्त |
| खिलअत/खिल्लत | सुल्तान द्वारा पुरस्कार या प्रशंसा के रूप में प्रदत्त प्रतीक चिन्ह या पोषाक |
| कारखाना | राज्य के नियंत्रण में फैक्ट्रियां या उद्योग |
| कोतवाल | नगर प्रशासन का प्रधान अधिकारी |
| सराय-ए-दल | यह निर्मित वस्तुओं एवं आयातित माल का बाजार था। |
| परवाना नवीस | परमिट देने वाला अधिकारी |
| सद्र-उस-सुदुर | धर्म विभाग व दान विभाग का प्रधान |
| काजी-उल-कुजात | सुल्तान के बाद न्याय का सर्वोच्च अधिकारी |
| दीवान-ए-इस्तिहाक | पेंशन विभाग |
| दीवान-ए-खेरात | दान विभाग |
| दीवान-ए-बंदगान | दास विभाग |
| जिहाद | धर्म युद्ध |
| दारुल-हर्ब | काफिरों का देश |
| दारुल इस्लाम | इस्लाम का देश |
| कुफ्र | अल्लाह या मुहम्मद साहब में अविश्वास |
| मुक्ताई | सल्तनत काल में लगान निर्धारण की मिश्रित प्रणाली |
| जिम्मी | इस्लाम स्वीकार करने के स्थान पर जजिया देने वाले लोग |
| तजकिर | युद्ध के समय दिया जाने वाला महत्वपूर्ण धर्मोपदेश |
| तफसीर | कुरान का अनुवाद या समीक्षा |
| फतवा | किसी समस्या का शरीयत के अनुसार निर्णय |
| फरमान तुगरी | वह फरमान जिस पर सुल्तान की खास मुहर लगी हो। |
| फिकह | इस्लामी धर्म नीति का ज्ञान |
| मैमार | भवन निर्माण करने वाला इंजीनियर |
| आमिल | गाँवों में भूमिकर वसूल करने वाला अधिकारी |
| कारकुन | भूमिकर का हिसाब-किताब रखने वाला |
| कुब्बा | एक प्रकार का तोरण द्वार जिसे मार्गों पर सजाया जाता था |
| खरीतादार | फरमानों को भेजने वाला अधिकारी |
| खानकाह | सूफियों का निवास स्थान |
| खिर्का | वह ऊपरी वस्त्र जिसे शेख पहनते थे। |
| जहांदारी | शासन प्रबन्ध या राज्य व्यवस्था |
| अहकामे तौकी | राजकीय फरमान |
| नौबत | केवल सुल्तान की उपस्थिति या राजधानी में बजने वाले नगाड़ा, तुरही, बिगुल, झाँज, बाँसुरी आदि वाद्य यन्त्र |
| मफरुज | किलों की सेना के खर्च के लिए नियत भूमि |
| मसाहत | भूमि की पैमाइश |
| विलायत | राज्य का सबसे बड़ा भाग अथवा प्रान्त या प्रदेश |
| सदका | एक प्रकार का दान/धार्मिक कर |
| समा | सूफियों का संगीत तथा नृत्य |
| हश्म-ए-कल्ब | सुल्तान की केन्द्रीय सेना |
| हश्म-ए-अतरफ | प्रान्तों की सेना |
| हुलिया | सैनिकों का पूर्ण विवरण |
| मिल्लत | मुस्लिम (सुन्नी) प्रजा/मुस्लिम भ्रातृत्व |
| नद्दाफ | रूई धुनने वाला कारीगर (धुनिया), बुनकर |
| अरादा/मंगनीक | बड़े पत्थर व आग के गोले फैंकने वाली मशीन |
| गैर-वजही | अनियमित सैनिक |
| निसाब | जकात से मुक्त संपत्ति |
| गैरत श्री | हिन्दूओं के सामाजिक मामलों में सरकार द्वारा निर्णय लेने के लिए प्रयुक्त कानून |
| निसार | आरती की प्रथा |
| चिल्लाह-ए-मा-आकुल | भारतीय योग की प्राणायाम विधि |
| कुश्कैजिर | तोप का बिगड़ा हुआ रूप |
| चर्ख | शिला प्रक्षेपास्त्र |
| फलाखून | गुलेल |
| सबत | एक सुरक्षित गाड़ी जो शत्रु के आक्रमण से रक्षा करती थी। |
| पटोला | गुजरात का एक प्रसिद्ध वस्त्र |
| अलसी | एक प्रकार का महंगा कपड़ा |
| सलामी | तुगलक स्थापत्य शैली की ढलवां दीवारें |
| नौरोज | ईरानी नववर्ष |
| तौहीद-ए-वजुदी | जीव मात्र की एकता का सिद्धान्त |
| अहल-ए-इल्म | ज्ञानी व्यक्ति, उलेमा |
| मसनबी | एक काव्यात्मक रचना |
| सनद | नियुक्ति आदेश |
| अकलीम | प्रदेश, राज्य या प्रान्त |
| मुकाता/मुकतिया | ठेके पर लगान वसूली का अधिकार प्राप्त करने वाले |
| बरीद | गुप्तचर एवं सूचनाएँ एकत्र करने वाले |
| खिदमती | पराजित भारतीय शासकों से वसूला जाने वाला कर |
| महदी | सूफी सिलसिले में पापों से मुक्ति दिलाने वाला |
| निर्ख-ए-फ़रमानी | राज्य की ओर से निर्धारित मूल्य |
| वफ़ा-ए-फ़रमानी | राज्य द्वारा निर्धारित उपज |
| बलाहार | बहुत छोटा किसान |
| खासादार | सुल्तान के अस्त्र-शस्त्रों का प्रबन्ध करने वाला अधिकारी |
| तमस्सुक | बॉण्ड या बन्धपत्र |
| किसास | गम्भीर अपराध हेतु बदले के रूप में दिया जाने वाला दण्ड |
| नदीम | सुल्तान का सहचर |
| तकरत | सल्तनतकाल में निःसन्तान मरने वालों की राज्य द्वारा संपत्ति हस्तगत करने को तरकत कहते है। |
| ताजिर | अपराधी को सुधारने के लिए दिया जाने वाला दण्ड |
| फितना | ईश्वरीय कानूनों का उल्लंघन तथा विद्रोह |
| अहदी | सम्राट् के विश्वसनीय सैनिकों की सेना |
| किरानी | लिपिक |
| अताबेक | अल्पवयस्क सुल्तानों के संरक्षक के लिए प्रयुक्त उपाधि |
| खजीज | कोषाध्यक्ष |
| तरीकत | कुरान की उदारवादी व्याख्या |
| मुफरिद | दुर्ग में हथियारों की देखभाल करने वाला अधिकारी |
| मुसादत | राज्य द्वारा अमीरों को प्रदत्त ऋण |
| दोसिहट | कपड़े का बाजार |
| वहदत-उल-वूजुद | ईश्वरीय एकता |
| वहदत-उल-शुहुद | दर्शन की एकता |
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