मुइजुददीन मुहम्मद गोरी (1173 ई.-1206 ई): मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत मुइजुददीन मुहम्मद गोरी (1173 ई.-1206 ई)
📚 विषय सूची

भारत में तुर्की साम्राज्य

➣ भारत में तुर्की साम्राज्य का एंव मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मुजुर्धन मुहम्मद बिन साम था, जिसे शिहाबुद्दीन (धर्म का ज्वलंत लक्षण) मुहम्मद गौरी अथवा गौर वंश का मुहम्मद भी कहा जाता है।

➣ भारत पर आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान मुहम्मद बिन कासिम था, परंतु शीघ्र मृत्यु हो जाने के कारण वह भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करने में असफल रहा। उसके आक्रमण का एकमात्र स्थायी प्रभाव सिंध की विज्ञय थी।

➣ मुहम्मद विन कासिम के बाद महमूद गजनवी ने भारत पर कई आक्रमण किये, लेकिन उसने भी अपने आप को मात्र लूटपाट तक ही सीमित रखा।

➣ इस प्रकार भारत में मुसलमानों के साम्राज्य की दृढ़ नींव रखने का श्रेय मुहम्मद गौरी को ही जाता है।

गोर का एक पहाड़ी क्षेत्र था, जो गजनी और हेरात के बीच में स्थित था। आरम्भ में गोरी, गजनी के अधीनस्थ थे, किंतु बाद में वे स्वतंत्र हो गये। गोर में शंसबनी वंश मुख्य था।

➣ भारत के पश्चिम उत्तर के सीमांत पर मुहम्मद ग़ोरी नामक एक मुसलमान सरदार ने महमूद ग़ज़नवी के वंशजों से राज्याधिकार छीन कर एक नये इस्लामी राज्य, ग़ोर (1173 ई.), की स्थापना की।

➣ गौरी स्वतंत्र शासक होते हुए भी स्वयं को अपने बड़े भाई गियासुद्दीन के अधीन मानता था। 1203 ई. में गियासुद्दीन की मृत्यु के पश्चात गौरी ने स्वतंत्र शासक के रूप में मुइजुद्दीन की उपाधि धारण की थी।

➣ मुहम्मद ग़ोरी महत्त्वाकांक्षी था। वह महमूद ग़ज़नवी की तरह भारत पर आक्रमण करने का इच्छुक था। वह लूटमार के साथ इस देश में मुस्लिम राज्य भी स्थापित करना चाहता था।

➣ उस समय में पश्चिमी पंजाब तक और दूसरी ओर मुल्तान एवं सिंध तक मुसलमानों का अधिकार था, जिसके अधिकांश भाग पर महमूद के वंशज ग़ज़नवी सरदार शासन करते थे।

➣ पंजाब भारत का सिंहद्वार कहा जाता था अतः इस पर आक्रमण करना उसके लिये आवश्यक हो गया। साम्राज्य स्थापना के उद्देश्य से 1175 से 1205 ई. के मध्य गौरी ने कई बार भारत पर आक्रमण किये।

मुहम्मद गोरी शंसबनी वंश का था जो गजनी का शासक बना जिसका उद्देश्य भारत में तुर्की सत्ता स्थापित करना था।

मुहम्मद गौरी का भारत आक्रमण

➣ गौरी गोमल दरें से भारत आया था। मिनहाज की तबकात ए नासिरी में गौरी की भारत विजय का विवरण है। मुहम्मद गौरी का भारत आक्रमण

1175 ई. में मुहम्मद गोरी ने सर्वप्रथम भारतीय सीमाओं में प्रवेश किया था। जिसमें पहला आक्रमण 1175 ई. में मुल्तान पर किया और अगले ही वर्ष 1176 ई. में कच्छ जीतने के बाद गुजरात की ओर बढ़ा।

➣ मुहम्मद गोरी ने 1178-79 ई. में गुजरात पर आक्रमण किया, लेकिन गुजरात के शासक मूलराज ने गौरी को आबू पर्वत के निकट पराजित कर दिया।

मूलराज द्वितीय की हाथों हुई यह पराजय मुहम्मद गोरी की भारत में प्रथम पराजय थी। इस युद्ध का नेतृत्व मूलराज द्वितीय की विधवा माँ नायिका देवी ने किया था। 1178 ई. में मूलराज द्वितीय की मृत्यु के बाद भीम द्वितीय शासक बना।

➣ अब वह पेशावर और पंजाब होकर भारत विजय का आयोजन करने लगा। उस समय पेशावर और पंजाब में गजनवी के वंशज शासन कर रहे थे।

1179 ई. में उसने पेशावर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। दो वर्ष बाद लाहौर (पंजाव) पर आक्रमण किया। इस समय वहां का शासक खुसरव मलिक था। खुसरव मलिक ने बहुमूल्य भेंट देकर अपनी रक्षा की।

1185 ई. में गौरी ने सियालकोट को जीता और वापस चला गया। 1186 ई. में उसने पुनः लाहौर को जीत कर वहाँ के शासक खुसरव को बंदी बना लिया। बंदी गृह में ही 1192 ई. में खुसराव की मृत्यु हो गई।

लाहौर को केंद्र बनाकर 1189 ई. में मुहम्मद गौरी ने भटिंडा एंव सरहिंद के दुर्ग को जीत लिया। गौरी का भटिण्डा अभियान एवं सरहिन्द के किले को जीतना तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) का प्रमुख कारण था।

➣ गौरी ने पंजाब के अधिकांश भाग को ग़ज़नवी के वंशजों से छीन लिया और वहाँ पर अपनी सृदृढ़ क़िलेबंदी कर भारत के हिन्दू राजाओं पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगा।

➣ मुहम्मद ग़ोरी के राज्य की सीमा अब दिल्ली के चाहमान शासक पृथ्वीराज चौहान के राज्य से लगी थीं। अतः आगे बढ़ने के लिए उसे अब पृथ्वीराज चौहान का सामना करना था।

➣ मुहम्मद ग़ोरी ने पृथ्वीराज के विरुद्ध जो अभियान किया, वह एक प्रबल आक्रमण था। इसलिए महमूद ग़ज़नवी के बाद मुहम्मद ग़ोरी ही भारत पर चढ़ाई करने वाला दूसरा मुस्लिम आक्रमणकारी माना गया है।

➣ गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान का आमना सामना थानेश्वर के निकटवर्ती तराइन या तरावड़ी के मैदान में हुआ जिसे तराईन का युद्ध नाम से जाना जाता है।

1191 ई. में तराईन का प्रथम युद्ध हुआ जिसमे महमूद गौरी को भारी क्षति उठानी पड़ी। फलस्वरूप उसे भागना पड़ा। मुहम्मद गौरी की भारत में यह दूसरी पराजय थी।

➣ एक योजना के साथ गौरी तराईन के मैदान में फिर आ धमका। 1192 में तराईन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया। पृथ्वीराज चौहान की पराजय के पश्चात् ही भारत में मुस्लिम शक्ति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया।

➣ तराइन की दूसरी लड़ाई को भारतीय इतिहास की एक निर्णायक लड़ाई इसलिये माना जाता है, क्योंकि उस समय चौहानों का राज्य उत्तरी भारत का प्रमुख राज्य था और उसकी हार ने उत्तरी भारत में तुर्कों की सत्ता की स्थापना को लगभग तय कर दिया।

तराईन के युद्धों का वर्णन मिन्हाज़ उस सिराज़ द्वारा रचित तबकात ए नासिरी ग्रन्थ में मिलता है।

➣ तराईन के युद्ध के बाद गौरी ने हाँसी, समाना, मेरठ, अलीगढ़ पर अधिकार कर दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। 1192 ई. से दिल्ली, भारत में गोरी की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र थी।

➣ मुहम्मद गोरी अपने द्वारा जीते गए भारतीय प्रदेशों पर शासन का उत्तरदायित्व कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंपकर वापस गजनी लौट गया था।

➣ मुहम्मद गोरी 1194 ई. में फिर भारत वापस आया। जिसमे उसका सामना जयचंद्र (गहड़वाल वंश) हुआ। दोनों के मध्य चंदावर (वर्तमान इटावा जिले) नामक स्थान पर भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में जयचंद मारा गया।

➣ इस विजय के पश्चात् तुर्की का नियंत्रण पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनारस तक स्थापित हो गया। अब जयचंद का पुत्र हरिश्चंद्र मुहम्मद गौरी के अधीन शासन करने लग गया।

➣ 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में कुतुबुद्दीन ऐबक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वस्तुतः 1192-1206 ई. तक उसने गोरी के प्रतिनिधि के रूप में उत्तरी भारत के विजित भागों का प्रशासन संभाला।

➣ इस अवधि में ऐबक ने उत्तरी भारत में तुर्की शक्ति का विस्तार भी किया। बिहार और उत्तरी बंगाल की विजय के बारे में गोरी अथवा ऐबक ने सोचा भी न था।

➣ इस कार्य को गोरी के एक साधारण दास इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने किया। उसने 1193 से 1202 ई. के मध्य में बिहार की विजय की तथा नालंदा एवं विक्रमशिला को तहस-नहस कर राजधानी उदन्तपुर पर कब्जा कर लिया।

➣ उसने 1198 से 1203 ई. के मध्य बंगाल पर आक्रमण किया। उस समय वहां का शासक लक्ष्मणसेन था। वह बिना युद्ध किए ही भाग निकला।

➣ तुर्की सेना ने राजधानी नदिया में प्रवेश कर बुरी तरह लूट-पाट की। राजा की अनुपस्थिति में नगर ने आत्मसमर्पण कर दिया। लक्ष्मणसेन ने भाग कर पूर्वी बंगाल में शरण ली और वहीं कुछ समय तक शासन करता रहा।

इख्तियारुद्दीन ने भी संपूर्ण बंगाल को जीतने का प्रयत्न नहीं किया। इख्तियारुद्दीन ने लखनौती को अपनी राजधानी बनाया। प्रो. हबीब के अनुसार, तुर्कों द्वारा उत्तर-पश्चिम की विजय ने क्रमशः शहरी क्रांति और ग्रामीण क्रांति को जन्म दिया है।

➣ मुहम्मद गोरी का अंतिम आक्रमण 1205 ई. में पंजाब में खोक्खर विद्रोह को दबाने के लिए वापस भारत आया और उनका नरसंहार किया।

➣ वापस गजनी लौटते वक्त सिंधु नदी के तट पर दमयक नामक स्थान पर नमाज पढ़ते समय 15 मार्च, 1206 को अफरीदी (करमार्थी) कबीलों द्वारा मुहम्मद गोरी की हत्या कर दी गयी।

➣ मुहम्मद गोरी की हत्या के पश्चात् उत्तराधिकारियों ने स्वंय को स्वतंत्र घोषित कर दिया। यल्दौज, जो गौरी का ही एक ग़ुलाम था , को गजनी की गद्दी प्राप्त हुई।

➣ 1206 ई. में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के पश्चात् कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाहौर से सत्ता प्रारंभ की और उसे अपनी राजधानी घोषित किया। ऐबक का मकबरा भी यहीं है।

अन्य

➣ मुहम्मद गोरी के दरबारी कवि फखरुद्दीन गाजी एवं नजामि उरूजी थे।

➣ गोरी के सिक्कों की एक ओर शिव के बैल तथा देवनागरी लिपि में पृथ्वीराज लिखा होता था।

➣ मुहम्मद गोरी के कुछ सिक्कों पर एक ओर कलमा ख़ुदा रहता था। दूसरी ओर देवी लक्ष्मी की आकृति होती थी।

➣ ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती मुहम्मद गौरी के साथ 1192 ई. में भारत आये व अजमेर गये। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने ही भारत में चिश्ती संप्रदाय की स्थापना की थी।

वर्ष राज्य / स्थान शासक परिणाम एवं महत्व
1175 ई. मुल्तान करमाथी शासक विजय; भारत की दिशा में मुहम्मद गोरी का प्रथम सफल अभियान।
1176 ई. उच्छ करमाथी शासक विजय; सिंध क्षेत्र में गोरी की स्थिति और मजबूत हुई।
1178 ई. अन्हिलवाड़ (गुजरात) चालुक्य वंश, रानी नाइक देवी (भीम द्वितीय की संरक्षिका) पराजय; गोरी की भारत में पहली बड़ी हार।
1179 ई. पेशावर मलिक खुसरो विजय; पंजाब क्षेत्र में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ।
1181 ई. लाहौर मलिक खुसरो आक्रमण; गजनवी सत्ता पर दबाव बढ़ा।
1182 ई. देवल एवं सिंध सुम्रा शासक विजय; सिंध क्षेत्र पर प्रभाव स्थापित किया।
1184 ई. स्यालकोट मलिक खुसरो विजय; स्यालकोट में किला बनवाकर सैन्य आधार स्थापित किया।
1186 ई. लाहौर मलिक खुसरो विजय; गजनवी वंश का अंत और पंजाब पर गोरी का अधिकार।
1189 ई. भटिंडा चौहान सूबेदार विजय; पृथ्वीराज चौहान के साथ संघर्ष की भूमिका तैयार हुई।
1191 ई. तराइन का प्रथम युद्ध पृथ्वीराज चौहान पराजय; गोरी घायल हुआ और युद्ध हार गया।
1192 ई. तराइन का द्वितीय युद्ध पृथ्वीराज चौहान विजय; उत्तरी भारत में तुर्की सत्ता की नींव पड़ी।
1193 ई. हांसी, कुहराम, सरसुती एवं दिल्ली विजय; दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों पर तुर्की नियंत्रण स्थापित हुआ।
1194 ई. चंदावर (कन्नौज) गाहड़वाल शासक जयचन्द विजय; गंगा-यमुना दोआब पर तुर्कों का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
1195–96 ई. बयाना कुमारपाल विजय; राजपूत प्रतिरोध को कमजोर किया गया।
1196 ई. ग्वालियर सुलक्षणपाल विजय; मध्य भारत में तुर्की प्रभाव का विस्तार हुआ।

➣ महमूद गज़नवी जहाँ विजय और धन संग्रह में लगा रहा, जबकि मुहम्मद गौरी एक ऐसा साम्राज्य (दिल्ली सल्तनत) स्थापित करने में सफल हुआ, जो शताब्दियों तक स्थायी रहा।

➣ मुहम्मद गोरी का कोई पुत्र नहीं था इसलिए 1206 में उसकी हत्या के बाद उसका साम्राज्य उसके ग़ुलामों में इस प्रकार बँट गया –

 ताजुद्दीन यल्दौज ग़जनी
 कुतुबद्दीन ऐबक लाहौर, दिल्ली
 बख्तियारूद्दीन खिलजीबंगाल
 नासिरूद्दीन कुबाचा कच्छ, मुल्तान

➣ मुहम्मद गोरी ने सर्वप्रथम कुतुबुद्दीन ऐबक को हाँसी की इक्ता प्रदान की थी। ऐबक ने भारत में नए राजवंश की नींव डाली, जिसे गुलाम वंश कहा जाता है। 1206 ई. से ही दिल्ली सल्तनत की शुरुआत हुई। ऐबक के समय राजधानी लाहौर थी दिल्ली नहीं।

तुर्की आक्रमण का प्रभाव

➣ तुर्कों के आक्रमण के बाद भारत में सदियों से चली आ रही बहु-राज्य व्यवस्था खत्म हो गई और राजनीतिक ढांचा एक नए रूप में ढलने लगा।

➣ तुर्कों के आने के साथ ही भारत की पुरानी सामाजिक प्रथाओं में ढिलाई आने लगी, जबकि नए तरह के संबंध और संपर्क बनने शुरू हुए। राजनीतिक स्तर पर देखें तो सामंती ढांचे की जगह अब एक केंद्रीकृत और निरंकुश शासन-प्रणाली स्थापित हो गई।

➣ सेना के गठन, उसकी बनावट और सैनिकों की भर्ती व रख-रखाव के तरीकों में भी बड़ा बदलाव दिखाई दिया। पहले जहां युद्ध करना किसी खास जाति या वर्ग तक सीमित माना जाता था, वहीं अब यह बंधन टूट गया।

➣ सामंतों की निजी सेनाओं की जगह अब मजबूत और स्थायी सेनाएं बनने लगीं, जिनकी भर्ती सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में होती थी।

➣ तुर्क शासकों की विजय के बाद राजकाज की भाषा बदलकर फारसी हो गई, जिससे प्रशासनिक कामकाज में एकरूपता और व्यवस्थित ढांचा देखने को मिला।

➣ इस विजय का एक बड़ा असर भारतीय जाति-व्यवस्था पर भी पड़ा, जिसे गहरा झटका लगा। नतीजा यह निकला कि जो लोग पारंपरिक जाति व्यवस्था के तहत शोषण झेल रहे थे, वे नए सुल्तानों की तरफ झुकने लगे और उनके समर्थक बन गए।

➣ तुर्क अपने साथ भारत में कई नई तकनीकें भी लाए, जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था के ढांचे में गहरा बदलाव आया। शहरों के दोबारा आबाद होने और फलने-फूलने के इसी दौर को देखते हुए इतिहासकार मोहम्मद हबीब ने तुर्कों के आगमन को नगरीय क्रांति यानी शहरी क्रांति का नाम दिया।

मिन्हाज़ उस सिराज़

➣ मिन्हाज़ उस सिराज़ का जन्म 1193 ई. में अफगानिस्तान के फिरोज़कोह में हुआ था। जिसका पूरा नाम अबू उरमान मिन्हाजुद्दीन बिन सिराजुद्दीन था।

➣ मिन्हाज़ उस सिराज़ के पिता मुहम्मद गोरी की सेना में अध्यात्मिक गुरु के पद पर काम किया करते थे।

➣ मिन्हाज़ को इल्तुतमिश को राजकीय संरक्षण प्रदान था। उसने 1231 में ग्वालियर पर अधिकार करने के बाद इल्तुतमिश ने मिन्हाज़ को ग्वालियर में काज़ी तथा इमाम के पद पर नियुक्त किया था।

➣ रज़िया के शासनकाल में मिन्हाज़ उस सिराज़ को दिल्ली में मदरसे का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया था

बहरामशाह के शासनकाल में मिन्हाज़ उस सिराज़ को मुख्य काज़ी के पद पर नियुक्त किया गया।

नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में मिन्हाज़ उस सिराज़ को दरबारी कवि नियुक्त किया गया।

➣ मिन्हाज़ उस सिराज़ के द्वारा लिखा गया तबकात ए नासिरी ग्रन्थ, नासिरुद्दीन महमूद को ही समर्पित है।

➣ तबक़ात ए नासिरी में नासिरुद्दीन महमूद को दिल्ली का सबसे आदर्श सुल्तान बताया गया है।

➣ मिन्हाज़ उस सिराज़ की मृत्यु दिल्ली में, बलबन के शासनकाल में हुई थी।

तबक़ात-ए-नासिरी

मिन्हाज़ उस सिराज़ के द्वारा लिखा गया तबक़ात-ए-नासिरी ग्रन्थ, नासिरुद्दीन महमूद को समर्पित है।

➣ तबक़ात ए नासिरी की रचना फ़ारसी भाषा में मिन्हाज़ उस सिराज़ के द्वारा 13वी शताब्दी (लगभग 1227 से 1259 के मध्य ) में की गई थी।

➣ तबक़ात ए नासिरी मुहम्मद गोरी की भारत विजय, कुतुबुद्दीन ऐबक तथा बख्तियार खिलज़ी के द्वारा किए गए आक्रमणों की जानकारी देता है।

➣ तबक़ात ए नासिरी 23 अध्यायों में विभक्त है जिसमें तराइन के युद्ध, नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय आदि को ध्वस्त करने की जानकारी भी प्रदान की गई है।

➣ तबक़ात ए नासिरी में इल्तुतमिश के बारे में लिखा है कि – कोई भी राजा इतना दयावान, विद्वानों और वृद्धों के प्रति सहानुभूति रखने वाला नहीं हुआ।

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