दास-प्रथा
➣ भारत में दास-प्रथा की प्राचीनतम उल्लेख त्रग्वैदिक ग्रन्थ से प्राप्त होता है। उत्तर वैदिक साहित्य से भी दासों के विषय में वृहत जानकारी मिलती है।
➣ ऐतरेय ब्राह्मण एक ऐसे राजा का उल्लेख करता है जिसने अपने अभिषेक के समय दस हजार दासियों को उपहार स्वरुप पुरोहित को दिया था।
➣ हालाँकि मौर्य काल तथा गुप्तकाल, दोनों में दास प्रथा के प्रमाण मिले हैं।
➣ मौर्यकालीन शासक अशोक के अभिलेखों में भी दासों का उल्लेख मिलता है।
➣ अर्थशास्त्र में 5 प्रकार के दासों का उल्लेख है- उदरदास,आत्मविक्रयी , आत्माधाता, दण्डप्रणीतदाम , ध्वजाह्रत।
➣ मनुस्मृति में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है- ध्वजाह्रत , भक्तदास, गृहज, क्रीत, दत्त्रिम , पैत्रिक , दण्ड दास।
➣ नारद स्मृति में 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है। दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान सर्वप्रथम नारद ने ही किया है।
➣ विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में पन्द्रह प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है।
➣ भारत में ब्रिटिश शासन के समय 1843 ई. में इस प्रथा को बन्द करने के लिए एक अधिनियम पारित कर दिया गया था।
➣ चौथी शताब्दी ई. पू. भारत के विषय में मेगस्थनीज ने लिखा था कि भारतवर्ष में दास प्रथा नहीं है।
➣ अशोक के अभिलेखों में दासों तथा सेवकों के प्रति उचित व्यवहार किये जाने का आदेश मिलता है। सम्भवत: प्राचीन भारत दासों की स्थिति प्राचीन रोम तथा यूनान के दासों की अपेक्षा बहुत अच्छी थी।
सती प्रथा
➣ अथर्ववेद से सती प्रथा की औपचारिकता पूरी करने के लिए पत्नी अपने पति के साथ चिता पर लेटती थी। जहाँ से उसके सम्बन्धी उसके उठने का आग्रह करते थे।
➣ वैदिक समाज में सती प्रथा प्रचलित नहीं थी।
➣ रामायण के मूल अंश में इसका उल्लेख नहीं मिलता , दशरथ तथा रावण की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नियॉं के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु उत्तरकाण्ड में वेदयंती की माता के सती होने का उल्लेख है।
➣ ब्राह्मण साहित्य , बौद्ध साहित्य एंव गृह सूत्रों से भी इसका उल्लेख नहीं मिलता।
➣ महाभारत में इस प्रथा का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है, पाण्डु की मुत्यु बाद उनकी पत्नी माद्री सती हो गयी थी जबकि अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ सती नहीं हुई थीं।
➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र (मौर्यकाल) में सती प्रथा का कोई प्रमाण नहीं मिलता है किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है।
➣ दूसरी शताब्दी ई. के लगभग चेर शासक नेदुनजेरल आदन का चोल शासक पत्तिनी से युद्ध हुआ। जिसमे दोनों मारे गये फलस्वरूप दोनों की पत्नियां सती हो गयीं।
➣ पुराणों में सती होने का उल्लेख मिलता हैं। वात्स्यायन , भास् , कालिदास एंव शूद्रक जैसे विद्वानों ने इसका उल्लेख किया है।
➣ सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्तकाल में मिलता है। 510 ई. के ऐरण अभिलेख से पता चलता है कि, गुप्त नरेश भानुगुप्त का मित्र गोप राज (सैनिक) हूणों के विरुद्ध वीरगति को प्राप्त हुआ तत्प्श्चात उसके पत्नी के सती होने का उल्लेख है।
➣ 1829 ई. में भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा को प्रतिबन्धित करने के लिये लाये गये कानून को लागू करवाने में राजा राम मोहन राय ने सरकार की मदद की थी। अंततः सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया।
हड़प्पा और वैदिक सभ्यता में अंतर
| तुलना का आधार | हड़प्पा सभ्यता | वैदिक सभ्यता |
|---|---|---|
| काल | हड़प्पा सभ्यता का विकसित काल लगभग 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. माना जाता है। इसे कांस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है। | वैदिक सभ्यता का काल लगभग 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. माना जाता है। इसे प्रारंभिक (ऋग्वैदिक) और उत्तर वैदिक काल में विभाजित किया जाता है। |
| भौगोलिक क्षेत्र | यह सभ्यता सिंधु नदी तथा उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में फैली थी। इसका विस्तार वर्तमान पाकिस्तान, पंजाब, गुजरात, राजस्थान और हरियाणा तक था। | प्रारंभिक वैदिक सभ्यता सप्तसिंधु क्षेत्र में विकसित हुई, बाद में गंगा-यमुना दोआब और पूर्वी भारत तक फैल गई। |
| संस्कृति | हड़प्पा सभ्यता एक विकसित नगरीय संस्कृति थी। यहाँ सुनियोजित नगर, चौड़ी सड़कें, पक्के मकान, जल निकासी व्यवस्था और विशाल स्नानागार मिलते हैं। | वैदिक सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण संस्कृति थी। आरंभ में लोग गाँवों में रहते थे, बाद में उत्तर वैदिक काल में नगरों का विकास हुआ। |
| समाज | समाज व्यवस्थित और संगठित था। वर्ग विभाजन के संकेत मिलते हैं, लेकिन कठोर जाति व्यवस्था का प्रमाण नहीं मिलता। | समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण प्रमुख थे। उत्तर वैदिक काल में जाति व्यवस्था कठोर हो गई। |
| परिवार व्यवस्था | संभवतः मातृसत्तात्मक प्रभाव था, क्योंकि मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। | पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था प्रमुख थी। परिवार का मुखिया पिता होता था। |
| स्त्रियों की स्थिति | स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। मातृदेवी की पूजा से स्त्रियों के महत्व का संकेत मिलता है। | प्रारंभिक वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी, वे शिक्षा और यज्ञों में भाग लेती थीं। उत्तर वैदिक काल में उनकी स्थिति कमजोर हो गई। |
| अर्थव्यवस्था | अर्थव्यवस्था व्यापार, शिल्प और उद्योग पर आधारित थी। आंतरिक और विदेशी व्यापार अत्यधिक विकसित था। | अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। उत्तर वैदिक काल में व्यापार और उद्योग का विकास हुआ। |
| कृषि | गेहूँ, जौ, तिल और कपास की खेती की जाती थी। सिंचाई के लिए नदी जल का उपयोग होता था। | गेहूँ और जौ प्रमुख फसलें थीं, बाद में चावल की खेती भी होने लगी। बैलों द्वारा हल चलाया जाता था। |
| पशुपालन | गाय, बैल, भैंस, भेड़ और बकरी पाली जाती थीं। बैल कृषि कार्यों में उपयोगी थे। | गाय सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति मानी जाती थी। पशुधन व्यक्ति की समृद्धि का प्रतीक था। |
| व्यापार एवं वाणिज्य | मेसोपोटामिया सहित विदेशी क्षेत्रों से व्यापार के प्रमाण मिले हैं। मानकीकृत माप-तौल प्रणाली विकसित थी। | प्रारंभिक वैदिक काल में व्यापार सीमित था, लेकिन उत्तर वैदिक काल में व्यापार और विनिमय प्रणाली का विस्तार हुआ। |
| शिल्प एवं उद्योग | मिट्टी के बर्तन, मनके, आभूषण, धातु कार्य और मूर्ति निर्माण अत्यधिक विकसित थे। | रथ निर्माण, धातु कार्य, हथियार निर्माण और कुटीर उद्योग प्रमुख थे। |
| नगर व्यवस्था | नगर सुनियोजित थे। ग्रिड प्रणाली, जल निकासी, अनाज भंडार और सार्वजनिक स्नानागार प्रमुख विशेषताएँ थीं। | ग्राम प्रधान जीवन था। सुनियोजित नगर व्यवस्था का अभाव था। |
| धार्मिक विश्वास | मातृदेवी, पशुपति, वृक्ष और प्रकृति पूजा के प्रमाण मिलते हैं। | इंद्र, अग्नि, वरुण, सोम आदि देवताओं की पूजा की जाती थी। यज्ञों का विशेष महत्व था। |
| धार्मिक प्रथाएँ | मूर्ति पूजा और प्रतीक पूजा के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं। | यज्ञ, मंत्र और वैदिक कर्मकांड धार्मिक जीवन का मुख्य भाग थे। |
| लिपि | हड़प्पा लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है। यह चित्रात्मक मानी जाती है। | वैदिक साहित्य मौखिक परंपरा में सुरक्षित रखा गया। लिखित लिपि का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। |
| माप-तौल प्रणाली | मानकीकृत वजन और माप प्रणाली विकसित थी, जो व्यापार में उपयोग होती थी। | ऐसी विकसित मानकीकृत प्रणाली के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। |
| धातु उपयोग | तांबा और कांस्य का व्यापक उपयोग होता था। इसलिए इसे कांस्य युगीन सभ्यता कहा जाता है। | प्रारंभ में तांबे का उपयोग और उत्तर वैदिक काल में लोहे का उपयोग बढ़ा। |
| राजनीतिक व्यवस्था | स्पष्ट राजतंत्र के प्रमाण नहीं मिलते। संभवतः व्यापारी या नगर प्रशासन व्यवस्था थी। | राजा प्रधान शासन व्यवस्था थी। सभा और समिति जैसी संस्थाएँ भी थीं। |
| अंत्येष्टि प्रथा | दफनाने और कुछ स्थानों पर दाह संस्कार के प्रमाण मिले हैं। | दाह संस्कार प्रमुख प्रथा थी। |
| पतन / परिवर्तन | जलवायु परिवर्तन, नदी मार्ग परिवर्तन, बाढ़ और व्यापार में गिरावट इसके पतन के कारण माने जाते हैं। | उत्तर वैदिक काल में महाजनपदों और नए राज्यों का विकास हुआ। |
वैदिक शब्दावली
| वेद | ज्ञान या जानना |
| कुलप | परिवार का मुखिया |
| उग्र | पुलिस कर्मचारी |
| यव | जौ |
| उष्णीष | पगड़ी |
| लांगल | हल |
| करीष | गोबर की खाद |
| पर्जन्य | बादल |
| ऊर्दर | अनाज नापने का पात्र/यंत्र |
| अमाजू | आजोबन अविवाहिता विदुषी स्त्रियां |
| अपन्या | गाय (जिसे मारा न जाये) |
| गोमत | धनी व्यक्ति (जिसके पास पर्याप्त मात्र में गायें हों) |
| गव्य एवं गव्यति | चारागाह |
| गविष्टि | गाय के लिए युद्ध हेतु शब्द |
| गोपति | राजा या मुखिया |
| गोधूलि | समय मापने का शब्द |
| गवयुती | दूरी मापने का शब्द |
| दुहिता/दुहित्री (दूध दूहने वाली) | पुत्री |
| श्याम अयम् | लोहा |
| लोहित अयस् | तांबा |
| हिरण्य | सोना |
| लोह | तांबा |
| अपु | टिन |
| निष्क | सोने का टुकड़ा अथवा आभूषण,अथवा मुद्रा |
| पेशम | कढ़ाई बाले वस्त्र |
| उपान | जूते |
| गोधूम | गेहूं |
| ब्रीहि | चावल |
| अपूप | दूध या घी मिश्रित भोज्य पदार्थ |
| वाधूय | वधू द्वारा धारण किया जाने बाला बस्त्र (विबाह के अवसर पर) |
| धन्व | मरुस्थल |
| व्रात्य | पतित क्षत्रिय या पतित आर्य |
| हिमवन्त | हिमालय पर्वत |
| मूंजपर्वत | हिन्दूकुश पर्वत |
| नदीतमा | सरस्वती नदी |
| सिंधुमाता | सरस्वती नदी |
| अर्णव | समुद्र |
| पुरंदर | इंद्र की उपाधि (दुर्ग भेदक) |
| अथर्वन | भृग या अगिरस ऋषि की उपाधि (इन्होंने यज्ञ वेदी में अग्नि की स्थापना की) |
| धूमकेतु | अग्नि की उपाधि |
| अतिथि | अग्नि |
| कीवाश | हलवाहा |
| करीष या शकृत | गोबर की खाद |
| उर्वरा अथवा क्षेत् | कृषि योग्य भूमि |
| गोमत | धनी व्यक्ति |
| गोधना | अतिथि |
| नियोग | नि:सन्तान विधवा को पुत्र प्राप्ति के लिए किसी अन्य के साथ सम्बंध बनाने की अनुमति |
| पुनर्भू | विधवाओं का पुनर्विवाह |
| त्रयम्बक | शिव |
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