सिन्धु घाटी सभ्यता (2350-1750 ई.पू. ) : परीक्षोपयोगी नोट्स एक नजर में

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत सिन्धु घाटी सभ्यता (2350-1750 ई.पू. )
विषय परिचय / प्रमुख तथ्य
हड़प्पा सभ्यता सिन्धु घाटी की एक विकसित नगरीय सभ्यता थी, जिसे सिंधु सभ्यता भी कहा जाता है। यह विश्व की सबसे प्राचीन नगर सभ्यताओं में से एक मानी जाती है।
भौगोलिक स्थिति यह सभ्यता सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे फैली थी। वर्तमान में यह पाकिस्तान, उत्तर-पश्चिम भारत और अफगानिस्तान के कुछ भागों तक विस्तृत थी।
उदय व खनन इस सभ्यता का उदय नवपाषाण काल के बाद हुआ। प्रमुख उत्खनन स्थल: हड़प्पा (1921), मोहनजोदड़ो (1922) जैसे पुरातात्विक स्थलों से इसकी खोज हुई।
काल निर्धारण लगभग 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक इसका परिपक्व (Urban Phase) काल माना जाता है।
शहरीकरण / नगरीकरण संरचना सुनियोजित नगर योजना, ग्रिड पैटर्न सड़कें, पक्की ईंटों के मकान, जल निकासी प्रणाली और स्नानागार (Great Bath) इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।
कृषि गेहूं, जौ, कपास आदि प्रमुख फसलें थीं। सिंचाई के लिए नदी जल और वर्षा पर निर्भरता थी।
पशुपालन गाय, बैल, भेड़, बकरी और भैंस पाली जाती थीं। बैल कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण थे।
कारीगरी एवं शिल्प-कौशल मिट्टी के बर्तन, आभूषण, मनके (beads), धातु कार्य और तांबा-पीतल के उपकरणों का निर्माण अत्यधिक विकसित था।
व्यापार एवं वाणिज्य आंतरिक और बाह्य व्यापार विकसित था। मेसोपोटामिया से व्यापार के प्रमाण मिले हैं। तौल-मानक प्रणाली व्यापार में सहायक थी।
राजनीतिक संगठन केंद्रीय राजा के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। संभवतः नगर-राज्य या व्यापारी वर्ग द्वारा प्रशासन संचालित होता था।
सामाजिक जीवन समाज सुव्यवस्थित था, जिसमें श्रम विभाजन स्पष्ट था। स्त्रियों की स्थिति अपेक्षाकृत सम्मानजनक मानी जाती है।
धार्मिक प्रथा व परंपरा प्रकृति पूजा, मातृ देवी की उपासना, पशुपति (proto Shiva) की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं।
हड़प्पा लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है (undeciphered script)। यह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।
माप-तौल प्रणाली मानकीकृत वजन प्रणाली (binary system आधारित) का उपयोग व्यापार और लेन-देन में होता था।
हड़प्पा बर्तन लाल रंग के पॉलिश किए हुए मिट्टी के बर्तन (Red Ware) प्रमुख थे, जिन पर काले रंग की चित्रकारी मिलती है।
मुहर और मुद्रण स्टेटाइट (soapstone) से बनी मुहरें व्यापार और पहचान के लिए उपयोग होती थीं। इनमें पशु आकृतियाँ और लिपि अंकित होती थी।
मूर्तियाँ / प्रतिमाएँ मातृ देवी की मूर्तियाँ, नर्तकी (bronze dancing girl) और पशु मूर्तियाँ प्रमुख हैं।
अंत्येष्टि / अंतिम संस्कार तीन प्रकार के दफन प्रमाण मिले हैं: पूर्ण दफन, आंशिक दफन और दाह संस्कार। सामाजिक भिन्नता के संकेत मिलते हैं।
सिन्धु सभ्यता का पतन जलवायु परिवर्तन, नदी मार्ग परिवर्तन, बाढ़, व्यापार में गिरावट और बाहरी आक्रमण जैसी विभिन्न वजहों से इसका पतन हुआ।

➣ इस संस्कृति का विकास सिन्धु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ था। इसलिए इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है।

➣ 1826 ई. में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता का उल्लेख किया। ततपश्चात ब्रिटिश उत्खननकर्ता एंव खोजी कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। परन्तु यह अभी तक अनभिग्य रहा।

➣ सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी को जाता है।

➣ पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में सन 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने इस स्थान की खुदाई करवायी।

रेडियो कार्बन-14 (C14) नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. मानी गयी है।

➣ सिन्धु घाटी सभ्यता का स्वरूप नगरीय था। प्राप्त स्थलों में से केवल 6 को ही नगर माना जाता है, ये हैं – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सिंध का चन्हूदड़ो, गुजरात का लोथल, उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली।

➣ हड़प्पा सभ्यता के सर्वाधिक स्थल गुजरात राज्य में मिले हैं।

➣ प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण/शहरीकरण भी कहा जाता है।

➣ सिन्धु सभ्यता में ईटों का अनुपात 4:2:1 था। सभी मक्कन पक्की ईंटों के बने थे।

मुहनजो-दड़ो का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थान महान स्नानागार है। जो 11.88 मी. लम्बा, 7.01 मी. चौड़ा और 2.43 मी. गहरा है।

➣ एक सड़क 11 मीटर चौड़ी थी जो सम्भवतः राजमार्ग रही होगी। नगर की सभी सड़कें राजमार्ग से मिलती थीं।

➣ सैंधववासियों के जीवन का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य था। मुख्यतः नौ प्रकार की फसल उगाते थे।

जिस तरह नील ने मिस्त्र का निर्माण कर वहाँ के लोगों की सहायता की, उसी तरह सिन्धु नदी ने सिन्ध का निर्माण कर उन्हें समृद्ध बनाया।

➣ सिन्धु सभ्यता से प्राप्त अनाज चावल, जौ, खजूर, गेहूँ, कपास, तरबूज, मटर, ब्रासिका, जुसी, तिल एवं सरसों। जिसमे गहूं और जौ प्रमुख थे।

➣ हड़प्पा के लोगों ने बैल द्वारा खींचने वाले लकड़ी के हल का इस्तेमाल खेती में किया और इसके लिए ऊँटों का भी इस्तेमाल होता था।

➣ फसलों की कटाई के लिए पत्थर की हँसिया का इस्तेमाल किया गया होगा।

➣ सिन्धुवासियों को सबसे पहले कपास उत्पादन करने का श्रेय जाता है। इस वजह से यूनानियों ने इस क्षेत्र को सिन्डन नाम दिया।

➣ मुख्य पालतू पशुओं में बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी,ऊँट, कुत्ते, बिल्ली, गधे, खच्चर और सुअर आदि है। इन्हें कूबड़ वाला साँड़ विशेष प्रिय था।

➣ इसके आलावा उन्हें बंदर, भालू, खरहा आदि जंगली जानवरों का भी ज्ञान था। शेर का कोई साक्ष्य नहीं मिला है। यहाँ गाय के अवशेष नहीं मिले।

➣ हड़प्पा के लोग हाथी से अच्छी तरह परिचित थे परन्तु उनके पालने के साक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके हैं।

➣ हड़प्पा की शहरी संस्कृति काँस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है वे लोग लौह से परिचित नहीं थे।

➣ हड़प्पा के लोग पत्थरों के औजारों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन वे काँस्य के निर्माण और उपयोग से भी परिचित थे।

➣ हड़प्पा के लोग नाव भी बनाते थे, मुहर निर्माण और टेराकोटा निर्माण भी महत्वपूर्ण शिल्प थे।

➣ सिन्धु घाटी के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले बर्तन कुम्हार चाक पर बने होते थे।

चालाक लोमड़े और प्यासे कौवे की कहानियाँ हड़प्पा के मृदभांडों पर चित्रित हैं।

➣ पतली गर्दन वाले बड़े आकार के घड़े तथा लाल रंग के बर्तनों पर काले रंग की चित्रकारी हड़प्पा के बर्तनों की मुख्य विशेषता है।

➣ सिंन्धुवासी सिंधु-सभ्यता क्षेत्र के अंतर्गत पत्थर, धातु, खाल आदि का व्यापार करते थे।

➣ बाट-माप आकार धनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार, शंक्वाकार एवं ढोलाकार थे।

➣ सैंधववासी दशमलव प्रणाली पर आधारित बाटों का प्रयोग करते थे। तौल की इकाई संभवतः 16 अनुपात में थी जैसे 16, 64, 160, 320, 640 आदि।

➣ मोहनजोदड़ो से सीप का , हड़प्पा से ताम्बे का, कालीबंगा से मिट्टी का तथा लोथल से हाथी दाँत का पैमाना मिला है।

➣ मेसोपोटामिया में प्रवेश हेतु उर एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था जबकि लोथल व सुरकोतदा सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था।

➣ सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार परिवार था। हड़प्पा समाज सम्भवतः मातृसत्तात्मक था।

➣ घरों में बर्तन के रूप में मिट्टी एवं धातु के बने कलश, थाली, कटोरे, तश्तरी, गिलास एवं चम्मच का प्रयोग करते थे।

➣ सिंधुवासी शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों थे।

➣ भोज्य पदार्थों में गेहूँ, जौ, मटर, तिल, सरसों, खजूर, तरबूज के साथ गाय, सूअर, बकरी और मछली आदि का मांस प्रमुख रूप से प्रयोग में लाया जाता था।

➣ स्त्रियों और पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं था। सूती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का उपयोग होता था।

➣ स्त्री-पुरुष दोनों ही आभूषणों में कण्ठार, भुजबन्ध, कर्णफूल, छल्ले, चूडियाँ, (कालीबंगा से प्राप्त), करघनी, पायजेब आदि पहनते थे।

➣ स्त्री वर्ग लिपस्टिक का प्रयोग करती थीं। लिपस्टिक चन्हूदड़ों से प्राप्त हुई है।

➣ सिन्धु वासी औषधियों से परिचित थे। इस सभ्यता में खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के उदाहरण कालीबंगा एवं लोथल से प्राप्त होते हैं।

➣ मनोरंजन में मछली पकड़ना, शिकार करना, नृत्य, शिकार, पशुओं की लड़ाई, चौपड़, पासा खेलना आदि शामिल थे।

➣ हड़प्पा संस्कृति के समय से मूर्ति पूजा प्रारम्भ हो गई थी। परन्तु हड़प्पा संस्कृति में कही से किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले है।

➣ मन्दिरों वाली प्रथा प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया सम्भ्यताओं में पायी गयी हैं।

➣ सिंधु घाटी सभ्यता में वृक्ष पूजा का प्रचलन था।

➣ सर्वप्रथम स्वास्तिक चिह्न के अवशेष हड़प्पा सभ्यता से मिले हैं।

➣ सैन्धववासी मातृदेवी की पूजा करते थे। जो शाक्त धर्म का द्योतक है।

➣ सिन्धु सभ्यता के लोथल एवं कालीबंगा से हवनकुण्ड का साक्ष्य मिला है।

➣ मोहनजोदड़ो से एक मुहर प्राप्त हुई जिस पर अंकित देवता को शिव की पूजा से सम्बन्ध माना गया।

➣ मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार से जलपूजा के साक्ष्य का प्रमाण मिलता है।

➣ सूर्य पूजा की पूजा भी होती थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्वास्तिक चिन्हों का सम्बन्ध सूर्य पूजा से लगाया जाता है।

➣ भूत प्रेत व् अनिष्ट से बचने के लिए ताबीज भी धारण किया जाता था।

➣ हड़प्पा लिपि का सर्वाधिक पुराना नमूना 1853 ई. में (अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा) मिला था पर स्पष्टतः यह लिपि 1923 तक प्रकाश में आई।

➣ हड़प्पा लिपि वर्णमाला के अनुसार नहीं है, यह एक भावनात्मक चित्रकारी के रूप में है। लिपि में मछली, चिड़ियाँ, मानवाकृति आदि के चिन्ह मिलते हैं।

➣ लिपि-संकेत (चित्रलिपि) दो पंक्तियों में हैं, वहाँ पर ब्युस्त्रफीदान पद्धति का प्रयोग हुआ है

➣ अब तक 3000 से अधिक मुहरे प्राप्त हुई हैं। जिसमे लगभग 1300 मुहरे अकेले मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं।

➣ अधिकांश मुहरों पर छोटे चित्रों में एक सिंगी पशु, भैंस, बाघ, गैण्डे, बकरियाँ, हाथी, हिरण और मगरमच्छ जैसी तस्वीरें अंकित हैं।

➣ मुहरों के निर्माण में सर्वाधिक उपयोग सेलखड़ी या शैलखटी का किया गया है।

➣ मिट्टी की मूर्तियाँ जिन्हे आग में पकाया जाता उन्हें आम तौर पर टेराकोटा या मृण्मूर्तियाँ कहा जाता है।

➣ संगीत सम्बन्धी उपकरण ढोल, तबला आदि खुदाई से प्राप्त हुए हैं।

➣ हड़प्पा कालीन मूर्तियों में काँस्य-निर्मित एक महिला नर्तकी, मूर्तिकला का उत्कृष्ट नमूना है।

नर एवं नारी- मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां मिली है।

➣ मानव मृण्मूर्तियां ठोस है जबकि पशुओं की मृण्मूर्तियां खोखली।

➣ धातु मूर्तियों में ढलाई में मधूच्छिष्ट विधि का प्रयोग किया गया है।

➣ हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विद्यमान थी।

➣ सिंधु सभ्यता में शवों की अंतिम संस्कार में तीन प्रथाओं के प्रमाण मिले हैं- दाह संस्कार , पूर्ण समाधिकरण आशिंक समाधिकरण।

रूपनगर (रोपड़) की एक क़ब्र में मालिक के साथ कुत्ते के भी अवशेष मिले हैं।

लोथल की एक कब्र से मृतक के साथ बकरे को दफनाए जाने के प्रमाण मिले हैं।

➣ हड़प्पा संस्कृति के विनाश का ठीक कारण ज्ञात नहीं है। सिन्धु नदी की बाढ़, सिन्धु नदी का मार्ग बदलना, वर्षा की कमी, भूकम्प एवं विदेशी आक्रमण जैसे कारण समय-समय पर बताए गए हैं।

➣ सैंधव सभ्यता के विनाश का संभवतः सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था।

➣ हड़प्पा सभ्यता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य:

  • चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल एवं रंगपुर से मिले हैं।
  • सिंधु क्षेत्र का प्राचीन नाम मेलुहा था।
  • विश्व में चाँदी सर्वप्रथम भारत (हड़प्पा सभ्यता) में पाई गई।
  • सिंधु सभ्यता का मुख्य केन्द्र हड़प्पा था।
  • ऋग्वेद में हड़प्पा सभ्यता को हरयूपिया कहा गया है।
  • सैंधवकालीन सर्वाधिक मुहरें मोहनजोदड़ो से मिली हैं।
  • लोथल एवं कालीबंगा से युग्म समाधियां मिली हैं।
  • हड़प्पाकालीन पुरास्थल कुणाल से चाँदी के दो मुकुट मिले हैं।
  • लोथल एवं सुरकोतदा सिंधु सभ्यता के प्रमुख बंदरगाह थे।
  • लोथल से एक तराजू प्राप्त हुआ है।
  • सैंधववासी मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे।
  • पर्दा-प्रथा एवं वेश्यावृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थी।
  • सिंधुवासी बतख को अत्यधिक पवित्र मानते थे।

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