पाषाणकालीन सभ्यता से धातु युग की ओर संक्रमण

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📚 विषय सूची

➣ पाषाण युग में मनुष्य की किसी भी धातु का खनन कर पाने की असमर्थता थी। लेकिन इस युग में मनुष्यों ने तांबे, कांसे और लोहे के अलावा कुछ अन्य ठोस धातुओं की खोज तथा उनका उपयोग करना भी सीख गया था।

➣ हालाँकि अभी भी धातु के साथ पाषाण का भी प्रयोग हो रहा था।

ताम्रपाषाण युग

➣ सर्वप्रथम जिस धातु को औजारों से प्रयुक्त किया गया वह तांबा था। ऐसा माना जाता है कि तांबे का सर्वप्रथम प्रयोग लगभग 5000 ई.पू. में किया गया। इसका प्रमाण अतिरम्पक्कम (मद्रास) से प्राप्त तांबे का कुल्हाड़ी था ।

➣ इस चरण में पत्थर एवं तांबे के उपकरणों का साथ-साथ प्रयोग जारी रहा। इसी कारण इसे ताम्रपाषाणिक संस्कृति (कैल्कोलिथिक कल्चर) कहा जाता है। ताम्रपाषाणिक का अर्थ है-पत्थर एवं तांबे के प्रयोग की अवस्था।

➣ भारत में ताम्रपाषाण युग की बस्तियां दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाई गई हैं।

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में अनेक पुरास्थलों की खुदाई हुई है, ये हैं अहाड़, बालाथल, बागोर, ओजियाना एवं गिलुंद। ये पुरास्थल बनास घाटी में स्थित हैं। बनास घाटी में स्थित होने के कारण इसे बनास संस्कृति भी कहते हैं। अहाड़ का प्राचीन नाम तांबवती अर्थात तांबा वाली जगह है।

गिलुंद बालाथल, ओजियाना में घरों को चाहरदीवारी से घेरा गया है। अहाड़ के पास गिलुंद में मिट्टी की इमारत बनी है, किंतु कहीं-कहीं पक्की ईंटें भी लगी हैं। गिलुंद में तांबे के टुकड़े मिले हैं।

➣ ताम्रपाषाण युग के लोग शिल्प-कर्म में निःसंदेह बड़े दक्ष थे और पत्थर का काम भी अच्छा करते थे। वे कार्नेलियन, स्टेटाइट और क्वार्ट्ज क्रिस्टल जैसे अच्छे पत्थरों के मनके या गुटिकाएं भी बनाते थे।

➣ वे लोग कताई और बुनाई जानते थे, क्योंकि मालवा में चरखे और तकलियां हैं। महाराष्ट्र में कपास, सन और सेमल की रूई के बने धागे भी मिले हैं।

➣ इनामगांव में कुंभकार, धातुकार, हाथी-दांत के शिल्पी, चूना बनाने वाले और खिलौने की मिट्टी की मूर्ति (टेराकोटा) बनाने वाले कारीगर भी दिखाई देते हैं।

➣ इनामगांव में मातृ-देवी की प्रतिमा मिली है, जो पश्चिमी एशिया में पाई जाने वाली ऐसी प्रतिमा की प्रतिरूप है।

मालवा और राजस्थान में मिली रूढ़ शैली से बनी मिट्टी की वृषभ-मूर्तिकाएं यह सूचित करती हैं कि वृषभ (सांड) धार्मिक पंथ का प्रतीक था।

पश्चिमी महाराष्ट्र की चंदोली और नेवासा बस्तियों में कुछ बच्चों के गलों में तांबे के मनकों का हार पहनाकर उन्हें दफनाया गया है, जबकि अन्य बच्चों की कब्रों में सामान के तौर पर कुछ बर्तन मात्र हैं।

➣ महाराष्ट्र में मृतक को उत्तर-दक्षिण की दिशा में रखा जाता था, किंतु दक्षिण भारत में पूर्व-पश्चिम की दिशा में।

➣ महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति (जोर्वे संस्कृति) के नेवासा, दैमाबाद, चंदोली, इनामगांव आदि पुरास्थलों में मृतकों को अस्थि कलश में रखकर उत्तर से दक्षिण दिशा में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

➣ पश्चिमी भारत में लगभग संपूर्ण शवाधान (एक्सटेंडेड बरिअल) प्रचलित था, जबकि पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान (फ्रैक्शनल बरिअल) चलता था।

➣ सबसे बड़ी निधि मध्य प्रदेश के गुंगेरिया से प्राप्त हुई है। इसमें 424 तांबे के औजार एवं हथियार तथा 102 चांदी के पतले पत्तर हैं।

कायथा के एक घर में तांबे के 28 कंगन और दो अद्वितीय ढंग की कुल्हाड़ियां पाई गई हैं। इसी स्थान में स्टेटाइट और कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों की गोलियों के हार पात्रों में जमा पाए गए हैं।

गणेश्वर स्थल राजस्थान में खेत्री ताम्र-पट्टी के सीकर-झुंझनू क्षेत्र के तांबे की समृद्ध खानों के निकट पड़ता है।

➣ दक्षिण भारत में ब्रह्मगिरि, पिकलीहल, संगलनकल्लू, मस्की, हल्लूर आदि से ताम्रपाषाण युगीन बस्तियों के साक्ष्य मिले हैं। दक्षिण की अपेक्षा चरवाहा संस्कृति का अधिक प्रमाण मिला है।

➣ आरंभिक ताम्रपाषाण अवस्था के इनामगांव स्थल पर चूल्हों सहित बड़े-बड़े कच्ची मिट्टी के मकान और गोलाकार गड्ढों वाले मकान मिले हैं। पश्चात की अवस्था (1300-1000 ई.पू.) में पांच कमरों वाला एक मकान मिला है, जिसमें चार कमरे आयताकार हैं और एक वृत्ताकार।

➣ इनामगांव में 130 से अधिक घर और अनेक कब्रें पाई गई हैं। यह बस्ती किलाबंद है और खाई से घिरी हुई है। यहां शिल्पी या पंसारी लोग पश्चिम छोर पर रहते थे, जबकि सरदार प्रायः केंद्र स्थल में रहता था। यहां से अन्नागार भी मिला है।

➣ पूर्वी भारत में गंगा तटवर्ती चिरांद के अलावा, पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के पांडु राजर ढिब और बीरभूम जिले में महिषदल उल्लेखनीय ताम्रकालीन स्थल हैं।

➣ कुछ अन्य पुरास्थल जहां खुदाई हुई, वे हैं- बिहार में सेनुवार, सोनपुर और ताराडीह तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में खैराडीह और नरहन।

बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रहने वाले लोग टोटी वाले जलपात्र, गोड़ीदार तश्तरियां और गोड़ीदार कटोरे बनाते थे।

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र और अन्यत्र रहने वाले ताम्रपाषाण युग के लोग मवेशी पालन और कृषि करते थे। वे गाय, भेड़, बकरी और भैंस रखते थे और हिरण का शिकार भी करते थे।

➣ यहा से ऊंट के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मुख्य अनाज गेहूं और चावल के अतिरिक्त वे बाजरे की भी खेती करते थे।

➣ तिथिक्रम की दृष्टि से भारत में ताम्रपाषाणीय बस्तियों की अनेक शृंखलायें हैं। कुछ प्राक् हड़प्पीय(हड़पा पूर्व ) है, कुछ हड़प्पाकालीन, तो कुछ हड़प्पेत्तर यानी हड़पा के बाद की।

संबंधित संस्कृतियों का वर्गीकरण

  1. हड़प्पा पूर्व (4000–2500 ई.पू.)
    सौथी संस्कृति (बीकानेर क्षेत्र) तथा झाकर संस्कृति (सिंध क्षेत्र)
  2. हड़प्पाकालीन (2500–1800 ई.पू.)
    आहड़ संस्कृति (राजस्थान क्षेत्र), गणेश्वर संस्कृति, OCP (गेरूआ मृदभांड संस्कृति)
  3. हड़प्पेत्तर संस्कृति (1800–1300 ई.पू.)
    मालवा, कायथा, एरण, जौरवे संस्कृति

तांबा और पत्थर के औजारों के उपयोग पर कई संस्कृतियाँ आधारित थी। इस तरह की संस्कृति को ताम्रयुग संस्कृति कहा जाता है –

ताम्र पाषाण युग की संस्कृति

अहाड़ संस्कृतिलगभग 1700-1500 ई.पू.
कायथ संस्कृतिलगभग 2000-1800 ई.पू.
मालवा संस्कृतिलगभग 1500-1200 ई.पू.
सावलदा संस्कृतिलगभग 2300-2200 ई.पू
जोर्वे संस्कृतिलगभग 1400-700 ई.पू.
प्रभास संस्कृतिलगभग 1800-1200 ई.पू.
रंगपुर संस्कृतिलगभग 1500-1200 ई.पू.

अहाड़ संस्कृति (2100-1500 ई.पू.) अन्य ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों से भिन्न है, क्योंकि जहां दूसरे केंद्रों में लालकाले लेप के मृद्भांड बने हैं, वहीं यहां पर इस लेप के ऊपर सफेद रंग से चित्रकारी की गई कृष्ण लोहित मृद्भांड परंपरा विशिष्ट रही है।

➣ पश्चिमी मध्य प्रदेश में मालवा, कायथा, एरण और नवदाटोली प्रमुख स्थल हैं।

नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है, जो खारगोन जिले में स्थित है। इसका उत्खनन एच.डी. संकालिया ने कराया था।

➣ यहां से मिट्टी, बांस एवं फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं।

➣ यहां के मूल मृद्भांड लाल-काले रंग के हैं, जिन पर ज्यामितीय आरेख उत्कीर्ण है।

➣ कायथा संस्कृति जो हड़प्पा संस्कृति की कनिष्ठ समकालीन है, इसके मृद्भांडों में कुछ प्राक् हड़प्पीय लक्षण दिखाई देते हैं, साथ ही इन पर हड़प्पाई प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है।

➣ इस संस्कृति की लगभग 40 बस्तियां मालवा क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं, जो अत्यंत छोटी-छोटी हैं।

➣ गुलाबी रंग लिये सफेद रंग के मृद्भाण्ड, जिन पर काले रंग की ज्यामितीय चित्रकारी की गयी है, इस संस्कृति की प्रमुख विशेषता है।

➣ यहां से कच्चे घर,अस्थि एवं प्रस्तर उपकरण तथा अफगानिस्तान और ईरान के साथ संपर्क का साक्ष्य मिला है।

किलीगुलमुहम्मद, दाबसादात, पिराकदंब आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।

➣ यहां से मिले मृद्भाण्डों पर वृक्षों से घिरे कुकुदमान (डीलवाले) वृषभ का चित्रांकन मिला है, जिसके पैरों के बीच हिरन का अंकन है।

➣ यहां से अलंकरणयुक्त नारी की मृण्मूर्तियां भी मिली हैं। यहां पत्थरों की दीवारों पर सफेद चूने लगाये जाते थे। मकान दोमंजिले होते थे कच्ची ईंटों से बनाये जाते थे।

पश्चिमी बलूचिस्तान में विकसित यह संस्कृति सिंध तक विस्तृत थी।

➣ यहां से पूर्ण शवाधान का अवशेष मिला है। इस संस्कृति से पशु एवं नारी मृण्मूर्तियां नहीं मिली हैं।

➣ मृद्भाण्डों पर दूधिया, काले, लाल, नीले एवं हरे रंग से चित्रकारी की जाती थी।

➣ यहां पर लाल मृद्भाण्डों पर काले रंग का अलंकरण पाया जाता है।

राना घुडई, मुगल धुंडई, पेरिआनो धुंडई, सूरजंगल, डाबरकोट, कौदानी आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।

पेंदीदार कटोरे यहां के प्रमुख पात्र थे। यहां से नारी, पशु, लिंग, योनि की मृण्मूर्तियां बनाने के साक्ष्य भी मिले।

➣ पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रमुख पुरास्थल हैं-अहमदनगर जिले में जोर्वे, नेवासा और दैमाबाद; पुणे जिले में चंदोली, सोनगांव, इनामगांव, प्रकाश और नासिक। ये सभी पुरास्थल जोर्वे संस्कृति (1400-700 ई.पू.) के हैं।

➣ अब तक ज्ञात 200 जोर्वे स्थलों में गोदावरी का दैमाबाद सबसे बड़ा है। यह लगभग 20 हेक्टेयर में फैला है, जिसमें लगभग 4000 लोग रह सकते थे।

➣ कोटदिजी संस्कृति सिंध प्रांत आधुनिक पाकिस्तान के खैरपुर नामक स्थान पर स्थित प्राचीन सैंधव सभ्यता का एक केन्द्र था। जिसकी खोज धुर्ये ने 1935 ई. में की ।

➣ बस्ती के चारों ओर विशाल सुरक्षात्मक दीवार के अवशेष, पत्थर का चाक, कांसे की बनी मोटी चूड़ी, छह दलीय पुष्पाकृति आदि मिले हैं। जो लगभग 3000ई. पू. की प्रतीत होती है।

➣ यहाँ के मृद् भाण्डों में मोर, मृग, मत्स्य, शल्क और गेंदों की जुड़ी हुई आकृतियों का अपरिष्कृत चित्रण हुआ है।

➣ सम्भवतः यहाँ पर पत्थरों का उपयोग घर बनाने में किया जाता था, इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि पाषाणयुगीन सभ्यता का अंत यही पर हुआ था।

➣ कोटदीजी के विस्तृत स्तर में कांस्य की चपटे फलक वाली कुल्हाड़ी, तीराग्र ,छेनी, अंगूठी व दोहरी एवं इकहरी चूड़ियाँ आदि वस्तुएँ मिली हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ से मृत्पिण्ड भी मिले हैं।

➣ यहाँ लगभग 4000 ई. पू. में ही नगरीकरण प्रारम्भ हो गया था। यहाँ से प्राप्त फिरोजा तथा नीलम के मनको से मध्य आईसीए के साथ सबंधो का पता चलता है।

आयताकार नगर के अवशेष, नगर की सुरक्षा हेतु विशाल दीवार आदि यहां की विशेषताएं हैं।

➣ यहाँ से 7000-6000 ई. पू. के कृषि एंव पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यह भारत में सर्वप्रथम गेहूंजौ की खेती का स्थल है।

➣ यहाँ से मानव के साथ बकरी दफनाने जाने का साक्ष्य मिला है।

➣ मिट्टी की बनी मातृदेवी की प्रतिमाएं, कपास की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य आदि यहां से प्राप्त हुए हैं।

➣ किलेबंदी के अवशेष, गेहूं, जौ, मूंग-मसूर दाल, मटर के साक्ष्य, लीवान नामक स्थान, जहां से पत्थर से औजार बनाने के विशाल कारखाने आदि मिले हैं।

➣ महल सदृश्य दो विशाल भवन, धूप में सुखाई गयी ईंट का प्रयोग, मातृदेवी की प्रतिमाएं, कांसे की मूठदार कुल्हाड़ियां आदि मिले हैं।

➣ यह स्थल एक बन्दरगाह के रूप में था। जहाँ से हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पा कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।

➣ सिंधु सभ्यता के विपरीत, भवन निर्माण के लिए मुख्यतः कच्ची ईटों का ही प्रयोग किया जाता था।

➣ बालाकोट का सबसे समृद्ध उद्योग सीप उद्योग था। खुदाई में यहाँ से हज़ारों की संख्या में सीप की बनी चूड़ियों के टुकड़े मिले हैं।

विशाल इमारत, कुबड़े बैल एवं पीपल के पेड़, अंकित सुन्दर मिट्टी के बर्तन आदि प्राप्त हुए हैं।

➣ ताम्रपाषाणीय संस्कृतियाँ 1200 ई.पू. तक अस्तित्व में रही। इसके लुप्त होने का कारण 1200 ई.पू. के बाद से वर्षा की मात्रा में कमी आना माना जाता है।

➣ इसमें जोरवे संस्कृति 1200 ई. पू. के बाद भी 700 ई. पू. तक जीवित रही।

ताम्रपाषाण युगीन स्थल

ताम्रपाषाण युगीन स्थल
स्थल राज्य प्राप्त साक्ष्य
नवादाटोली मध्य प्रदेश इस स्थल का उत्खनन एच.डी. सांकलिया द्वारा किया गया। इंदौर के गिकट नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर अवस्थित है। चित्रित काले व लाल मृदभांड जिन्हें मालवा मृदभाण्ड के नाम से जाते हैं। कताई बुनाई व चरखे तकलियां प्राप्त हुई।
ताम्बवती राजस्थान काले व लाल मृदभाण्ड जिन पर सफेद रैखिक चित्रों से सजे रहते हैं।
दैमाबाद महाराष्ट्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। तांबे की 4 प्रमुख वस्तुएं (1. रथ चलाते हुए मनुष्य, 2. साड़, 3. गैंड़ा, 4. हाथी) ठोस धातु से निर्मित प्राप्त हुई। कलश शवाधान के प्रमाण कलश घरों के फर्श के नीचे रखने का प्रमाण।
इमाम गाँव महाराष्ट्र कच्ची मिट्टी के मकान व गोलाकार गड्डो वाले मकान के साक्ष्य।
नेवासा महाराष्ट्र पटसन का प्रथम साक्ष्य व मृदभाण्ड लाल तल पर काली डिजाइन वाले चाक निर्मित बर्तनों के प्रमाण मिले।

धातु युग

➣ नवपाषाण-युग के अंतिम चरण से धातु (तांबे) का व्यवहार आरंभ हुआ। कालांतर में कांसा और लौंह से भी लोग परिचित हुए। अतः, पाषाण-युग के पश्चात धातुयुग, का प्रारंभ हुआ।

➣ धातुयुग क्रमानुसार 3 कालों में विभक्त। इन्हीं तीन चरणों में मानव सभ्यता का उदय हुआ।

  1. ताम्र युग
  2. कांस्य युग
  3. लौह युग

ताम्र युग

➣ यह ताबें के प्रयोग का युग था। जिसे सैंधव-पूर्व सभ्यता का नाम दिया जाता है। इसे सैंधव सभ्यता का मूल माना जाता है।

➣ इस समय तक लोगों को कांसे और लोहे के बारें में ज्ञान नहीं था। धातु के रूप में ये लोग सिर्फ ताम्बें का उपयोग करते थे।

कुल्हाड़ी, भाले, तलवार तथा आवश्यकता की सभी वस्तुयें तॉबे से बनाई जाने लगी।

➣ इस संस्कृति में चाक-निर्मित लाल एवं काले मृद्भाण्डों का प्रयोग किया जाता था। मृद्भाण्डों के आधार पर इस संस्कृति को क्षेत्रीय उपखण्डों में विभाजित किया गया है।

➣ पहला, पांडुरंग के मृद्भाण्ड वाली दक्षिण क्षेत्र की संस्कृति, जिसमें क्वेटा, कुल्ली एवं अमरीनाल प्रमुख संस्कृतियां हैं तथा दूसरा, लाल रंग के मद्भाण्ड वाली उत्तरी क्षेत्र की संस्कृति, जिसमें जोब प्रमुख संस्कृति है।

➣ भारत में उत्तरी गंगा घाटीगंगा-यमुना दोआब क्षेत्र के स्थलों से ताम्र-उपकरण जैसे- हाथ की कुल्हाड़ी मत्स्य भाले, मानवतारोपी मूर्तियाँ प्राप्त हुए हैं। इन उपकरणों को गंगाघाटी ताम्रनिधि के नाम से पुकारा जाता है।

कांस्य युग (2000-1500 ई. पू)

➣ इस यगु में मानव ने तांबा और टिन मिलाकर एक नवीन धातु कांसा बनाया जो अत्यंत कठोर था। यह युग पाषाण युग तथा लौह युग के बीच का है।

➣ कांस्य युग में लोहे की खोज नहीं हो पाई थी और लौह युग में तांबा, कांसा और लोहे के अलावा मनुष्य कुछ अन्य ठोस धातुओं की खोज तथा उनका उपयोग भी सीख गया था।

➣ उत्तरी भारत में प्राप्त हुये इन कांसे के औजार में चित्र भी थे।

➣ इस युग मानव शहरी सभ्यताओं में बसने लगा और इसी कारण से विश्व की कई जगहों में पौराणिक सभ्यताओं का विकास हुआ। साथ ही सभ्यताओं में अलग-अलग लिपिओं का विकास हुआ जिनकी मदद से आज के पुरातत्व शास्त्रियों को उस युग के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य हासिल होते हैं।

हड़पा सभ्यता (2500-1750 ई.पू. ) कांस्य युग से सम्बंधित था। इसलिए इसे कांस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है। इसके अलावा मिस्र सभ्यता व चीनी सभ्यता समकालीन थे।

लौह युग (1200-600 ई. पू)

➣ इस युग में मानव ने लोहे का इस्तेमाल किया। इतिहास में यह युग पाषाण युग तथा कांस्य युग के बाद का काल है। इस काल में लोहे के अस्त्र शस्त्रों का निर्माण किया जाने लगा।

➣ मानव सभ्यता के विकास क्रम में लोहे का प्रयोग मनुष्य ने 2000 ई.पू. के आस-पास ही सीख लिया था, परंतु उस समय इसका प्रयोग कुछ समुदायों तक ही सीमित रहा।

एशिया माइनर (तुर्की) की हिट्टाइट जाति ने लोहे के निर्माण की तकनीक खोज निकाली तथा इसके साथ ही लौहे की ढलाई का कार्य 1400 ई. पू. के लगभग प्रारंभ हो गया।

➣ 1200 ई.पू. तक फिलिस्तीन, तुर्की, सीरिया, ईरान, इराक तथा यूनान के निवासी लोहे के औजारों तथा उपकरणों का प्रयोग करने लगें इस प्रकार 1200 ई.पू. से लौह युग का प्रारंभ हुआ।

भारत में लौह युग का प्रारंभ 1000 ई.पू. के लगभग माना जाता है। दक्षिण भारत में उत्तर पाषाण काल के बाद लौह काल प्रारम्भ हुआ जबकि उत्तरी भारत में ताम्रकाल के बाद लौह काल प्रारम्भ हुआ।

➣ सुप्रसिद्ध पुराविद् ह्वीलर की मान्यता है कि भारत में सर्वप्रथम लोहे का प्रचलन ईरान के हखामनी शासकों द्वारा किया गया था।

➣ इसी प्रकार कुछ अन्य विद्वान यूनानियों को इसे लाने का श्रेय प्रदान करते हैं। किंतु ये मत समीचीन नहीं लगते।

➣ यूनानी साहित्य में इस बात का उल्लेख मिलता है कि कारीगर लौह उपकरणों का निर्माण करने में कुशल थे।

➣ संभवत: यह शब्द सामान्य धातु के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है तथा भारत के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिसके आधार पर यह सिद्ध किया जा सके कि ऋग्वैदिक आर्य लोहे से परिचित थे।

➣ सामान्यतः यह माना जाता है कि भारत में आर्यों के आगमन के साथ लौहे का प्रचलन आरंभ हुआ। सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई. पू.) के ग्रंथों में हमें इस धातु के स्पष्ट संकेत प्राप्त होते हैं।

➣ इसमें मनुष्य ने विभिन्न भाषाओं की वर्णमालाओं का विकास किया जिसकी मदद से उस काल में साहित्य और इतिहास लिखे जा सके। संस्कृत और चीनी भाषाओं का

➣ साहित्य इस काल में फला-फूला। ऋग्वेद और अवस्ताई गाथाएँ इसी काल में लिखी गई थीं।

➣ ऋग्वेद में अयस् नामक धातु का उल्लेख प्राप्त होता है जिसके वास्तविक अर्थ के विषय में मतभेद है।

➣ अथर्ववेद में लोहायस् तथा श्याम अयस् शब्द मिलते हैं। विद्वानों ने लौह शब्द को तांबे के अर्थ में तथा श्याम शब्द को लोहे के अर्थ से ग्रहण किया है। इस प्रकार

➣ अथर्ववेद में उल्लिखित श्यामअयस् से तात्पर्य लौह धातु से ही है। इसके बाद अयस् शब्द लोहे का ही पर्याय बन गया।

➣ काठक संहिता में चौबीस बैलों द्वारा खींचे जाने वाले भारी हलों का उल्लेख मिलता है। इनमें अवश्य ही लोहे की फाल लगाई गयी होगी।

अथर्ववेद भी लोहे से बने हुए फाल का उल्लेख करता है। इस प्रकार साहित्यक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईसा-पूर्व 8वीं सदी में भारतीय को लौहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

➣ विश्व के संदर्भ में लौह युग लगभग 1300 ई.पू. में आरंभ हुआ। भारत में लोहे का साक्ष्य 1000 ई.पू. के आस-पास एटा जिले के अतरंजीखेड़ा से प्राप्त हुआ।

➣ हाल के वर्षों में लौह युग के आरंभ का संबंध चित्रित धूसर मृद्भाण्ड से स्थापित किया गया है। जिनमें सबसे पहले अहिच्छत्र के उत्कृष्ट मृदभाण्डों और उसके बाद हस्तिनापुर के मृद्भाण्ड का उल्लेख किया जाता है।

➣ इस युग में चाक की सहायता से विशेष प्रकार के मिट्टी के बने बर्तन चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW: Painted Grey Ware) प्रमुख रूप से पाये जाते हैं। अतः इस संस्कृति को चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति कहा जाता है।

साक्ष्य

➣ भारत में इस अवस्था से सम्बद्ध स्थल दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाये गये हैं।

➣ दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में अहर और गिलुन्द, दो स्थलों की खुदाई की गई। जो बनास बाटी के सूख भागों में स्थित हैं।

➣ पश्चिमी मध्य प्रदेश या मालवा में कयथ और एरन की खुदाई हुई है। मालवा से प्राप्त मृद्भांडों को ताम्र पाषाणीय मृद्भाडा में उत्कृष्ट माना गया है।

➣ पश्चिमी महाराष्ट्र के जोरवे, नेवासा एवं दैमाबाद (अहमदनगर), चंदाली, सोनगाँव, इनामगाँव, झामगाँव, प्रकाश और नासिक में विस्तृत उत्खनन किए गये हैं। ये सभी स्थल जोरवे संस्कृति से सम्बंधित हैं।

➣ ये केन्द्रीय और पश्चिम भारत की मालवा ताम्र-पाषाण संस्कृति से पाए गए हैं। मिट्टी के इन बर्तनों और इनके कुछ अन्य सांस्कृतिक तत्व महाराष्ट्र में भी दिखाई देते हैं।

जलोढ़ मिट्टी वाले मैदानों और घने जंगल वाले इलाकों को छोड़कर प्राय: समूचे देश में ताम्र पाषाणीय संस्कृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

लौह उपकरण प्राप्ति स्थल

धातु युग में लौह उपकरण प्राप्ति स्थल

सबंधित तथ्य

➣ ताम्रपाषाण लोग ज्यादातर पत्थर और ताम्बे की वस्तुओं का इस्तेमाल करते थे लेकिन के कभी-कभी निम्न श्रेणी के काँसे और लोहे का भी इस्तेमाल करते थे।

➣ ताम्र पाषाणकालीन लोग मुख्यत: ग्रामीण समुदाय के थे और देश के ऐसे भागों में फैले थे, जहाँ पहाड़ी जमीन और नदियां थीं।

➣ ताम्र पाषाण युग के लोग गाय, भेड, बकरी, सुअर और भैंस पालते थे तथा हिरण का शिकार करते थे। ऊँट के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।

➣ ताम्र पाषाणीय लोग पशुपालन का सदुपयोग नहीं कर सके। वे विस्तृत कृषि भी न कर सके। हल और फावड़ा न होने से वे केवल झूम खेती कर पाते थे।

➣ इस सभ्यता के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे हालाँकि यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है।

➣ वे गेहूँ, चावल, बाजरा, मसूर, उड़द, मूंग, मटर, रागी (मडुवा), अलसी तथा कपास उगाते थे और मछली पकड़ने के काटे (ब्रसी) का प्रयोग करते थे।

➣ बस्तियाँ छोटी और बड़ी होती थीं। वे अपना घर गीली मिट्टी थोप कर बनाते थे, अहार के लोग पत्थर से बने घरों में रहते थे।

कयथा (मालवा) और एरण (मध्य भारत) उनकी सबसे पुरानी बस्तियाँ हैं। उन्होंने ही सर्वप्रथम बड़े-बड़े गाँव बसाये।

➣ वे चाकों पर बने काले-लाल मृद्भांडों का प्रयोग करते थे। उनकी प्राक् कांस्य अवस्था से लगता है कि उन्होंने सर्वप्रथम चित्रित मृद्भाडों का प्रयोग किया।

➣ वे पकाने, खाने, पीने और समान रखने के लिए इन मृभांडों का प्रयोग करते थे। लोटा एवं थाली दोनों उनके द्वारा प्रयुक्त होता था।

➣ वे लोग ताम्र तथा पत्थर शिल्प के बेहद कुशल कारीगर भी थे। खुदाई में औजार, हथियार और ताम्बे की चूड़ियों का भी पता चला है।

मालवा में बुनाई वाले यन्त्र से ज्ञात होता है कि उन्हें कताई और बुनाई का भी ज्ञान था। सूती रेशम और सेमल रेशम (कपास के पेड़) से बने कपास-सूत और रेशमी धागे महाराष्ट्र में मिले जो कपड़ा निर्माण की कुशलता के द्योतक हैं।

इनामगाँव में कुम्हार, लोहार, हाथी दाँत निकालने वाले, चूना-निर्माता और टेराकोटा जैसे विभिन्न शिल्पों के काम करने वाले कारीगर भी थे।

➣ लोग मृतक को अस्थिकलश में रखकर अपने घर में फर्श के नीचे उत्तर दक्षिण स्थिति में गाड़ते थे। मृतकों के साथ बर्तन और कुछ ताम्बे की वस्तुएँ कब्र में डाली जाती थीं। हड़प्पा के लोगों की तरह उन्होंने अलग कब्रिस्तान का इस्तेमाल नहीं किया।

➣ महिलाओं की टेराकोटा मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्रपाषाणीय लोग मातृ देवी की पूजा करते थे। अनेक कच्ची मिट्टी की नग्न पुतलियाँ भी पूजी जाती थीं।

➣ इस सभ्यता की खुदाई से प्राप्त ताम्र वस्तुयें हैं-तीर के नोक, बरछे के फल, बसियाँ, सेल्ट, कंगन, औजारों की मूठे, चूड़ियाँ, छेनियाँ आदि।

➣ ताम्र पाषाणीय लोग लिखने की कला नहीं जानते थे और न ही वे नगरों में रहते थे, जबकि कांस्ययुगीन लोग नगरवासी हो गये थे।

➣ ताम्र पाषाणीय गैरिक मदभांड वाले लोग हड़प्पावासियों के सम-सामयिक थे और वे जिस क्षेत्र में रहते थे वह भी हड़प्पाइयों के क्षेत्र से बहुत दूर नहीं था।

नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्पवूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है जो इंदौर के निकट स्थित है। यहाँ से मिट्टी, बांस तथा फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं।

➣ ताम्रपाषाण युग में सामाजिक संरचना, अनाज, मिट्टी के बर्तनों आदि से क्षेत्रीय अन्तर स्पष्ट हो जाते हैं। पूर्वी भारत में चावल का उत्पादन हुआ और पश्चिम भारत में जौ और गेहूँ की खेती की गई।

➣ कांसे के उपकरणों के प्रयोग से क्रीट, मिस्र, मेसोपोटामिया और सिंधु में घाटी भी प्राचीनतम सभ्यताओं के विकास में सहायता मिली।

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