चोल काल अपनी विकसित ग्राम सभाओं के लिए इतिहास में विशेष स्थान रखता है। ये सभाएं तीन प्रकार की होती थीं — ‘उर’ (सामान्य ग्रामसभा), ‘सभा’ या ‘महासभा’ (ब्राह्मण बहुल गांवों में) और ‘नगरम्’ (व्यापारिक बस्तियों में)। ग्राम प्रशासन में ‘वारियम्’ नामक समितियाँ होती थीं जो भूमि, बगीचे, तालाब आदि की देख-रेख करती थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तरमेरूर शिलालेख (Uttaramerur Inscription), जो 10वीं शताब्दी का है, चोल ग्राम सभाओं के चुनाव नियमों का विस्तृत विवरण देता है — इसमें उम्मीदवारों की योग्यता, अयोग्यता और कार्यकाल तक का उल्लेख है। यह विश्व के प्राचीनतम लिखित लोकतांत्रिक दस्तावेजों में से एक माना जाता है।
2. कुशल ग्रामीण प्रशासन के लिए प्रसिद्ध राजवंश था-
(a) चोल
(b) राष्ट्रकूट
(c) चालुक्य
(d) पल्लव
M.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
दक्षिण भारत के राजवंशों में चोल अपने सुव्यवस्थित ग्रामीण प्रशासन के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। चोल साम्राज्य में ग्राम स्वशासन इतना सुदृढ़ था कि राजतंत्र के बावजूद गाँव अपने आंतरिक प्रशासन में पूर्णतः स्वायत्त थे। ग्रामसभाएं न्याय, कर संग्रह, सिंचाई और भूमि प्रबंधन जैसे कार्य स्वयं संभालती थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘सभा’ के सदस्यों को ‘वारियपेरुमक्कल’ कहा जाता था। इन समितियों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए नियम थे — यदि कोई सदस्य अपने या अपने रिश्तेदार के मामले में निर्णय लेता, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता था।
3. नवीं शताब्दी ई. में निम्नलिखित में से किसके द्वारा चोल साम्राज्य की नींव डाली गई ?
(a) कृष्ण I
(b) राजराज चोल
(c) विजयालय
(d) परांतक
R.A.S. / R.T.S (Pre) 2016
उत्तर-(c)
मध्यकालीन चोल साम्राज्य की स्थापना विजयालय ने लगभग 850 ई. में की थी। वह पहले पल्लव राजाओं के अधीन एक सामंती सरदार था। पल्लवों और पाण्ड्यों के आपसी संघर्ष का लाभ उठाकर उसने तंजौर (तंजावुर) पर अधिकार कर लिया और वहाँ देवी दुर्गा का एक मंदिर बनवाया। विजयालय ने लगभग 871 ई. तक शासन किया और मध्यकालीन चोल वंश की नींव रखी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विजयालय के पुत्र आदित्य प्रथम ने पल्लव राजा अपराजित को पराजित कर पल्लव सत्ता का पूर्णतः अंत कर दिया और चोल साम्राज्य का विस्तार किया। संगम काल में भी चोल वंश अस्तित्व में था, जिसकी राजधानी उरैयूर थी — यह मध्यकालीन चोलों से भिन्न एवं पुराना वंश था।
4. चोलों की राजधानी थी-
(a) कावेरीपत्तन
(b) महाबलीपुरम्
(c) कांची
(d) तंजौर
U.P. Lower Sub. (Pre) 2009
उत्तर-(d)
मध्यकालीन चोल साम्राज्य की प्रमुख राजधानी तंजौर (तंजावुर) थी। बाद में राजेंद्र चोल प्रथम ने गंगैकोंडचोलपुरम् नामक नई राजधानी बसाई, जो उनकी उत्तर भारत विजय की स्मृति में बनाई गई थी। संगम काल में चोलों की राजधानी उरैयूर थी और कावेरीपट्टनम् (पुहार) उनका प्रमुख बंदरगाह नगर था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गंगैकोंडचोलपुरम् में राजेंद्र प्रथम ने एक भव्य शिव मंदिर बनवाया जो तंजौर के बृहदीश्वर मंदिर की प्रतिकृति के रूप में निर्मित था। तंजौर आज भी तमिलनाडु की ‘सांस्कृतिक राजधानी’ के रूप में जाना जाता है।
5. चोलों का राज्य किस क्षेत्र में फैला था ?
(a) विजयनगर क्षेत्र
(b) मालाबार तट
(c) होयसल
(d) कोरोमंडल तट, दक्कन के कुछ भाग
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(d)
चोल साम्राज्य मुख्यतः कोरोमंडल तट (पूर्वी तट) पर फैला था, जिसमें वर्तमान तमिलनाडु का अधिकांश भाग, दक्कन के कुछ क्षेत्र तथा उरैयूर, कावेरीपट्टनम् और तंजावुर जैसे महत्वपूर्ण केंद्र सम्मिलित थे। राजेंद्र चोल प्रथम के काल में साम्राज्य का विस्तार श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक हो गया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजेंद्र चोल प्रथम ने 1025 ई. में श्रीविजय साम्राज्य (वर्तमान मलेशिया-इंडोनेशिया) पर नौसैनिक अभियान चलाया — यह भारतीय इतिहास के सबसे दूरगामी नौसैनिक अभियानों में से एक था, जिसने हिंद महासागर व्यापार मार्गों पर चोलों का वर्चस्व स्थापित किया।
6. किस दक्षिण भारतीय राज्य में उत्तम ग्राम प्रशासन था ?
(a) चेर
(b) चालुक्य
(c) चोल
(d) वातापी
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(c)
दक्षिण भारत के सभी प्रमुख राज्यों में चोल साम्राज्य का ग्राम प्रशासन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। चोल काल में गाँव एक स्वायत्त इकाई के रूप में कार्य करते थे। ग्राम सभाओं की ‘वारियम्’ (उपसमितियाँ) अलग-अलग विभागों जैसे तालाब, बगीचे, मंदिर संपत्ति आदि की देखभाल करती थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘नाडु’ नामक प्रशासनिक इकाई भी होती थी, जो कई गांवों का समूह थी। ‘नाडु’ की अपनी सभा होती थी जिसे ‘नाट्टार’ कहते थे। इस प्रकार चोल प्रशासन गाँव से लेकर ‘मंडलम्’ तक एक सुव्यवस्थित बहुस्तरीय ढाँचे पर आधारित था।
7. निम्नलिखित में से किस मंदिर परिसर में एक भारी-भरकम नंदी की मूर्ति है, जिसे भारत की विशालतम नंदी मूर्ति माना जाता है ?
(a) वृहदीश्वर मंदिर
(b) लिंगराज मंदिर
(c) कंदरिया महादेव मंदिर
(d) लेपाक्षी मंदिर
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर (राजराजेश्वर मंदिर) चोल स्थापत्य कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का 500′ × 250′ का विशाल प्रांगण, ऊँचा विमान (शिखर) और प्रवेशद्वार पर द्वारपालों की मूर्तियाँ इसे अनोखा बनाती हैं। मंदिर के बाहरी भाग में एकाश्म (एक ही पत्थर से निर्मित) नंदी की विशाल मूर्ति स्थापित है, जिसे भारत की सबसे बड़ी नंदी प्रतिमा माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बृहदीश्वर मंदिर को UNESCO ने 1987 में ‘ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स’ के अंतर्गत विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। इस मंदिर का 66 मीटर ऊँचा विमान (शिखर) अपने ऊपर एक 80 टन के ग्रेनाइट पत्थर को धारण करता है, जिसे बिना क्रेन के ढलान पथ (inclined plane) के माध्यम से चढ़ाया गया था — यह तत्कालीन अभियांत्रिकी की अद्भुत उपलब्धि है।
8. निम्नलिखित में कौन चोल प्रशासन की विशेषता थी?
(a) साम्राज्य का मंडलम में विभाजन
(b) ग्राम प्रशासन की स्वायत्तता
(c) राज्य के मंत्रियों को समस्त अधिकार
(d) कर संग्रह प्रणाली का सस्ता व उचित होना
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(b)
चोल प्रशासन की सबसे प्रमुख विशेषता स्वायत्त ग्राम प्रशासन था। ग्राम सभाएं अपनी भूमि, जलाशय, मंदिर और स्थानीय विवादों का प्रबंधन स्वयं करती थीं। केंद्रीय शासन इनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था, बल्कि ये सभाएं राज्य को कर संग्रह में सहयोग देती थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल साम्राज्य प्रशासनिक दृष्टि से ‘मंडलम्’ (प्रांत), ‘वलनाडु’ (जिला), ‘नाडु’ (तालुका), और ‘ग्राम’ में विभाजित था। यह बहुस्तरीय विकेंद्रीकृत व्यवस्था आधुनिक संघीय ढाँचे की प्रारंभिक अवधारणा से मेल खाती है।
9. चोल युग प्रसिद्ध था, निम्न के लिए-
(a) धार्मिक विकास
(b) ग्रामीण सभाएं
(c) राष्ट्रकूटों से युद्ध
(d) लंका से व्यापार
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1993
उत्तर-(b)
चोल युग में ग्रामीण सभाओं की एक सुदृढ़ व्यवस्था थी जो तत्कालीन भारत में अद्वितीय थी। इन सभाओं को कर लगाने, स्थानीय विवाद सुलझाने और सार्वजनिक निर्माण कार्यों की देखरेख करने के अधिकार प्राप्त थे। यह व्यवस्था इतनी सक्षम थी कि राजसत्ता परिवर्तन होने पर भी ग्रामीण जीवन अप्रभावित रहता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘देवदान’ और ‘ब्रह्मदेय’ नामक भूमि-अनुदान प्रचलित थे, जिनमें क्रमशः मंदिर और ब्राह्मणों को भूमि दी जाती थी। ऐसी भूमि पर राजकीय कर नहीं लगता था, और इनका प्रबंधन भी संबंधित ग्राम सभा ही करती थी।
10. तंजौर का वृहदीश्वर मंदिर निर्मित हुआ था, शासनकाल में चोल सम्राट-
(a) परांतक प्रथम के
(b) राजराज प्रथम के
(c) राजेंद्र प्रथम के
(d) राजाधिराज प्रथम के
U.P.P.C.S. (Mains) 2008
उत्तर-(b)
तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर (जिसे राजराजेश्वर मंदिर भी कहते हैं) चोल सम्राट राजराज प्रथम के शासनकाल में 1010 ई. में बनकर पूर्ण हुआ। यह द्रविड़ स्थापत्य शैली का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। मंदिर का विशाल विमान (शिखर) तथा प्रांगण में एकाश्म नंदी मूर्ति इसे विशेष बनाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजराज प्रथम (985–1014 ई.) ने न केवल यह मंदिर बनवाया, बल्कि तमिल साहित्य की महान कृति ‘तेवारम्’ (शैव भजन संग्रह) को संकलित करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मंदिर की दीवारों पर नृत्य करती हुई देवांगनाओं की अत्यंत सजीव मूर्तियाँ बनवाईं, जो चोल कला की परिपक्वता का प्रमाण हैं।
11. 72 व्यापारी, चीन में किसके कार्यकाल में भेजे गए थे?
(a) कुलोत्तुंग-I
(b) राजेंद्र – I
(c) राजराज-I
(d) राजाधिराज-I
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(a)
चोल शासक कुलोत्तुंग प्रथम (1070–1120 ई.) के शासनकाल में वर्ष 1077 ई. में 72 व्यापारियों का एक दूत मंडल चीन के सुन्ग वंश के दरबार में भेजा गया था। यह चोल-चीन संबंधों का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुलोत्तुंग प्रथम चालुक्य-चोल वंश का संस्थापक माना जाता है, क्योंकि वह पूर्वी चालुक्य और चोल दोनों वंशों से संबंधित था। इसके अलावा, कुलोत्तुंग प्रथम ने श्रीलंका पर अपना आधिपत्य बनाए रखा और उसे कर देने से मुक्त कर दिया, जिससे उसे ‘शुंगम् तविर्त्त’ (करों को हटाने वाला) की उपाधि मिली।
12. कौन-सा मध्यकालीन भारतीय साम्राज्य व्यापक स्तर पर स्थानीय स्वशासन के लिए प्रसिद्ध था?
(a) चालुक्य
(b) चोल
(c) सोलंकी
(d) परमार
66th B.P.S.C. (Pre) 2020
उत्तर-(b)
चोल साम्राज्य मध्यकालीन भारत में स्थानीय स्वशासन की अत्यंत विकसित व्यवस्था के लिए विख्यात था। चोलों के अंतर्गत ग्रामीण स्तर पर ‘उर’, ‘सभा’ और ‘नगरम्’ जैसी स्वायत्त संस्थाएँ कार्य करती थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल की ग्राम सभाओं का सबसे विस्तृत विवरण तमिलनाडु के उत्तरमेरूर शिलालेखों (919 ई. और 921 ई.) से मिलता है, जो परांतक प्रथम के शासनकाल के हैं। इन अभिलेखों में समिति सदस्यों की योग्यताएँ, चुनाव प्रक्रिया और अयोग्यता के नियम तक अंकित हैं, जो इस व्यवस्था की परिपक्वता को दर्शाते हैं।
13. शिव की ‘दक्षिणामूर्ति’ प्रतिमा उन्हें किस रूप में प्रदर्शित करती है?
(a) शिक्षक
(b) नृत्य करते हुए
(c) विश्राम करते हुए
(d) ध्यानमग्न
U.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(a)
शिव की ‘दक्षिणामूर्ति’ प्रतिमा में उन्हें परम गुरु (शिक्षक) के रूप में दर्शाया जाता है। इस प्रतिकृति में शिव दक्षिण दिशा की ओर मुख करके वृक्ष के नीचे बैठे होते हैं और अपने भक्तों व शिष्यों को योग, ज्ञान, संगीत और शास्त्रों की शिक्षा देते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘दक्षिणामूर्ति’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘दक्षिण दिशा की ओर मुख करने वाले’, क्योंकि दक्षिण दिशा को मृत्यु के देवता यम की दिशा माना जाता है और शिव मृत्यु पर विजेता हैं। इस स्वरूप में शिव के चार शिष्यों — सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार — को उनके चरणों में बैठे दर्शाया जाता है।
14. चोल काल में निर्मित नटराज की कांस्य प्रतिमाओं में देवाकृति प्रायः
(a) अष्टभुज है
(b) षड्भुज है
(c) चतुर्भुज है
(d) द्विभुज है
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(c)
चोल काल में निर्मित नटराज की कांस्य प्रतिमाओं में शिव की आकृति सामान्यतः चतुर्भुज (चार भुजाओं वाली) होती है। इन प्रतिमाओं में शिव को आनंद तांडव नृत्य की मुद्रा में दिखाया जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नटराज की इन प्रतिमाओं में शिव के चारों ओर एक ज्वाला-मण्डल (प्रभामण्डल) होता है जिसे ‘तिरुवासि’ या ‘प्रभावली’ कहते हैं, जो सृष्टि-चक्र का प्रतीक है। प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी फ्रिट्जोफ काप्रा ने अपनी पुस्तक ‘The Tao of Physics’ में नटराज की इस नृत्य-मुद्रा की तुलना आधुनिक परमाणु भौतिकी के ऊर्जा नृत्य से की है।
15. चोलों के अधीन ग्राम प्रशासन के बहुत से ब्यौरे जिन शिलालेखों में हैं, वे कहां हैं?
उत्तर मेरूर
(a) तंजावुर
(b) उरैयूर
(c) कांचीपुरम
(d)
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(d)
चोल शासनकाल में ग्राम सभाओं और उनकी कार्यकारिणी समितियों (‘वारियम्’) की विस्तृत कार्यप्रणाली का वर्णन उत्तरमेरूर (वर्तमान तमिलनाडु) के शिलालेखों में मिलता है। प्रत्येक गाँव की अपनी स्वतंत्र सभा होती थी जो केंद्रीय नियंत्रण से प्रायः मुक्त होकर कार्य करती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तरमेरूर के शिलालेखों में ‘कुडवोलई’ प्रणाली का उल्लेख है — यह एक प्रकार की लॉटरी प्रणाली थी जिसमें ताड़ के पत्तों पर उम्मीदवारों के नाम लिखकर एक बर्तन में डाले जाते थे और बच्चे द्वारा यादृच्छिक रूप से नाम निकाले जाते थे। यह विश्व की प्राचीनतम लोकतांत्रिक चुनाव प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
16. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
1. चोलों ने पाण्ड्य तथा चेर शासकों को पराजित कर प्रायद्वीपीय भारत पर प्रारंभिक मध्यकालीन समय में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
2. चोलों ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के शैलेंद्र साम्राज्य के विरुद्ध सैन्य चढ़ाई की तथा कुछ क्षेत्रों को जीता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) दोनों 1 और 2
(d) दोनों में से कोई भी नहीं
I.A.S. (Pre) 2003
उत्तर-(c)
दोनों कथन सही हैं। चोल शासक परांतक प्रथम ने पाण्ड्य राजा को पराजित कर ‘मदुरैकोंड’ की उपाधि ली, तथा राजराज प्रथम ने चेर (केरल) को कंडलूर के युद्ध में हराया। राजराज प्रथम एवं उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के शैलेंद्र साम्राज्य (सुमात्रा-मलाया क्षेत्र) पर सफल सैन्य अभियान चलाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजेंद्र प्रथम का यह समुद्री अभियान (लगभग 1025 ई.) भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक अभियानों में से एक था, जिसमें चोल सेना ने श्रीविजय साम्राज्य के कई बंदरगाहों को जीता। इसी विजय के उपलक्ष्य में राजेंद्र प्रथम ने ‘मुडिकोंड चोलपुरम’ नामक नई राजधानी की स्थापना की और ‘गंगैकोंड चोल’ की उपाधि धारण की।
17. चोल शासकों के समय में बनी हुई प्रतिमाओं में सबसे अधिक विख्यात हुईं-
(a) पत्थर की प्रतिमाएं
(b) संगमरमर की प्रतिमाएं
(c) विष्णु भगवान की पत्थर की शिलाओं पर अंकित प्रतिमाएं
(d) नटराज शिव की कांसे की प्रतिमाएं
ng>R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1994)
उत्तर-(d)
चोल काल में धातु-शिल्प (विशेषतः कांस्य-मूर्तिकला) अपने उत्कर्ष पर पहुँची और नटराज शिव की कांस्य प्रतिमाएँ विश्व-विख्यात हुईं। इन्हें ‘खोया मोम’ (Lost Wax / Cire Perdue) तकनीक से बनाया जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोलकालीन कांस्य प्रतिमाओं में नटराज के अतिरिक्त ‘अर्धनारीश्वर’, ‘कल्याणसुंदर’ और ‘उमा-महेश्वर’ की प्रतिमाएँ भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं। भारत सरकार ने नटराज की प्रतिमा को अपने प्रतीक-चिह्न के रूप में अपनाया है और जिनेवा स्थित CERN (यूरोपीय नाभिकीय अनुसंधान संगठन) के परिसर में भी नटराज की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है।
18.निम्नलिखित में से किसको दक्षिण भारत के विशेषकर चोल युग के स्थापत्यों की विश्व में श्रेष्ठतम प्रतिमा-रचना माना जाता है?
(a) महिषासुरमर्दिनी
(b) नटराज
(c) राम
(d) सोमस्कंद
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(b)
चोल युग की कांस्य मूर्तिकला में नटराज (नृत्य करते शिव) की प्रतिमा को विश्व की श्रेष्ठतम प्रतिमा-रचनाओं में स्थान दिया जाता है। इसे भारतीय कला-दर्शन और ब्रह्मांड की सृष्टि-स्थिति-लय की अवधारणा का सर्वोत्कृष्ट दृश्य-अभिव्यक्ति माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नटराज की प्रतिमा में चार प्रतीकात्मक तत्व होते हैं — ऊपरी दाएँ हाथ में डमरू (सृष्टि का प्रतीक), ऊपरी बाएँ हाथ में अग्नि (विनाश का प्रतीक), अभय मुद्रा (संरक्षण का प्रतीक) और पैर तले दबा अपस्मार पुरुष (अज्ञान पर विजय का प्रतीक)। चेन्नई के सरकारी संग्रहालय में संरक्षित 11वीं शताब्दी की नटराज प्रतिमा को इस कला-परंपरा का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है।
19. नटराज की प्रसिद्ध कांस्य मूर्ति किस कला का उदाहरण है?
(a) चोल क़ला का
(b) गांधार कला का
(c) गुप्त कला का
(d) मौर्य कला का
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(a)
नटराज की प्रसिद्ध कांस्य मूर्ति चोल कला का अप्रतिम उदाहरण है। चोल कलाकारों ने ‘मधुच्छिष्ट विधान’ (Lost Wax Casting) पद्धति से इन मूर्तियों का निर्माण किया जो तकनीकी दृष्टि से भी अत्यंत उन्नत थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गांधार कला यूनानी-बौद्ध कला का मिश्रण थी जो मुख्यतः बुद्ध प्रतिमाओं के निर्माण के लिए जानी जाती है, जबकि गुप्त कला की विशेषता मथुरा और सारनाथ की पाषाण प्रतिमाओं में दिखती है। चोल कला इन सबसे भिन्न है — यह द्रविड़ परंपरा की विशुद्ध अभिव्यक्ति है जिसमें आगम शास्त्रों के अनुसार प्रतिमा-लक्षणों का पालन किया जाता था।
20. चोल शासकों के शासनकाल में निम्नलिखित में से कौन-सा वारियम् उद्यान प्रशासन का कार्य देखता था?
(a) पोन वारियम्
(b) एरि वारियम्
(c) टोट्ट वारियम्
(d) सम्वत्सर वारियम्
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(c)
चोल काल में गाँव की विभिन्न गतिविधियों की देखरेख के लिए विशेष कार्यकारिणी समितियाँ (वारियम्) होती थीं। उद्यान प्रशासन का दायित्व ‘टोट्ट वारियम्’ पर था। अन्य समितियों में एरि वारियम् (तालाब/सिंचाई समिति), पोन वारियम् (स्वर्ण/कोष समिति) और सम्वत्सर वारियम् (वार्षिक समिति) प्रमुख थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘एरि वारियम्’ (तालाब समिति) का विशेष महत्व था क्योंकि तमिलनाडु की कृषि व्यवस्था जलाशयों पर निर्भर थी — इन्हें ‘एरि’ कहा जाता था। इन समितियों के सदस्यों के लिए कड़ी योग्यता शर्तें थीं, जैसे उनके पास न्यूनतम भूमि होनी चाहिए, वे किसी भ्रष्टाचार के दोषी न हों और उनके परिवार पर कोई ऋण न हो।
21. निम्नलिखित चोल शासकों में जिसने बंगाल की खाड़ी को ‘चोल झील’ का स्वरूप प्रदान कर दिया, वह कौन था?
(a) राजराज प्रथम
(b) राजेंद्र प्रथम
(c) अधिराज
(d) कुलोत्तुंग
U.P. P.C.S. (Spl) (Pre) 2008
उत्तर-(b)
राजेंद्र प्रथम (1014–1044 ई.) चोल वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासकों में से एक था। उसने अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत बंगाल की खाड़ी के समस्त तटीय व द्वीपीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया, जिससे इस खाड़ी को ‘चोल झील’ कहा जाने लगा। उसने 1017 ई. में श्रीलंका को पूरी तरह अपने अधीन कर सिंहल नरेश महेंद्र पंचम को बंदी बना लिया। उत्तर भारत अभियान में उसने पाल शासक महीपाल को परास्त किया और ‘गंगैकोंड’ की उपाधि धारण कर ‘गंगैकोंडचोलपुरम्’ नाम से नई राजधानी बसाई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय साम्राज्य (आधुनिक मलेशिया-इंडोनेशिया क्षेत्र) पर भी नौसैनिक आक्रमण किया, जो किसी भारतीय राजवंश द्वारा किया गया सुदूर समुद्री अभियानों में सबसे उल्लेखनीय माना जाता है। उसने ‘मुडिकोंड चोल’, ‘पंडित चोल’ तथा ‘कडारम कोंड’ जैसी अनेक विरुदावलियाँ भी धारण की थीं।
22. निम्न में से दक्षिण भारत का कौन-सा राजवंश अपनी नौसैनिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध था ?
चोल राजवंश दक्षिण भारत का वह साम्राज्य था जिसने अपनी शक्तिशाली नौसेना के बल पर न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के तटीय क्षेत्रों बल्कि श्रीलंका, मालदीव, श्रीविजय (मलेशिया-इंडोनेशिया) जैसे दूरस्थ द्वीपों तक अपना वर्चस्व स्थापित किया। चोलों की नौसेना में युद्धपोत, रसद-नौकाएँ और प्रशिक्षित नाविकों की विशाल संख्या शामिल थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल नौसेना का मुख्य केंद्र ‘नागपट्टिनम’ बंदरगाह था, जो उस काल का एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र भी था। चोल राजाओं ने अपनी नौसेना को ‘कडलपडै’ कहा जाता था। इतिहासकारों के अनुसार चोल नौसेना की शक्ति का चरमोत्कर्ष राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में हुआ।
23. ‘गंगैकोंडचोलपुरम्’ की स्थापना किसने की थी ?
(a) राजराज-I
(b) राजाधिराज
(c) राजेंद्र-I
(d) विजयादित्य
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
उत्तर-(c)
राजेंद्र प्रथम ने गंगा घाटी (उत्तर-पूर्वी भारत) पर विजय प्राप्त करने के स्मरण में ‘गंगैकोंड’ की उपाधि ग्रहण की और इस विजय के उपलक्ष्य में ‘गंगैकोंडचोलपुरम्’ नाम से एक भव्य नई राजधानी की स्थापना की। यह नगर आज तमिलनाडु के अरियालुर जिले में स्थित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गंगैकोंडचोलपुरम् में राजेंद्र प्रथम ने एक विशाल शिव मंदिर ‘बृहदीश्वर मंदिर’ (गंगैकोंडचोलेश्वर मंदिर) का निर्माण भी कराया था, जो तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के समकक्ष माना जाता है। यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली का अत्यंत उत्कृष्ट उदाहरण है और आज भी इतिहासकारों व पुरातत्त्वविदों के लिए शोध का विषय है।
24. निम्नलिखित में से किस चोल शासक को चोलगंगम् नामक वृहद कृत्रिम झील बनवाने का श्रेय दिया जाता है?
(a) राजराज प्रथम
(b) राजेंद्र
(c) राजाधिराज
(d) राजराज द्वितीय
U.P.P.C.S(Mains) 2016
उत्तर-(b)
राजेंद्र प्रथम ने अपनी नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम् के समीप सिंचाई की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ‘चोलगंगम्’ नामक एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण कराया। इस जलाशय का उद्देश्य कृषि भूमि को जल उपलब्ध कराना और स्थानीय जनजीवन को समृद्ध बनाना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल शासक जल-प्रबंधन में अत्यंत दक्ष थे — उन्होंने कावेरी नदी के डेल्टा क्षेत्र में सिंचाई के लिए नहरों और बाँधों का एक सुव्यवस्थित जाल बिछाया था, जिसे आधुनिक इंजीनियरिंग दृष्टि से भी प्रभावशाली माना जाता है। चोल काल में ‘एरी’ (तालाब) प्रणाली द्वारा वर्षाजल संग्रह करने की परंपरा इतनी विकसित थी कि आज भी तमिलनाडु में सैकड़ों ऐसे प्राचीन जलाशय कार्यरत हैं।
25. निम्नांकित राजवंशों में से किसके शासक अपने शासनकाल में ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते थे?
(a) चालुक्य
(b) चोल
(c) कदंब
(d) कलचुरि
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(*)
प्राचीन भारत के अधिकांश हिंदू राजवंशों में यह परंपरा थी कि राजा अपने जीवनकाल में ही ‘युवराज’ की घोषणा कर देता था, जिससे उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न न हो। यह प्रवृत्ति चोल वंश में विशेष रूप से संस्थागत रूप में दिखाई देती है। इसीलिए उत्तर (*) दिया गया है, क्योंकि यह परंपरा केवल एक राजवंश तक सीमित नहीं थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल राजवंश में ‘युवराज पट्टाभिषेक’ एक महत्त्वपूर्ण राजकीय समारोह था, जिसमें राजकुमार को विधिपूर्वक उत्तराधिकारी घोषित किया जाता था। राजराज प्रथम ने भी अपने पुत्र राजेंद्र को अपने जीवनकाल में युवराज घोषित किया था, और राजेंद्र ने राज्य संचालन में उनका सक्रिय सहयोग भी किया था।
26. चालुक्य वंश का सबसे महान शासक कौन था?
(a) विक्रमादित्य
(b) मंगलेश
(c) पुलकेशिन द्वितीय
(d) पुलकेशिन प्रथम
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(c)
पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंश के शासकों में सर्वाधिक योग्य तथा शक्तिशाली था। उसने 610 ई. से 642 ई. तक शासन किया। उसकी उपलब्धियों का विवरण हमें ऐहोल अभिलेख से प्राप्त होता है।
27. वह चोल राजा कौन था, जिसने श्रीलंका को पूर्ण स्वतंत्रता दी और सिंहल राजकुमार के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया था?
(a) कुलोत्तुंग- I
(b) राजेंद्र – I
(c) अधिराजेंद्र
(d) राजाधिराज – I
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(a)
कुलोत्तुंग प्रथम के समय में श्रीलंका के राजा विजयबाहु ने अपनी स्वतंत्रता घोषित की। किंतु कुलोत्तुंग प्रथम ने श्रीलंका में चोल प्रभाव की
समाप्ति के प्रति किसी कटुता का प्रदर्शन नहीं किया तथा उसने अपनी पुत्री का विवाह श्रीलंका के राजकुमार वीरप्पेरुमाल के साथ कर दिया।
28. प्राचीन भारत का निम्नलिखित में से कौन-सा महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र उस व्यापार मार्ग पर था, जो कल्याण को वेंगी से जोड़ता था?
(a) तगर
(b) श्रीपुर
(c) त्रिपुरी
(d) ताम्रलिप्ति
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(a)
तगर प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, यह कल्याण तथा वेंगी के मध्य स्थित था।
29. चोल राजाओं में किस एक ने सीलोन (Ceylon) पर विजय प्राप्त की थी ?
(a) आदित्य-I
(b) राजराज-I
(c) राजेंद्र-I
(d) विजयालय
I.A.S. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने सिंहल द्वीप या श्रीलंका विजय (सीलोन- श्रीलंका) का कार्य पूर्ण किया था। यद्यपि राजराज-I ने भी श्रीलंका पर आक्रमण कर वहां के कुछ प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया था, किंतु संपूर्ण श्रीलंका पर उसका अधिकार नहीं हो पाया था। राजेंद्र प्रथम ने वहां के शासक महेंद्र पंचम को बंदी बनाकर चोल राज्य भेज दिया, जहां 12 वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई। संपूर्ण श्रीलंका पर राजेंद्र का अधिकार हो गया था।
30. चालुक्यों की राजधानी कहां थी ?
(a) वातापी
(b) श्रावस्ती
(c) कांची
(d) कन्नौज
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(a)
बीजापुर (कर्नाटक) जिले के वातापी नामक प्राचीन नगर का आधुनिक नाम बादामी है। छठी-सातवीं शताब्दी ई. में यह चालुक्यों की राजधानी थी। वातापी के चालुक्य राजवंश का वास्तविक संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था।
31. किस चोल राजा ने जल सेना प्रारंभ की थी ?
(a) राजेंद्र चोल
(b) परांतक चोल
(c) राजराज प्रथम
(d) राजराज द्वितीय
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
चोल साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक परांतक द्वितीय (सुंदर चोल) का पुत्र अरिमोलिवर्मन था, जो 985 ई. में ‘राजराज’ के नाम से गद्दी पर बैठा। यह विजेता के साथ-साथ कुशल प्रशासक तथा महान निर्माता भी था। राजराज प्रथम ने एक स्थायी सेना तथा विशाल नौसेना का गठन किया। उसने समस्त भूमि की नाप कराई।
32. निम्न में से कौन-सी संस्था विदेशी व्यापार से संबंधित थी?
(a) श्रेणी
(b) नगरम
(c) नानादेशि
(d) मणिग्राम
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c&d)
‘श्रेणी’ एक ही प्रकार के व्यवसाय करने वाले लोगों की समिति होती थी। ‘नगरम’ व्यापारियों के स्थानीय संगठनों को कहा जाता था। इस प्रकार के संगठन कांची तथा मामल्लपुरम् में विद्यमान थे। लेखों से हमें विभिन्न व्यापारिक संघों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। ये व्यापारी संघ हैं- मणिग्रामम्, नानादेशिस (नानादेशि), वलैंग, बलंजियर, इदंगै आदि। माणिग्रामम्, नानादेशिस दूसरे देशों के साथ भी व्यापार करते थे।
33. निम्नलिखित में से किस वंश द्वारा प्रायः महिलाओं को प्रशासन उच्च पद प्रदान किए जाते थे?
(a) चोल
(b) चालुक्य
(c) पाल
(d) सेन
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(b)
चालुक्यों के शासनकाल में प्रायः महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। विजयादित्य प्रथम के भाई चंद्रादित्य की रानी विजय भट्टारिका ने अपने नाम से दो ताम्रपत्र लिखवाए थे। वह एक अच्छी कवयित्री भी थी। विजयादित्य ने अपनी छोटी बहन कुमकुम देवी के कहने पर एक विद्वान ब्राह्मण को एक गांव दान में दिया था। कीर्तिवर्मन द्वितीय की महारानी महादेवी के उसके साथ रक्तपुर के स्कंधावार में उपस्थित रहने का उल्लेख मिलता है। इस वंश की विजय भट्टारिका ने. कुशलतापूर्वक शासन संचालित किया था।
34. चोल शासक का नाम बताइए, जिसने श्रीलंका के
उत्तर ी भाग पर विजय प्राप्त की।
(a) राजराज प्रथम
(b) राजेंद्र प्रथम
(c) परांतक प्रथम
(d) आदित्य प्रथम
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(a)
चोल शासक राजराज प्रथम ने सिंहल (श्रीलंका) पर आक्रमण करके उत्तरी सिंहल को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। विजित क्षेत्र में राजराज ने अनुराधापुर को नष्ट कर पोलोन्नरुवा को इस क्षेत्र की राजधानी बनाया और इसका नाम ‘जननाथ मंगलम्’ रखा। राजराज शैव मतावलम्बी था, उसने ‘शिवपादशेखर’ की उपाधि धारण की थी।
35. नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को कथन (a) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है-
कथन (a) : हमें चोलों के विषय में उनके पूर्ववर्ती राजवंशों की अपेक्षा अधिक जानकारी है।
कारण (R) : चोल शासकों ने मंदिरों की दीवारों पर अभिलेख उत्कीर्ण करने का चलन प्रारंभ किया, जिनमें उनकी विजयों के ऐतिहासिक विवरण दिए जाते थे।
नीचे दिए गए कूट में से सही
कूट :
उत्तर का चयन कीजिए।
(a) (a) और (R) दोनों सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या करता है।
(b) (a) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (a) सत्य है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
चोलों के विषय में हमें उनके पूर्ववर्ती राजवंशों की अपेक्षा अधिक जानकारी है। राजराज प्रथम एवं राजेंद्र प्रथम ने मंदिरों की ऐतिहासिक दीवारों पर शिलालेख स्थापित किए। राजराज प्रथम ने अभिलेखों द्वारा अपने पूर्वजों के इतिहास को संकलित करने एवं अपने काल की घटनाओं और विजयों को लेखों में जोड़ने की प्रथा का प्रारंभ किया। इसका अनुकरण बाद के राजाओं ने किया। अतः स्पष्ट है कि कथन और कारण दोनों सत्य हैं तथा कारण (R), कथन (a) की सही व्याख्या करता है।
36. भारत के इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-
शब्द विवरण
1. एरिपत्ति – भूमि, जिससे मिलने वाला राजस्व अलग से ग्राम जलाशय के रख-रखाव के लिए निर्धारित कर दिया जाता था।
2. तनियूर – एक अकेले ब्राह्मण अथवा एक ब्राह्मण समूह को दान में दिए गए ग्राम
3. घटिका- प्रायः मंदिरों के साथ संबद्ध विद्यालय उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(a) 1 और 2
(b) केवल 3
(c) 2 और 3
(d) 1 और 3
I.A.S. (Pre) 2016
उत्तर-(d)
एरिपत्ति चोल प्रशासन के अंतर्गत वह भूमि होती थी, जिससे मिलने वाला राजस्व अलग से ग्राम जलाशय के रख-रखाव के लिए निर्धारित कर दिया जाता था। 7वीं, 8वीं सदी में दक्षिण भारत में घटिका प्रायः मंदिरों के साथ संबद्ध विद्यालय थे। चोल कालीन स्थानीय प्रशासन में बड़े नगरों में अलग कुर्रम (ग्राम संघ) गठित किए जाते थे, जिन्हें ‘तनियूर’ अथवा ‘तकुर्रम’ कहा जाता था।
37. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में प्राप्य ‘यवनप्रिय’ शब्द द्योतक था-
(a) एक प्रकार के उत्कृष्ट भारतीय मलमल का
(b) हाथी दांत का
(c) नृत्य के लिए यवन राजसभा में भेजी जाने वाली नर्तकियों का
(d) काली मिर्च का
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(d)
प्राचीन संस्कृत साहित्य में ‘यवन’ शब्द मूलतः यूनानियों (Greeks) के लिए प्रयुक्त होता था, जो बाद में रोमवासियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा। काली मिर्च यूनानियों और रोमवासियों की अत्यंत प्रिय वस्तु थी, इसीलिए संस्कृत ग्रंथों में इसे ‘यवनप्रिय’ की संज्ञा दी गई। रोम में काली मिर्च इतनी मूल्यवान थी कि इसे ‘काला सोना’ कहा जाता था और कभी-कभी कर (Tax) के रूप में भी स्वीकार किया जाता था। 410 ई. में जब विसिगोथ राजा अलारिक ने रोम को घेरा, तो उसने फिरौती में 3,000 पाउंड काली मिर्च की माँग की थी।
38. शिलप्पादिकारम का लेखक था-
(a) इलंगो
(b) परणर
(c) करिकाल
(d) विष्णुस्वामिन
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
उत्तर-(a)
‘शिलप्पादिकारम’ (जिसका अर्थ है ‘नूपुर की कहानी’) तमिल साहित्य के पाँच महाकाव्यों में से एक है। इसकी रचना इलंगो आडिगल ने की थी, जो चेर वंश के राजकुमार थे और उन्होंने राजपाट छोड़कर बौद्ध भिक्षु का जीवन अपनाया। इस महाकाव्य की नायिका कण्णगी है, जिसकी कहानी पति कोवलन की अन्यायपूर्ण मृत्यु के बाद उसके प्रतिशोध पर केंद्रित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इस कृति में तत्कालीन तीनों तमिल राज्यों — चेर, चोल और पांड्य — की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक झलक मिलती है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत भी है।
39. कवि कालिदास के नाम का उल्लेख किसमें हुआ है?
(a) इलाहाबाद स्तंभ लेख में
(b) ऐहोल के उत्कीर्ण लेख में
(c) अलपादुदान लेख में
(d) हनुमकोंडा उत्कीर्ण लेख में
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) चालुक्य नरेश पुलकेशिन-II की उपलब्धियों का वर्णन करने वाला एक महत्वपूर्ण अभिलेख है, जिसकी रचना दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत भाषा और दक्षिण ब्राह्मी लिपि में की थी। प्रशस्ति के अंत में रविकीर्ति ने दावा किया है कि उसने यह रचना कर कालिदास और भारवि जैसे महाकवियों की श्रेणी में स्थान पाया है — इसी कारण इस अभिलेख में कालिदास का नाम आता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इस अभिलेख में हर्षवर्धन पर पुलकेशिन-II की विजय का भी उल्लेख है, जो हर्ष के नर्मदा के दक्षिण में विस्तार को रोकने की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व की घटना है। रविकीर्ति इस अभिलेख में स्वयं को ‘जिनेंद्र भक्त’ (जैन धर्मावलंबी) भी बताते हैं।
40. संस्कृत के कवि और नाटककार कालिदास का उल्लेख हुआ है-
(a) पुलकेशिन-II के ऐहोल अभिलेख में
(b) मिहिरभोज के ग्वालियर अभिलेख में
(c) कुमारगुप्त-I के करमदंडा शिवलिंग अभिलेख में
(d) चंद्रगुप्त-II के मथुरा स्तंभ लेख में
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
उत्तर-(a)
ऐहोल अभिलेख में रविकीर्ति ने कालिदास और भारवि का नाम लेकर उनसे अपनी तुलना की है। कालिदास को परंपरागत रूप से चंद्रगुप्त-II (विक्रमादित्य) के नवरत्नों में से एक माना जाता है और उनकी कृतियाँ — अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मेघदूतम्, रघुवंशम् — संस्कृत साहित्य की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ का सर्वप्रथम यूरोपीय अनुवाद 1789 में सर विलियम जोन्स ने किया था, जिसे पढ़कर जर्मन कवि गेटे ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
41. ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में भारत तथा रोम के बीच घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों की सूचना किस पुरास्थल की खुदाइयों से प्राप्त होती है?
अरिकामेडु (प्राचीन नाम ‘पोडुके’) पुडुचेरी के दक्षिण में कोरोमंडल तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण रोमन व्यापारिक केंद्र था। यहाँ 1945 में सर मोर्टिमर व्हीलर के नेतृत्व में व्यापक उत्खनन हुआ, जिसमें रोमन अम्फोरा (दो हत्थों वाले मदिरा-कलश), रोमन दीपक, काँच के बर्तन और अरेटाइन मृद्भांड (Arretine ware) मिले। ये साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि यहाँ रोमन व्यापारियों की एक स्थायी बस्ती थी जो पहली-दूसरी शताब्दी ई. में विशेष रूप से सक्रिय थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त मनके-निर्माण की कार्यशालाएँ यह भी दर्शाती हैं कि स्थानीय कारीगर रोमन ग्राहकों की रुचि के अनुसार माल तैयार करते थे।
42. किस शासक ने सिंहल द्वीप के विरुद्ध 642 ई. में दो समुद्री अभियान भेजा था?
(a) राजाराम
(b) नरसिंह वर्मन I
(c) कीर्ति वर्मन I
(d) जयसिंह I
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(b)
पल्लव शासक नरसिंह वर्मन-I (630–668 ई.) को ‘महामल्ल’ की उपाधि प्राप्त थी और उन्हीं के नाम पर प्रसिद्ध बंदरगाह नगर ‘मामल्लपुरम’ (महाबलीपुरम) का नाम पड़ा। उन्होंने चालुक्य राजा पुलकेशिन-II को वातापी की लड़ाई में परास्त किया और ‘वातापीकोंड’ की उपाधि धारण की। सिंहल के राजकुमार मानवर्मा ने उनसे सहायता माँगी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने दो शक्तिशाली नौसैनिक अभियान भेजकर मानवर्मा को सिंहल की गद्दी पर बैठाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:यह घटना पल्लव नौसैनिक शक्ति की श्रेष्ठता का प्रमाण है। नरसिंह वर्मन-I के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी दक्षिण भारत की यात्रा की थी।
43. तोल्काप्पियम ग्रंथ संबंधित है-
(a) प्रशासन से
(b) विधि से
(c) व्याकरण और काव्य से
(d) उपर्युक्त सभी से
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
‘तोल्काप्पियम’ तमिल भाषा का सबसे प्राचीन व्याकरण ग्रंथ है, जिसकी रचना तोल्काप्पियर ने की थी, जो ऋषि अगस्त्य के बारह प्रमुख शिष्यों में से एक थे। यह ग्रंथ तीन भागों में विभाजित है — एझुत्तदिकारम् (ध्वनि एवं लिपि), सोल्लदिकारम् (शब्द एवं व्याकरण), और पोरुलदिकारम् (साहित्य एवं काव्यशास्त्र)। यह संगम साहित्य का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि ‘तोल्काप्पियम’ न केवल भाषाई नियमों को निर्धारित करता है, बल्कि इसमें तत्कालीन तमिल समाज के प्रेम-संबंधों और भौगोलिक परिवेश (तिणै पद्धति) का भी विस्तृत विवेचन है, जो इसे साहित्यिक दृष्टि से अद्वितीय बनाता है।
44. संगम साहित्य में ‘तोल्काप्पियम’ एक ग्रंथ है-
(a) तमिल कविता का
(b) तमिल व्याकरण का
(c) तमिल वास्तुशास्त्र का
(d) तमिल राजशास्त्र का
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
‘तोल्काप्पियम’ तमिल साहित्य का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ है जो मुख्यतः व्याकरण और काव्यशास्त्र पर केंद्रित है। इसकी रचना सूत्र शैली में की गई है, जो संस्कृत व्याकरण परंपरा से मिलती-जुलती है। विद्वानों के अनुसार इस ग्रंथ का रचनाकाल ईसा पूर्व तीसरी से दूसरी शताब्दी के बीच माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इसमें तमिल काव्य के लिए ‘अकम’ (प्रेम) और ‘पुरम’ (वीरता) जैसी काव्य-शैलियों का वर्गीकरण किया गया है, जो संगमकालीन कविता की आत्मा है।
45. सूची-I के पदों को सूची-II के पदों के साथ सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए कूटों से सही उत्तर चुनिए :
सूची-I सूची-II
A. तिरुक्कुरल 1. प्रेम कथा
B. तोल्काप्पियम 2. दर्शन
C. शिल्पादिकारम 3. वणिक कथा
D. मणिमेकलै 4. व्याकरण
कूट :
A B C D
(a) 1 2 4 3
(b) 2 3 4 1
(c) 4 2 3 1
(d) 2 4 1 3
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(d)
इन चारों तमिल कृतियों का सही परिचय इस प्रकार है — तिरुक्कुरल (तिरुवल्लुवर रचित) एक दार्शनिक ग्रंथ है जो अर्थशास्त्र, नीति और प्रेम पर आधारित 1330 द्विपदियों में विभाजित है; तोल्काप्पियम तमिल का सबसे पुराना व्याकरण ग्रंथ है; शिल्पादिकारम इलंगो आडिगल रचित प्रेम-आधारित महाकाव्य है; और मणिमेकलै (सत्तनार रचित) एक बौद्ध दार्शनिक महाकाव्य है जिसमें एक नर्तकी की पुत्री मणिमेकलै की वणिक-परिवेश में बौद्ध धर्म की ओर यात्रा वर्णित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि ‘तिरुक्कुरल’ का अनुवाद विश्व की 80 से अधिक भाषाओं में हो चुका है और इसे ‘तमिल वेद’ भी कहा जाता है।
46. शैव संतों के लेखन के संग्रह को पांचवां वेद भी समझा जाता है। उपर्युक्त संग्रह का क्या नाम है?
(a) तोल्कापियम
(b) सिल्पद्दीकरन
(c) मणीमेखलय
(d) तिरुमुराय
Jharkhand P.C.S.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(d)
‘तिरुमुराय’ तमिल भाषा में शैव भक्ति साहित्य का बारह खंडों में विभाजित विशाल संकलन है, जिसे 6वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य तमिल नायनार संतों ने रचा। इसके प्रथम सात खंड ‘तेवारम’ के नाम से जाने जाते हैं, जिन्हें तिरुज्ञानसंबंदर, तिरुनावुक्करसर और सुंदरमूर्ति ने लिखा। आठवाँ खंड ‘तिरुवासकम’ माणिक्कवाचकर की अमर रचना है। इसे वेदों और शैव आगमों के साथ तमिलनाडु में शैव सिद्धांत का प्रमुख आधारग्रंथ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि ‘तिरुमुराय’ में वर्णित मंदिर तमिलनाडु के शिव मंदिरों की ‘पाडल पेत्र स्थलम’ सूची के निर्माण का आधार हैं।
47. धार्मिक कविताओं का संकलन ‘कुरल’ किस भाषा में है?
(a) ग्रीक
(b) तमिल
(d) पालि
(c) तेलुगू
M.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
‘कुरल’ तमिल भाषा में रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण काव्य-ग्रंथ है, जिसकी रचना महान तमिल कवि तिरुवल्लुवर ने की थी। इसे तमिल साहित्य का ‘लघुवेद’ और ‘तमिल बाइबिल’ भी कहा जाता है तथा ‘मुप्पाल’ के नाम से भी जाना जाता है। अनुश्रुतियों के अनुसार तिरुवल्लुवर को ब्रह्मा का अवतार माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुरल में कुल 1,330 दोहे (कुरल छंद) हैं, जो तीन भागों — अरम् (धर्म), पொருள् (अर्थ) और इन्बम् (काम/प्रेम) — में विभाजित हैं। इसका अनुवाद विश्व की 40 से अधिक भाषाओं में हो चुका है, जिससे यह भारत के सर्वाधिक अनूदित प्राचीन ग्रंथों में से एक है।
48. रोमन बस्ती कहां से प्राप्त हुई है?
(a) कालीबंगा
(b) अरिकामेडु
(c) रंगपुर
(d) सतारा
U.P. Lower Sub. (Pre) 2009
उत्तर-(b)
अरिकामेडु (वर्तमान पुदुचेरी के निकट) से रोमन बस्ती के प्रमाण मिले हैं। यहाँ के उत्खनन में रोमन मिट्टी के पात्र, एम्फोरा जार, काँच की वस्तुएँ और रोमन दीपक आदि प्राप्त हुए हैं, जो भारत-रोम व्यापार की पुष्टि करते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अरिकामेडु की पहली व्यवस्थित पुरातात्विक खुदाई 1945 में सर मॉर्टिमर व्हीलर के नेतृत्व में की गई थी। यहाँ से प्राप्त ‘अरेटाइन पॉटरी’ (Arretine Ware) इटली में बनाई जाती थी, जो यह सिद्ध करती है कि अरिकामेडु पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी में भूमध्यसागरीय व्यापारियों का एक सक्रिय केंद्र था।
49. निम्नलिखित राजवंशों में किसका उल्लेख संगम साहित्य में नहीं हुआ है?
(a) कदंब
(b) चेर
(c) चोल
(d) पाण्ड्य
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(a)
संगम साहित्य में मुख्यतः तीन तमिल राजवंशों — चोल, चेर और पाण्ड्य — का विस्तृत उल्लेख मिलता है। कदंब राजवंश का संगम साहित्य में कोई उल्लेख नहीं है। संगम साहित्य कृष्णा नदी के दक्षिण से सुदूर प्रायद्वीप तक की राजनीतिक गतिविधियों पर प्रकाश डालता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कदंब राजवंश की स्थापना लगभग चौथी शताब्दी ईस्वी में मयूरशर्मन ने की थी और इसकी राजधानी वनवासी (वर्तमान कर्नाटक) थी — यह संगम काल के बाद का राजवंश है, इसीलिए इसका संगम साहित्य में उल्लेख नहीं है। संगम साहित्य की रचना लगभग 300 ई.पू. से 300 ई. के मध्य मानी जाती है।
50. निम्नलिखित तमिल ग्रंथों में किसे ‘लघुवेद’ की संज्ञा दी गई है?
(a) नन्दिकलम्बकम्
(b) कलिंगत्तुपर्णि
(c) पेरियपुराणम्
(d) कुरल
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(d)
तमिल ग्रंथ ‘कुरल’ को ‘लघुवेद’ की संज्ञा दी गई है। इसे ‘तमिल बाइबिल’ और ‘मुप्पाल’ भी कहा जाता है। इसकी रचना तिरुवल्लुवर ने की थी। यह ग्रंथ नीति, प्रेम और धर्म — तीनों विषयों को समेटे हुए है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिरुवल्लुवर की स्मृति में तमिलनाडु में ‘तिरुवल्लुवर दिवस’ प्रतिवर्ष ‘पोंगल’ के दूसरे दिन मनाया जाता है। कन्याकुमारी में समुद्र के बीच स्थित विशाल तिरुवल्लुवर प्रतिमा (133 फीट ऊँची) कुरल की 133 अध्यायों (अधिकारों) का प्रतीक है।
51. पूर्वी भारत में प्रमुख भारतीय-रोमन व्यापारिक स्थान था-
(a) राजगीर
(b) अरिकामेडु
(c) भाग्रपीर
(d) तामलुक
Jharkhand P.C.S.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(b)
प्रश्न में ‘पूर्वी भारत’ शब्द भ्रामक लग सकता है, किन्तु अरिकामेडु (पुदुचेरी के निकट, दक्षिण-पूर्वी तट) भारत-रोम व्यापार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक रूप से प्रमाणित व्यापारिक केंद्र था। यहाँ से रोमन मुद्राएँ, एम्फोरा जार और अन्य रोमन वस्तुएँ मिली हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तामलुक (ताम्रलिप्ति, वर्तमान पश्चिम बंगाल) भी एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था, किन्तु वह मुख्यतः दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका के साथ व्यापार के लिए जाना जाता था, न कि रोमन व्यापार के लिए। रोमन साम्राज्य के साथ भारत का व्यापार मुख्यत: पश्चिमी और दक्षिणी तटों — भरूच (बारिगाजा), मुजिरिस और अरिकामेडु — के माध्यम से होता था।
52. एम्फोरा जार होता है, एक-
(a) छिद्रयुक्त जार
(b) लंबा एवं दोनों तरफ हत्थेदार जार
(c) चित्रित धूसर जार
(d) काला और लाल मिट्टी का जार
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(b)
एम्फोरा जार एक विशेष प्रकार का लंबा, संकीर्ण गर्दन वाला और दोनों तरफ हत्थों (handles) से युक्त मिट्टी का पात्र है। प्राचीन रोम और ग्रीस में इसका उपयोग जैतून का तेल, शराब (wine) और मछली की चटनी (garum) आदि के भंडारण एवं परिवहन के लिए होता था। अरिकामेडु की खुदाई में इसके अवशेष मिले हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: एम्फोरा जार का आकार जानबूझकर नुकीली पेंदी (pointed base) वाला बनाया जाता था ताकि इसे जहाज की रेत या मिट्टी में खड़ा किया जा सके और समुद्री यात्रा के दौरान यह स्थिर रहे। एक मानक रोमन एम्फोरा की क्षमता लगभग 26 लीटर होती थी और इसका वजन भरे होने पर 50 किलोग्राम से अधिक हो सकता था।
53. निम्नलिखित में से कौन एक तमिल देश के संगम युग का राजवंश नहीं था?
(a) चेर
(b) चोल
(c) पल्लव
(d) पाण्ड्य
U.P.U.D.A./L.D.A.(Mains) 2010
उत्तर-(c)
संगम युग के तमिल देश के तीन प्रमुख राजवंश चेर, चोल और पाण्ड्य थे। पल्लव राजवंश संगम काल का नहीं था — पल्लवों का उदय लगभग तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी में हुआ, जो संगम काल की समाप्ति के पश्चात का काल है। पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पल्लव राजवंश अपनी द्रविड़ स्थापत्य शैली के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) के रथ मंदिर और शोर टेम्पल पल्लव स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिनका निर्माण पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम (मामल्ल) के शासनकाल में हुआ था। इसके विपरीत, संगम युग के चोल, चेर और पाण्ड्य शासकों की जानकारी मुख्यतः संगम काव्य-ग्रंथों से ही प्राप्त होती है।
54. निम्नलिखित में से कौन-सा बंदरगाह पोडुके नाम से ‘दी पेरिप्लस ऑफ दी इरिथ्रियन सी’ के लेखक को ज्ञात था?
(a) अरिकामेडु
(b) ताम्रलिप्ति
(c) कोरके
(d) बारबेरिकम
U.P. P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
अरिकामेडु को ‘दी पेरिप्लस ऑफ दी इरिथ्रियन सी’ नामक यूनानी ग्रंथ में ‘पोडुके’ नाम से संदर्भित किया गया है। यह ग्रंथ लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में एक अज्ञात यूनानी नाविक/व्यापारी द्वारा लिखा गया था और इसमें हिंद महासागर के व्यापारिक मार्गों व बंदरगाहों का विस्तृत विवरण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘पेरिप्लस ऑफ दी इरिथ्रियन सी’ में भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों — बारिगाजा (भरूच), मुजिरिस (कोडुंगल्लूर) और नेलसिंडा — का भी उल्लेख है। ‘इरिथ्रियन सी’ उस काल में हिंद महासागर, लाल सागर और अरब सागर के संयुक्त क्षेत्र को कहा जाता था। यह ग्रंथ प्राचीन भारत-रोम व्यापार को समझने का एक अमूल्य ऐतिहासिक स्रोत है।
55. दक्षिणी भारत का प्रसिद्ध ‘तक्कोलम का युद्ध’ हुआ था-
उत्तर चालुक्यों के मध्य
(a) चोल एवं
(b) चोल एवं राष्ट्रकूटों के मध्य
(c) चोल एवं होयसल के मध्य
(d) चोल एवं पाण्ड्यों के मध्य
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
तक्कोलम का युद्ध (949 ई.) चोल शासक परांतक प्रथम और राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय के बीच हुआ था। इस युद्ध में पश्चिमी गंग शासक बुत्तुग द्वितीय ने राष्ट्रकूटों का साथ दिया, और चोलों को निर्णायक पराजय मिली। इस जीत के उपलक्ष्य में कृष्ण तृतीय ने ‘तंजैयुकोंड’ की उपाधि धारण की और तंजौर पर अधिकार कर लिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कृष्ण तृतीय ने रामेश्वरम तक दक्षिण में विजय प्राप्त की और वहाँ एक विजय-स्तंभ तथा मंदिर का निर्माण करवाया। तक्कोलम की पराजय के बाद चोल सत्ता कुछ दशकों के लिए अत्यंत कमज़ोर हो गई, और उसका पुनरुत्थान बाद में राजराज प्रथम के काल में हुआ।
56. निम्नलिखित में से कौन तमिल रामायणम या रामावतारम का लेखक था?
(a) कंबन
(b) कुट्टन
(c) नन्नय
(d) टिक्कण
U.P.U.D.A./L.D.A. (Mains) 2010
उत्तर-(a)
कंबन 12वीं शताब्दी के महान तमिल कवि थे, जिन्होंने चोल शासनकाल में ‘कंब रामायणम’ (जिसे रामावतारम भी कहते हैं) की रचना की। यह रचना वाल्मीकि की संस्कृत रामायण से प्रेरित होते हुए भी स्वतंत्र काव्य-व्यक्तित्व रखती है। इसमें लगभग 10,000 पद हैं और इसे तमिल साहित्य की सर्वोच्च कृतियों में गिना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कंबन को ‘कविचक्रवर्ती’ की उपाधि दी गई थी। इनके ग्रंथ में रावण को एक जटिल और दार्शनिक पात्र के रूप में चित्रित किया गया है, जो वाल्मीकि रामायण से एक महत्त्वपूर्ण अंतर है।
57. निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्राचीन भारत में व्यापारियों का निगम था?
(a) चतुर्वेदीमंगलम्
(b) परिषद
(c) अष्टदिग्गज
(d) मणिग्रामम्
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(d)
मणिग्रामम् दक्षिण भारत, विशेषतः चोल काल में व्यापारियों का एक प्रमुख संगठन (व्यापारिक गिल्ड) था। इस प्रकार के व्यापारिक निगम दूरस्थ व्यापार, विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ वाणिज्य संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। ‘वलंजीयर’ इसी तरह का एक अन्य प्रसिद्ध व्यापारिक संघ था। चतुर्वेदिमंगलम् ब्राह्मणों को दान में दिए गए गाँव को कहा जाता था, न कि व्यापारियों के संगठन को।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मणिग्रामम् के व्यापारी अपना स्वयं का सशस्त्र दल रखते थे और इन्हें राज्य की ओर से विशेष व्यापारिक अधिकार व कर-छूट प्राप्त थी। ये संगठन मंदिर-निर्माण और सामाजिक कार्यों में भी आर्थिक योगदान देते थे।
58. चोल साम्राज्य को अंततः किसने समाप्त किया?
(a) महमूद गजनवी ने
(b) बख्तियार खिलजी ने
(c) मुहम्मद गौरी ने
(d) मलिक काफूर
U. P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(*)
चोल साम्राज्य का पतन किसी एक आक्रमणकारी के हाथों नहीं हुआ, बल्कि यह आंतरिक कमज़ोरी और होयसल व पाण्ड्य राज्यों के उभार का परिणाम था। 13वीं शताब्दी के मध्य तक राजेंद्र तृतीय को पाण्ड्यों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी और लगभग 1279 ई. के बाद स्वतंत्र चोल सत्ता का कोई प्रमाण नहीं मिलता। मलिक काफूर ने 1310-11 ई. में दक्षिण भारत पर आक्रमण किया, किंतु तब तक चोल साम्राज्य पहले ही समाप्त हो चुका था। इसलिए प्रश्न के विकल्पों में कोई भी उत्तर पूर्णतः सही नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल वंश की स्थापना विजयालय ने लगभग 850 ई. में की थी और उसका स्वर्णकाल राजराज प्रथम (985-1014 ई.) तथा राजेंद्र प्रथम (1014-1044 ई.) के शासनकाल में रहा, जब चोल नौसेना ने श्रीलंका और मलय प्रायद्वीप तक विजय प्राप्त की थी।
59. सूची-I और सूची-II को सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए हुए कूट का प्रयोग करते हुए सही
सूची-I सूची-II
A. गुप्त 1. बादामी
B. चंदेल 2. पनमलै
C. चालुक्य 3. खजुराहो
D. पल्लव 4. देवगढ़
कूट : उत्तर का चयन कीजिए-
(a) A-4, B-3, C-1, D-2
(c) A-2, B-3, C-4, D-1
(b) A-4, B-2, C-3, D-1
(d) A-3, B-4, C-1, D-2
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
सही सुमेलन इस प्रकार है — गुप्त वंश का संबंध देवगढ़ (उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थित) से है, जहाँ प्रसिद्ध गुप्तकालीन दशावतार मंदिर स्थित है। चंदेल शासकों ने खजुराहो (मध्य प्रदेश) में भव्य मंदिर-समूह का निर्माण करवाया, जिनमें कंदरिया महादेव मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है। चालुक्यों की राजधानी बादामी (कर्नाटक) थी और पनमलै पल्लव स्थापत्य का उदाहरण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: देवगढ़ का दशावतार मंदिर पंचायतन शैली का प्रारंभिक उदाहरण है और इसमें शेषशायी विष्णु की अत्यंत कलात्मक प्रतिमा है। खजुराहो के मंदिरों को यूनेस्को ने 1986 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है।
60. मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
1. तमिल क्षेत्र के सिद्ध (सित्तर) एकेश्वरवादी थे तथा मूर्तिपूजा की निंदा करते थे।
2.कन्नड़ क्षेत्र के लिंगायत पुनर्जन्म के सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगाते थे तथा जाति अधिक्रम को अस्वीकार करते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
I.A.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
तमिल क्षेत्र के सिद्ध (सित्तर) संत एकेश्वरवाद में विश्वास रखते थे और मूर्तिपूजा, कर्मकांड तथा जातिभेद का विरोध करते थे। कन्नड़ क्षेत्र के लिंगायत संप्रदाय की स्थापना 12वीं शताब्दी में बसवण्णा (बसवेश्वर) ने की थी। लिंगायत मान्यता के अनुसार मृत्यु के पश्चात भक्त शिव में विलीन हो जाता है और पुनर्जन्म नहीं होता — इस प्रकार उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत को नकारा। इन्होंने जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणीय श्रेष्ठता का भी खंडन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लिंगायत साहित्य ‘वचन’ कहलाता है, जो कन्नड़ गद्य-पद्य का अमूल्य भंडार है। बसवेश्वर ने ‘अनुभव मंटप’ नामक एक आध्यात्मिक संसद की स्थापना की थी, जिसमें महिलाएँ और निम्न जाति के लोग भी भाग लेते थे।
61. किस ऋषि के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दक्षिण भारत का आर्यकरण किया, उन्हें आर्य बनाया?
(a) विश्वामित्र
(b) अगस्त्य
(c) वशिष्ठ
(d) सांभर
Jharkhand P.C.S.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
दक्षिण भारत को आर्य संस्कृति से परिचित कराने का श्रेय महर्षि अगस्त्य को दिया जाता है। उन्होंने विंध्य पर्वत को पार कर दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और वहीं स्थायी रूप से निवास किया। तमिल परंपरा में उन्हें ‘तमिल भाषा और साहित्य के आदि जनक’ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अगस्त्य ने ‘अगस्त्यम्’ नामक तमिल व्याकरण की रचना की थी, जो अब अनुपलब्ध है। संगम साहित्य के अनुसार प्रथम और द्वितीय संगम दोनों की अध्यक्षता भी महर्षि अगस्त्य ने ही की थी।
62. भारत के इतिहास में निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए-
1. राजा भोज के अधीन प्रतिहारों का उदय
2. महेंद्रवर्मन – I के अधीन पल्लव सत्ता की स्थापना
3. परांतक – I द्वारा चोल सत्ता की स्थापना
4. गोपाल द्वारा पाल राजवंश की संस्थापना
उपर्युक्त घटनाओं का, प्राचीन काल से आरंभ कर, सही कालानुक्रम क्या है ?
(a) 2-1-4-3
(b) 3-1-4-2
(c) 2-4-1-3
(d) 3-4-1-2
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
इन घटनाओं का सही कालानुक्रम इस प्रकार है — सर्वप्रथम महेंद्रवर्मन I के अधीन पल्लव सत्ता की स्थापना (600–630 ई.), तत्पश्चात गोपाल द्वारा पाल राजवंश की स्थापना (750–770 ई.), फिर राजा भोज (मिहिरभोज) के नेतृत्व में प्रतिहारों का उत्कर्ष (836–885 ई.), और अंत में परांतक I द्वारा चोल सत्ता की सुदृढ़ स्थापना (907–953 ई.)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गोपाल को बंगाल की अराजकता समाप्त करने के लिए जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से राजा चुना गया था — यह भारतीय इतिहास में निर्वाचन का एक दुर्लभ उदाहरण है। परांतक I ने पाण्ड्यों को परास्त कर ‘मदुरैकोंड’ की उपाधि धारण की थी।
63. संगम युग में ‘उरैयूर’ किसलिए विख्यात था?
(a) मसालों के व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र
(b) कपास के व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र
(c) विदेशी व्यापार का महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र
(d) आंतरिक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
उरैयूर वर्तमान तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में कावेरी नदी के तट पर स्थित था। यह संगम काल में चोल राज्य की प्रारंभिक राजधानी भी था। यह नगर उस काल में उत्कृष्ट कोटि के सूती वस्त्रों के निर्माण और व्यापार के लिए सुप्रसिद्ध था। प्रसिद्ध यूनानी ग्रंथ ‘पेरिप्लस ऑफ दी एरीथ्रियन सी’ में इस नगर का उल्लेख ‘ओरेओ’ नाम से मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार में उरैयूर के सूती वस्त्र अत्यधिक लोकप्रिय थे। कालांतर में चोलों ने अपनी राजधानी उरैयूर से पुहार (कावेरीपत्तनम) स्थानांतरित कर दी थी।
64. निम्नलिखित में से कौन-सी जोड़ी (6वीं से 12वीं शताब्दी तक
दक्षिण भारत का राज्य एवं उसकी राजधानी) सुमेलित नहीं है ?
(a) पल्लव – कांचीपुरम्
(b) पाण्ड्य – मदुरै
(c) चेर – पुडुचेरी
(d) चोल – तंजौर
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
चेर राज्य वर्तमान केरल के क्षेत्र में विस्तृत था, जिसमें त्रावणकोर, कोचीन एवं मालाबार का कुछ भाग सम्मिलित था। चेर राज्य की राजधानी ‘वांजी’ अथवा ‘वांची’ थी, न कि पुडुचेरी। शेष सभी युग्म — पल्लव-कांचीपुरम्, पाण्ड्य-मदुरै और चोल-तंजौर — सही सुमेलित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चेर राज्य का मुख्य बंदरगाह ‘मुशिरि’ (आधुनिक कोडुंगल्लूर/मुज़िरिस) था, जो रोमन व्यापार का प्रमुख केंद्र था। चेर राजा उदयन जेरल इरुम्पोरई ने ‘पट्टिनप्पालै’ में वर्णित अनेक सैन्य अभियान किए थे।
65. सूची-I और सूची-II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए हुए
कूट से सही
सूची-I सूची-II
A. चालुक्य 1. मदुरई
B. पल्लव 2. कन्नौज
C. हर्ष 3. बादामी
D. पाण्ड्य 4. कांचीपुरम्
कूट :
A B C D
उत्तर चुनिए-
(a) 3 4 2 1
(b) 4 3 2 1
(c) 1 4 2 3
(d) 1 3 2 4
U.P.P.C.S. (Spl) (Pre) 2004
उत्तर-(a)
बादामी (वातापी) के चालुक्यों की राजधानी बादामी थी। पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम् थी। हर्षवर्धन ने कन्नौज को अपना मुख्य केंद्र बनाकर शासन किया और पाण्ड्यों की राजधानी मदुरई थी। चालुक्य राजा पुलकेशिन II ने हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर पराजित किया था — यह जानकारी कवि रविकीर्ति की ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) से प्राप्त होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बादामी के अतिरिक्त चालुक्यों की एक अन्य शाखा ‘वेंगी के चालुक्य’ थी जिनकी राजधानी वेंगी थी। हर्षवर्धन ने कन्नौज में एक विशाल धार्मिक सभा का आयोजन किया था जिसमें चीनी यात्री ह्वेनसांग भी उपस्थित था।
66. तृतीय संगम हुआ था –
(a) अरिकामेडु में
(b) इरनाकुलम में
(c) मदुरई में
(d) तूकोरिन में
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(c)
संगम का शाब्दिक अर्थ है ‘विद्वान कवियों की परिषद्’। पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में तीन संगमों का आयोजन किया गया था। प्रथम संगम मदुरई में हुआ जिसकी अध्यक्षता अगस्त्य ऋषि ने की। द्वितीय संगम कपाटपुरम् (अलैवाई) में हुआ, जिसकी अध्यक्षता पहले अगस्त्य ने और बाद में तोल्काप्पियर ने की। तृतीय संगम पुनः मदुरई में हुआ जिसकी अध्यक्षता नक्कीरर ने की — इसी संगम में तमिल साहित्य का अधिकांश भाग संकलित हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय संगम का प्रमुख ग्रंथ ‘तोल्काप्पियम्’ है, जो तमिल का प्राचीनतम उपलब्ध व्याकरण ग्रंथ माना जाता है। संगम साहित्य में ‘अकम्’ (प्रेम) और ‘पुरम्’ (वीरता) दो प्रमुख काव्य-विधाएँ थीं।
67. पाण्ड्य राज्य की जीवन रेखा कौन-सी नदी थी?
(a) गोदावरी
(b) कृष्णा
(c) तुंगभद्रा
(d) वेंगी
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2010
उत्तर-(d)
पाण्ड्य राज्य कावेरी नदी के दक्षिण में अवस्थित था, जिसमें आधुनिक मदुरा, तिन्नेवेल्ली जिले और त्रावणकोर का कुछ भाग सम्मिलित था। इस राज्य की जीवन रेखा वेंगी नदी थी जो अपनी असाधारण भूमि की उर्वरता के लिए प्रसिद्ध थी। पाण्ड्यों की राजधानी मदुरा थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में पाण्ड्य राज्य का उल्लेख किया है और यहाँ की मोती एवं रत्नों के व्यापार की प्रशंसा की है। पाण्ड्य शासकों ने रोमन साम्राज्य में अपने दूत भेजे थे, जिसका उल्लेख रोमन लेखक प्लिनी ने किया है।
68. निम्नलिखित में से कौन-से संगम पत्तन पश्चिमी तट पर स्थित थे? नीचे दिए कूट से सही
1. कोरकै 2. पुहार
3. तोंडी 4. मुशिरि
कूट :
उत्तर चुनिए –
(a) केवल 1 एवं 2
(c) केवल 3 एवं 4
(b) केवल 2 एवं 3
(d) केवल 4 एवं 1
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
एक अज्ञात यूनानी नाविक द्वारा प्रथम शताब्दी ई. में रचित ‘पेरिप्लस ऑफ दी एरीथ्रियन सी’ में प्राचीन भारत के बंदरगाहों का विस्तृत विवरण मिलता है। इसके अनुसार नौरा, तोंडी, मुशिरि और नेलिसंडा पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाह थे। कोरकै और पुहार पूर्वी तट (कोरोमंडल तट) पर स्थित थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मुशिरि (मुज़िरिस) को रोमन व्यापारियों द्वारा ‘प्रथम बंदरगाह’ की संज्ञा दी गई थी, यहाँ रोमन व्यापारियों की एक स्थायी बस्ती थी जिसे ‘Augustus का मंदिर’ भी कहा जाता था। 2004 में मिस्र में खोजा गया ‘मुज़िरिस पेपाइरस’ (द्वितीय शताब्दी ई.) इस बंदरगाह के रोम के साथ व्यापार का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
69. संगम कालीन साहित्य में ‘कोन’, ‘को’ एवं ‘मन्नन’ किसके लिए प्रयुक्त होते थे?
(a) प्रधानमंत्री
(b) राजस्व मंत्री
(c) सेनाधिकारी
(d) राजा
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2010
उत्तर-(d)
संगम कालीन तमिल साहित्य में राजा को संदर्भित करने के लिए ‘कोन’, ‘को’ और ‘मन्नन’ शब्दों का प्रयोग किया जाता था। ये शब्द राजा की शक्ति, संप्रभुता और शासनाधिकार के प्रतीक थे। संगम साहित्य में राजा के कर्तव्यों और गुणों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: संगम काल में राजा को ‘वेंदन’ भी कहा जाता था, जो सर्वोच्च शासक का द्योतक था। इस युग में राजा की तीन प्रमुख जिम्मेदारियाँ थीं — युद्ध में विजय, प्रजा का पालन, और कवियों को संरक्षण देना, जिसे तमिल में ‘कडमै’ कहते थे।
70. निम्नलिखित पल्लव शासकों का नाम उनके राज्यकाल को दृष्टिगत रखते हुए सही कालानुक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए और नीचे दिए गए कूट से सही
उत्तर का चयन कीजिए :
1. परमेश्वरवर्मन I
2. नरसिंहवर्मन I
3. नन्दिवर्मन II
महेंद्रवर्मन I
कूट :
(a) 4, 2, 1, 3
(c) 1, 3, 2, 4
(b) 4, 3, 1, 2
(d) 3, 2, 1, 4
U.P.B.E.O. (Pre) 2019
उत्तर-(a)
पल्लव शासकों का सही कालानुक्रम इस प्रकार है — महेंद्रवर्मन I (600–630 ई.), नरसिंहवर्मन I (630–668 ई.), परमेश्वरवर्मन I (लगभग 670–700 ई.) और नन्दिवर्मन II (731–795 ई.)। इस प्रकार सही क्रम 4, 2, 1, 3 होता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महेंद्रवर्मन I प्रारंभ में जैन धर्म का अनुयायी था, बाद में शैव संत अप्पर के प्रभाव से वह शैव बन गया। नरसिंहवर्मन I ने चालुक्य राजा पुलकेशिन II को वातापी के युद्ध (642 ई.) में पराजित किया और ‘वातापीकोण्ड’ की उपाधि धारण की।
71. दक्षिण भारत के मंदिरों के आकर्षक द्वार क्या कहलाते हैं?
(a) शिखर
(b) गोपुरम्
(c) देवालय
(d) मंडपम्
(e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/उपर्युक्त में से एक से अधिक
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
दक्षिण भारत के मंदिरों के विशाल और अलंकृत प्रवेश द्वारों को ‘गोपुरम्’ कहा जाता है। यह द्रविड़ स्थापत्य शैली की सबसे पहचानी जाने वाली विशेषता है। पाण्ड्य और चोल शासकों के काल में यह शैली अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। चोल कालीन स्थापत्य की पहचान वास्तव में भव्य मंदिरों से नहीं, बल्कि इन्हीं गोपुरमों से होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मदुरई के मीनाक्षी अम्मन मंदिर में कुल 14 गोपुरम हैं, जिनमें से दक्षिणी गोपुरम सबसे ऊँचा (लगभग 170 फीट) है। गोपुरम की बाहरी दीवारें देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और लोक जीवन के दृश्यों से सजी असंख्य मूर्तियों से आच्छादित होती हैं, जो हिन्दू धर्मशास्त्र का दृश्य विश्वकोश मानी जाती हैं।
72. किस राजवंश ने
उत्तर भारत पर शासन नहीं किया है?
(a) चालुक्य
(b) राजपूत
(c) गुप्त
(d) मौर्य
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
दिए गए विकल्पों में चालुक्य वंश एकमात्र ऐसा राजवंश था जिसने उत्तर भारत पर कभी शासन नहीं किया। चालुक्यों का साम्राज्य मुख्यतः दक्कन और दक्षिण भारत तक सीमित था। उनकी प्रमुख शाखा बादामी (वातापी) के चालुक्यों की राजधानी वर्तमान कर्नाटक में थी। पुलकेशिन द्वितीय इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था जिसने सम्राट हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर पराजित किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चालुक्यों की तीन प्रमुख शाखाएँ थीं — बादामी के चालुक्य (6वीं-8वीं सदी), वेंगी के पूर्वी चालुक्य और कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने पुलकेशिन द्वितीय के दरबार का दौरा किया था और उसे एक महान एवं पराक्रमी राजा बताया था।
73. मीनाक्षी मंदिर स्थित है-
(a) मदुरई में
(b) पुदुकोट्टै में
(c) श्री रंगम में
(d) तंजावुर में
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(a)
विश्वप्रसिद्ध मीनाक्षी अम्मन मंदिर तमिलनाडु के मदुरई नगर में स्थित है। मदुरई पाण्ड्य वंश की राजधानी थी। संगम काल में मदुरई साहित्य और संस्कृति का केंद्र थी — यहाँ प्रथम और तृतीय संगम (साहित्यिक सम्मेलन) आयोजित हुए थे। यह मंदिर देवी पार्वती (मीनाक्षी) और भगवान शिव (सुन्दरेश्वर) को समर्पित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीनाक्षी मंदिर के वर्तमान स्वरूप का अधिकांश निर्माण 17वीं शताब्दी में नायक शासक तिरुमलई नायक के शासनकाल में हुआ था। यह मंदिर लगभग 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और इसमें 33,000 से अधिक मूर्तियाँ हैं — इसे UNESCO की विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकित किया जा चुका है।
74. निम्न में से किस चीनी यात्री ने चालुक्यों के शासनकाल में चीन एवं भारत के संबंधों का विवरण दिया है?
(a) फाह्यान
(b) ह्वेनसांग
(c) इत्सिंग
(d) मात्वालिन
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(d)
मात्वालिन (Ma Tuan-lin) एक चीनी इतिहासकार और लेखक थे जिन्होंने चालुक्य शासनकाल के दौरान चीन और भारत के राजनयिक एवं व्यापारिक संबंधों का विस्तृत विवरण अपने ग्रंथ ‘वेन्हियान तुन्गकाओ’ में दिया है। फाह्यान गुप्तकाल में, ह्वेनसांग हर्षकाल में और इत्सिंग 7वीं सदी के अंत में भारत आए थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मात्वालिन ने स्वयं भारत की यात्रा नहीं की थी, वे चीनी स्रोतों और पूर्व यात्रियों के विवरणों का संकलन करके लिखते थे। उनका ग्रंथ ‘वेन्हियान तुन्गकाओ’ प्राचीन एशियाई इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसमें भारत-चीन के बीच दूतमंडलों के आदान-प्रदान का भी उल्लेख है।
75. निम्नलिखित में से किस राजा ने अपने मंत्रियों को पशुओं पर क्रूरता पर प्रतिबंध लगाने के लिए काशी क्षेत्र भेजा था?
(a) चालुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह
(b) चालुक्य राजा कुमारपाल
(c) चोल राजा कुलोत्तुंग I
(d) कश्मीरी राजा जयसिंह
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(b)
गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक कुमारपाल (1143-1173 ई.) ने जैन धर्म अपना लिया था और वे प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचंद्र के शिष्य थे। अहिंसा के सिद्धांत से प्रेरित होकर उन्होंने अपने राज्य में पशुवध पर कठोर प्रतिबंध लगाया और इसे लागू करने के लिए अपने मंत्रियों को काशी जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी भेजा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आचार्य हेमचंद्र ने कुमारपाल के लिए ‘कुमारपालचरित’ नामक ग्रंथ की रचना की थी। कुमारपाल के शासनकाल को गुजरात के सोलंकी वंश का स्वर्णकाल माना जाता है — उन्होंने अनेक जैन मंदिरों का निर्माण करवाया और पाटन (अन्हिलवाड़) को एक समृद्ध सांस्कृतिक केंद्र बनाया।
76. सुमेलित कीजिए :
(a) मीनाक्षी मंदिर (1) तिरूमाल (आंध्र प्रदेश)
(b) वेंकटेश्वर मंदिर (2) मदुरई (बालाजी विश्वनाथ)
(c) महाकाल मंदिर (3) हावड़ा (प. बंगाल)
(d) बेलूर मठ (4) उज्जैन
कूट :
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 2 1 4 3
(c) 4 3 1 2
(d) 3 4 1 2
M.P.P.C.S. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
सही सुमेलन इस प्रकार है — मीनाक्षी मंदिर: मदुरई (तमिलनाडु), वेंकटेश्वर (बालाजी) मंदिर: तिरुमाल/तिरुपति (आंध्र प्रदेश), महाकाल मंदिर: उज्जैन (मध्य प्रदेश), बेलूर मठ: हावड़ा (पश्चिम बंगाल)। बेलूर मठ में रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है जिसकी स्थापना 1897 ई. में स्वामी विवेकानंद ने की थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर विश्व के सर्वाधिक धनी धार्मिक स्थलों में से एक है और यहाँ प्रतिदिन औसतन 50,000 से 1,00,000 श्रद्धालु आते हैं। महाकालेश्वर मंदिर (उज्जैन) भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जिसकी मूर्ति दक्षिणमुखी (दक्षिण की ओर मुख) है।
77. निम्नलिखित में से कौन-सा एक काकतीय राज्य में अति महत्वपूर्ण समुद्र पत्तन था?
(a) काकीनाडा
(b) मोटुपल्ली
(c) मछलीपत्तनम (मसूलीपत्तनम)
(d) नेल्लुरु
I.A.S. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
मोटुपल्ली काकतीय राज्य का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह था। यह वर्तमान आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित है। इतालवी यात्री मार्कोपोलो ने इस बंदरगाह का दौरा किया था और काकतीय शासकों के अधीन आंध्र प्रदेश की व्यापारिक समृद्धि का उल्लेख किया। 13वीं शताब्दी के गणपति देव द्वारा जारी मोटुपल्ली शिलालेख में यहाँ से कपूर, मोती, हाथीदाँत, रेशम, काली मिर्च आदि के व्यापार का विवरण मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: काकतीय वंश की राजधानी वारंगल (वर्तमान तेलंगाना) थी। काकतीय रानी रुद्रमादेवी (1262-1289 ई.) इतिहास की उन विरल महिला शासकों में से एक हैं जिन्होंने स्वतंत्र रूप से राज्य किया — मार्कोपोलो ने स्वयं उनकी वीरता और कुशल शासन की प्रशंसा की है।
78. कदंब राजाओं की राजधानी थी-
(a) तंजौर
(b) वनवासी
(c) कांची
(d) बादामी
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(b)
कदंब राजवंश की राजधानी वनवासी (वर्तमान कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में) थी। इस वंश की स्थापना 4थी शताब्दी ईस्वी में मयूरशर्मन ने की थी। कदंब वंश दक्षिण भारत के उन प्रारम्भिक राजवंशों में से एक था जिसने कन्नड़ भाषा को राजकीय संरक्षण दिया। बाद में इस राज्य को चालुक्य शासक पुलकेशिन-II ने अपने साम्राज्य में मिला लिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कदंब वंश ने कन्नड़ साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया — उनके शासनकाल में कन्नड़ भाषा में पहले शिलालेख (हल्मिडी शिलालेख, लगभग 450 ई.) प्राप्त होते हैं जो कन्नड़ लिपि के प्राचीनतम प्रमाणों में से एक हैं। उल्लेखनीय है कि तंजौर चोलों की, कांची पल्लवों की और बादामी चालुक्यों की राजधानी थी।
79. दक्षिण भारत के किस वंश के राजा ने रोम राज्य में एक दूत 26 ई.पू. में भेजा था ?
(a) चोल
(b) चेर
(c) पाण्ड्य
(d) चालुक्य
M.P.P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(c)
पाण्ड्य वंश के राजा ने 26 ई.पू. में रोम के सम्राट ऑगस्टस के पास अपना राजदूत भेजा था। यह भारत और रोम के बीच प्राचीन कूटनीतिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रमाण है। पाण्ड्यों की राजधानी मदुरई थी और उनका शासन तमिलनाडु के दक्षिणी भाग पर था। इस दूतमंडल का उल्लेख रोमन इतिहासकार स्ट्राबो और कैसियस डियो ने किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पाण्ड्यों और रोम के बीच व्यापार अत्यंत समृद्ध था — मुख्य रूप से मोती, मसाले, हाथी दाँत और कीमती पत्थरों का व्यापार होता था। रोमन लेखक प्लिनी ने शिकायत की थी कि रोम का अत्यधिक सोना भारतीय व्यापार में जा रहा है, जो भारत-रोम व्यापार की व्यापकता को दर्शाता है।
मीनाक्षी अम्मन मंदिर तमिलनाडु राज्य के मदुरई शहर में वैगई नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। यह मंदिर देवी मीनाक्षी (पार्वती का रूप) और उनके पति सुन्दरेश्वर (शिव) को समर्पित है। मदुरई पाण्ड्य साम्राज्य की राजधानी थी जो प्राचीन संगम युग से ही एक प्रमुख धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मदुरई को ‘पूर्व का एथेंस’ कहा जाता है क्योंकि यह प्राचीन काल से ही विद्या और संस्कृति का केंद्र रहा है। संगम काल में यहाँ तीन महान साहित्यिक संगम (सम्मेलन) हुए थे जिनसे तमिल साहित्य की अमूल्य धरोहर — संगम साहित्य — का सृजन हुआ।
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