मगध का उत्कर्ष (600–322 BCE)): राजवंश, शासक और राजधानी

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत मगध का उत्कर्ष (600–322 BCE))
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मगध प्राचीन भारत के सोलह महाजनपद में से एक था। बौद्ध काल तथा परवर्तीकाल में उत्तरी भारत का सबसे अधिक शक्तिशाली जनपद था। इसकी स्थिति स्थूल रूप से दक्षिण बिहार के प्रदेश में थी। आधुनिक पटना तथा गया ज़िला इसमें शामिल थे।

6वीं शताब्दी ई.पू. में गंगाघाटी में जहां एक तरफ साम्राज्यवाद का उदय हो रहा था, एक विशाल सुसंगठित साम्राज्य की नींव रखी जा रही थी, ठीक उसी समय, अनेक नए धार्मिक संप्रदायों का उदय हो रहा था।

➣ जिस प्रकार साम्राज्यवादी गतिविधियों का केंद्र मगध बना, उसी प्रकार नवीन धार्मिक गतिविधियों का भी केंद्र मगध ही बना था।

➣ मगध का उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में मिलता हैं ऋग्वेद में यद्यपि मगध का उल्लेख नहीं मिलता, तथापि कीकट (किराट) नामक जाति व इसके शासक प्रमगंद का उल्लेख मिलता हैं इसकी पहचान मगध से की गई है।

प्रमुख शासक राजधानी
जरासंध (बृहद्रथ वंश) गिरिव्रज या वसुमती
बिम्बसार (हर्यक वंश) राजगृह
उदायिन (हर्यक वंश) पाटलिपुत्र या कुसुमपुर
शिशुनाग (शिशुनाग वंश) वैशाली
कालाशोक (शिशुनाग वंश) पाटलिपुत्र

➣ इसके बाद से मगध की राजधानी पाटलिपुत्र ही रही।

बृहद्रथ वंश : मगध का प्रारम्भिक राजवंश

➣ पुराणों के अनुसार, मगध पर शासन करने वाला पहला राजवंश बृहद्रथ वंश था। इस वंश के पहले राजा बृहद्रथ का पुत्र जरासंध था, जिसने गिरिव्रज को अपनी राजधानी बनाया।

➣ मगध के प्राचीन इतिहास की रूपरेखा महाभारत तथा पुराणों में मिलती है। इन ग्रंथों के अनुसार मगध के सबसे प्राचीन राजवंश का संस्थापक बृहद्रथ था।

➣ वह जरासंध का पिता और वसु चैध-उपरिचर का पुत्र था। मगध की आरंभिक राजधानी वसुमती या गिरिव्रज की स्थापना का श्रेय वसु को ही था।

➣ बृहद्रथ का पुत्र जरासंध एक पराक्रमी शासक था, जिसने अनेक राजाओं को पराजित किया। अंततोगत्वा उसे श्रीकृष्ण के निर्देश पर भीम के हाथों पराजित होकर मरना पड़ा।

रिपुंजय इस वंश (बृहदथ) का अतिम शासक था।

हर्यक वंश (पितृहंता वंश): मगध के उत्कर्ष की शुरुआत

➣ बृहद्रथ-वंश के पश्चात मगध में जो नया राजवंश सत्ता में आया, वह हर्यक वंश के नाम से विख्यात हुआ।

➣ बौद्ध एवं जैनग्रंथों में इस वंश को हर्यक वंश कहा गया है। इस वंश का प्रथम महान शासक बिम्बिसार हुआ, जिसने मगध साम्राज्य की नींव रखी थी।

बिम्बिसार (544 – 492 ई.पू.) : मगध का शक्तिशाली निर्माता

➣ बिम्बिसार ने हर्यक वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक (544-492 ई.पू.) था। उसे मगध-साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है। यह बौद्ध तथा जैन दोनों मतों का पोषक था।

➣ मत्स्य पुराण में बिम्बिसार को क्षेत्रौजस तथा जैन साहित्य में श्रेणिक कहा गया है।

➣ महावंश के अनुसार, बिंबिसार 15 वर्ष की आयु में मगध नरेश बना था। बिम्बिसार ने विजयों तथा वैवाहिक संबंधों के द्वारा अपने वंश का विस्तार किया।

➣ इसने लिच्छवी गणराज्य के शासक चेटक की पुत्री चेलना (छलना) के साथ विवाह कर मगध की उत्तरी सीमा सुरक्षित किया।

➣ दूसरा प्रमुख वैवाहिक संबंध कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला के साथ किया। इस वैवाहिक संबंध से उसे काशी का प्रांत (अथवा उसके कुछ ग्राम) प्राप्त हो गए।

➣ अन्य प्रमुख वैवाहिक संबंध मद्र देश (पंजाब) की राजकुमारी क्षेमा, जिसकी पहचान वैदेही वासवी से की गई है , के साथ करके मद्रों का सहयोग प्राप्त किया।

➣ बिम्बिसार का राजवैद्य जीवक राजगृह की गणिका सालवती का पुत्र था। जीवक का लालन-पालन बिम्बिसार के पुत्र राजकुमार अभय ने किया।

➣ बिम्बिसार ने जीवक को अवन्ति नरेश चण्डप्रद्योत की पीलिया (पाण्डु) नामक बीमारी को ठीक करने के लिए भेजा था। जिससे मैत्री संबंध स्थापित हुए।

➣ बिम्बिसार ने अंग देश के शासक ब्रह्मदत्त को पराजित कर उसे अपने राज्य में मिला लिया और अपने पुत्र अजातशत्रु को वहां का शासक नियुक्त किया।

➣ मगध की आरम्भिक राजधानी वसुमती या गिरिव्रज थी, जिसकी स्थापना वसु ने की थी। इसे कुशाग्रपुर भी कहते हैं।

➣ कालांतर में लिच्छवियों की बढ़ती शक्ति के कारण बिम्बिसार ने उत्तर की ओर नयी राजधानी राजगृह बनायी। जिसका वास्तुकार महागोविन्द था। मगध का वास्तुकार भी महागोविन्द ही था।

➣ मगध प्रतिद्वंदी अवन्ति राज्य था, जिसकी राजधानी उज्जैन थी। इसके राजा चण्डप्रद्योत महासेन का बिम्बिसार से युद्ध हुआ था। परन्तु दोनों में अंतत: समझौता हो गया।

➣ बिम्बिसार ने पहली बार मगध में सुदृढ़ शासन व्यवस्था की नींव डाली। बुद्धघोष के अनुसार बिम्बिसार के साम्राज्य में 80 हजार गांव थे तथा उसका विस्तार 300 लीग (लगभग 900 मील) था।

विनयपिटक से ज्ञात होता है कि इसने वेणुवन नामक उद्यान बुद्ध एवं संघ के निमित्त प्रदान किया था। दीघनिकाय से ज्ञात होता है कि बिंबिसार ने चंपा के ब्राह्मण को वहां की संपूर्ण आमदनी दान में दे दिया।

➣ बिम्बिसार ने भिक्षुओं के लिए तरपण्य (नदी पार शुल्क) समाप्त कर दिया था।

➣ बिंबिसार को अपने पुत्र अजातशत्रु द्वारा बंदी बनाकर कारागार में डालने का उल्लेख बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में मिलता है।

➣ बिंबिसार की मृत्यु 492 ई.पू. के लगभग हो गई।

अजातशत्रु (492 – 460 ई.पू.): साम्राज्य विस्तार का प्रतीक

➣ बिंबिसार के पश्चात इसका पुत्र कुणिक (अजातशत्रु ) मगध का शासक हुआ। औपापतित सूत्र में अजातशत्रु को देवनाम प्रिय कहा गया है।

देवदत्त के उकसाने पर अपने पिता बिम्बिसार की हत्या कर अजातशत्रु मगध का शासक बना। बौद्ध ग्रन्थ अजातशत्रु को पितृहन्ता घोषित करते हैं, जबकि जैन ग्रन्थ नहीं।

➣ लिच्छवियों से सुरक्षा के लिए अजातशत्रु ने राजगृह का दुर्गीकरण करवाया। अजातशत्रु ने ही सर्वप्रथम पाटलिपुत्र की महत्ता पहचानी एवं पाटलिपुत्र दुर्ग का निर्माण करवाया।

➣ लेकिन पाटलिपुत्र नगर की स्थापना और उसे राजधानी बनाने का कार्य उदायिन ने किया। पाटलिपुत्र की स्थापना अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदयन ने गंगा और सोन नदी के संगम पर एक किला बनाकर की थी।

➣ यह अपने पिता के समान ही साम्राज्यवादी था। अजातशत्रु ने वज्जि संघ, कोशल एवं काशी को मगध साम्राज्य में मिलाया।

➣ इसके शासन के प्रारंभिक वर्षों में मगध एवं कोशल राज्य के बीच संघर्ष शुरू हो गया। किंतु बाद में मगध के शासक अजातशत्रु तथा कोशल के शासक प्रसेनजित के बीच संधि हो गई।

➣ प्रसेनजित ने अपने पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु से कर दिया तथा पुनः काशी के ऊपर उसका अधिकार स्वीकार कर लिया।

➣ सुमंगल विलासिनी के अनुसार वज्जि संघ एवं अजातशत्रु के बीच संघर्ष का कारण गंगा नदी किनारे हीरों की खानें थी।

➣ अजातशत्रु ने लिच्छवी गणराज्य की राजधानी वैशाली को जीतकर मगध साम्राज्य का हिस्सा बना लिया था। इस प्रकार काशी और वैशाली को मिला लेने के बाद मगध का साम्राज्य और विस्तृत हो गया।

➣ जैन-ग्रंथों के अनुसार बिम्बिसार ने लिच्छवी राजकुमारी से उत्पन्न दो पुत्र हल्ल एवं बेहल्ल को अपना सेचनक नामक हाथी तथा बहुमूल्य 18 लड़ियों का हार दिया था।

➣ अजातशत्रु ने राजा बनने पर अपनी रानी पद्मावती के उकसाने पर इन्हें वापस माँगा। हल्ल एवं बेहल्ल अपने नाना चेटक के पास वैशाली चले गये। इस कारण अजातशत्रु ने वैशाली से युद्ध किया।

➣ मगध में वस्सकार (वर्षकार) एवं कोसल में दीर्घचारायण प्रभावशाली मन्त्री थे। इससे वज्जि संघ को जीतने में बड़ी आसानी हुई। अजातशत्रु का एक अन्य मंत्री सुनीधि (सुनीढ़) था।

➣ अजातशत्रु के मंत्री वस्सकार ने वैशाली के लिच्छवियों में फूट डाली थी। वस्सकार ने इस मामले में बुद्ध से सलाह ली थी। इस क्रम में वस्सकार ने बुद्ध से राजगृह (गृहकूट पर्वत) में मुलाकात की।

➣ अजातशत्रु के शासनकाल के 8वें वर्ष में बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ। उसनें राजगृह में स्तूप का निर्माण करवाया था।

➣ दीघ निकाय के अनुसार क्षत्रिय होने के आधार पर अजातशत्रु ने बुद्ध के अस्थि अवशेषों में हिस्सेदारी का दावा करते हुए कहा था कि बुद्ध भी खतिय (क्षत्रिय), मैं भी खतिय।

➣ इसी के काल में राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया, जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं को सुत्तपिटक तथा विनयपिटक के रूप में लिपिबद्ध किया गया।

➣ कालांतर में इसकी हत्या इसके पुत्र उदायिन ने कर दी थी।

➣ पुराणों के अनुसार 28 वर्ष तथा बौद्ध साक्ष्यों के अनुसार 32 वर्ष तक अजातशत्रु ने शासन किया।

उदायिन या उदयभद्र (460 – 444 ई.पू.): पाटलिपुत्र का संस्थापक

➣ उदायिन ने गंगा और सोन नदियों के संगम पर पाटलिपुत्र या कुसुमपुर नामक नगर की स्थापना की तथा राजगृह से अपनी राजधानी स्थानांतरित की।

➣ उदायिन जैन धर्मावलम्बी था।

➣ इसकी हत्या एक व्यक्ति ने छूरा भोंक कर दी थी। उदायिन के बाद उसके 3 पुत्रों (अनिरूद्ध, मुंडक और नागदशक अथवा दर्शक) ने क्रमवार राज्य किये। पुराणों अथवा कथाकोश में नागदशक का एक नाम दर्शक मिलता है।

➣ हर्यंक वंश के अंतिम शासक नागदशक या दर्शक को शिशुनाग नामक अमात्य एवं काशी (बनारस) के राज्यपाल ने अपदस्थ कर शिशुनाग वंश की नींव डाली।

शिशुनाग वंश : मगध का पश्चिमी विस्तार

➣ इस वंश का संस्थापक शिशुनाग था। यह वनारस के राजा का गर्वनर था। शिशु अवस्था में माता पिता ने उनका परित्याग कर दिया था। उसकी रक्षा एक नाग ने किया था इसलिए शिशुनाग के नाम से प्रसिद्ध हुए।

शिशुनाग (412 – 394 ई.पू.) : अवन्ति विजेता शासक

महावंश टीका में शिशुनाग को एक लिच्छवी राजा की वेश्या पत्नी से उत्पन्न कहा गया है। पुराणों के अनुसार वह क्षत्रिय था।

➣ शिशुनाग ने अवन्ति को जीतकर मगध साम्राज्य में मिलाया तथा वज्जियों पर नियंत्रण रखने के लिए पाटलिपुत्र के अतिरिक्त वैशाली को दूसरी राजधानी बनाया।

➣ इसकी सबसे बड़ी सफलता अवंति राज्य को जीतकर उसे मगध साम्राज्य में मिलाना था। शिशुनाग ने अवन्ति के शासक अवन्तिवर्धन को पराजित किया था।

➣ इस विजय के पश्चात शिशुनाग का वत्स के ऊपर भी अधिकार हो गया, क्योंकि वह अवंति के अधीन था। अवंति और वत्स पर अधिकार हो जाने से पश्चिमी विश्व के साथ पाटलिपुत्र को व्यापार-वाणिज्य के लिए एक नया मार्ग प्राप्त हो गया।

➣ अवंति की विजय शिशुनाग के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। इससे मगध साम्राज्य की पश्चिमी सीमा मालवा तक पहुंच गई। अब मगध साम्राज्य के अन्तर्गत बंगाल से लेकर मालवा तक का भू-भाग सम्मिलित था।

➣ शिशुनाग ने गिरिव्रज के अतिरिक्त वैशाली नगर को अपनी दूसरी राजधानी बनाई थी, जो बाद में उसकी प्रधान राजधानी बन गई।

प्राचीन भारत में जनता द्वारा चुना गया प्रथम ऐतिहासिक शासक शिशुनाग था। दूसरा बंगाल के पाल वंशीय शासक गोपाल प्रथम (750-770 ई.) है।

कालाशोक (394 – 366 ई.पू.)द्वितीय बौद्ध संगीति काल

महावंश के अनुसार, शिशुनाग की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कालाशोक राजा बना। पुराणों में कालाशोक को काकवर्ण कहा गया है।

➣ इसने अपनी राजधानी पुन: पाटलिपुत्र में स्थानांतरित कर लिया। इस समय के बाद पाटलिपुत्र में ही मगध की राजधानी रही।

सिंहली महाकाव्यों के अनुसार गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण लगभग सौ वर्ष बाद कालाशोक के शासनकाल के दसवें वर्ष में वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति (383 ई.पू.) का आयोजन हुआ। इस संगीति में बौद्ध संघ दो संप्रदायों स्थविर तथा महासंघिक में विभाजित हो गए।

बाणभट्ट के हर्षचरित से ज्ञात होता है कि राजधानी के समीप घूमते किसी व्यक्ति ने कालाशोक की हत्या कर दी।

महानंदिन (366-344 ई. पू.) : शिशुनाग वंश का अंतिम शासक

➣ महाबोधिवंश के अनुसार कालाशोक की हत्या के बाद उसके दस पुत्रों (1. भद्रसेन, 2. कोर्णदवर्ण, 3. मंगुरा, 4. सर्वज्ञजह, 5. जालिक, 6. उभक, 7. संजय, 8. कोर्व्य, 9. नंदीवर्धन, 10. पंचमक) ने संयुक्त रूप से 22 वर्षो तक शासन किया जिसमें सर्वप्रमुख महानन्दिन (नंदिवर्धन) था।

➣ कालाशोक के उत्तराधिकारियों का शासन 344 ई.पू. के लगभग समाप्त हो गया। महानंदिन शिशुनाग वंश का अंतिम शासक सिद्ध हुआ।

महापदमनंद ने शिशुनाग वंश को समाप्त कर एक नये राजवंश की स्थापना की जो नंद वंश के नाम से जाना गया।

नंद वंश: विशाल और समृद्ध साम्राज्य

➣ शिशुनाग वंश का अंत कर नंद वंश की स्थापना जिस व्यक्ति ने की, वह निम्न वर्ण से संबंधित था। विभिन्न ग्रंथों में उसका नाम भिन्न-भिन्न दिया गया है।

➣ पुराण में उसे महापद्म, जबकि महाबोधि वंश में उसे उग्रसेन कहा गया है। पुराणों के अनुसार, महापद्मनंद शिशुनाग वंश के अंतिम राजा महानदिन की शुद्ध स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।

➣ जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन के अनुसार, वह नापित (नाई) पिता और वेश्या माता का पुत्र था।

➣ खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख से पता चलता है कि नन्द राजा ने कलिंग को जीता एवं कलिंग से जिनसेन की प्रतिमा उठाकर ले गया तथा कलिंग में एक नहर का निर्माण भी करवाया।

पाणिनी महापद्मनन्द का मित्र था। पाणिनी का जन्म गांधार के शालातूर में हुआ था।

➣ महापद्मनन्द ने अपने जैन मंत्री कल्पक की सहायता से क्षत्रियों का विनाश किया था।

➣ नंद वंश में कुल राजा होने के कारण उन्हें नवनंद कहा जाता है। महाबोधि वंश के अनुसार, इनके नाम हैं-उग्रसेन, पण्डुक, पण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, गोविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त तथा धनानंद।

धनानंद नंद वंश का अंतिम सम्राट था। यूनानी लेखकों ने धनानन्द को अग्रेमीज कहा है। इसी शासक के समय में सिंकदर (326 ई.पू.) ने भारत में आक्रमण किया था।

➣ धनानंद के जैन अमात्य शकटाल तथा स्थूलभद्र थे। उपवर्ष, वररूचि, कात्यायन जैसे विद्वान भी नंद काल में ही उत्पन्न हुए थे।

दीपवंश एवं महावंश के अनुसार धनानन्द ने 80 करोड़ धनराशि गंगा के भीतर एक पर्वत गुफा में छिपा रखी थी। टर्नर ने महावंश के आधार पर नन्द शासकों को लालची बताया।

➣ संगम कवि मामलनूर एवं ह्वेनसांग ने भी नन्दों की अतुल्य सम्पत्ति का उल्लेख किया है। कथासरित्सागर के अनुसार नन्दों के पास 99 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं थी।

➣ जनता पर अत्यधिक कर लगाने के कारण जनता इससे असंतुष्ट थी। इसका लाभ चन्द्रगुप्त मौर्य ने उठाकर, चाणक्य की मदद से इसकी हत्या कर मौर्य वंश की स्थापना की थी।

नन्द वंश से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

  • नन्द शासकों ने जैन धर्म को प्रश्रय दिया।
  • नन्द वंश ने सर्वप्रथम वृहत् मगध साम्राज्य की स्थापना की थी।
  • युद्ध में हाथियों का सबसे पहले प्रयोग मगध राज्य ने किया।
  • नन्द वंश के विनाश में आजीवक धर्म की भूमिका रही।
  • पाणिनी, कात्यायन एवं पतंजलि को त्रिमुनि कहा जाता है।
  • कथा सरित्सागर के अनुसार अयोध्या नन्दों की महत्वपूर्ण छावनी थी।
  • अष्टाध्यायी के अनुसार नन्द शासकों ने माप-तौल की नई प्रणाली नंदोपक्रमाणिमानानि चलाई थी।

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