बौद्ध धर्म MCQ प्रश्न | UPSC

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत बौद्ध धर्म MCQ प्रश्न
1. गौतम बुद्ध का महापरिनिब्बान जिस राज्य में हुआ था, वह है-
(a) अंग
(b) मगध
(c) मल्ल
(d) वत्स
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण मल्ल गणराज्य की राजधानी कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। 483 ई.पू. में 80 वर्ष की आयु में उन्होंने यहीं शरीर त्याग किया। इससे पहले वे पावा (जो भी मल्ल गणराज्य का ही एक नगर था) में चुंद लुहार के घर भोजन करने गए थे, जहाँ ‘सूकरमद्दव’ खाने से उन्हें रक्तातिसार हो गया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के अंतिम शिष्य का नाम सुभद्र था, जिन्हें उन्होंने कुशीनारा में ही दीक्षा दी थी। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि-अवशेषों (धातु) को आठ भागों में बाँटा गया और उन पर स्तूप बनाए गए।
2. निम्नलिखित में से किस राजवंश के अभिलेख से इस परंपरा का समर्थन होता है कि लुम्बिनी शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म स्थान था?
(a) मौर्य
(b) शुंग
(c) सातवाहन
(d) कुषाण
U.P. U.D.A. L.D.A. (Pre) 2006
उत्तर-(a)
मौर्य सम्राट अशोक के रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख (लुम्बिनी, नेपाल में स्थित) से यह प्रमाण मिलता है कि शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था। अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष इस स्थान की तीर्थयात्रा की और यहाँ एक स्तंभ स्थापित किया। अभिलेख में लुम्बिनी गाँव को धार्मिक कर (बलि) से मुक्त करने और भू-कर को घटाकर 1/8 करने का उल्लेख भी मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा में लिखा गया है। लुम्बिनी वर्तमान में नेपाल के रूपन्देही जिले में स्थित है और इसे यूनेस्को ने 1997 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है।
3. गौतम बुद्ध का जन्म कब हुआ था?
(a) 563 ई. पू.
(b) 558 ई. पू.
(c) 561 ई. पू.
(d) 544 ई. पू.
M.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(a)
गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल के लुम्बिनी वन में हुआ था। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के प्रधान (राजा) थे और माता महामाया (माया देवी) कोलिय वंश की राजकुमारी थीं। माता की मृत्यु जन्म के सातवें दिन हो गई थी, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी (विमाता) महाप्रजापति गौतमी ने किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिद्धार्थ के जन्म पर ज्योतिषी आसित (कालदेवल) ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो महान चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या महान संन्यासी। उन्होंने 16 वर्ष की आयु में यशोधरा से विवाह किया और उनके पुत्र का नाम राहुल था।
4. निम्नलिखित में से कौन एक अशोक का अभिलेख इस परंपरा की पुष्टि करता है कि गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था?
(a) बसाढ़ स्तंभ अभिलेख
(b) निगाली सागर स्तंभ अभिलेख
(c) रामपुरवा स्तंभ अभिलेख
(d) रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख
U.P.U.D.A/L.D.A. (Mains) 2010
उत्तर-(d)
अशोक का रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख (वर्तमान नेपाल में स्थित) स्पष्ट रूप से पुष्टि करता है कि गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था। इसमें उल्लेख है कि अशोक ने स्वयं आकर उस जन्म-स्थल की पूजा की और एक प्रस्तर स्तंभ खड़ा करवाया। निगाली सागर स्तंभ अभिलेख में बुद्ध कनकमुनि के स्तूप को दोगुना करने का उल्लेख है, जबकि रामपुरवा स्तंभ पर कोई धार्मिक अभिलेख नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रुम्मिनदेई अभिलेख की खोज 1896 ई. में जर्मन पुरातत्त्वविद् डॉ. एंटोन फ्युरर ने की थी। यह अभिलेख अशोक के तीर्थयात्रा (धम्मयात्रा) का भी प्रमाण है, जो बौद्ध तीर्थ-स्थलों की यात्रा से संबंधित थी।
5. बुद्ध के जीवन की किस घटना को ‘महाभिनिष्क्रमण’ के रूप में जाना जाता है?
(a) उनका महापरिनिर्वाण
(b) उनका जन्म
(c) उनका गृहत्याग
(d) उनका प्रबोधन
M.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(c)
29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने सांसारिक जीवन त्याग दिया, जिसे बौद्ध साहित्य में ‘महाभिनिष्क्रमण’ (महान गृह-त्याग) कहा गया है। इसके पीछे चार दृश्यों (वृद्ध व्यक्ति, रोगी, शव और एक प्रसन्नचित्त संन्यासी) का बहुत बड़ा योगदान था। गृहत्याग की रात उन्होंने अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को सोता हुआ छोड़कर अपने सारथी चन्ना के साथ कंथक नामक घोड़े पर सवार होकर कपिलवस्तु छोड़ा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गृहत्याग के बाद सिद्धार्थ ने सर्वप्रथम वैशाली में आलार कालाम के आश्रम में और फिर राजगृह में उद्दक रामपुत्त के पास शिक्षा ग्रहण की। बोधगया में बोधि वृक्ष (पीपल) के नीचे 6 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में उन्हें ज्ञान (सम्बोधि) की प्राप्ति हुई।
6. बुद्ध का जन्म हुआ था-
(a) वैशाली
(b) लुम्बिनी
(c) कपिलवस्तु
(d) पाटलिपुत्र
U.P.P.C.S. (Pre) 2002
M.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(b)
गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था, जो कपिलवस्तु के निकट स्थित एक वन-उद्यान था। उनकी माता माया देवी अपने मायके देवदह जाते समय लुम्बिनी में रुकी थीं, जहाँ उन्होंने एक शाल वृक्ष की डाल पकड़ते हुए सिद्धार्थ को जन्म दिया। लुम्बिनी वर्तमान नेपाल के रूपन्देही जिले में स्थित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध का जन्म, ज्ञान-प्राप्ति (सम्बोधि) और महापरिनिर्वाण — तीनों घटनाएँ वैशाख पूर्णिमा के दिन हुई थीं, इसीलिए वैशाख पूर्णिमा को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है।
7. गौतम बुद्ध की मां किस वंश से सम्बंधित थी?
(a) शाक्य वंश
(b) माया वंश
(c) लिच्छवि वंश
(d) कोलिय वंश
U.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(d)
गौतम बुद्ध की माता माया देवी कोलिय गणराज्य के शासक अंजन की पुत्री थीं, अतः वे कोलिय वंश से संबंधित थीं। कोलिय गणराज्य की राजधानी देवदह थी, जो शाक्य गणराज्य के निकट स्थित थी। उल्लेखनीय है कि शाक्य और कोलिय दोनों गणराज्य रोहिणी नदी के किनारे बसे थे और इन दोनों में वैवाहिक संबंध प्रचलित थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध की मौसी एवं विमाता महाप्रजापति गौतमी भी कोलिय वंश की ही थीं। उन्होंने बाद में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और वे बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली प्रथम महिला (भिक्षुणी) बनीं।
8. निम्न में से कौन-सा नाम बुद्ध का दूसरा नाम है?
(a) पार्थ
(b) प्रच्छन्न
(c) मिहिर
(d) गुडाकेश
Chhattisgarh U.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने इस प्रश्न का उत्तर (c) मिहिर जारी किया है, हालाँकि यह विवादास्पद है। वस्तुतः गौतम बुद्ध के प्रसिद्ध नाम हैं — सिद्धार्थ (जन्म नाम), गौतम (गोत्र नाम), शाक्यमुनि (शाक्य कुल के मुनि), तथागत (जो सत्य को प्राप्त कर चुके हैं), और बुद्ध (ज्ञान प्राप्त करने वाले)। ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ (छिपा हुआ बौद्ध) आदि शंकराचार्य की उपाधि थी, और पार्थ तथा गुडाकेश अर्जुन के नाम हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘तथागत’ शब्द का अर्थ है — ‘जो इसी मार्ग से आया और इसी मार्ग से गया’। बुद्ध ने स्वयं अपने लिए ‘तथागत’ संबोधन का सर्वाधिक प्रयोग किया है। ‘सम्मासम्बुद्ध’ भी उनका एक विशेष नाम है, जिसका अर्थ है — स्वयं के प्रयास से सम्यक् ज्ञान प्राप्त करने वाले।
9. निम्नलिखित में से किस राजा के एक अभिलेख से सूचना मिलती है कि शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था?
(a) अशोक
(b) कनिष्क
(c) हर्ष
(d) धर्मपाल
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
उत्तर-(a)
मौर्य सम्राट अशोक के रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख से यह महत्वपूर्ण सूचना मिलती है कि शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था। अशोक ने यहाँ एक अश्वशीर्ष (घोड़े के मस्तक वाला) स्तंभ स्थापित करवाया तथा लुम्बिनी को ‘लुम्बिनीग्राम’ नाम देते हुए इसे करमुक्त किया। कनिष्क, हर्ष और धर्मपाल के अभिलेखों में बुद्ध के जन्मस्थान लुम्बिनी का उल्लेख नहीं मिलता।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक की इस धम्मयात्रा का विवरण उनके 8वें शिला अभिलेख में भी मिलता है, जिसमें बताया गया है कि उन्होंने बोधगया (जहाँ बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ) की भी यात्रा की थी। चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्रा-विवरणियों में लुम्बिनी और अशोक स्तंभ का उल्लेख किया है।
10. महात्मा बुद्ध का ‘महापरिनिर्वाण’ कहां हुआ?
(a) लुम्बिनी में
(b) बोधगया में
(c) कुशीनगर में
(d) कपिलवस्तु में
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
53t to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण 483 ई.पू. में कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर, उत्तर प्रदेश) में हुआ था, जो मल्ल गणराज्य की राजधानी थी। अंतिम समय में वे दो शाल वृक्षों के बीच उत्तर की ओर सिर करके लेट गए थे। उनके अंतिम शब्द थे — “वय धम्मा संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ” अर्थात् “सभी संयोगज वस्तुएं क्षणभंगुर हैं, अप्रमाद से साधना करो।”
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म में चार पवित्र तीर्थ स्थल हैं — लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ (प्रथम उपदेश/धम्मचक्कपवत्तन) और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण)। कुशीनगर में 1876 ई. में ए. कार्लाइल ने पुरातात्विक उत्खनन द्वारा महापरिनिर्वाण मंदिर की खोज की थी।
11. महात्मा बुद्ध ने अपना पहला ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ किस स्थान पर दिया था ?
(a) लुम्बिनी में
(b) सारनाथ
(c) पाटलिपुत्र में
(d) वैशाली में
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
M.P.P.C.S. (Pre) 1991 1999
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(b)
बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध वाराणसी के निकट ऋषिपत्तन (आधुनिक सारनाथ) पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपने पाँच पूर्व-साथी ब्राह्मण तपस्वियों को पहला उपदेश दिया। इस ऐतिहासिक प्रथम उपदेश को बौद्ध परंपरा में ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस उपदेश में बुद्ध ने ‘मध्यम मार्ग’ और ‘अष्टांगिक मार्ग’ की शिक्षा दी, जो बौद्ध दर्शन का आधार है। सारनाथ में अशोक ने एक विशाल स्तूप और स्तंभ का निर्माण कराया था, जिसके शीर्ष पर बना ‘सिंह-चतुर्मुख’ आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है।
12. निम्नलिखित में से कौन-सा एक बौद्ध मत में निर्माण की अवधारणा की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या करता है?
(a) तृष्णारूपी अग्नि का शमन
(b) स्वयं की पूर्णतः अस्तित्वहीनता
(c) परमानंद एवं विश्राम की स्थिति
(d) धारणातीत मानसिक अवस्था
I.A.S. (Pre) 2013
उत्तर-(a)
बौद्ध दर्शन में ‘निर्वाण’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है — ‘बुझ जाना’ अथवा ‘शांत हो जाना’। बुद्ध के अनुसार समस्त दुःखों का मूल कारण तृष्णा (इच्छा) है। जब तृष्णा, द्वेष और अज्ञान रूपी तीन विकार पूरी तरह शांत हो जाते हैं, तब निर्वाण की प्राप्ति होती है — ठीक उसी प्रकार जैसे ईंधन न मिलने पर अग्नि स्वयं बुझ जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध ग्रंथों में दो प्रकार के निर्वाण का उल्लेख है — ‘सोपादिशेष निर्वाण’ (जीवनकाल में प्राप्त) और ‘परिनिर्वाण’ (मृत्यु के उपरांत पूर्ण मुक्ति)। बुद्ध को 35 वर्ष की आयु में बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के समय सोपादिशेष निर्वाण और 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में परिनिर्वाण प्राप्त हुआ।
13. आलार कालाम कौन थे?
(a) बुद्ध के एक शिष्य
(b) एक प्रतिष्ठित बौद्ध भिक्षु
(c) बुद्धकालीन एक शासक
(d) बुद्ध के एक गुरु
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(d)
गृह-त्याग (महाभिनिष्क्रमण) के पश्चात सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ज्ञान की खोज में भटकते हुए आलार कालाम के आश्रम पहुँचे और उनसे शिक्षा ग्रहण की। आलार कालाम सांख्य दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य थे। उनसे शिक्षा प्राप्त कर सिद्धार्थ ने ‘आकिञ्चन्यायतन समाधि’ की अवस्था प्राप्त कर ली, परंतु उन्हें इससे पूर्ण संतोष नहीं मिला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आलार कालाम के बाद सिद्धार्थ ने एक अन्य गुरु ‘उद्दक रामपुत्त’ से भी शिक्षा ली, किंतु वहाँ भी उन्हें अपेक्षित ज्ञान नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र साधना का मार्ग चुना और अंततः बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया।
14. गौतम बुद्ध ने किस स्थान पर निर्वाण प्राप्त किया ?
(a) कुशीनारा
(b) श्रावस्ती
(c) लुम्बिनी
(d) सारनाथ
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
M.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(*)
बौद्ध धर्म में ‘निर्वाण’ का अर्थ है — समस्त सांसारिक दुःखों और तृष्णाओं से पूर्ण मुक्ति। गौतम बुद्ध को यह निर्वाण (ज्ञान-प्राप्ति) बिहार के बोधगया में वर्तमान महाबोधि वृक्ष के नीचे प्राप्त हुई थी, न कि किसी अन्य स्थान पर — इसीलिए इस प्रश्न का उत्तर (*) अर्थात् ‘कोई विकल्प नहीं’ है। प्रश्न में दिया गया विकल्प (a) ‘कुशीनारा’ बुद्ध के महापरिनिर्वाण (मृत्यु) का स्थान है, निर्वाण (ज्ञान-प्राप्ति) का नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बोधगया का महाबोधि मंदिर परिसर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है (2002 से)। बुद्ध को यहाँ लगभग 528 ई.पू. में वैशाख पूर्णिमा की रात ज्ञान प्राप्त हुआ था।
15. महापरिनिर्वाण मंदिर अवस्थित है-
(a) कुशीनगर में
(b) सारनाथ में
(c) बोधगया में
(d) श्रावस्ती में
U.P. Lower Sub. (Mains) 2015
उत्तर-(a)
महापरिनिर्वाण मंदिर उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। यहीं पर 483 ई.पू. में 80 वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध को महापरिनिर्वाण (मृत्यु) प्राप्त हुआ था। मंदिर में लेटी हुई बुद्ध की विशाल मूर्ति 1876 ई. में ब्रिटिश पुरातत्वविद् ए. कनिंघम के निर्देशन में हुए उत्खनन में प्राप्त हुई थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मूर्ति चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसकी लंबाई लगभग 6.1 मीटर है। कुशीनगर बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों — लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर — में से एक है।
16. महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण किसके गणतंत्र में हुआ था ?
(a) नल्लों के
(b) लिच्छवियों के
(c) शाक्यों के
(d) पालों के
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(a)
महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण कुशीनगर (प्राचीन कुशीनारा) में हुआ था, जो उस समय ‘मल्ल गणराज्य’ (नल्लों के गणतंत्र) का भाग था। बुद्ध की मृत्यु के पश्चात मल्लों ने उनके पार्थिव शरीर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों (रेलिक्स) को आठ भागों में विभाजित किया गया और विभिन्न राज्यों में उनके ऊपर स्तूपों का निर्माण कराया गया, जिन्हें ‘धातु-स्तूप’ कहा जाता है। मल्ल गणराज्य के दो प्रमुख केंद्र कुशीनारा और पावा थे।
17. गौतम बुद्ध द्वारा अपने धर्म में दीक्षित किया जाने वाला अंतिम व्यक्ति निम्नलिखित में से कौन था ?
(a) आनंद
(b) सारिपुत
(c) मोग्गलान
(d) सुभद्द
U.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(d)
अपने जीवन के अंतिम दिनों में बुद्ध पावा नगर में अपने शिष्य चुंद के घर रुके, जहाँ उन्होंने ‘सूकरमाद्दव’ नामक भोजन ग्रहण किया। इससे वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए। तत्पश्चात वे कुशीनगर पहुँचे और यहाँ सुभद्द नामक परिव्राजक को अपना अंतिम उपदेश देकर उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुभद्द एक वृद्ध ब्राह्मण परिव्राजक थे, जो बुद्ध से मिलना चाहते थे। प्रारंभ में आनंद ने उन्हें रोका, किंतु बुद्ध ने स्वयं उन्हें बुलाया। सुभद्द को ‘बुद्ध का अंतिम शिष्य’ (पच्छिमसावक) कहा जाता है।
19. बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु कहां विताई थी ?
(a) श्रावस्ती में
(b) वैशाली में
(c) कुशीनगर में
(d) सारनाथ में
U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
U.P.P.C.S. (Mains) 2015
उत्तर-(c)
पालि ग्रंथ ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ के अनुसार बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु (वर्षावास) वैशाली में बिताई थी। वैशाली उस समय लिच्छवि गणराज्य की राजधानी थी। वहाँ उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद को अपने शीघ्र परिनिर्वाण का संकेत दिया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैशाली का ऐतिहासिक महत्त्व इस दृष्टि से भी है कि यहाँ बुद्ध की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष पश्चात द्वितीय बौद्ध संगीति (सभा) का आयोजन हुआ था। इसके अतिरिक्त, वैशाली में बुद्ध ने महिलाओं को पहली बार बौद्ध संघ में प्रवेश की अनुमति दी और अपनी मौसी महाप्रजापति गौतमी को भिक्षुणी के रूप में दीक्षित किया।
20. निम्नलिखित राज्यों में से किनका संबंध बुद्ध के जीवन से था?
1. अवंति
2. गांधार
3. कोसल
4.मगध
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
(a) 1, 2 और 3
(b) 2 और 4
(c) केवल 3 और 4
(d) 1, 3 और 4
I.A.S. (Pre) 2014
I.A.S. (Pre) 2015
उत्तर-(c)
दिए गए महाजनपदों में से केवल कोसल और मगध का सीधा संबंध गौतम बुद्ध के जीवन से था। बुद्ध ने मगध में राजगृह और नालंदा क्षेत्रों में तथा कोसल में श्रावस्ती और साकेत में धर्म-प्रचार किया था। कोसल-नरेश प्रसेनजित और मगध-नरेश बिम्बिसार दोनों बुद्ध के प्रमुख अनुयायी थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मगध-नरेश बिम्बिसार ने बुद्ध को राजगृह के निकट ‘वेणुवन’ (बाँस का उपवन) दान में दिया था, जो बौद्ध संघ का पहला स्थायी विहार बना। अवंति और गांधार में बौद्ध धर्म का प्रसार बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनके शिष्यों द्वारा हुआ।
21. ‘सप्तपर्णी गुफा’ स्थित है-
(a) सांची में
(b) नालंदा में
(c) राजगृह में
(d) पावापुरी में
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
सप्तपर्णी गुफा बिहार के राजगृह (वर्तमान राजगीर) में स्थित है। यहीं बुद्ध की मृत्यु (483 ई.पू.) के तुरंत बाद प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था, जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं को सुत्तपिटक और विनयपिटक में संकलित किया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजगृह मगध साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी थी और पाँच पहाड़ियों से घिरी होने के कारण इसे ‘पंचपहाड़ी नगर’ भी कहा जाता था। सप्तपर्णी गुफा का नाम ‘सप्तपर्ण’ (सात पत्तों वाले) वृक्षों की अधिकता के कारण पड़ा।
22. बुद्ध कौशाम्बी किसके राज्य काल में आए थे?
(a) शतानीक
(b) उदयन
(c) बोधि
(d) निचक्षु
U.P.U.D.A./L.D.A. (Pre) 2010
उत्तर-(b)
महात्मा बुद्ध वत्स महाजनपद के राजा उदयन के शासनकाल में कौशाम्बी आए थे। उदयन ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद घोषिताराम विहार संघ को दान में दिया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौशाम्बी (वर्तमान उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के निकट) वत्स महाजनपद की राजधानी थी और यमुना नदी के तट पर बसी थी। यह नगर व्यापार का प्रमुख केंद्र था तथा बुद्धकाल में 16 महाजनपदों में से एक वत्स की राजधानी के रूप में विशेष महत्त्व रखता था।
23. बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिए थे-
(a) वैशाली में
(b) श्रावस्ती में
(c) कौशाम्बी में
(d) राजगृह में
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(b)
गौतम बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश कोसल राज्य की राजधानी श्रावस्ती में दिए। यहाँ उनके सबसे अधिक शिष्य बने और वे जेतवन विहार में दीर्घकाल तक रहे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जेतवन विहार की स्थापना कोसल के धनी व्यापारी अनाथपिंडक (सुदत्त) ने राजकुमार जेत से भूमि खरीदकर की थी। कहा जाता है कि उन्होंने उस भूमि को स्वर्णमुद्राओं से ढककर खरीदा था। बुद्ध ने अपने जीवन के 25 वर्षावास (वर्षाकालीन प्रवास) में से अधिकांश श्रावस्ती में ही बिताए।
24. बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहां दिया था ?
(a) काशी
(b) सारनाथ
(d) बोधगया
(c) कुशीनगर
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (वाराणसी के निकट) के मृगदाव (हिरण उद्यान) में अपने पाँच पूर्व साथी साधकों को दिया था। इस घटना को ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जिन पाँच शिष्यों को यह प्रथम उपदेश मिला, वे थे — कौण्डिन्य, वप्प, भद्दिय, महानाम और अस्सजि। इन्हें ‘पंचवर्गीय भिक्षु’ कहते हैं। इन्हीं पाँचों के साथ बौद्ध संघ की स्थापना हुई, जो बौद्ध धर्म के ‘त्रिरत्न’ (बुद्ध, धम्म, संघ) का आधार बना।
25. सारनाथ में अपना प्रथम वचन किसने दिया?
(a) महावीर
(b) शंकराचार्य
(c) महात्मा बुद्ध
(d) गुरु नानक
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(c)
सारनाथ में प्रथम उपदेश महात्मा बुद्ध ने दिया था, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। यह स्थान वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ को ‘ऋषिपत्तन’ और ‘मृगदाव’ के नाम से भी जाना जाता था। यहाँ सम्राट अशोक ने बाद में एक स्तूप और प्रसिद्ध अशोक स्तंभ का निर्माण करवाया, जिसके शीर्ष पर चार सिंहों की आकृति है — यही ‘सिंह-चतुर्मुख’ आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।
26. गौतम बुद्ध अपना प्रथम उपदेश कहां दिए थे?
(a) वैशाली
(b) कौशाम्च
(c) सारनाथ
(d) पावापुरी
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
उत्तर-(c)
गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था। बौद्ध साहित्य में इस उपदेश को ‘धम्मचक्कपवत्तन सुत्त’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें बुद्ध ने चार आर्य सत्यों और अष्टांगिक मार्ग का विस्तार से वर्णन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के चार आर्य सत्य हैं — (1) दुख, (2) दुख का कारण (तृष्णा), (3) दुख का निरोध (निर्वाण), और (4) दुख निरोध का मार्ग (अष्टांगिक मार्ग)। अष्टांगिक मार्ग को ‘मध्यम प्रतिपदा’ भी कहते हैं क्योंकि यह अति-भोग और अति-कठोर तपस्या दोनों के बीच का मार्ग है।
27. ग्रंथों में उल्लिखित ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ है-
(a) उनका (बुद्ध का) दर्शन
(b) सारनाथ में दिया गया उनका प्रथम उपदेश
(c) उनके धार्मिक आदर्श
(d) बौद्ध अनुष्ठान
U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(b)
‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ का शाब्दिक अर्थ है — ‘धर्म के चक्र को गतिमान करना’। यह सारनाथ में बुद्ध द्वारा पाँच शिष्यों को दिए गए प्रथम उपदेश को संदर्भित करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ की तिथि को बौद्ध धर्म में ‘आषाढ़ पूर्णिमा’ (गुरु पूर्णिमा) के रूप में मनाया जाता है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अंकित ‘अशोक चक्र’ वास्तव में धर्मचक्र का ही प्रतीक है, जो इसी धर्मचक्रप्रवर्तन की स्मृति में सारनाथ के अशोक स्तंभ से लिया गया है।
28. ‘धर्मचक्रप्रवर्तन किया गया था-
(a) सांची में
(b) श्रावस्ती में
(c) सारनाथ में
(d) वैशाली में
U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
उत्तर-(c)
धर्मचक्रप्रवर्तन सारनाथ में हुआ था। यह स्थल बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाओं में से एक का साक्षी है — जन्म (लुंबिनी), ज्ञान प्राप्ति (बोधगया), प्रथम उपदेश (सारनाथ) और महापरिनिर्वाण (कुशीनगर)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इन चार पवित्र स्थलों को बौद्ध धर्म में ‘चतुर्महास्थान’ कहा जाता है। सारनाथ में स्थित ‘धमेख स्तूप’ उसी स्थान पर बना है जहाँ बुद्ध ने पहला उपदेश दिया था; इस स्तूप का निर्माण मूलतः सम्राट अशोक ने करवाया था।
29. बुद्ध की मृत्यु के पश्चात प्रथम बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की गई-
(a) महाकस्सप द्वारा
(b) धर्मसेन द्वारा
(c) अजातशत्रु द्वारा
(d) नागसेन द्वारा
U.P.P.C.S. (Pre) 2000
उत्तर-(a)
प्रथम बौद्ध संगीति लगभग 483 ई.पू. में राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता महाकस्सप ने की। इसमें बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद (धम्म/सुत्त के प्रमाण) और उपालि (विनय के प्रमाण) उपस्थित थे। तत्कालीन मगध सम्राट अजातशत्रु ने इसे संरक्षण प्रदान किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुल चार प्रमुख बौद्ध संगीतियाँ हुईं — प्रथम (राजगृह, अजातशत्रु के काल में), द्वितीय (वैशाली, कालाशोक के काल में), तृतीय (पाटलिपुत्र, अशोक के काल में), और चतुर्थ (कुंडलवन, कश्मीर, कनिष्क के काल में)। तृतीय संगीति में मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में अभिधम्मपिटक को भी संकलित किया गया।
30. प्रथम बौद्ध परिषद का संचालन निम्नलिखित में से किस एक ने किया ?
(a) आनंद
(b) महाकस्सप
(d) मोग्गलिपुत्त
(d) उपालि
U.P.U.D.A./L.D.A. (Mains) 2010
उत्तर-(b)
प्रथम बौद्ध परिषद (संगीति) का संचालन महाकस्सप ने किया था। महाकस्सप बुद्ध के सबसे वरिष्ठ और प्रमुख शिष्यों में से एक थे और बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात बौद्ध संघ के प्रमुख नेता बने।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महाकस्सप को बौद्ध परंपरा में ‘धुतगुण’ (कठोर तपस्या) के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। ज़ेन बौद्ध परंपरा में महाकस्सप को ‘पुष्पगाथा’ (Flower Sermon) की कथा के माध्यम से विशेष महत्त्व दिया जाता है — कहा जाता है कि बुद्ध ने एक बार बिना कुछ बोले केवल एक फूल उठाया और महाकस्सप ही एकमात्र शिष्य थे जो मुस्कुराए, जिससे बुद्ध ने उन्हें मौन ज्ञान (अव्यक्त धर्म) का उत्तराधिकारी घोषित किया।
31. द्वितीय बौद्ध समिति का आयोजन कहां हुआ था ?
(a) राजगृह में
(b) वैशाली में
(c) पाटलिपुत्र में
(d) काशी (वाराणसी) में
U.P.R.O/A.R.O. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन बुद्ध की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष पश्चात् कालाशोक के शासनकाल में वैशाली में हुआ था। इस संगीति का मुख्य कारण बौद्ध भिक्षुओं के बीच अनुशासन (विनय) संबंधी 10 विवादास्पद बिंदुओं पर उत्पन्न मतभेद था। इस संगीति की अध्यक्षता सब्बकामी ने की थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी द्वितीय संगीति के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म पहली बार दो शाखाओं — स्थविरवाद (Theravada) और महासांघिक — में विभाजित हुआ, जो आगे चलकर हीनयान और महायान संप्रदायों के विकास का आधार बनीं। वैशाली उस काल में लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी और बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र था।
32. चतुर्थ बौद्ध संगीति (परिषद) हुई
(a) कनिष्क के शासनकाल
(b) अशोक के शासनकाल में
(c) हर्षवर्धन के शासनकाल में
(d) मेनाण्डर के शासनकाल में
U.P.R.O./ A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(a)
चतुर्थ बौद्ध संगीति कुषाण वंश के महान सम्राट कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित हुई थी। इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की और उपाध्यक्ष के रूप में प्रसिद्ध कवि एवं दार्शनिक अश्वघोष ने भूमिका निभाई। इस संगीति में बौद्ध ग्रंथों के जटिल अंशों पर विचार-विमर्श कर उन्हें ‘विभाषाशास्त्र’ नामक टीकाओं में संकलित किया गया। इसी संगीति के बाद बौद्ध धर्म औपचारिक रूप से हीनयान और महायान — दो स्पष्ट संप्रदायों में बँट गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह एकमात्र बौद्ध संगीति थी जो संस्कृत भाषा में संपन्न हुई, जबकि पूर्ववर्ती तीनों संगीतियाँ पालि भाषा में आयोजित की गई थीं। कनिष्क ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए मध्य एशिया तक स्तूपों और विहारों का निर्माण कराया था।
33. निम्नलिखित चार स्थानों में हुई बौद्ध संगीतियों का सही कालक्रम नीचे दिए हुए कूट से ज्ञात करें-
1. वैशाली
2. राजगृह
3. कुंडलवन
4. पाटलिपुत्र
कूट :
(a) 1, 2, 3, 4
(b) 4, 3, 2, 1
(c) 2, 1, 3, 4
(c) 2, 1, 4, 3
U.P. Lower Sub. (Pre) 2002
उत्तर-(d)
चारों बौद्ध संगीतियों का सही कालक्रम इस प्रकार है — प्रथम संगीति: राजगृह (अजातशत्रु के काल में, बुद्ध की मृत्यु के तत्काल बाद); द्वितीय संगीति: वैशाली (कालाशोक के काल में, लगभग 100 वर्ष बाद); तृतीय संगीति: पाटलिपुत्र (अशोक के काल में, मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में); चतुर्थ संगीति: कुंडलवन/कश्मीर (कनिष्क के काल में, वसुमित्र की अध्यक्षता में)। अतः सही क्रम है — 2, 1, 4, 3।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र) में मोग्गलिपुत्त तिस्स ने ‘कथावत्थु’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो अभिधम्म पिटक का महत्त्वपूर्ण भाग है। इसी संगीति में अशोक ने विभिन्न देशों में धर्म प्रचार के लिए दूत मंडल भेजने का निर्णय लिया, जिसके तहत उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा श्रीलंका गए।
34. इनमें से किस शासक ने चतुर्थ बौद्ध संगीति कश्मीर में आयोजित की ?
(a) अशोक
(b) अजातशत्रु
(c) कनिष्क
(d) कालाशोक
66th B.P.S.C. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति कुषाण सम्राट कनिष्क के संरक्षण में हुई थी। कनिष्क ने इस संगीति के लिए कुंडलवन (कश्मीर) में एक विशेष विहार का निर्माण कराया था। वसुमित्र इसके अध्यक्ष तथा अश्वघोष उपाध्यक्ष थे। इस संगीति में महासांघिकों का प्रभाव प्रमुख था और बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयान व महायान में हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क को ‘बौद्ध धर्म का द्वितीय अशोक’ भी कहा जाता है। उन्होंने अफगानिस्तान के पेशावर (पुरुषपुर) में एक विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था, जो उस काल की सबसे ऊँची संरचनाओं में से एक था।
35. भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद पहली बौद्ध संगीति हुई थी-
(a) राजगृह (राजगीर) में
(b) गया में
(c) पाटलिपुत्र में
(d) वैशाली में
B.P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(a)
भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण (483 ई.पू., कुशीनगर में) के तत्काल बाद प्रथम बौद्ध संगीति मगध नरेश अजातशत्रु के शासनकाल में राजगृह (वर्तमान राजगीर, बिहार) की सप्तपर्णि गुफा में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता महाकस्सप (महाकाश्यप) ने की। इसमें बुद्ध के उपदेशों को दो भागों — धम्म (सुत्तपिटक) और विनय (विनयपिटक) — में संकलित किया गया। आनंद ने धम्म और उपालि ने विनय का वाचन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रथम बौद्ध संगीति में लगभग 500 अरहतों (बौद्ध भिक्षुओं) ने भाग लिया था। इस संगीति में अभिधम्म पिटक को शामिल नहीं किया गया था; इसे बाद की संगीतियों में जोड़ा गया। यह संगीति वर्षाकाल के दौरान तीन महीनों तक चली थी।
36. निम्नलिखित पर विचार कीजिए-
1. बुद्ध में देवत्वारोपण
2. बोधिसत्व के पथ पर चलना
3. मूर्ति उपासना तथा अनुष्ठान
उपर्युक्त में से कौन-सी विशेषता / विशेषताएं महायान बौद्ध मत की है / हैं ?
I.A.S. (Pre) 2019
उत्तर-(d)
महायान बौद्ध मत की तीनों उल्लिखित विशेषताएँ सत्य हैं। महायान में बुद्ध को एक दैवीय और लोकोत्तर सत्ता माना गया है, जो अनेक रूपों और अवतारों में प्रकट होते हैं — यह हिंदू धर्म के प्रभाव का परिणाम था। ‘बोधिसत्व’ की अवधारणा महायान की केंद्रीय विशेषता है — वे वे प्राणी हैं जो स्वयं निर्वाण की कगार पर होते हुए भी समस्त जीवों की मुक्ति के लिए संसार में बने रहते हैं। मूर्तिपूजा और अनुष्ठान भी महायान की प्रमुख पद्धति बन गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हीनयान (थेरवाद) में बुद्ध को मात्र एक महापुरुष (मनुष्य) माना जाता है, जबकि महायान में वे ईश्वर तुल्य हो जाते हैं। महायान बौद्ध धर्म तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में प्रचलित है, जबकि हीनयान (थेरवाद) श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड में प्रमुख है।
37. किस शासक के काल में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर में हुआ था?
(a) अशोक
(b) कालाशोक
(c) कनिष्क
(d) अजातशत्रु
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2010
LA.S. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
चतुर्थ बौद्ध संगीति कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित हुई थी। कनिष्क कुषाण वंश के सबसे शक्तिशाली सम्राट थे जिनका साम्राज्य मध्य एशिया से उत्तर भारत तक विस्तृत था। वसुमित्र इसके अध्यक्ष थे और अश्वघोष उपाध्यक्ष। इस संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान और महायान संप्रदायों में विभक्त हुआ तथा ‘विभाषाशास्त्र’ नामक टीकाएँ संकलित की गईं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अश्वघोष — जो इस संगीति के उपाध्यक्ष थे — संस्कृत साहित्य के महान कवि भी थे। उन्होंने ‘बुद्धचरित’ (बुद्ध की जीवनी) और ‘सौंदरानंद’ जैसे महाकाव्यों की रचना की। उन्हें अक्सर ‘भारत का प्रथम संस्कृत नाटककार’ भी कहा जाता है।
38. बौद्ध धर्म की महायान शाखा औपचारिक रूप से किसके शासनकाल में प्रकट हुई ?
(a) अजातशत्रु
(b) अशोक
(c) धर्मपाल
(d) कनिष्क
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(c)
यद्यपि प्रश्न का उत्तर विकल्प (c) अर्थात् ‘धर्मपाल’ दिया गया है, तथापि ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार महायान बौद्ध मत कनिष्क (विकल्प d) के शासनकाल में चतुर्थ बौद्ध संगीति (कुंडलवन, कश्मीर) के दौरान औपचारिक रूप से एक पृथक संप्रदाय के रूप में उभरा। इस संगीति में महासांघिकों के प्रभाव और बुद्ध की दैवीय व्याख्या ने महायान को स्पष्ट स्वरूप दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महायान का सबसे प्रभावशाली दार्शनिक नागार्जुन था, जिन्होंने ‘शून्यवाद’ (Madhyamaka) का प्रतिपादन किया और ‘प्रज्ञापारमिता’ ग्रंथों की रचना की। नागार्जुन को ‘महायान का पिता’ भी कहा जाता है। नागार्जुन के विचार बाद में तिब्बती और चीनी बौद्ध धर्म की आधारशिला बने।
39. कश्मीर में कनिष्क के शासनकाल में जो बौद्ध संगीति आयोजित हुई थी, उसकी अध्यक्षता निम्नलिखित में से किसने की थी ?
(a) पार्श्व
(b) नागार्जुन
(c) शूद्रक
(d) वसुमित्र
I.A.S. (Pre) 2001
उत्तर-(d)
कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। वसुमित्र एक प्रख्यात बौद्ध विद्वान थे और सर्वास्तिवाद संप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे। इस संगीति में बौद्ध ग्रंथों की व्याख्या ‘विभाषाशास्त्र’ में की गई। प्रसिद्ध दार्शनिक कवि अश्वघोष इसके उपाध्यक्ष थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वसुमित्र ने ‘प्रकरणपाद’ नामक महत्त्वपूर्ण अभिधर्म ग्रंथ की रचना भी की थी। कनिष्क द्वारा आयोजित यह संगीति इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें विभिन्न बौद्ध संप्रदायों के 500 से अधिक विद्वान भिक्षुओं ने भाग लिया था और इसके निष्कर्षों को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करके पाषाण संदूक में सुरक्षित किया गया था।
40. कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध सभा किस नगर में आयोजित की गई थी ?
(a) मगध
(b) पाटलिपुत्र
(c) कश्मीर
(d) राजगृह
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
उत्तर-(c)
कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध सभा (चतुर्थ बौद्ध संगीति) कश्मीर के कुंडलवन नामक स्थान पर आयोजित की गई थी। कनिष्क का शासनकाल लगभग 78 ई. से प्रारंभ माना जाता है और उनके नाम पर शक संवत् की शुरुआत हुई। इस संगीति के बाद बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में विभाजित हो गया, जिसमें महायान का प्रचार-प्रसार उत्तर और मध्य एशिया की ओर हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कश्मीर प्राचीन काल से बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं सदी ई.) ने कश्मीर की अपनी यात्रा के दौरान वहाँ सैकड़ों बौद्ध विहारों और मठों का उल्लेख किया है। कनिष्क ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए मध्य एशिया, चीन और तिब्बत तक धर्म दूत भेजे थे।
41. बुद्ध के जीवन की चार महत्वपूर्ण घटनाओं और उनसे संबद्ध चार स्थानों का नीचे उल्लेख है, यह दो स्तंभों (I) एवं (II) में अंकित हैं, आपको इनका सुमेल करना है-
स्तम्भ-I   स्तंभ-II
(1) जन्म – (i) सारनाथ
(2) ज्ञान प्राप्ति – (ii) बोधगया
(3) प्रथम प्रवचन – (iii) लुम्बिनी
(4) निघन – (iv) कुशीनगर
सही मेल है-
(a) 1-i, 2-ii, 3-iv, 4-iii
(b) 1-i, 2-iii, 3-i, 4-iv
(c) 1-iii, 2-ii, 3-i, 4-iv
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी (कपिलवस्तु के समीप) में हुआ था। बोधगया में निरंजना नदी के किनारे एक पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा की रात उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, इसीलिए वह वृक्ष ‘बोधिवृक्ष’ कहलाया। सारनाथ (ऋषिपत्तन/मृगदाव) में उन्होंने अपने पाँच साथियों को प्रथम उपदेश दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर, उत्तर प्रदेश) में 483 ई.पू. में उनका निधन हुआ, जिसे बौद्ध परंपरा में ‘महापरिनिर्वाण’ कहा गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के जीवन की इन चार प्रमुख घटनाओं से जुड़े स्थल सामूहिक रूप से ‘चतुर्महास्थान’ कहलाते हैं और ये प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल हैं। लुम्बिनी में सम्राट अशोक ने एक स्तंभ स्थापित किया था जो आज भी विद्यमान है और बुद्ध के जन्मस्थान का ऐतिहासिक प्रमाण देता है।
42. बोधगया में महाबोधि मंदिर बनाया गया, जहां-
(a) गौतम बुद्ध पैदा हुए थे।
(b) गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ।
(c) गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन दिया।
(d) गौतम की मृत्यु हुई।
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
बोधगया (बिहार) में गौतम बुद्ध को 35 वर्ष की आयु में, 6 वर्षों की कठोर साधना के बाद, वैशाख पूर्णिमा की रात एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान (बोधि) प्राप्त हुआ था। इसी स्थान पर महाबोधि मंदिर का निर्माण हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महाबोधि मंदिर परिसर को यूनेस्को ने 2002 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। मूल मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में करवाया था, और वर्तमान मंदिर का निर्माण गुप्तकाल (5वीं-6वीं शताब्दी ई.) में हुआ माना जाता है।
43. प्रथम बौद्ध समिति का आयोजन हुआ था-
(a) अनिरुद्ध के शासनकाल में
(b) अजातशत्रु के शासनकाल में
(c) बिंबिसार के शासनकाल में
(d) उदयभद्र के शासनकाल में
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(b)
प्रथम बौद्ध संगीति (सभा) का आयोजन 483 ई.पू. में मगध नरेश अजातशत्रु के शासनकाल में राजगृह (राजगीर) की सप्तपर्णि गुफा में हुई थी। इस सभा की अध्यक्षता महाकश्यप ने की थी। इसमें बुद्ध के उपदेशों को ‘विनयपिटक’ और ‘सुत्तपिटक’ के रूप में संकलित किया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस संगीति में आनंद ने बुद्ध के उपदेशों (सुत्त) और उपालि ने विनय नियमों का वाचन किया था। यह संगीति बुद्ध के महापरिनिर्वाण के ठीक तीन महीने बाद आयोजित हुई थी।
44. तृतीय बौद्ध सभा किस स्थान पर बुलाई गई थी ?
(a) तक्षशिला
(b) सारनाथ
(c) बोधगया
(d) पाटलिपुत्र
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(d)
तृतीय बौद्ध संगीति (सभा) का आयोजन लगभग 250 ई.पू. में सम्राट अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में हुई थी। इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। इस सभा में ‘अभिधम्मपिटक’ को त्रिपिटक में जोड़ा गया, जिससे बौद्ध धर्मग्रंथों का पूर्ण संकलन त्रिपिटक के रूप में तैयार हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय बौद्ध संगीति के बाद ही सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा। यह बौद्ध धर्म के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार में एक ऐतिहासिक मोड़ था।
45. निम्नलिखित में से किस नगर में प्रथम बौद्ध समा आयोजित की गई थी?
(a) नालंदा
(b) गया
(c) राजगीर
(d) बोधगया
U.P.P.C.S. (Pre) 2000
M.P.P.C.S. (Pre) 1990
उत्तर-(c)
प्रथम बौद्ध संगीति राजगृह (राजगीर, बिहार) में हुई थी। राजगीर मगध साम्राज्य की प्राचीन राजधानी था और बुद्ध के जीवनकाल में धार्मिक-राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यहाँ सप्तपर्णि गुफा में महाकश्यप की अध्यक्षता में यह सभा आयोजित की गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजगीर में ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में कई वर्षावास (वर्षाकालीन प्रवास) बिताए थे। बौद्ध और जैन दोनों धर्मों के लिए राजगीर एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है क्योंकि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर ने भी यहाँ उपदेश दिए थे।
46. निम्न में से किस शासक ने द्वितीय बौद्ध सभा का आयोजन किया था?
(a) अजातशत्रु
(b) कालाशोक
(c) आनंद
(d) अशोक
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन लगभग 383 ई.पू. में शिशुनाग वंश के राजा कालाशोक (काकवर्ण) के शासनकाल में वैशाली में हुई थी। इसकी अध्यक्षता सब्बकामी ने की। इस सभा का मुख्य कारण वज्जिपुत्तक भिक्षुओं द्वारा विनय के दस नियमों में शिथिलता लाने का विवाद था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस संगीति के परिणामस्वरूप बौद्ध संघ दो भागों में विभाजित हो गया — ‘स्थविरवाद’ (रूढ़िवादी) और ‘महासांघिक’ (उदारवादी)। यही विभाजन आगे चलकर हीनयान और महायान संप्रदायों के उद्भव की नींव बना।
47. भारतीय कला में बुद्ध के जीवन की किस घटना का चित्रण मृग सहित चक्र’ द्वारा हुआ है ?
(a) महाभिनिष्क्रमण
(b) सम्बोधि
(c) प्रथम उपदेश
(d) निर्वाण
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
उत्तर-(c)
भारतीय कला में ‘मृग सहित चक्र’ (धर्मचक्र के साथ हिरण) का प्रतीक बुद्ध के प्रथम उपदेश को दर्शाता है। बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ के मृगदाव (हरिण वन) में पाँच भिक्षुओं को दिया था, इसलिए मृग इस घटना का प्रतीक बन गया। इस घटना को ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध की मानवीय मूर्ति नहीं बनाई जाती थी; उनका प्रतिनिधित्व विभिन्न प्रतीकों द्वारा होता था — जैसे जन्म के लिए कमल, ज्ञान के लिए बोधिवृक्ष, प्रथम उपदेश के लिए धर्मचक्र-मृग, और महापरिनिर्वाण के लिए स्तूप। बुद्ध की प्रथम मानवीय मूर्तियाँ कुषाण काल (गांधार और मथुरा कला) में बनाई गईं।
48. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
सूची-1 (चिह्न) सूची-II (अर्थ)
A. जन्म – 1. वोधि वृक्ष
B. प्रथम प्रवचन – 2. धर्मचक्रप्रवर्तन
C. महाबोधि- 3. घोड़ा
D. त्याग – 4. कमल
कूट :
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 4 3 2 1
(c) 3 4 1 2
(d) 4 2 1 3
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(d)
सही सुमेलन इस प्रकार है — जन्म का प्रतीक कमल है (क्योंकि बुद्ध के जन्म के समय कमल खिलने की किंवदंती है); प्रथम प्रवचन का प्रतीक धर्मचक्रप्रवर्तन है; महाबोधि (ज्ञान प्राप्ति) का प्रतीक बोधिवृक्ष है; और गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण) का प्रतीक घोड़ा है, क्योंकि बुद्ध ने अपने प्रिय घोड़े ‘कंथक’ पर सवार होकर गृहत्याग किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के गृहत्याग के समय उनके सारथी का नाम ‘छन्दक’ था। कंथक (घोड़ा) ने राजमहल से बाहर निकलते समय आवाज़ न करे, इसके लिए देवताओं ने उसके खुरों को थाम लिया था — यह बौद्ध साहित्य में वर्णित है।
49. करमापा लामा तिब्बत के बुद्ध संप्रदाय के किस वर्ग का है?
(a) गेलूगपा
(b) कंग्यूपा
(c) साक्यपा
(d) लिंगमापा
U.P.P.C.S. (Pre) 2000
उत्तर-(b)
करमापा लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के ‘कंग्यूपा’ (Kagyu) संप्रदाय के प्रमुख हैं। कंग्यूपा तिब्बती बौद्ध धर्म के चार प्रमुख संप्रदायों में से एक है। करमापा की वंशपरंपरा विश्व में सबसे प्राचीन पुनर्जन्म आधारित उत्तराधिकार परंपरा (तुल्कु परंपरा) मानी जाती है, जो 12वीं शताब्दी से चली आ रही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिब्बती बौद्ध धर्म के चार प्रमुख संप्रदाय हैं — गेलूगपा (जिसके प्रमुख दलाई लामा हैं), कंग्यूपा (करमापा), साक्यपा और न्यिंगमापा। गेलूगपा संप्रदाय की स्थापना 14वीं-15वीं शताब्दी में जे त्सोंगखापा ने की थी और यह राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक प्रभावशाली रहा है।
50. महात्मा बुद्ध के संबंध में निम्नलिखित कथनों में कौन सही है?
1. उनका जन्म कपिलवस्तु में हुआ था।
2. उन्होंने बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया था।
3. उन्होंने वैदिक धर्म को अस्वीकार किया था।
4. उन्होंने आर्य सत्य का प्रचार किया था।
नीचे दिए गए कूट से सही
कूट :
उत्तर चुनिए :
(a) 1 तथा 2
(b) 1 तथा 3
(c) 1, 2, तथा
(d) 1, 2, 3 तथा 4
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(d)
उपर्युक्त सभी चारों कथन सही हैं। बुद्ध का जन्म लुम्बिनी (कपिलवस्तु के निकट) में हुआ, ज्ञान बोधगया में मिला, उन्होंने वेदों की प्रामाणिकता और यज्ञ-बलि व्यवस्था को अस्वीकार किया, तथा चार आर्य सत्यों (दुख, दुख का कारण, दुख का निरोध, निरोध का मार्ग) का प्रचार किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के चार आर्य सत्यों के साथ-साथ उन्होंने ‘अष्टांगिक मार्ग’ भी प्रतिपादित किया, जिसे ‘मध्यम मार्ग’ भी कहते हैं। यह अत्यंत भोग और अत्यंत तप दोनों के बीच का मार्ग है। बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व पर मौन रहकर व्यावहारिक नैतिकता पर बल दिया, इसलिए बौद्ध धर्म को ‘अनात्मवादी’ और ‘अनीश्वरवादी’ दर्शन माना जाता है।
51. गौतम बुद्ध ने अपनी मृत्यु के उपरांत बौद्ध संघ के नेतृत्व के लिए निम्न में से किसे नामित किया था ?
(a) आनंद
(b) महाकस्सप
(c) उपालि
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2002
उत्तर-(d)
कुशीनारा में महापरिनिर्वाण से पूर्व बुद्ध ने आनंद से कहा — “मैंने जो धर्म और विनय उपदेश दिए हैं, वही तुम्हारे शास्ता होंगे।” इस प्रकार उन्होंने किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि अपने धर्म एवं विनय को ही संघ का मार्गदर्शक घोषित किया। यह घटना लगभग 483 ई.पू. की मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद महाकस्सप की अध्यक्षता में राजगृह (राजगीर) में प्रथम बौद्ध संगीति आयोजित की गई, जिसमें उपालि ने विनयपिटक और आनंद ने सुत्तपिटक का वाचन किया। यह भी उल्लेखनीय है कि आनंद बुद्ध के सबसे निकट शिष्य और निजी परिचारक थे, जिन्होंने 25 वर्षों तक उनकी सेवा की।
52. निम्नलिखित में से कौन बुद्ध के जीवनकाल में ही संघ प्रमुख होना चाहता था?
(a) देवदत्त
(b) महाकस्सप
(c) उपालि
(d) आनंद
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
देवदत्त बुद्ध का चचेरा भाई था और शाक्यकुल से ही संबंधित था। भिक्षु बनते ही उसके मन में संघ का नेतृत्व पाने की महत्वाकांक्षा जाग उठी। उसने बुद्ध को संघ से हटाने के लिए कई षड्यंत्र रचे, यहाँ तक कि उन पर हत्या के प्रयास भी किए — जैसे पहाड़ से शिला लुढ़कवाना और नालागिरि हाथी को उन पर छोड़ना — किंतु सभी प्रयास विफल रहे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: देवदत्त ने मगध नरेश अजातशत्रु को अपना समर्थक बना लिया था, जो उसकी महत्वाकांक्षाओं में सहायक था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार देवदत्त ने संघ में फूट डालने हेतु पाँच कठोर नियमों (पंचवस्तु) का प्रस्ताव भी रखा था, जिसे बुद्ध ने अस्वीकार कर दिया।
53. बुद्ध के उपदेश किससे संबंधित हैं?
(a) आत्मा संबंधी विवाद
(b) ब्रह्मचर्य
(c) धार्मिक कर्मकांड
(d) आचरण की शुद्धता व पवित्रता
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(d)
बुद्ध के उपदेशों का केंद्र था — नैतिक आचरण, मन की पवित्रता और दुःख से मुक्ति का व्यावहारिक मार्ग। उन्होंने आत्मा-परमात्मा जैसे तात्त्विक प्रश्नों को “अव्याकृत” (अनुत्तरित) छोड़ा और वैदिक यज्ञ-कर्मकांडों की कड़ी आलोचना की। उनका अष्टांगिक मार्ग — सम्यक दृष्टि से लेकर सम्यक समाधि तक — पूर्णतः आचरण पर आधारित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध ने अपने उपदेश संस्कृत की बजाय तत्कालीन लोकभाषा पाली में दिए, ताकि साधारण जनता उन्हें सहज रूप से समझ सके। उनका प्रसिद्ध “मज्झिम पटिपदा” (मध्यम मार्ग) का सिद्धांत — न अति-भोग, न अति-तप — नैतिक जीवन का आधार था।
54. निम्नलिखित में से कौन-सा बौद्ध पवित्र स्थल निरंजना नदी पर स्थित था?
(a) बोधगया
(b) कुशीनगर
(c) लुम्बिनी
(d) ऋषिपत्तन
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(a)
बोधगया, जहाँ गौतम बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, निरंजना नदी (आधुनिक फल्गु नदी) के तट पर स्थित है। यह नदी निरंजना और मोहना नामक दो छोटी धाराओं के संगम से बनती है। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति से पूर्व इसी नदी में स्नान किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर को यूनेस्को ने 2002 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। यह मंदिर मूलतः सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में बनवाया था, और वर्तमान संरचना गुप्तकाल (5वीं-6वीं शताब्दी ई.) की मानी जाती है।
55. बोधगया में ‘बोधि वृक्ष’ अपने वंश की इस पीढ़ी का है-
(a) तृतीय
(b) चतुर्थ
(c) पंचम
(d) षष्ठम
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(c)
बोधगया का वर्तमान बोधि वृक्ष उस मूल पीपल वृक्ष की पाँचवीं पीढ़ी है, जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार मूल वृक्ष को 7वीं शताब्दी में बंगाल के शासक शशांक ने नष्ट करवाया था। पुरातत्ववेत्ता अलेक्जेंडर कनिंघम ने 19वीं शताब्दी में वर्तमान (पाँचवीं पीढ़ी के) वृक्ष को लगवाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस वृक्ष की एक शाखा तीसरी शताब्दी ई.पू. में सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा श्रीलंका ले गई थीं, जहाँ अनुराधापुरा में लगाया गया वह वृक्ष आज भी जीवित है और विश्व का सबसे पुराना ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित वृक्ष माना जाता है। बोधि वृक्ष का वैज्ञानिक नाम Ficus religiosa है।
56. ‘त्रिपिटक’ क्या है?
(a) गांधीजी के तीन बंदर
(b) ब्रह्मा, विष्णु, महेश
(c) महावीर के तीन नगीने
(d) बुद्ध के उपदेशों का संग्रह
U.P. Lower Sub. (Pre) 2003
U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(d)
त्रिपिटक बौद्ध धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्राचीनतम धर्मग्रंथ है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनकी शिक्षाओं को तीन भागों में संकलित किया गया — विनय पिटक (संघ के आचार-नियम), सुत्त पिटक (धार्मिक सिद्धांत एवं उपदेश) और अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विवेचन)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: त्रिपिटक की रचना पाली भाषा में हुई, जो उस काल में आम जनता की भाषा थी। यह ग्रंथ बौद्ध धर्म के थेरवाद (हीनयान) सम्प्रदाय का मूल आधार माना जाता है।
57. निम्नलिखित में से किस बौद्ध ग्रंथ में संघ जीवन के नियम प्राप्त होते हैं?
(a) दीघ निकाय
(b) विनय पिटक
(c) अभिधम्म पिटक
(d) विभाषा शास्त्र
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(b)
विनय पिटक त्रिपिटक का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें बौद्ध संघ के भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए आचार-व्यवहार, दैनिक जीवन के नियम एवं अनुशासन संबंधी विधि-निषेध संकलित हैं। विनय पिटक के अंतर्गत मुख्यतः तीन ग्रंथ हैं — सुत्त विभंग, खंधक और परिवार।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसके अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रथम बौद्ध संगीति (483 ई.पू., राजगृह) में उपालि ने विनय पिटक का और आनंद ने सुत्त पिटक का वाचन किया था।
58. अष्टांग मार्ग की संकल्पना, अंग है-
(a) दीपवंश की विषयवस्तु का
(b) दिव्यावदान की विषयवस्तु का
(c) महापरिनिब्बान की विषयवस्तु का
(d) धर्मचक्रप्रवर्तन सुत्त की विषयवस्तु का
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(d)
बुद्ध ने सारनाथ (ऋषिपत्तन/मृगदाव) में अपना प्रथम उपदेश पाँच ब्राह्मण शिष्यों को दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जाता है। इसी उपदेश का सार ‘धर्मचक्रप्रवर्तन सुत्त’ में संकलित है, जिसमें चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का विस्तृत वर्णन है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अष्टांगिक मार्ग के आठ सोपान हैं — सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मांत, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। इसे ‘मध्यमा प्रतिपदा’ भी कहते हैं क्योंकि यह अति-भोग और अति-तप दोनों के बीच का मार्ग है। अष्टांगिक मार्ग को तीन भागों — शील, समाधि और प्रज्ञा — में वर्गीकृत किया जाता है।
59.’त्रिपिटक’ ग्रंथ किस धर्म से संबंधित है?
(a) वैदिक धर्म
(b) बौद्ध धर्म
(c) जैन धर्म
(d) शैव धर्म
R.A.S./R.T.S. (Pre) 2012
उत्तर-(b)
त्रिपिटक बौद्ध धर्म का मूल और सर्वप्रमुख धर्मग्रंथ है। इसे पाली भाषा में लिखा गया और इसमें बुद्ध की संपूर्ण शिक्षाओं का व्यवस्थित संकलन है। ‘त्रि’ अर्थात तीन और ‘पिटक’ अर्थात टोकरी — यानी ‘तीन टोकरियाँ’।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विशेष तथ्य यह है कि त्रिपिटक की रचना तृतीय बौद्ध संगीति (250 ई.पू.) के समय सम्राट अशोक के संरक्षण में पाटलिपुत्र में हुई, जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी।
60. त्रिपिटक किसकी धार्मिक पुस्तक है?
(a) जैन
(b) हिन्दू
(c) पारसी
(d) बौद्ध
63rd B.P.S.C. (Pre) Exam. 2017
उत्तर-(d)
त्रिपिटक बौद्ध धर्म का पवित्र धर्मग्रंथ है। यह पाली भाषा में रचित है और इसमें तीन प्रमुख भाग हैं — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि श्रीलंका में त्रिपिटक को ताड़ के पत्तों पर लिखकर सुरक्षित किया गया था और यूनेस्को ने श्रीलंका के पाली त्रिपिटक को ‘विश्व स्मृति रजिस्टर’ (Memory of the World Register) में स्थान दिया है।
61. त्रिपिटक निम्नलिखित में से किससे संबंधित है?
(a) जैनियों से
(b) बौद्धों से
(c) सिक्खों से
(d) हिंदुओं से
M.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(b)
त्रिपिटक बौद्धों का सर्वोच्च धर्मग्रंथ है। बौद्ध परंपरा में इसे ‘बुद्धवचन’ माना जाता है। इसके तीनों खंड — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक — मिलकर बौद्ध धर्म के संपूर्ण दर्शन, आचार और अध्यात्म को समेटते हैं। महत्वपूर्ण
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: त्रिपिटक के सुत्त पिटक में ‘धम्मपद’ नामक अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ सम्मिलित है जिसमें 423 गाथाएँ हैं और इसे ‘बौद्धों की गीता’ भी कहा जाता है।
62.’यमक’ बुद्ध ‘पिटक’ से संबंधित है-
(a) सुत्त
(b) विनय
(c) अभिधम्म
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
अभिधम्म पिटक त्रिपिटक का तीसरा और दार्शनिक दृष्टि से सर्वाधिक जटिल भाग है। इसमें बौद्ध दर्शन के सूक्ष्म तत्वों का विश्लेषण प्रश्नोत्तर शैली में किया गया है। इसके अंतर्गत सात ग्रंथ आते हैं — धम्मसंगणि, विभंग, धातुकथा, पुग्गलपञ्ञत्ति, कथावत्थु, यमक और पट्ठान। ‘यमक’ का अर्थ है ‘जोड़े में विचार करना’ — इसमें धर्म-तत्वों को परस्पर विपरीत युग्मों में व्याख्यायित किया गया है। उल्लेखनीय है कि कथावत्थु की रचना मोग्गलिपुत्त तिस्स ने तृतीय बौद्ध संगीति में की थी, जो अभिधम्म पिटक का एक प्रमुख अंग है।
63. निम्न में से किस बौद्ध साहित्य में महात्मा बुद्ध के ‘नैतिक एवं सिद्धांत’ संबंधित प्रवचन संकलित हैं?
(a) विनय पिटक
(b) जातक कथाएं
(c) अभिधम्म पिटक
(d) सुत्त पिटक
M.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(d)
सुत्त पिटक में बुद्ध के नैतिक उपदेश और धार्मिक सिद्धांत संकलित हैं। इसे पाँच निकायों में विभाजित किया गया है — दीघ निकाय, मज्झिम निकाय, संयुत्त निकाय, अंगुत्तर निकाय और खुद्दक निकाय। जातक कथाएँ खुद्दक निकाय का ही हिस्सा हैं, जिनमें बुद्ध के 550 पूर्व जन्मों की कथाएं हैं। विनय पिटक में संघ के अनुशासन के नियम हैं जबकि अभिधम्म पिटक में गूढ़ दार्शनिक विवेचन है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुत्त पिटक के दीघ निकाय में ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ है, जो बुद्ध के अंतिम दिनों और उनके महापरिनिर्वाण का सबसे प्रमाणिक विवरण प्रस्तुत करता है।
64. बौद्ध संघ में भिक्षुणी के रूप में स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति बुद्ध द्वारा दी गई थी-
(a) श्रावस्ती में
(b) वैशाली में
(c) राजगृह में
(d) कुशीनगर में
U.P.P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(b)
बुद्ध ने प्रारंभ में स्त्रियों को संघ में प्रवेश देने से मना किया था, परंतु अपने प्रिय शिष्य आनंद के आग्रह और महाप्रजापति गौतमी की निष्ठा देखकर उन्होंने वैशाली में स्त्रियों को भिक्षुणी के रूप में संघ-प्रवेश की अनुमति दी। महाप्रजापति गौतमी बुद्ध की मौसी और पालनकर्त्री माँ थीं और वे बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली सर्वप्रथम स्त्री बनीं। उल्लेखनीय है कि बुद्ध ने स्त्रियों के संघ-प्रवेश के साथ ‘अष्ट गुरुधर्म’ नामक आठ विशेष नियम भी लागू किए, जो भिक्षुणियों पर भिक्षुओं के प्रति आदर-भाव का दायित्व निर्धारित करते थे।
65. गौतम बुद्ध के बारे में निम्न में से क्या सत्य है?
1. वे कर्म में विश्वास करते थे।
2. आत्मा का शरीर में परिवर्तन मानते थे।
3. निर्वाण प्राप्ति में विश्वास करते थे।
4. ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते थे। निम्न कूटों में से सही उत्तर चुनिए-
(a) केवल 1, 2, 3 सही हैं।
(b) 1, 2 सही हैं।
(c) केवल 1 सही है।
(d) सभी चारों सही हैं।
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(*)
महात्मा बुद्ध कर्म सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखते थे और निर्वाण प्राप्ति को जीवन का परम लक्ष्य मानते थे। वे पुनर्जन्म में विश्वास करते थे, किंतु उनका पुनर्जन्म का सिद्धांत अनात्मवाद पर आधारित था — अर्थात आत्मा नहीं, बल्कि कर्म-संस्कारों की सन्तति का पुनर्जन्म होता है। वे ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते थे, इसलिए बौद्ध धर्म को ‘नास्तिक दर्शन’ की श्रेणी में रखा जाता है। अतः कथन 1 और 3 सही हैं, जो किसी दिए गए विकल्प से मेल नहीं खाते — इसीलिए उत्तर (*) अर्थात ‘कोई उत्तर नहीं’ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा और वेदों की प्रामाणिकता तीनों को अस्वीकार किया, इसी कारण उन्हें वैदिक परंपरा का विरोधी माना गया।
66. ‘संसार अस्थिर और क्षणिक है’ का निम्न में किससे संबंध है?
(a) बौद्ध
(b) जैन
(c) गीता
(d) वेदांत
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(a)
बौद्ध दर्शन में क्षणिकवाद (Momentarism) एक मूलभूत सिद्धांत है। गौतम बुद्ध ने अनित्यवाद का प्रतिपादन करते हुए कहा कि इस जगत में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है — सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है। क्षणिकवाद इसी का तार्किक विस्तार है, जिसके अनुसार प्रत्येक वस्तु और विचार केवल एक क्षण के लिए अस्तित्व में रहता है और अगले ही क्षण नष्ट हो जाता है। जैसे दीपक की लौ में हर पल नई लौ जलती और बुझती है, उसी प्रकार समस्त जगत क्षण-क्षण परिवर्तित होता रहता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध दर्शन के इस क्षणिकवाद को बाद में दिग्नाग और धर्मकीर्ति जैसे बौद्ध दार्शनिकों ने और अधिक परिष्कृत किया। धर्मकीर्ति ने अपने ग्रंथ ‘प्रमाणवार्तिक’ में इसे तर्कसम्मत आधार दिया। साथ ही, यह सिद्धांत बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्यों — दुःख, समुदाय, निरोध और मार्ग — से भी गहराई से जुड़ा है, क्योंकि संसार की अनित्यता को समझना ही दुःख से मुक्ति का पहला कदम माना गया है।
67. अनात्मवाद सिद्धांत है-
(a) सांख्य का
(b) वेदांत का
(c) बौद्ध दर्शन का
(d) जैन दर्शन का
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
अनात्मवाद (नैरात्मवाद) बौद्ध दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। गौतम बुद्ध ने ‘सर्वं अनात्मकम्’ कहते हुए यह स्पष्ट किया कि न तो कोई शाश्वत आत्मा है और न ही कोई स्थायी भौतिक तत्व। यह सिद्धांत उपनिषदों के आत्मवाद के विपरीत है जिसमें आत्मा को नित्य और अविनाशी माना गया है। बुद्ध के अनुसार जो हम ‘मैं’ या ‘आत्मा’ समझते हैं, वह वास्तव में पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का क्षणिक समूह मात्र है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध दर्शन में अनात्मवाद को तीन लक्षणों (त्रिलक्षण) में से एक माना गया है — अनित्य, दुःख और अनात्मन। बाद के बौद्ध दार्शनिकों में नागार्जुन ने अपने माध्यमिक दर्शन (शून्यवाद) में इसे और गहराई दी तथा यह सिद्ध किया कि न केवल आत्मा, बल्कि समस्त धर्म (घटनाएं) भी स्वभावशून्य हैं।
68. बौद्ध धर्म में ‘त्रिरत्न’ का क्या अभिप्राय है?
(a) त्रिपिटक
(b) बुद्ध, धम्म, संघ
(c) शील, समाधि, संघ
(d) सत्य, अहिंसा, करुणा
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
बौद्ध धर्म में ‘त्रिरत्न’ — बुद्ध, धम्म और संघ — को सर्वोच्च आश्रय माना गया है। प्रत्येक बौद्ध अनुयायी दीक्षा के समय “बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” का उच्चारण करता है। बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) के बाद उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में विभाजित किया गया जिन्हें त्रिपिटक कहा जाता है — विनय पिटक (संघ के नियम), सुत्त पिटक (बुद्ध के उपदेश) और अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विश्लेषण)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: त्रिपिटक मूलतः पाली भाषा में लिखे गए हैं और इनका संकलन प्रथम बौद्ध संगीति (483 ई.पू.) में राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में हुआ था, जिसकी अध्यक्षता महाकस्सप ने की थी। त्रिरत्न की अवधारणा जैन धर्म में भी मिलती है, किंतु जैन धर्म में त्रिरत्न हैं — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र।
69. वह स्तूप-स्थल, जिसका संबंध भगवान बुद्ध के जीवन की किसी घटना से नहीं रहा है, वह है :
(a) सारनाथ
(b) सांची
(c) बोधगया
(d) कुशीनारा
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(b)
बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख स्थल हैं — लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ (प्रथम उपदेश / धर्मचक्रप्रवर्तन) और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण)। इनके विपरीत, सांची का स्तूप बुद्ध के जीवन की किसी विशेष घटना से संबंधित नहीं है। सांची का महान स्तूप सम्राट अशोक द्वारा मध्यप्रदेश में बनवाया गया था और यह बुद्ध के अवशेषों (धातु) को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से निर्मित किया गया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांची के स्तूप को यूनेस्को ने 1989 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। सांची स्तूप के चार द्वार (तोरण) अत्यंत प्रसिद्ध हैं जिन पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं के दृश्य अंकित हैं। इन तोरणों का निर्माण शुंग और सातवाहन काल में हुआ था।
70. निम्नलिखित स्तूपों का सही तैथिक क्रम (कालानुक्रम) क्या है?
(a) भरहुत, सांची, अमरावती, धमेख
(b) अमरावती, सांची, भरहुत, धमेख
(c) सांची, अमरावती, भरहुत, धमेख
(d) धमेख, भरहुत, अमरावती, सांची
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(*)
सांची और भरहुत स्तूपों की नींव मौर्य सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी ई.पू.) के शासनकाल में रखी गई थी। धमेख स्तूप (सारनाथ) को भी कुछ इतिहासकार अशोक काल से जोड़ते हैं, जबकि इसका वर्तमान स्वरूप गुप्त काल (5वीं-6वीं शताब्दी ई.) में निर्मित माना जाता है। अमरावती स्तूप का निर्माण सातवाहन वंश के काल (दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई.) में हुआ। चूँकि भरहुत, सांची और धमेख के मध्य सटीक कालक्रम निर्धारित करना संभव नहीं है, इसलिए इस प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमरावती स्तूप आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है और इसे ‘महाचैत्य’ भी कहा जाता है। भरहुत स्तूप को सर्वप्रथम अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1873 में खोजा था और इसकी वेदिकाएँ अब कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
71. सर्वप्रथम ‘स्तूप’ शब्द कहां मिलता है ?
(a) ऋग्वेद
(b) जातक कथा
(c) अर्थशास्त्र
(d) अष्टाध्यायी
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
‘स्तूप’ शब्द का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ढेर’ या ‘मिट्टी का टीला’। ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनेयी संहिता, तैत्तरीय ब्राह्मण और पंचविश ब्राह्मण में भी स्तूप का उल्लेख आता है। बौद्ध काल में स्तूप का अर्थ बदलकर उस अर्धगोलाकार संरचना से हो गया जिसमें बुद्ध या किसी महत्वपूर्ण बौद्ध व्यक्ति के अवशेष (धातु) रखे जाते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध परंपरा के अनुसार, बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके अवशेषों को आठ भागों में विभाजित किया गया और उन पर आठ स्तूप बनाए गए। बाद में सम्राट अशोक ने इन स्तूपों को खुलवाकर अवशेषों को 84,000 भागों में बाँटकर सारे साम्राज्य में स्तूप बनवाए — यह वृत्तांत अशोकावदान में मिलता है। स्तूप की संरचना के मुख्य भाग होते हैं — अंड (गुंबद), हर्मिका (रेलिंग), यष्टि (छत्र-दंड), और वेदिका (परिक्रमा पथ की रेलिंग)।
72. विश्व का सबसे ऊंचा कहा जाने वाला ‘विश्व शांति स्तूप’ बिहार में कहां है?
(a) वैशाली
(b) नालंदा
(c) राजगीर
(d) पटना
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(c)
बिहार के राजगीर में रत्नागिरि पहाड़ी (लगभग 400 मीटर ऊँचाई) पर स्थित विश्व शांति स्तूप (Peace Pagoda) को विश्व का सबसे ऊँचा शांति स्तूप कहा जाता है। इसका निर्माण जापानी बौद्ध संगठन ‘निप्पोनजान म्योहोजी’ द्वारा किया गया था। राजगीर का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहाँ बुद्ध ने कई वर्ष बिताए और यहीं प्रथम बौद्ध संगीति (राजगृह, 483 ई.पू.) का आयोजन हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजगीर को प्राचीनकाल में ‘राजगृह’ कहा जाता था और यह मगध साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी थी। यहीं भगवान बुद्ध ने गृधकूट पर्वत पर अनेक महत्वपूर्ण उपदेश दिए थे, जिनमें प्रज्ञापारमिता सूत्र भी शामिल है। इसके अतिरिक्त, विश्व शांति स्तूप के शीर्ष तक पहुँचने के लिए रोपवे (उड्डनखटोला) की सुविधा उपलब्ध है जो पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है।
73. बुद्ध की 80 फुट बड़ी प्रतिमा जो बोधगया में है, निर्मित की गई थी-
(a) जापानियों के द्वारा
(b) थाई लोगों के द्वारा
(c) श्रीलंकाइयों के द्वारा
(d) भूटानियों के द्वारा
R.A.S./ R.T.S. (Pre) 1993
उत्तर-(a)
बोधगया में स्थित 80 फुट (लगभग 25 मीटर) ऊँची बुद्ध प्रतिमा का निर्माण जापान के ‘दाईजोकियो’ बौद्ध संप्रदाय के सहयोग से किया गया था। यह प्रतिमा लाल ग्रेनाइट और बलुई पत्थर से निर्मित है और इसके निर्माण में लगभग 7 वर्ष का समय लगा। बोधगया वही पवित्र स्थल है जहाँ गौतम बुद्ध को पीपल के वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे ज्ञान (बोधि) की प्राप्ति हुई थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर परिसर को यूनेस्को ने 2002 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। यहाँ का मूल बोधि वृक्ष वही माना जाता है जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था — वर्तमान वृक्ष उसी मूल वृक्ष की संतान है। बोधगया बिहार के गया जिले में फल्गु नदी के तट पर स्थित है।
74. अशोकाराम विहार निम्नलिखित में से किस स्थान पर स्थित था?
(a) वैशाली
(b) पाटलिपुत्र
(c) कौशाम्बी
(d) श्रावस्ती
U.P.P.C.S. (Mains) 2015
उत्तर-(b)
प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ महावंश के अनुसार, मौर्य सम्राट अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) में अशोकाराम विहार का निर्माण करवाया था। इस विहार का निर्माण थेर भिक्षु इंद्रगुप्त के निरीक्षण में हुआ। यह विहार बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। अशोक के काल में ही तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन पाटलिपुत्र में हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय बौद्ध संगीति (लगभग 250 ई.पू.) की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी और इसी संगीति में अभिधम्म पिटक को अंतिम रूप दिया गया। अशोक ने इसी संगीति के पश्चात अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु भेजा था — संघमित्रा अपने साथ बोधि वृक्ष की एक शाखा भी लेकर गई थीं।
75. प्राचीन भारत के बौद्ध मठों में, पवरन नामक समारोह आयोजित किया जाता था, जो-
(a) संघपरिनायक और धर्म तथा विनय विषयों पर एक-एक वक्ता को चुनने का अवसर होता था।
(b) वर्षा ऋतु के दौरान मठों में प्रवास के समय भिक्षुओं द्वारा किए गए अपराधों की स्वीकारोक्ति का अवसर होता था।
(c) किसी नए व्यक्ति को बौद्ध संघ में प्रवेश देने का समारोह होता था, जिसमें उसका सिर मुंडवा दिया जाता था और पीले वस्त्र दिए जाते थे।
(d) आषाढ़ की पूर्णिमा के अगले दिन बौद्ध भिक्षुओं के एकत्र होने का अवसर होता था, जब वे वर्षा ऋतु के आगामी चार महीनों के लिए निश्चित आवास चुनते थे।
I.A.S. (Pre) 2002
उत्तर-(b)
पवरन (Pavāraṇā) बौद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान था जो वर्षावास (वस्सा) की समाप्ति पर आयोजित होता था। वर्षा ऋतु के चार महीने (आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक) बौद्ध भिक्षु एक स्थान पर ठहरते थे और धर्म प्रचार कार्य स्थगित रहता था। वर्षावास समाप्त होने पर आयोजित पवरन समारोह में भिक्षु एक-दूसरे के समक्ष अपने कृत्यों की आलोचना व स्वीकारोक्ति करते थे और भविष्य की योजना बनाते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पवरन के अगले दिन ‘कठिन’ समारोह होता था जिसमें गृहस्थ बौद्ध अनुयायी भिक्षुओं को वस्त्र (चीवर) दान करते थे — यह परंपरा आज भी थेरवाद बौद्ध देशों जैसे श्रीलंका, थाईलैंड और म्यांमार में जीवित है। वर्षावास की परंपरा भगवान बुद्ध ने स्वयं आरंभ की थी ताकि वर्षा में यात्रा के दौरान अनजाने में जीव-जंतुओं को हानि न पहुँचे।
76. गांधार शैली की पूर्ति कला में बुद्ध के सारनाथ में हुए प्रथम धर्मोपदेश से संबद्ध प्रवचन मुद्रा का नाम है-
(a) अभय
(b) ध्यान
(c) धर्मचक्र
(d) भूमिस्पर्श
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(c)
सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश ‘धम्मचक्कपवत्तन’ (धर्मचक्र प्रवर्तन) कहलाता है और इससे जुड़ी मुद्रा ‘धर्मचक्र मुद्रा’ है, जिसमें दोनों हाथ छाती के सामने एक विशेष संकेत की स्थिति में होते हैं। गांधार कला शैली पहली से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्षेत्र में विकसित हुई, जिसमें यूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक) कला का स्पष्ट प्रभाव दिखता है — बुद्ध की मूर्तियों में घुंघराले बाल और यूनानी वस्त्र इसी प्रभाव के प्रमाण हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गांधार कला की सबसे प्रसिद्ध मूर्तियाँ लाहौर संग्रहालय और पेशावर संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इस शैली में बुद्ध की चार प्रमुख मुद्राएँ प्रचलित हैं — अभय (भय निवारण), ध्यान (समाधि), धर्मचक्र (उपदेश) और भूमिस्पर्श (ज्ञान प्राप्ति का क्षण)।
77. देश में निम्न में से किसने मूर्ति पूजा की नींव रखी थी?
(a) जैन धर्म ने
(b) बौद्ध धर्म ने
(c) आजीविकों ने
(d) वैदिक धर्म ने
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(b)
भारत में संगठित और व्यापक स्तर पर मूर्ति पूजा की परंपरा का श्रेय बौद्ध धर्म की महायान शाखा को जाता है। महायानियों ने ईसा की पहली-दूसरी शताब्दी में बुद्ध को देवता मानकर उनकी प्रतिमाएँ स्थापित करना शुरू किया। इससे पहले बौद्ध धर्म में बुद्ध का प्रतीकात्मक रूप से — जैसे चरण-चिह्न, छत्र, बोधि वृक्ष और धर्मचक्र से — स्मरण होता था, प्रत्यक्ष मूर्ति से नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मथुरा और गांधार — ये दो प्रमुख केंद्र थे जहाँ बुद्ध की सर्वप्रथम मूर्तियाँ निर्मित हुईं। मथुरा शैली में बुद्ध की मूर्तियाँ लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई थीं और उनमें भारतीय परंपरा का प्रभाव अधिक था, जबकि गांधार शैली पर यूनानी प्रभाव स्पष्ट था।
78. भारत में पहले जिन मानव प्रतिमाओं को पूजा गया, वे थीं-
(a) ब्रह्मा की
(b) विष्णु की
(c) बुद्ध की
(d) शिव की
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर भारत में सबसे पहले बुद्ध की मानव प्रतिमाओं की पूजा की गई। यह परिवर्तन लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में महायान बौद्ध धर्म के उदय के साथ आया, जब बुद्ध को मानव-गुरु की बजाय दिव्य देवता के रूप में स्थापित किया जाने लगा। इससे पहले के हीनयान काल में बुद्ध को प्रतीकों के माध्यम से याद किया जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण शासक कनिष्क (लगभग 127-150 ईस्वी) के काल में बुद्ध मूर्तियों का व्यापक प्रसार हुआ। साँची के स्तूप के तोरण द्वारों (पहली शताब्दी ईसा पूर्व) पर बुद्ध को सिंहासन, पदचिह्न और छत्र से दर्शाया गया है — यह प्रतीकात्मक युग का प्रमाण है, जो मूर्ति पूजा से पहले का है।
79. गौतम बुद्ध को एक देवता का स्थान किस राजा के युग में प्राप्त हुआ?
(a) अशोक
(b) कनिष्क
(c) चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
(d) हर्ष
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। इसी संगीति में बौद्ध धर्म औपचारिक रूप से हीनयान और महायान — दो शाखाओं में विभाजित हुआ। महायान शाखा ने बुद्ध को देवता घोषित करते हुए उनकी पूजा-अर्चना को धर्म का केंद्र बनाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क स्वयं बौद्ध धर्म का अनुयायी था और उसने अनेक बौद्ध विहारों एवं स्तूपों का निर्माण कराया — पेशावर का ‘कनिष्क स्तूप’ उस काल का सबसे ऊँचा स्तूप माना जाता था। इसी काल में बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन और तिब्बत तक फैला।
80. बौद्ध धर्म के महायान और हीनयान संप्रदायों में सर्वाधिक मौलिक अंतर निम्नलिखित में कौन-सा है?
(a) अहिंसा पर बल
(b) जाति रहित समाज
(c) देवी-देवताओं की पूजा
(d) स्तूप पूजा
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
हीनयान और महायान का सबसे बुनियादी भेद बुद्ध की स्थिति और देवी-देवताओं की भूमिका को लेकर है। हीनयान में बुद्ध एक महान मानव-शिक्षक थे जिन्होंने स्वयं मोक्ष का मार्ग दिखाया; इसमें व्यक्तिगत साधना और निर्वाण पर जोर था। महायान में बुद्ध को दिव्य ईश्वर माना गया और ‘बोधिसत्व’ की अवधारणा विकसित हुई — जो स्वयं निर्वाण को स्थगित करके सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए कार्य करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हीनयान की प्रमुख भाषा पाली थी और यह शाखा मुख्यतः श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड में प्रचलित है (इसे ‘थेरवाद’ भी कहते हैं)। महायान की भाषा संस्कृत थी और यह चीन, जापान, कोरिया और तिब्बत में फैली। नागार्जुन महायान के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक थे, जिनका ‘शून्यवाद’ का सिद्धांत इसी शाखा की बौद्धिक आधारशिला है।
81. ‘क्षणिकवाद’ का प्रतिपादन किसने किया?
(a) बुद्ध
(b) जैन
(c) चार्वाक
(d) न्याय
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
क्षणिकवाद बौद्ध दर्शन का वह सिद्धांत है जो कहता है कि संसार की प्रत्येक वस्तु — चाहे भौतिक हो या मानसिक — हर क्षण परिवर्तित होती रहती है और कोई भी चीज़ दो क्षणों तक एक जैसी नहीं रहती। बुद्ध के ‘अनित्यता’ (अनिच्च) के मूल विचार से ही यह सिद्धांत विकसित हुआ। बौद्धोत्तर दार्शनिकों ने इसे और सुव्यवस्थित किया — आत्मा क्षणिक है, वस्तुएँ अनित्य हैं, इसलिए किसी में भी आसक्ति दुःख का कारण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध दर्शन के तीन मूल लक्षण हैं — अनित्यता (अनिच्च), दुःख (दुक्ख) और अनात्मा (अनत्ता)। क्षणिकवाद इन तीनों से जुड़ा है। धर्मकीर्ति (7वीं शताब्दी) ने अपने ग्रंथ ‘प्रमाणवार्तिका’ में क्षणिकवाद को तार्किक रूप से सबसे परिष्कृत ढंग से प्रस्तुत किया।
82. सर एडविन एर्नाल्ड की पुस्तक ‘द लाइट ऑफ एशिया’ आधारित है-
(a) दिव्यावदान पर
(b) ललितविस्तार पर
(c) सुत्तपिटक पर
(d) अभिधम्मपिटक पर
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
सर एडविन अर्नाल्ड की महाकाव्यात्मक कृति ‘The Light of Asia’ (1879) संस्कृत ग्रंथ ‘ललितविस्तार’ पर आधारित है, जो गौतम बुद्ध के जीवन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। यह पुस्तक पश्चिमी जगत में बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में अत्यंत प्रभावशाली रही — इसकी एक लाख से अधिक प्रतियाँ बिकीं और कई भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ललितविस्तार एक महायान बौद्ध ग्रंथ है जो संस्कृत में लिखा गया है और बुद्ध के जन्म से लेकर उनके प्रथम उपदेश तक का वर्णन करता है। स्वामी विवेकानंद ‘द लाइट ऑफ एशिया’ से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने इसकी सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की थी।
83. निम्नलिखित में से किसे ‘एशिया के ज्योति पुंज’ के तौर पर जाना जाता है?
(a) गौतम बुद्ध को
(b) महात्मा गांधी को
(c) महावीर स्वामी को
(d) स्वामी विवेकानंद को
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(a)
गौतम बुद्ध को ‘एशिया के ज्योति पुंज’ (Light of Asia) की उपाधि दी जाती है, जो सर एडविन अर्नाल्ड की 1879 में प्रकाशित काव्य-पुस्तक ‘The Light of Asia’ से लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक ने बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को पश्चिमी दुनिया के सामने काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया और एशियाई आध्यात्मिकता के प्रति व्यापक रुचि जगाई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतम बुद्ध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। उन्हें ‘एशिया के प्रकाश पुंज’ कहे जाने का एक कारण यह भी है कि बौद्ध धर्म पूरे एशिया — भारत, चीन, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड, कोरिया, वियतनाम — में फैला और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। वर्तमान में बौद्ध धर्म विश्व के प्रमुख धर्मों में से एक है जिसके लगभग 53 करोड़ अनुयायी हैं।
84. निम्नांकित में से किसे ‘एशिया का ज्योति पुंज’ नाम से जाना जाता है?
(a) ईसा मसीह
(b) भगवान बुद्ध
(c) पैगम्बर मुहम्मद
(d) जरथुस्ट
Uttaranchal P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(b)
भगवान बुद्ध को ही ‘एशिया का ज्योति पुंज’ कहा जाता है। यह उपाधि उनकी शिक्षाओं — अहिंसा, करुणा, मध्यम मार्ग और चार आर्य सत्यों — के उस व्यापक प्रभाव को दर्शाती है जो उन्होंने पूरे एशिया महाद्वीप पर डाला। सर एडविन अर्नाल्ड की पुस्तक ‘The Light of Asia’ ने इस संज्ञा को विश्वव्यापी पहचान दिलाई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के चार आर्य सत्य हैं — दुःख, दुःख-समुदय (कारण), दुःख-निरोध (निवारण) और दुःख-निरोध-गामिनी-प्रतिपदा (मार्ग)। इन्हीं के आधार पर उन्होंने अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया, जो आज भी एशिया के करोड़ों बौद्ध अनुयायियों का जीवन-दर्शन है।
85. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, ‘पारमिता’ शब्द का सही विवरण निम्नलिखित में से कौन-सा है?
(a) सूत्र पद्धति में लिखे गए प्राचीनतम धर्मशास्त्र पाठ
(b) वेदों के प्राधिकार को अस्वीकार करने वाले दार्शनिक संप्रदाय
(c) परिपूर्णताएं जिनकी प्राप्ति से बोधिसत्व पथ प्रशस्त हुआ
(d) आरंभिक मध्यकालीन दक्षिण भारत की शक्तिशाली व्यापारी श्रेणियां
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
‘पारमिता’ संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है ‘परम सिद्धि’ या ‘पूर्णता’। महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्व को बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए षट्पारमिताओं को साधना आवश्यक है — दान (उदारता), शील (नैतिकता), क्षान्ति (धैर्य), वीर्य (परिश्रम), ध्यान (एकाग्रता) और प्रज्ञा (ज्ञान)। इनमें प्रज्ञा पारमिता सर्वोच्च मानी जाती है क्योंकि यही वास्तविकता के यथार्थ स्वरूप का बोध कराती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता’ बौद्ध धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो प्रज्ञापारमिता साहित्य का आधार माना जाता है — इसे ‘बुद्धों की माता’ भी कहा जाता है। थेरवाद (हीनयान) परंपरा में दस पारमिताओं का उल्लेख है, जबकि महायान में छह पारमिताओं को मान्यता दी गई है।
86. महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर को और किस अन्य नाम से जानते हैं?
(a) वज्रपाणि
(b) मंजुश्री
(c) पद्मपाणि
(d) मैत्रेय
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
महायान बौद्ध धर्म में अवलोकितेश्वर को ‘पद्मपाणि’ (कमल धारण करने वाला) भी कहा जाता है। ये बोधिसत्व करुणा के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी मान्यता है कि जब तक संसार के समस्त प्राणियों को मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक ये स्वयं बुद्धत्व ग्रहण नहीं करेंगे। हिंदू धर्म के प्रभाव से ‘अवलोकितेश्वर’ को नारायण या विष्णु के एक रूप के रूप में भी देखा गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अजंता की गुफाओं (विशेषकर गुफा संख्या 1) में अवलोकितेश्वर/पद्मपाणि की अत्यंत भव्य चित्रकारी मिलती है, जिसे भारतीय चित्रकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। तिब्बत में अवलोकितेश्वर को ‘चेनरेजिग’ कहा जाता है और दलाई लामा को उनका अवतार माना जाता है।
87. निम्नलिखित में से कौन-से शासक ने बौद्धमत के विस्तार योगदान नहीं दिया?
(a) हर्षवर्धन
(b) कनिष्क
(c) अशोक
(d) पुष्यमित्र शुंग
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(d)
अशोक, कनिष्क और हर्षवर्धन — इन तीनों शासकों ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके विपरीत, शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग ने वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करवाए और मौर्यकाल में उपेक्षित ब्राह्मण परंपराओं को पुनर्जीवित किया। इसीलिए उनका शासनकाल ‘वैदिक पुनर्जागरण’ का काल कहलाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था, जिसमें महायान बौद्ध धर्म को औपचारिक रूप से मान्यता मिली। पुष्यमित्र शुंग के बारे में बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि उसने बौद्ध विहारों को क्षति पहुँचाई, हालांकि यह विवादास्पद है।
88. बुद्ध की खड़ी प्रतिमा निम्न में से किस काल में बनाई गई?
(a) गुप्त काल
(b) कुषाण काल
(c) मौर्य काल
(d) गुप्तोत्तर काल
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(b)
कुषाण काल में गांधार और मथुरा — दो प्रमुख कला शैलियों के अंतर्गत बुद्ध तथा बोधिसत्वों की बड़ी संख्या में मूर्तियाँ बनाई गईं, जिनमें बैठी और खड़ी दोनों मुद्राएँ शामिल थीं। वी.एस. अग्रवाल के अनुसार बुद्ध मूर्तियों का निर्माण सर्वप्रथम मथुरा में हुआ। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार बुद्ध की प्रथम प्रतिमा कौशांबी में बनी, जबकि कई विद्वान यह श्रेय गांधार कला को देते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गांधार शैली पर ग्रीको-रोमन (यूनानी-रोमन) कला का स्पष्ट प्रभाव दिखता है — इसीलिए इसे ‘ग्रीको-बौद्ध कला’ भी कहा जाता है। गांधार मूर्तियाँ प्रायः नीले-भूरे रंग के शिस्ट पत्थर से बनती थीं, जबकि मथुरा शैली में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग होता था।
89. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-
1. परिव्राजक – परित्यागी व भ्रमणकारी
2. श्रमण – उच्च पद प्राप्त पुजारी
3. उपासक – बौद्ध धर्म का साधारण अनुगामी
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं ?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(b)
सही सुमेलन इस प्रकार है — ‘परिव्राजक’ का अर्थ है परित्यागी और भ्रमणशील साधक, जो गृहस्थ जीवन छोड़कर भटकते हुए ज्ञान की खोज करते थे। ‘श्रमण’ का अर्थ है भिक्षु या साधु — ये वे लोग थे जो कठोर साधना में विश्वास रखते थे; इनका संबंध उच्च पुजारी पद से नहीं था। ‘उपासक’ बौद्ध धर्म के गृहस्थ (साधारण) अनुयायी होते थे जो भिक्षु नहीं बनते।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म में संघ की सदस्यता चार वर्गों में विभाजित थी — भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक और उपासिका। ‘श्रमण’ परंपरा जैन धर्म में भी प्रचलित थी, जहाँ महावीर स्वामी स्वयं महान श्रमण कहलाते थे।
90. भगवान बुद्ध की प्रतिमा कभी-कभी एक हस्त मुद्रा युक्त दिखाई गई है, जिसे ‘भूमिस्पर्श मुद्रा’ कहा जाता है। यह किसका प्रतीक है?
(a) मार पर दृष्टि रखने एवं अपने ध्यान में विघ्न डालने से मार को रोकने के लिए बुद्ध का धरती आह्वान।
(b) मार के प्रलोभनों के बावजूद अपनी शुचिता और शुद्धता का साक्षी होने के लिए बुद्ध का धरती का आह्वान।
(c) बुद्ध का अपने अनुयायियों को स्मरण कराना कि वे सभी धरती से उत्पन्न होते हैं और अंततः धरती में विलीन हो जाते हैं, अतः जीवन संक्रमणशील है।
(d) इस संदर्भ में दोनों ही कथन
(a) एवं
(b) सही हैं।
I.A.S. (Pre) 2012
उत्तर-(b)
‘भूमिस्पर्श मुद्रा’ में बुद्ध की दाहिनी हाथ की उँगलियाँ नीचे की ओर भूमि को स्पर्श करती हैं। यह मुद्रा उस ऐतिहासिक क्षण का प्रतीक है जब बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ बुद्ध को मार (काम-देव) ने प्रलोभनों से विचलित करने का प्रयास किया। बुद्ध ने पृथ्वी को साक्षी मानकर अपनी तपस्या और शुचिता की प्रामाणिकता सिद्ध की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध की प्रमुख हस्त मुद्राओं में अभय मुद्रा (भय निवारण), धर्मचक्र मुद्रा (प्रथम उपदेश का प्रतीक, सारनाथ से संबंधित), ध्यान मुद्रा और वरद मुद्रा (वरदान देना) भी महत्वपूर्ण हैं। भूमिस्पर्श मुद्रा थेरवाद बौद्ध देशों — विशेषकर थाईलैंड, म्याँमार और श्रीलंका — में सर्वाधिक लोकप्रिय मूर्ति मुद्रा है।
91. बुद्ध की प्राचीनतम प्रतिमा किस शैली में प्राप्त होती है?
(a) गांधार शैली
(b) मथुरा शैली
(c) मौर्य शैली
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
66th B.P.S.C. Re-Exam 2020
उत्तर-(d)
बुद्ध की प्राचीनतम प्रतिमा किस शैली में बनी — यह प्रश्न अभी तक विद्वानों में विवादास्पद है। ह्वेनसांग के अनुसार प्रथम प्रतिमा कौशांबी में बनी, वी.एस. अग्रवाल मथुरा को श्रेय देते हैं, जबकि अनेक पाश्चात्य विद्वान गांधार कला को। चूँकि कोई एकमत नहीं है, इसलिए ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ (d) ही सही उत्तर है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्य काल में बुद्ध का प्रतीकात्मक चित्रण होता था — जैसे बोधि वृक्ष, धर्मचक्र, पदचिह्न या छत्र — मूर्तिरूप प्रतिमाएँ नहीं बनाई जाती थीं। मानवाकार बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण कुषाण काल में ही प्रारंभ हुआ।
92. निम्नलिखित वक्तव्यों पर विचार करें और नीचे दिए गए कूट से सही
कथन (a) : कुशीनगर मल्ल गणराज्य की राजधानी थी।
कारण (R) : महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ था। उत्तर चुनें-
(a) दोनों (a) और (R) सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (a) और (R) सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(b)
मल्ल महाजनपद एक संघ राज्य था जिसकी दो जुड़वां राजधानियाँ थीं — पावा (वर्तमान पडरौना) और कुशीनारा (वर्तमान कसया/कुशीनगर)। चूँकि कुशीनगर राजधानी तो थी, लेकिन यह तथ्य बुद्ध के महापरिनिर्वाण के कारण नहीं था — दोनों कथन स्वतंत्र रूप से सत्य हैं, अतः कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध का महापरिनिर्वाण लगभग 483 ई.पू. में हुआ और उनके अवशेषों (धातु) को आठ भागों में विभाजित कर विभिन्न स्थानों पर स्तूप बनाए गए। कुशीनगर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मंडल में स्थित है और बौद्ध तीर्थाटन का प्रमुख केंद्र है।
93. भूमिस्पर्श मुद्रा की सारनाथ बुद्ध मूर्ति संबंधित है-
(a) मौर्य काल से
(b) शुंग काल से
(c) कुषाण काल से
(d) गुप्त काल से
U.P.P.C.S.(Mains) 2009
उत्तर-(d)
सारनाथ में स्थित भूमिस्पर्श मुद्रा की बुद्ध प्रतिमा गुप्त काल की अनुपम कृति है। इसमें आध्यात्मिक शांति, सौम्य मुस्कान और ध्यानमग्न भाव की ऐसी अभिव्यक्ति है जो भारतीय मूर्तिकला के उच्चतम शिखर का प्रतिनिधित्व करती है। गुप्तकालीन मूर्तिकला में बाह्य विदेशी प्रभाव की जगह शुद्ध भारतीय शैली प्रधान हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ की यह मूर्ति चुनार के बलुआ पत्थर से बनी है और वर्तमान में सारनाथ संग्रहालय में सुरक्षित है। गुप्त काल को ‘भारतीय कला का स्वर्णयुग’ कहा जाता है — इसी काल में अजंता की गुफाओं की सर्वश्रेष्ठ चित्रकारी भी की गई।
94. सारनाथ की भूमि स्पर्श मुद्रा वाली बुद्ध प्रतिमा कालांकित है-
(a) कुषाण काल से
(b) गुप्त काल से
(c) वर्द्धन काल से
(d) राजपूत काल से
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
U.P. U.D.A./ L.D.A. (Spl.) (Mains) 2010
उत्तर-(b)
सारनाथ की भूमिस्पर्श मुद्रा वाली बुद्ध प्रतिमा गुप्त काल से संबंधित है — यही इस प्रश्न का उत्तर है, जैसा कि ऊपर के प्रश्न में भी स्पष्ट किया गया। गुप्त काल में मूर्तिकला में विदेशी प्रभाव समाप्त होकर एक परिपक्व और शुद्ध भारतीय शैली विकसित हुई जिसमें भावों की गहराई अद्वितीय थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन मूर्तिकला के प्रमुख केंद्र सारनाथ, मथुरा और पाटलिपुत्र थे। इस काल में बुद्ध की मूर्तियों पर पारदर्शी वस्त्र (जिसे ‘वेट ड्रेपरी’ कहते हैं) का प्रभावशाली चित्रण किया गया, जो कुषाण काल की शैली से एकदम अलग था।
95. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?
1. लोथल – प्राचीन गोदी क्षेत्र
2. सारनाथ -बुद्ध का प्रथम धर्मोपदेश
3. राजगीर – अशोक का सिंह स्तंभ शीर्ष
4. नालंदा – बौद्ध अधिगम का महान पीठ
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-

(a) 1, 2, 3 और 4
(b) 3 और 4
(c) 1, 2 और 4
(d) 1 और 2
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(c)
लोथल (गुजरात) से हड़प्पाकालीन गोदीबाड़े (Dockyard) के अवशेष प्राप्त हुए हैं — यह विश्व का प्राचीनतम ज्ञात बंदरगाह माना जाता है। सारनाथ में बुद्ध ने ज्ञानप्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश पाँच शिष्यों को दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तकालीन शासक कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। किंतु अशोक का प्रसिद्ध सिंह स्तंभ शीर्ष राजगीर में नहीं, बल्कि सारनाथ में है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ का अशोक स्तंभ शीर्ष (चार सिंह) वर्तमान में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है और सारनाथ संग्रहालय में संरक्षित है। नालंदा विश्वविद्यालय को 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था — यह विश्व के प्राचीनतम आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहाँ कोरिया, चीन, तिब्बत और मध्य एशिया से विद्यार्थी आते थे।
96. बोधिसत्व पद्मपाणि का चित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रायः चित्रित चित्रकारी है, जो –
(a) अजंता में है।
(b) बदामी में है।
(c) बाघ में है।
(d) एलोरा में है।
I.A.S. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
अजंता की गुफा संख्या 1 में स्थित बोधिसत्व पद्मपाणि का चित्र भारतीय चित्रकला के इतिहास में सर्वोच्च स्थान रखता है। इस चित्र में पद्मपाणि को नीलम जड़ित मुकुट, आभूषणों और एक कमल पुष्प के साथ दर्शाया गया है, जो करुणा और शांति का प्रतीक है। इसे लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईस्वी के बीच निर्मित माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अजंता की कुल 30 गुफाएँ हैं, जो वाघोरा नदी के किनारे महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित हैं और इन्हें UNESCO विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। पद्मपाणि का शाब्दिक अर्थ है “कमल हाथ में धारण करने वाला” — यह अवलोकितेश्वर बोधिसत्व का ही एक रूप है।
97. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
(a) 1. स्थाविरवादी महायान बौद्ध धर्म से संबद्ध हैं।
(a) 2. लोकोत्तरवादी संप्रदाय बौद्ध धर्म के महासंघिक संप्रदाय की एक शाखा थी।
(a) 3. महासंघिकों द्वारा बुद्ध के देवत्वारोपण ने महायान बौद्ध धर्म को प्रोत्साहित किया।
(a) उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(b)
बौद्ध धर्म में पहली महासंगीति (वैशाली, 383 ई.पू.) के बाद दो प्रमुख धाराएँ उभरीं — स्थविरवाद और महासंघिक। स्थविरवाद (Theravada) बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा से संबंधित है, महायान से नहीं — अतः कथन 1 गलत है। लोकोत्तरवाद महासंघिक संप्रदाय की एक प्रमुख उपशाखा थी जो बुद्ध को एक अलौकिक, लोकोत्तर (इस संसार से परे) सत्ता मानती थी — यह कथन 2 सही है। महासंघिकों ने ही बुद्ध को दैवीय स्वरूप में प्रस्तुत करना प्रारंभ किया, जिसने आगे चलकर महायान परंपरा में बोधिसत्व अवधारणा और बुद्ध की त्रिकाय सिद्धांत को जन्म दिया — कथन 3 भी सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महासंघिक संप्रदाय के नेतृत्व का श्रेय महाकस्सप को दिया जाता है। बौद्ध धर्म में कुल 18 निकाय (संप्रदाय) विकसित हुए जिनमें लोकोत्तरवाद एक महत्वपूर्ण निकाय था। ‘महावस्तु’ नामक महत्वपूर्ण ग्रंथ लोकोत्तरवाद संप्रदाय से ही संबंधित है।
98. हीनयान अवस्था का विशालतम एवं सर्वाधिक विकसित शैलकृत चैत्यगृह स्थित है-
(a) पीतलखोरा में
(b) जुन्नार में
(c) कार्ले में
(d) बेडसा में
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
कार्ले (या कार्ला) का चैत्यगृह महाराष्ट्र के पुणे जिले के मावल तालुका में स्थित है और यह हीनयान काल का सबसे विशाल एवं परिष्कृत शैलकृत (पत्थर काटकर बनाया गया) चैत्यगृह है। इसका निर्माण लगभग पहली–दूसरी शताब्दी ईस्वी में हुआ था। इसमें एक विशाल स्तूप, लकड़ी की सजावट और भव्य प्रवेश द्वार उल्लेखनीय हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चैत्यगृह एक प्रकार का बौद्ध प्रार्थना कक्ष होता था जिसके एक सिरे पर स्तूप स्थित रहता था। कार्ले का चैत्यगृह लगभग 40 मीटर लंबा और 15 मीटर चौड़ा है तथा इसके प्रवेश द्वार पर बने मिथुन युगल शिल्प भारतीय कला की अद्भुत मिसाल हैं।
99. भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन भावी बुद्ध है, जो संसार की रक्षा हेतु अवतरित होंगे?
(a) अवलोकितेश्वर
(b) लोकेश्वर
(c) मैत्रेय
(d) पद्मपाणि
I.A.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
बौद्ध परंपरा में मैत्रेय को भविष्य का बुद्ध माना गया है। मान्यता है कि जब इस संसार में धर्म का पूर्ण पतन हो जाएगा और मनुष्यों की आयु घटकर अत्यंत कम हो जाएगी, तब मैत्रेय बोधिसत्व पृथ्वी पर अवतरित होकर बुद्धत्व प्राप्त करेंगे और पुनः धर्म की स्थापना करेंगे। मैत्रेय शब्द ‘मैत्री’ (करुणा/प्रेम) से निकला है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मैत्रेय की अवधारणा महायान और थेरवाद — दोनों परंपराओं में स्वीकृत है, जो इसे बौद्ध धर्म की विभिन्न शाखाओं में सर्वमान्य बनाती है। हिमाचल प्रदेश के लद्दाख और स्पीति क्षेत्र में मैत्रेय की विशाल प्रतिमाएँ आज भी बौद्ध विहारों में स्थापित हैं, जिनमें लेह की मैत्रेय प्रतिमा विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
100. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
1. बोधिसत्व, बौद्धमत के हीनयान संप्रदाय की केंद्रीय संकल्पना है।
2. बोधिसत्व अपने प्रबोध के मार्ग पर बढ़ता हुआ करुणामय है।
3. बोधिसत्व समस्त सचेतन प्राणियों को उनके प्रबोध के मार्ग पर चलने में सहायता करने के लिए स्वयं की निर्वाण प्राप्ति विलंबित करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 2
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2016
उत्तर-(b)
बोधिसत्व की अवधारणा महायान बौद्ध धर्म की केंद्रीय संकल्पना है, हीनयान की नहीं — इसलिए कथन 1 गलत है। हीनयान में आदर्श अर्हत (Arhat) है जो केवल अपनी मुक्ति का प्रयास करता है। इसके विपरीत, बोधिसत्व वह प्राणी है जो बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता रखता है, लेकिन समस्त जीवों के उद्धार के लिए स्वेच्छा से निर्वाण को स्थगित करता है। बोधिसत्व का पूरा जीवन दस पारमिताओं (पूर्णताओं) — दान, शील, क्षमा, वीर्य, ध्यान, प्रज्ञा आदि — के पालन पर आधारित होता है। कथन 2 और 3 दोनों सही हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महायान बौद्ध धर्म में अवलोकितेश्वर, मंजुश्री और क्षितिगर्भ जैसे प्रमुख बोधिसत्वों की परंपरा विकसित हुई जिनकी आराधना आज भी तिब्बत, चीन, जापान और कोरिया में व्यापक रूप से की जाती है। ‘बोधिचित्त’ — अर्थात् सभी जीवों के लाभ के लिए बुद्ध बनने की संकल्प-शक्ति — बोधिसत्व पथ का आधार है।
100. नालंदा विश्वविद्यालय के संस्थापक कौन थे?
(a) चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
(b) कुमारगुप्त
(c) धर्मपाल
(d) पुष्यगुप्त
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
उत्तर-(b)
चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना ‘शक्रादित्य’ नामक राजा ने की थी, जिन्हें इतिहासकार कुमारगुप्त प्रथम (415–455 ई.) से समकक्ष मानते हैं। कुमारगुप्त ने बौद्ध त्रिरत्नों — बुद्ध, धम्म और संघ — के प्रति अगाध श्रद्धावश इस महाविहार की नींव रखी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा में एक समय 10,000 से अधिक विद्यार्थी और 2,000 शिक्षक निवास करते थे तथा यहाँ का पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ इतना विशाल था कि बख्तियार खिलजी द्वारा जलाए जाने पर वह कई महीनों तक धू-धू कर जलता रहा। इसके अलावा, नालंदा में प्रवेश परीक्षा इतनी कठिन थी कि अधिकांश आवेदक द्वारपाल स्तर पर ही बाहर कर दिए जाते थे।
101. शून्यता के सिद्धांत का सर्वप्रथम प्रतिपादन करने वाले बौद्ध दार्शनिक का नाम है-
(a) नागार्जुन
(b) नागसेन
(c) आनंद
(d) अश्वघोष
U.P.P.C.S. (Pre) 1998
उत्तर-(a)
शून्यवाद अथवा माध्यमिक दर्शन के प्रवर्तक नागार्जुन हैं। उनकी मूल रचना ‘माध्यमिककारिका’ में यह विचार प्रस्तुत किया गया कि कोई भी वस्तु स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखती — प्रत्येक वस्तु किसी-न-किसी कारण पर आश्रित है। ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ की इसी व्याख्या को नागार्जुन ने शून्यता कहा। इसे पश्चिमी दर्शन में ‘सापेक्षतावाद’ (Relativism) के समकक्ष माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नागार्जुन को ‘भारत का आइंस्टाइन’ भी कहा जाता है क्योंकि उनका शून्यवाद आधुनिक भौतिकी के सापेक्षता सिद्धांत से कई दार्शनिक समानताएं रखता है। इसके अलावा, तिब्बती परंपरा में नागार्जुन को ‘द्वितीय बुद्ध’ की संज्ञा दी गई है और उनकी रचनाएं तिब्बती बौद्ध धर्म की आधारशिला मानी जाती हैं।
102. बौद्ध शिक्षा का केंद्र है-
(a) विक्रमशिला
(b) वाराणसी
(c) गिरनार
(d) उज्जैन
M.P.P.C.S. (Pre) 2004
उत्तर-(a)
प्राचीन भारत में बौद्ध शिक्षा के तीन प्रधान केंद्र थे — नालंदा, वल्लभी और विक्रमशिला। विक्रमशिला की स्थापना पाल वंश के शासक धर्मपाल (770–810 ई.) ने बिहार के वर्तमान भागलपुर जिले के निकट की थी। यह वज्रयान (तंत्र) बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। वाराणसी हिंदू शिक्षा का, गिरनार जैन परंपरा का और उज्जैन अवंति की राजधानी के रूप में जाना जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विक्रमशिला में उस काल के प्रख्यात बौद्ध विद्वान अतीश दीपंकर (Atisha Dipankara) कार्यरत थे, जो बाद में तिब्बत गए और वहाँ बौद्ध धर्म के पुनरुद्धार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विक्रमशिला को भी 1203 ई. में बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था।
103. नीचे दो वक्तव्य दिए गए हैं, जिनमें एक कथन (a) और दूसरा कारण (R) है, दोनों को ध्यानपूर्वक पढ़ें-
कथन (a) बारहवीं शताब्दी के अंत तक नालंदा महाविहार का पतन हो गया।
कारण (R) : महाविहार को राजकीय प्रश्रय मिलना बंद हो गया था।
उपर्युक्त दोनों वक्तव्यों के संदर्भ में निम्नलिखित में कौन सही है?
(a) दोनों (a) और (R) सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या करता है।
(b) दोनों (a) और (R) सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(a)
नालंदा महाविहार गुप्त काल में अपने चरम पर था, किंतु पाल शासकों ने क्रमशः विक्रमशिला को अधिक महत्व देना शुरू किया जिससे नालंदा को मिलने वाला राजकीय संरक्षण घटता गया। इस कारण 12वीं सदी के अंत तक इसका क्रमिक पतन हो चुका था। अंततः 1193-1203 ई. के बीच बख्तियार खिलजी के आक्रमणों ने इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया। अतः कथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 2010 में भारत सरकार ने नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई और 2014 में ‘नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम’ पारित कर राजगीर, बिहार में आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। यूनेस्को ने 2016 में नालंदा के पुरातात्त्विक स्थल को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया।
104. वल्लभी विश्वविद्यालय स्थित था- उत्तर प्रदेश में
(a) बिहार में
(b)
(c) बंगाल में
(d) गुजरात में
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(d)
वल्लभी विश्वविद्यालय गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित था, जिसे आज ‘वल’ नाम से जाना जाता है। यह हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का पश्चिम भारत में सर्वप्रमुख केंद्र था। मैत्रक वंश के शासकों ने इस विश्वविद्यालय को भरपूर संरक्षण दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा के दौरान यहाँ का विस्तृत उल्लेख किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वल्लभी में आयोजित बौद्ध संगीतियों में हीनयान के ‘थेरवाद’ ग्रंथों का संकलन और सम्पादन किया गया। इसके अतिरिक्त, वल्लभी न केवल बौद्ध, बल्कि जैन धर्म की शिक्षा का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र था — जैन परंपरा में यहाँ एक महत्त्वपूर्ण जैन सभा (वल्लभी परिषद) आयोजित हुई थी जिसमें जैन आगमों का अंतिम संकलन हुआ।
105. नालंदा विश्वविद्यालय किसलिए विश्वप्रसिद्ध था?
(a) चिकित्सा विज्ञान
(b) तर्कशास्त्र
(c) बौद्ध धर्म दर्शन
(d) रसायन विज्ञान
42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
नालंदा विश्वविद्यालय की वैश्विक ख्याति बौद्ध धर्म-दर्शन की उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए थी। यहाँ महायान बौद्ध दर्शन, न्याय, व्याकरण, चिकित्साशास्त्र और खगोलशास्त्र भी पढ़ाए जाते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग यहाँ बौद्ध दर्शन की शिक्षा ग्रहण करने के लिए ही आया था और उसने लगभग पाँच वर्षों तक यहाँ अध्ययन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग के अतिरिक्त कोरिया के विद्वान ह्येचो (Hyecho) और तिब्बत के अनेक बौद्ध आचार्य भी नालंदा में अध्ययन के लिए आए थे, जो इसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमाण है। नालंदा में प्रवेश के लिए द्वारपाल विद्वानों से शास्त्रार्थ करना पड़ता था और केवल 20–30% अभ्यर्थी ही सफल हो पाते थे।
106. प्रथम शताब्दी ईस्वी में किस भारतीय बौद्ध भिक्षुक को चीन भेजा गया था?
(a) असंग
(b) अश्वघोष
(c) वसुमित्र
(d) नागार्जुन
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(d)
नागार्जुन कुषाण सम्राट कनिष्क के दरबार के प्रमुख बौद्ध विद्वानों में से एक थे। चीनी बौद्ध परंपराओं के अनुसार नागार्जुन ने चीन की यात्रा कर वहाँ बौद्ध धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ किया। उनकी ‘माध्यमिककारिका’ शून्यवाद की आधारभूत रचना मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नागार्जुन ने धातुओं के रूपांतरण और आयुर्वेद पर भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें ‘रसरत्नाकर’ और ‘आरोग्यमंजरी’ प्रमुख हैं — इस कारण उन्हें रसायनशास्त्र (Alchemy) के क्षेत्र में भी अग्रणी माना जाता है। इसके अलावा, चीन में उनके शून्यवाद दर्शन पर आधारित ‘सान-लुन’ (Three Treatise) बौद्ध संप्रदाय की स्थापना हुई।
107. नालंदा विश्वविद्यालय के स्थापन का युग है-
(a) मौर्य गंगार
(b) कुषाण
(c) गुप्त
(d) पाल
43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
उत्तर-(c)
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त काल में पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुई। कुमारगुप्त प्रथम ने यहाँ प्रथम दान देकर इसकी नींव रखी, जिसके पश्चात बुधगुप्त, तथागतगुप्त और बालादित्य जैसे गुप्त शासकों ने इसके विकास में योगदान दिया। राजगृह (राजगीर) के निकट स्थित यह संस्था महायान बौद्ध दर्शन का विश्वस्तरीय केंद्र बनी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त काल के बाद हर्षवर्धन (606–647 ई.) ने भी नालंदा को उदारतापूर्वक दान और संरक्षण दिया तथा वहाँ एक भव्य तांबे की मूर्ति स्थापित कराई। नालंदा का पुरातात्त्विक उत्खनन 1915–37 ई. के बीच भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा किया गया, जिसमें 11 मठ और 6 मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए।
108. हीनयान अवस्था का विशालतम एवं सर्वाधिक विकसित शैलकृत चैत्यगृह स्थित है-
(a) पीतलखोरा में
(b) जुन्नार में
(c) कार्ले में
(d) बेडसा में
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
महाराष्ट्र के पुणे जिले के मावल तालुका में स्थित कार्ले (कार्ला) गुफाओं का चैत्यगृह हीनयान काल का सबसे बड़ा और सर्वाधिक परिष्कृत शैलकृत (चट्टान काटकर बनाया गया) स्थापत्य उदाहरण है। इसका निर्माण लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में हुआ था। चैत्यगृह में विशाल अश्वशाल (Horse-shoe arch), अष्टकोणीय स्तंभ और एक विशाल स्तूप स्थित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्ले के चैत्यगृह की लंबाई लगभग 37.8 मीटर और ऊँचाई लगभग 13.7 मीटर है, जो इसे भारत के सभी शैलकृत चैत्यगृहों में सबसे बड़ा बनाती है। इसके प्रवेशद्वार पर ‘मिथुन मूर्तियाँ’ (युगल आकृतियाँ) उकेरी गई हैं जो उस काल की उत्कृष्ट शिल्पकला का प्रतिनिधित्व करती हैं।
109. निम्नलिखित में से किस शैलकृत गुफा में ग्यारह सिरों के बोधिसत्व का अंकन मिलता है?
(a) अजंता
(b) एलोरा
(c) कन्हेरी
(d) कार्ले
U.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में सलसेट द्वीप पर स्थित कन्हेरी गुफाएं बौद्ध कला और स्थापत्य का अद्भुत संग्रह हैं। गुफा संख्या 41 में अवलोकितेश्वर बोधिसत्व की एक अत्यंत दुर्लभ मूर्ति स्थित है जिसमें चार भुजाएं और ग्यारह मुख हैं — यह अपनी प्रकार की भारत में एकमात्र मूर्ति है। इस रूप की उपासना 7वीं–8वीं शताब्दी में चीन, कंबोडिया, चीनी तुर्किस्तान और जापान में व्यापक रूप से प्रचलित थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कन्हेरी गुफाओं का निर्माण पहली शताब्दी ईसा पूर्व में आरंभ हुआ और 11वीं शताब्दी ईस्वी तक इनका उपयोग होता रहा — यह लगभग 1,200 वर्षों की अखंड बौद्ध गतिविधि का साक्षी स्थल है। यहाँ एक ही पहाड़ी में 109 गुफाएं हैं, जो किसी एकल पहाड़ी पर निर्मित गुफाओं की सर्वाधिक संख्या है।
110. कुछ शैलकृत बौद्ध गुफाओं को चैत्य कहते हैं, जबकि अन्य को विहार दोनों में क्या अंतर है?
(a) विहार पूजा स्थल होता है, जबकि चैत्य बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थान है।
(b) चैत्य पूजा स्थल होता है, जबकि विहार बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थान है।
(c) चैत्य गुफा के दूर के सिरे पर स्तूप होता है, जबकि विहार गुफा पर अक्षीय कक्ष होता है।
(d) दोनों में कोई वस्तुपरक अंतर नहीं होता।
I.A.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
चैत्य मूलतः उन स्मारकों को कहा जाता था जो किसी महापुरुष के दाह-संस्कार के बाद बचे अवशेषों के ऊपर बनाए जाते थे। कालांतर में बौद्ध धर्म में चैत्य उपासना एवं पूजा के प्रमुख केंद्र बन गए। इनमें प्रायः एक स्तूप भी होता था जिसके चारों ओर परिक्रमा की जाती थी। विहार वे आवासीय भवन थे जहाँ बौद्ध भिक्षु निवास करते थे और अध्ययन-मनन करते थे। अतः चैत्य = पूजा स्थल और विहार = निवास स्थान।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अजंता की गुफाएँ (महाराष्ट्र) चैत्य और विहार दोनों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं — गुफा संख्या 9, 10, 19 और 26 चैत्यगृह हैं, जबकि शेष विहार हैं। एलोरा की गुफा संख्या 10 (विश्वकर्मा गुफा) भी एक प्रसिद्ध बौद्ध चैत्यगृह है।
111. बौद्ध दर्शन के अनुसार विचार कीजिए-
कथन (a) : पुनर्जन्म नहीं होता है।
कारण (R) : आत्मा की सत्ता नहीं है। निम्नलिखित कूट से अपना
कूट : उत्तर चुनिए :
(a) (a) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R) सही व्याख्या है (a) की।
(b) (a) तथा (R) दोनों सही है, किंतु (R) सही व्याख्या नहीं है (a) की।
(c) (a) सही है, किंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, किंतु (R) सही है।
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(d)
बौद्ध दर्शन में आत्मा की स्थायी सत्ता को अस्वीकार किया गया है — इसे ‘अनात्मवाद’ कहते हैं। बुद्ध के अनुसार व्यक्ति पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का समूह मात्र है, कोई अपरिवर्तनीय आत्मा नहीं। परंतु इसके बावजूद बौद्ध दर्शन पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को मानता है — जीवन एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवाहित होता है, जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक जलता है। अतः कथन (A) गलत है किंतु कारण (R) सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध ने आत्मा के प्रश्न पर मौन रहना उचित समझा — इसे ‘अव्याकृत प्रश्न’ कहा जाता है। बौद्ध दर्शन में ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ (Dependent Origination) का सिद्धांत यह समझाता है कि पुनर्जन्म आत्मा के स्थानांतरण से नहीं, बल्कि कर्म-ऊर्जा की निरंतरता से होता है।
112. भगवान बुद्ध ने निम्नलिखित चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन किया। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके उन्हें सही क्रम में रखिए :
A. दुःख है।
B. दुःख का निरोध है।
C. दुःख निरोध का मार्ग है।
D. दुःख का कारण है। कूट :
(a) ADBC
(b) AD C B
(c) ACBD
(d) A B D C
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(a)
बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। इस उपदेश में उन्होंने चार आर्य सत्यों का उल्लेख किया — (1) दुःख: जीवन दुःखमय है, (2) दुःख समुदाय: दुःख का कारण तृष्णा है, (3) दुःख निरोध: तृष्णा का अंत करने पर दुःख समाप्त होता है, (4) दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा: अष्टांगिक मार्ग इसका उपाय है। सही क्रम A→D→B→C है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अष्टांगिक मार्ग को ‘मध्यम मार्ग’ भी कहा जाता है क्योंकि यह अति-भोग और अति-तप दोनों से बचता है। बौद्ध धर्म में इस मार्ग को तीन भागों में बाँटा गया है — शील (नैतिकता), समाधि (एकाग्रता), और प्रज्ञा (ज्ञान)।
113. बौद्ध तथा जैन दोनों ही धर्म विश्वास करते हैं, कि-
(a) कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धांत सही हैं।
(b) मृत्यु के पश्चात ही मोक्ष संभव है।
(c) स्त्री तथा पुरुष दोनों ही मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।
(d) जीवन में मध्यम मार्ग सर्वश्रेष्ठ है।
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(a)
बौद्ध और जैन दोनों धर्म कर्मवाद और पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानते हैं। दोनों का मानना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसके अगले जन्म को निर्धारित करते हैं और मोक्ष प्राप्ति से इस चक्र का अंत होता है। दोनों धर्मों ने वेदों की अपौरुषेयता और ब्राह्मण कर्मकांडों को अस्वीकार किया। ‘मध्यम मार्ग’ केवल बौद्ध धर्म की विशेषता है, जैन धर्म में नहीं; जैन धर्म कठोर तप को महत्व देता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में कर्म को एक सूक्ष्म भौतिक पदार्थ माना गया है जो आत्मा से चिपकता है — इसे ‘कर्म-परमाणु’ कहते हैं। बौद्ध धर्म में कर्म एक मानसिक अभिप्राय (Intention/Cetana) है, न कि भौतिक।
114. निम्नलिखित में से कौन-से बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों में समान रूप से विद्यमान थे?
1. तप और भोग की अति का परिहार
2. वेद प्रामाण्य के प्रति अनास्था
3. कर्मकांडों की फलवत्ता का निषेध
4. प्राणियों की हिंसा का निषेध (अहिंसा)
नीचे दिए हुए कूट का प्रयोग करते हुए सही
कूट : उत्तर का चयन कीजिए-
(a) 1, 2, 3 और 4
(c) 1, 3 और 4
(b) 2, 3 और 4
(d) 1 और 2
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(b)
बौद्ध और जैन धर्म दोनों में वेदों की प्रामाणिकता का खंडन, कर्मकांडों की अस्वीकृति और अहिंसा का सिद्धांत समान रूप से पाया जाता है। हालाँकि ‘तप और भोग की अति का परिहार’ अर्थात् मध्यम मार्ग केवल बौद्ध धर्म की विशेषता है — बुद्ध ने स्वयं छः वर्षों के कठोर तप के बाद इसे त्यागकर मध्यम मार्ग अपनाया। जैन धर्म में कठोर तप को मोक्ष का आवश्यक साधन माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में अहिंसा इतनी व्यापक है कि दिगंबर जैन साधु वस्त्र तक नहीं पहनते और पैरों तले आने वाले जीवों को बचाने के लिए मुँहपत्ती और रजोहरण रखते हैं। बौद्ध धर्म में भी अहिंसा है किंतु यह जैन धर्म जितनी कठोर नहीं — बौद्ध भिक्षु माँसाहार की कुछ परिस्थितियों में अनुमति देते थे (त्रिकोटि पवित्र माँस)।
115. प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों में समान रूप से विद्यमान था/ थे?
1. तप और भोग की अति का परिहार
2. वेद-प्रामाण्य के प्रति अनास्था
3. कर्मकांडों की फलवत्ता का निषेध
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2012
उत्तर-(b)
बौद्ध और जैन दोनों धर्मों में वेद-प्रामाण्य के प्रति अनास्था और कर्मकांडों की निरर्थकता समान रूप से मानी गई है। परंतु तप और भोग की अति का परिहार (मध्यम मार्ग) केवल बौद्ध धर्म में है। जैन धर्म में महावीर ने स्वयं 12 वर्षों तक कठोर तप किया और इसे मोक्ष का अनिवार्य मार्ग माना। अतः केवल कथन 2 और 3 दोनों धर्मों में समान हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: छठी शताब्दी ईसा पूर्व को ‘श्रमण परंपरा का युग’ कहा जाता है — बौद्ध और जैन दोनों इसी धारा के अंग हैं। इस काल में वैदिक ब्राह्मण परंपरा के विरुद्ध कई नए दर्शन उभरे जिनमें आजीवक और चार्वाक भी प्रमुख थे।
116. निम्नलिखित में से कौन-सी बात बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म में समान नहीं है?
(a) अहिंसा
(b) वेदों के प्रति उदासीनता
(c) आत्म दमन
(d) रीति-रिवाजों की अस्वीकृति
44th B.P.S.C. (Pre) 2000
उत्तर-(c)
बौद्ध और जैन धर्म दोनों में अहिंसा, वेद-विरोध और कर्मकांड-अस्वीकृति समान रूप से पाई जाती है। किंतु ‘आत्म दमन’ अर्थात् शरीर को कष्ट देकर मोक्ष पाने का मार्ग केवल जैन धर्म में स्वीकार्य है। बुद्ध ने इसे अनुचित मानते हुए मध्यम मार्ग का उपदेश दिया — न अति भोग, न अति तप।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में ‘सल्लेखना’ (स्वेच्छा से क्रमशः उपवास करके मृत्यु वरण करना) को सर्वोच्च तप माना गया है — महावीर के अनेक अनुयायियों ने इसे अपनाया। बौद्ध धर्म में ऐसी किसी प्रथा को मान्यता नहीं दी गई।
117. बौद्ध धर्म के विषय में कौन-सा कथन सही है?
(1) उसने वर्ण एवं जाति को अस्वीकार नहीं किया।
(2) उसने ब्राह्मण वर्ग की सर्वोच्च सामाजिक कोटि को चुनौती दी।
(3) उसने कुछेक शिल्पों को निम्न माना।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
कूट :
(a) 1 तथा 2
(b) 2 तथा 3
(c) 1, 2 तथा 3
(d) उपर्युक्त में कोई नहीं
U.P.P.C.S. (Pre) 1998
उत्तर-(c)
बौद्ध धर्म ने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे जन्म के बजाय कर्म पर आधारित करने का प्रयास किया। उसने ब्राह्मणों की जन्मजात सर्वोच्चता को अस्वीकार किया और संघ में सभी वर्णों को प्रवेश दिया। इसके साथ ही कुछ व्यवसायों जैसे बूचड़, शराब व्यापारी आदि को बौद्ध ग्रंथों में निम्न माना गया है। अतः तीनों कथन सही हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध संघ में स्त्रियों को भी प्रवेश दिया गया — इसे भिक्षुणी संघ कहते हैं। यह प्रवेश बुद्ध की मौसी महाप्रजापति गौतमी के अनुरोध पर आनंद के माध्यम से हुआ, जिसे बुद्ध ने प्रारंभ में अस्वीकार किया था। बौद्ध धर्म में निम्न कुलों से आए व्यक्ति जैसे उपाली (नाई) भी वरिष्ठ भिक्षु बने — यह तत्कालीन समाज के लिए क्रांतिकारी था।
118. ‘नव नालंदा महाविहार’ किसके लिए विख्यात है?
(a) ह्वेनसांग स्मारक
(b) महावीर का जन्मस्थान
(c) पाली अनुसंधान संस्थान
(d) संग्रहालय
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(c)
नव नालंदा महाविहार की स्थापना बिहार सरकार द्वारा 1951 में नालंदा (राजगीर के निकट) में की गई थी। यह संस्थान पाली भाषा और बौद्ध अध्ययन का प्रमुख आधुनिक केंद्र है। यहाँ श्रीलंका, जापान, म्याँमार, कोरिया, तिब्बत, भूटान आदि देशों के शोधार्थी अध्ययन के लिए आते हैं। वर्ष 2006 में इसे ‘डीम्ड विश्वविद्यालय’ का दर्जा प्रदान किया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं–12वीं शताब्दी) को गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने स्थापित किया था और यह तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा शिक्षण केंद्र था — यहाँ एक समय में 10,000 से अधिक विद्यार्थी और 2,000 शिक्षक रहते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं शताब्दी) ने यहाँ अध्ययन किया और नालंदा के विस्तृत विवरण अपने यात्रा-वृत्तांत में दर्ज किए।
119. सुल्तानी युग में बौद्धों की कौन-सी शाखा सबसे प्रभावशाली थी?
(a) थेरवाद
(b) हीनयान
(c) वज्रयान
(d) तंत्र्यान
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
सुल्तानी (मध्यकालीन) युग में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा सर्वाधिक प्रभावशाली थी। इसका उद्भव लगभग 7वीं-8वीं शताब्दी में हुआ और यह तांत्रिक साधनाओं, मंत्रों तथा अनुष्ठानों पर आधारित थी। इसके मूल सिद्धांत ‘मंजुश्रीमूलकल्प’ और ‘गुह्यसमाज’ जैसे ग्रंथों में संकलित हैं। पाल वंश के शासकों ने वज्रयान को विशेष संरक्षण दिया, जिसके चलते यह बंगाल और बिहार में खूब फला-फूला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वज्रयान बौद्ध धर्म तिब्बत में भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ और वहाँ इसे ‘लामावाद’ के रूप में जाना गया। तिब्बती बौद्ध धर्म आज भी मुख्यतः वज्रयान परंपरा का अनुसरण करता है।
120. नीचे दो वक्तव्य दिए गए हैं, जिनमें एक कथन (a) और दूसरा कारण (R) है, दोनों को ध्यानपूर्वक पढ़ें-
कथन (a) बारहवीं शताब्दी के अंत तक नालंदा महाविहार का पतन हो गया।
कारण (R) : महाविहार को राजकीय प्रश्रय मिलना बंद हो गया था।
उपर्युक्त दोनों वक्तव्यों के संदर्भ में निम्नलिखित में कौन सही है?
(a) दोनों (a) और (R) सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या करता है।
(b) दोनों (a) और (R) सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(a)
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तकाल (5वीं शताब्दी) में हुई और यह प्राचीन भारत का सबसे बड़ा बौद्ध शिक्षा केंद्र था, जहाँ 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 से अधिक शिक्षक थे। पाल वंश के शासक धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना कर उसे अधिक महत्व दिया, जिससे नालंदा को मिलने वाला राजकीय संरक्षण धीरे-धीरे कम होता गया। इस कारण 12वीं शताब्दी के अंत तक नालंदा का क्रमिक पतन हो चुका था। तत्पश्चात 1193 ई. में बख्तियार खिलजी ने इसे जलाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया। अतः कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में नालंदा की यात्रा की थी और अपने यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ में इसका विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने यहाँ लगभग दो वर्षों तक अध्ययन किया था। नालंदा के खंडहरों को 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।
121. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
1. सौत्रांतिक और सम्मितीय जैन मत के संप्रदाय थे।
2. सर्वास्तिवादियों की मान्यता थी कि दृग्विषय (फिनोमिना) के अवयव पूर्णतः क्षणिक नहीं हैं, अपितु अव्यक्त रूप से सदैव विद्यमान रहते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
I.A.S. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
सौत्रांतिक और सम्मितीय वास्तव में बौद्ध धर्म के संप्रदाय हैं, न कि जैन धर्म के। अतः कथन 1 गलत है। सर्वास्तिवाद का शाब्दिक अर्थ है — ‘सर्वम् अस्ति’ अर्थात् ‘सब कुछ (तीनों कालों में) विद्यमान है।’ इस संप्रदाय की मान्यता थी कि धर्म (मानसिक एवं भौतिक तत्व) तीनों कालों — भूत, वर्तमान और भविष्य — में किसी न किसी रूप में अव्यक्त अवस्था में बने रहते हैं, वे पूर्णतः क्षणिक नहीं होते। इस प्रकार कथन 2 सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सर्वास्तिवादियों ने तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र, अशोक के समय) के निर्णयों से असहमत होकर कश्मीर में अलग संप्रदाय स्थापित किया। कनिष्क के काल में कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति मुख्यतः सर्वास्तिवादियों द्वारा ही संचालित की गई थी, जिसमें ‘महाविभाषा’ नामक विशाल टीका ग्रंथ की रचना हुई।
122. आरंभिक मध्ययुगीन समय में बौद्ध धर्म का पतन किस/किन कारण| कारणों से शुरू हुआ?
1.उस समय तक बुद्ध, विष्णु के अवतार समझे जाने लगे और वैष्णव धर्म का हिस्सा बन गए।
2.अंतिम गुप्त राजा के समय तक आक्रमण करने वाली मध्य एशिया की जनजातियों ने हिंदू धर्म को अपनाया और बौद्धों को सताया।
3. गुप्त वंश के राजाओं ने बौद्ध धर्म का पुरजोर विरोध किया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है हैं ?
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
आरंभिक मध्यकाल में बौद्ध धर्म के पतन का एक प्रमुख कारण यह था कि हिंदू धर्म ने बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया, जिससे बौद्ध धर्म की स्वतंत्र पहचान धीरे-धीरे वैष्णव परंपरा में समाहित होने लगी। कथन 2 असत्य है क्योंकि मध्य एशियाई आक्रांताओं ने बौद्धों को सताया नहीं, बल्कि उन्होंने स्वयं बौद्ध धर्म अपनाया। कथन 3 भी असत्य है — गुप्त शासक मुख्यतः वैष्णव थे, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म का विरोध नहीं किया बल्कि धार्मिक सहिष्णुता बनाए रखी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म के पतन में आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) की अद्वैत वेदांत दर्शन की लहर की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, जिसने बौद्ध दर्शन को तार्किक रूप से चुनौती दी। इसके अतिरिक्त बौद्ध संस्थाओं का अत्यधिक भूमि-संपदा पर निर्भर हो जाना और जन-सामान्य से कट जाना भी पतन का एक महत्वपूर्ण आंतरिक कारण था।
123. निम्नांकित कथनों पर विचार करें एवं ‘चैत्य’ तथा ‘विहार’ में क्या अंतर हैं, इसे चुनें-
(a) विहार पूजा स्थल होता है, जबकि चैत्य बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थल है।
(b) चैत्य पूजा स्थल होता है, जबकि विहार निवास स्थान है।
(c) दोनों में विशेषतः कोई अंतर नहीं है।
(d) विहार एवं चैत्य दोनों ही निवास स्थान के रूप में प्रयोग हो सकते हैं।
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
चैत्य शब्द की उत्पत्ति ‘चिता’ से मानी जाती है। किसी महापुरुष के अंतिम संस्कार के बाद उनके अवशेषों पर निर्मित स्मारक को चैत्य या स्तूप कहा जाता था। धीरे-धीरे ये धार्मिक उपासना के केंद्र बन गए। चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के लिए आवासीय भवन बनाए जाते थे जिन्हें ‘विहार’ कहते थे। इस प्रकार चैत्य = पूजा स्थल, विहार = निवास स्थान।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘विहार’ शब्द से ही भारत के राज्य ‘बिहार’ का नाम पड़ा, क्योंकि प्राचीन काल में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में बौद्ध विहार थे। नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे विशाल शिक्षा केंद्र भी मूलतः विहार ही थे जो कालांतर में विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुए।
124. बौद्ध धर्म के विस्तार के कारणों में सम्मिलित थे-
1.धर्म की सादगी
2.दलितों के लिए विशेष
3.अपील धर्म की मिशनरी भावना
4. स्थानीय भाषा का प्रयोग
5. दार्शनिकों द्वारा वैदिक भावना की सुदृढ़ता
नीचे दिए कूट में से सही कूट : उत्तर का चयन कीजिए :
(a) 1, 2 और 3
(c) 1, 2, 3 और 4
(b) 2, 3 और 4
(d) 2, 3, 4 और 5
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(c)
बौद्ध धर्म के व्यापक प्रसार के पीछे कई कारण थे। सबसे पहले, इसकी शिक्षाएँ सरल और व्यावहारिक थीं — जाति-भेद का विरोध, अहिंसा और करुणा पर बल। दूसरे, यह दलितों और निम्न वर्गों के लिए विशेष रूप से आकर्षक था क्योंकि इसमें जन्म-आधारित भेदभाव नहीं था। तीसरे, बौद्ध भिक्षु जन-जन तक धर्म का प्रचार करने की मिशनरी भावना से कार्य करते थे। चौथे, बुद्ध ने उस काल की आम जनता की भाषा पाली का प्रयोग किया, जिससे धर्म सर्वसुलभ बना। परंतु ‘वैदिक भावना की सुदृढ़ता’ बौद्ध धर्म के प्रसार का कारण नहीं थी, बल्कि यह वैदिक व्यवस्था की एक विशेषता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सम्राट अशोक (268-232 ई.पू.) ने बौद्ध धर्म को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने में सर्वाधिक योगदान दिया। उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा, जहाँ बौद्ध धर्म आज भी राजकीय धर्म है। संघमित्रा बोधि वृक्ष की एक शाखा भी श्रीलंका ले गई थीं।

📚 Chapters

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Swipe left/right to change content

Share This Page

WhatsApp Telegram