वैकोम सत्याग्रह (1924–25) : पेरियार, गांधी और अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत वैकोम सत्याग्रह (1924–25)
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वैकोम सत्याग्रह : परिचय

वैकोम सत्याग्रह वर्ष 1924–25 में तत्कालीन त्रावणकोर रियासत में अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध चलाया गया एक महत्वपूर्ण सामाजिक आंदोलन था।

➣ इसका मुख्य केंद्र वैकोम महादेव मंदिर था, जिसके आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर निम्न जातियों के लोगों के आवागमन पर प्रतिबंध लगा हुआ था।

➣ ध्यान दें, सत्याग्रह का तत्काल उद्देश्य मंदिर में प्रवेश प्राप्त करना नहीं, बल्कि मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर सभी जातियों के लोगों को चलने का समान अधिकार दिलाना था।

➣ इसलिए वैकोम सत्याग्रह को केवल मंदिर प्रवेश आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि समान नागरिक अधिकार और अस्पृश्यता-विरोध के संघर्ष के रूप में समझा जाता है।

➣ इस आंदोलन की प्रारंभिक पहल टी. के. माधवन, के. पी. केशव मेनन और के. केलप्पन जैसे केरल के नेताओं ने की।

➣ आगे चलकर पेरियार, महात्मा गांधी, श्री नारायण गुरु के अनुयायी, अकाली स्वयंसेवक और विभिन्न सामाजिक संगठनों के सहयोग से इसका दायरा व्यापक हुआ।

30 मार्च 1924 को शुरू हुआ यह सत्याग्रह लगभग 20 महीने तक चला। लंबे संघर्ष के बाद 1925 में मंदिर के आसपास की तीन सार्वजनिक सड़कें सभी जातियों के लिए खोल दी गईं। हालांकि मंदिर प्रवेश और कुछ अन्य मार्गों का प्रश्न बाद तक बना रहा।

➣ आगे चलकर इस संघर्ष ने 1936 की त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा जैसी व्यापक सामाजिक परिवर्तनकारी पहल की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पृष्ठभूमि

त्रावणकोर में जातिगत भेदभाव की स्थिति

➣ 19वीं और 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में त्रावणकोर की सामाजिक व्यवस्था में जाति आधारित ऊँच-नीच और अस्पृश्यता का प्रभाव बहुत गहरा था।

➣ कुछ समुदायों को केवल मंदिरों में प्रवेश से ही नहीं, बल्कि मंदिरों के आसपास की सड़कों, सार्वजनिक स्थानों और अन्य सामाजिक सुविधाओं के उपयोग में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता था।

➣ विशेष रूप से अवर्ण और अस्पृश्य माने जाने वाले समुदायों के लिए सामाजिक दूरी और आवागमन से जुड़े कठोर नियम लागू थे।

➣ ऊँची जातियों के धार्मिक एवं सामाजिक वर्चस्व के कारण निम्न जातियों को सामान्य नागरिकों के समान अधिकार प्राप्त नहीं थे। इससे यह प्रश्न धीरे-धीरे सामने आने लगा कि सार्वजनिक मार्गों और सुविधाओं का उपयोग जाति के आधार पर कैसे रोका जा सकता है?

➣ वैकोम मंदिर के आसपास की सड़कें इसी भेदभाव का स्पष्ट उदाहरण थीं। ये मार्ग सार्वजनिक आवागमन के लिए उपयोग होते थे, लेकिन मंदिर के निकट होने के कारण कुछ जातियों को वहाँ से गुजरने की अनुमति नहीं थी।

➣ इस व्यवस्था ने धार्मिक परंपरा और नागरिक अधिकार के बीच एक महत्वपूर्ण संघर्ष को जन्म दिया।

सामाजिक सुधार आंदोलनों का प्रभाव

➣ वैकोम सत्याग्रह की पृष्ठभूमि केवल कांग्रेस की राजनीति से नहीं बनी थी। केरल में पहले से ही श्री नारायण गुरु जैसे समाज सुधारकों के नेतृत्व में जातिगत भेदभाव के विरुद्ध सामाजिक चेतना विकसित हो रही थी।

➣ श्री नारायण गुरु का संदेश समानता, सामाजिक सुधार और जातिगत ऊँच-नीच के विरोध पर आधारित था और इससे निम्न जातियों में आत्मसम्मान की भावना को बल मिला।

➣ इसी व्यापक सामाजिक जागरण के बीच एस.एन.डी.पी. योगम जैसे संगठनों ने शिक्षा और सामाजिक सुधार के माध्यम से पिछड़े समुदायों को संगठित किया।

➣ केरल में विकसित यह सामाजिक चेतना आगे चलकर सार्वजनिक अधिकारों और अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण आधार बनी।

➣ इसी वातावरण में अय्यंकाली जैसे नेताओं ने भी निम्न जातियों के शिक्षा और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

➣ इन प्रारंभिक सुधार आंदोलनों ने यह विचार मजबूत किया कि सामाजिक स्थिति केवल जन्म से निर्धारित नहीं होनी चाहिए और सार्वजनिक जीवन में समान अधिकार सभी को मिलने चाहिए।

राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों की बढ़ती मांग

➣ 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक त्रावणकोर में जातिगत भेदभाव के विरुद्ध आवाज केवल सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं रही। धीरे-धीरे यह मांग सरकार और विधायी संस्थाओं तक पहुँचने लगी।

➣ निम्न जातियों से जुड़े शिक्षित नेताओं ने सार्वजनिक सुविधाओं और नागरिक अधिकारों में समानता की मांग उठानी शुरू की।

➣ त्रावणकोर की श्री मूलम प्रजा सभा जैसे मंचों पर भी सामाजिक भेदभाव से जुड़े प्रश्न उठने लगे। निम्न जातियों से आने वाले प्रतिनिधियों और समाज सुधारकों ने ऐसी व्यवस्थाओं की आलोचना की जिनके कारण बड़ी आबादी सार्वजनिक जीवन में बराबरी का स्थान प्राप्त नहीं कर पा रही थी। इससे सामाजिक सुधार की मांग धीरे-धीरे नागरिक अधिकारों के प्रश्न में बदलने लगी।

➣ वैकोम में मंदिर के आसपास की सड़कों का प्रश्न इसी व्यापक सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का हिस्सा था। आंदोलनकारियों का तर्क था कि यदि सड़कें सार्वजनिक हैं, तो उनका उपयोग जाति के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए

वैकोम संघर्ष की आवश्यकता क्यों पड़ी?

➣ वैकोम मंदिर के आसपास निम्न जातियों के आवागमन पर प्रतिबंध के विरुद्ध अनेक स्तरों पर निवेदन और विरोध किए गए, लेकिन तत्काल कोई प्रभावी समाधान नहीं निकला।

➣ जब सामान्य अनुरोधों से स्थिति नहीं बदली, तब सुधारवादी नेताओं ने प्रत्यक्ष और शांतिपूर्ण आंदोलन का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया।

➣ इसी परिस्थिति में वैकोम को अस्पृश्यता-विरोधी सत्याग्रह के केंद्र के रूप में चुना गया। आंदोलनकारियों का तत्काल लक्ष्य मंदिर में प्रवेश प्राप्त करना नहीं, बल्कि मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर सभी जातियों के लिए समान आवागमन का अधिकार स्थापित करना था।

➣ इस प्रकार वैकोम सत्याग्रह की पृष्ठभूमि को त्रावणकोर की जातिगत व्यवस्था, अस्पृश्य समुदायों पर सामाजिक एवं आवागमन संबंधी प्रतिबंध, नागरिक अधिकारों की बढ़ती मांग, सार्वजनिक सड़कों पर समान अधिकार के लिए प्रत्यक्ष संघर्ष की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है।

स्थान वैकोम, त्रावणकोर रियासत
मुख्य धार्मिक केंद्र वैकोम महादेव मंदिर
मुख्य समस्या मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर जाति आधारित प्रतिबंध
तत्काल मांग सभी जातियों के लिए सार्वजनिक सड़कों पर आवागमन का अधिकार
व्यापक मुद्दा अस्पृश्यता, सामाजिक समानता और नागरिक अधिकार
सामाजिक पृष्ठभूमि श्री नारायण गुरु, SNDP योगम और अन्य केरल सुधार आंदोलनों से बढ़ती सामाजिक चेतना

टी. के. माधवन की भूमिका और आंदोलन की तैयारी

➣ केरल में श्री नारायण गुरु, एस.एन.डी.पी. योगम तथा अन्य सामाजिक संगठनों के प्रयासों से निम्न जातियों में शिक्षा, सामाजिक समानता और आत्मसम्मान के प्रति जागरूकता बढ़ रही थी।

➣ इसी वातावरण में टी. के. माधवन ने वैकोम और त्रावणकोर में अछूत माने जाने वाले समुदायों के सार्वजनिक तथा धार्मिक अधिकारों का प्रश्न प्रमुखता से उठाया।

टी. के. माधवन ने सबसे पहले मंदिर प्रवेश और सार्वजनिक मार्गों के उपयोग के प्रश्न को व्यवस्थित रूप से उठाया। 1917 में उन्होंने ‘देशाभिमानी’ में मंदिर प्रवेश के प्रश्न पर लिखा।

➣ बाद के वर्षों में उन्होंने त्रावणकोर की विधान सभा और सामाजिक संगठनों के सामने भी इस समस्या को उठाया। 1919 में लगभग 5,000 इझावा लोगों की एक सभा ने त्रावणकोर के सभी सरकारी नियंत्रण वाले हिंदू मंदिरों में प्रवेश की मांग की।

गांधी और टी. के. माधवन की मुलाकात

1921 में महात्मा गांधी के दक्षिण भारत दौरे के दौरान टी. के. माधवन ने तिरुनेलवेली में उनसे मुलाकात की। माधवन ने गांधी को केरल में इझावा तथा अन्य बहिष्कृत समुदायों की स्थिति और मंदिरों तथा सार्वजनिक मार्गों पर लगे प्रतिबंधों की जानकारी दी।

➣ उन्होंने सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन के लिए गांधी और कांग्रेस के समर्थन की मांग की। गांधी ने इस विषय को कांग्रेस के कार्यक्रम में शामिल करने के प्रति सहमति दिखाई।

➣ हालांकि गांधी के समर्थन के बाद भी तत्काल सत्याग्रह शुरू नहीं हुआ। आंदोलन के लिए स्थानीय स्तर पर संगठन, जनसमर्थन, आर्थिक संसाधन और स्वयंसेवकों की तैयारी आवश्यक थी। अगले दो वर्षों में यही तैयारी धीरे-धीरे पूरी की गई।

काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन और समर्थन

➣ वैकोम के प्रश्न को अखिल भारतीय स्तर पर ले जाने के लिए टी. के. माधवन ने कांग्रेस के मंच का उपयोग किया। इसी उद्देश्य से वे 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए।

➣ उन्होंने केरल में अस्पृश्यता और निम्न जातियों पर लगाए गए सामाजिक प्रतिबंधों के प्रश्न को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने रखने का निर्णय लिया।

काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन का आयोजन 28 दिसंबर 1923 से 1 जनवरी 1924 तक हुआ और इसकी अध्यक्षता मौलाना मोहम्मद अली ने की।

➣ इस अधिवेशन में देश के अनेक प्रमुख नेता उपस्थित थे। केरल की ओर से टी. के. माधवन, के. पी. केशव मेनन और के. एम. पनिक्कर जैसे नेता शामिल हुए।

➣ उन्होंने अस्पृश्यता उन्मूलन से संबंधित प्रस्ताव प्रस्तुत किया। प्रस्ताव में मंदिर प्रवेश को सभी हिंदुओं का जन्मसिद्ध अधिकार बताया गया और कांग्रेस को अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए कार्य करने का आह्वान किया गया।

➣ माधवन का यह प्रयास केवल वैकोम तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि कांग्रेस अस्पृश्यता उन्मूलन को अपने राष्ट्रीय कार्यक्रम का हिस्सा बनाए और केरल सहित उन क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाए जहाँ निम्न जातियों को मंदिरों, सार्वजनिक मार्गों तथा अन्य सुविधाओं से दूर रखा जाता था।

➣ इस प्रकार उन्होंने सामाजिक सुधार के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया और केरल में चल रहे सामाजिक भेदभाव का प्रश्न पहली बार कांग्रेस के राष्ट्रीय मंच पर प्रभावी ढंग से सामने आया।

➣ इस प्रस्ताव का बिना विरोध पारित होना महत्वपूर्ण था। इससे कांग्रेस के भीतर अस्पृश्यता-विरोधी कार्य को अधिक स्पष्ट समर्थन मिला और केरल के नेताओं को अपने क्षेत्र में अधिक संगठित आंदोलन चलाने का आधार प्राप्त हुआ।

➣ केरल के आधिकारिक विवरण के अनुसार काकीनाडा में उठाए गए इस प्रश्न ने केरल में अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए आगे की कार्रवाई को नई गति दी।

केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की तैयारी

➣ काकीनाडा से लौटने के बाद केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) ने अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए बैठक की। 20 जनवरी 1924 को एक अस्पृश्यता उन्मूलन समिति बनाई गई।

➣ इसके संयोजक के. केलप्पन थे तथा इसमें टी. के. माधवन, कुरूर नीलकंठन नंबूदिरिपाद, टी. आर. कृष्णस्वामी अय्यर और के. वेलायुध मेनन शामिल थे।

➣ इसके साथ आंदोलन के प्रचार और जनसमर्थन को बढ़ाने के लिए एक अलग प्रचार समिति भी बनाई गई। इसमें ए. के. पिल्लै, हसन कोया पूमाला, कुरूर नीलकंठन नंबूदिरिपाद, टी. के. माधवन और के. पी. केशव मेनन शामिल थे।

➣ इससे आंदोलन की तैयारी केवल एक स्थानीय सभा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे पूरे केरल में प्रचारित करने की योजना बनाई गई। समिति ने त्रावणकोर और कोचीन के महाराजाओं के सामने भी अस्पृश्यता से संबंधित मांग रखने का निर्णय किया।

➣ साथ ही कार्यकर्ताओं को विभिन्न क्षेत्रों में भेजकर लोगों को आंदोलन के उद्देश्य से परिचित कराने की योजना बनाई गई। इस प्रकार जनमत निर्माण और प्रत्यक्ष सत्याग्रह दोनों की तैयारी साथ-साथ चलने लगी।

केरल यात्रा और जनजागरण

➣ आंदोलन को व्यापक आधार देने के लिए अस्पृश्यता-विरोधी प्रचार यात्राएँ आयोजित की गईं। के. केलप्पन और अन्य कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने दक्षिणी केरल के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर लोगों को अस्पृश्यता की समस्या और सार्वजनिक मार्गों पर समान अधिकार की आवश्यकता के बारे में समझाया।

➣ इस प्रचार का एक उद्देश्य सवर्ण हिंदुओं को भी आंदोलन से जोड़ना था। आंदोलन के नेताओं का प्रयास था कि इसे केवल इझावा या किसी एक समुदाय का संघर्ष न माना जाए, बल्कि इसे व्यापक हिंदू समाज के भीतर अस्पृश्यता समाप्त करने का आंदोलन बनाया जाए।

➣ आगे चलकर इसी कारण सत्याग्रह के प्रारंभिक स्वयंसेवकों में अलग-अलग जातियों के लोगों को शामिल किया गया।

वैकोम को आंदोलन का केंद्र बनाने का निर्णय

➣ आंदोलन के लिए वैकोम को इसलिए चुना गया क्योंकि वहाँ प्रसिद्ध वैकोम महादेव मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर बहिष्कृत समुदायों के आवागमन पर स्पष्ट प्रतिबंध था।

➣ आंदोलनकारियों ने शुरुआत में सीधे मंदिर प्रवेश को मुख्य मुद्दा बनाने के बजाय मंदिर के चारों ओर की चार सार्वजनिक सड़कों पर सभी जातियों के लिए आवागमन का अधिकार प्राप्त करने को प्राथमिक मांग बनाया। इससे आंदोलन को व्यापक नागरिक अधिकार के प्रश्न से जोड़ना आसान हुआ।

28 फरवरी 1924 के आसपास KPCC और उससे जुड़े नेता वैकोम पहुँचे। वहाँ एक बड़ी सार्वजनिक सभा की गई और मंदिर के आसपास लगे प्रतिबंधात्मक बोर्ड हटाने की मांग रखी गई।

आंदोलनकारियों ने अगले चरण में बहिष्कृत समुदायों के लोगों को इन सड़कों से होकर ले जाने की योजना बनाई।

➣ स्थानीय अधिकारियों और कुछ सवर्ण नेताओं ने संभावित तनाव को देखते हुए आंदोलन को कुछ समय के लिए टालने का आग्रह किया। आंदोलनकारियों ने भी तैयारी के लिए समय देने पर सहमति जताई।

➣ इसी बीच स्थानीय मजिस्ट्रेट ने जुलूस पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी कर दिया। इसके बाद रणनीति बदलते हुए बड़े जुलूस के बजाय प्रतिदिन तीन स्वयंसेवकों को प्रतिबंधित मार्ग पर भेजने का निर्णय लिया गया।

➣ यह निर्णय गांधीवादी अहिंसक सत्याग्रह की भावना के अनुरूप था। तय किया गया कि एक बार में तीन स्वयंसेवक आगे बढ़ेंगे; गिरफ्तारी होने पर अगला जत्था उनकी जगह लेगा।

➣ स्वयंसेवकों का चयन अलग-अलग जातियों से करने का उद्देश्य यह संदेश देना था कि अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष पूरे समाज का संघर्ष है।

सत्याग्रह आश्रम और अंतिम तैयारी

➣ आंदोलन को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए वैकोम मंदिर के दक्षिण में लगभग एक फर्लांग की दूरी पर सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया गया। विभिन्न क्षेत्रों से स्वयंसेवक यहाँ पहुँचने लगे। आश्रम आंदोलनकारियों के रहने, प्रशिक्षण और संगठन का प्रमुख केंद्र बना।

➣ आंदोलन के लिए 30 मार्च 1924 की तिथि तय की गई। प्रतिबंधित मार्ग पर पुलिस की तैनाती और अवरोध के बावजूद स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह शुरू करने की तैयारी जारी रखी।

➣ इस प्रकार मार्च 1924 तक वैकोम में आंदोलन के लिए नेतृत्व, स्वयंसेवक, प्रचार, आश्रम और स्पष्ट रणनीति तैयार हो चुके थे।

काकीनाडा अधिवेशन 28 दिसंबर 1923–1 जनवरी 1924
अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली
मुख्य सिख/केरल नेता? यहाँ टी. के. माधवन ने केरल का अस्पृश्यता प्रश्न उठाया
महत्वपूर्ण अन्य केरल प्रतिनिधि के. पी. केशव मेनन, के. एम. पनिक्कर
मुख्य प्रस्ताव अस्पृश्यता उन्मूलन
महत्वपूर्ण विचार मंदिर प्रवेश को सभी हिंदुओं का जन्मसिद्ध अधिकार माना गया
अगला कदम 20 जनवरी 1924 को KPCC की अस्पृश्यता उन्मूलन समिति

वैकोम सत्याग्रह का प्रारंभ और प्रारंभिक संघर्ष (1924)

➣ आंदोलन की तैयारियों के बाद 30 मार्च 1924 को वैकोम सत्याग्रह औपचारिक रूप से शुरू हुआ।

➣ सत्याग्रह का तत्काल उद्देश्य वैकोम महादेव मंदिर के आसपास की प्रतिबंधित सार्वजनिक सड़कों पर सभी जातियों के लोगों को चलने का अधिकार दिलाना था। आंदोलनकारियों ने शुरुआत में मंदिर के भीतर प्रवेश की मांग के बजाय सार्वजनिक मार्गों पर समान अधिकार को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया।

➣ सत्याग्रह के पहले दिन बड़ी संख्या में स्वयंसेवक वैकोम पहुँचे। सत्याग्रहियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि वे हिंसा या किसी प्रकार के प्रतिरोध का सहारा नहीं लेंगे। इस प्रकार आंदोलन की शुरुआत से ही अहिंसा और अनुशासन को विशेष महत्व दिया गया।

पहले जत्थे में तीन स्वयंसेवक चुने गए – कुंजप्पी (पुलया), बहुलेयन (इझावा) और गोविंद पणिक्कर (नायर)। तीनों अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से थे और हाथ में हाथ डालकर प्रतिबंधित मार्ग की ओर बढ़े।

➣ इसका प्रतीकात्मक महत्व भी था, क्योंकि सत्याग्रह ने यह संदेश दिया कि अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष केवल किसी एक जाति का संघर्ष नहीं, बल्कि सामाजिक समानता का संघर्ष है।

➣ मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर पुलिस की तैनाती थी और एक प्रतिबंधात्मक सूचना-पट्ट लगाया गया था, जिसमें निम्न जातियों के लोगों को आगे जाने से रोका गया था।

➣ पुलिस ने तीनों स्वयंसेवकों को रोककर उनकी जाति पूछी। गोविंद पणिक्कर को अकेले आगे जाने की अनुमति दी जा सकती थी, लेकिन उन्होंने अपने साथियों को छोड़कर आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। तीनों वहीं बैठ गए और शांतिपूर्वक गिरफ्तारी दी।

➣ इन तीनों की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन रुका नहीं। प्रतिदिन नए तीन स्वयंसेवक प्रतिबंधित मार्ग की ओर भेजे जाने लगे। वे पुलिस की रोक का सामना करते, गिरफ्तारी देते और उनके स्थान पर अगले स्वयंसेवक आ जाते।

➣ इस प्रकार सत्याग्रह को लगातार चलाने के लिए जत्था-आधारित संगठन और सामूहिक गिरफ्तारी की रणनीति अपनाई गई।

➣ कुछ ही दिनों में आंदोलन के प्रमुख नेताओं ने भी गिरफ्तारी दी। के. पी. केशव मेनन, टी. के. माधवन और के. केलप्पन सहित कई प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

➣ बाद में टी. आर. कृष्णस्वामी अय्यर, के. कुमार, ए. के. पिल्लै, चिट्टेजथु शंकु पिल्लै और जॉर्ज जोसेफ जैसे नेताओं की भी भूमिका सामने आई। इससे आंदोलन का नेतृत्व धीरे-धीरे प्रत्यक्ष गिरफ्तारी के बावजूद संगठन को चलाने की चुनौती में बदल गया।

10 अप्रैल 1924 तक पुलिस ने बड़ी संख्या में सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया। इसके बाद प्रशासन ने प्रतिदिन होने वाली गिरफ्तारियों की नीति से हटकर प्रतिबंधित क्षेत्रों में बाड़ और पुलिस अवरोध लगाने शुरू किए।

➣ इससे सत्याग्रह की रणनीति में एक नया चरण आया – अब स्वयंसेवक बार-बार गिरफ्तारी देने के बजाय पुलिस अवरोध के सामने बैठकर शांतिपूर्ण धरना, प्रार्थना और भजन करने लगे।

➣ आंदोलन के दौरान सत्याग्रहियों ने पुलिस के दमन और सामाजिक विरोध के बावजूद हिंसा का सहारा नहीं लिया। वे प्रतिबंधित स्थान के सामने बैठते, भजन एवं देशभक्ति के गीत गाते और शांतिपूर्वक अपना विरोध जारी रखते थे। इस अनुशासन ने वैकोम सत्याग्रह को एक उल्लेखनीय अहिंसक सामाजिक आंदोलन का रूप दिया।

➣ प्रारंभिक संघर्ष के दौरान यह भी स्पष्ट हो गया कि आंदोलन को केवल कुछ स्थानीय नेताओं के प्रयास से लंबे समय तक चलाना कठिन होगा। प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी सत्याग्रह जारी रखने के लिए नए स्वयंसेवकों, आर्थिक सहायता और व्यापक जनसमर्थन की आवश्यकता थी।

➣ यही परिस्थिति आगे चलकर आंदोलन को केरल से बाहर के समर्थकों से जोड़ने का आधार बनी।

पेरियार और वैकोम सत्याग्रह

➣ प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारियों के बाद आंदोलन को लगातार चलाने के लिए बाहर से भी सक्रिय समर्थन की आवश्यकता महसूस हुई। इसी समय ई. वी. रामासामी नायकर (पेरियार) वैकोम पहुँचे और आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए।

➣ पेरियार उस समय मद्रास प्रांत के एक प्रमुख कांग्रेस कार्यकर्ता थे। वे सामाजिक समानता और जातिगत भेदभाव के प्रश्नों पर पहले से सक्रिय थे। 13 अप्रैल 1924 को वे वैकोम पहुँचे।

उनके साथ मदुरै के एस. रामा अय्यर, नारायणस्वामी तथा अन्य समर्थक भी आंदोलन से जुड़े। उनके आगमन से सत्याग्रह शिविर में नया उत्साह पैदा हुआ और आंदोलन को केरल से बाहर भी अधिक प्रसिद्धि मिली।

पेरियार की गिरफ्तारियाँ

➣ वैकोम पहुँचने के बाद पेरियार ने सार्वजनिक सभाओं में भाषण देकर अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव और ब्रिटिश प्रशासन द्वारा समर्थित सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की।

13 अप्रैल 1924 को उन्होंने एक सभा में प्रभावशाली भाषण दिया, जिसके बाद प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें एक महीने के कठोर कारावास की सजा दी गई।

➣ पेरियार की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन कमजोर नहीं पड़ा। इसके विपरीत उनकी गिरफ्तारी ने वैकोम सत्याग्रह को पूरे मद्रास प्रांत और दक्षिण भारत में अधिक चर्चा का विषय बना दिया।

➣ पहली सजा पूरी करने के बाद पेरियार आंदोलन में फिर सक्रिय हुए। उन्होंने त्रावणकोर में सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से अस्पृश्यता और जातिगत प्रतिबंधों का विरोध जारी रखा। सरकार ने उनके भाषणों और गतिविधियों को रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए, लेकिन वे आंदोलन से अलग नहीं हुए।

➣ बाद में पेरियार को फिर गिरफ्तार किया गया और इस बार उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। दूसरी गिरफ्तारी के दौरान भी उनका प्रभाव आंदोलन पर बना रहा और उनके सहयोगियों ने सत्याग्रह को जारी रखा।

➣ पेरियार के लगातार संघर्ष और जेल जाने के कारण उन्हें सिख आंदोलनों में प्रयुक्त वीर जैसे सम्मान की तरह वैकोम से जुड़ी राजनीति में वैकोम वीरर के नाम से प्रसिद्धि मिली। यह उपाधि उनके द्वारा आंदोलन में निभाई गई सक्रिय और संघर्षशील भूमिका की स्मृति से जुड़ी है।

नागम्मल और महिलाओं की भागीदारी

➣ पेरियार की भूमिका का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी पत्नी नागम्मल की भागीदारी थी। पेरियार के जेल जाने के बाद भी वे आंदोलन से जुड़ी रहीं और बाद के चरण में नागम्मल तथा उनकी रिश्तेदार कनकम्मल सहित महिला कार्यकर्ताओं ने वैकोम में सभाओं और प्रचार गतिविधियों में भाग लिया।

➣ महिलाओं की सक्रिय भागीदारी वैकोम सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण विशेषता बन गई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि आंदोलन केवल पुरुष कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं था। महिलाओं ने सभाओं, प्रचार, सत्याग्रह और जनजागरण में भाग लेकर आंदोलन के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया।

➣ केरल के आधिकारिक विवरण के अनुसार इससे पहले महिलाओं की भूमिका अधिकतर शिक्षा और सामाजिक सेवा तक सीमित थी, लेकिन वैकोम आंदोलन के दौरान उन्होंने सार्वजनिक राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय भाग लेना शुरू किया।

यहाँ ध्यान रखना आवश्यक है, वैकोम सत्याग्रह पेरियार द्वारा शुरू नहीं किया गया था। आंदोलन की प्रारंभिक तैयारी और नेतृत्व में टी. के. माधवन, के. पी. केशव मेनन और के. केलप्पन जैसे केरल के नेताओं की केंद्रीय भूमिका थी। पेरियार अप्रैल 1924 में आंदोलन में शामिल हुए और बाद में उसके सबसे प्रसिद्ध नेताओं में से एक बने।

राष्ट्रीय स्तर पर वैकोम का समर्थन

➣ गांधी और कांग्रेस के समर्थन से वैकोम सत्याग्रह की खबरें केरल से बाहर भी पहुँचीं। देश के विभिन्न क्षेत्रों से स्वयंसेवक और आर्थिक सहायता आंदोलन के लिए आने लगी।

➣ सत्याग्रह आश्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुँचने लगे और आंदोलन एक व्यापक अखिल-भारतीय सामाजिक सुधार संघर्ष का स्वरूप लेने लगा।

केरल के सामाजिक सुधार संगठन, कांग्रेस कार्यकर्ता, SNDP, NSS, अकाली स्वयंसेवक और अन्य समर्थक अलग-अलग रूपों में आंदोलन से जुड़े। इससे वैकोम का प्रश्न स्थानीय जातिगत प्रतिबंध से आगे बढ़कर अस्पृश्यता और समान नागरिक अधिकार के राष्ट्रीय प्रश्न से जुड़ गया।

अकाली स्वयंसेवकों का सहयोग

➣ वैकोम सत्याग्रह को पंजाब के अकाली दल से भी महत्वपूर्ण समर्थन मिला। पंजाब से 12 अकाली स्वयंसेवक वैकोम पहुँचे। उनका नेतृत्व लाला लाल सिंह और कृपा सिंह कर रहे थे।

➣ उनका उद्देश्य स्वयं सत्याग्रह में भाग लेने के साथ-साथ आंदोलनकारियों को आवश्यक सहायता प्रदान करना था।

➣ अकाली स्वयंसेवकों ने वैकोम में लंगर अर्थात् मुफ्त भोजनशाला शुरू की। इसमें सत्याग्रहियों और वहाँ आने वाले लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती थी।

➣ यह पहल सिखों की लंगर परंपरा और सामाजिक समानता की भावना को वैकोम आंदोलन से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण घटना थी।

➣ अकाली स्वयंसेवकों द्वारा शुरू की गई भोजनशाला को लेकर महात्मा गांधी का दृष्टिकोण कुछ अलग था।

➣ गांधी का मानना था कि वैकोम सत्याग्रह का मुख्य प्रश्न सार्वजनिक सड़कों पर समान आवागमन और अस्पृश्यता का अंत है, इसलिए आंदोलन का ध्यान भोजन की व्यवस्था जैसे सहायक कार्यों की ओर अधिक नहीं जाना चाहिए। उन्होंने अकालियों द्वारा शुरू की गई भोजनशाला की आलोचना की।

➣ हालांकि गांधी की इस आपत्ति का अर्थ अकाली स्वयंसेवकों के सहयोग का विरोध करना नहीं था। उनका मुख्य आग्रह यह था कि आंदोलन की मूल दिशा और अहिंसक अनुशासन प्रभावित नहीं होना चाहिए।

➣ इस घटना से यह भी पता चलता है कि आंदोलन के समर्थकों के बीच सहयोग के बावजूद सत्याग्रह चलाने की रणनीति और प्राथमिकताओं को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद थे।

श्री नारायण गुरु और SNDP का सहयोग

➣ वैकोम सत्याग्रह को श्री नारायण गुरु और उनके सामाजिक सुधार आंदोलन से भी मजबूत समर्थन मिला।

SNDP योगम ने आंदोलनकारियों की सहायता की तथा सत्याग्रहियों के लिए श्री नारायण भोजनशाला के माध्यम से भोजन की व्यवस्था की। श्री नारायण गुरु ने स्वयं भी आंदोलन का समर्थन किया और आर्थिक सहायता प्रदान की।

➣ श्री नारायण गुरु का समर्थन आंदोलन के लिए विशेष महत्व रखता था क्योंकि केरल में सामाजिक समानता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध पहले से ही उनकी व्यापक प्रतिष्ठा थी। उनके समर्थन से वैकोम को स्थानीय सामाजिक सुधार आंदोलन से मजबूत वैचारिक आधार मिला।

मुस्लिम और ईसाई समुदायों का सहयोग

➣ वैकोम सत्याग्रह को मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं और संगठनों का भी समर्थन प्राप्त हुआ। के. ई. अब्दुल रहमान कुट्टी, जो केरल चंद्रिका के प्रबंध संपादक थे, वैकोम आए और आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया।

खिलाफत आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं तथा अन्य मुस्लिम संगठनों ने भी स्वयंसेवकों को आर्थिक और नैतिक सहायता दी।

➣ आंदोलन को ईसाई समुदाय के कुछ वर्गों से भी समर्थन मिला। इस प्रकार वैकोम सत्याग्रह में अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक समुदायों के लोगों की भागीदारी दिखाई दी।

➣ इससे आंदोलन की पहचान केवल किसी एक जाति या धार्मिक समूह के आंदोलन की न रहकर समान नागरिक अधिकार और अस्पृश्यता-विरोध के व्यापक संघर्ष के रूप में बनी।

➣ इस सहयोग ने वैकोम आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता को सामने रखा – अस्पृश्यता के विरोध में बहिष्कृत समुदायों के साथ सुधारवादी सवर्ण, सिख, मुस्लिम और अन्य सामाजिक समूह भी अलग-अलग रूपों में जुड़े

➣ हालांकि सभी समूहों के उद्देश्य और कार्यशैली पूरी तरह समान नहीं थे, लेकिन सार्वजनिक मार्गों पर समान अधिकार की मांग ने उन्हें एक साझा मंच प्रदान किया।

अकाली स्वयंसेवक पंजाब से 12 स्वयंसेवक
नेता लाला लाल सिंह और कृपा सिंह
मुख्य योगदान लंगर/मुफ्त भोजनशाला
श्री नारायण गुरु सत्याग्रह का समर्थन और आर्थिक सहायता
SNDP सत्याग्रहियों के लिए भोजन की व्यवस्था
NSS मन्नथ पद्मनाभन के नेतृत्व में समर्थन
सवर्ण जथा वैकोम से तिरुवनंतपुरम तक समर्थन यात्रा
मुस्लिम सहयोग खिलाफत कार्यकर्ताओं एवं मुस्लिम संगठनों का समर्थन
व्यापक महत्व वैकोम को अखिल-भारतीय अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन का स्वरूप मिला

सवर्ण जथा और आंदोलन का विस्तार

➣ वैकोम सत्याग्रह के लगातार चलने के साथ आंदोलन को यह आवश्यकता महसूस हुई कि अस्पृश्यता-विरोध की मांग केवल बहिष्कृत समुदायों तक सीमित न रहे।

➣ यदि समाज में स्थायी परिवर्तन लाना है, तो सवर्ण हिंदुओं और अन्य सामाजिक समूहों का समर्थन भी आवश्यक था। इसी उद्देश्य से सवर्ण जथा का आयोजन किया गया।

मन्नथ पद्मनाभन और सवर्ण जथा

मन्नथ पद्मनाभन, जो नायर समुदाय के प्रमुख सामाजिक नेता और नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) के संस्थापक थे, ने वैकोम सत्याग्रह के समर्थन में सवर्ण हिंदुओं को संगठित करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ उनके नेतृत्व में सवर्ण जथा का गठन किया गया। भारत सरकार के स्वतंत्रता सेनानी अभिलेख में भी उन्हें वैकोम से तिरुवनंतपुरम तक निकाले गए सवर्ण जथा का नेता बताया गया है।

1 नवंबर 1924 को सवर्ण जथा वैकोम से तिरुवनंतपुरम के लिए रवाना हुआ। इसमें बड़ी संख्या में सवर्ण हिंदू शामिल थे।

➣ जथा का उद्देश्य महारानी रीजेंट के सामने यह दिखाना था कि समाज के भीतर एक बड़ा वर्ग अवर्णों को मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार देने का समर्थन करता है।

➣ जथा के साथ एक विशाल ज्ञापन भी तैयार किया गया, जिस पर लगभग 25,000 सवर्ण हिंदुओं के हस्ताक्षर थे।

➣ यह ज्ञापन त्रावणकोर की महारानी रीजेंट सेतु लक्ष्मी बाई को प्रस्तुत किया गया। इसमें वैकोम की सड़कों को सभी जातियों के लिए खोलने की मांग का समर्थन किया गया था।

➣ इस पहल को श्री नारायण गुरु के शिष्य सत्यव्रत स्वामी का भी समर्थन प्राप्त था। वे जातिगत भेदभाव के प्रबल विरोधी थे और उनके प्रभाव ने सवर्ण जथा के आयोजन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में सहायता की।

सवर्ण जथा का राजनीतिक और सामाजिक महत्व

➣ सवर्ण जथा के माध्यम से आंदोलन ने त्रावणकोर सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण सामाजिक तथ्य रखा – अस्पृश्यता को बनाए रखना पूरे सवर्ण समाज की सर्वसम्मत इच्छा नहीं थी।

बड़ी संख्या में सवर्ण हिंदुओं का समर्थन यह दिखाता था कि सामाजिक सुधार के लिए समाज के भीतर से भी दबाव बनाया जा सकता है।

➣ इससे वैकोम सत्याग्रह को केवल अवर्ण बनाम सवर्ण संघर्ष के रूप में देखना कठिन हो गया। इसके बजाय यह आंदोलन सामाजिक सुधार के ऐसे व्यापक अभियान के रूप में सामने आया जिसमें बहिष्कृत समुदायों, सुधारवादी सवर्णों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अलग-अलग रूपों में भाग लिया।

आंदोलन का व्यापक विस्तार

➣ आंदोलन में विभिन्न जातियों और समुदायों की भागीदारी ने इसके मूल संदेश को मजबूत किया कि सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार जन्म या जाति के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता

➣ आंदोलन का विस्तार केवल स्वयंसेवकों की संख्या में नहीं हुआ, बल्कि इसके पक्ष में जनमत भी बनने लगा।

➣ सवर्ण जथा जैसे अभियानों ने सरकार और शासक परिवार पर सामाजिक दबाव बढ़ाया, जबकि बाहर से आए स्वयंसेवकों और आर्थिक सहायता ने सत्याग्रह को लंबे समय तक जारी रखने में मदद की।

➣ आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के बीच त्रावणकोर सरकार के सामने यह प्रश्न अधिक गंभीर होता गया कि मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों के संबंध में चली आ रही जातिगत पाबंदियों को कब तक बनाए रखा जा सकता है।

➣ इस प्रकार सत्याग्रह धीरे-धीरे सामाजिक दबाव से राजनीतिक निर्णय की दिशा में बढ़ने लगा।

➣ हालांकि फरवरी 1925 में त्रावणकोर विधान परिषद में सभी जातियों के लिए वैकोम की सड़कों को खोलने का प्रस्ताव बहुत कम अंतर से असफल हुआ – 22 के मुकाबले 21 मत से – फिर भी यह परिणाम बताता था कि सामाजिक सुधार का प्रश्न अब राज्य की विधायी राजनीति तक पहुँच चुका था।

सवर्ण जथा के नेता मन्नथ पद्मनाभन
संगठन नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) से जुड़े सवर्ण सुधारक
प्रस्थान 1 नवंबर 1924, वैकोम
गंतव्य तिरुवनंतपुरम
ज्ञापन लगभग 25,000 सवर्ण हिंदुओं के हस्ताक्षर
प्राप्तकर्ता महारानी रीजेंट सेतु लक्ष्मी बाई
महत्वपूर्ण सहयोगी सत्यव्रत स्वामी
महिला भागीदारी नागम्मल सहित महिला कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका
विधान परिषद सड़कें खोलने का प्रस्ताव 22–21 मतों से असफल
व्यापक परिणाम आंदोलन को सामाजिक और अखिल-भारतीय समर्थन में विस्तार

गांधी की वैकोम यात्रा और समाधान का प्रयास (1925)

➣ वैकोम सत्याग्रह के प्रारंभिक चरण में आंदोलन का नेतृत्व मुख्यतः टी. के. माधवन, के. पी. केशव मेनन और के. केलप्पन जैसे केरल के नेताओं के हाथों में था।

महात्मा गांधी ने आंदोलन के आरंभ से ही अस्पृश्यता के प्रश्न के प्रति समर्थन व्यक्त किया, लेकिन उनका प्रयास था कि संघर्ष अहिंसक, अनुशासित और सामाजिक टकराव को बढ़ाए बिना आगे बढ़े।

गांधी की वैकोम यात्रा (मार्च 1925)

➣ आंदोलन के लगभग एक वर्ष बाद महात्मा गांधी 9 मार्च 1925 को वैकोम पहुँचे। यह उनकी वैकोम की पहली यात्रा थी। उन्होंने 10 मार्च को सत्याग्रहियों के साथ प्रार्थना में भाग लिया और आंदोलन की स्थिति को स्वयं समझने का प्रयास किया।

➣ गांधी ने सत्याग्रह आश्रम में रहकर आंदोलनकारियों से बातचीत की और उनके कार्यक्रम तथा अनुशासन को समझा। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि सत्याग्रही अहिंसा, धैर्य और आत्मसंयम बनाए रखें।

➣ उन्होंने आंदोलन को लेकर कुछ रणनीतिक सावधानियाँ भी बरतीं। वे चाहते थे कि सत्याग्रह का मुख्य मुद्दा सार्वजनिक मार्गों पर समान आवागमन रहे और ऐसा कोई कदम न उठाया जाए जिससे आंदोलन धार्मिक संघर्ष का रूप ले ले। इसीलिए उन्होंने भूख-हड़ताल जैसी रणनीति के प्रति भी समर्थन नहीं दिया।

गांधी की सवर्ण नेताओं से बातचीत और श्री नारायण गुरु से मुलाकात

➣ गांधी के वैकोम दौरे का सबसे महत्वपूर्ण भाग स्थानीय सवर्ण हिंदू नेताओं से उनकी बातचीत थी।

10 मार्च 1925 को वे महादेव देसाई, अपने पुत्र रामदास गांधी, सी. राजगोपालाचारी और के. कृष्णस्वामी अय्यर के साथ वैकोम के प्रमुख सवर्ण नेताओं से मिले। बातचीत लगभग तीन घंटे चली, लेकिन तत्काल कोई समाधान नहीं निकल सका।

➣ इन वार्ताओं में गांधी ने सामाजिक भेदभाव समाप्त करने तथा सार्वजनिक मार्गों पर सभी लोगों के आवागमन के अधिकार का समर्थन किया। लेकिन वैकोम के रूढ़िवादी नेताओं ने तत्काल प्रतिबंध हटाने को स्वीकार नहीं किया।

➣ गांधी का दृष्टिकोण यह था कि अस्पृश्यता को समाप्त करने का स्थायी समाधान सामाजिक परिवर्तन से आएगा। वे सवर्ण समाज के भीतर से परिवर्तन और आत्मबोध उत्पन्न करना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने सत्याग्रह के साथ-साथ सवर्ण नेताओं से संवाद को भी महत्वपूर्ण माना।

➣ वैकोम यात्रा के दौरान गांधी ने 12 मार्च 1925 को सामाजिक सुधारक श्री नारायण गुरु से उनके शिवगिरि आश्रम में मुलाकात की। गांधी ने अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन और वैकोम सत्याग्रह के संबंध में उनसे बातचीत की।

➣ गांधी ने वहाँ उपस्थित इझावा तथा अन्य बहिष्कृत समुदायों के लोगों से भी बातचीत की और उन्हें वैकोम सत्याग्रह को उचित समझने पर उसका समर्थन करने के लिए प्रेरित किया। इससे आंदोलन में श्री नारायण गुरु की सामाजिक सुधार परंपरा और गांधी के अस्पृश्यता-विरोधी अभियान के बीच संबंध और स्पष्ट हुआ।

गांधी की भूमिका का महत्व

➣ गांधी की भूमिका को वैकोम सत्याग्रह के मूल संस्थापक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आंदोलन की प्रारंभिक पहल और नेतृत्व केरल के नेताओं ने किया था।

➣ गांधी का सबसे बड़ा योगदान आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाने, अहिंसक अनुशासन बनाए रखने, सवर्ण नेताओं से संवाद स्थापित करने और समझौते का रास्ता खोजने में था।

➣ गांधी के हस्तक्षेप ने यह भी सुनिश्चित किया कि वैकोम का संघर्ष केवल तत्काल प्रशासनिक टकराव न बने। उन्होंने इसे अस्पृश्यता के विरुद्ध सामाजिक सुधार के व्यापक प्रश्न से जोड़ा और यह प्रयास किया कि परिवर्तन सामाजिक सहमति तथा नैतिक दबाव के माध्यम से आए।

➣ हालांकि गांधी का दृष्टिकोण आंदोलन के सभी कार्यकर्ताओं से पूरी तरह समान नहीं था। कुछ कार्यकर्ता अधिक तेज और प्रत्यक्ष कार्रवाई चाहते थे, जबकि गांधी धैर्य, अहिंसा और संवाद को प्राथमिकता देते थे। इसी कारण आंदोलन के भीतर रणनीति को लेकर मतभेद भी दिखाई दिए।

वैकोम सत्याग्रह का समझौता (1925)

➣ लगभग 20 महीने तक चले वैकोम सत्याग्रह के बाद 1925 में आंदोलन के समाधान की दिशा में परिस्थितियाँ अनुकूल होने लगीं। इस लंबे संघर्ष के दौरान सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारियाँ, पुलिस अवरोध और सामाजिक विरोध का सामना किया, लेकिन आंदोलन लगातार जारी रहा।

➣ अंततः 23 नवंबर 1925 को वैकोम सत्याग्रह को वापस लेने का निर्णय हुआ। समझौते के अनुसार वैकोम महादेव मंदिर के चारों ओर की तीन सार्वजनिक सड़कें सभी जातियों के लोगों के लिए खोल दी गईं। इससे बहिष्कृत समुदायों को उन मार्गों पर बिना जातिगत प्रतिबंध के आने-जाने का अधिकार प्राप्त हुआ।

➣ हालांकि मंदिर के पूर्वी ओर स्थित सड़क और उससे जुड़े कुछ निकटवर्ती मार्गों पर प्रतिबंध बना रहा। इसलिए सत्याग्रह की मूल मांग पूरी तरह पूरी नहीं हुई। विशेष रूप से मंदिर में प्रवेश का अधिकार अभी भी प्राप्त नहीं हुआ था।

➣ इस प्रकार 1925 का समझौता पूर्ण सफलता नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण आंशिक सफलता था। सार्वजनिक मार्गों पर जाति-आधारित प्रतिबंध को बड़ी सीमा तक हटाया गया, लेकिन धार्मिक समानता का प्रश्न अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ।

सत्याग्रह का समापन

➣ समझौते के बाद सत्याग्रहियों ने अपना आंदोलन समाप्त करने का निर्णय लिया और नवंबर 1925 में सत्याग्रह शिविर को भी समाप्त कर दिया गया।

➣ कुछ स्रोत 23 नवंबर 1925 को सत्याग्रह की वापसी का उल्लेख करते हैं, जबकि कुछ विवरणों में 30 नवंबर 1925 को इसके औपचारिक समापन की तिथि दी गई है।

➣ लगभग दो वर्षों तक चले इस संघर्ष ने यह साबित किया कि संगठित अहिंसक आंदोलन और व्यापक जनसमर्थन के माध्यम से लंबे समय से चली आ रही सामाजिक पाबंदियों को चुनौती दी जा सकती है।

तत्काल परिणाम एवं दीर्घकालीन प्रभाव

➣ वैकोम सत्याग्रह का तत्काल सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था कि मंदिर के आसपास की तीन सार्वजनिक सड़कों पर सभी जातियों के लोगों के आवागमन का अधिकार स्वीकार किया गया।

➣ इससे त्रावणकोर की सामाजिक व्यवस्था में जाति आधारित सार्वजनिक प्रतिबंधों को पहली बार महत्वपूर्ण चुनौती मिली।

➣ आंदोलन ने बहिष्कृत समुदायों में आत्मसम्मान और अधिकार चेतना को मजबूत किया। साथ ही सवर्ण सुधारकों, महिलाओं, सामाजिक संगठनों और देश के विभिन्न हिस्सों से आए स्वयंसेवकों की भागीदारी ने इसे व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप दिया।

➣ वैकोम सत्याग्रह ने केरल में अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध चल रहे सामाजिक सुधार आंदोलनों को नई गति दी। इसके बाद मंदिर प्रवेश और सामाजिक समानता के प्रश्न अधिक मजबूती से उठाए गए।

➣ इसका सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालीन परिणाम 12 नवंबर 1936 की त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा के संदर्भ में दिखाई देता है।

➣ महाराजा श्री चिथिरा तिरुनाल बलराम वर्मा द्वारा जारी इस उद्घोषणा के माध्यम से त्रावणकोर के हिंदू मंदिरों को उन जातियों के लिए खोल दिया गया जिन्हें पहले अस्पृश्य माना जाता था।

➣ हालांकि 1936 की मंदिर प्रवेश उद्घोषणा को केवल वैकोम सत्याग्रह का सीधा परिणाम नहीं माना जाना चाहिए। यह केरल के लंबे सामाजिक सुधार आंदोलन, अस्पृश्यता-विरोधी संघर्षों और वैकोम जैसी आंदोलनों से बनी सामाजिक चेतना का व्यापक परिणाम थी।

➣ वैकोम के अनुभव ने आगे आने वाले गुरुवायूर सत्याग्रह और अन्य मंदिर प्रवेश आंदोलनों को भी प्रेरणा दी। इस प्रकार वैकोम ने सार्वजनिक मार्गों पर समान अधिकार के प्रश्न को आगे बढ़ाकर धार्मिक और सामाजिक समानता की व्यापक मांग को मजबूत किया।

अवधि लगभग 20 महीने / 604 दिन
समझौता 1925
23 नवंबर 1925 अंतिम सत्याग्रहियों की वापसी/समझौते के आधार पर withdrawal
30 नवंबर 1925 कुछ स्रोतों में औपचारिक समापन
खुली सड़कें मंदिर के चारों ओर 3 सड़कें
प्रतिबंध पूर्वी दिशा के कुछ निकटवर्ती मार्गों पर बना रहा
तत्काल परिणाम सार्वजनिक सड़कों पर जाति-आधारित प्रतिबंध में बड़ी कमी
मंदिर प्रवेश तत्काल प्राप्त नहीं हुआ
दीर्घकालीन प्रभाव 1936 त्रावणकोर Temple Entry Proclamation
महत्व अस्पृश्यता को नागरिक अधिकार एवं सामाजिक न्याय के प्रश्न से जोड़ा

महत्वपूर्ण तथ्य

वैकोम सत्याग्रह वर्ष 1924–25 में तत्कालीन त्रावणकोर रियासत में अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध चलाया गया आंदोलन था।

➣ इसका तत्काल उद्देश्य वैकोम महादेव मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर सभी जातियों को आवागमन का अधिकार दिलाना था।

➣ वैकोम सत्याग्रह की प्रारंभिक पहल में टी. के. माधवन, के. पी. केशव मेनन और के. केलप्पन की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

1921 में टी. के. माधवन ने महात्मा गांधी से मुलाकात कर केरल में अस्पृश्यता और मंदिरों के आसपास लगे जातिगत प्रतिबंधों का प्रश्न उनके सामने रखा।

28 दिसंबर 1923–1 जनवरी 1924 को हुए काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना मोहम्मद अली ने की। इसी अधिवेशन में टी. के. माधवन ने अस्पृश्यता और मंदिर प्रवेश का प्रश्न उठाया।

20 जनवरी 1924 को केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) ने अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए समिति बनाई। इसके संयोजक के. केलप्पन थे।

30 मार्च 1924 को वैकोम सत्याग्रह का औपचारिक प्रारंभ हुआ।

➣ सत्याग्रह के पहले जत्थे में कुंजप्पी (पुलया), बहुलेयन (इझावा) और गोविंद पणिक्कर (नायर) शामिल थे। उन्होंने प्रतिबंधित मार्ग पर आगे बढ़कर शांतिपूर्वक गिरफ्तारी दी।

➣ सत्याग्रह की शुरुआती रणनीति के तहत प्रतिदिन तीन स्वयंसेवकों को प्रतिबंधित मार्ग की ओर भेजा जाता था। गिरफ्तारी के बाद उनके स्थान पर नए स्वयंसेवक भेजे जाते थे।

➣ प्रारंभिक चरण में के. पी. केशव मेनन, टी. के. माधवन और के. केलप्पन सहित कई प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। बाद में पुलिस ने सड़कों पर बाड़ और अवरोध लगा दिए।

13 अप्रैल 1924 को ई. वी. रामासामी नायकर (पेरियार) वैकोम पहुँचे और सत्याग्रह में सक्रिय रूप से शामिल हुए।

➣ पेरियार को वैकोम आंदोलन में भाग लेने के कारण दो बार गिरफ्तार किया गया। उनके संघर्ष के कारण उन्हें “वैकोम वीरर” के नाम से प्रसिद्धि मिली।

➣ पेरियार की गिरफ्तारी के बाद उनकी पत्नी नागम्मल ने भी वैकोम आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। इससे आंदोलन में महिलाओं की भूमिका और अधिक स्पष्ट हुई।

➣ पंजाब से 12 अकाली स्वयंसेवक वैकोम पहुँचे। उनके नेतृत्व में लाला लाल सिंह और कृपा सिंह का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

➣ अकाली स्वयंसेवकों ने वैकोम में लंगर अर्थात् मुफ्त भोजनशाला शुरू की और सत्याग्रहियों को भोजन उपलब्ध कराया।

➣ सामाजिक सुधारक श्री नारायण गुरु और उनके संगठन SNDP योगम ने भी वैकोम सत्याग्रह का समर्थन किया तथा सत्याग्रहियों की सहायता की।

मन्नथ पद्मनाभन के नेतृत्व में सवर्ण जथा का आयोजन किया गया। 1 नवंबर 1924 को यह वैकोम से तिरुवनंतपुरम के लिए रवाना हुआ।

➣ सवर्ण जथा के साथ लगभग 25,000 सवर्ण हिंदुओं के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन महारानी रीजेंट सेतु लक्ष्मी बाई को प्रस्तुत किया गया।

9 मार्च 1925 को महात्मा गांधी वैकोम पहुँचे। उन्होंने सत्याग्रहियों से मुलाकात की और आंदोलन को अहिंसक तथा अनुशासित बनाए रखने पर जोर दिया।

10 मार्च 1925 को गांधी ने वैकोम के प्रमुख सवर्ण नेताओं से लगभग तीन घंटे तक बातचीत की।

12 मार्च 1925 को गांधी ने श्री नारायण गुरु से शिवगिरि आश्रम में मुलाकात की और अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन पर चर्चा की।

➣ लगभग 20 महीने तक चले वैकोम सत्याग्रह के बाद 1925 में समझौता हुआ। मंदिर के आसपास की तीन सार्वजनिक सड़कें सभी जातियों के लिए खोल दी गईं।

➣ वैकोम समझौते में सभी सड़कें और मंदिर प्रवेश का अधिकार तत्काल नहीं मिला। मंदिर के निकट पूर्वी सड़क सहित कुछ मार्गों पर प्रतिबंध बना रहा।

23 नवंबर 1925 को सत्याग्रह वापस लेने का निर्णय हुआ। कुछ स्रोत इसके औपचारिक समापन की तिथि 30 नवंबर 1925 भी बताते हैं।

➣ वैकोम सत्याग्रह का तत्काल परिणाम सार्वजनिक मार्गों पर जाति-आधारित प्रतिबंध में कमी था, जबकि मंदिर प्रवेश का प्रश्न आगे भी आंदोलन का विषय बना रहा।

➣ वैकोम सत्याग्रह ने केरल में अस्पृश्यता-विरोधी संघर्ष को नई गति दी और आगे के मंदिर प्रवेश आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।

➣ इसका दीर्घकालीन प्रभाव 12 नवंबर 1936 की त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके द्वारा त्रावणकोर के हिंदू मंदिर उन जातियों के लिए भी खोल दिए गए जिन्हें पहले अस्पृश्य माना जाता था।

सम्पूर्ण कालक्रम : एक नजर में

वर्ष / तिथि महत्वपूर्ण तथ्य
1921 टी. के. माधवन ने महात्मा गांधी से मुलाकात कर केरल में अस्पृश्यता और मंदिर के आसपास की सड़कों पर प्रतिबंध का प्रश्न उठाया।
23 दिसंबर 1923 टी. के. माधवन ने काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में अस्पृश्यता और मंदिर प्रवेश का प्रश्न उठाया।
काकीनाडा अधिवेशन अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना मोहम्मद अली ने की। अस्पृश्यता-विरोधी प्रस्ताव को समर्थन मिला।
20 जनवरी 1924 केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने अस्पृश्यता उन्मूलन समिति बनाई। संयोजक के. केलप्पन थे।
मार्च 1924 वैकोम को अस्पृश्यता-विरोधी सार्वजनिक आंदोलन के केंद्र के रूप में चुना गया।
30 मार्च 1924 वैकोम सत्याग्रह प्रारंभ हुआ।
पहला सत्याग्रही जत्था कुंजप्पी (पुलया), बहुलेयन (इझावा) और गोविंद पणिक्कर (नायर)
प्रारंभिक चरण प्रतिदिन नए स्वयंसेवक प्रतिबंधित मार्ग पर जाते और शांतिपूर्वक गिरफ्तारी देते थे।
10 अप्रैल 1924 बड़ी संख्या में गिरफ्तारियों के बाद पुलिस ने प्रतिबंधित क्षेत्रों में बाड़ और अवरोध लगाकर सत्याग्रहियों को रोकना शुरू किया।
13 अप्रैल 1924 ई. वी. रामासामी नायकर (पेरियार) वैकोम पहुँचे और सत्याग्रह में सक्रिय रूप से शामिल हुए।
पेरियार आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और गिरफ्तारियों के कारण बाद में वैकोम वीरर के नाम से प्रसिद्ध हुए।
1924 पेरियार की गिरफ्तारी के बाद उनकी पत्नी नागम्मल सहित महिलाओं ने भी आंदोलन की गतिविधियों में भाग लिया।
1924 पंजाब से आए अकाली स्वयंसेवकों ने वैकोम में सहयोग किया और लंगर की व्यवस्था की।
अकाली स्वयंसेवक प्रारंभिक विवरणों में 12 स्वयंसेवकों तथा उनके नेताओं लाला लाल सिंह और कृपा सिंह का उल्लेख मिलता है।
1 नवंबर 1924 मन्नथ पद्मनाभन के नेतृत्व में सवर्ण जथा वैकोम से तिरुवनंतपुरम के लिए रवाना हुआ।
सवर्ण जथा लगभग 25,000 सवर्ण हिंदुओं के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन महारानी रीजेंट सेतु लक्ष्मी बाई को दिया गया।
महिलाओं की भागीदारी नागम्मल सहित अनेक महिलाओं ने सत्याग्रह, प्रचार और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया।
9 मार्च 1925 महात्मा गांधी वैकोम पहुँचे।
10 मार्च 1925 गांधी ने सत्याग्रहियों के साथ प्रार्थना की और स्थानीय सवर्ण नेताओं से बातचीत की।
12 मार्च 1925 गांधी ने श्री नारायण गुरु से उनके शिवगिरि आश्रम में मुलाकात की।
1925 समझौते के बाद वैकोम मंदिर के आसपास की तीन सार्वजनिक सड़कें सभी जातियों के लिए खोल दी गईं।
23 नवंबर 1925 सत्याग्रह की वापसी का निर्णय लिया गया। कुछ स्रोत 30 नवंबर 1925 को इसके औपचारिक समापन का उल्लेख।
तत्काल परिणाम तीन सड़कें खुलीं, लेकिन मंदिर की सभी सड़कें और मंदिर का आंतरिक प्रवेश तत्काल नहीं खुला।
12 नवंबर 1936 त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा जारी हुई, जिसके माध्यम से हिंदू मंदिरों में उन जातियों के प्रवेश की अनुमति दी गई जिन्हें पहले अस्पृश्य माना जाता था।

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