उत्तर मुग़लकाल
➣ अकबर के शासनकाल से मुगल साम्राज्य का उत्कर्ष आरंभ हुआ, जबकि औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद यह पतन की ओर अग्रसर होने लगा।
➣ मुगल साम्राज्य का पतन अयोग्य उत्तराधिकारियों, कमजोर प्रशासनिक नीतियों तथा बदलते राजनीतिक परिदृश्यों का समग्र परिणाम था। इस काल में अल्प अंतराल पर अनेक शासकों का शासन हुआ, जिनका क्रमवार अध्ययन हम इस अध्याय में करेंगे।
➣ 3 मार्च, 1707 ई. को अहमदनगर में औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई।
➣ औरंगज़ेब की मृत्यु के समय मुगल साम्राज्य में कुल 21 सूबे थे, जिनमें 1 सूबा काबुल में, 14 सूबे उत्तर भारत में तथा 6 सूबे दक्षिण भारत में स्थित थे।
➣ औरंगज़ेब के पाँच पुत्र थे-
मुहम्मद सुल्तान,
मुहम्मद अकबर,
मुहम्मद मुअज्ज़म (बहादुरशाह प्रथम),
मुहम्मद आज़म,
कामबख्श।
➣ मुहम्मद सुल्तान तथा मुहम्मद अकबर का निधन औरंगज़ेब के शासनकाल में ही हो चुका था। शेष तीनों शहज़ादों के बीच उत्तराधिकार के लिए युद्ध हुआ।
➣ उल्लेखनीय है कि स्वयं औरंगज़ेब को भी सत्ता प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकार का युद्ध लड़ना पड़ा था। इसलिए उसने मृत्यु से पूर्व अपने पुत्रों के बीच साम्राज्य के बँटवारे संबंधी निर्देश (वसीयत) दिए, ताकि उत्तराधिकार का युद्ध टाला जा सके। उसने अपनी वसीयत में साम्राज्य को तीन पुत्रों में बाँटने का प्रबंध किया था – मुअज्ज़म (शाहआलम) को 12 सूबे, आज़म को दक्कन-गुजरात-आगरा तथा कामबख़्श को हैदराबाद-बीजापुर की सूबेदारी। किन्तु उसकी मृत्यु के बाद भी तीनों शहज़ादों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष प्रारम्भ हो गया।
➣ इस उत्तराधिकार संघर्ष में गुरु गोविंद सिंह ने मुहम्मद मुअज्ज़म का समर्थन किया। बाद में सम्राट बनने पर बहादुरशाह ने गुरु गोविंद सिंह के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार किया।
➣ औरंगज़ेब की मृत्यु के समय मुहम्मद मुअज्ज़म काबुल, मुहम्मद आज़म गुजरात तथा कामबख्श बीजापुर का सूबेदार था।
बहादुरशाह प्रथम (शाहे बेख़बर) (1707-12 ई.)
➣ औरंगज़ेब की मृत्यु का समाचार मिलने पर मुहम्मद मुअज्ज़म ने काबुल से भारत की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में लाहौर के उत्तर में स्थित शाहदौला पुल पर 18 जून, 1707 ई. को उसने बहादुरशाह की उपाधि धारण कर स्वयं को मुगल सम्राट घोषित किया।
➣ गद्दी पर बैठते समय उसकी आयु लगभग 63 वर्ष थी। इस कारण वह मुगल साम्राज्य का सबसे वृद्ध सम्राट माना जाता है जिसने पहली बार सिंहासन ग्रहण किया।
➣ सम्राट बनने के बाद उसने अबुल नसर सैयद कुतुबुद्दीन मुहम्मद शाह आलम बहादुरशाह बादशाह की शाही उपाधि धारण की। इतिहास में वह मुख्यतः बहादुरशाह प्रथम के नाम से प्रसिद्ध है।
जाजऊ का युद्ध (18 जून, 1707 ई.)
➣ मुहम्मद मुअज्ज़म तथा उसके भाई मुहम्मद आज़म शाह के बीच उत्तराधिकार का निर्णायक युद्ध 18 जून, 1707 ई. को जाजऊ (आगरा के निकट) नामक स्थान पर लड़ा गया।
➣ इस युद्ध में मुअज्ज़म की सेना ने आज़म शाह की सेना को पराजित कर दिया। युद्ध में आज़म शाह तथा उसके दो पुत्र बीदर बख़्त और वालाजाह (वाला जाह) मारे गए।
➣ जाजऊ की विजय के बाद मुहम्मद मुअज्ज़म का मुगल सिंहासन पर अधिकार लगभग निर्विवाद हो गया तथा उसने बहादुरशाह प्रथम के रूप में शासन प्रारम्भ किया।
बीजापुर का युद्ध (1709 ई.)
➣ जाजऊ के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद भी बहादुरशाह प्रथम की स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुई थी, क्योंकि उसका सबसे छोटा भाई कामबख्श दक्कन में स्वतंत्र शासक बनने का प्रयास कर रहा था।
➣ कामबख्श ने बीजापुर तथा हैदराबाद क्षेत्र में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का प्रयास किया और स्वयं को लगभग स्वतंत्र शासक के रूप में प्रस्तुत किया।
➣ परिणामस्वरूप बहादुरशाह प्रथम स्वयं दक्कन पहुँचा और 13 जनवरी, 1709 ई. को बीजापुर के निकट दोनों भाइयों के बीच युद्ध हुआ।
➣ इस युद्ध में कामबख्श गंभीर रूप से घायल हो गया और अगले दिन उसकी मृत्यु हो गई। इसके साथ ही औरंगज़ेब के जीवित पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष समाप्त हो गया।
प्रशासन एवं दरबारी राजनीति
➣ उत्तराधिकार के युद्धों के बाद बहादुरशाह प्रथम ने मुगल साम्राज्य को स्थिर करने का प्रयास किया, किन्तु उसकी उदार एवं समझौतावादी नीति तथा वृद्धावस्था के कारण वह अपने पूर्वजों की भाँति सुदृढ़ शासन स्थापित नहीं कर सका।
➣ वह स्वभाव से उदार, सहिष्णु एवं मिलनसार था। यद्यपि उसमें प्रशासनिक अनुभव की कमी नहीं थी, फिर भी वह कई बार निर्णय लेने में विलंब करता था। इसी कारण कुछ समकालीन लेखकों ने उसे शाह-ए-बेख़बर (अर्थात् परिस्थितियों से अनभिज्ञ शासक) की संज्ञा दी।
जुल्फिकार ख़ाँ का प्रभाव
➣ बहादुरशाह प्रथम के शासनकाल में शक्तिशाली अमीर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। उत्तराधिकार के युद्ध में उसके सहयोग के कारण बादशाह उस पर विशेष विश्वास करता था।
➣ बहादुरशाह ने ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को मीर बख़्शी के पद पर बनाए रखा तथा बाद में उसे दक्कन का सूबेदार भी नियुक्त कर दिया। इस प्रकार एक ही अमीर के हाथों में दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण पद आ गए, जिससे उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा में अत्यधिक वृद्धि हुई।
➣ इतिहासकारों के अनुसार किसी एक अमीर को एक साथ इतने महत्त्वपूर्ण पद सौंपना बहादुरशाह की एक प्रमुख प्रशासनिक भूल थी।
वकील-ए-मुत्तलक एवं वज़ीर का महत्त्व
➣ बहादुरशाह प्रथम ने वकील-ए-मुत्तलक (प्रधान प्रतिनिधि) का पद पुनः स्थापित किया और इस पद पर अपने विश्वसनीय सरदार असद ख़ाँ को नियुक्त किया।
➣ उसके शासनकाल में वज़ीर के पद की प्रतिष्ठा एवं प्रभाव में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप उच्च अमीरों के बीच वज़ीर बनने की प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी, जिसने आगे चलकर मुगल दरबार की गुटबाज़ी को और प्रबल कर दिया।
ईरानी एवं तुरानी दल
➣ बहादुरशाह प्रथम के शासनकाल में मुगल दरबार दो प्रमुख गुटों में विभाजित होने लगा-ईरानी दल तथा तुरानी दल। बाद के मुगल इतिहास में इन दोनों गुटों की प्रतिस्पर्धा ने केंद्रीय सत्ता को काफी कमजोर किया।
➣ ईरानी दल में मुख्यतः शिया मत के अमीर सम्मिलित थे। इसके प्रमुख नेताओं में असद ख़ाँ तथा उसका पुत्र ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ प्रमुख थे।
➣ तुरानी दल में अधिकांश सुन्नी अमीर थे। इस गुट के प्रमुख सरदारों में चिन क़िलिच ख़ाँ (बाद में निज़ाम-उल-मुल्क) तथा फ़िरोज़ जंग प्रमुख थे।
धार्मिक एवं प्रशासनिक नीति
➣ बहादुरशाह प्रथम ने अपने पूर्ववर्ती औरंगज़ेब की अपेक्षा अधिक उदार एवं सहिष्णु धार्मिक नीति अपनाई। उसने विभिन्न वर्गों एवं समुदायों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया।
➣ उसके शासनकाल में मदद-ए-माश (धार्मिक एवं विद्वानों को दी जाने वाली कर-मुक्त भूमि) के अनुदानों को वंशानुगत बना दिया गया, जिससे इन अनुदानों के उत्तराधिकारी भी उनका लाभ प्राप्त कर सके।
➣ बहादुरशाह ने मुगल दरबार में पुनः होली उत्सव मनाने की परंपरा प्रारम्भ करवाई। इससे उसकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय मिलता है।
➣ उसने समाज में प्रचलित सती प्रथा पर औरंगज़ेब की तरह कठोर प्रतिबंध लगाने का प्रयास नहीं किया। इसलिए कुछ इतिहासकार इसे सती प्रथा के प्रति अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण मानते हैं।
राजपूत नीति
➣ यबहादुरशाह प्रथम की राजपूत नीति औरंगज़ेब की कठोर नीति की तुलना में अधिक उदार एवं समझौतावादी थी। उसने राजपूतों के साथ सहयोग स्थापित कर मुगल साम्राज्य को स्थिर करने का प्रयास किया।
➣ यद्यपि प्रारम्भ में उसने कुछ राजपूत राज्यों पर मुगल अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया, किन्तु शीघ्र ही उसे यह अनुभव हो गया कि निरंतर युद्ध की अपेक्षा संधि और सहयोग की नीति अधिक लाभदायक होगी।
मारवाड़ के साथ संबंध
➣ औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मारवाड़ के शासक महाराजा अजीत सिंह ने पुनः अपनी स्वतंत्रता स्थापित करने का प्रयास किया।
➣ बहादुरशाह प्रथम ने प्रारम्भ में मारवाड़ पर सैन्य अभियान चलाकर जोधपुर पर अधिकार कर लिया तथा अजीत सिंह को पराजित किया।
➣ बाद में परिस्थितियों को देखते हुए उसने अजीत सिंह के साथ समझौता कर लिया तथा उसे 3500 का मनसब और ‘महाराज’ की उपाधि प्रदान की।
➣ इस संधि के बाद अजीत सिंह ने पुनः मुगल अधीनता स्वीकार कर ली, यद्यपि व्यवहार में वह पर्याप्त सीमा तक स्वतंत्र बना रहा।
राजपूताना संघ का गठन
➣ बहादुरशाह प्रथम के दक्कन अभियान पर चले जाने के बाद महाराजा अजीत सिंह (मारवाड़), दुर्गादास राठौड़ तथा सवाई जयसिंह (आमेर) ने परस्पर सहयोग स्थापित किया।
➣ इन राजपूत शासकों को मेवाड़ के शासक महाराणा अमर सिंह द्वितीय का भी समर्थन प्राप्त हुआ। इन शासकों ने मिलकर मुगल हस्तक्षेप का विरोध किया।
➣ इतिहास में इसे सामान्यतः राजपूताना संघ अथवा राजपूत संघ के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य राजपूत राज्यों की स्वायत्तता बनाए रखना तथा मुगल हस्तक्षेप को सीमित करना था।
➣ बहादुरशाह प्रथम ने अनुभव किया कि राजपूतों के साथ दीर्घकालीन संघर्ष से मुगल साम्राज्य को लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होगी। इसलिए उसने युद्ध के स्थान पर संधि एवं सहयोग की नीति अपनाई।
➣ उसने राजपूत शासकों को पुनः सम्मानजनक स्थान प्रदान किया तथा उनके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया।
➣ उसकी इस नीति के कारण राजपूतों और मुगलों के बीच तत्काल व्यापक युद्ध टल गया, किन्तु मुगल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति पहले जैसी मजबूत नहीं रह सकी।
आमेर (जयपुर) का उत्तराधिकार विवाद
➣ आमेर में उत्तराधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर बहादुरशाह प्रथम ने उसमें हस्तक्षेप किया।
➣ अंततः उसने सवाई जयसिंह को आमेर का शासक स्वीकार कर लिया। इससे कछवाहा शासकों और मुगल दरबार के संबंध पुनः सामान्य हो गए।
➣ बहादुरशाह की यह नीति उसके पूर्ववर्ती औरंगज़ेब की कठोर नीति से भिन्न थी। वह राजपूतों को बलपूर्वक दबाने के स्थान पर उन्हें साथ लेकर शासन चलाना चाहता था।
मराठा नीति
➣ बहादुरशाह प्रथम ने मराठों के साथ मेल-मिलाप एवं संतुलन की नीति अपनाई, किन्तु वह उनकी बढ़ती शक्ति पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करने में सफल नहीं हो सका। यही कारण था कि उसके बाद मराठा शक्ति का विस्तार और अधिक तीव्र गति से हुआ।
➣ बहादुरशाह प्रथम के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौतियों में मराठा समस्या प्रमुख थी। औरंगज़ेब की मृत्यु के समय मराठा शक्ति पुनः संगठित हो रही थी तथा मराठों में उत्तराधिकार को लेकर भी संघर्ष चल रहा था।
➣ बहादुरशाह प्रथम ने मराठों को पूर्णतः सैन्य बल से दबाने के स्थान पर समझौते एवं संतुलन की नीति अपनाई। उसका उद्देश्य मराठों की आंतरिक प्रतिद्वंद्विता का लाभ उठाकर मुगल प्रभुत्व बनाए रखना था।
➣ शाहू, छत्रपति संभाजी का पुत्र था। उसे 1689 ई. में संभाजी की मृत्यु के बाद मुगलों ने बंदी बना लिया था। लगभग 18 वर्ष तक मुगल कैद में रहने के पश्चात 8 मई, 1707 ई. को जुल्फ़िकार ख़ाँ की सलाह पर बहादुरशाह प्रथम ने शाहू को मुगल कैद से मुक्त कर दिया।
➣ शाहू की रिहाई का उद्देश्य केवल उदारता दिखाना नहीं था, बल्कि मराठों में राजनीतिक विभाजन उत्पन्न करना भी था। उस समय मराठा साम्राज्य पर ताराबाई अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय की ओर से शासन कर रही थीं।
➣ मुगल कैद से मुक्त होने के बाद शाहू ने स्वयं को मराठा साम्राज्य का वैध उत्तराधिकारी घोषित किया। दूसरी ओर ताराबाई अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करती रहीं।
➣ परिणामस्वरूप मराठा साम्राज्य दो गुटों में विभाजित हो गया-एक पक्ष शाहू का तथा दूसरा ताराबाई का।
➣ बहादुरशाह प्रथम ने इस गृह-संघर्ष का लाभ उठाने का प्रयास किया, क्योंकि मराठों की एकता मुगल साम्राज्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती थी।
चौथ एवं सरदेशमुखी का प्रश्न
➣ मराठे दक्कन के मुगल प्रदेशों से चौथ तथा सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार चाहते थे। उसने मराठों को सरदेशमुखी के अधिकार को स्वीकार करने की सहमति दी, किन्तु चौथ वसूलने की अनुमति नहीं दिया।
➣ इसके अतिरिक्त उसने शाहू को सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य का वैध छत्रपति भी स्वीकार नहीं किया। इससे मराठों की आंतरिक प्रतिद्वंद्विता बनी रही।
मराठा नीति का मूल्यांकन
➣ बहादुरशाह प्रथम की मराठा नीति का मूल आधार संतुलन और समझौता था। उसने मराठों के किसी एक गुट को पूर्ण समर्थन नहीं दिया, बल्कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया।
➣ उसकी इस नीति से कुछ समय के लिए मराठों की आंतरिक एकता कमजोर रही, किन्तु मुगल साम्राज्य मराठा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाल सका।
➣ आगे चलकर मराठों की शक्ति निरंतर बढ़ती गई और वे अठारहवीं शताब्दी में भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बनकर उभरे।
सिख नीति एवं बंदा सिंह बहादुर
➣ बहादुरशाह प्रथम ने अपने शासन के प्रारम्भ में सिखों के प्रति उदार एवं मैत्रीपूर्ण नीति अपनाई। इसका प्रमुख कारण यह था कि उत्तराधिकार के युद्ध में गुरु गोविंद सिंह ने मुहम्मद मुअज्ज़म (बहादुरशाह प्रथम) का समर्थन किया था।
➣ सम्राट बनने के बाद बहादुरशाह ने गुरु गोविंद सिंह का सम्मान किया तथा उन्हें खिलअत (सम्मानस्वरूप पोशाक) और उच्च मनसब प्रदान किया।
गुरु गोविंद सिंह से संबंध
➣ सम्राट बनने के बाद बहादुरशाह प्रथम की गुरु गोविंद सिंह से भेंट हुई। दोनों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित हुए और बहादुरशाह ने उन्हें सम्मान प्रदान किया।
➣ उस समय गुरु गोविंद सिंह का मुख्य उद्देश्य सरहिंद के सूबेदार वज़ीर ख़ाँ को दंडित कराना था, क्योंकि उसी के आदेश पर गुरु के दो छोटे पुत्रों की हत्या कर दी गई थी।
➣ बहादुरशाह ने तत्काल वज़ीर ख़ाँ के विरुद्ध कोई कठोर कार्रवाई नहीं की। परिणामस्वरूप सिखों और मुगल शासन के बीच तनाव पुनः बढ़ने लगा।
➣ 7 अक्टूबर, 1708 ई. को नांदेड़ (महाराष्ट्र) में गुरु गोविंद सिंह का निधन हो गया। अपने अंतिम समय में उन्होंने लक्ष्मण देव बैरागी (जो आगे चलकर बंदा सिंह बहादुर के नाम से प्रसिद्ध हुए) को पंजाब जाकर मुगल अत्याचारों का प्रतिरोध करने का आदेश दिया।
बंदा सिंह बहादुर का उदय
➣ गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु के बाद बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब में सिखों का नेतृत्व संभाला और मुगल शासन के विरुद्ध व्यापक अभियान प्रारम्भ किया।
➣ उन्होंने बड़ी संख्या में किसानों, जाटों तथा सिखों को अपने साथ संगठित किया और मुगल अधिकारियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया।
➣ बंदा सिंह बहादुर ने क्रमशः समाना, कपूरी, सढौरा आदि स्थानों पर अधिकार स्थापित किया और मुगल प्रशासन को गंभीर चुनौती दी।
➣ 1710 ई. में उन्होंने सरहिंद पर आक्रमण कर वहाँ के सूबेदार वज़ीर ख़ाँ को युद्ध में पराजित एवं मृत्युदंड दिया। इससे पंजाब में मुगल सत्ता को गहरा आघात पहुँचा।
➣ अपनी सफलताओं के बाद बंदा सिंह बहादुर ने शिवालिक पर्वत क्षेत्र में स्थित लोहगढ़ को अपना प्रमुख दुर्ग एवं सैन्य केन्द्र बनाया।
➣ उन्होंने अपने नाम से नहीं, बल्कि गुरु नानक देव और गुरु गोविंद सिंह के नाम पर सिक्के जारी कराए, जिससे स्पष्ट होता है कि उनका संघर्ष व्यक्तिगत सत्ता के लिए नहीं, बल्कि खालसा पंथ और न्याय की स्थापना के लिए था।
बहादुरशाह का सैन्य अभियान
➣ पंजाब में सिखों की बढ़ती शक्ति को देखकर बहादुरशाह प्रथम ने स्वयं उनके विरुद्ध सैन्य अभियान का नेतृत्व किया।
➣ 1710 ई. में मुगल सेना ने लोहगढ़ दुर्ग पर घेरा डाल दिया। भीषण संघर्ष के बाद मुगल सेना ने दुर्ग पर अधिकार तो कर लिया, किन्तु बंदा सिंह बहादुर सुरक्षित निकलने में सफल रहे।
➣ यद्यपि बहादुरशाह ने अस्थायी रूप से लोहगढ़ पर अधिकार स्थापित कर लिया, फिर भी वह बंदा सिंह बहादुर के आंदोलन का पूर्णतः दमन नहीं कर सका।
विदेशी संबंध एवं अन्य महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
➣ बहादुरशाह प्रथम के शासनकाल में यद्यपि मुगल साम्राज्य आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा था, फिर भी यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के साथ राजनयिक एवं व्यापारिक संबंध बने रहे।
➣ 1711 ई. में जोसुआ केटेलार के नेतृत्व में डच ईस्ट इंडिया कंपनी का एक प्रतिनिधिमंडल बहादुरशाह प्रथम के दरबार में पहुँचा। इसका उद्देश्य मुगल साम्राज्य के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना तथा डच व्यापारिक हितों की रक्षा करना था।
➣ बहादुरशाह के दरबार में जुलियानी नामक एक प्रभावशाली पुर्तग़ाली महिला का विशेष स्थान था। वह मुगल राजपरिवार और यूरोपीय प्रतिनिधियों के बीच संपर्क स्थापित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। डच प्रतिनिधिमंडल के स्वागत में भी उसका विशेष योगदान माना जाता है। उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर बहादुरशाह प्रथम ने उसे बीबी तथा फ़िदवी जैसी सम्मानसूचक उपाधियाँ प्रदान कीं।
➣ बहादुरशाह प्रथम ने यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के प्रति सामान्यतः मैत्रीपूर्ण एवं व्यावहारिक नीति अपनाई। उसके शासनकाल में अंग्रेज़, डच, फ्रांसीसी तथा पुर्तग़ाली व्यापारी भारत में अपना व्यापार करते रहे। उस समय उनका मुख्य उद्देश्य व्यापार था।
व्यक्तित्व
➣ बहादुरशाह प्रथम स्वभाव से उदार, सहिष्णु, विनम्र एवं समझौतावादी शासक था। उसने अपने पिता औरंगज़ेब की कठोर नीतियों में कुछ नरमी लाने का प्रयास किया।
➣ वह धार्मिक कट्टरता का समर्थक नहीं था। उसने राजपूतों, मराठों तथा सिखों के साथ यथासंभव समझौते की नीति अपनाने का प्रयास किया।
➣ वृद्धावस्था तथा उत्तराधिकार युद्धों के कारण वह प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका। फलस्वरूप शक्तिशाली अमीरों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
➣ इतिहासकारों के अनुसार वह एक सद्भावनापूर्ण एवं उदार शासक था, किन्तु उसमें औरंगज़ेब जैसी दृढ़ इच्छाशक्ति तथा अकबर जैसी संगठन क्षमता का अभाव था। परिणामस्वरूप वह मुगल साम्राज्य के पतन को रोकने में सफल नहीं हो सका। ओवन सिडनी के अनुसार- बहादुरशाह अंतिम मुगल शासक था, जिसके बारे में कुछ अच्छे शब्द कहे जा सकते हैं।
मृत्यु एवं उत्तराधिकार का युद्ध
➣ सिख नेता बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध सैन्य अभियान के दौरान बहादुरशाह प्रथम पंजाब में ही रुका रहा। इसी अभियान के दौरान उसकी तबीयत बिगड़ गई।
➣ 27 फ़रवरी, 1712 ई. को लाहौर में बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु हो गई। उसके शासनकाल की अवधि लगभग पाँच वर्ष (1707–1712 ई.) रही।
➣ बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु के साथ ही मुगल साम्राज्य में एक बार पुनः उत्तराधिकार का युद्ध प्रारम्भ हो गया। उसके चारों पुत्रों ने मुगल सिंहासन पर अपना-अपना अधिकार प्रस्तुत किया।
➣ बहादुरशाह प्रथम के चार प्रमुख पुत्र थे-
❑ जहाँदारशाह❑ अज़ीम-उश-शान
❑ रफ़ी-उश-शान
❑ जहानशाह (जहाँ शाह)
➣ उत्तराधिकार युद्ध प्रारम्भ हो जाने के कारण बहादुरशाह प्रथम के शव को तत्काल दिल्ली नहीं लाया जा सका। लगभग दस सप्ताह तक उसका शव सुरक्षित रखा गया।
➣ इसके बाद उसे दिल्ली लाकर महरौली स्थित मोती मस्जिद के निकट दफ़नाया गया।
➣ बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु के बाद उसके चारों पुत्रों के बीच भीषण उत्तराधिकार युद्ध हुआ। इस संघर्ष में शक्तिशाली अमीर ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ ने जहाँदारशाह का समर्थन किया।
➣ जहाँदारशाह अपने तीनों भाइयों को पराजित कर मुगल सम्राट बनने में सफल हुआ। इस प्रकार 1712 ई. में जहाँदारशाह मुगल साम्राज्य का अगला शासक बना।
▪ वास्तविक नाम – मुहम्मद मुअज्ज़म
▪ शासनकाल – 1707–1712 ई.
▪ उपनाम – शाह-ए-बेख़बर
▪ जाजऊ का युद्ध – 18 जून, 1707 ई.
▪ बीजापुर का युद्ध – 13 जनवरी, 1709 ई.
▪ शाहू की रिहाई – 8 मई, 1707 ई.
▪ गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु – 7 अक्टूबर, 1708 ई.
▪ बंदा सिंह बहादुर द्वारा सरहिंद विजय – 1710 ई.
▪ डच प्रतिनिधिमंडल – 1711 ई.
▪ मृत्यु – 27 फ़रवरी, 1712 ई., लाहौर
जहाँदारशाह (1712–1713 ई.)
➣ बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में पुनः उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ गया। इस संघर्ष में उसके चारों पुत्रों-जहाँदारशाह, अज़ीम-उश-शान, रफ़ी-उश-शान तथा जहानशाह-ने मुगल सिंहासन पर अपना-अपना दावा प्रस्तुत किया।
➣ इस उत्तराधिकार युद्ध में शक्तिशाली ईरानी अमीर ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ के सहयोग से जहाँदारशाह ने अपने तीनों भाइयों को पराजित कर 1712 ई. में मुगल सम्राट के रूप में सिंहासन ग्रहण किया।
➣ जहाँदारशाह का शासनकाल केवल लगभग एक वर्ष (1712–1713 ई.) तक रहा, फिर भी यह मुगल इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जाता है, क्योंकि इसी काल से मुगल सम्राटों के निर्माण और पतन में शक्तिशाली अमीरों का हस्तक्षेप स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
जहाँदारशाह का व्यक्तित्व
➣ जहाँदारशाह स्वभाव से विलासी, अयोग्य एवं दुर्बल शासक था। वह शासन-प्रशासन की अपेक्षा भोग-विलास में अधिक रुचि रखता था।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने जहाँदारशाह को ‘लम्पट मूर्ख’ की संज्ञा दी है।
➣ उसके शासनकाल में दरबार का अनुशासन शिथिल हो गया तथा सम्राट का प्रभाव निरंतर घटता गया। इसका लाभ शक्तिशाली अमीरों ने उठाया और वे प्रशासन पर हावी हो गए।
ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ का प्रभाव
➣ जहाँदारशाह के शासनकाल में वास्तविक सत्ता वज़ीर ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ के हाथों में थी। सम्राट प्रशासनिक दृष्टि से दुर्बल था, इसलिए शासन के अधिकांश महत्त्वपूर्ण निर्णय वज़ीर द्वारा ही लिए जाते थे।
➣ सिंहासन पर बैठते ही जहाँदारशाह ने ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ को वज़ीर नियुक्त किया। ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ, औरंगज़ेब के प्रसिद्ध वज़ीर असद ख़ाँ का पुत्र था तथा उस समय का सबसे प्रभावशाली मुगल अमीर माना जाता था।
➣ ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ ने साम्राज्य की बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। उसकी नीति का मुख्य उद्देश्य मुगल साम्राज्य को निरंतर युद्धों से निकालकर मेल-मिलाप एवं समझौते के माध्यम से स्थिरता प्रदान करना था।
➣ प्रशासन को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ ने अपने विश्वस्त सुभागचन्द्र को दीवान नियुक्त किया तथा उसे ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद राजस्व विभाग का संचालन मुख्यतः उसी के हाथों में आ गया।
➣ जहाँदारशाह के शासनकाल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ ने युद्ध की अपेक्षा समझौते और मेल-मिलाप की नीति अपनाई। राजपूतों, जाटों, बुंदेलों तथा मराठों के साथ उसके संबंध अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण रहे, जबकि केवल बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध कठोर नीति जारी रही।
लाल कुंवर का प्रभाव
➣ जहाँदारशाह की प्रिय उपपत्नी लाल कुंवर, जिसे इम्तियाज़ महल की उपाधि प्राप्त थी, का दरबार में अत्यधिक प्रभाव था।
➣ जहाँदारशाह ने उसे राजकीय कार्यों में हस्तक्षेप की अनुमति दे रखी थी। उसके प्रभाव के कारण उसके अनेक रिश्तेदारों एवं समर्थकों को उच्च सरकारी पद प्रदान किए गए।
➣ इससे मुगल प्रशासन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा तथा योग्य अधिकारियों की अपेक्षा व्यक्तिगत कृपा के आधार पर नियुक्तियाँ होने लगीं।
इतिहासकार ताराचंद ने जहाँदारशाह को लम्पट मूर्ख कहा है।
राजपूत नीति
➣ जहाँदारशाह ने राजपूतों के प्रति मैत्री एवं सहयोग की नीति अपनाई। उसने आमेर के शासक सवाई जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया तथा ‘मिर्जा राजा’ की उपाधि प्रदान की।
➣ इसी प्रकार मारवाड़ के शासक अजीत सिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि देकर गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया। इससे राजपूतों और मुगल दरबार के संबंधों में पुनः सुधार हुआ।
वित्तीय एवं प्रशासनिक सुधार
➣ साम्राज्य की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ ने जागीरों एवं उच्च पदों के अंधाधुंध वितरण पर रोक लगाने का प्रयास किया।
➣ राजस्व वसूली को अधिक प्रभावी बनाने के लिए उसने इजारा प्रथा (भू-राजस्व की ठेकेदारी व्यवस्था) को प्रोत्साहित किया। राज्य द्वारा भू-राजस्व वसूली का अधिकार निश्चित धनराशि के बदले निजी व्यक्तियों (ठेकेदारों) को देना इजारा प्रथा कहलाता है।
➣ यद्यपि इस व्यवस्था से अल्पकाल में राजस्व बढ़ा, किन्तु ठेकेदारों द्वारा किसानों से अत्यधिक वसूली किए जाने के कारण कृषक वर्ग पर अत्याचार बढ़ गए। आगे चलकर यह व्यवस्था मुगल कृषि व्यवस्था के लिए हानिकारक सिद्ध हुई।
धार्मिक एवं सामंजस्य की नीति
➣ जहाँदारशाह के शासनकाल में ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ ने विभिन्न शक्तियों के साथ मेल-मिलाप की नीति अपनाई। उसने जाट नेता चूड़ामन तथा बुंदेला शासक छत्रसाल के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए और उन्हें अपने पक्ष में बनाए रखने का प्रयास किया।
➣ इसके विपरीत बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में चल रहे सिख आंदोलन के विरुद्ध मुगल सरकार की दमनात्मक नीति जारी रही।
➣ परंपरागत विवरणों के अनुसार जहाँदारशाह के शासनकाल में 1679 ई. में औरंगज़ेब द्वारा लगाए गए जज़िया कर को समाप्त कर दिया गया, जिससे उसकी अपेक्षाकृत उदार धार्मिक नीति का परिचय मिलता है।
➣ जहाँदारशाह ने मराठों के साथ भी समझौते की नीति अपनाई। उसने मराठों को दक्कन की चौथ एवं सरदेशमुखी स्वीकार करने की सहमति इस शर्त पर दी कि इन करों की वसूली मुगल अधिकारियों के माध्यम से की जाएगी।
➣ इस नीति का उद्देश्य मराठों को संतुष्ट रखते हुए मुगल प्रशासन का नियंत्रण बनाए रखना था।
मृत्यु
➣ जहाँदारशाह का शासनकाल अत्यंत अल्पकालिक रहा। उसकी प्रशासनिक दुर्बलता तथा शक्तिशाली अमीरों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण उसके विरुद्ध शीघ्र ही विद्रोह प्रारम्भ हो गया।
➣ इस समय अज़ीम-उश-शान का पुत्र फ़र्रुख़सियर बंगाल से मुगल सिंहासन प्राप्त करने के उद्देश्य से आगे बढ़ा। उसे सैय्यद बंधुओं–अब्दुल्ला ख़ाँ एवं हुसैन अली ख़ाँ-का पूर्ण समर्थन प्राप्त था।
➣ फ़र्रुख़सियर ने बिहार एवं बंगाल के समर्थकों को संगठित कर दिल्ली की ओर कूच किया। दूसरी ओर जहाँदारशाह अपने वज़ीर ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ के साथ उसकी सेना का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। 10 जनवरी, 1713 ई. को आगरा के निकट दोनों पक्षों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें फ़र्रुख़सियर विजयी रहा। युद्ध में पराजित होने के बाद जहाँदारशाह भाग निकला, किन्तु शीघ्र ही पकड़ लिया गया। 11 फ़रवरी, 1713 ई. को फ़र्रुख़सियर के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई। इसके साथ ही उसका लगभग एक वर्ष का शासन समाप्त हो गया और फ़र्रुख़सियर मुगल साम्राज्य का नया सम्राट बना।
इतिहासकार ताराचंद ने जहाँदारशाह को ‘लम्पट मूर्ख’ कहा है। उसके शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि मुगल सम्राटों के निर्माण और पतन में शक्तिशाली अमीरों की भूमिका निर्णायक हो गई।
फ़र्रुख़सियर (1713–1719 ई.)
➣ फ़र्रुख़सियर मुगल सम्राट बहादुरशाह प्रथम के पुत्र अज़ीम-उश-शान का पुत्र था। जहाँदारशाह के विरुद्ध हुए उत्तराधिकार युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद वह 11 जनवरी, 1713 ई. को मुगल सिंहासन पर बैठा।
➣ फ़र्रुख़सियर को मुगल सम्राट बनाने में सैय्यद बंधुओं–अब्दुल्ला ख़ाँ एवं हुसैन अली ख़ाँ-की निर्णायक भूमिका थी। इसी कारण उसके शासन के प्रारम्भिक वर्षों में वास्तविक सत्ता इन्हीं दोनों के हाथों में रही।
➣ इतिहासकारों ने फ़र्रुख़सियर को दुर्बल, कायर एवं निर्णयहीन शासक माना है। इतिहासकार एस. आर. शर्मा ने उसे घृणित कायर की संज्ञा दी है।
फ़र्रुख़सियर का व्यक्तित्व➣ फ़र्रुख़सियर महत्वाकांक्षी तो था, किन्तु उसमें दृढ़ निर्णय लेने की क्षमता का अभाव था। वह दरबार के विभिन्न गुटों के प्रभाव में आसानी से आ जाता था।
➣ प्रारम्भ में वह पूरी तरह सैय्यद बंधुओं पर निर्भर रहा, किन्तु बाद में उन्हीं के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर उनके विरुद्ध गुप्त षड्यंत्र रचने लगा। यही संघर्ष आगे चलकर उसके पतन का प्रमुख कारण बना।
सैय्यद बंधुओं का उदय
➣ फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में सैय्यद बंधु मुगल साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली अमीर बनकर उभरे। ये दोनों भाई बारहा (मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश) के प्रसिद्ध सैय्यद परिवार से संबंधित थे।
➣ बड़े भाई अब्दुल्ला ख़ाँ को वज़ीर का पद तथा क़ुतुब-उल-मुल्क की उपाधि प्रदान की गई।
➣ छोटे भाई हुसैन अली ख़ाँ को अमीर-उल-उमरा तथा मीर बख़्शी नियुक्त किया गया। बाद में उसे दक्कन का सूबेदार भी बनाया गया।
➣ दोनों भाइयों ने प्रशासन, सेना तथा दरबार पर इतना अधिक प्रभाव स्थापित कर लिया कि फ़र्रुख़सियर नाममात्र का सम्राट बनकर रह गया।
▪ हुसैन अली ख़ाँ – अमीर-उल-उमरा एवं मीर बख़्शी
▪ दोनों भाई इतिहास में ‘सैय्यद बंधु’ तथा ‘शासक निर्माता (King Makers)’ के नाम से प्रसिद्ध हैं।
ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ का अंत
➣ फ़र्रुख़सियर सिंहासन पर बैठने के बाद उन सभी व्यक्तियों को दंडित करना चाहता था जिन्होंने जहाँदारशाह का साथ दिया था। इसी उद्देश्य से उसने तत्कालीन वज़ीर ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ को बंदी बनाकर उसकी हत्या करवा दी।
➣ साथ ही उसके पिता असद ख़ाँ को भी गिरफ्तार कर कारागार में डाल दिया गया। इससे ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ के प्रभाव का पूर्णतः अंत हो गया।
प्रशासन एवं प्रमुख घटनाएँ
➣ फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में अनेक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक, सैन्य एवं व्यापारिक घटनाएँ हुईं। यद्यपि सम्राट नाममात्र का शासक था, फिर भी उसके शासनकाल में राजपूतों, सिखों तथा अंग्रेज़ों से संबंधित कई घटनाएँ भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व रखती हैं।
राजपूत नीति
➣ 1714 ई. में मारवाड़ के शासक महाराजा अजीत सिंह की बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने के लिए मुगल सेनापति हुसैन अली ख़ाँ ने जोधपुर पर आक्रमण किया।
➣ परिस्थितियों को देखते हुए अजीत सिंह ने संधि करना उचित समझा। संधि की शर्तों के अनुसार उसने अपनी पुत्री का विवाह मुगल सम्राट फ़र्रुख़सियर से कर दिया।
➣ बाद में सैय्यद बंधुओं ने फ़र्रुख़सियर के विरुद्ध अपने संघर्ष के दौरान अजीत सिंह को अपने पक्ष में मिलाने के लिए उसे अजमेर तथा गुजरात की सूबेदारी प्रदान की।
सिख नीति
➣ फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में मुगल सेना ने 17 दिसम्बर, 1715 ई. को सिख नेता बंदा सिंह बहादुर को उसके सैकड़ों अनुयायियों सहित गुरदास नंगल के निकट बंदी बना लिया।
➣ बंदा सिंह बहादुर तथा उसके साथियों को दिल्ली लाया गया। उनसे इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए कहा गया, किन्तु उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।
➣ फलस्वरूप 1716 ई. में दिल्ली में बंदा सिंह बहादुर तथा उसके अनेक साथियों को मृत्युदंड दे दिया गया। इसके साथ ही सिख विद्रोह का प्रथम चरण समाप्त हो गया।
▪ मृत्युदंड – 1716 ई., दिल्ली
1717 ई. का शाही फ़रमान
➣ फ़र्रुख़सियर के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में 1717 ई. का शाही फ़रमान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
➣ 1717 ई. में जॉन सरमन के नेतृत्व में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी का एक प्रतिनिधिमंडल फ़र्रुख़सियर के दरबार में पहुँचा। इस प्रतिनिधिमंडल में एडवर्ड स्टीफ़ेन्सन, प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक विलियम हैमिल्टन तथा आर्मीनियाई दुभाषिया ख़्वाजा सरहद भी सम्मिलित थे।
➣ कहा जाता है कि विलियम हैमिल्टन ने फ़र्रुख़सियर की गंभीर बीमारी का सफल उपचार किया, जिससे प्रसन्न होकर सम्राट ने अंग्रेज़ों को अनेक व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान कीं।
➣ 1717 ई. के शाही फ़रमान द्वारा अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को 3,000 रुपये वार्षिक भुगतान के बदले बंगाल में लगभग शुल्क-मुक्त व्यापार करने की सुविधा प्राप्त हुई।
➣ साथ ही कंपनी को कलकत्ता के आसपास अतिरिक्त गाँव प्राप्त करने तथा अपने व्यापारिक विशेषाधिकारों का विस्तार करने की अनुमति भी मिली।
▪ अंग्रेज़ों को व्यापारिक सुविधाओं का विस्तार मिला।
▪ बंगाल में कंपनी की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई।
▪ इतिहासकार इसे अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्ना कार्टा भी कहते हैं।
सैय्यद बंधुओं से संघर्ष
➣ शासन के प्रारम्भ में फ़र्रुख़सियर पूरी तरह सैय्यद बंधुओं पर निर्भर था, किन्तु समय के साथ वह उनके बढ़ते प्रभाव से असंतुष्ट हो गया। उसने सैय्यद बंधुओं के प्रभुत्व को समाप्त कर स्वयं शासन की बागडोर अपने हाथों में लेने का प्रयास किया।
➣ फ़र्रुख़सियर ने गुप्त रूप से अनेक अमीरों को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया तथा सैय्यद बंधुओं के विरुद्ध षड्यंत्र रचना प्रारम्भ कर दिया। इस उद्देश्य से उसने गुजरात के सूबेदार दाऊद ख़ाँ पन्नी को हुसैन अली ख़ाँ के विरुद्ध भेजा।
➣ दोनों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें दाऊद ख़ाँ मारा गया। इससे फ़र्रुख़सियर की योजना असफल हो गई और सैय्यद बंधुओं की शक्ति पहले से भी अधिक बढ़ गई।
➣ इसके बाद सैय्यद बंधुओं ने भी फ़र्रुख़सियर को गद्दी से हटाने का निश्चय कर लिया तथा उसके विरुद्ध नए सहयोगियों की तलाश प्रारम्भ कर दी।
दिल्ली की संधि (1719 ई.)
➣ 1719 ई. में हुसैन अली ख़ाँ ने मराठा पेशवा बालाजी विश्वनाथ के साथ दिल्ली की संधि की। इस संधि का मुख्य उद्देश्य फ़र्रुख़सियर को अपदस्थ करना था।
➣ इस संधि के अंतर्गत सैय्यद बंधुओं ने छत्रपति शाहू को दक्कन के छह मुगल सूबों से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार स्वीकार किया। बदले में मराठों ने सैय्यद बंधुओं को सैन्य सहायता देने का वचन दिया।
➣ इसके परिणामस्वरूप बालाजी विश्वनाथ मराठा सेना के साथ दिल्ली पहुँचा और सैय्यद बंधुओं का समर्थन किया। यह पहली बार था जब मराठों ने उत्तर भारत की राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया।
▪ पक्ष – हुसैन अली ख़ाँ एवं बालाजी विश्वनाथ
▪ उद्देश्य – फ़र्रुख़सियर को अपदस्थ करना
▪ परिणाम – मराठों का उत्तर भारतीय राजनीति में प्रथम प्रत्यक्ष हस्तक्षेप
फ़र्रुख़सियर की मृत्यु
➣ मराठों तथा सैय्यद बंधुओं की संयुक्त शक्ति के सामने फ़र्रुख़सियर टिक नहीं सका। 28 फ़रवरी, 1719 ई. को सैय्यद बंधुओं ने फ़र्रुख़सियर को बंदी बनाकर गद्दी से हटा दिया।
➣ इसके पश्चात् 19 अप्रैल, 1719 ई. को उसकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार लगभग छह वर्ष का उसका शासन समाप्त हो गया।
किसी शक्तिशाली अमीर द्वारा किसी मुगल सम्राट को अपदस्थ कर उसकी हत्या कराने का यह पहला प्रमुख उदाहरण था। साथ ही, मराठों ने पहली बार उत्तर भारत की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई।
रफ़ी-उद्-दराजात (28 फ़रवरी–4 जून, 1719 ई.)
➣ फ़र्रुख़सियर की मृत्यु के बाद सैय्यद बंधुओं (शासक निर्माता) ने रफ़ी-उश-शान के पुत्र रफ़ी-उद्-दराजात को मुगल सिंहासन पर बैठाया। वह मुगल साम्राज्य का दसवाँ सम्राट था।
➣ रफ़ी-उद्-दराजात ने 28 फ़रवरी, 1719 ई. से 4 जून, 1719 ई. तक केवल तीन माह चार दिन शासन किया। वह सबसे कम अवधि तक शासन करने वाला मुगल सम्राट माना जाता है।
➣ वह प्रारम्भ से ही क्षय रोग (टीबी) से पीड़ित था और 4 जून, 1719 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।
➣ उसके शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना नेकूसियर का विद्रोह थी। 18 मई, 1719 ई. को आगरा के सूबेदार बीरबल ने औरंगज़ेब के पौत्र नेकूसियर (शहज़ादा अकबर का पुत्र) को आगरा में मुगल सम्राट घोषित कर दिया।
➣ सैय्यद बंधुओं ने इस विद्रोह का शीघ्र दमन कर दिया और 13 अगस्त, 1719 ई. को नेकूसियर को बंदी बना लिया। बाद में 1723 ई. में दिल्ली के सलीमगढ़ किले में कैद के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
रफ़ी-उद्-दौला ‘शाहजहाँ द्वितीय’ (6 जून–17 सितम्बर, 1719 ई.)
➣ रफ़ी-उद्-दराजात की मृत्यु के बाद सैय्यद बंधुओं (शासक निर्माता) ने उसके भाई रफ़ी-उद्-दौला को मुगल सिंहासन पर बैठाया।
➣ गद्दी पर बैठने के बाद उसने ‘शाहजहाँ शानी’ अथवा ‘शाहजहाँ द्वितीय’ की उपाधि धारण की।
➣ उसका शासनकाल 6 जून, 1719 ई. से 17 सितम्बर, 1719 ई. तक लगभग 3 माह 11 दिन का रहा। वह मुगल इतिहास का दूसरा सबसे अल्पकालीन शासन करने वाला सम्राट था।
➣ अपने भाई रफ़ी-उद्-दराजात की भाँति रफ़ी-उद्-दौला भी सैय्यद बंधुओं की कठपुतली बना रहा तथा शासन का वास्तविक नियंत्रण उन्हीं के हाथों में था।
➣ 17 सितम्बर, 1719 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। अधिकांश इतिहासकार इसकी मृत्यु का कारण पेचिश मानते हैं, जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार उसकी हत्या कर दी गई थी।
▪ रफ़ी-उद्-दौला के शासनकाल में महाराजा अजीत सिंह अपनी पुत्री (फ़र्रुख़सियर की विधवा) को मुगल हरम से वापस मारवाड़ ले गए और उसका पुनः हिंदू धर्म में शुद्धीकरण कराया। यह घटना तत्कालीन राजपूत-मुगल संबंधों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
मुहम्मद इब्राहीम
➣ मुहम्मद इब्राहीम, बहादुरशाह प्रथम के पुत्र रफ़ी-उश-शान का पुत्र था।
➣ 1719 ई. में सैय्यद बंधुओं के विरोधी अमीरों ने उसे कुछ समय के लिए मुगल सम्राट घोषित कर दिया, किन्तु उसे व्यापक समर्थन प्राप्त नहीं हो सका।
➣ सैय्यद बंधुओं ने शीघ्र ही उसे पराजित कर बंदी बना लिया और उसका शासन समाप्त हो गया। इसके बाद मुहम्मद शाह को मुगल सिंहासन पर बैठाया गया।
▪ मुहम्मद इब्राहीम का शासन केवल नाममात्र का था। उसे अधिकांश इतिहासकार वैध एवं प्रभावी मुगल सम्राटों की सूची में विशेष स्थान नहीं देते।
मुहम्मद शाह ‘रौशन अख्तर/रंगीला’ (1719–1748 ई.)
➣ रफ़ी-उद्-दौला (शाहजहाँ द्वितीय) की मृत्यु के बाद सैय्यद बंधुओं (शासक निर्माता) ने बहादुरशाह प्रथम के चौथे पुत्र जहानशाह के पुत्र रौशन अख्तर को 29 सितम्बर, 1719 ई. को मुहम्मद शाह की उपाधि के साथ मुगल सिंहासन पर बैठाया।
➣ मुहम्मद शाह का शासनकाल लगभग 29 वर्ष (1719–1748 ई.) तक चला, जो औरंगज़ेब के बाद उत्तरकालीन मुगल शासकों में सबसे लंबा शासनकाल था।
➣ मुहम्मद शाह स्वभाव से विलासी, कला-प्रेमी एवं संगीत-प्रेमी था। वह अपना अधिकांश समय हरम, नृत्य, संगीत एवं मनोरंजन में व्यतीत करता था। इसी कारण इतिहास में वह ‘मुहम्मद शाह रंगीला’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जबकि युवराजकाल का नाम रौशन अख्तर था।
सैय्यद बंधुओं का पतन
➣ मुहम्मद शाह के शासन के प्रारम्भिक दिनों में वास्तविक सत्ता सैय्यद बंधुओं–अब्दुल्ला ख़ाँ एवं हुसैन अली ख़ाँ के हाथों में थी। दरबार के अनेक प्रभावशाली अमीर उनके बढ़ते प्रभुत्व से असंतुष्ट थे।
➣ सैय्यद बंधुओं के विरुद्ध एक शक्तिशाली गुट का गठन हुआ, जिसमें निज़ाम-उल-मुल्क, मुहम्मद अमीन ख़ाँ, हैदर बेग़ (हैदर ख़ाँ), सआदत ख़ाँ तथा राजमाता कुदसिया बेगम जैसे प्रभावशाली व्यक्ति सम्मिलित थे।
➣ 8 अक्टूबर, 1720 ई. को राजस्थान के टोडा भीम के निकट हैदर बेग़ ने छलपूर्वक हुसैन अली ख़ाँ की हत्या कर दी। इससे सैय्यद बंधुओं की शक्ति को गहरा आघात पहुँचा।
➣ अपने भाई की हत्या का समाचार मिलने पर अब्दुल्ला ख़ाँ ने मुहम्मद शाह के विरुद्ध सेना लेकर अभियान प्रारम्भ किया।
➣ 13 नवम्बर, 1720 ई. को हसनपुर के युद्ध में अब्दुल्ला ख़ाँ पराजित हुआ और उसे बंदी बना लिया गया। बाद में कारागार में उसकी मृत्यु हो गई।
मुहम्मद शाह के शासनकाल की प्रारम्भिक एवं सबसे महत्त्वपूर्ण घटना सैय्यद बंधुओं का पतन थी। इसके बाद मुगल दरबार में तूरानी गुट का प्रभाव बढ़ गया और सम्राट सैय्यद बंधुओं के नियंत्रण से मुक्त हो गया।
➣ सैय्यद बंधुओं के पतन के बाद मुहम्मद शाह ने मुगल साम्राज्य के प्रशासन को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। इसके लिए उसने अनुभवी अमीरों को उच्च पदों पर नियुक्त किया, किन्तु दरबारी गुटबाज़ी और षड्यंत्रों के कारण उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
निज़ाम-उल-मुल्क का उदय एवं हैदराबाद राज्य की स्थापना
➣ सैय्यद बंधुओं के पतन के बाद मुहम्मद अमीन ख़ाँ को वज़ीर नियुक्त किया गया, किन्तु जनवरी, 1721 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
➣ इसके बाद 1722 ई. में चिन क़िलिच ख़ाँ, जो इतिहास में निज़ाम-उल-मुल्क के नाम से प्रसिद्ध है, को मुगल साम्राज्य का वज़ीर नियुक्त किया गया।
➣ निज़ाम-उल-मुल्क एक योग्य, दूरदर्शी एवं कुशल प्रशासक था। उसने मुगल प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं दरबारी षड्यंत्रों को समाप्त करने का प्रयास किया, किन्तु दरबार के विलासी वातावरण तथा सम्राट की उदासीनता के कारण वह अपने सुधार सफलतापूर्वक लागू नहीं कर सका।
➣ दरबार की निरंतर गुटबाज़ी से निराश होकर 1724 ई. में उसने वज़ीर पद छोड़ दिया और मराठों के आक्रमण का सामना करने के बहाने दक्कन चला गया।
शकूरखेड़ा का युद्ध (1724 ई.)
➣ निज़ाम-उल-मुल्क के दक्कन चले जाने पर मुहम्मद शाह ने मुबारिज़ ख़ाँ को दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया तथा उसे निज़ाम-उल-मुल्क का दमन करने का आदेश दिया।
➣ दोनों के बीच 11 अक्टूबर, 1724 ई. को शकूरखेड़ा (साखरखेड़ा) के मैदान में निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें निज़ाम-उल-मुल्क विजयी रहा और मुबारिज़ ख़ाँ युद्ध में मारा गया।
➣ इस विजय के बाद दक्कन में मुगल सत्ता व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई और निज़ाम-उल-मुल्क सबसे शक्तिशाली प्रांतीय शासक बनकर उभरा।
हैदराबाद राज्य की स्थापना
➣ शकूरखेड़ा के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद 1724 ई. में निज़ाम-उल-मुल्क (चिन क़िलिच ख़ाँ) ने दक्कन में हैदराबाद राज्य की स्थापना की।
➣ यद्यपि उसने औपचारिक रूप से मुगल सम्राट की अधीनता स्वीकार की, किन्तु व्यवहार में हैदराबाद एक स्वतंत्र राज्य बन गया।
➣ मुहम्मद शाह ने भी परिस्थितियों को देखते हुए उसकी स्वायत्तता स्वीकार कर ली तथा उसे ‘आसफ़ जाह’ की उपाधि प्रदान की। आगे चलकर उसके वंश को आसफ़जाही वंश के नाम से जाना गया।
चिन क़िलिच ख़ाँ, जो निज़ाम-उल-मुल्क के नाम से प्रसिद्ध था, ने 1724 ई. में हैदराबाद राज्य की स्थापना की थी।
स्वतंत्र राज्यों का उदय
➣ मुहम्मद शाह के शासनकाल की सबसे प्रमुख राजनीतिक विशेषता मुगल साम्राज्य का विघटन तथा प्रांतीय राज्यों का उदय थी। इसी काल में बंगाल, अवध, हैदराबाद, रूहेलखंड, कर्नाटक तथा जाट राज्य जैसी क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरकर सामने आईं, जिन्होंने आगे चलकर मुगल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता को लगभग समाप्त कर दिया।
मुगल साम्राज्य से स्वतंत्र होने वाले प्रमुख राज्य
| राज्य | संस्थापक / प्रमुख शासक | स्थापना | राजधानी | महत्त्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|---|---|
| बंगाल | मुर्शिद कुली ख़ाँ | 1717–1720 ई. | मुर्शिदाबाद | बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा पर स्वायत्त शासन स्थापित किया। |
| अवध | सआदत ख़ाँ बुरहान-उल-मुल्क | 1722 ई. | फ़ैज़ाबाद (बाद में लखनऊ) | उत्तर भारत का शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य बना। |
| हैदराबाद | निज़ाम-उल-मुल्क (चिन क़िलिच ख़ाँ / आसफ़ जाह प्रथम) | 1724 ई. | हैदराबाद | आसफ़जाही वंश की स्थापना की। |
| रूहेलखंड | अली मुहम्मद ख़ाँ | 18वीं शताब्दी | बरेली | रोहिला अफ़गानों का प्रमुख राज्य। |
| कर्नाटक | सआदतुल्ला ख़ाँ | 18वीं शताब्दी | आर्काट | बाद में कर्नाटक युद्धों का प्रमुख क्षेत्र बना। |
| भरतपुर (जाट राज्य) | चूड़ामन → बदन सिंह | 18वीं शताब्दी | भरतपुर | बाद में महाराजा सूरजमल ने इसे सबसे शक्तिशाली बनाया। |
मराठा नीति
➣ मुहम्मद शाह के शासनकाल में मराठा शक्ति का तीव्र विस्तार हुआ। मुगल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर मराठों ने उत्तर एवं मध्य भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया।
➣ मुहम्मद शाह ने मराठों के साथ संघर्ष की अपेक्षा समझौते की नीति अपनाई। उसने छत्रपति शाहू के अधिकारों को स्वीकार करते हुए दक्कन के छः मुगल सूबों से चौथ एवं सरदेशमुखी की वसूली की अनुमति प्रदान की।
➣ इसके बदले मराठों ने आवश्यकता पड़ने पर मुगल साम्राज्य की सहायता के लिए 15,000 घुड़सवार उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।
➣ यद्यपि इस नीति से कुछ समय के लिए संघर्ष कम हुआ, किन्तु इससे मराठों की शक्ति और प्रभाव में निरंतर वृद्धि होती गई।
दिल्ली पर मराठा आक्रमण (1737 ई.)
➣ पेशवा बाजीराव प्रथम (1720–1740 ई.) के नेतृत्व में मराठा साम्राज्य अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ा। बाजीराव एक कुशल सेनानायक एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ था।
➣ उसका उद्देश्य मुगल साम्राज्य की दुर्बलता का लाभ उठाकर मराठा प्रभुत्व का विस्तार करना था। उसने मालवा, बुंदेलखंड तथा गुजरात सहित उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया।
➣ 29 मार्च, 1737 ई. को पेशवा बाजीराव प्रथम लगभग 500 चुने हुए घुड़सवारों के साथ तीव्र गति से दिल्ली पहुँच गया।
➣ मराठा सेना के इस आकस्मिक आक्रमण से मुगल दरबार में भारी घबराहट फैल गई। कहा जाता है कि मुहम्मद शाह कुछ समय के लिए दिल्ली छोड़ने की तैयारी करने लगा था।
➣ यद्यपि बाजीराव ने दिल्ली पर स्थायी अधिकार स्थापित करने का प्रयास नहीं किया, फिर भी इस घटना ने मुगल साम्राज्य की सैन्य कमजोरी को स्पष्ट कर दिया।
➣ बाजीराव प्रथम के अभियान के बाद उत्तर भारत में मराठों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। मुगल सम्राट की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा और प्रांतीय शासकों का केंद्रीय सत्ता पर विश्वास और कम हो गया।
➣ मराठों के बढ़ते प्रभाव ने आगे चलकर 1739 ई. में नादिरशाह के भारत आक्रमण का मार्ग भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रशस्त किया, क्योंकि उस समय तक मुगल साम्राज्य की सैन्य एवं राजनीतिक दुर्बलता पूरे एशिया में प्रसिद्ध हो चुकी थी।
पेशवा बाजीराव प्रथम दिल्ली पर आक्रमण करने वाला प्रथम मराठा सेनानायक था। 1737 ई. का उसका दिल्ली अभियान मुगल साम्राज्य की गिरती हुई शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
नादिरशाह का आक्रमण (1739 ई.)
➣ मुहम्मद शाह के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना फ़ारस (ईरान) के शासक नादिरशाह का 1739 ई. का भारत आक्रमण था। इस आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की सैन्य, आर्थिक एवं राजनीतिक दुर्बलता को उजागर कर दिया।
➣ 24 फ़रवरी, 1739 ई. को करनाल के युद्ध में मुगल सेना पराजित हुई, जिसके बाद नादिरशाह ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। 22 मार्च, 1739 ई. को दिल्ली में हुए नरसंहार और व्यापक लूट ने मुगल साम्राज्य को गहरा आघात पहुँचाया।
➣ नादिरशाह अपने साथ तख़्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन), कोहिनूर हीरा तथा अपार धन-संपत्ति फ़ारस ले गया। इसके बाद मुगल साम्राज्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई और उसकी प्रतिष्ठा को भी भारी क्षति पहुँची।
मुहम्मद शाह तख़्त-ए-ताऊस पर बैठने वाला अंतिम मुगल सम्राट था।
अहमदशाह अब्दाली का प्रथम आक्रमण (1748 ई.)
➣ 1747 ई. में नादिरशाह की मृत्यु के बाद उसके सेनापति अहमदशाह अब्दाली (अहमदशाह दुर्रानी) ने अफ़ग़ानिस्तान में दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की और अगले ही वर्ष भारत पर अपना पहला आक्रमण किया।
➣ 1748 ई. में उसने पंजाब पर आक्रमण किया, किन्तु 11 मार्च, 1748 ई. को मानुपुर (सरहिंद के निकट) के युद्ध में मुगल सेना ने उसका सफलतापूर्वक सामना किया। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व शहज़ादा अहमद (भावी सम्राट अहमदशाह बहादुर) तथा सफ़दरजंग ने किया।
➣ यद्यपि प्रथम आक्रमण में अब्दाली को पीछे हटना पड़ा, लेकिन बाद के वर्षों में उसने भारत पर कई बार आक्रमण किए, जिनसे मुगल साम्राज्य और अधिक कमजोर होता गया।
▪ नादिरशाह एवं अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण विस्तार से पढ़ें
मुहम्मद शाह की मृत्यु
➣ 26 अप्रैल, 1748 ई. को लगभग 29 वर्ष शासन करने के बाद मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई।
➣ उसके बाद उसका पुत्र अहमदशाह बहादुर मुगल सिंहासन पर बैठा।
मुहम्मद शाह का शासनकाल मुगल साम्राज्य के विघटन का काल माना जाता है। उसके शासन में केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, प्रांतीय राज्यों का उदय हुआ तथा विदेशी आक्रमणों ने मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया।
▪ उपनाम – रंगीला
▪ शासनकाल – 1719–1748 ई.
▪ सैय्यद बंधुओं का पतन – 1720 ई.
▪ हैदराबाद राज्य – 1724 ई.
▪ बाजीराव का दिल्ली अभियान – 1737 ई.
▪ नादिरशाह का आक्रमण – 1739 ई.
▪ अहमदशाह अब्दाली का प्रथम आक्रमण – 1748 ई.
▪ मृत्यु – 26 अप्रैल, 1748 ई.
▪ उत्तराधिकारी – अहमदशाह बहादुर
अहमदशाह बहादुर (1748–1754 ई.)
➣ मुहम्मद शाह रंगीला की मृत्यु के बाद उसका एकमात्र पुत्र अहमदशाह बहादुर 1748 ई. में मुगल सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल में मुगल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता और अधिक कमजोर हो गई तथा दरबारी गुटों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।
➣ अहमदशाह बहादुर की माता उदहम बाई (बाद में कुदसिया बेगम) मूलतः एक नर्तकी थीं। सम्राट बनने के बाद उन्होंने दरबार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और उन्हें ‘क़िबला-ए-आलम’ की उपाधि प्राप्त हुई।
➣ अहमदशाह बहादुर प्रशासन में विशेष रुचि नहीं लेता था। फलस्वरूप शासन का अधिकांश कार्य राजमाता कुदसिया बेगम, हरम तथा हिजड़ों के प्रभावशाली समूह के हाथों में चला गया।
अहमदशाह बहादुर का शासनकाल दरबारी षड्यंत्रों, आर्थिक अव्यवस्था तथा अमीरों के बढ़ते हस्तक्षेप के लिए जाना जाता है। इसी काल में मुगल सम्राट की वास्तविक शक्ति लगभग समाप्त हो गई।➣ अहमदशाह बहादुर के शासनकाल में मुगल साम्राज्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। निरंतर युद्धों, दरबारी षड्यंत्रों तथा कमजोर प्रशासन के कारण राजकोष लगभग खाली हो गया।
➣ कहा जाता है कि सेना को वेतन देने के लिए शाही महल की बहुमूल्य वस्तुओं तक को बेचना पड़ा, जो मुगल साम्राज्य की गिरती हुई आर्थिक स्थिति का स्पष्ट प्रमाण था।
दरबार की राजनीति
➣ अहमदशाह बहादुर के शासनकाल में जावेद ख़ाँ नामक एक प्रभावशाली हिजड़ा दरबार का प्रमुख राजनीतिज्ञ बन गया। सम्राट ने उसे ‘नवाब बहादुर’ की उपाधि प्रदान की, जिसके कारण उसका प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।
➣ उस समय मुगल साम्राज्य का सबसे प्रभावशाली मंत्री अवध का नवाब सफ़दरजंग था, जो वज़ीर के पद पर आसीन था। प्रारम्भ में उसने साम्राज्य को संभालने का प्रयास किया, किन्तु शीघ्र ही उसके और सम्राट के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए।
➣ सफ़दरजंग अपनी शक्ति के बल पर कई प्रशासनिक निर्णय स्वयं लेने लगा। इसके उत्तर में सम्राट ने जावेद ख़ाँ के नेतृत्व में एक नया दरबारी गुट तैयार किया, जिससे दरबार में गुटबाज़ी और बढ़ गई।
दरबारी संघर्ष
➣ अहमदशाह बहादुर के शासनकाल में मुगल दरबार अनेक शक्तिशाली गुटों में विभाजित हो गया। वास्तविक सत्ता सम्राट के बजाय वज़ीरों, दरबारी अमीरों तथा प्रभावशाली सरदारों के हाथों में सिमटने लगी।
➣परिणामस्वरूप सफ़दरजंग, जावेद ख़ाँ, इमाद-उल-मुल्क तथा मराठा सरदारों के बीच निरंतर सत्ता संघर्ष चलता रहा, जिससे केंद्रीय शासन और अधिक कमजोर होता गया।
➣ उस समय अवध के नवाब एवं वज़ीर सफ़दरजंग मुगल साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली अमीर थे, जबकि जावेद ख़ाँ राजमाता कुदसिया बेगम का विश्वासपात्र होने के कारण दरबार की राजनीति में अत्यधिक प्रभाव रखता था। दोनों गुटों के बीच बढ़ते मतभेदों ने दरबार की गुटबाज़ी को और तीव्र कर दिया।
➣ 1752 ई. में सफ़दरजंग के समर्थकों ने जावेद ख़ाँ की हत्या कर दी। इस घटना के बाद राजमाता कुदसिया बेगम का प्रभाव भी तेजी से घटने लगा और दरबार में सत्ता का नया संघर्ष प्रारम्भ हो गया।
➣ इसी समय ग़ाज़ीउद्दीन ख़ाँ फ़िरोज़ जंग द्वितीय (इमाद-उल-मुल्क) एक शक्तिशाली दरबारी नेता के रूप में उभरा। उसने मराठा सरदार मल्हारराव होल्कर का समर्थन प्राप्त कर सफ़दरजंग को पराजित किया और स्वयं मुगल साम्राज्य का वज़ीर बन गया।
➣ इमाद-उल-मुल्क के वज़ीर बनने के बाद मुगल सम्राट की स्थिति और अधिक कमजोर हो गई। अब वास्तविक सत्ता उसके हाथों में आ गई तथा अहमदशाह बहादुर केवल नाममात्र का शासक बनकर रह गया।
अहमदशाह बहादुर की पदच्युति
➣ वज़ीर बनने के बाद इमाद-उल-मुल्क मुगल साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। उसने सम्राट की उपेक्षा करते हुए प्रशासन और दरबार पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया।
➣ अहमदशाह बहादुर की अयोग्यता तथा कमजोर नेतृत्व से असंतुष्ट होकर इमाद-उल-मुल्क ने उसे गद्दी से हटाने का निर्णय लिया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने मराठा सरदार रघुनाथराव (राघोबा) का सहयोग प्राप्त किया।
➣ 2 जून, 1754 ई. को मराठा सेना की सहायता से इमाद-उल-मुल्क ने अहमदशाह बहादुर को अपदस्थ कर बंदी बना लिया तथा उसकी आँखें फोड़कर उसे कारागार में डाल दिया।
➣ अहमदशाह बहादुर की पदच्युति के बाद जहाँदारशाह के पुत्र आलमगीर द्वितीय को मुगल सिंहासन पर बैठाया गया।
➣ इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि उस समय तक मुगल सम्राट केवल नाममात्र का शासक रह गया था और वास्तविक सत्ता वज़ीरों तथा मराठों जैसे शक्तिशाली समूहों के हाथों में पहुँच चुकी थी।
आलमगीर द्वितीय (1754–1759 ई.)
➣ अहमदशाह बहादुर को पदच्युत किए जाने के बाद जहाँदारशाह के पुत्र अज़ीज़ुद्दीन को 2 जून, 1754 ई. को आलमगीर द्वितीय की उपाधि के साथ मुगल सिंहासन पर बैठाया गया।
‘आलमगीर’ उपाधि इससे पहले औरंगज़ेब (आलमगीर प्रथम) ने धारण की थी।
➣ आलमगीर द्वितीय एक दुर्बल एवं निर्बल व्यक्तित्व वाला शासक था। उसके शासनकाल में वास्तविक सत्ता सम्राट के हाथों में न होकर वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क के नियंत्रण में थी। परिणामस्वरूप सम्राट केवल नाममात्र का शासक बनकर रह गया।
अहमदशाह अब्दाली का आक्रमण (1757 ई.)
➣ आलमगीर द्वितीय के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना अहमदशाह अब्दाली का 1757 ई. में भारत पर चौथा आक्रमण था। इस अभियान के दौरान अब्दाली ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया तथा मथुरा, वृंदावन और आगरा सहित अनेक नगरों में व्यापक लूटपाट एवं नरसंहार कराया।
➣ इस आक्रमण के बाद मुगल सम्राट को अब्दाली की शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं। परिणामस्वरूप पंजाब, कश्मीर, सिंध तथा सरहिंद के क्षेत्रों पर अब्दाली का प्रभाव स्थापित हो गया।
➣ अब्दाली ने अपने विश्वसनीय सहयोगी नजीब ख़ाँ रोहिल्ला (नजीब-उद्-दौला) को मीर बख़्शी नियुक्त कराया। इसके बाद नजीब-उद्-दौला मुगल दरबार का सबसे प्रभावशाली सरदार बन गया और दिल्ली की राजनीति में अफ़ग़ानों का प्रभाव बढ़ गया।
दरबार की स्थिति एवं अन्य महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
➣ आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में मुगल साम्राज्य की आर्थिक एवं प्रशासनिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। वास्तविक सत्ता वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क के हाथों में थी, जबकि सम्राट की स्थिति केवल नाममात्र के शासक की रह गई थी।
➣ समकालीन विवरणों के अनुसार वज़ीर इमाद-उल-मुल्क के आतंक के कारण एक समय ऐसा भी आया जब लगातार तीन दिनों तक शाही रसोई (शाही चूल्हा) में भोजन नहीं पक सका।
➣ यहाँ तक कि भोजन की व्यवस्था के लिए शाही परिवार की महिलाओं को भी महल से बाहर निकलना पड़ा। यह घटना मुगल साम्राज्य की गिरती हुई आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति का प्रतीक मानी जाती है।
➣ कहा जाता है कि आर्थिक संकट इतना गहरा गया था कि सम्राट आलमगीर द्वितीय के पास उचित शाही सवारी तक उपलब्ध नहीं थी। परिणामस्वरूप वह अपने जनानखाने से लाल किले की सफेद संगमरमर वाली मोती मस्जिद तक पैदल जाया करता था।
➣ आलमगीर द्वितीय ने फ़्रांसीसी गवर्नर जोज़फ़ फ़्राँस्वा डूप्ले को उसकी सेवाओं के सम्मान में ‘नवाब’ की उपाधि प्रदान की थी। यह उस समय भारत में फ्रांसीसी प्रभाव के बढ़ते महत्व का संकेत था।
➣ इसी शासनकाल में 23 जून, 1757 ई. को प्लासी का युद्ध हुआ, जिसमें बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व वाली अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने पराजित कर दिया। इस विजय के साथ भारत में अंग्रेज़ों के राजनीतिक प्रभुत्व की वास्तविक शुरुआत हुई।
आलमगीर द्वितीय की हत्या
➣ मुगल दरबार में वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा था। दूसरी ओर सम्राट आलमगीर द्वितीय उसके नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से शासन करना चाहता था। इसी कारण दोनों के बीच संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हो गए।
➣ इसी समय अहमदशाह अब्दाली के एक बार पुनः भारत की ओर बढ़ने की सूचना मिली। इमाद-उल-मुल्क को आशंका थी कि यदि अब्दाली दिल्ली पहुँच गया तो सम्राट उसके विरुद्ध अब्दाली का सहयोग ले सकता है। इस भय से उसने आलमगीर द्वितीय को हटाने का षड्यंत्र रचा।
➣ 29 नवम्बर, 1759 ई. को इमाद-उल-मुल्क के आदेश पर आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई। इस प्रकार उसका लगभग पाँच वर्ष का शासन समाप्त हो गया।
➣ आलमगीर द्वितीय की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में पुनः उत्तराधिकार का संकट उत्पन्न हो गया। दिल्ली में शाहजहाँ तृतीय को सम्राट घोषित किया गया, जबकि बिहार में युवराज अली गौहर ने स्वयं को शाह आलम द्वितीय घोषित कर दिया।
➣ कुछ समय तक मुगल साम्राज्य में दो अलग-अलग सम्राटों का दावा बना रहा।
शाहजहाँ तृतीय (1759–1760 ई.)
➣ आलमगीर द्वितीय की हत्या के बाद वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क ने मुही-उल-मिल्लत को शाहजहाँ तृतीय की उपाधि देकर दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया।
➣ उसका शासनकाल 10 दिसम्बर, 1759 ई. से 10 अक्टूबर, 1760 ई. तक रहा। इस अवधि में वास्तविक सत्ता वज़ीर इमाद-उल-मुल्क के हाथों में ही रही तथा शाहजहाँ तृतीय केवल नाममात्र का सम्राट था।
➣ इसी समय दूसरी ओर अली गौहर ने बिहार में स्वयं को शाह आलम द्वितीय घोषित कर दिया था। फलस्वरूप कुछ समय तक मुगल साम्राज्य में दो सम्राटों का दावा बना रहा।
शाहजहाँ तृतीय उत्तरकालीन मुगल इतिहास का एक नाममात्र का शासक था, जिसे वज़ीर इमाद-उल-मुल्क ने अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए सिंहासन पर बैठाया था।
शाह आलम द्वितीय ‘अली गौहर’ (1759–1806 ई.)
➣ आलमगीर द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र अली गौहर ने आगे चलकर शाह आलम द्वितीय के नाम से शासन किया। उसका शासनकाल उत्तरकालीन मुगल इतिहास का सबसे लंबा तथा सर्वाधिक घटनापूर्ण काल माना जाता है।
➣ इसी काल में पानीपत का तृतीय युद्ध, बक्सर का युद्ध, इलाहाबाद की संधि, बंगाल की दीवानी तथा दिल्ली पर अंग्रेज़ों का अधिकार जैसी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हुईं।
➣ 29 नवम्बर, 1759 ई. को उसके पिता आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई। उस समय अली गौहर बिहार में था। उसने पटना पहुँचकर स्वयं को शाह आलम द्वितीय के नाम से मुगल सम्राट घोषित कर दिया।
➣ दूसरी ओर दिल्ली में वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क ने मुही-उल-मिल्लत को शाहजहाँ तृतीय के नाम से सिंहासन पर बैठा दिया।
➣ परिणामस्वरूप कुछ समय तक मुगल साम्राज्य में दो अलग-अलग सम्राटों का दावा बना रहा-दिल्ली में शाहजहाँ तृतीय तथा बिहार में शाह आलम द्वितीय।
उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति
➣ शाह आलम द्वितीय के शासनारंभ के समय मुगल साम्राज्य अत्यंत कमजोर हो चुका था। दिल्ली पर वज़ीर इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव था, जबकि उत्तर-पश्चिम में अहमदशाह अब्दाली, दक्षिण में मराठे तथा पूर्व में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी-अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे थे।
➣ इसी समय अहमदशाह अब्दाली ने पुनः भारत पर आक्रमण कर पंजाब पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। दूसरी ओर पेशवा बालाजी बाजीराव के नेतृत्व में मराठे उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे।
➣दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसने आगे चलकर 1761 ई. के पानीपत के तृतीय युद्ध का मार्ग प्रशस्त किया।
पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.)
➣ उत्तर भारत में मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच प्रभुत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही थी। मराठों ने पंजाब तक अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था, जबकि अब्दाली उत्तर-पश्चिम भारत में अपनी सत्ता बनाए रखना चाहता था। परिणामस्वरूप दोनों शक्तियों के बीच निर्णायक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई।
➣ मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ कर रहे थे, जबकि उनके साथ विश्वासराव, इब्राहिम ख़ाँ गर्दी तथा अनेक प्रमुख मराठा सरदार उपस्थित थे। दूसरी ओर अफ़ग़ान सेना का नेतृत्व अहमदशाह अब्दाली कर रहा था, जिसे नजीब-उद्-दौला तथा शुजाउद्दौला जैसे भारतीय सहयोगियों का समर्थन प्राप्त था।
➣ 14 जनवरी, 1761 ई. को पानीपत के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। लंबे और रक्तरंजित संघर्ष के बाद मराठों की निर्णायक पराजय हुई। इस युद्ध में सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव सहित हजारों मराठा सैनिक मारे गए।
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध ने उत्तर भारत में मराठों के तीव्र विस्तार को अस्थायी रूप से रोक दिया। यद्यपि अब्दाली विजयी रहा, फिर भी वह भारत में स्थायी शासन स्थापित नहीं कर सका और कुछ समय बाद अफ़ग़ानिस्तान लौट गया।
➣ इस युद्ध के बाद मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। मुगल साम्राज्य पहले की भाँति कमजोर बना रहा और भारत की राजनीति में मराठों, अफ़ग़ानों तथा अंग्रेज़ों के बीच शक्ति-संघर्ष जारी रहा।
बक्सर का युद्ध(1764 ई.)
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद भी शाह आलम द्वितीय अपनी खोई हुई सत्ता को पुनः स्थापित नहीं कर सका। इसी बीच मीर क़ासिम और अंग्रेज़ों के बीच संघर्ष आरम्भ हो गया।
➣ अंग्रेज़ों का मुकाबला करने के लिए मीर क़ासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने एक संयुक्त मोर्चा बनाया।
➣ 22 अक्टूबर, 1764 ई. को बक्सर के मैदान में दोनों पक्षों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। संयुक्त सेना का सामना अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से हुआ, जिसका नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो (Hector Munro) ने किया।
➣ पराजय के बाद मीर क़ासिम भाग गया, शुजाउद्दौला परास्त हुआ और शाह आलम द्वितीय अंग्रेज़ों के संरक्षण में चला गया। बक्सर का युद्ध भारत में अंग्रेज़ी सत्ता के विस्तार की दृष्टि से अत्यंत निर्णायक सिद्ध हुआ।
इलाहाबाद की संधि (1765 ई.)
➣ बक्सर के युद्ध के बाद 12 अगस्त, 1765 ई. को रॉबर्ट क्लाइव और शाह आलम द्वितीय के बीच इलाहाबाद की संधि हुई। इस संधि ने भारत में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ कर दिया।
➣ संधि के अनुसार बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूली का अधिकार) अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को प्राप्त हो गई। बदले में कंपनी ने मुगल सम्राट को 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देने तथा कोड़ा एवं इलाहाबाद के जिले उसके अधिकार में देने का वचन दिया।
➣ इलाहाबाद की संधि के बाद मुगल सम्राट की आर्थिक निर्भरता अंग्रेज़ों पर बढ़ गई। इसके साथ ही अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी केवल एक व्यापारिक संस्था न रहकर भारत की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गई।
शाह आलम द्वितीय की दिल्ली वापसी
➣ इलाहाबाद की संधि (1765 ई.) के बाद मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय अंग्रेज़ों के संरक्षण में इलाहाबाद में रहने लगा। यद्यपि वह नाममात्र का सम्राट था, परंतु उसके पास वास्तविक राजनीतिक शक्ति नहीं थी।
➣ अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये की पेंशन दिए जाने के बावजूद शाह आलम द्वितीय अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और राजधानी दिल्ली को पुनः प्राप्त करना चाहता था। दूसरी ओर कंपनी भी उस समय दिल्ली की राजनीति में सीधे हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं थी।
➣ इस बीच उत्तर भारत में मराठा सरदार महादजी शिंदे (सिंधिया) का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा। शाह आलम द्वितीय ने दिल्ली लौटने के लिए महादजी शिंदे से सहायता माँगी।
➣ 1772 ई. में महादजी शिंदे के संरक्षण में शाह आलम द्वितीय पुनः दिल्ली पहुँचा और मुगल सिंहासन पर आसीन हुआ। इसके बाद कई वर्षों तक वह मराठों के संरक्षण में रहा, जबकि दिल्ली की वास्तविक सत्ता महादजी शिंदे के प्रभाव में थी।
➣ शाह आलम द्वितीय के दिल्ली लौटने के कारण अंग्रेज़ों और मुगल सम्राट के संबंधों में दूरी आ गई। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने उसे दी जाने वाली 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद कर दी तथा कोड़ा और इलाहाबाद के जिलों पर पुनः अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
गुलाम क़ादिर का अत्याचार
➣ 1788 ई. में रुहेलखंड के सरदार गुलाम क़ादिर रोहिल्ला ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसका उद्देश्य मुगल शाही ख़ज़ाने पर कब्ज़ा करना तथा दिल्ली की सत्ता पर अपना प्रभाव स्थापित करना था।
➣ गुलाम क़ादिर ने सम्राट शाह आलम द्वितीय पर छिपे हुए ख़ज़ाने का पता बताने के लिए अमानवीय अत्याचार किए। जब सम्राट ने कोई जानकारी नहीं दी, तो उसने उसकी आँखें फोड़ दीं और उसे अंधा कर दिया। यह घटना उत्तरकालीन मुगल इतिहास की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक मानी जाती है।
➣ गुलाम क़ादिर ने शाही परिवार के सदस्यों के साथ भी दुर्व्यवहार किया तथा लाल किले में व्यापक लूटपाट करवाई। उसके अत्याचारों से दिल्ली की जनता और मुगल दरबार दोनों भयभीत हो गए।
➣ कुछ समय बाद महादजी शिंदे ने दिल्ली पहुँचकर गुलाम क़ादिर को पराजित कर राजधानी से बाहर खदेड़ दिया तथा शाह आलम द्वितीय को पुनः मुगल सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। इसके बाद दिल्ली पर मराठों का प्रभाव पुनः स्थापित हो गया।
अंग्रेज़ों का दिल्ली पर अधिकार(1803 ई.)
➣ 1803 ई. में द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध के दौरान अंग्रेज़ी सेना के सेनापति जनरल जेरार्ड लेक ने दौलतराव शिंदे को पराजित कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
➣ दिल्ली पर अंग्रेज़ों के अधिकार के बाद शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी का संरक्षण स्वीकार कर लिया और वह कंपनी का पेंशनभोगी बन गया। इसके साथ ही मुगल सम्राट की राजनीतिक स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो गई।
➣ 19 नवम्बर, 1806 ई. को शाह आलम द्वितीय की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र अकबर द्वितीय मुगल सिंहासन पर बैठा।
शाह आलम द्वितीय का मूल्यांकन
➣ शाह आलम द्वितीय उत्तरकालीन मुगल सम्राटों में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला शासक था। उसका शासनकाल लगभग 47 वर्ष (1759–1806 ई.) तक चला, किन्तु इस पूरे काल में वह अधिकांश समय विभिन्न शक्तियों-अफ़ग़ानों, अंग्रेज़ों और मराठों-के संरक्षण में रहा।
➣ उसके शासनकाल में मुगल साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो गई। सम्राट का प्रभाव केवल औपचारिक रह गया, जबकि वास्तविक सत्ता समय-समय पर अहमदशाह अब्दाली, महादजी शिंदे तथा अंततः अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में चली गई।
➣ शाह आलम द्वितीय के शासनकाल में पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.), बक्सर का युद्ध (1764 ई.), इलाहाबाद की संधि (1765 ई.), बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी का कंपनी को प्राप्त होना, गुलाम क़ादिर द्वारा सम्राट को अंधा किया जाना (1788 ई.) तथा 1803 ई. में अंग्रेज़ों द्वारा दिल्ली पर अधिकार जैसी घटनाएँ हुईं। इन घटनाओं ने भारत के राजनीतिक इतिहास की दिशा बदल दी।
➣ 1803 ई. के बाद मुगल सम्राट पूर्णतः अंग्रेज़ों का पेंशनभोगी बन गया। यद्यपि उसके नाम का सम्मान बना रहा, किन्तु उसके पास कोई वास्तविक प्रशासनिक या सैन्य शक्ति नहीं थी।
➣ इतिहासकारों की दृष्टि में शाह आलम द्वितीय का शासनकाल मुगल साम्राज्य के अंतिम राजनीतिक पतन तथा भारत में अंग्रेज़ी प्रभुत्व के सुदृढ़ होने का काल माना जाता है।
अकबर द्वितीय (1806–1837 ई.)
➣ शाह आलम द्वितीय की मृत्यु के बाद 19 नवम्बर, 1806 ई. को उसका पुत्र अकबर द्वितीय मुगल सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल तक मुगल सम्राट की राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी और वह अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में एक नाममात्र का शासक बनकर रह गया था।
अकबर द्वितीय अंग्रेज़ों के संरक्षण में शासन करने वाला पहला मुगल सम्राट था।
➣ अकबर द्वितीय के समय वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में थी। मुगल सम्राट का प्रभाव केवल औपचारिक रह गया था और वह कंपनी द्वारा दी जाने वाली पेंशन पर निर्भर था।
अंग्रेज़ों का बढ़ता प्रभुत्व
➣ अकबर द्वितीय के शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल सम्राट के अधिकारों और सम्मान को क्रमशः सीमित करना प्रारम्भ कर दिया। सम्राट की राजनीतिक भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी थी और उसका प्रभाव केवल औपचारिक रह गया था।
➣ 1835 ई. में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल सम्राट के नाम से सिक्के जारी करना बंद कर दिया। इसके स्थान पर कंपनी ने अपने नाम से सिक्के जारी करने प्रारम्भ किए। यह घटना भारत में मुगल सम्राट की घटती हुई संप्रभुता का स्पष्ट प्रतीक थी।
➣ इसी काल में कंपनी सरकार ने मुगल सम्राट को प्राप्त पारंपरिक सम्मान और विशेषाधिकारों में भी धीरे-धीरे कटौती करनी प्रारम्भ कर दी, जिससे उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और अधिक कम हो गई।
राजा राममोहन राय
➣ अकबर द्वितीय के शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी और मुगल सम्राट के संबंध लगातार तनावपूर्ण होते गए। कंपनी ने सम्राट के विशेषाधिकारों तथा आर्थिक सुविधाओं में कटौती करनी शुरू कर दी, जिससे उसकी स्थिति और अधिक कमजोर हो गई।
➣ सम्राट अकबर द्वितीय ने अपने अधिकारों तथा पेंशन संबंधी मांगों को अंग्रेज़ी सरकार के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए राजा राममोहन राय को अपना प्रतिनिधि बनाकर 1831 ई. में इंग्लैंड भेजा।
इसी अवसर पर उन्हें राजा की उपाधि प्रदान की गई।
➣ राजा राममोहन राय ने इंग्लैंड में मुगल सम्राट की ओर से उसके अधिकारों और पेंशन से संबंधित विषयों को ब्रिटिश सरकार के समक्ष रखा। यद्यपि उन्हें पूर्ण सफलता नहीं मिली, फिर भी इस घटना का भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व माना जाता है।
बहादुरशाह द्वितीय ‘बहादुरशाह ज़फ़र’ (1837–1857 ई.)
➣ अकबर द्वितीय की मृत्यु के बाद 28 सितम्बर, 1837 ई. को उसका पुत्र बहादुरशाह द्वितीय मुगल सिंहासन पर बैठा। वह मुगल वंश का अंतिम सम्राट था।
➣ उसके शासनकाल तक मुगल साम्राज्य का वास्तविक अधिकार केवल लाल किले तक सीमित रह गया था और सम्राट पूरी तरह अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में था।
➣ यद्यपि उसके पास वास्तविक राजनीतिक या सैन्य शक्ति नहीं थी, फिर भी 1857 ई. की क्रांति के दौरान वह भारतीय प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा। विद्रोहियों ने उसे भारत का सम्राट घोषित कर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाया।
➣ भारतीय इतिहास में बहादुरशाह ज़फ़र को एक शक्तिशाली सम्राट के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। उसकी शायरी आज भी भारत की सांस्कृतिक धरोहर का महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
➣ बहादुरशाह द्वितीय ‘ज़फ़र’ उपनाम से उर्दू शायरी लिखता था। इसी कारण वह इतिहास में बहादुरशाह ज़फ़र के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह स्वयं एक उत्कृष्ट कवि था तथा उसके दरबार में साहित्य, संगीत और उर्दू कविता को विशेष संरक्षण प्राप्त था।
साहित्य एवं सांस्कृतिक संरक्षण
➣ बहादुरशाह ज़फ़र का दरबार तत्कालीन भारत का एक प्रमुख साहित्यिक एवं सांस्कृतिक केंद्र था। उसके संरक्षण में अनेक प्रसिद्ध कवि, लेखक और विद्वान रहे, जिन्होंने उर्दू साहित्य को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।
➣ शेख़ इब्राहीम ‘ज़ौक़’ बहादुरशाह ज़फ़र के उस्ताद (काव्य-गुरु) थे, जबकि प्रसिद्ध उर्दू शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब भी उसके दरबार से जुड़े हुए थे। इसके अतिरिक्त हसन अस्करी उसके आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं।
➣ बहादुरशाह ज़फ़र के समय तक मुगल साम्राज्य राजनीतिक रूप से भले ही कमजोर हो चुका था, किन्तु साहित्य, भाषा, संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में उसका दरबार अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए था।
1857 ई. की क्रांति एवं बहादुरशाह ज़फ़र की भूमिका
➣ 10 मई, 1857 ई. को मेरठ से आरम्भ हुए सैनिक विद्रोह ने शीघ्र ही एक व्यापक जनविद्रोह का रूप ले लिया। 11 मई, 1857 ई. को विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुँचे और उन्होंने बहादुरशाह ज़फ़र से इस आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने का आग्रह किया।
➣ प्रारम्भ में बहादुरशाह ज़फ़र इस विद्रोह का नेतृत्व करने के पक्ष में नहीं था, क्योंकि उसके पास न तो पर्याप्त सैन्य शक्ति थी और न ही प्रशासनिक संसाधन। किन्तु विद्रोहियों के आग्रह तथा परिस्थितियों के दबाव में उसने उनका नेतृत्व स्वीकार कर लिया।
➣ विद्रोही सैनिकों ने बहादुरशाह ज़फ़र को हिन्दुस्तान का सम्राट घोषित किया। उसके नाम से फ़रमान जारी किए गए तथा विभिन्न भारतीय शासकों और जनता से अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष में सहयोग करने का आह्वान किया गया।
➣ यद्यपि बहादुरशाह ज़फ़र विद्रोह का प्रतीकात्मक नेता था, फिर भी उसके नेतृत्व ने 1857 के आंदोलन को वैधता और व्यापक स्वीकार्यता प्रदान की। इसी कारण अंग्रेज़ों ने उसे विद्रोह का प्रमुख उत्तरदायी मानते हुए उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की।
गिरफ्तारी, मुकदमा एवं निर्वासन
➣ सितम्बर 1857 ई. में अंग्रेज़ों ने भीषण संघर्ष के बाद पुनः दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इसके बाद बहादुरशाह ज़फ़र अपने परिवार सहित हुमायूँ के मकबरे में शरण लेने के लिए चला गया।
➣ 20 सितम्बर, 1857 ई. को अंग्रेज़ अधिकारी मेजर विलियम हडसन ने बहादुरशाह ज़फ़र को हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन उसने ज़फ़र के पुत्रों मिर्ज़ा मुगल, मिर्ज़ा ख़िज़र सुल्तान तथा पौत्र मिर्ज़ा अबू बकर को बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के गोली मार दी।
➣ लोकप्रिय परंपरा के अनुसार बहादुरशाह ज़फ़र की गिरफ्तारी के समय मेजर हडसन और ज़फ़र के बीच प्रसिद्ध शेरों का आदान-प्रदान हुआ, यद्यपि इस घटना के ऐतिहासिक प्रमाण निश्चित रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
➣ अंग्रेज़ों ने बहादुरशाह ज़फ़र पर लाल किले में मुकदमा चलाया। उस पर 1857 के विद्रोह का नेतृत्व करने, अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने तथा राजद्रोह के आरोप लगाए गए। मुकदमे के बाद उसे आजीवन निर्वासन का दंड दिया गया।
➣ 1858 ई. में बहादुरशाह ज़फ़र को उसकी पत्नी ज़ीनत महल तथा परिवार के कुछ सदस्यों के साथ रंगून (वर्तमान यांगून, म्यांमार) निर्वासित कर दिया गया, जहाँ उसे कड़ी निगरानी में रखा गया।
रंगून में अंतिम जीवन एवं मृत्यु
➣ रंगून (वर्तमान यांगून, म्यांमार) में निर्वासन के दौरान बहादुरशाह ज़फ़र ने अपना शेष जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में व्यतीत किया। कभी सम्पूर्ण भारत का प्रतीक माने जाने वाले मुगल सम्राट को अपने अंतिम दिनों में गुमनामी और अभाव का जीवन जीना पड़ा।
➣ निर्वासन के दौरान उसकी साहित्यिक प्रतिभा और अधिक निखरकर सामने आई। उसने अनेक मार्मिक ग़ज़लें और शेर लिखे, जिनमें अपने देश से बिछड़ने, अकेलेपन और जीवन की निराशा का गहरा चित्रण मिलता है। उसकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ आज भी व्यापक रूप से उद्धृत की जाती हैं-
न किसी के दिल का क़रार हूँ।
जो किसी के काम न आ सका,
मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ।।”
➣ 7 नवम्बर, 1862 ई. को 86 वर्ष की आयु में रंगून में बहादुरशाह ज़फ़र का निधन हो गया। उसे वहीं श्वेडागोन पैगोडा के निकट दफनाया गया। बाद में उसी स्थान पर उसकी स्मृति में मकबरा विकसित किया गया।
➣ 1 नवम्बर, 1858 ई. को महारानी विक्टोरिया के घोषणा-पत्र के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया। इसके साथ ही मुगल साम्राज्य का औपचारिक अंत हो गया और बहादुरशाह ज़फ़र भारत का अंतिम मुगल सम्राट सिद्ध हुआ।
निष्कर्ष
➣ मुगल साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक ऐसा युग था जिसने केवल राजनीतिक व्यवस्था ही नहीं, बल्कि प्रशासन, कला, स्थापत्य, साहित्य, संगीत और संस्कृति को भी नई दिशा दी। बाबर द्वारा स्थापित यह साम्राज्य अकबर के समय अपनी सबसे मजबूत नींव पर खड़ा हुआ, जहाँगीर और शाहजहाँ के काल में समृद्धि एवं सांस्कृतिक वैभव के शिखर पर पहुँचा तथा औरंगज़ेब के समय क्षेत्रीय विस्तार की चरम सीमा तक पहुँचा।
➣ किन्तु किसी भी विशाल साम्राज्य की तरह मुगल साम्राज्य भी समय के साथ अनेक चुनौतियों का सामना करने लगा। उत्तराधिकार के संघर्ष, कमजोर शासक, शक्तिशाली अमीरों की महत्वाकांक्षा, प्रांतीय राज्यों का उदय, मराठों का बढ़ता प्रभाव, विदेशी आक्रमण और अंततः अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक हस्तक्षेप ने इसकी शक्ति को धीरे-धीरे क्षीण कर दिया।
➣ इतिहास का यह भी एक अद्भुत विडम्बना है कि जिस अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने कभी मुगल दरबार में व्यापार करने की अनुमति माँगी थी, उसी कंपनी ने धीरे-धीरे भारत की राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में ले ली और अंततः उसी मुगल साम्राज्य का अंत कर दिया, जिसके संरक्षण में उसने भारत में अपने व्यापार की शुरुआत की थी।
उत्तरकालीन मुगल दरबार के प्रमुख गुट
➣ औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में केंद्रीय सत्ता निरंतर कमजोर होती गई। परिणामस्वरूप दरबार के शक्तिशाली अमीर विभिन्न गुटों में विभाजित हो गए। इन गुटों के बीच वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा ने उत्तराधिकार के युद्धों, षड्यंत्रों तथा राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा दिया।
➣ उत्तरकालीन मुगल दरबार में मुख्य रूप से सैय्यद बंधु, तूरानी गुट, ईरानी गुट तथा अफ़ग़ानी गुट सबसे अधिक प्रभावशाली थे। इन गुटों की आपसी प्रतिद्वंद्विता ने मुगल साम्राज्य के पतन को और अधिक तेज़ कर दिया।
उत्तरकालीन मुगल दरबार में प्रमुख गुट एवं उनके पद
| मुगल शासक | प्रमुख व्यक्ति | गुट | पद / भूमिका |
|---|---|---|---|
| जहाँदारशाह (1712–13) |
ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ | ईरानी | वज़ीर एवं वास्तविक शासक |
| फ़र्रुख़सियर (1713–19) |
अब्दुल्ला ख़ाँ बारहा | सैय्यद बंधु | वज़ीर |
| हुसैन अली ख़ाँ बारहा | सैय्यद बंधु | मीर बख़्शी एवं अमीर-उल-उमरा | |
| मुहम्मदशाह (1719–48) |
निज़ाम-उल-मुल्क | तूरानी | वज़ीर (1722–24), हैदराबाद का संस्थापक |
| मुहम्मद अमीन ख़ाँ | तूरानी | प्रारम्भिक वज़ीर | |
| मुहम्मदशाह (1719–48) |
सआदत ख़ाँ | ईरानी | अवध का सूबेदार एवं संस्थापक |
| मुहम्मदशाह (1719–48) |
ज़कारिया ख़ाँ | तूरानी | लाहौर का सूबेदार |
| अहमदशाह बहादुर (1748–54) |
सफ़दरजंग | ईरानी | वज़ीर |
| अहमदशाह बहादुर (1748–54) |
इमाद-उल-मुल्क | तूरानी | बाद में वज़ीर एवं सत्ता का वास्तविक नियंत्रक |
| आलमगीर द्वितीय (1754–59) |
नजीबुद्दौला | अफ़ग़ानी | मीर बख़्शी |
| आलमगीर द्वितीय (1754–59) |
इमाद-उल-मुल्क | तूरानी | वज़ीर एवं वास्तविक शासक |
| शाह आलम द्वितीय (1759–1806) |
नजीबुद्दौला | अफ़ग़ानी | मीर बख़्शी एवं प्रमुख सरदार |
| गुट | धार्मिक/क्षेत्रीय आधार | प्रमुख नेता | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|---|
| सैय्यद बंधु | बारहा के सैय्यद (भारत) | अब्दुल्ला ख़ाँ, हुसैन अली ख़ाँ | किंग मेकर (राजा बनाने वाले) |
| तूरानी गुट | मध्य एशिया के सुन्नी | निज़ाम-उल-मुल्क, अमीन ख़ाँ, ज़कारिया ख़ाँ | सैय्यद बंधुओं का प्रमुख विरोधी गुट |
| ईरानी गुट | फ़ारसी (शिया) | ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ, सआदत ख़ाँ | फ़ारसी मूल के अमीरों का प्रभावशाली गुट |
| अफ़ग़ानी गुट | अफ़ग़ान/रोहिला सरदार | मुहम्मद ख़ाँ बंगश, अली मुहम्मद ख़ाँ | उत्तर भारत एवं रोहिलखंड में प्रभाव |
1. सैय्यद बंधु
➣ सैय्यद बंधु उत्तरकालीन मुगल इतिहास में ‘किंग मेकर’ (राजा बनाने वाले) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके प्रभाव के कारण कई मुगल सम्राट गद्दी पर बैठे और हटाए गए।
➣ इस गुट के दो प्रमुख नेता सैय्यद अब्दुल्ला ख़ाँ बारहा तथा उनके छोटे भाई सैय्यद हुसैन अली ख़ाँ बारहा थे। दोनों का संबंध उत्तर प्रदेश के बारहा क्षेत्र से था, जिसके कारण इन्हें बारहा के सैय्यद कहा जाता था।
➣ फ़र्रुख़सियर को मुगल सम्राट बनाने में इन दोनों भाइयों की निर्णायक भूमिका रही। बाद में सम्राट और सैय्यद बंधुओं के बीच मतभेद बढ़ गए। परिणामस्वरूप 1719 ई. में सैय्यद बंधुओं ने पेशवा बालाजी विश्वनाथ से समझौता कर फ़र्रुख़सियर को अपदस्थ कर उसकी हत्या करवा दी।
➣ सैय्यद अब्दुल्ला ख़ाँ को वज़ीर तथा सैय्यद हुसैन अली ख़ाँ को मीर बख़्शी एवं अमीर-उल-उमरा का पद प्राप्त था।
➣ मुहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल में तूरानी गुट के षड्यंत्रों के कारण 1720 ई. में हुसैन अली ख़ाँ की हत्या कर दी गई, जबकि 1720–21 ई. में अब्दुल्ला ख़ाँ पराजित होकर बंदी बना लिया गया। इसके साथ ही सैय्यद बंधुओं का प्रभुत्व समाप्त हो गया।
2. तूरानी गुट
➣ तूरानी गुट में मुख्यतः मध्य एशिया से आए सुन्नी मुसलमान अमीर सम्मिलित थे। मुहम्मद शाह के समय यही गुट दरबार में सबसे अधिक प्रभावशाली बन गया।
➣ इस गुट के प्रमुख नेताओं में निज़ाम-उल-मुल्क आसफ़जाह, मुहम्मद अमीन ख़ाँ तथा ज़कारिया ख़ाँ प्रमुख थे।
➣ इसी गुट ने सैय्यद बंधुओं के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर उनका प्रभाव समाप्त किया तथा आगे चलकर मुगल राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित किया।
3. ईरानी गुट
➣ ईरानी गुट में मुख्यतः शिया मत के वे अमीर शामिल थे, जो फ़ारस (ईरान) से भारत आए थे। उत्तरकालीन मुगल दरबार में यह भी एक प्रभावशाली गुट था।
➣ इस गुट के प्रमुख नेताओं में ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ, सआदत ख़ाँ बुरहान-उल-मुल्क, अमीर ख़ाँ तथा अन्य ईरानी मूल के सरदार सम्मिलित थे।
➣ इस गुट ने समय-समय पर तूरानी तथा सैय्यद गुटों के साथ राजनीतिक गठबंधन और संघर्ष दोनों किए तथा उत्तरकालीन मुगल राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।
4. अफ़ग़ानी गुट
➣ अफ़ग़ानी गुट में अफ़ग़ान मूल के सरदार सम्मिलित थे, जिनका प्रभाव विशेष रूप से उत्तर भारत और रोहिलखंड क्षेत्र में बढ़ा।
➣ इस गुट के प्रमुख नेताओं में मुहम्मद ख़ाँ बंगश तथा अली मुहम्मद ख़ाँ रोहिल्ला प्रमुख थे।
➣ समय के साथ अफ़ग़ानी सरदारों ने उत्तर भारत में अपनी स्वतंत्र शक्ति स्थापित कर ली। बाद में यही शक्ति रोहिला राज्यों के रूप में विकसित हुई, जिसने उत्तरकालीन मुगल राजनीति तथा अहमदशाह अब्दाली के अभियानों में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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