यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन (1888 ई.)
➣ यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन की स्थापना 1888 ई. में अलीगढ़ में सर सैयद अहमद ख़ाँ तथा राजा शिवप्रसाद सितारे-हिंद द्वारा की गई थी। यह संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव के विरोध में स्थापित प्रमुख राजनीतिक संगठनों में से एक थी।
➣ इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीतियों का विरोध करना, ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीयों – विशेषकर मुसलमानों एवं देशी रियासतों के शासकों – की निष्ठा को प्रदर्शित करना तथा यह स्पष्ट करना था कि कांग्रेस सम्पूर्ण भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
➣ सर सैयद अहमद ख़ाँ का मानना था कि उस समय कांग्रेस की राजनीतिक माँगें, विशेषकर प्रातिनिधिक शासन तथा प्रतियोगी सिविल सेवा परीक्षाओं से संबंधित प्रस्ताव, मुसलमानों के हितों के अनुरूप नहीं थे।
➣ इसी कारण उन्होंने एक ऐसे संगठन की स्थापना की, जो ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग की नीति अपनाते हुए विशेष रूप से मुसलमानों एवं देशी रियासतों के हितों का प्रतिनिधित्व कर सके।
स्थापना की पृष्ठभूमि
➣ 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद यह संगठन तेजी से एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच के रूप में उभरने लगा। कांग्रेस द्वारा प्रातिनिधिक शासन, प्रशासनिक सुधारों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से भारतीयों को उच्च सरकारी सेवाओं में अवसर देने जैसी माँगें उठाई जाने लगीं।
➣ सर सैयद अहमद ख़ाँ इन माँगों से सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि उस समय मुसलमान समुदाय शिक्षा एवं आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत पिछड़ा हुआ था। ऐसी स्थिति में खुली प्रतियोगिता तथा बहुसंख्यक-आधारित प्रातिनिधिक व्यवस्था से मुसलमानों के हित प्रभावित हो सकते थे और वे प्रशासन एवं राजनीति में पीछे रह जाते।
➣ इन्हीं कारणों से सर सैयद ने कांग्रेस का खुलकर विरोध करना प्रारम्भ किया। उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और जनता के समक्ष यह स्पष्ट करना था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सम्पूर्ण भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि मुख्यतः पश्चिमी शिक्षा प्राप्त एक वर्ग की आवाज़ है।
➣ इसी पृष्ठभूमि में 1888 ई. में अलीगढ़ में सर सैयद अहमद ख़ाँ तथा राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिंद’ ने यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन की स्थापना की, जिसने कांग्रेस-विरोधी विचारधारा को एक संगठित राजनीतिक मंच प्रदान किया।
यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन के उद्देश्य
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीतिक नीतियों एवं कार्यक्रमों का विरोध करना।
- ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीयों की निष्ठा एवं सहयोग की भावना को बनाए रखना।
- मुसलमानों एवं देशी रियासतों के शासकों के हितों का प्रतिनिधित्व करना।
- ब्रिटिश सरकार एवं ब्रिटिश जनता के समक्ष यह स्पष्ट करना कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सम्पूर्ण भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
- संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण माध्यमों से ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग बनाए रखना।
- कांग्रेस द्वारा उठाई गई प्रातिनिधिक शासन एवं प्रतियोगी सिविल सेवा परीक्षाओं जैसी माँगों का विरोध करना, जिन्हें सर सैयद मुसलमानों के हितों के विरुद्ध मानते थे।
- पत्र-पत्रिकाओं, सभाओं तथा ज्ञापनों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार तक अपनी बात पहुँचाना।
सदस्य एवं प्रमुख जुड़े व्यक्ति
| व्यक्ति | योगदान / परिचय |
|---|---|
| सर सैयद अहमद ख़ाँ | मुख्य संस्थापक; मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल (MAO) कॉलेज (बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) के प्रवर्तक एवं संस्था के वैचारिक मार्गदर्शक। |
| राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिंद’ | बनारस के प्रमुख शिक्षाविद् एवं ज़मींदार; संस्था के सह-संस्थापक। |
| थियोडोर बेक | MAO कॉलेज के प्राचार्य; संस्था के प्रमुख प्रेरक एवं संगठनकर्ता। |
| नवाब मोहसिन-उल-मुल्क | सर सैयद अहमद ख़ाँ के निकट सहयोगी; MAO कॉलेज के सचिव तथा अलीगढ़ आंदोलन के प्रमुख नेता। |
| नवाब वक़ार-उल-मुल्क | सर सैयद के विश्वस्त सहयोगी; आगे चलकर MAO कॉलेज के मानद सचिव तथा मुस्लिम राजनीति के प्रमुख नेता। |
| चिराग़ अली | शिक्षाविद्, विचारक एवं सर सैयद अहमद ख़ाँ के प्रमुख सहयोगियों में से एक। |
➣ इसके विपरीत, बदरुद्दीन तैयबजी जैसे प्रतिष्ठित मुस्लिम नेता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़े रहे (वे 1887 ई. में कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने)। इससे स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के प्रति सर सैयद का विरोध सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय की सर्वसम्मत राय नहीं था।
स्थापना से पूर्व की प्रमुख घटनाएँ
➣ 1888 ई. में यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन की स्थापना से पूर्व सर सैयद अहमद ख़ाँ ने कई ऐसे सार्वजनिक वक्तव्य दिए, जिन्होंने उनके कांग्रेस-विरोधी राजनीतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट किया तथा संस्था की स्थापना के लिए वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ लखनऊ भाषण (18 दिसंबर 1887) : कैसरबाग स्थित बारादरी में आयोजित मुसलमानों की एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए सर सैयद ने पहली बार खुलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलोचना की। इस सभा में अवध के तालुक़दार, सरकारी अधिकारी, सेना, वकालत, पत्रकारिता तथा धर्म क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रमुख व्यक्ति उपस्थित थे।
➣ मेरठ भाषण (16 मार्च 1888) : इस भाषण में सर सैयद ने कहा कि बदरुद्दीन तैयबजी को छोड़कर कोई भी प्रमुख मुस्लिम नेता कांग्रेस से नहीं जुड़ा था, इसलिए कांग्रेस के प्रति उनका समर्थन सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय की राय नहीं माना जा सकता। यह भाषण मुहम्मडन एजुकेशनल कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के अवसर पर दिया गया था।
➣ अलीगढ़ में स्थापना बैठक (1888) : इन भाषणों से बनी वैचारिक पृष्ठभूमि के बाद 1888 ई. में अलीगढ़ में सर सैयद अहमद ख़ाँ तथा राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिंद’ ने यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन की औपचारिक स्थापना की।
गतिविधियाँ एवं कार्यप्रणाली
➣ एसोसिएशन ने ब्रिटेन में भी अपनी एक शाखा स्थापित की, जिसे ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के सहयोग से संचालित किया गया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश संसद एवं ब्रिटिश जनता के समक्ष कांग्रेस-विरोधी दृष्टिकोण प्रस्तुत करना था।
➣ संस्था ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों के समानांतर सभाएँ आयोजित कीं तथा समाचार-पत्रों, पर्चों और ज्ञापनों के माध्यम से यह प्रचारित किया कि कांग्रेस केवल पश्चिमी शिक्षा प्राप्त एक सीमित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, न कि किसानों, मुसलमानों, देशी रियासतों के शासकों अथवा व्यापक भारतीय समाज का।
➣ इसके सदस्यों में मुख्यतः मुस्लिम अभिजात वर्ग, ज़मींदार तथा देशी रियासतों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति शामिल थे। संस्था की कार्यशैली पूरी तरह संवैधानिक थी और यह अपने विचारों के प्रचार के लिए सभाओं, ज्ञापनों तथा प्रचार-प्रसार के माध्यमों का उपयोग करती थी।
एसोसिएशन का महत्व
➣ यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का खुलकर विरोध करने वाली प्रारम्भिक राजनीतिक संस्थाओं में से एक थी, जिसने कांग्रेस की नीतियों के विरुद्ध एक संगठित वैकल्पिक राजनीतिक मंच प्रस्तुत किया।
➣ इसने ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा एवं सहयोग की नीति का समर्थन किया तथा संवैधानिक सुधारों के बजाय सरकार के साथ सहयोग को अधिक उपयुक्त माना।
➣ इस संस्था ने मुसलमानों एवं देशी रियासतों के शासकों के लिए एक पृथक राजनीतिक मंच उपलब्ध कराया, जिससे उनके राजनीतिक हितों एवं दृष्टिकोण को संगठित रूप से अभिव्यक्ति मिली।
➣ इसके विचारों एवं गतिविधियों ने आगे चलकर पृथक राजनीतिक संगठनों के विकास तथा अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (1906 ई.) की स्थापना के लिए अप्रत्यक्ष रूप से अनुकूल वातावरण तैयार किया।
➣ इसने ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति को अप्रत्यक्ष समर्थन प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण को बल मिला।
➣ यह संस्था इस बात का प्रमाण है कि 19वीं सदी के अंत तक भारतीय राष्ट्रवाद एकरूप नहीं था, बल्कि विभिन्न समुदायों, वर्गों एवं राजनीतिक हितों के आधार पर उसमें स्पष्ट मतभेद विद्यमान थे।
रूपांतरण एवं उत्तरवर्ती प्रभाव
➣ यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन का प्रभाव मुख्यतः मुस्लिम अभिजात वर्ग, ज़मींदारों तथा ब्रिटिश सरकार के समर्थक शिक्षित वर्ग तक सीमित रहा।
➣ कांग्रेस-विरोधी विचारधारा के बावजूद यह संस्था व्यापक जनसमर्थन प्राप्त नहीं कर सकी और अखिल भारतीय स्तर पर एक प्रभावशाली राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित नहीं हो पाई।
➣ समय के साथ इसके नेताओं ने अनुभव किया कि केवल कांग्रेस का विरोध पर्याप्त नहीं है, बल्कि भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक, शैक्षिक तथा प्रशासनिक हितों के संरक्षण के लिए एक अधिक संगठित एवं विशिष्ट संस्था की आवश्यकता है। इसी पृष्ठभूमि में 1893 ई. में मोहम्मडन डिफेंस एसोसिएशन की स्थापना हुई, जिसने यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन की राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाया।
➣ 1898 ई. में सर सैयद अहमद ख़ाँ के निधन के बाद अलीगढ़ आंदोलन के प्रारम्भिक नेतृत्व का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा।
➣ परिणामस्वरूप यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन भी सक्रिय राजनीतिक भूमिका निभाने में असमर्थ हो गई और उसका प्रभाव क्रमशः समाप्त होता गया।
➣ यद्यपि यह संस्था स्वयं अधिक समय तक प्रभावी नहीं रह सकी, फिर भी इसने भारतीय मुसलमानों में पृथक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता तथा ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग की नीति को बल दिया।
➣ आगे चलकर यही वैचारिक धारा मोहम्मडन डिफेंस एसोसिएशन (1893) और बाद में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (1906) जैसी संस्थाओं के विकास में दिखाई देती है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना वर्ष | 1888 ई. |
| स्थान | अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) |
| संस्थापक | सर सैयद अहमद ख़ाँ एवं राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिंद’ |
| पृष्ठभूमि | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की नीतियों एवं उसकी राजनीतिक माँगों के विरोध में स्थापना। |
| पूर्व-घटनाएँ | लखनऊ भाषण (18 दिसंबर 1887) एवं मेरठ भाषण (16 मार्च 1888) |
| मुख्य उद्देश्य | कांग्रेस का विरोध करना तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा एवं सहयोग की नीति का समर्थन करना। |
| प्रमुख जुड़े व्यक्ति | सर सैयद अहमद ख़ाँ, राजा शिवप्रसाद, थियोडोर बेक, मोहसिन-उल-मुल्क, वक़ार-उल-मुल्क, चिराग़ अली |
| प्रमुख गतिविधियाँ | ब्रिटेन में शाखा की स्थापना, कांग्रेस-विरोधी प्रचार तथा ब्रिटिश संसद एवं जनमत को प्रभावित करने का प्रयास। |
| सदस्य वर्ग | मुख्यतः मुस्लिम अभिजात वर्ग, ज़मींदार तथा देशी रियासतों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति। |
| रूपांतरण | 1893 ई. में मुहम्मडन डिफेंस एसोसिएशन में रूपांतरित। |
| दूरगामी प्रभाव | 1906 ई. में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना के लिए वैचारिक आधार तैयार किया। |
| विशेषता | कांग्रेस के विरोध में स्थापित प्रारम्भिक राजनीतिक संस्था, जिसने मुसलमानों एवं देशी रियासतों के हितों का प्रतिनिधित्व करने का प्रयास किया। |
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