1.अधिकतर नरमपंथी नेता थे-
43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
कांग्रेस की स्थापना (1885) से लेकर 1905 तक के काल को इतिहासकार नरमपंथी युग कहते हैं। इस दौर में दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, दिनशा वाचा, सुरेंद्रनाथ बनर्जी एवं व्योमेश चंद्र बनर्जी जैसे प्रमुख नेता मुख्यतः बंबई, कलकत्ता एवं पूना जैसे बड़े नगरों से जुड़े शिक्षित मध्यवर्गीय वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। ये अधिकांशतः वकील, पत्रकार, शिक्षक एवं व्यवसायी थे, जिनका ग्रामीण जनसाधारण से सीधा जुड़ाव सीमित था। इनकी कार्यपद्धति संवैधानिक साधनों- स्मृतिपत्र, प्रार्थना-पत्र एवं प्रतिनिधिमंडल भेजने तक ही सीमित थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) ने वर्ष 1885 में बंबई में कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन का आयोजन कराया था, जिसके प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी बने थे। दादाभाई नौरोजी वर्ष 1892 में फिन्सबरी सेंट्रल क्षेत्र से ब्रिटिश संसद के सदस्य निर्वाचित होने वाले पहले भारतीय बने थे।
2.निम्नलिखित में से कौन उग्र राष्ट्रवादी नेता नहीं था?
U.P.P.C.S (Mains) 2016
उत्तर-(d)
गोपाल कृष्ण गोखले उदारवादी (नरमपंथी) धारा के प्रमुख नेता थे, जबकि बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक (बी.जी. तिलक) तथा लाला लाजपत राय ‘लाल-बाल-पाल’ की त्रयी के रूप में प्रसिद्ध उग्र राष्ट्रवादी (गरमपंथी) नेता थे। गोखले संवैधानिक सुधारों तथा क्रमिक परिवर्तन में विश्वास रखते थे और उन्हें महात्मा गांधी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गोखले ने वर्ष 1905 में पूना में ‘भारत सेवक समाज’ (Servants of India Society) की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य निःस्वार्थ भाव से देश सेवा करने वाले कार्यकर्ता तैयार करना था। गोखले वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे।
3.कांग्रेस के नरम-दल के नेताओं की आंदोलन की पद्धति थी-
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(b)
नरमपंथी नेता ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार रहते हुए संवैधानिक दायरे में रहकर आंदोलन चलाने में विश्वास करते थे, जिसे ‘राजभक्तिपूर्ण आंदोलन’ (Constitutional Agitation) कहा गया। वे प्रार्थना-पत्र, स्मरण-पत्र (Memorial), प्रतिनिधिमंडल भेजने तथा प्रेस के माध्यम से जनमत तैयार करने को अपना प्रमुख हथियार मानते थे, ताकि प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाई जा सके।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक ने इसी नरमपंथी शैली की आलोचना करते हुए इसे ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ (Political Mendicancy) की संज्ञा दी थी। नरमपंथी नेताओं ने वर्ष 1889 में लंदन में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति’ तथा पत्रिका ‘इंडिया’ की स्थापना कर ब्रिटिश जनमत को प्रभावित करने का प्रयास किया था।
4.किसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरुद्ध ‘अनुनय, विनय और विरोध’ की राजनीति का दोष लगाया था?
U.P.P.C.S (Pre) 2005
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
उत्तर-(a)
बाल गंगाधर तिलक ने नरमपंथी कांग्रेस नेतृत्व की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस केवल ‘अनुनय, विनय और विरोध’ (Prayer, Petition and Protest) की राजनीति तक सीमित रह गई है, जिससे ब्रिटिश सरकार पर कोई वास्तविक दबाव नहीं बन पाता। उनका मानना था कि स्वराज्य भीख में नहीं मिलेगा, बल्कि उसे संघर्ष द्वारा अर्जित करना होगा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक ने ‘केसरी’ (मराठी) तथा ‘मराठा’ (अंग्रेजी) नामक समाचार-पत्रों के माध्यम से जनजागरण किया तथा जनसमूह को संगठित करने हेतु गणेश चतुर्थी एवं शिवाजी उत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सवों का आरंभ किया। होमरूल आंदोलन (1916) के दौरान उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया था कि स्वराज्य उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।
5.निम्न में कौन उग्रपंथी नहीं था?
44th B.P.S.C. (Pre) 2000
उत्तर-(d)
दिए गए विकल्पों में बाल गंगाधर तिलक उग्र राष्ट्रवादी धारा के प्रमुख नेता थे, जबकि मदनलाल (मदनलाल ढींगरा) तथा ऊधम सिंह क्रांतिकारी धारा से संबद्ध थे, जिन्होंने सशस्त्र प्रतिरोध का मार्ग अपनाया था। इसके विपरीत गोपाल कृष्ण गोखले उदारवादी विचारधारा के प्रतिनिधि थे, जो संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण साधनों के माध्यम से सुधार लाने में विश्वास रखते थे, अतः वे उग्रपंथी श्रेणी में नहीं आते।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मदनलाल ढींगरा ने वर्ष 1909 में लंदन में कर्नल विलियम कर्जन वायली की हत्या की थी, जबकि ऊधम सिंह ने वर्ष 1940 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के प्रतिशोध स्वरूप माइकल ओ’डायर की हत्या लंदन में की थी।
6.महात्मा गांधी के पदार्पण से पूर्व भारत में राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को निम्नलिखित में से किन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने प्रभावित किया था?
1. 1898 के इटली-अबीसीनिया युद्ध ने
2. चीन के बॉक्सर आंदोलन ने
3. आयरलैंड के क्रांतिकारी आंदोलन ने
4. रूस-जापान के युद्ध में जापान की विजय ने
2. चीन के बॉक्सर आंदोलन ने
3. आयरलैंड के क्रांतिकारी आंदोलन ने
4. रूस-जापान के युद्ध में जापान की विजय ने
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(d)
20वीं सदी के प्रारंभ में घटित कई अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। इटली-अबीसीनिया युद्ध में एक अफ्रीकी देश द्वारा यूरोपीय औपनिवेशिक शक्ति को परास्त करना, चीन में साम्राज्यवाद-विरोधी बॉक्सर आंदोलन, आयरलैंड का क्रांतिकारी स्वाधीनता संघर्ष तथा रूस-जापान युद्ध (1904-05) में एशियाई देश जापान की यूरोपीय शक्ति रूस पर विजय- इन सभी घटनाओं ने भारतीयों के मन में यह विश्वास जगाया कि यूरोपीय शक्तियां अजेय नहीं हैं, जिससे राष्ट्रवादी चेतना को बल मिला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इटली-अबीसीनिया युद्ध की निर्णायक ‘अडवा की लड़ाई’ (Battle of Adwa) वर्ष 1896 में हुई थी, जिसमें इथियोपिया के सम्राट मेनेलिक द्वितीय की सेना ने इटली को बुरी तरह पराजित किया था; इसे किसी अफ्रीकी राष्ट्र द्वारा किसी यूरोपीय औपनिवेशिक शक्ति की पहली बड़ी पराजय माना जाता है। रूस-जापान युद्ध का समापन वर्ष 1905 की पोर्ट्समाउथ संधि से हुआ था।
7.किसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर प्रार्थना, याचना तथा विरोध की राजनीति करने का आरोप लगाया ?
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2002
उत्तर-(b)
वर्ष 1905 के पश्चात कांग्रेस के भीतर उग्रपंथी विचारधारा का उदय हुआ, जिसके प्रमुख नेता बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल तथा अरविंद घोष थे। ये नेता संवैधानिक दायरे में मांगें मनवाने के नरमपंथी तरीके से असंतुष्ट थे और स्वराज्य को अपना अंतिम लक्ष्य मानते थे। तिलक ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हमारा उद्देश्य आत्मनिर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं, और उन्होंने कांग्रेस पर केवल प्रार्थना, याचना तथा विरोध तक सीमित रहने का आरोप लगाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अंग्रेजी सरकार ने तिलक को राजद्रोह के आरोप में वर्ष 1908 में छह वर्ष के कारावास की सजा देकर मांडले (बर्मा) की जेल भेजा था, जहां उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ की रचना की थी।
8.निम्नलिखित में किस आंदोलन के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विभाजन हुआ जिसके परिणामस्वरूप ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ का उद्भव हुआ?
I.A.S. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में आरंभ हुए स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन को लेकर कांग्रेस के नरमपंथी तथा गरमपंथी धड़ों में गहरे मतभेद उभरे। गरमपंथी नेता इस आंदोलन को बंगाल तक सीमित न रखकर संपूर्ण देश में फैलाना चाहते थे और केवल विदेशी वस्त्र-बहिष्कार ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार के साथ पूर्ण असहयोग की मांग कर रहे थे, जबकि नरमपंथी इसे संयमित दायरे में रखना चाहते थे। इन्हीं मतभेदों के चलते अंततः कांग्रेस में ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ का विभाजन सामने आया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह विभाजन औपचारिक रूप से दिसंबर 1907 के सूरत अधिवेशन में हुआ, जिसे इतिहास में ‘सूरत विभाजन’ (Surat Split) के नाम से जाना जाता है। बंगाल विभाजन की घोषणा तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने जुलाई 1905 में की थी, जो 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी हुआ।
9.इनमें से कौन उग्र राष्ट्रवाद के उल्लेखनीय नेताओं में से नहीं था?
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
बिपिन चंद्र पाल, लोकमान्य तिलक तथा लाला लाजपत राय उग्र राष्ट्रवादी धारा के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं, जिन्हें सम्मिलित रूप से ‘लाल-बाल-पाल’ कहा जाता है। इसके विपरीत गोपाल कृष्ण गोखले नरमपंथी विचारधारा से जुड़े थे और वे क्रमिक, संवैधानिक सुधारों के पक्षधर थे, अतः उन्हें उग्र राष्ट्रवाद के नेताओं में सम्मिलित नहीं किया जाता।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बिपिन चंद्र पाल ने ‘न्यू इंडिया’ तथा ‘वंदे मातरम्’ जैसे पत्रों का संपादन किया था और उन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों के अग्रदूतों में गिना जाता है। लाला लाजपत राय को उनकी ओजस्वी देशभक्ति के कारण ‘पंजाब केसरी’ की उपाधि दी गई थी।
10. निम्नलिखित में से किसने 1904 से लगातार भारत को ‘स्वशासन’ देने पर बल दिया?
U.P.P.C.S (Mains) 2016
उत्तर-(d)
दादाभाई नौरोजी ने भारत के लिए ‘स्वराज्य’ अथवा ‘स्वशासन’ की मांग सर्वप्रथम वर्ष 1904 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस के समक्ष रखी थी। इसके पश्चात वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में भेजे गए अपने संदेश में भी उन्होंने स्वशासन की आवश्यकता पर बल दिया, तथा वर्ष 1906 के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए दिए गए भाषण में औपचारिक रूप से ‘स्वराज’ की मांग प्रस्तुत की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दीर्घकालिक राष्ट्रसेवा के कारण दादाभाई नौरोजी को ‘भारत का वयोवृद्ध पुरुष’ (Grand Old Man of India) कहा जाता है। अपनी पुस्तक ‘Poverty and Un-British Rule in India’ (1901) में उन्होंने प्रसिद्ध ‘धन-निष्कासन सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) प्रतिपादित किया, जिसमें भारत की संपदा के ब्रिटेन की ओर निरंतर बहिर्गमन को रेखांकित किया गया था।
11. ‘शेर-ए-पंजाब’ के नाम से इनमें से कौन मशहूर थे?
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
लाला लाजपत राय अपनी ओजस्वी एवं निर्भीक वक्तृत्व शैली के कारण ‘शेर-ए-पंजाब’ (पंजाब का सिंह) के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता एवं पंजाब प्रांत के प्रतिनिधि थे तथा उन्हें ‘पंजाब केसरी’ के नाम से भी जाना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के विरुद्ध लाहौर में आयोजित शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप कुछ सप्ताह बाद नवंबर 1928 में उनका निधन हो गया। उन्होंने वर्ष 1920 में कांग्रेस के विशेष कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता भी की थी।
12. निम्नलिखित में से कौन-सा नेता कांग्रेस के गरम दल से संबंधित था ?
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(a)
अरविंद घोष कांग्रेस के उग्रवादी अथवा गरम दल के विचारक एवं नेता थे तथा लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक एवं बिपिन चंद्र पाल के साथ गरम दल के चार प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। उन्होंने कांग्रेस की संवैधानिक एवं याचनापूर्ण नीति की कड़ी आलोचना करते हुए इसे जनसाधारण से कटी हुई तथा असफल संस्था बताया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वर्ष 1908 के अलीपुर बम कांड (मणिकतल्ला उद्यान छापे) में गिरफ्तार होने के बाद साक्ष्य के अभाव में अरविंद घोष को बरी कर दिया गया, जिसके पश्चात उन्होंने सक्रिय राजनीति त्याग दी और पांडिचेरी जाकर आध्यात्मिक साधना में जीवन व्यतीत किया, जहां उन्होंने ‘श्री अरविंद आश्रम’ की स्थापना की।
13. निम्न में से किस एक को लाला लाजपत राय ने अपना राजनीतिक गुरु माना था?
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(d)
लाला लाजपत राय इटली के महान क्रांतिकारी विचारक ज्यूसेपे मैजिनी के जीवन और विचारों से गहराई से प्रभावित थे तथा उन्होंने मैजिनी को अपना राजनीतिक गुरु माना। मैजिनी के राष्ट्रवादी एवं त्यागपूर्ण आदर्शों ने लाला जी की राजनीतिक सोच को आकार दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लाला लाजपत राय ने मैजिनी की प्रसिद्ध रचना ‘द ड्यूटीज ऑफ मैन’ (Duties of Man) का उर्दू भाषा में अनुवाद भी किया था। मैजिनी इटली के एकीकरण आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे, जिन्होंने वर्ष 1831 में ‘यंग इटली’ नामक संगठन की स्थापना की थी।
14.कांग्रेस की प्रार्थना और याचना की नीति अंततोगत्वा समाप्त हो गई-
I.A.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
नरमपंथी नेतृत्व की निरंतर असफल आवेदन-निवेदन नीति से कांग्रेस के भीतर एवं बाहर असंतोष बढ़ता गया। ब्रिटिश सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैये ने बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे युवा नेताओं को क्षुब्ध किया, जिन्होंने उदारवादियों की भिक्षावृत्ति-नीति को अस्वीकार करते हुए स्वराज्य को अपना लक्ष्य बनाया। तिलक के नेतृत्व में ही कांग्रेस की यह प्रार्थना-याचना की नीति अंततः समाप्त हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अंग्रेज इतिहासकार वैलेंटाइन शिरोल ने तिलक को अपनी पुस्तक में “भारतीय अशांति का जनक” (Father of Indian Unrest) की संज्ञा दी थी। तिलक ने वर्ष 1916 में पुणे में होमरूल लीग की स्थापना की थी।
15.राष्ट्रीय आंदोलन में निम्न में से किसको नरमदलीय के तौर पर नहीं जाना जाता था?
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(a)
दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविंद रानाडे तथा गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरमपंथी (उदारवादी) धड़े के प्रमुख प्रतिनिधि थे, जो संवैधानिक तरीकों एवं क्रमिक सुधारों में विश्वास रखते थे। इसके विपरीत बाल गंगाधर तिलक गरम दल अथवा उग्रवादी विचारधारा के अग्रणी नेता थे, अतः वे नरमदलीय श्रेणी में नहीं आते।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महादेव गोविंद रानाडे को ‘भारतीय अर्थशास्त्र का जनक’ माना जाता है तथा वे ‘प्रार्थना समाज’ एवं ‘डेक्कन एजुकेशन सोसायटी’ जैसी सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़े थे। इसके विपरीत तिलक को जनता ने ‘लोकमान्य’ की उपाधि से सम्मानित किया था।
16. उन्होंने मैजिनी, गैरिबॉल्डी, शिवाजी तथा श्रीकृष्ण की जीवनी लिखी; वे अमेरिका में कुछ समय के लिए रहे तथा वे केंद्रीय सभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए। वे थे-
I.A.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय एक सशक्त लेखक भी थे, जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण, छत्रपति शिवाजी, स्वामी दयानंद सरस्वती, मैजिनी तथा गैरिबॉल्डी जैसी महान विभूतियों की संक्षिप्त जीवनियां लिखीं। वर्ष 1907 में छह माह के निर्वासन के दौरान वे कुछ समय अमेरिका में रहे और बाद में केंद्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly) के सदस्य भी निर्वाचित हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लाला लाजपत राय ने ‘अनहैप्पी इंडिया’ तथा ‘द स्टोरी ऑफ माई डिपोर्टेशन’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं। उन्होंने वर्ष 1920 में लाहौर में ‘नेशनल कॉलेज’ की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
17. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन गरमपंथियों के प्रभावाधीन आया-
43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
वर्ष 1906 के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन उग्रवादी अथवा गरमपंथी विचारधारा के प्रभाव में आ गया। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल तथा अरविंद घोष के संयुक्त नेतृत्व में गरम दल ने स्वराज्य प्राप्ति को अपना केंद्रीय लक्ष्य घोषित किया। तिलक का प्रसिद्ध नारा था- “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।”
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी कालखंड में बंगाल विभाजन (1905) के विरुद्ध स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन भी अपने चरम पर था, जिसने गरमपंथी विचारधारा को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में यही वैचारिक टकराव कांग्रेस के औपचारिक विभाजन का कारण बना।
18. निम्नलिखित में से कौन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में उदारवादियों से जुड़ा नहीं था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(d)
फिरोजशाह मेहता, दादाभाई नौरोजी तथा गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नरमपंथी (उदारवादी) धारा के प्रमुख स्तंभ थे, जो संवैधानिक सुधारों एवं सरकार के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार में विश्वास रखते थे। इसके विपरीत लाला लाजपत राय ‘लाल-बाल-पाल’ त्रयी के सदस्य के रूप में गरम दल अथवा उग्रवादी विचारधारा से संबद्ध थे, अतः वे उदारवादियों में सम्मिलित नहीं किए जाते।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फिरोजशाह मेहता को ‘बंबई का शेर’ (Lion of Bombay) कहा जाता था और उन्होंने ‘बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन’ की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दादाभाई नौरोजी तीन बार (1886, 1893, 1906) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे।
19. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को किसने “भीख मांगने वाली संस्था” (बेगिंग इंस्टीट्यूट) कहा था ?
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2008
उत्तर-(b)
उग्रवादी विचारधारा के नेताओं ने नरमपंथियों की संवैधानिक एवं याचनापूर्ण कार्यशैली की तीखी आलोचना की। बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ‘भीख मांगने वाली संस्था’ (Begging Institution) की संज्ञा देते हुए कहा कि यह संस्था केवल प्रार्थना-पत्रों और प्रतिनिधिमंडलों के माध्यम से सरकार से रियायतें मांगने तक सीमित रह गई है, जबकि वास्तविक आवश्यकता जन-आंदोलन और आत्मनिर्भरता की है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक ने इसी भावना से वर्ष 1893 में सार्वजनिक गणेशोत्सव तथा वर्ष 1895 में शिवाजी उत्सव की शुरुआत की, ताकि धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से जनसाधारण में राष्ट्रीयता की भावना जगाई जा सके। तिलक ने ‘केसरी’ समाचार-पत्र के माध्यम से भी अपने विचार जनता तक पहुंचाए।
20. निम्नलिखित में से कौन एक उग्रवादी था?
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले कांग्रेस के नरमपंथी खेमे के सुप्रसिद्ध नेता थे, जो संवैधानिक तरीकों से सुधार चाहते थे। इसके विपरीत बिपिन चंद्र पाल उग्रवादी विचारधारा के प्रमुख नेता थे और ‘लाल-बाल-पाल’ त्रयी के सदस्य के रूप में स्वराज्य प्राप्ति हेतु प्रत्यक्ष जन-आंदोलन के पक्षधर थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बिपिन चंद्र पाल को उनके ओजस्वी भाषणों के कारण ‘क्रांतिकारी विचारों का जनक’ भी कहा जाता है, तथा उन्होंने वर्ष 1906 में ‘वंदे मातरम्’ नामक अंग्रेजी समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था, जिसके माध्यम से उन्होंने पूर्ण स्वराज्य की वकालत की।
21. निम्नलिखित में से किसे ‘भारतीय अशांति का जनक’ कहा गया है ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
उत्तर-(a)
ब्रिटिश औपनिवेशिक नौकरशाही बाल गंगाधर तिलक के तीव्र राष्ट्रवादी रुख तथा जनसाधारण को सीधे संगठित करने की उनकी शैली से अत्यंत असहज थी। अंग्रेज पत्रकार-इतिहासकार सर वैलेंटाइन शिरोल ने अपनी कृति में तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ (Father of Indian Unrest) निरूपित किया, क्योंकि तिलक ने कांग्रेस को मात्र प्रार्थी संस्था से बदलकर सरकार की मुखर आलोचक शक्ति बना दिया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक ने इस आरोप के विरुद्ध शिरोल पर इंग्लैंड की अदालत में मानहानि का वाद दायर किया था, परंतु यह मुकदमा वे हार गए। तिलक को ‘लोकमान्य’ की उपाधि जनता ने उनकी दीर्घकालिक राष्ट्रसेवा एवं बलिदान के सम्मान में स्वतः प्रदान की थी।
22. निम्नलिखित नेताओं में से कौन एक ‘स्वदेशी’ के समर्थक थे?
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(a)
बंगाल विभाजन (1905) के विरुद्ध चलाए गए स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में अरविंद घोष का नाम अग्रणी है। इसी आंदोलन से जुड़े अन्य प्रमुख गरमपंथी नेताओं में पंजाब से लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र से बाल गंगाधर तिलक तथा बंगाल से बिपिन चंद्र पाल सम्मिलित थे, जिन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार एवं स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में प्रचारित किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अरविंद घोष ने स्वदेशी आंदोलन के दौरान कलकत्ता में ‘बंगाल नेशनल कॉलेज’ की स्थापना में भी योगदान दिया, जहां वे प्राचार्य भी रहे। स्वदेशी आंदोलन के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन भी किया गया था, ताकि सरकारी शिक्षा व्यवस्था का विकल्प तैयार किया जा सके।
23. बाल गंगाधर तिलक ‘लोकमान्य तिलक’ के नाम से जाना जाने लगे, जब-
64th B.P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(e)
ब्रिटिश सरकार ने पुणे के सहायक कलेक्टर रैंड की हत्या के मामले में बाल गंगाधर तिलक को अभियुक्त बनाया था, जिसमें दोषी पाए जाने पर उन्हें 18 माह के कठोर कारावास की सजा मिली। किंतु तिलक को ‘लोकमान्य’ की उपाधि किसी एक घटना से नहीं, बल्कि शिक्षण कार्य, केसरी व मराठा समाचार-पत्रों के संपादन, गणेशोत्सव व शिवाजी उत्सव के आयोजन तथा रैंड हत्याकांड में मिले कारावास सहित उनके समग्र राष्ट्रवादी अवदान के फलस्वरूप जनता ने स्वतः प्रदान की थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चापेकर बंधुओं ने वर्ष 1897 में पुणे में प्लेग नियंत्रण अधिकारी रैंड की हत्या की थी, जिसके परोक्ष उकसावे के आरोप में तिलक पर मुकदमा चलाया गया था। जेल से रिहा होने के बाद तिलक का स्वागत एक राष्ट्रीय नायक के रूप में हुआ, जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई।
24. बाल गंगाधर तिलक को किसने ‘अशांति का जनक’ कहा?
U.P. Lower Sub. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
अंग्रेज लेखक एवं ‘द टाइम्स’ के पत्रकार सर वैलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक में बाल गंगाधर तिलक को ‘भारत में अशांति का जनक’ निरूपित करते हुए उन्हें ब्रिटिश शासन के लिए सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण भारतीय नेताओं में गिना था, क्योंकि तिलक ने जनसाधारण को सीधे राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का कार्य किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिरोल की पुस्तक ‘Indian Unrest’ वर्ष 1910 में प्रकाशित हुई थी। इसी टिप्पणी से क्षुब्ध होकर तिलक ने इंग्लैंड जाकर शिरोल के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर किया, यद्यपि वे यह मुकदमा हार गए।
25. निम्न में कौन मध्यममार्गी नहीं था?
U.P. P.C.S (Pre) 1995
उत्तर-(b)
गोपाल कृष्ण गोखले, ए.ओ. ह्यूम तथा मदन मोहन मालवीय कांग्रेस की प्रारंभिक मध्यममार्गी (नरमपंथी) धारा से जुड़े नेता थे, जो संवैधानिक सुधारों एवं सरकार के साथ संवाद में विश्वास रखते थे। इसके विपरीत बाल गंगाधर तिलक नवराष्ट्रवादी अथवा उग्र विचारधारा के अग्रदूत थे, जिन्होंने मध्यममार्गी नीतियों को अस्वीकार करते हुए प्रत्यक्ष जन-संघर्ष का मार्ग अपनाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ए.ओ. ह्यूम एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश सिविल सेवा अधिकारी थे, जिन्होंने वर्ष 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई थी। मदन मोहन मालवीय ने वर्ष 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना की थी।
26.किसने कहा था, “तिलक भारतीय अशांति के जनक हैं”?
U.P. P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(a)
वैलेंटाइन शिरोल, जो उस समय लंदन के प्रतिष्ठित समाचार-पत्र ‘द टाइम्स’ से संबद्ध थे, ने बाल गंगाधर तिलक को भारत में फैल रही राजनीतिक अशांति का प्रमुख स्रोत बताते हुए उन्हें ‘भारतीय अशांति का जनक’ कहा। यह टिप्पणी इस बात का प्रमाण थी कि ब्रिटिश शासन तिलक की लोकप्रियता एवं उग्र राष्ट्रवादी विचारों से कितना चिंतित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक ने वर्ष 1908 में पुनः राजद्रोह के एक अन्य आरोप में छह वर्ष का कारावास भोगा था, जो उन्हें मांडले (बर्मा) की जेल में काटना पड़ा। तिलक के नेतृत्व में ही कांग्रेस का सूरत अधिवेशन (1907) नरम और गरम दलों के विभाजन का साक्षी बना।
27. बी. जी. तिलक को सजा के पश्चात निम्नलिखित में से किसने दया की वकालत की थी और कहा था “संस्कृत के एक विद्धान के रूप में तिलक में मेरी दिलचस्पी है।”?
U.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(b)
जब बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में सजा सुनाई गई, तो जर्मन मूल के प्रसिद्ध प्राच्यविद् एवं संस्कृत विद्वान मैक्स मुलर ने उनके प्रति उदारता दिखाने की अपील करते हुए कहा था कि संस्कृत के एक विद्वान के रूप में तिलक में उनकी विशेष रुचि है। यह घटना तिलक की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्वत् समाज में भी पहचान को दर्शाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मैक्स मुलर भारतीय वेदों, विशेषकर ऋग्वेद, के अनुवाद एवं संपादन के लिए विश्वविख्यात हैं तथा उन्होंने ‘सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट’ नामक श्रृंखला का भी संपादन किया था। तिलक स्वयं एक विद्वान संस्कृतज्ञ थे, जिन्होंने ‘ओरायन’ तथा ‘आर्कटिक होम इन द वेदाज’ जैसे ग्रंथों की रचना की थी।
28.निम्नलिखित में से किसे “भारतीय अशांति के जनक” के रूप में जाना जाता है?
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
बाल गंगाधर तिलक त्याग एवं सेवा की भावना में दृढ़ विश्वास रखते थे तथा वे ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती देने का साहस रखते थे। उन्हीं के प्रयासों से कांग्रेस मात्र सरकार की प्रशंसा करने वाली संस्था से बदलकर एक मुखर आलोचक संस्था में परिवर्तित हुई, जिसके कारण एंग्लो-इंडियन प्रशासन उन्हें विद्रोही मानता था और सर वैलेंटाइन शिरोल ने उन्हें ‘भारत में अशांति का जनक’ कहा था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक ने शिरोल के इस कथन को चुनौती देते हुए इंग्लैंड की अदालत में मानहानि का मुकदमा दायर किया था, यद्यपि वे यह मुकदमा हार गए, फिर भी इस प्रकरण ने उनकी राष्ट्रीय छवि को और सुदृढ़ किया। तिलक ने ‘गीता रहस्य’ नामक ग्रंथ की रचना मांडले जेल में बंदी रहते हुए की थी।
29. निम्नलिखित में से किसने महाराष्ट्र के गणपति उत्सव का ऐसा कायाकल्प किया कि वह एक राष्ट्रीय उत्सव हो गया और उसका स्वरूप राजनैतिक हो गया?
U.P. P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(d)
बाल गंगाधर तिलक ने पारंपरिक रूप से घरेलू स्तर पर मनाए जाने वाले गणपति उत्सव को वर्ष 1893 में सार्वजनिक स्वरूप प्रदान किया, जिससे यह उत्सव विभिन्न जाति-वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाने तथा राष्ट्रीय चेतना जगाने का सशक्त माध्यम बन गया। इस प्रकार एक धार्मिक पर्व को तिलक ने व्यापक राजनैतिक एवं सामाजिक एकजुटता के उपकरण में बदल दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक ने इसी क्रम में वर्ष 1895 में रायगढ़ में शिवाजी उत्सव की भी शुरुआत की थी, जिसके माध्यम से उन्होंने मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के शौर्य और स्वराज्य की भावना को जनमानस में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।
30.1908 में बाल गंगाधर तिलक को जेल हुई-
43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
वर्ष 1908 में अंग्रेजी सरकार ने बाल गंगाधर तिलक पर ‘केसरी’ पत्र में प्रकाशित लेखों के आधार पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, जिसमें दोषी ठहराते हुए उन्हें छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और मांडले (बर्मा) की जेल भेज दिया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी मांडले कारावास के दौरान तिलक ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘गीता रहस्य’ की रचना की, जिसमें उन्होंने भगवद्गीता के कर्मयोग की व्याख्या राष्ट्रीय कर्तव्य-बोध के संदर्भ में प्रस्तुत की। तिलक की इस सजा के विरोध में बंबई के मजदूरों ने भी व्यापक हड़ताल की थी।
31.भारतीय मुसलमान, सामान्य रूप से उग्रवादी आंदोलन की ओर आकर्षित नहीं हुए, इसका कारण था-
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(d)
भारतीय मुसलमान सामान्यतः उग्रवादी आंदोलन से दूर रहे, क्योंकि उग्रवादी नेता प्रायः हिंदू प्रतीकों, पर्वों एवं अतीत-गौरव को आधार बनाकर जनजागरण करते थे, जिससे मुस्लिम समुदाय को यह आंदोलन अपने से जुड़ा हुआ प्रतीत नहीं होता था। अरविंद घोष के इस कथन से इसकी पुष्टि होती है, जिसमें उन्होंने स्वतंत्रता को हिंदू धर्म से जुड़ा लक्ष्य बताया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसके विपरीत सर सैयद अहमद खां ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहकर पाश्चात्य शिक्षा एवं सरकार के साथ सहयोग की नीति अपनाने की सलाह दी थी, जिसके तहत उन्होंने वर्ष 1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की, जो आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना।
32. महात्मा गांधी के साथ निम्न मुसलमानों में से किसने बाल गंगाधर तिलक की अर्थी उठाई थी?
U.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
1 अगस्त, 1920 को बाल गंगाधर तिलक के निधन के पश्चात उनकी शवयात्रा में हिंदू-मुस्लिम एकता का अनूठा दृश्य देखने को मिला, जब महात्मा गांधी के साथ मौलाना शौकत अली तथा डॉ. सैफुद्दीन किचलू ने तिलक की अर्थी को कंधा दिया। उस अवसर पर मौलाना हसरत मोहानी ने शोक-गीत भी प्रस्तुत किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक के निधन के समय देश में असहयोग आंदोलन तथा खिलाफत आंदोलन अपने प्रारंभिक चरण में थे, जिनमें शौकत अली व मोहम्मद अली (अली बंधु) महात्मा गांधी के निकट सहयोगी के रूप में कार्य कर रहे थे, जो उस दौर की हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बना।
33. 1908 में 6 वर्ष के कारावास की सजा स्वतंत्रता संग्राम के किस उग्रवादी नेता को दी गई थी?
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(b)
वर्ष 1908 में स्वतंत्रता संग्राम के उग्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक को ‘केसरी’ समाचार-पत्र में प्रकाशित उनके लेखों के आधार पर राजद्रोह का दोषी मानते हुए छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई तथा उन्हें मांडले (बर्मा) की जेल में निरुद्ध किया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह तिलक के विरुद्ध दर्ज दूसरा प्रमुख राजद्रोह मुकदमा था; इससे पूर्व वर्ष 1897 में भी उन्हें रैंड हत्याकांड से संबंधित भड़काऊ लेखन के आरोप में 18 माह की सजा हो चुकी थी। मांडले जेल में रहते हुए ही उन्होंने ‘गीता रहस्य’ नामक अपनी प्रसिद्ध रचना पूर्ण की।
34.कथन: बाल गंगाधर तिलक सांप्रदायिकतावादी थे।
कारण (R) : उन्होंने धर्म का राजनैतिक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर अपना उत्तर चुनिए-
कारण (R) : उन्होंने धर्म का राजनैतिक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर अपना उत्तर चुनिए-
U.P. P.C.S (Pre) 2001
उत्तर- (d)
प्रस्तुत कथन (A) कि तिलक सांप्रदायिकतावादी थे, तथ्यात्मक रूप से गलत है, जबकि कारण (R) कि उन्होंने धर्म को राजनैतिक उपकरण के रूप में प्रयुक्त किया, सही है। तिलक ने धार्मिक प्रतीकों जैसे गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव का प्रयोग जनसाधारण को संगठित कर राष्ट्रीय चेतना जगाने हेतु किया था, न कि किसी समुदाय-विशेष के विरुद्ध सांप्रदायिक भावना भड़काने हेतु। वे महात्मा गांधी से पूर्व जनसाधारण के साथ सीधा जुड़ाव स्थापित करने वाले प्रथम राष्ट्रवादी नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने इसी उद्देश्य से अखाड़ों, लाठी-क्लबों तथा गोरक्षा सभाओं का भी गठन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक के निधन पर मौलाना शौकत अली व डॉ. सैफुद्दीन किचलू द्वारा उनकी अर्थी उठाया जाना इस बात का प्रमाण है कि वे हिंदू-मुस्लिम एकता के विरोधी नहीं थे। तिलक ने वर्ष 1916 के ‘लखनऊ समझौते’ में कांग्रेस-मुस्लिम लीग एकता के पक्ष में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी।
35.उग्रवादी विचारधारा को निम्नलिखित में से कौन-सा एक निरूपित करता है?
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(b)
उग्रवादी विचारधारा संवैधानिक याचनाओं एवं प्रार्थनाओं के स्थान पर आक्रामक एवं प्रत्यक्ष कार्यवाही द्वारा स्वशासन प्राप्त करने में विश्वास करती थी। जहां नरमपंथी दल वार्षिक अधिवेशनों, प्रस्तावों तथा इंग्लैंड भेजे जाने वाले शिष्टमंडलों के माध्यम से अंग्रेजों की न्यायप्रियता पर भरोसा करता था, वहीं गरमपंथी दल सामूहिक जन-आंदोलन एवं आत्म-बलिदान में विश्वास रखता था। उग्रवादियों के लिए स्वराज का अर्थ विदेशी नियंत्रण से पूर्ण मुक्ति था, जबकि नरमपंथियों के लिए यह साम्राज्य के भीतर औपनिवेशिक स्वशासन तक सीमित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उग्रवादी विचारधारा को व्यावहारिक स्वरूप वर्ष 1905 के स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन में मिला, जो बंगाल विभाजन के विरुद्ध आरंभ हुआ था। इसी वैचारिक टकराव के परिणामस्वरूप वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस औपचारिक रूप से नरम व गरम दल में विभाजित हो गई।
36. महाराष्ट्र में गणपति पर्व का श्रीगणेश किया था-
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
U.P. P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(a)
बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में पारंपरिक रूप से घरों तक सीमित गणपति पूजा को वर्ष 1893 में सार्वजनिक उत्सव का स्वरूप देकर इसका शुभारंभ किया। उनका उद्देश्य धार्मिक आस्था के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर राष्ट्रीय एकता एवं स्वाधीनता की भावना का संचार करना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिलक द्वारा प्रारंभ किया गया यह सार्वजनिक गणेशोत्सव आज भी महाराष्ट्र, विशेषकर पुणे एवं मुंबई में, बड़े उत्साह से मनाया जाता है तथा यह भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक उत्सवों में से एक बन चुका है। तिलक ने दो वर्ष पश्चात, वर्ष 1895 में, रायगढ़ में इसी भावना से शिवाजी उत्सव की भी शुरुआत की थी।
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