सुहरावर्दी सिलसिला : संस्थापक, विचारधारा, प्रमुख संत एवं योगदान

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सुहरावर्दी सिलसिला : परिचय

सुहरावर्दी सम्प्रदाय मध्यकालीन भारत के प्रमुख सूफी सिलसिलों में से एक था। इसका मूल विकास इराक (बगदाद) में हुआ तथा बाद में यह भारत पहुँचा। चिश्ती सम्प्रदाय के बाद यह भारत का दूसरा प्रमुख सूफी सिलसिला माना जाता है।

➣ इस सम्प्रदाय के मूल संस्थापक शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी थे, जबकि भारत में इसके वास्तविक संस्थापक एवं प्रचारक शेख बहाउद्दीन जकारिया थे।

➣ सुहरावर्दी सम्प्रदाय का नाम इराक के सुहरावर्द नामक स्थान के आधार पर पड़ा, जहाँ से इस सिलसिले का विकास हुआ।

संस्थापक : शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी

शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी (1145–1234 ई.) इराक के प्रसिद्ध सूफी संत, विद्वान तथा इस सिलसिले के प्रमुख प्रवर्तक थे। उन्होंने बगदाद को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया।

➣ उन्होंने सूफी मत के सिद्धान्तों को व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा सूफी जीवन को इस्लामी शरीयत के अनुरूप स्थापित करने पर विशेष बल दिया।

➣ उनकी प्रसिद्ध कृति “अवारिफ-उल-मआरिफ” (Awarif-ul-Ma’arif) सूफी मत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तकों में गिनी जाती है। मध्यकालीन भारत के अनेक सूफी संतों द्वारा इस ग्रन्थ का अध्ययन किया जाता था।

➣ इस ग्रन्थ में सूफी साधना, आध्यात्मिक अनुशासन, गुरु-शिष्य सम्बन्ध, खानकाह व्यवस्था तथा धार्मिक आचरण का विस्तृत वर्णन मिलता है।

भारत में सुहरावर्दी सम्प्रदाय का प्रवेश

➣ भारत में इस सम्प्रदाय का प्रचार-प्रसार शेख बहाउद्दीन जकारिया (1182–1268 ई.) ने किया। इन्हें भारत में सुहरावर्दी सिलसिले का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

➣ बहाउद्दीन जकारिया इल्तुतमिश के समकालीन थे तथा उन्होंने मुल्तान को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया। इसी कारण मुल्तान सुहरावर्दी सम्प्रदाय का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया।

➣ बहाउद्दीन जकारिया ने अपने आध्यात्मिक प्रभाव, विद्वत्ता तथा संगठन क्षमता के कारण अल्प समय में ही इस सम्प्रदाय को उत्तर-पश्चिम भारत में लोकप्रिय बना दिया।

➣ उनके शिष्यों ने आगे चलकर सिन्ध, पंजाब तथा बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में इस सिलसिले का प्रचार-प्रसार किया।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय की प्रमुख विशेषताएँ

➣ सुहरावर्दी संत इस्लामी शरीयत के पालन पर विशेष बल देते थे तथा आध्यात्मिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी महत्वपूर्ण मानते थे।

➣ इस सम्प्रदाय के संत राजकीय सेवा, धन-सम्पत्ति एवं सांसारिक जीवन को त्याज्य नहीं मानते थे। उनका मत था कि यदि धन एवं पद का उपयोग समाज-कल्याण के लिए किया जाए तो वह स्वीकार्य है।

➣ चिश्ती संतों के विपरीत, सुहरावर्दी संत सुल्तानों एवं शासकों से सम्पर्क बनाए रखते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर शासन से सहयोग भी स्वीकार करते थे।

➣ इस सम्प्रदाय के अनेक संतों ने शेख-उल-इस्लाम, सद्र-ए-विलायत आदि राजकीय पदों को भी स्वीकार किया।

➣ सुहरावर्दी संतों का विश्वास था कि राज्य की सहायता से धार्मिक एवं सामाजिक कार्य अधिक प्रभावी ढंग से सम्पन्न किए जा सकते हैं।

बहाउद्दीन जकारिया एवं इल्तुतमिश

शेख बहाउद्दीन जकारिया का दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इल्तुतमिश से घनिष्ठ सम्बन्ध था। वे मानते थे कि यदि शासक धर्मनिष्ठ हो तो उसके सहयोग से समाज एवं धर्म का अधिक प्रभावी ढंग से कल्याण किया जा सकता है।

➣ चिश्ती संतों के विपरीत, बहाउद्दीन जकारिया ने राजकीय संरक्षण, जागीर, धन-सम्पत्ति तथा प्रशासनिक सहयोग को स्वीकार किया। उनका मत था कि इन साधनों का उपयोग जनसेवा एवं धार्मिक कार्यों के लिए किया जा सकता है।

➣ उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग शिक्षा, खानकाहों के संचालन, निर्धनों की सहायता तथा धार्मिक गतिविधियों के विस्तार में किया।

नासिरुद्दीन कुबाचा प्रकरण

नासिरुद्दीन कुबाचा उस समय सिन्ध एवं मुल्तान का शासक था तथा उसका इल्तुतमिश से संघर्ष चल रहा था।

➣ बहाउद्दीन जकारिया ने इस संघर्ष में इल्तुतमिश का समर्थन किया, जिससे इल्तुतमिश की विजय के बाद उनका सम्मान और प्रभाव दोनों बढ़ गए।

➣ उनकी निष्ठा एवं सहयोग से प्रसन्न होकर इल्तुतमिश ने उन्हें शेख-उल-इस्लाम की प्रतिष्ठित उपाधि प्रदान की।

➣ यह घटना इस बात का प्रमुख उदाहरण मानी जाती है कि सुहरावर्दी संत राजनीतिक सत्ता से सहयोग रखने में विश्वास करते थे।

जलालुद्दीन तबरीजी

जलालुद्दीन तबरीजी सुहरावर्दी सम्प्रदाय के प्रमुख संतों में से थे। उन्होंने बंगाल (लखनौती) को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया।

➣ उन्होंने बंगाल में अनेक खानकाहों की स्थापना की तथा सूफी विचारधारा का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।

➣ उनके प्रयासों से सुहरावर्दी सिलसिला पूर्वी भारत में भी लोकप्रिय हुआ और बंगाल इस सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र बन गया।

शेख रुकनुद्दीन अबुल फतह

शेख रुकनुद्दीन अबुल फतह (रुक्न-ए-आलम) बहाउद्दीन जकारिया के पौत्र एवं उत्तराधिकारी थे। वे सुहरावर्दी सम्प्रदाय के अत्यन्त प्रतिष्ठित संत माने जाते हैं।

➣ वे बलबन के समकालीन थे तथा दिल्ली सल्तनत के शासकों से उनके घनिष्ठ सम्बन्ध थे।

➣ उनके पास पर्याप्त धन-सम्पत्ति एवं जागीरें थीं, किन्तु वे उस सम्पत्ति का उपयोग गरीबों, यात्रियों, विद्यार्थियों एवं जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए करते थे।

➣ उनकी प्रसिद्ध दरगाह मुल्तान में स्थित है, जो आज भी सूफी परम्परा का महत्वपूर्ण केन्द्र मानी जाती है।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय का प्रभाव एवं क्षेत्र

➣ सुहरावर्दी सम्प्रदाय का प्रभाव मुख्यतः मुल्तान, सिन्ध, पंजाब तथा बंगाल तक सीमित रहा। इसका प्रमुख केन्द्र मुल्तान था।

➣ यह सिलसिला चिश्ती सम्प्रदाय की भाँति सम्पूर्ण भारत में व्यापक रूप से नहीं फैल सका, क्योंकि इसके संतों का प्रभाव मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित रहा।

➣ भारत में इस सम्प्रदाय को लोकप्रिय बनाने का सर्वाधिक श्रेय बहाउद्दीन जकारिया (मुल्तान) तथा जलालुद्दीन तबरीजी (बंगाल) को दिया जाता है।

➣ इस सिलसिले के अन्य प्रमुख संतों में सैयद सुर्ख जोश, बुरहानुद्दीन तथा शेख रुकनुद्दीन आदि का नाम उल्लेखनीय है।

चिश्ती बनाम सुहरावर्दी

आधार चिश्ती सम्प्रदाय सुहरावर्दी सम्प्रदाय
राजनीति शासकों से दूरी शासकों से सहयोग
राजकीय पद स्वीकार नहीं करते थे स्वीकार करते थे
धन-सम्पत्ति त्याग का समर्थन जनकल्याण हेतु स्वीकार्य
प्रमुख केन्द्र अजमेर, दिल्ली मुल्तान
भारत में प्रमुख प्रचारक ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती बहाउद्दीन जकारिया

सिद्धान्त एवं विचारधारा

➣ सुहरावर्दी सम्प्रदाय का उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति, इस्लामी शरीयत का पालन तथा समाज में नैतिक मूल्यों का प्रसार करना था। इस सिलसिले के संत आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाते थे।

➣ इस सम्प्रदाय के संत शरीयत (इस्लामी धार्मिक नियम) के पालन को अत्यधिक महत्व देते थे। उनका मत था कि शरीयत के बिना आध्यात्मिक साधना (तरीकत) पूर्ण नहीं हो सकती।

➣ सुहरावर्दी संत गुरु (पीर) एवं शिष्य (मुरीद) की परम्परा में विश्वास करते थे। वे मानते थे कि आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही सम्भव है।

➣ इस सिलसिले में संयम, आत्मानुशासन, ईश्वर-भक्ति, सेवा तथा सदाचार को आध्यात्मिक जीवन का आधार माना गया।

➣ सुहरावर्दी संत संगठित खानकाह व्यवस्था के पक्षधर थे। उनकी खानकाहें केवल धार्मिक केन्द्र नहीं थीं, बल्कि शिक्षा, समाज-सेवा एवं निर्धनों की सहायता के प्रमुख केन्द्र भी थीं।

खानकाह व्यवस्था

➣ सुहरावर्दी खानकाहों में आने वाले यात्रियों, विद्यार्थियों एवं गरीबों के लिए भोजन, आवास तथा शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी।

➣ इन खानकाहों का संचालन प्रायः दान, जागीरों तथा राजकीय सहायता से होता था, जिससे इनकी आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत सुदृढ़ रहती थी।

➣ खानकाहों में धार्मिक शिक्षा, कुरान का अध्ययन, सूफी साधना, उपदेश तथा समाज-सेवा नियमित रूप से संचालित होती थी।

➣ अनेक खानकाहें स्थानीय समाज के लिए शिक्षा एवं लोककल्याण का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गई थीं।

सामाजिक योगदान

➣ इस सम्प्रदाय ने समाज में दान, सेवा, नैतिकता तथा धार्मिक अनुशासन की भावना को प्रोत्साहित किया।

➣ सुहरावर्दी संतों ने अपनी आय एवं प्राप्त धन-सम्पत्ति का बड़ा भाग गरीबों, विधवाओं, अनाथों तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता में व्यय किया।

➣ इस सिलसिले ने शिक्षा के प्रसार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। अनेक विद्यार्थियों को खानकाहों में निःशुल्क शिक्षा एवं रहने की सुविधा उपलब्ध कराई जाती थी।

➣ सुहरावर्दी संतों ने धार्मिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी महत्वपूर्ण माना, जिससे समाज में स्थिरता एवं अनुशासन को बढ़ावा मिला।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय का पतन

➣ प्रारम्भिक काल में यह सम्प्रदाय अत्यन्त प्रभावशाली था, किन्तु समय के साथ इसका प्रभाव सीमित होता गया।

➣ इसका प्रमुख कारण यह था कि यह सिलसिला मुख्यतः मुल्तान, सिन्ध एवं पंजाब तक ही सीमित रहा तथा चिश्ती सम्प्रदाय की भाँति सम्पूर्ण भारत में व्यापक जनसमर्थन प्राप्त नहीं कर सका।

➣ राजनीतिक संरक्षण पर अपेक्षाकृत अधिक निर्भरता के कारण भी इसके प्रभाव में धीरे-धीरे कमी आई।

➣ इसके बावजूद उत्तर-पश्चिम भारत में सुहरावर्दी सम्प्रदाय ने सूफी परम्परा, धार्मिक शिक्षा तथा समाज-सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

• मूल संस्थापक : शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी (बगदाद)
• भारत में संस्थापक : बहाउद्दीन जकारिया (मुल्तान)
• प्रमुख ग्रन्थ : अवारिफ-उल-मआरिफ
• मुख्यालय : मुल्तान
• समकालीन शासक : इल्तुतमिश एवं बलबन
• बंगाल में प्रचार : जलालुद्दीन तबरीजी (लखनौती)
• विशेषता : राजकीय संरक्षण, धन-सम्पत्ति एवं प्रशासनिक पदों को स्वीकार करने वाला प्रमुख सूफी सिलसिला।

ऐतिहासिक महत्व

➣ सुहरावर्दी सम्प्रदाय ने भारत में सूफी आन्दोलन को एक संगठित एवं संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। इसकी खानकाहें केवल आध्यात्मिक केन्द्र ही नहीं थीं, बल्कि शिक्षा, समाज-सेवा एवं जनकल्याण के प्रमुख केन्द्र भी थीं।

➣ इस सिलसिले ने यह सिद्ध किया कि धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के लिए राजकीय सहयोग का भी उपयोग किया जा सकता है। यही कारण है कि इसके अनेक संत दिल्ली सल्तनत के शासकों के निकट रहे।

➣ सुहरावर्दी सम्प्रदाय ने विशेष रूप से मुल्तान, सिन्ध, पंजाब तथा बंगाल में इस्लामी शिक्षा, सूफी विचारधारा तथा धार्मिक संस्थाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ यद्यपि यह सम्प्रदाय चिश्ती सिलसिले जितना लोकप्रिय नहीं हो सका, फिर भी मध्यकालीन भारत में इसके राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक प्रभाव को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है।

चिश्ती एवं सुहरावर्दी सम्प्रदाय : प्रमुख अंतर

आधार चिश्ती सम्प्रदाय सुहरावर्दी सम्प्रदाय
संस्थापक ख्वाजा अबू इशाक चिश्ती शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी
भारत में प्रमुख प्रचारक ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती बहाउद्दीन जकारिया
शासकों से सम्बन्ध दूरी बनाए रखते थे निकट सम्बन्ध रखते थे
राजकीय पद स्वीकार नहीं करते थे स्वीकार करते थे
धन-सम्पत्ति त्याग एवं फकीरी पर बल जनकल्याण हेतु स्वीकार्य
मुख्य केन्द्र अजमेर, दिल्ली मुल्तान
लोकप्रियता सम्पूर्ण भारत में व्यापक मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित

Quick Revision

तथ्य उत्तर
सुहरावर्दी सम्प्रदाय का मूल संस्थापक शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी
भारत में सुहरावर्दी सिलसिले का संस्थापक शेख बहाउद्दीन जकारिया
भारत में प्रमुख केन्द्र मुल्तान
समकालीन सुल्तान इल्तुतमिश
प्रमुख ग्रन्थ अवारिफ-उल-मआरिफ
बंगाल में प्रचार-प्रसार जलालुद्दीन तबरीजी द्वारा
शेख-उल-इस्लाम की उपाधि बहाउद्दीन जकारिया को इल्तुतमिश द्वारा प्रदान की गई
बहाउद्दीन जकारिया के पौत्र शेख रुकनुद्दीन अबुल फतह (रुक्न-ए-आलम)
प्रमुख क्षेत्र सिन्ध, पंजाब, मुल्तान एवं बंगाल
विशेष पहचान राजकीय संरक्षण स्वीकार करने वाला प्रमुख सूफी सिलसिला

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