गुरु हरराय (1630–1661 ई.) : शिक्षाएँ, जनसेवा एवं सिख धर्म में योगदान

📚 विषय सूची

प्रारम्भिक जीवन एवं परिवार

गुरु हरराय सिखों के सप्तम गुरु थे। उनका जन्म 16 जनवरी 1630 ई. को कीरतपुर साहिब (वर्तमान पंजाब) में हुआ। वे सिखों के षष्ठ गुरु गुरु हरगोविन्द के पौत्र तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र बाबा गुरदित्ता एवं माता निहाल कौर (अनी राय) के पुत्र थे।

➣ गुरु हरराय का पालन-पोषण कीरतपुर साहिब के धार्मिक एवं अनुशासित वातावरण में हुआ। उनके दादा गुरु हरगोविन्द ने उन्हें गुरुबाणी, सेवा, आध्यात्मिक जीवन तथा शस्त्र-विद्या की शिक्षा दी। साथ ही उन्होंने घुड़सवारी, शिकार एवं सैन्य प्रशिक्षण भी प्राप्त किया, जिससे वे नेतृत्व के लिए तैयार हुए।

➣ बाल्यावस्था से ही गुरु हरराय का स्वभाव अत्यंत दयालु, विनम्र, शांतिप्रिय एवं करुणामय था। कहा जाता है कि वे प्रकृति एवं जीव-जंतुओं से विशेष प्रेम करते थे और किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट पहुँचाना उचित नहीं मानते थे। उन्हें औषधीय पौधों एवं वनस्पतियों में भी विशेष रुचि थी।

1644 ई. में गुरु हरगोविन्द के निधन के समय गुरु हरराय की आयु लगभग 14 वर्ष थी। उनकी योग्यता, सेवा-भाव एवं आध्यात्मिक गुणों से प्रभावित होकर गुरु हरगोविन्द ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। आगे चलकर उन्होंने सिख धर्म की सेवा, मानव कल्याण तथा धार्मिक अनुशासन की परंपरा को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया।

विषय विवरण
जन्म 16 जनवरी 1630 ई.
जन्मस्थान कीरतपुर साहिब, पंजाब
पिता बाबा गुरदित्ता
माता माता निहाल कौर
दादा गुरु हरगोविन्द
गुरुकाल 1644–1661 ई.
गुरु बने 14 वर्ष की आयु में

➣ गुरु हरगोविन्द ने अपने पुत्रों के स्थान पर अपने पौत्र हरराय की योग्यता, विनम्रता एवं सेवा-भाव से प्रभावित होकर उन्हें 1644 ई. में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उस समय उनकी आयु लगभग 14 वर्ष थी।

व्यक्तित्व एवं कार्य

➣ गुरु हरराय अत्यंत दयालु, शांतिप्रिय, विनम्र एवं करुणामय स्वभाव के थे। वे सभी प्राणियों के प्रति प्रेम एवं दया का भाव रखने का उपदेश देते थे।

➣ उन्होंने अपने दादा गुरु हरगोविन्द द्वारा स्थापित सैन्य संगठन को बनाए रखा तथा एक छोटी घुड़सवार सेना भी संगठित रखी, किंतु अपने पूरे गुरुकाल में उन्होंने किसी भी मुगल शासक के विरुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध नहीं किया।

➣ गुरु हरराय का विशेष झुकाव आयुर्वेद, वनस्पति विज्ञान एवं औषधीय पौधों की ओर था। उन्होंने कीरतपुर साहिब में एक विशाल औषधीय उद्यान तथा औषधालय की स्थापना की, जहाँ रोगियों का निःशुल्क उपचार किया जाता था।

➣ उनका मानना था कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है। इसलिए उन्होंने निर्धनों, रोगियों एवं जरूरतमंदों की सहायता को विशेष महत्व दिया।

दारा शिकोह से संबंध

➣ गुरु हरराय के समय मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार का संघर्ष प्रारम्भ हो गया था। शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का गुरु हरराय के प्रति सम्मान का भाव था और वह उनके उदार एवं आध्यात्मिक व्यक्तित्व से प्रभावित था।

➣ परंपरा के अनुसार गुरु हरराय ने अपने औषधालय से दुर्लभ औषधियाँ उपलब्ध कराकर दारा शिकोह की सहायता की थी। यह उनके मानव-सेवा एवं करुणा के सिद्धांत का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

➣ बाद में 1658 ई. में सामूगढ़ के युद्ध में पराजित होने के पश्चात् दारा शिकोह ने भागते समय गुरु हरराय से भेंट कर उनका आशीर्वाद एवं सहयोग प्राप्त किया। यद्यपि गुरु हरराय ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक संघर्ष में भाग नहीं लिया, फिर भी उन्होंने मानवीय आधार पर दारा शिकोह के प्रति सहानुभूति दिखाई।

➣ दारा शिकोह के प्रति गुरु हरराय की सहानुभूति एवं सहायता के कारण औरंगज़ेब उनके प्रति सशंकित एवं अप्रसन्न हो गया। यही घटना आगे चलकर गुरु हरराय और औरंगज़ेब के संबंधों में तनाव का प्रमुख कारण बनी।

रामराय एवं औरंगज़ेब का दरबार

➣ दारा शिकोह की सहायता से अप्रसन्न होकर मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने गुरु हरराय को दिल्ली दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया। इसका उद्देश्य गुरु हरराय की निष्ठा एवं उनके विचारों की परीक्षा लेना भी था।

➣ गुरु हरराय स्वयं दरबार में नहीं गए, बल्कि अपने ज्येष्ठ पुत्र रामराय को अपना प्रतिनिधि बनाकर दिल्ली भेजा। उन्होंने रामराय को गुरुबाणी के मूल स्वरूप का सम्मान बनाए रखने का निर्देश भी दिया।

➣ दरबार में औरंगज़ेब ने गुरु ग्रंथ साहिब की एक पंक्ति “मिट्टी मुसलमान की…” (आसा की वार) के विषय में प्रश्न किया। सम्राट को प्रसन्न करने के उद्देश्य से रामराय ने उस पंक्ति का अर्थ बदलकर प्रस्तुत कर दिया।

➣ गुरु हरराय ने इसे गुरुबाणी के मूल स्वरूप से समझौता माना। इस कारण उन्होंने रामराय को सिख पंथ से निष्कासित कर दिया तथा भविष्य में उससे कोई संबंध न रखने का निर्णय लिया।

➣यह घटना सिख इतिहास में गुरुबाणी की पवित्रता एवं अपरिवर्तनीयता के सिद्धांत का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।

रामराय एवं देहरादून

➣ सिख पंथ से निष्कासित होने के बाद रामराय को औरंगज़ेब ने दून घाटी में जागीर प्रदान की। इसके बाद उन्होंने वहीं स्थायी रूप से निवास करना प्रारम्भ किया।

➣ रामराय ने दून घाटी में अपना डेरा स्थापित किया, जो आगे चलकर रामराय का डेरा कहलाया। इस डेरे के कारण यह क्षेत्र आगे देहरादून के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

➣ समय के साथ रामराय का डेरा धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। आज भी दरबार श्री गुरु रामराय देहरादून के प्रमुख ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।

➣ रामराय के अनुयायी रामरैया अथवा रामरायी कहलाए, जिन्होंने आगे चलकर एक पृथक धार्मिक परंपरा विकसित की।

➣ वर्तमान में दरबार श्री गुरु राम राय के संरक्षण में अनेक शैक्षिक एवं सामाजिक संस्थाएँ संचालित की जाती हैं। इन्हीं में श्री गुरु राम राय (SGRR) एजुकेशन मिशन के अंतर्गत SGRR Public Schools, SGRR University, चिकित्सा संस्थान एवं अन्य शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई है। इन संस्थानों का नाम गुरु रामराय की स्मृति में रखा गया है। SGRR Education Mission की स्थापना 1952 में श्री महंत इन्दिरेश चरण दास जी महाराज ने की थी।

गुरु हरकिशन को उत्तराधिकारी

➣ गुरु हरराय के दो पुत्र थे-रामराय तथा हरकिशन। दोनों में से रामराय ज्येष्ठ थे, किन्तु गुरु हरराय ने उत्तराधिकार के लिए केवल जन्मक्रम के बजाय योग्यता एवं गुरुमत के पालन को महत्व दिया।

➣ रामराय द्वारा औरंगज़ेब के दरबार में गुरुबाणी के अर्थ में परिवर्तन किए जाने के कारण गुरु हरराय ने इसे गुरुबाणी के मूल स्वरूप से समझौता माना और उन्हें गुरुगद्दी के अयोग्य घोषित कर दिया।

➣ इसके पश्चात् उन्होंने अपने कनिष्ठ पुत्र हरकिशन को उनकी विनम्रता, आध्यात्मिक पात्रता एवं गुरुमत के प्रति निष्ठा के आधार पर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उस समय हरकिशन की आयु लगभग 5 वर्ष थी।

1661 ई. में गुरु हरराय के निधन के बाद गुरु हरकिशन सिखों के अष्टम गुरु बने। वे सिख इतिहास के सबसे कम आयु के गुरु थे और उन्होंने बाल्यावस्था में ही गुरु पद की गरिमा को बनाए रखा।

मृत्यु

➣ गुरु हरराय का निधन 6 अक्टूबर 1661 ई. को कीरतपुर साहिब (पंजाब) में हुआ। अधिकांश ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार उनका निधन प्राकृतिक कारणों अथवा अल्पकालिक बीमारी के कारण हुआ था।

➣ लगभग 17 वर्षों के गुरुकाल में उन्होंने सिख धर्म की सेवा, मानव कल्याण, धार्मिक अनुशासन एवं गुरुबाणी की शुद्ध परंपरा को सुदृढ़ बनाए रखा।

➣ अपने जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने सिख पंथ की गुरु परंपरा को निरंतर बनाए रखने के लिए गुरु हरकिशन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जिससे नेतृत्व का परिवर्तन शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ।

➣ गुरु हरराय को उनकी करुणा, पर्यावरण एवं जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता, औषधीय सेवा तथा गुरुबाणी की पवित्रता की रक्षा के लिए आज भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

प्रमुख योगदान

क्षेत्र योगदान
मानव सेवा कीरतपुर साहिब में औषधीय उद्यान एवं औषधालय की स्थापना कर रोगियों की सेवा की।
सैनिक व्यवस्था गुरु हरगोविन्द द्वारा स्थापित सैन्य संगठन को बनाए रखा।
धार्मिक अनुशासन गुरुबाणी के मूल स्वरूप की रक्षा हेतु रामराय को पंथ से निष्कासित किया।
उत्तराधिकार गुरु हरकिशन को अष्टम गुरु नियुक्त किया।
व्यक्तित्व दयालु, शांतिप्रिय, करुणामय एवं प्रकृति-प्रेमी गुरु।

Quick Revision

विषय तथ्य
जन्म 16 जनवरी 1630 ई., कीरतपुर साहिब
सप्तम गुरु 1644–1661 ई.
दादा गुरु हरगोविन्द
समकालीन मुगल शासक शाहजहाँ एवं औरंगज़ेब
प्रमुख घटना दारा शिकोह की सहायता एवं रामराय प्रकरण
प्रमुख कार्य औषधालय एवं औषधीय उद्यान की स्थापना
पुत्र रामराय एवं हरकिशन
उत्तराधिकारी गुरु हरकिशन
मृत्यु 6 अक्टूबर 1661 ई., कीरतपुर साहिब

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