जीवन परिचय
➣ गुरु गोविन्द सिंह सिखों के दशम एवं अंतिम मानव गुरु थे। उनका गुरुकाल 1675 ई. से 1708 ई. तक रहा। उन्होंने सिख धर्म को एक संगठित, अनुशासित एवं साहसी स्वरूप प्रदान किया तथा 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना कर सिख इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया।
➣ वे महान योद्धा, आध्यात्मिक गुरु, कवि, साहित्यकार, संगठनकर्ता एवं राष्ट्ररक्षक थे। धार्मिक स्वतंत्रता, न्याय तथा मानवता की रक्षा के लिए उनका योगदान भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 22 दिसम्बर 1666 ई. |
| जन्मस्थान | पटना साहिब (वर्तमान पटना, बिहार) |
| बचपन का नाम | गोविन्द राय |
| पिता | गुरु तेगबहादुर |
| माता | माता गुजरी |
| गुरुकाल | 1675–1708 ई. |
| पत्नी | माता जीतो जी (अजीत कौर),माता सुंदरी जी,माता साहिब देवन (माता साहिब कौर) – खालसा की माता |
| पुत्र | अजीत सिंह,जुझार सिंह,जोरावर सिंह,फतेह सिंह |
गुरुगद्दी ग्रहण
➣ 1675 ई. में गुरु तेगबहादुर की शहादत के पश्चात् मात्र 9 वर्ष की आयु में गोविन्द राय सिखों के दशम गुरु बने। इतनी कम आयु में गुरुगद्दी ग्रहण करना सिख इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी।
➣ बाल्यावस्था में ही उन्होंने अपने पिता का सर्वोच्च बलिदान देखा, जिसने उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने अन्याय, धार्मिक उत्पीड़न एवं अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का संकल्प लिया तथा सिख समुदाय को सशक्त बनाने का निश्चय किया।
➣ गुरु बनने के बाद उन्होंने सिख समुदाय को अधिक संगठित, अनुशासित एवं आत्मरक्षी बनाने का कार्य प्रारम्भ किया। उन्होंने संगत को साहस, सेवा, समानता एवं धर्म की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने की प्रेरणा दी।
➣ उनके नेतृत्व में सिख पंथ ने संगठन, आध्यात्मिकता एवं सैन्य शक्ति-तीनों क्षेत्रों में तीव्र विकास किया। आगे चलकर इन्हीं प्रयासों का परिणाम 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना के रूप में सामने आया।
➣ गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों को सिख इतिहास में चार साहिबजादे के नाम से जाना जाता है। चारों ने धर्म एवं सत्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया, जिसके कारण गुरु गोविन्द सिंह को श्रद्धापूर्वक सर्वंस दानी कहा जाता है।
आनन्दपुर साहिब
➣ गुरु गोविन्द सिंह का प्रमुख कार्यक्षेत्र आनन्दपुर साहिब था। यहीं उन्होंने धार्मिक शिक्षा, सैन्य प्रशिक्षण तथा सिख संगठन को नई दिशा प्रदान की।
➣ इसके अतिरिक्त पांवटा साहिब भी उनकी एक महत्वपूर्ण कर्मस्थली थी, जहाँ उन्होंने कुछ समय निवास किया तथा अनेक साहित्यिक रचनाओं की रचना की। इसी काल में उन्होंने वीरता एवं धर्म की रक्षा से संबंधित अनेक ग्रंथों की रचना का कार्य भी किया।
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ घुड़सवारी, धनुर्विद्या, तलवारबाज़ी एवं युद्ध-कौशल को भी समान महत्व दिया। उनके नेतृत्व में सिख समुदाय एक अनुशासित एवं संगठित शक्ति के रूप में विकसित होने लगा।
➣ आगे चलकर आनन्दपुर साहिब सिख धर्म का प्रमुख धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सैन्य केन्द्र बन गया। यहीं से गुरु गोविन्द सिंह ने सिख समुदाय को नई पहचान प्रदान की और 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की।
पंज प्यारे
➣ बैसाखी के विशाल समारोह में गुरु गोविन्द सिंह ने संगत के समक्ष मानव-बलिदान की परीक्षा लेते हुए पूछा कि कौन है जो धर्म के लिए अपना सिर दे सकता है?
➣ एक-एक करके पाँच श्रद्धालु आगे आए। इन्हें अमृत प्रदान कर पंज प्यारे बनाया गया।
| पंज प्यारे | मूल नाम एवं स्थान |
|---|---|
| भाई दया सिंह | दयाराम – लाहौर (खत्री) |
| भाई धर्म सिंह | धर्मदास – हस्तिनापुर (मेरठ) (जाट) |
| भाई मोहकम सिंह | मोहकम चंद – द्वारका (छींबा) |
| भाई हिम्मत सिंह | हिम्मत राय – जगन्नाथ पुरी (झीवर/जल-सेवक) |
| भाई साहिब सिंह | साहिब चंद – बीदर (नाई) |
➣ पाँचों पंज प्यारे भारत के विभिन्न क्षेत्रों तथा अलग-अलग जातियों से थे। इसके माध्यम से गुरु गोविन्द सिंह ने जाति-भेद एवं ऊँच-नीच का पूर्णतः विरोध किया और समानता का संदेश दिया।
अमृत-संचार एवं खण्डे दा पाहुल
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने लोहे के पात्र (सरोवर/बाटा) में जल एवं पताशे डालकर दोधारी खण्डे से अमृत तैयार किया। परंपरा के अनुसार माता साहिब देवन ने इसमें पताशे डाले, जो वीरता एवं करुणा के समन्वय का प्रतीक माना जाता है।
➣ इस नई दीक्षा-विधि को खण्डे दा पाहुल अथवा अमृत-संचार कहा गया। इसके द्वारा गुरु ने पहले पाँचों श्रद्धालुओं को अमृत पिलाया।
➣ इसके बाद गुरु गोविन्द सिंह ने स्वयं भी पंज प्यारों से अमृत ग्रहण किया। इस घटना ने यह संदेश दिया कि गुरु और शिष्य दोनों समान हैं तथा खालसा में सभी का स्थान समान है।
➣ इसी अवसर पर गुरु गोविन्द सिंह ने अपने नाम के साथ राय के स्थान पर सिंह धारण किया और वे गुरु गोविन्द सिंह कहलाए।
सिंह, कौर एवं पाँच ककार
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने सभी दीक्षित पुरुषों को अपने नाम के साथ सिंह तथा महिलाओं को कौर लगाने का निर्देश दिया, जिससे जातिगत पहचान समाप्त हो सके।
➣ उन्होंने प्रत्येक खालसा सिख के लिए पाँच ककार धारण करना अनिवार्य किया।
| पाँच ककार | महत्त्व |
|---|---|
| केश | प्राकृतिक स्वरूप एवं ईश्वर की रचना का सम्मान। |
| कंघा | स्वच्छता एवं अनुशासन का प्रतीक। |
| कड़ा | ईश्वर-स्मरण, आत्मसंयम एवं दृढ़ संकल्प का प्रतीक। |
| कच्छा | शुचिता, संयम एवं तत्परता का प्रतीक। |
| कृपाण | धर्म, न्याय एवं निर्बलों की रक्षा का प्रतीक। |
खालसा पंथ की स्थापना (1699 ई.)
➣ गुरु गोविन्द सिंह का सबसे महत्वपूर्ण योगदान खालसा पंथ की स्थापना माना जाता है। 30 मार्च 1699 ई. (बैसाखी) के दिन आनन्दपुर साहिब में उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।
➣ खालसा शब्द का अर्थ है—शुद्ध, निष्कलंक एवं स्वतंत्र। इसका उद्देश्य सिख समुदाय को धार्मिक, सामाजिक एवं सैनिक दृष्टि से संगठित कर अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार करना था।
➣ बैसाखी के विशाल समारोह में गुरु गोविन्द सिंह ने संगत के सामने धर्म के लिए सिर की मांग की। पहले तो सभी आश्चर्यचकित रह गए, किंतु एक-एक करके पाँच श्रद्धालु आगे आए। इन्हें आगे चलकर पंज प्यारे के नाम से जाना गया। गुरु ने इन्हें अमृत पिलाकर खालसा पंथ में दीक्षित किया और बाद में स्वयं भी उन्हीं पाँच प्यारों से अमृत ग्रहण कर समानता एवं अनुशासन का आदर्श प्रस्तुत किया।
➣ खालसा पंथ की स्थापना के साथ गुरु गोविन्द सिंह ने सिखों को एक नई धार्मिक एवं सामाजिक पहचान प्रदान की। उन्होंने जाति-भेद, ऊँच-नीच एवं सामाजिक असमानता का विरोध करते हुए सभी खालसा सिखों को समान अधिकार एवं समान सम्मान प्रदान किया।
खालसा पंथ का उद्देश्य
| उद्देश्य | विवरण |
|---|---|
| धार्मिक | सिख धर्म की रक्षा एवं शुद्ध आचरण का पालन। |
| सामाजिक | जाति-भेद, ऊँच-नीच एवं छुआछूत का विरोध। |
| सैनिक | अन्याय एवं अत्याचार का साहसपूर्वक प्रतिरोध। |
| नैतिक | सत्य, सेवा, अनुशासन एवं त्यागपूर्ण जीवन का पालन। |
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा के अनुयायियों को तंबाकू, नशा एवं अनैतिक आचरण से दूर रहने तथा सदैव सत्य, साहस, अनुशासन एवं मानव सेवा का पालन करने का उपदेश दिया।
गुरु गोविन्द सिंह के प्रमुख युद्ध
➣ गुरु गोविन्द सिंह के समय पहाड़ी राजाओं तथा मुगल शासकों के साथ अनेक संघर्ष हुए। इन युद्धों का उद्देश्य किसी राज्य का विस्तार करना नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, आत्मरक्षा एवं न्याय की रक्षा करना था।
➣ भंगाणी का युद्ध (1688 ई.) गुरु गोविन्द सिंह और कुछ पहाड़ी राजाओं के बीच हुआ। गुरु गोविन्द सिंह की बढ़ती प्रतिष्ठा, सैन्य संगठन तथा पांवटा साहिब में उनके प्रभाव से चिंतित होकर कुछ पहाड़ी राजाओं ने उनके विरुद्ध मोर्चा बना लिया। इस युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी पहली महत्वपूर्ण सैन्य विजय प्राप्त की, जिससे सिखों का आत्मविश्वास और संगठन दोनों सुदृढ़ हुए।
➣ नादौन का युद्ध (1691 ई.) मुगल अधिकारियों द्वारा पहाड़ी राजाओं से जबरन कर (राजस्व) वसूले जाने के विवाद के कारण हुआ। इस संघर्ष में गुरु गोविन्द सिंह ने कुछ पहाड़ी राजाओं का साथ दिया और मुगल सेनापति अलिफ़ ख़ाँ का सफलतापूर्वक सामना किया। इस विजय से गुरु की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी।
➣ आनन्दपुर के युद्ध (1700–1705 ई.) खालसा पंथ की स्थापना के बाद गुरु गोविन्द सिंह की बढ़ती शक्ति से भयभीत पहाड़ी राजाओं एवं मुगल शासन ने कई बार आनन्दपुर साहिब को घेर लिया। लंबे संघर्ष और कठिन परिस्थितियों के बाद गुरु गोविन्द सिंह को आनन्दपुर का किला छोड़ना पड़ा, किन्तु उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया।
➣ चमकौर का युद्ध (1704/1705 ई.) आनन्दपुर साहिब छोड़ने के बाद हुआ। अत्यंत सीमित संख्या में सिखों ने विशाल मुगल सेना का साहसपूर्वक सामना किया। इसी युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह के दो बड़े पुत्र साहिबज़ादा अजीत सिंह एवं साहिबज़ादा जुझार सिंह वीरगति को प्राप्त हुए, जिन्होंने अद्वितीय वीरता का परिचय दिया।
➣ मुक्तसर का युद्ध (1705 ई.) खिद्राना (वर्तमान मुक्तसर) के निकट लड़ा गया। इस युद्ध में पहले गुरु का साथ छोड़ चुके 40 सिख पुनः लौटे और वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए शहीद हो गए। गुरु गोविन्द सिंह ने उनके त्याग से प्रभावित होकर उन्हें चाली मुक्ते (चालीस मुक्त) की उपाधि प्रदान की।
गुरु गोविन्द सिंह के प्रमुख युद्ध एवं संघर्ष
➣ गुरु गोविन्द सिंह के समय पहाड़ी राजाओं तथा मुगल शासकों के साथ अनेक संघर्ष हुए। इन युद्धों का उद्देश्य किसी राज्य का विस्तार करना नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, आत्मरक्षा एवं न्याय की रक्षा करना था।
भंगाणी का युद्ध (1688 ई.)
➣ गुरु गोविन्द सिंह और कुछ पहाड़ी राजाओं के बीच 1688 ई. में भंगाणी का युद्ध हुआ। गुरु गोविन्द सिंह की बढ़ती प्रतिष्ठा, सैन्य संगठन तथा पांवटा साहिब में उनके बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर कुछ पहाड़ी राजाओं ने उनके विरुद्ध मोर्चा बना लिया।
➣ इस युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी पहली महत्वपूर्ण सैन्य विजय प्राप्त की। इस विजय से सिखों का आत्मविश्वास बढ़ा तथा गुरु गोविन्द सिंह की सैन्य नेतृत्व क्षमता पूरे क्षेत्र में स्थापित हो गई।
नादौन का युद्ध (1691 ई.)
➣ 1691 ई. में मुगल अधिकारियों द्वारा पहाड़ी राजाओं से जबरन कर (राजस्व) वसूले जाने के विवाद के कारण नादौन का युद्ध हुआ। इस संघर्ष में गुरु गोविन्द सिंह ने कुछ पहाड़ी राजाओं का साथ दिया और मुगल सेनापति अलिफ़ ख़ाँ का सफलतापूर्वक सामना किया।
➣ इस विजय से गुरु गोविन्द सिंह की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी तथा सिख समुदाय की सैन्य शक्ति का प्रभाव पूरे क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
आनन्दपुर साहिब का घेराव (1700–1705 ई.)
➣ 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना के बाद गुरु गोविन्द सिंह की बढ़ती शक्ति, संगठित सिख समुदाय तथा खालसा के प्रभाव से पहाड़ी राजा एवं मुगल शासक चिंतित हो गए। उन्होंने कई बार आनन्दपुर साहिब पर आक्रमण किया, किन्तु प्रत्येक बार उन्हें कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ा।
➣ परिणामस्वरूप 1700–1705 ई. के बीच आनन्दपुर साहिब का कई बार घेराव किया गया। सबसे लंबा घेराव कई महीनों तक चला, जिसके कारण किले में खाद्यान्न, पानी एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया।
➣ अंततः मुगल सेनापतियों एवं पहाड़ी राजाओं ने सुरक्षित मार्ग देने की शपथ लेकर गुरु गोविन्द सिंह से किला खाली करने का अनुरोध किया। संगत के आग्रह पर गुरु ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, किन्तु किला छोड़ते ही शत्रुओं ने अपने वचन का उल्लंघन कर सिखों पर अचानक आक्रमण कर दिया।
सरसा नदी की घटना
➣ आनन्दपुर साहिब छोड़ने के बाद गुरु गोविन्द सिंह एवं उनके अनुयायियों को सरसा नदी पार करनी पड़ी। उसी समय भारी वर्षा, तेज़ बहाव एवं मुगल सेना के आक्रमण के कारण सिख दल बिखर गया।
➣ इस घटना में गुरु गोविन्द सिंह अपने दो बड़े पुत्रों साहिबज़ादा अजीत सिंह एवं साहिबज़ादा जुझार सिंह के साथ अलग हो गए, जबकि माता गुजरी अपने दोनों छोटे साहिबज़ादों जोरावर सिंह एवं फतेह सिंह के साथ अलग पड़ गईं।
चमकौर का युद्ध (1704/1705 ई.)
➣ सरसा नदी पार करने के बाद गुरु गोविन्द सिंह अपने लगभग 40 सिख साथियों के साथ चमकौर साहिब पहुँचे, जहाँ मुगल सेना एवं पहाड़ी राजाओं की विशाल संयुक्त सेना ने उन्हें घेर लिया।
➣ संख्या में अत्यंत कम होने के बावजूद सिखों ने अद्भुत साहस एवं वीरता का परिचय दिया। एक-एक कर सिख योद्धा युद्ध के लिए निकलते रहे और वीरगति प्राप्त करते रहे।
➣ इसी युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह के दोनों बड़े पुत्र साहिबज़ादा अजीत सिंह एवं साहिबज़ादा जुझार सिंह वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए शहीद हो गए।
➣ सिख परंपरा के अनुसार संगत के आग्रह पर गुरु गोविन्द सिंह रात्रि के समय चमकौर से सुरक्षित निकल गए, जिससे सिख नेतृत्व सुरक्षित रह सका और संघर्ष आगे भी जारी रहा।
छोटे साहिबज़ादों की शहादत (1705 ई.)
➣ दूसरी ओर माता गुजरी के साथ साहिबज़ादा जोरावर सिंह एवं साहिबज़ादा फतेह सिंह को सरहिंद के फौजदार वज़ीर ख़ाँ के सैनिकों ने बंदी बना लिया।
➣ दोनों बाल साहिबज़ादों पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डाला गया, किंतु उन्होंने अपने धर्म से समझौता करने से स्पष्ट इंकार कर दिया।
➣ 26 दिसम्बर 1705 ई. को दोनों साहिबज़ादों को जीवित दीवार में चिनवा दिया गया। इसके बाद उनकी हत्या कर दी गई। माता गुजरी का भी उसी समय निधन हो गया।
➣ छोटे साहिबज़ादों की शहादत भारतीय इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता एवं अदम्य साहस का अद्वितीय उदाहरण मानी जाती है।
मुक्तसर का युद्ध (1705 ई.)
➣ चमकौर एवं सरहिंद की घटनाओं के बाद 1705 ई. में खिद्राना (वर्तमान मुक्तसर) के निकट गुरु गोविन्द सिंह और मुगल सेना के बीच एक और महत्वपूर्ण युद्ध हुआ, जिसे मुक्तसर का युद्ध कहा जाता है।
➣ इस युद्ध में पहले गुरु का साथ छोड़ चुके 40 सिख पुनः लौटे और वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए शहीद हो गए। उनके अद्वितीय त्याग से प्रभावित होकर गुरु गोविन्द सिंह ने उन्हें चाली मुक्ते (चालीस मुक्त) की उपाधि प्रदान की।
चार साहिबज़ादों की शहादत
➣ चारों साहिबज़ादों का बलिदान सिख इतिहास की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में गिना जाता है। उन्होंने धर्म, सत्य एवं न्याय की रक्षा के लिए सर्वोच्च त्याग का आदर्श प्रस्तुत किया।
| साहिबज़ादा | शहादत |
|---|---|
| अजीत सिंह | चमकौर का युद्ध (1704/1705 ई.) |
| जुझार सिंह | चमकौर का युद्ध (1704/1705 ई.) |
| जोरावर सिंह | सरहिंद में जीवित दीवार में चिनवाया गया (1705 ई.) |
| फतेह सिंह | सरहिंद में जीवित दीवार में चिनवाया गया (1705 ई.) |
| युद्ध | वर्ष | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| भंगाणी का युद्ध | 1688 ई. | गुरु गोविन्द सिंह की पहली बड़ी सैन्य विजय। |
| नादौन का युद्ध | 1691 ई. | पहाड़ी राजाओं की ओर से मुगल सेनापति अलिफ़ ख़ाँ का सामना किया। |
| आनन्दपुर के युद्ध | 1700–1705 ई. | मुगलों एवं पहाड़ी राजाओं द्वारा बार-बार घेराबंदी। |
| चमकौर का युद्ध | 1704/1705 ई. | गुरु के दो बड़े पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए। |
| मुक्तसर का युद्ध | 1705 ई. | चाली मुक्ते (40 मुक्ते) के लिए प्रसिद्ध। |
साहित्यिक एवं धार्मिक योगदान
➣ गुरु गोविन्द सिंह केवल महान योद्धा ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के कवि, साहित्यकार, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक गुरु भी थे। उनकी रचनाओं में वीरता, धर्म, न्याय, ईश्वर-भक्ति तथा मानवता की रक्षा का संदेश मिलता है।
➣ उन्होंने संस्कृत, ब्रजभाषा, पंजाबी तथा फ़ारसी सहित अनेक भाषाओं के विद्वानों को संरक्षण दिया। उनके दरबार में अनेक कवि एवं विद्वान रहते थे, जिन्हें सामूहिक रूप से बावन कवि (52 कवि) कहा जाता है।
प्रमुख रचनाएँ
| रचना | विशेषता |
|---|---|
| जाप साहिब | ईश्वर की महिमा का वर्णन; सिख नितनेम का प्रमुख भाग। |
| अकाल उस्तत | ईश्वर की सर्वव्यापकता एवं मानव समानता का संदेश। |
| बचित्तर नाटक | आत्मकथात्मक एवं ऐतिहासिक विवरण; दशम ग्रंथ का प्रमुख भाग। |
| चंडी चरित्र | शक्ति एवं वीरता का वर्णन। |
| चंडी दी वार | वीर रस से युक्त रचना। |
| शस्त्र नाम माला | विभिन्न शस्त्रों का काव्यात्मक वर्णन। |
| चौबीस अवतार | विष्णु के 24 अवतारों का वर्णन। |
| चरित्रोपाख्यान | नैतिक एवं शिक्षाप्रद कथाओं का संग्रह। |
➣ इन रचनाओं में से अधिकांश का संकलन दशम ग्रंथ में मिलता है।
जफ़रनामा
➣ 1705 ई. में गुरु गोविन्द सिंह ने मुगल सम्राट औरंगज़ेब को फ़ारसी भाषा में जफ़रनामा (विजय-पत्र) लिखा।
➣ इस पत्र में उन्होंने औरंगज़ेब द्वारा किए गए वचनभंग, अन्याय एवं धार्मिक उत्पीड़न की कठोर आलोचना की तथा सत्य, न्याय और नैतिकता का संदेश दिया।
➣ जफ़रनामा सिख इतिहास का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ माना जाता है।
दमदमा साहिब एवं आदि ग्रंथ
➣ 1706 ई. में गुरु गोविन्द सिंह दमदमा साहिब (तलवंडी साबो, पंजाब) पहुँचे, जहाँ उन्होंने कुछ समय निवास किया।
➣ यहीं उन्होंने भाई मणि सिंह सहित अन्य विद्वानों की सहायता से आदि ग्रंथ का पुनः संपादन कराया तथा गुरु तेगबहादुर की वाणी को भी उसमें सम्मिलित कराया।
➣ इस संपादित स्वरूप को दमदमी बीड़ कहा जाता है, जो आगे चलकर सिख परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।
गुरु ग्रंथ साहिब का शाश्वत गुरुपद
➣ 1708 ई. में अपने जीवन के अंतिम दिनों में गुरु गोविन्द सिंह ने घोषणा की कि अब से कोई मानव गुरु नहीं होगा।
➣ उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत (सनातन) गुरु घोषित किया तथा सभी सिखों को उसकी शिक्षाओं का पालन करने का आदेश दिया।
➣ इस घोषणा के साथ लगभग दो शताब्दियों से चली आ रही मानव गुरु-परंपरा का समापन हो गया और गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म का सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु बन गया।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक योगदान
➣ गुरु गोविन्द सिंह केवल महान योद्धा एवं धार्मिक नेता ही नहीं थे, बल्कि उच्च कोटि के कवि, साहित्यकार, विद्वान एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत भी थे। उन्होंने साहित्य, शिक्षा एवं आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से सिख समाज को वैचारिक एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाया। उनके प्रमुख योगदानों का सारांश निम्नलिखित है।
| क्षेत्र | योगदान |
|---|---|
| साहित्य | अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं वीर रस की रचनाओं की रचना की। |
| धार्मिक सुधार | गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित किया। |
| शिक्षा | विद्वानों एवं कवियों को संरक्षण दिया। |
| भाषा | ब्रज, पंजाबी, संस्कृत एवं फ़ारसी साहित्य को समृद्ध किया। |
➣ गुरु गोविन्द सिंह के दरबार में अनेक विद्वान, कवि एवं साहित्यकार उपस्थित रहते थे। उन्होंने ज्ञान, शिक्षा एवं साहित्य को धर्म और समाज के उत्थान का महत्वपूर्ण माध्यम माना तथा विभिन्न भाषाओं में रचनाओं को प्रोत्साहन दिया।
➣ उनके साहित्यिक एवं सांस्कृतिक योगदान ने सिख धर्म को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि बौद्धिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भी नई पहचान प्रदान की। आज भी उनकी रचनाएँ और विचार साहस, धर्मनिष्ठा एवं मानवता की प्रेरणा देते हैं।
नांदेड़ प्रवास एवं बंदा सिंह बहादुर
➣ 1708 ई. में गुरु गोविन्द सिंह दक्षिण भारत के नांदेड़पहुँचे, जो गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। यह उनके जीवन का अंतिम प्रमुख प्रवास सिद्ध हुआ और यहीं से उन्होंने सिख पंथ के भविष्य से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
➣ नांदेड़ में उनकी भेंट माधोदास बैरागी नामक एक वैरागी साधु से हुई। सिख परंपरा के अनुसार गुरु गोविन्द सिंह के व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर उसने सिख धर्म स्वीकार किया और गुरु ने उसका नाम बंदा सिंह बहादुर रखा।
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने बंदा सिंह बहादुर को पाँच प्रमुख सिखों के साथ पंजाब भेजा तथा उन्हें मुगल अत्याचारों का प्रतिरोध करने, अन्याय का अंत करने और पीड़ित जनता की रक्षा का दायित्व सौंपा। उन्होंने बंदा सिंह बहादुर को अपने प्रतिनिधि के रूप में सिख समुदाय का नेतृत्व करने का भी निर्देश दिया।
➣ आगे चलकर बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद पर विजय प्राप्त कर वज़ीर ख़ाँ को पराजित किया, जो छोटे साहिबज़ादों की हत्या का दोषी माना जाता था। इसके साथ ही उन्होंने सिखों की पहली संगठित राजनीतिक शक्ति स्थापित करने तथा किसानों को भूमि का अधिकार दिलाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी किए, जिससे सिख इतिहास में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
नांदेड़ में आक्रमण, मृत्यु एवं अंतिम आदेश
➣ 1708 ई. में नांदेड़ प्रवास के दौरान सरहिंद के फौजदार वज़ीर ख़ाँ ने गुरु गोविन्द सिंह की हत्या के उद्देश्य से दो पठानों को भेजा। अवसर पाकर उनमें से एक ने गुरु जी पर कटार से अचानक आक्रमण कर दिया।
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने तत्काल साहसपूर्वक आक्रमणकारी का सामना किया और उसे मार गिराया, किंतु इस संघर्ष में उन्हें गंभीर चोट लगी। उपचार के बाद उनका घाव कुछ समय के लिए भर गया, जिससे उनकी स्थिति में सुधार दिखाई देने लगा।
➣ सिख परंपरा के अनुसार कुछ समय बाद धनुष खींचते समय पुराना घाव पुनः खुल गया, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई।
➣ 7 अक्टूबर 1708 ई. को नांदेड़ (वर्तमान महाराष्ट्र) में गुरु गोविन्द सिंह का देहावसान हो गया। उनके जीवन का समापन सिख इतिहास के एक युग के अंत के रूप में माना जाता है।
➣ अपने अंतिम समय में गुरु गोविन्द सिंह ने घोषणा की कि अब से सिखों का कोई मानव गुरु नहीं होगा। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया तथा सभी सिखों को उसकी शिक्षाओं का पालन करने का आदेश दिया।
➣ इसके साथ ही लगभग 239 वर्षों (1469–1708 ई.) से चली आ रही दस मानव गुरुओं की परंपरा का समापन हुआ और सिख धर्म में गुरु ग्रंथ साहिब को सर्वोच्च आध्यात्मिक मार्गदर्शक का स्थान प्राप्त हुआ। यह निर्णय सिख इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है।
स्मारक एवं उपाधियाँ
➣ गुरु गोविन्द सिंह की स्मृति में नांदेड़ में स्थित तख्त सचखंड श्री हुजूर साहिब का विशेष महत्व है। यह सिखों के पाँच तख्तों में से एक है।
➣ अपने अद्वितीय त्याग, वीरता एवं बलिदान के कारण गुरु गोविन्द सिंह को श्रद्धापूर्वक सच्चा पादशाह, सर्वंस दानी तथा दशमेश पिता जैसी सम्मानसूचक उपाधियों से संबोधित किया जाता है।
गुरु गोविन्द सिंह के प्रमुख योगदान
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने सिख धर्म के धार्मिक, सामाजिक, सैन्य, साहित्यिक एवं संगठनात्मक विकास में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने सिख समुदाय को नई पहचान प्रदान की तथा उसे अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने वाली संगठित शक्ति के रूप में विकसित किया। उनके प्रमुख योगदानों का सारांश निम्नलिखित है।
| क्षेत्र | प्रमुख योगदान |
|---|---|
| धार्मिक | 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना कर सिखों को नई धार्मिक पहचान एवं अनुशासित जीवन-पद्धति प्रदान की। |
| सामाजिक | जाति-भेद, ऊँच-नीच एवं सामाजिक भेदभाव का विरोध कर समानता, भाईचारे तथा मानव गरिमा का संदेश दिया। |
| सैनिक | सिखों को संगठित, अनुशासित एवं आत्मरक्षी योद्धा समुदाय के रूप में विकसित किया तथा संत-सिपाही की परंपरा को सुदृढ़ बनाया। |
| साहित्य | जाप साहिब, अकाल उस्तत, बचित्तर नाटक, ज़फ़रनामा, चंडी चरित्र आदि महत्वपूर्ण रचनाओं की रचना की। |
| शिक्षा एवं संस्कृति | विद्वानों एवं कवियों को संरक्षण दिया तथा ब्रज, पंजाबी, संस्कृत एवं फ़ारसी साहित्य के विकास को प्रोत्साहित किया। |
| धार्मिक व्यवस्था | 1708 ई. में गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित कर लगभग 239 वर्षों से चली आ रही मानव गुरु-परंपरा का समापन किया। |
➣ गुरु गोविन्द सिंह का जीवन साहस, त्याग, धर्मनिष्ठा, साहित्य-सृजन एवं मानवता की सेवा का अद्वितीय उदाहरण है। उनके द्वारा स्थापित सिद्धांतों ने सिख धर्म को नई दिशा प्रदान की और आगे चलकर उसे एक सशक्त धार्मिक एवं सामाजिक समुदाय के रूप में स्थापित किया।
➣ आज गुरु गोविन्द सिंह को केवल सिख धर्म के दशम गुरु के रूप में ही नहीं, बल्कि महान योद्धा, समाज-सुधारक, कवि, दार्शनिक एवं राष्ट्रप्रेरक व्यक्तित्व के रूप में भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।
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| विषय | तथ्य |
|---|---|
| जन्म | 22 दिसम्बर 1666 ई., पटना साहिब (बिहार) |
| बचपन का नाम | गोविन्द राय |
| दशम गुरु | 1675–1708 ई. |
| खालसा पंथ | 30 मार्च 1699 ई., आनन्दपुर साहिब |
| प्रमुख ग्रंथ | जफ़रनामा, जाप साहिब, बचित्तर नाटक आदि |
| शाश्वत गुरु | गुरु ग्रंथ साहिब |
| मृत्यु | 7 अक्टूबर 1708 ई., नांदेड़ (महाराष्ट्र) |
| प्रमुख स्मारक | तख्त सचखंड श्री हुजूर साहिब, नांदेड़ |
| उत्तराधिकारी | कोई मानव गुरु नहीं; गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित किया। |
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