गुरु अमरदास (1479–1574 ई.) : मंजी प्रथा, लंगर व्यवस्था एवं सामाजिक सुधार

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प्रारम्भिक जीवन एवं परिवार

➣ गुरु अमरदास सिखों के तृतीय गुरु थे। उनका जन्म 5 मई 1479 ई. (कुछ स्रोत केवल 1479 ई. का उल्लेख करते हैं) को बासरके गाँव (वर्तमान अमृतसर, पंजाब) में हुआ।

➣ उनके पिता तेज भान भल्ला तथा माता माता सुलखनी (भक्त कौर) थीं। वे भल्ला खत्री परिवार से संबंधित थे।

➣ गुरु अमरदास का पालन-पोषण धार्मिक वातावरण में हुआ। युवावस्था में वे सनातन परंपरा के अनुयायी थे तथा नियमित रूप से हरिद्वार की तीर्थयात्रा एवं धार्मिक अनुष्ठान करते थे।

➣उनका विवाह माता मनसा देवी से हुआ। उनके दो पुत्र-मोहन एवं मोहरी तथा दो पुत्रियाँ-बीबी दानी एवं बीबी भानी थीं।

➣ लगभग 61 वर्ष की आयु में उनकी भेंट गुरु अंगद देव की पुत्री बीबी अमरो से हुई। बीबी अमरो के मुख से गुरु नानक की वाणी सुनकर वे अत्यंत प्रभावित हुए और खडूर साहिब पहुँचकर गुरु अंगद देव के शिष्य बन गए। इसके बाद उन्होंने पूर्ण समर्पण, विनम्रता एवं निस्वार्थ सेवा के साथ गुरु की सेवा की।

➣ गुरु अंगद देव ने उनकी योग्यता, सेवा-भाव एवं आध्यात्मिक पात्रता से प्रसन्न होकर 1552 ई. में उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इस प्रकार गुरु अमरदास सिखों के तृतीय गुरु बने और आगे चलकर सिख धर्म के संगठन, सामाजिक सुधार तथा धर्म-प्रचार को नई दिशा प्रदान की।

विषयविवरण
जन्म5 मई 1479 ई. (परंपरागत मतानुसार)
जन्मस्थानबासरके (बासरके गिल्लां), वर्तमान अमृतसर जिला, पंजाब
पिताभाई तेज भान भल्ला
मातामाता लखमी (लछमी) देवी
पत्नीमाता मनसा देवी
संतानदो पुत्र – मोहरी एवं मोहन, तथा दो पुत्रियाँ – बीबी दानी एवं बीबी भानी
गुरुकाल1552–1574 ई.

➣ प्रारम्भिक जीवन में गुरु अमरदास सनातन धर्म के अनुयायी थे तथा धार्मिक प्रवृत्ति के कारण नियमित रूप से हरिद्वार की तीर्थयात्रा एवं गंगा-स्नान के लिए जाते थे।

➣ वे परिश्रमी, धार्मिक एवं सेवा-भावी स्वभाव के व्यक्ति थे। गृहस्थ जीवन अपनाते हुए उन्होंने व्यापार एवं कृषि कार्य भी किया तथा श्रम को सदैव सम्मान दिया।

गुरु अंगद देव के शिष्य बनना

➣ लगभग 61–62 वर्ष की आयु में गुरु अमरदास के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। एक दिन उन्होंने बीबी अमरो (गुरु अंगद देव की पुत्री) के मुख से गुरु नानक देव की वाणी सुनी, जिससे वे अत्यंत प्रभावित हुए।

➣ इसके पश्चात् वे खडूर साहिब पहुँचे और गुरु अंगद देव के शिष्य बन गए। उन्होंने अत्यंत विनम्रता, निष्ठा एवं सेवा-भाव से गुरु की सेवा की और शीघ्र ही उनके प्रिय शिष्यों में सम्मिलित हो गए।

➣ सिख परंपरा के अनुसार गुरु अमरदास प्रतिदिन प्रातःकाल व्यास नदी से जल लाकर गुरु अंगद के स्नान हेतु प्रस्तुत करते थे। उनकी निःस्वार्थ सेवा, विनम्रता एवं समर्पण सिख इतिहास में आदर्श माने जाते हैं।

तृतीय गुरु के रूप में नियुक्ति

➣ गुरु अंगद देव ने अपने पुत्रों के स्थान पर गुरु अमरदास की योग्यता, सेवा-भाव एवं आध्यात्मिक उत्कृष्टता को देखते हुए 1552 ई. में उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इस प्रकार गुरु अमरदास सिखों के तृतीय गुरु बने।

➣ गुरु बनने के पश्चात् उन्होंने गुरु नानक एवं गुरु अंगद द्वारा स्थापित सिद्धांतों को आगे बढ़ाया तथा सिख धर्म के संगठन और प्रचार-प्रसार को नई दिशा प्रदान की।

गोइन्दवाल साहिब को केन्द्र बनाना

➣ गुरु अंगद देव के निधन के बाद उनके पुत्र दातू ने स्वयं गुरुगद्दी प्राप्त करने का प्रयास किया, जिससे सिख समुदाय में कुछ समय के लिए मतभेद उत्पन्न हुए।

➣ इन परिस्थितियों में गुरु अमरदास ने गोइन्दवाल साहिब (वर्तमान पंजाब के तरनतारन क्षेत्र के निकट, व्यास नदी के तट पर) को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया।

➣ आगे चलकर गोइन्दवाल साहिब सिख धर्म का एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं प्रचार-प्रसार केन्द्र बन गया। यहीं से गुरु अमरदास ने सिख संगठन को अधिक व्यवस्थित एवं व्यापक स्वरूप प्रदान किया।

अकबर से भेंट एवं “पहले पंगत, फिर संगत”

➣ गुरु अमरदास के समय सिख धर्म का प्रभाव निरंतर बढ़ने लगा। उनकी ख्याति सुनकर मुगल सम्राट अकबर भी गोइन्दवाल साहिब पहुँचा और गुरु अमरदास से भेंट की।

➣ सिख परंपरा के अनुसार गुरु अमरदास का नियम था कि “पहले पंगत, फिर संगत” अर्थात् गुरु से मिलने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को लंगर में सभी के साथ समान पंक्ति में बैठकर भोजन करना होगा।

➣ सम्राट अकबर ने भी इस परंपरा का सम्मान करते हुए सामान्य लोगों के साथ पंगत में बैठकर भोजन किया। यह घटना सिख धर्म में समानता, सेवा एवं जाति-भेद के विरोध का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।

➣ गुरु अमरदास के व्यक्तित्व एवं उनके सामाजिक सुधारों से प्रभावित होकर अकबर ने बीबी भानी (गुरु अमरदास की पुत्री) को भूमि (जागीर) प्रदान की। इसी भूमि पर आगे चलकर गुरु रामदास ने रामदासपुर नगर बसाया, जो बाद में अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

गोइन्दवाल बावली (बावली साहिब)

➣ गुरु अमरदास ने गोइन्दवाल साहिब में एक विशाल बावली (सीढ़ीदार कुआँ) का निर्माण कराया, जो सिख धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल बन गया।

➣ इस बावली में 84 सीढ़ियाँ बनाई गई थीं। सिख परंपरा के अनुसार श्रद्धालु इन सीढ़ियों पर उतरते हुए जपुजी साहिब का पाठ करते थे।

➣ यह बावली केवल जल-स्रोत ही नहीं थी, बल्कि धार्मिक सभा, सेवा-भाव एवं संगत का प्रमुख केन्द्र भी थी।

मंजी प्रथा एवं पीरी प्रथा

➣ सिख धर्म के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए गुरु अमरदास ने धर्म-प्रचार एवं प्रशासन को अधिक संगठित बनाने के लिए मंजी प्रथा प्रारम्भ की।

➣ इसके अंतर्गत सम्पूर्ण सिख समुदाय को 22 मंजी (धार्मिक-प्रचार केन्द्रों) में विभाजित किया गया तथा प्रत्येक मंजी पर एक योग्य प्रचारक (मंजीदार) नियुक्त किया गया।

➣ महिलाओं की धार्मिक भागीदारी एवं नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए गुरु अमरदास ने पीरी प्रथा भी प्रारम्भ की। इसके अंतर्गत महिला प्रचारिकाओं को विभिन्न क्षेत्रों में धर्म-प्रचार का दायित्व सौंपा गया।

प्रथाउद्देश्य
मंजी प्रथासिख धर्म के प्रचार एवं संगठन के लिए 22 प्रचार केन्द्रों की स्थापना।
पीरी प्रथामहिलाओं को धर्म-प्रचार एवं नेतृत्व में सक्रिय भागीदारी प्रदान करना।

सामाजिक एवं धार्मिक सुधार

➣ गुरु अमरदास ने समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों का विरोध किया तथा मानव समानता और सामाजिक न्याय पर बल दिया।

सुधारविवरण
सती प्रथाइस अमानवीय प्रथा का विरोध किया।
पर्दा प्रथामहिलाओं की स्वतंत्रता एवं सम्मान के पक्ष में इसका विरोध किया।
जाति-भेदसभी मनुष्यों की समानता पर बल दिया।
विधवा विवाहविधवा-विवाह को प्रोत्साहित किया।
अंतरजातीय विवाहजातिगत भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से समर्थन किया।
गृहस्थ जीवनसंन्यास के स्थान पर गृहस्थ जीवन में रहकर ईश्वर-भक्ति एवं सेवा का संदेश दिया।

➣ गुरु अमरदास का मत था कि ईश्वर की प्राप्ति संसार त्यागकर नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए परिश्रम, सेवा, सत्य एवं भक्ति के माध्यम से की जा सकती है।

➣ उन्होंने स्त्री एवं पुरुष को समान अधिकार दिए तथा महिलाओं को धार्मिक एवं सामाजिक नेतृत्व में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया, जो उस समय की दृष्टि से एक अत्यंत प्रगतिशील कदम था।

साहित्यिक योगदान एवं वाणी

➣ गुरु अमरदास ने गुरु नानक देव एवं गुरु अंगद देव की वाणी के संरक्षण एवं संकलन का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके समय में तैयार की गई गोइन्दवाल पोथियाँ आगे चलकर सिखों के पाँचवें गुरु गुरु अर्जुन देव द्वारा आदि ग्रंथ के संकलन का महत्वपूर्ण आधार बनीं।

➣ गुरु अमरदास ने स्वयं भी अनेक आध्यात्मिक रचनाएँ कीं, जो गुरु ग्रंथ साहिब में “महला 3” शीर्षक के अंतर्गत संकलित हैं। उनकी वाणी में ईश्वर-भक्ति, मानव समानता, सेवा, सत्य, विनम्रता तथा नैतिक जीवन का संदेश मिलता है।

➣ उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना “आनन्द साहिब” है, जिसे “अनन्दु” भी कहा जाता है। यह सिखों की दैनिक प्रार्थना (नितनेम) का महत्वपूर्ण भाग है तथा विवाह एवं अन्य धार्मिक अवसरों पर भी इसका पाठ किया जाता है।

आनन्द कारज

➣ गुरु अमरदास ने सिख समाज में सरल, सादगीपूर्ण एवं धार्मिक मूल्यों पर आधारित विवाह को प्रोत्साहित किया तथा विवाह में अनावश्यक आडंबरों, कर्मकाण्डों एवं सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया।

➣ उन्होंने विवाह को केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एवं नैतिक जीवन की पवित्र शुरुआत माना। इसी कारण उन्होंने विवाह समारोह में सादगी, ईश्वर-स्मरण और संगत की उपस्थिति पर विशेष बल दिया।

➣ गुरु अमरदास के प्रयासों से सिख समाज में वैवाहिक संस्कार अधिक सरल एवं समानतापूर्ण बने तथा ब्राह्मणवादी कर्मकाण्डों पर निर्भरता कम हुई। इससे सिख समुदाय की एक स्वतंत्र धार्मिक पहचान को भी बल मिला।

➣ वर्तमान आनन्द कारज विवाह-पद्धति का स्वरूप बाद के काल में विकसित हुआ। इसमें गाए जाने वाले “लावाँ” की रचना चतुर्थ गुरु रामदास ने की थी। इसलिए लावाँ की रचना गुरु अमरदास ने नहीं, बल्कि गुरु रामदास ने की थी।

गुरु रामदास को उत्तराधिकारी

➣ गुरु अमरदास ने अपने पुत्रों के स्थान पर अपने योग्य शिष्य एवं दामाद भाई जेठा को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। यह निर्णय उनकी योग्यता, विनम्रता एवं निःस्वार्थ सेवा-भाव के आधार पर लिया गया।

➣ भाई जेठा आगे चलकर गुरु रामदास के नाम से प्रसिद्ध हुए और सिखों के चतुर्थ गुरु बने। गुरु अमरदास ने अपने जीवनकाल में ही उन्हें गुरु पद सौंपकर सिख समुदाय के नेतृत्व का दायित्व प्रदान किया।

➣ गुरु अमरदास ने उत्तराधिकार के चयन में योग्यता, सेवा-भाव एवं आध्यात्मिक पात्रता को वंशानुगत अधिकार से अधिक महत्व दिया। इससे सिख परंपरा में यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि गुरु पद का आधार जन्म नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एवं नैतिक श्रेष्ठता है।

➣ गुरु रामदास के गुरु बनने के बाद सिख पंथ का संगठन और अधिक सुदृढ़ हुआ तथा गुरु अमरदास द्वारा स्थापित परंपराओं का प्रभावी रूप से विस्तार हुआ।

मृत्यु

➣ गुरु अमरदास का निधन 1 सितम्बर 1574 ई. को गोइन्दवाल साहिब में हुआ।

➣ लगभग 22 वर्षों के गुरुकाल में उन्होंने सिख धर्म को एक संगठित धार्मिक एवं सामाजिक संस्था के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रमुख योगदान

क्षेत्रयोगदान
सिख संगठन22 मंजी प्रथा एवं पीरी प्रथा द्वारा धर्म-प्रचार को संगठित किया।
सामाजिक सुधारसती प्रथा, पर्दा प्रथा एवं जाति-भेद का विरोध तथा विधवा एवं अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया।
धार्मिक केन्द्रगोइन्दवाल साहिब को सिख धर्म का प्रमुख केन्द्र बनाया तथा 84 सीढ़ियों वाली बावली का निर्माण कराया।
साहित्यगोइन्दवाल पोथियाँ तैयार कराईं तथा आनन्द साहिब की रचना की।
महिला उत्थानमहिलाओं को धर्म-प्रचार में भागीदारी देने हेतु पीरी प्रथा प्रारम्भ की।
समानतापहले पंगत, फिर संगत की परंपरा को सुदृढ़ किया।

Quick Revision

विषयतथ्य
जन्म1479 ई., बासरके (अमृतसर, पंजाब)
तृतीय गुरु1552–1574 ई.
प्रमुख केन्द्रगोइन्दवाल साहिब
समकालीन मुगल शासकअकबर
प्रमुख संगठनात्मक योगदान22 मंजी प्रथा एवं पीरी प्रथा
प्रमुख सामाजिक सुधारसती प्रथा, पर्दा प्रथा का विरोध; विधवा एवं अंतरजातीय विवाह का समर्थन
प्रमुख धार्मिक स्थल84 सीढ़ियों वाली गोइन्दवाल बावली
प्रमुख रचनाआनन्द साहिब
महलामहला 3 (गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित)
उत्तराधिकारीभाई जेठा (गुरु रामदास)
मृत्यु1574 ई., गोइन्दवाल साहिब

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