रामानन्द : रामानन्दी (रामावत/वैरागी) सम्प्रदाय
➣ रामानन्द मध्यकालीन भारत के महान संत तथा उत्तर भारत में संगठित भक्ति आन्दोलन के प्रथम प्रमुख आचार्य माने जाते हैं। उन्होंने दक्षिण भारत की वैष्णव भक्ति परम्परा को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया तथा रामभक्ति को जन-जन तक पहुँचाया।
➣ परम्परागत मान्यता के अनुसार रामानन्द का जन्म 1299 ई. में प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज) के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम पुण्यसदन शर्मा, माता का नाम सुशीला देवी तथा बचपन का नाम रामदत्त बताया जाता है।
➣ हिन्दी साहित्य में रामानन्द के सम्बन्ध में प्रसिद्ध उक्ति है- “भक्ति द्रविड़ उपजी, लाए रामानन्द”, जिसका आशय है कि दक्षिण भारत में विकसित भक्ति-धारा को रामानन्द ने उत्तर भारत में व्यापक रूप से प्रचारित किया।
➣ रामानन्द के गुरु राघवानन्द थे, जिनसे उन्होंने काशी में शिक्षा प्राप्त की। राघवानन्द रामानुजाचार्य की श्रीवैष्णव (विशिष्टाद्वैत) परम्परा से सम्बद्ध आचार्य थे। इस कारण रामानन्द को रामानुजाचार्य की सम्प्रदाय-परम्परा का प्रमुख आचार्य माना जाता है, न कि उनका प्रत्यक्ष शिष्य।
➣ तीर्थयात्रा से लौटने पर जातिगत भेदभाव के कारण उत्पन्न मतभेदों के पश्चात रामानन्द ने एक स्वतंत्र भक्ति परम्परा का प्रचार किया, जिसमें जाति, वर्ण एवं ऊँच-नीच के भेदभाव को अस्वीकार किया गया।
➣ उन्होंने रामानन्दी (रामावत/वैरागी) सम्प्रदाय की स्थापना की तथा भगवान श्रीराम को अपना आराध्य माना। इसी कारण उन्हें सगुण रामभक्ति धारा का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है।
➣ रामानन्द ने भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन बताया तथा सभी जातियों एवं वर्गों के लोगों के लिए भक्ति का मार्ग समान रूप से खुला होने पर बल दिया।
➣ उनका प्रसिद्ध कथन है- “जात-पात पूछे नाहिं कोई, हरि को भजै सो हरि को होई॥” इसी भावना को उन्होंने संस्कृत में सर्वे प्रपत्तेऽधिकारिणः (सभी मनुष्य भक्ति के अधिकारी हैं) के सिद्धान्त द्वारा भी व्यक्त किया।
प्रमुख शिष्य एवं योगदान
➣ सम्प्रदाय-परम्परा के अनुसार रामानन्द के 12 प्रमुख शिष्य (द्वादश महाभागवत) माने जाते हैं, जो विभिन्न जातियों एवं सामाजिक वर्गों से सम्बन्धित थे। इससे स्पष्ट होता है कि रामानन्द ने भक्ति आन्दोलन को सामाजिक समरसता का स्वरूप प्रदान किया।
➣ इनके प्रमुख शिष्यों में कबीर (जुलाहा), रैदास/रविदास (चर्मकार), धन्ना (जाट), सेन (नाई), पीपा (राजपूत), अनन्तानन्द, भावानन्द, सुखानन्द, सुरसुरानन्द, नरहर्यानन्द, पद्मावती तथा सुरसरी का उल्लेख मिलता है।
➣ निम्न सारणी में रामानन्द के कुछ प्रमुख शिष्यों एवं उनके योगदान का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।
| शिष्य | विशेषता |
|---|---|
| कबीर | निर्गुण भक्ति के प्रमुख संत |
| रैदास (रविदास) | सामाजिक समरसता एवं निर्गुण भक्ति |
| धन्ना | सरल एवं निष्कपट भक्ति |
| सेन | भक्ति एवं सेवा-भाव |
| पीपा | राजपूत शासक से संत बने |
प्रमुख रचनाएँ
➣ रामानन्द से सम्बन्धित प्रमुख ग्रन्थों में श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर तथा श्रीरामार्चन-पद्धति का उल्लेख मिलता है। इन ग्रन्थों की प्रामाणिकता एवं मूल हस्तलिखित प्रतियों के विषय में विद्वानों के बीच मतभेद है। इनमें रामभक्ति, वैष्णव सिद्धान्त तथा उपासना-पद्धति का वर्णन मिलता है।
| ग्रन्थ | संक्षिप्त परिचय |
|---|---|
| श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर | वैष्णव सिद्धान्तों एवं भक्ति के मूल विचारों का विवेचन करने वाला ग्रन्थ। |
| श्रीरामार्चन-पद्धति | भगवान श्रीराम की उपासना एवं पूजा-पद्धति का वर्णन करने वाला ग्रन्थ। |
भक्ति आन्दोलन में योगदान
➣ रामानन्द ने भक्ति आन्दोलन को संस्कृत की सीमा से निकालकर लोकभाषा के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाया। उन्होंने जाति एवं ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध करते हुए सभी वर्गों के लोगों को भक्ति का समान अधिकार प्रदान किया।
➣ काशी का पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ आज भी रामानन्दी सम्प्रदाय का प्रमुख आचार्यपीठ माना जाता है।
➣ वर्तमान में रामानन्दी सम्प्रदाय भारत का सबसे बड़ा वैष्णव संन्यासी सम्प्रदाय माना जाता है।
➣ रामानन्द के विचारों ने आगे चलकर भक्ति आन्दोलन को व्यापक जनआन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया। उनकी शिष्य-परम्परा से कबीर, रैदास, धन्ना तथा अन्य संतों ने सामाजिक समानता, धार्मिक सहिष्णुता और भक्ति के संदेश को पूरे उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया।
मृत्यु
➣ परम्परागत मान्यता के अनुसार 1411 ई. में लगभग 111 वर्ष की आयु में रामानन्द का देहावसान हुआ। उनके जीवनकाल एवं मृत्यु-तिथि के सम्बन्ध में विभिन्न मत प्रचलित हैं।
➣ रामानन्द की शिष्य-परम्परा से आगे चलकर निर्गुण तथा सगुण– दोनों भक्ति धाराओं का व्यापक विकास हुआ।
• जन्म : 1299 ई. (परम्परागत मान्यता), प्रयाग (प्रयागराज)
• बचपन का नाम : रामदत्त
• गुरु : राघवानन्द
• सम्प्रदाय : रामानन्दी (रामावत/वैरागी) सम्प्रदाय
• प्रमुख केन्द्र : काशी (पंचगंगा घाट)
• आराध्य : भगवान श्रीराम
• भक्ति धारा : सगुण रामभक्ति
• प्रसिद्ध उक्ति : “भक्ति द्रविड़ उपजी, लाए रामानन्द”
• प्रमुख शिष्य : कबीर, रैदास, धन्ना, सेन, पीपा आदि
• प्रमुख ग्रन्थ : श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर एवं श्रीरामार्चन-पद्धति
• मृत्यु : 1411 ई. (परम्परागत मान्यता)
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