प्रशासनिक स्वरूप
➣ प्रारम्भ में पेशवा, छत्रपति शिवाजी द्वारा स्थापित अष्टप्रधान परिषद् का एक प्रमुख सदस्य था। उस समय राज्य की सर्वोच्च सत्ता छत्रपति के हाथों में ही निहित थी पेशवा का कार्य राजा को शासन संचालन एवं प्रशासनिक कार्यों में सहायता देना था।
➣ बालाजी विश्वनाथ तथा बाजीराव प्रथम के समय पेशवा पद का महत्व निरन्तर बढ़ता गया। विशेषकर बाजीराव प्रथम के बाद यह पद व्यवहारतः वंशानुगत बन गया और पेशवा मराठा राजनीति का सबसे प्रभावशाली अधिकारी बनकर उभरा।
➣ 1749 ई. में छत्रपति शाहू की मृत्यु के बाद राजाराम द्वितीय को मराठा सिंहासन पर बैठाया गया। इसके पश्चात् 1750 ई. में राजाराम द्वितीय और पेशवा बालाजी बाजीराव के बीच हुई संगोला की संधि मराठा इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुई।
➣ संगोला की संधि (1750 ई.) के बाद मराठा साम्राज्य की वास्तविक सत्ता पेशवा के हाथों में आ गई, जबकि छत्रपति केवल नाममात्र का शासक रह गया। इसके साथ ही मराठा साम्राज्य का राजनीतिक केन्द्र सतारा से पुणे स्थानान्तरित हो गया।
➣ पेशवाओं ने पुणे को अपने प्रशासन का मुख्य केन्द्र बनाया। यहीं स्थित उनका केन्द्रीय सचिवालय हुजूर दफ्तर से सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य का प्रशासन संचालित होता था।
➣ पेशवा काल में प्रशासन पहले की अपेक्षा अधिक केंद्रीकृत हुआ, किन्तु समय के साथ विभिन्न मराठा सरदारों की शक्ति भी बढ़ने लगी। परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर पड़ता गया।
➣ राजाराम के समय पुनः प्रारम्भ हुई जागीर प्रथा को पेशवाओं ने व्यापक रूप से अपनाया। इससे अनेक मराठा सरदारों को बड़े-बड़े भू-भाग जागीर के रूप में मिलने लगे। आगे चलकर यही व्यवस्था मराठा संघ में सामन्ती प्रवृत्तियों तथा आन्तरिक विघटन का एक प्रमुख कारण बनी।
➣ इस प्रकार पेशवा काल में मराठा शासन का स्वरूप बदल गया। जहाँ शिवाजी के समय छत्रपति शासन का वास्तविक केन्द्र था, वहीं पेशवा काल में पेशवा ही प्रशासन, सेना, वित्त तथा साम्राज्य की नीतियों का वास्तविक संचालक बन गया।
केन्द्रीय प्रशासन
➣ पेशवा काल में शासन का सर्वोच्च अधिकारी पेशवा होता था। संगोला की संधि (1750 ई.) के बाद मराठा साम्राज्य की वास्तविक सत्ता उसी के हाथों में आ गई। वह प्रशासन, सेना, वित्त, कूटनीति तथा प्रान्तीय अधिकारियों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखता था।
➣ पेशवा का मुख्य सचिवालय हुजूर दफ्तर कहलाता था। यही मराठा शासन का केन्द्रीय कार्यालय था, जो पुणे में स्थित था। जहाँ से समस्त प्रशासनिक आदेश जारी किए जाते थे तथा राजस्व, सैन्य, न्याय एवं अन्य विभागों से संबंधित अभिलेख सुरक्षित रखे जाते थे।
➣ हुजूर दफ्तर में अनेक अधिकारी कार्यरत रहते थे, जो प्रशासन के विभिन्न विभागों का संचालन करते थे। इन अधिकारियों की नियुक्ति सामान्यतः योग्यता के आधार पर की जाती थी, किन्तु कालान्तर में अनेक पद व्यवहारतः वंशानुगत होने लगे।
प्रमुख केन्द्रीय अधिकारी
➣ फड़नवीस राज्य के वित्त विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था। वह आय-व्यय का लेखा-जोखा रखता, राजकोष का नियंत्रण करता तथा राजस्व संबंधी मामलों में पेशवा का प्रमुख सलाहकार होता था।
➣ मजूमदार आय एवं व्यय का निरीक्षक होता था। उसका कार्य विभिन्न विभागों के लेखों की जाँच करना तथा वित्तीय अभिलेखों की शुद्धता सुनिश्चित करना था।
➣ कारकून प्रशासनिक कार्यालयों का प्रमुख लिपिकीय अधिकारी था। वह सरकारी पत्र-व्यवहार, अभिलेखों का संधारण तथा विभिन्न प्रान्तों से प्राप्त सूचनाओं का संकलन करता था और समय-समय पर उन्हें केन्द्रीय प्रशासन तक पहुँचाता था।
➣ आवश्यकता के अनुसार अन्य अधिकारी भी नियुक्त किए जाते थे, जो सैन्य, राजस्व तथा प्रशासनिक विभागों में पेशवा की सहायता करते थे। इस प्रकार केन्द्रीय प्रशासन का सम्पूर्ण संचालन हुजूर दफ्तर के माध्यम से होता था।
केन्द्रीय प्रशासन की विशेषताएँ
➣ पेशवा काल में प्रशासन पहले की अपेक्षा अधिक संगठित एवं अभिलेख-आधारित हो गया। विभिन्न विभागों के कार्यों का स्पष्ट विभाजन किया गया तथा शासन संचालन में लिखित अभिलेखों और कार्यालय व्यवस्था को विशेष महत्व दिया गया।
➣ यद्यपि प्रशासन का केन्द्र पुणे था, फिर भी सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य के प्रान्तों और जिलों का नियंत्रण केन्द्रीय प्रशासन के माध्यम से ही किया जाता था।
पेशवा केन्द्रीय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी था। उसका मुख्य सचिवालय हुजूर दफ्तर कहलाता था, जबकि फड़नवीस, मजूमदार तथा कारकून उसके प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी थे।
प्रान्तीय एवं जिला प्रशासन
➣ विशाल मराठा साम्राज्य के सुचारु प्रशासन के लिए पेशवाओं ने शासन को विभिन्न प्रान्तों, जिलों तथा ग्रामों में विभाजित किया था। प्रत्येक स्तर पर अलग-अलग अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।
➣ प्रान्तीय एवं जिला प्रशासन का मुख्य उद्देश्य राजस्व वसूली, कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा केन्द्रीय प्रशासन के आदेशों का पालन कराना था। इसके माध्यम से पुणे स्थित केन्द्रीय शासन सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने का प्रयास करता था।
(सर सूबेदार)
↓
जिला
(मामलतदार / कामविसदार)
(देशमुख / देशपाण्डे)
(कारकून)
↓
ग्राम
(पाटिल)
प्रान्तीय प्रशासन
➣ पेशवा काल में सूबे को सामान्यतः प्रान्त कहा जाता था। प्रत्येक प्रान्त का सर्वोच्च अधिकारी सर सूबेदार होता था, जो वहाँ का प्रशासनिक, राजस्व तथा न्यायिक प्रमुख माना जाता था।
➣ सर सूबेदार अपने प्रान्त में शान्ति एवं कानून-व्यवस्था बनाए रखने, राजस्व की वसूली की निगरानी करने तथा अधीनस्थ अधिकारियों पर नियंत्रण रखने का कार्य करता था। वह सीधे पेशवा के प्रति उत्तरदायी होता था।
➣ प्रान्त के अंतर्गत आने वाले परगने अथवा तरफ को सामूहिक रूप से महल कहा जाता था। प्रत्येक महल के प्रशासन की व्यवस्था भी प्रान्तीय अधिकारियों के नियंत्रण में रहती थी।
| इकाई / अधिकारी | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| प्रान्त (सूबा) | प्रशासनिक इकाई, जिसका प्रमुख सर सूबेदार होता था। |
| सर सूबेदार | प्रान्त का प्रशासनिक, राजस्व एवं न्यायिक प्रमुख |
| महल | परगने अथवा तरफ का प्रशासनिक क्षेत्र |
जिला प्रशासन
➣ प्रत्येक जिले में मामलतदार तथा कामविसदार पेशवा के प्रमुख प्रतिनिधि होते थे। शिवाजी के समय इनका स्थानांतरण किया जाता था, किन्तु पेशवा काल में धीरे-धीरे इनके पद व्यवहारतः वंशानुगत होते चले गए।
➣ मामलतदार का कार्य राजस्व वसूली, कृषि एवं उद्योग को प्रोत्साहन देना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा दीवानी एवं फौजदारी मामलों की देखरेख करना था। वह जिले के समस्त प्रशासन का प्रमुख अधिकारी माना जाता था।
➣ ग्रामों में भूमि-कर का निर्धारण मामलतदार स्थानीय पाटिल के परामर्श से करता था। विभिन्न जिलों की महत्ता के अनुसार मामलतदार एवं कामविसदार के वेतन तथा भत्तों में भी अंतर होता था।
➣ देशमुख तथा देशपाण्डे जिला प्रशासन में नियंत्रणकारी अधिकारी थे। वे राजस्व अभिलेखों की जाँच करते, लेखों का सत्यापन करते तथा प्रशासन में अनियमितताओं एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखने का कार्य करते थे।
➣ कारकून जिले का अभिलेख अधिकारी होता था। वह प्रशासनिक घटनाओं, राजस्व अभिलेखों तथा अन्य सरकारी सूचनाओं का रिकॉर्ड रखता और समय-समय पर उनकी जानकारी केन्द्रीय प्रशासन को भेजता था।
➣ प्रत्येक महल में हवलदार मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता था। मजूमदार तथा फड़नवीस उसके प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्यों में सहायता करते थे।
| अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| मामलतदार / कामविसदार | जिले में पेशवा के प्रतिनिधि; प्रशासन एवं राजस्व व्यवस्था का संचालन |
| देशमुख / देशपाण्डे | राजस्व अभिलेखों की जाँच एवं प्रशासनिक नियंत्रण |
| कारकून | अभिलेखों का संधारण एवं केन्द्रीय प्रशासन को सूचनाएँ भेजना |
| हवलदार | महल का मुख्य कार्यकारी अधिकारी |
ग्राम प्रशासन
➣ पेशवा काल में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम प्रशासन मुख्यतः स्थानीय अधिकारियों द्वारा संचालित किया जाता था, जो राजस्व वसूली, कानून-व्यवस्था तथा न्यायिक कार्यों का संचालन करते थे।
➣ ग्राम का मुख्य अधिकारी पाटिल (पटेल) होता था। यह पद सामान्यतः वंशानुगत था। पाटिल ग्राम प्रशासन का प्रधान होने के साथ-साथ राज्य और ग्रामीणों के बीच प्रमुख कड़ी का कार्य करता था।
➣ पाटिल का मुख्य कार्य भूमि-कर की वसूली, कानून-व्यवस्था बनाए रखना, छोटे-मोटे न्यायिक विवादों का निपटारा करना तथा शासन के आदेशों का पालन कराना था। उसे सरकार से नियमित वेतन नहीं मिलता था, बल्कि वह एकत्रित कर का एक निश्चित भाग अपने पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त करता था।
➣ कुलकर्णी ग्राम का लेखाधिकारी होता था। वह भूमि का लेखा-जोखा रखता, किसानों के अभिलेख तैयार करता तथा राजस्व संबंधी विवरण सुरक्षित रखता था।
➣ कुलकर्णी के अधीन चौगुले कार्य करता था। उसका मुख्य कार्य पाटिल की सहायता करना तथा कुलकर्णी द्वारा तैयार किए गए अभिलेखों और लेखों का संधारण करना था।
➣ ग्राम की आवश्यक सेवाओं की पूर्ति के लिए बारह बलूते (बारह बलुतेदार) व्यवस्था प्रचलित थी। इसमें विभिन्न शिल्पकार एवं सेवा-प्रदाता समुदाय सम्मिलित थे, जिन्हें ग्रामीण अपनी कृषि उपज का निश्चित भाग प्रदान करते थे।
➣ पोतदार सिक्कों के भार तथा उनकी धातु की शुद्धता की जाँच करने वाला अधिकारी था। व्यापारिक लेन-देन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।
➣ नगरों में कोतवाल कानून-व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था तथा सार्वजनिक सुरक्षा का प्रमुख अधिकारी होता था। वह अपराधों की रोकथाम तथा नगर प्रशासन की देखरेख भी करता था।
न्याय व्यवस्था
➣ पेशवा काल की न्याय व्यवस्था मुख्यतः प्राचीन हिन्दू धर्मशास्त्रों, स्मृतियों, मनुस्मृति तथा दायभाग जैसे ग्रन्थों के सिद्धान्तों पर आधारित थी।
➣ ग्राम स्तर पर पाटिल, जिला स्तर पर मामलतदार तथा प्रान्त स्तर पर सर सूबेदार न्यायिक अधिकारों का प्रयोग करते थे। इनके निर्णयों के विरुद्ध आवश्यकता पड़ने पर उच्च अधिकारी के समक्ष अपील की जा सकती थी।
➣ दीवानी मामलों का निर्णय प्रायः पंचायतों द्वारा किया जाता था। इन्हें सम्मानपूर्वक पंचपरमेश्वर कहा जाता था। पंचायत के निर्णय से असंतुष्ट पक्ष मामलतदार के समक्ष अपील कर सकता था।
➣ ग्राम की पुलिस व्यवस्था पाटिल के अधीन तथा जिला स्तर की पुलिस मामलतदार के नियंत्रण में कार्य करती थी।
| अधिकारी / संस्था | मुख्य कार्य |
|---|---|
| पाटिल (पटेल) | ग्राम का मुख्य अधिकारी; कर-वसूली, प्रशासन एवं न्यायिक कार्यों का संचालन |
| कुलकर्णी | ग्राम का लेखाधिकारी; भूमि एवं राजस्व अभिलेखों का संधारण |
| कोतवाल | नगर का पुलिस एवं कानून-व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी |
| पंचायत (पंचपरमेश्वर) | दीवानी मुकदमों का निर्णय करने वाली स्थानीय न्यायिक संस्था |
राजस्व व्यवस्था
➣ पेशवा काल में राज्य की आर्थिक व्यवस्था का प्रमुख आधार राजस्व था। शासन के संचालन, सेना के व्यय तथा प्रशासनिक खर्चों की पूर्ति मुख्यतः भू-राजस्व, चौथ, सरदेशमुखी तथा अन्य विविध करों से होती थी।
भू-राजस्व
➣ पेशवा काल में भूमि-कर राज्य की आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत था। किसानों से उनकी कृषि भूमि के आधार पर कर वसूल किया जाता था।
➣ शिवाजी के समय भूमि की वास्तविक उपज के आधार पर कर निर्धारित किया जाता था, किन्तु पेशवा काल में भूमि-कर को प्रायः एक निश्चित अवधि के लिए स्थिर कर दिया जाता था। इससे राजस्व वसूली में सुविधा हुई, यद्यपि कई बार किसानों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ता था।
➣ नई भूमि को कृषि योग्य बनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहन दिया जाता था। ऐसी भूमि पर प्रारम्भिक वर्षों में अपेक्षाकृत कम कर लगाया जाता था, जिससे अधिकाधिक क्षेत्र खेती के अंतर्गत लाया जा सके।
➣ पेशवा माधवराव प्रथम ने कृषि विस्तार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बंजर तथा पथरीली भूमि को जोतने वालों को विशेष प्रोत्साहन दिया। ऐसी भूमि का एक भाग किसानों को इनाम के रूप में प्रदान किया जाता था।
विविध कर
➣ भू-राजस्व के अतिरिक्त पेशवा काल में अनेक प्रकार के कर भी वसूले जाते थे। इनमें गृह कर, कूप-सिंचित भूमि पर कर, सीमा शुल्क, माप एवं तौल के परीक्षण का वार्षिक शुल्क तथा अन्य स्थानीय कर प्रमुख थे।
➣ पेशवाओं ने विधवा पुनर्विवाह पर पतदाम नामक कर लगाया था। यह उस समय के सामाजिक एवं आर्थिक करों में से एक माना जाता है।
➣ पेशवा काल में चौथ तथा सरदेशमुखी राज्य की आय के अत्यन्त महत्वपूर्ण स्रोत थे। चौथ सामान्यतः किसी प्रदेश की आय का 25 प्रतिशत तथा सरदेशमुखी 10 प्रतिशत होती थी।
➣ चौथ की राशि का वितरण निश्चित अनुपात में किया जाता था। इसका 25% भाग बबती, 6% सहोत्र, 3% नाडगुंडा तथा शेष 66% भाग मोकासा (सरंजाम) के रूप में मराठा सरदारों को दिया जाता था।
| चौथ का भाग | विवरण |
|---|---|
| बबती (25%) | राजा का हिस्सा |
| सहोत्र (6%) | पंत सचिव को दिया जाता था |
| नाडगुंडा (3%) | राजा की इच्छा के अनुसार व्यय किया जाता था |
| मोकासा / सरंजाम (66%) | मराठा सरदारों को दिया जाता था |
➣ सरदेशमुखी की संपूर्ण आय राजा के हिस्से में जाती थी। इसकी वसूली सीधे काश्तकारों से की जाती थी।
➣ कामविसदार चौथ की वसूली करता था, जबकि गुमाश्ता सरदेशमुखी की वसूली का कार्य करता था।
➣ राजस्थान में मराठों ने सामान्यतः चौथ एवं सरदेशमुखी की वसूली नहीं की। वहाँ के राजाओं से खानदानी तथा मामलत (खराज) के रूप में धन लिया जाता था। केवल अजमेर मराठों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में था।
भूमि व्यवस्था एवं जागीर प्रथा
➣ पेशवा काल में भूमि व्यवस्था मराठा प्रशासन का एक महत्वपूर्ण आधार थी। राज्य की आय का अधिकांश भाग कृषि पर निर्भर था, इसलिए भूमि के स्वामित्व, कर-वसूली तथा भूमि-अनुदान की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता था।
मीरासदार एवं उपरिस
➣ मीरासदार वे स्थायी काश्तकार अथवा भू-स्वामी थे, जिनका अपनी भूमि पर पैतृक अधिकार होता था। उनके पास कृषि के साधन, जैसे हल, बैल तथा अन्य उपकरण भी होते थे।
➣ अनेक मीरासदारों को कर-मुक्त अथवा रियायती भूमि भी प्राप्त थी। यद्यपि शिवाजी ने उनकी विशेषाधिकारयुक्त स्थिति को सीमित करने का प्रयास किया था, फिर भी पेशवा काल में उनका प्रभाव पुनः बढ़ने लगा।
➣ उपरिस (उपरी) वे कृषक थे, जिनके पास अपनी भूमि नहीं होती थी। वे अधिकारियों की अनुमति से भूमि लेकर खेती करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उस भूमि से हटाया भी जा सकता था।
जागीर प्रथा
➣ राजाराम के समय पुनः प्रारम्भ हुई जागीर प्रथा का विस्तार पेशवा काल में हुआ। प्रशासनिक अधिकारियों, सैन्य सरदारों तथा सेवाओं के बदले अनेक व्यक्तियों को भूमि अनुदान के रूप में जागीरें प्रदान की जाने लगीं।
➣ प्रारम्भ में जागीरें केवल सेवा-काल तक सीमित मानी जाती थीं, किन्तु समय के साथ वे वंशानुगत होती चली गईं। इससे स्थानीय सरदारों की शक्ति बढ़ी तथा केन्द्रीय शासन की पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर होने लगी।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जागीर प्रथा के विस्तार ने मराठा संघ में सामन्ती प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया, जिससे विभिन्न मराठा सरदार अधिक स्वायत्त होते गए और राजनीतिक एकता प्रभावित हुई।
मोकासा एवं सरंजाम
➣ मोकासा अथवा सरंजाम भूमि-अनुदान की ऐसी व्यवस्था थी, जिसके अंतर्गत सैन्य अथवा प्रशासनिक सेवाओं के बदले भूमि अथवा उसके राजस्व का अधिकार प्रदान किया जाता था।
➣ प्रारम्भ में मोकासा और सरंजाम व्यक्तिगत सेवा से जुड़े अनुदान थे, किन्तु सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा पेशवा काल में ये भी व्यवहारतः वंशानुगत बन गए।
➣ अधिकारियों और सरदारों को दिए जाने वाले अनेक मोकासे आगे चलकर स्थायी जागीरों में परिवर्तित हो गए, जिससे स्थानीय शक्तियों का प्रभाव निरन्तर बढ़ता गया।
अन्य विशेषताएँ
➣ वतनदार वे अधिकारी अथवा भू-स्वामी थे, जिन्हें वंशानुगत आधार पर भूमि एवं राजस्व से संबंधित अधिकार प्राप्त थे। वे स्थानीय प्रशासन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
➣ बाजीराव द्वितीय के समय कर-वसूली की परम्परागत व्यवस्था में परिवर्तन हुआ और अनेक स्थानों पर कर वसूली का अधिकार इजारा (ठेका अथवा नीलामी) प्रणाली के माध्यम से दिया जाने लगा। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ा और प्रशासनिक अनियमितताओं में भी वृद्धि हुई।
| विषय | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| मीरासदार | स्थायी भू-स्वामी एवं पैतृक अधिकार रखने वाले काश्तकार |
| उपरिस | अस्थायी काश्तकार, जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर बेदखल किया जा सकता था |
| मोकासा / सरंजाम | सैन्य या प्रशासनिक सेवाओं के बदले दिया जाने वाला भूमि अनुदान |
| जागीर प्रथा | पेशवा काल में वंशानुगत होकर सामन्ती व्यवस्था का प्रमुख आधार बनी |
| इजारा प्रणाली | बाजीराव द्वितीय के समय कर-वसूली का अधिकार ठेके (नीलामी) पर दिया जाने लगा |
सैन्य व्यवस्था
➣ पेशवा काल में मराठा साम्राज्य की शक्ति का प्रमुख आधार उसकी सैन्य व्यवस्था थी। साम्राज्य के निरन्तर विस्तार, चौथ एवं सरदेशमुखी की वसूली तथा बाहरी शत्रुओं से सुरक्षा के लिए एक विशाल सेना का संगठन किया गया।
➣ मराठा सेना का संगठन मुख्यतः मुगल सैन्य व्यवस्था तथा दक्षिण भारत के मुस्लिम राज्यों की सैन्य परम्पराओं से प्रभावित था। यद्यपि शिवाजी द्वारा स्थापित गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का प्रभाव बना रहा, किन्तु पेशवा काल में सेना का स्वरूप पहले की अपेक्षा अधिक सामन्ती हो गया।
मराठा सेना का संगठन
➣ मराठा सेना में घुड़सवार सेना को सर्वाधिक महत्व दिया जाता था। तीव्र गति से लम्बी दूरी तय करना तथा अचानक आक्रमण करना इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी।
➣ शिवाजी अपने सैनिकों को राज्य की ओर से नियमित वेतन देते थे, किन्तु पेशवाओं ने धीरे-धीरे जागीर एवं सरंजाम की व्यवस्था अपनाई। परिणामस्वरूप अनेक सैनिक सरदार अपनी-अपनी निजी सेनाएँ रखने लगे, जिससे केन्द्रीय सैन्य नियंत्रण कमजोर होने लगा।
➣ मराठा घुड़सवार सेना मुख्यतः दो भागों में विभाजित थी— बारगीर तथा शिलेदार। बारगीर वे सैनिक थे-
| प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| बारगीर | इन सैनिकों को राज्य की ओर से घोड़े, अस्त्र-शस्त्र तथा अन्य सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई जाती थी। |
| शिलेदार | ये सैनिक अपने निजी घोड़े, अस्त्र-शस्त्र एवं उपकरणों के साथ सेना में सेवा करते थे। |
गुरिल्ला (छापामार) युद्ध प्रणाली
गुरिल्ला (छापामार) युद्ध प्रणाली का प्रयोग भारत में विभिन्न कालों में अनेक शासकों ने किया। महाराणा प्रताप ने मुगलों के विरुद्ध अरावली के दुर्गम क्षेत्रों में तथा अहमंगर से मलिक अम्बर ने दक्कन में मुगल सेना के विरुद्ध इस युद्धनीति का प्रभावी उपयोग किया।➣ बाद में छत्रपति शिवाजी ने इसे संगठित रूप प्रदान किया, जिसे पेशवा बाजीराव प्रथम ने और अधिक विकसित करते हुए मराठा साम्राज्य के विस्तार का प्रभावशाली साधन बनाया।
➣ पेशवा बाजीराव प्रथम ने छत्रपति शिवाजी द्वारा विकसित गुरिल्ला (छापामार) युद्ध प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाया। इस युद्धनीति में शत्रु पर अचानक आक्रमण करना, उसकी रसद एवं संचार व्यवस्था को बाधित करना, तीव्र गति से स्थान परिवर्तन करना तथा अनुकूल अवसर देखकर निर्णायक प्रहार करना प्रमुख विशेषताएँ थीं।
➣ बाजीराव प्रथम ने अपनी तीव्र गति वाली घुड़सवार सेना के बल पर इस युद्ध प्रणाली का सफलतापूर्वक प्रयोग किया। परिणामस्वरूप उसने लगभग 20 वर्षों के अपने सैन्य जीवन में अनेक युद्ध लड़े और परंपरागत रूप से माना जाता है कि वह किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुआ।
सेना का आधुनिकीकरण
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) के बाद मराठा नेतृत्व को यह अनुभव हुआ कि केवल पारंपरिक घुड़सवार सेना के बल पर आधुनिक युद्धों में सफलता प्राप्त करना कठिन है। इसलिए मराठा सरदारों ने सेना को यूरोपीय शैली में संगठित करने का प्रयास प्रारम्भ किया।
➣ इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कार्य महादजी सिंधिया ने किया। उत्तर भारत में अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाने के लिए उसने फ्रांसीसी सैन्य अधिकारी बेनोइट डी बोएन (Benoît de Boigne) की सेवाएँ प्राप्त कीं।
➣ डी बोएन ने मराठा सेना को यूरोपीय सैन्य पद्धति के अनुसार पुनर्गठित किया। उसने सैनिकों को नियमित प्रशिक्षण दिया, कठोर अनुशासन लागू किया तथा आधुनिक युद्ध-कौशल का अभ्यास कराया।
➣ साथ ही डी बोएन ने आधुनिक पैदल सेना (Infantry), संगठित तोपखाना तथा नियमित ब्रिगेड प्रणाली का विकास किया। इन सुधारों के कारण महादजी सिंधिया की सेना उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली भारतीय सेनाओं में गिनी जाने लगी।
➣ डी बोएन के नेतृत्व में मराठा सेना ने अनेक महत्वपूर्ण अभियानों में सफलता प्राप्त की, जिससे दिल्ली तथा उत्तर भारत में महादजी सिंधिया का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया और मुगल बादशाह भी उसके संरक्षण में आ गया।
➣ डी बोएन के सेवानिवृत्त होने के बाद फ्रांसीसी अधिकारी पेरॉन ने उसकी सैन्य व्यवस्था को आगे बढ़ाया। उसने भी यूरोपीय शैली की सेना का नेतृत्व किया, किन्तु महादजी सिंधिया की मृत्यु के बाद मराठा सरदारों के पारस्परिक संघर्ष और अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव के कारण यह व्यवस्था अधिक समय तक प्रभावी नहीं रह सकी।
तोपखाना एवं गार्डी पैदल सेना
➣ प्रारम्भिक मराठा सेना में घुड़सवार सेना को सर्वाधिक महत्व दिया जाता था, जिसके कारण तोपखाना अपेक्षाकृत कमजोर था। किन्तु पेशवा काल में आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं को देखते हुए तोपखाने के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया।
➣ पेशवाओं ने पुणे तथा जुन्नार के अम्बेगाँव में तोप निर्माण के कारखाने स्थापित करवाए। इन कारखानों में मुख्यतः पुर्तगाली तथा भारतीय ईसाई कारीगर कार्य करते थे, जिन्हें धातु-कला एवं तोप निर्माण का विशेष अनुभव था।
➣ पेशवा काल में मराठा सेना में यूरोपीय शैली की प्रशिक्षित गार्दी पैदल सेना का भी विकास हुआ। इस सेना को आधुनिक बंदूकों, तोपों तथा अनुशासित सैन्य प्रशिक्षण से सुसज्जित किया गया था।
➣ इब्राहिम ख़ान गार्डी इस गार्डी पैदल सेना तथा तोपखाने का सबसे प्रसिद्ध सेनानायक था। उसने फ्रांसीसी सैन्य पद्धति के अनुसार अपनी सेना को प्रशिक्षित किया और उसे आधुनिक युद्ध-कौशल में दक्ष बनाया।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| तोप निर्माण केन्द्र | पुणे तथा जुन्नार का अम्बेगाँव |
| मुख्य कारीगर | पुर्तगाली एवं भारतीय ईसाई |
| प्रमुख सेनानायक | इब्राहिम ख़ान गार्डी |
| विशेषता | यूरोपीय शैली की प्रशिक्षित गार्डी पैदल सेना एवं आधुनिक तोपखाना |
| महत्वपूर्ण युद्ध | पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.) |
➣ 1761 ई. के पानीपत के तृतीय युद्ध में इब्राहिम ख़ान गार्डी ने मराठा सेना की अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व किया। उसके तोपखाने और पैदल सेना ने प्रारम्भिक चरण में अफ़ग़ान सेना को भारी क्षति पहुँचाई, किन्तु मराठा नेतृत्व में समन्वय की कमी तथा रसद संकट के कारण अंततः मराठों को पराजय का सामना करना पड़ा।
सेना की कमजोरियाँ
➣ पेशवा काल के उत्तरार्द्ध में सेना का अत्यधिक भाग जागीरदारों एवं मराठा सरदारों पर निर्भर हो गया। परिणामस्वरूप केन्द्रीय नियंत्रण कमजोर पड़ता गया और विभिन्न सरदार अपनी-अपनी स्वतंत्र सैन्य शक्ति विकसित करने लगे।
➣ मराठा सेना में एकीकृत नेतृत्व का अभाव, सरदारों के बीच प्रतिस्पर्धा तथा आधुनिक सैन्य संगठन की कमी ने आगे चलकर आंग्ल–मराठा युद्धों में उनकी पराजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अन्य विशेषताएँ
➣ पेशवा काल में सेना की दक्षता बढ़ाने के लिए समय-समय पर विदेशी सैनिकों तथा यूरोपीय सैन्य विशेषज्ञों की सेवाएँ भी ली जाती थीं। इन्हें आधुनिक युद्ध-कला, तोप संचालन तथा सैनिक प्रशिक्षण में विशेषज्ञता के कारण अपेक्षाकृत अधिक वेतन दिया जाता था।
➣ मराठा सेना में अनेक स्थानीय सरदार एवं पोलीगरभी युद्ध के समय सैनिक सहायता प्रदान करते थे। ये स्थानीय भू-स्वामी अपने अधीन सैनिकों के साथ आवश्यकता पड़ने पर मराठा सेना में सम्मिलित होकर युद्ध करते थे।
➣ मराठा सैनिकों के शौर्य, युद्ध अभियानों तथा वीरता का वर्णन करने वाली मराठी वीरगाथाओं को पॉवड़े कहा जाता था। इनका उद्देश्य सैनिकों एवं जनता में साहस, स्वाभिमान तथा राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करना था।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| विदेशी सैन्य विशेषज्ञ | आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण एवं तोप संचालन के लिए नियुक्त किए जाते थे। |
| पोलीगर | स्थानीय भू-स्वामी, जो आवश्यकता पड़ने पर अपनी सेना सहित मराठों की सहायता करते थे। |
| पॉवड़े | मराठी वीरगाथाएँ, जिनमें सैनिकों के शौर्य एवं युद्धों का वर्णन मिलता है। |
| मोडी लिपि | पेशवा काल की प्रशासनिक एवं राजकीय अभिलेखों की प्रमुख लिपि। |
➣ पेशवा काल के प्रशासनिक आदेश, राजस्व अभिलेख तथा सरकारी पत्र-व्यवहार मुख्यतः मोडी लिपि में लिखे जाते थे। यह मराठा प्रशासन की आधिकारिक एवं सर्वाधिक प्रचलित लिपि थी, जिसका उपयोग शासन-प्रशासन में व्यापक रूप से किया जाता था।
पेशवा प्रशासनQuick Revision
| विषय | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| वास्तविक शासक | 1750 ई. की संगोला की संधि के बाद पेशवा |
| राजनीतिक केन्द्र | सतारा → पुणे |
| केन्द्रीय सचिवालय | हुजूर दफ्तर |
| मुख्य केन्द्रीय अधिकारी | फड़नवीस, मजूमदार, कारकून |
| प्रान्त का अधिकारी | सर सूबेदार |
| जिले का अधिकारी | मामलतदार एवं कामविसदार |
| नियंत्रण अधिकारी | देशमुख एवं देशपाण्डे |
| ग्राम का मुखिया | पाटिल (पटेल) |
| ग्राम लेखाधिकारी | कुलकर्णी |
| नगर का पुलिस प्रमुख | कोतवाल |
| ग्राम न्याय | पंचायत (पंचपरमेश्वर) |
| मुख्य आय का स्रोत | भू-राजस्व |
| चौथ | 25% कर |
| सरदेशमुखी | 10% कर |
| चौथ वसूलने वाला | कामविसदार |
| सरदेशमुखी वसूलने वाला | गुमाश्ता |
| विधवा पुनर्विवाह कर | पतदाम |
| स्थायी भू-स्वामी | मीरासदार |
| अस्थायी काश्तकार | उपरिस |
| भूमि अनुदान | मोकासा / सरंजाम |
| वंशानुगत भूमि | जागीर |
| कर वसूली (उत्तरकाल) | इजारा (ठेका/नीलामी) – बाजीराव द्वितीय |
| सेना की प्रमुख शक्ति | घुड़सवार सेना |
| गुरिल्ला युद्ध | बाजीराव प्रथम ने आगे बढ़ाया |
| तोपखाना | पुणे एवं अम्बेगाँव |
| मराठी वीरगाथाएँ | पॉवड़े |
| राजकीय लिपि | मोडी लिपि |
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