बंगाल स्थापत्य कला
➣ बाँस की इमारतों से ली गई हिन्दू मंदिरों की लहरिएदार कार्निसों (घुमावदार छज्जों) की परम्परागत शैली का इस्लामी अनुकरण, छोटे-छोटे खम्भों पर नुकीली मेहराबें, तथा कमल जैसे सुन्दर खुदाई के हिन्दू सजावट के प्रतीक चिह्नों को अपनाना बंगाली स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण विशेषता थी।
➣ बंगाल में चूँकि पत्थरों का अभाव था, इसलिए यहाँ की अधिकांश इमारतों का निर्माण ईंटों से हुआ। ईंटों से निर्मित होने के कारण इन भवनों की आयु बहुत कम रही।
➣ घुमावदार छत: मानसूनी क्षेत्र होने के कारण बंगाल की छतों को घुमावदार बनाया गया था ताकि वर्षाकाल में छत पर एकत्र होने वाला जल शीघ्र बाहर निकल सके और संरचना की आयु बढ़े। यह शैली ग्रामीण बंगाल की पारम्परिक बाँस की झोपड़ियों से प्रेरित थी।
➣ पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के पाण्डुआ नगर में स्थित अदीना मस्जिद (भारत की सर्ववृहत्तम मुस्लिम इमारत) का निर्माण सिकन्दर शाह ने बंगाल सल्तनत की राजकीय मस्जिद के रूप में करवाया था।
➣ यह अपने समय में भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे विशाल मस्जिद थी और इसकी विशाल संरचना दमिश्क की उमय्यद मस्जिद जैसी हाइपोस्टाइल (स्तम्भ-आधारित) शैली से प्रेरित है।
➣ अदीना मस्जिद के प्रार्थना कक्ष के मध्य में एक विशाल बैरल-वॉल्टेड (अर्धवृत्ताकार छत वाला) केन्द्रीय गलियारा था जो इसे दमिश्क की महान मस्जिद से जोड़ता था।
➣ यह केन्द्रीय गलियारा मस्जिद को दो पंखों में विभाजित करता था। मस्जिद में विशाल घिरा हुआ आँगन था जो इसे बंगाल की अन्य सभी मस्जिदों से अलग बनाता था, क्योंकि बाद में ऐसा बड़ा खुला प्रांगण मानसूनी मौसम के लिए अनुपयुक्त होने के कारण कभी नहीं बनाया गया।
➣ सिकन्दर शाह का मकबरा मस्जिद की पिछली दीवार से सटे वर्गाकार कक्ष में सुल्तान सिकन्दरशाह की क़ब्र है। इस मस्जिद को बंगाल में संसार के आश्चर्यों में गिना जाता था।
➣ इसमें हजारों लोग एक साथ नमाज़ पढ़ सकते थे। सुल्तान ने मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर अपने लिए अरब और फारस के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ जैसे उद्घोष उत्कीर्ण करवाए।
➣ एकलाखी मकबरा, पाण्डुआ पाण्डुआ में स्थित लक्खी मकबरे का निर्माण हिन्दू भवनों की ईंटों से हुआ है। यह एक गुम्बद वाली वर्गाकार इमारत है। यह मकबरा राजा गणेश के पुत्र सुल्तान जलालुद्दीन मुहम्मद शाह (बंगाल मूल का पहला मुस्लिम सुल्तान) का माना जाता है।
➣ इस मकबरे ने घुमावदार कार्निस, अर्धगोलाकार गुम्बद, कोने की मीनारें और टेराकोटा सजावट जैसे तत्वों को प्रतिष्ठित किया जो बाद की बंगाली स्थापत्य का आधार बने।
➣ गौड़ (लखनौती) की प्रमुख इमारतें गौड़ बंगाल के शासकों की राजधानी था जिसे कालान्तर में लखनौती भी कहा गया।
➣ नुसरत शाह द्वारा निर्मित बड़ा सोना मस्जिद (1526 ई.) गौड़ की सबसे भव्य मस्जिद है। उसने गौड़ में बड़ा सोना एवं कदम रसूल मस्जिद का निर्माण करवाया। इसकी दीवारें सोने जैसी पॉलिश से चमकती थीं, इसीलिए इसे सोना मस्जिद कहा जाता है।
➣ छोटा सोना मस्जिद (1493-1519 ई.) गौड़ में स्थित है। इसका निर्माण वली मुहम्मद ने हुसैन शाह के काल में पूरा करवाया। यह मस्जिद अपनी सुन्दर पत्थर की नक्काशी और सोने की परत चढ़े गुम्बदों के लिए विख्यात है।
➣ नुसरत शाह द्वारा गौड़ में निर्मित कदम रसूल मस्जिद (1530 ई.) में पैगम्बर मुहम्मद के पदचिह्न सुरक्षित रखे गए हैं। यह इस्लामी दृष्टि से विशेष पवित्र स्थल माना जाता है।
➣ दाखिली दरवाजा लखनौती (गौड़) का प्रवेश द्वार है। लाल ईंटों से निर्मित यह विशाल द्वार बंगाली और तुगलक स्थापत्य के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें टेराकोटा की सजावट और नुकीले मेहराब बंगाली शैली की पहचान हैं।
➣ गौड़ में स्थित लोटन मस्जिद अपनी विशिष्ट टेराकोटा टाइलों से आच्छादित दीवारों के लिए प्रसिद्ध है। लोटन का अर्थ है – लोटना या लुढ़कना, जो इसकी गोल-मटोल दीवारों के कारण इसे दिया गया नाम है।
➣ रुक्न खाँ का मकबरा, देवी कोट – यह मकबरा बंगाली स्थापत्य की एक-गुम्बदीय वर्गाकार शैली का प्रतिनिधित्व करता है। घुमावदार कार्निस और टेराकोटा सजावट इसकी बंगाली विशेषताएँ हैं।
➣ गौड़ में स्थित दरसवारी (दारासबारी) मस्जिद व मकबरा बंगाल की उत्तरकालीन सल्तनत युगीन कला का प्रतीक है। इसके मिहराब की शिल्पकारी पर अदीना मस्जिद की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
➣ नुसरत शाह के समय में महाभारत का बांग्ला भाषा में अनुवाद करवाया गया, जो इस बात का प्रमाण है कि बंगाल के सुल्तान न केवल स्थापत्य कला के संरक्षक थे, बल्कि हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय के भी पोषक थे।
| इमारत / स्थल | शासक / निर्माता | काल (ई.) | विशेषता | |
|---|---|---|---|---|
| — पाण्डुआ (प्रमुख केन्द्र) — | ||||
| अदीना मस्जिद (भारत की सबसे विशाल मुस्लिम इमारत) | सिकन्दरशाह | 1368 ई. | भारत की सबसे विशाल मुस्लिम इमारत। नुकीले मेहराब, हिन्दू प्रतीकों का इस्लामी रूपांतरण। खम्भों पर मेहराब बंगाल शैली की पहचान। | |
| लाखी मकबरा | बंगाल सुल्तान | 14–15वीं शदी | पाण्डुआ का प्रमुख मकबरा; बंगाल की स्थापत्य शैली का उदाहरण। | |
| — गौड़ (प्रमुख केन्द्र) — | ||||
| बड़ा सोना मस्जिद | नुसरत शाह (पूर्ण) | 1526 ई. | गौड़ की सबसे बड़ी मस्जिद। सोने की परत वाले गुम्बदों के कारण ‘सोना मस्जिद’ नाम। नुसरत शाह ने 1526 ई. में पूर्ण करवाया। | |
| छोटा सोना मस्जिद (रत्न) | वली मुहम्मद / हुसैन शाह काल | 1493–1519 ई. | हुसैन शाह के काल में वली मुहम्मद द्वारा निर्मित। सोने की चमकदार टाइल-छत; बंगाल स्थापत्य का सर्वाधिक सुंदर नमूना माना जाता है। | |
| कदम रसूल मस्जिद | नुसरत शाह | 1530 ई. | पैगम्बर मुहम्मद के पदचिह्न (कदम रसूल) की स्मृति में निर्मित। गोलाकार गुम्बद एवं अष्टभुजीय मीनार। | |
| लोटन मस्जिद | बंगाल सुल्तान | 15वीं शदी | रंगीन टाइलों (लोटन = लुढ़कना/रंगीन) से सजी मस्जिद। बंगाल में टाइल-कार्य का दुर्लभ उदाहरण। | |
| दाखिला दरवाजा | बंगाल सुल्तान | 15–16वीं शदी | गौड़ नगर का भव्य प्रवेश द्वार। विशाल आकार एवं बारीक टेराकोटा अलंकरण। | |
| दरसवारी का मकबरा | बंगाल सुल्तान | 15–16वीं शदी | गौड़ के प्रमुख मकबरों में से एक; बंगाल की मकबरा-निर्माण परंपरा का उदाहरण। | |
| — अन्य स्थल — | ||||
| रूक्न खाँ का मकबरा | बंगाल सुल्तान | 15वीं शदी | देवी कोट में स्थित, बंगाल की क्षेत्रीय स्थापत्य परंपरा का नमूना। | |
गुजरात स्थापत्य कला
➣ हिन्दू-मुस्लिम-जैन स्थापत्य का समन्वय अहमदशाह ने गुजरात के जैनियों की उच्च स्थापत्य-परम्परा का लाभ उठाते हुए दिल्ली के स्थापत्य से एकदम भिन्न शैली का विकास किया। इस शैली की कुछ विशेषताएँ हैं – पतले मीनार, पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी और अलंकृत कोष्ठक।
➣ प्रारम्भिक काल की प्रमुख इमारतें (1300–1411 ई.) इस अवधि में खिलजी वंश के मुस्लिम राज्यपालों ने निर्माण कार्य आरंभ किया। भरूच में जामी मस्जिद तथा ढोलका में हिलाल खान काजी की मस्जिद ने प्रचलित स्थापत्य पैटर्न में एक नई शैली पेश की।
➣ मीनार की उपस्थिति गुजरात मस्जिद डिज़ाइन में एक उत्कृष्ट तत्व बन गई। इसी काल में बाबा फरीद का मकबरा बनाया गया, जो गुजरात की मुस्लिम स्थापत्य शैली का प्रथम उदाहरण माना जाता है।
➣ अहमदशाह (1411–1442 ई.) ने अपने लम्बे शासनकाल में सामंतों को काबू में किया, प्रशासन को स्थिरता दी और अपनी राजधानी पाटन से हटाकर नये नगर अहमदाबाद में ले आया। वह बहुत बड़ा भवन निर्माता था और उसने नगर को अनेक भव्य महलों, बाज़ारों, मस्जिदों और मदरसों से सजाया।
➣ जामा मस्जिद, अहमदाबाद (1423 ई.) इस मस्जिद को गुजरात वास्तुकला शैली का सर्वोत्कृष्ट नमूना माना जाता है। अहमदशाह द्वारा बनवाई गई इमारतें जैसे भव्य मस्जिदें, खानकाह, मदरसे आदि इस्लामी तथा हिन्दू स्थापत्य कला का संयुक्त नमूना हैं।
➣ उस काल के सुन्दर नमूनों में अहमदाबाद की जामा मस्जिद और तीन दरवाज़ा आज भी सुरक्षित हैं।
➣ अहमदशाह मकबरा इसका निर्माण जामा मस्जिद के पूर्व में स्थित अहाते में मुहम्मदशाह ने करवाया। यह वर्गाकार इमारत है जिसका प्रवेश द्वार दक्षिण भाग में है और ऊपर एक बड़े गुम्बद का निर्माण किया गया है।
➣ महमूद बेगड़ा (1459–1511 ई.) का काल गुजरात में इस्लामी स्थापत्य कला का गौरवपूर्ण आरंभ महमूद बेगड़ा के सिंहासनारूढ़ होने से होता है, जिसने तीन नगरों – चंपानेर, जूनागढ़ और खेड़ा – की स्थापना की और वहाँ शानदार इमारतें बनवाईं।
➣ उनके द्वारा निर्मित इमारतों में चंपानेर की जामी मस्जिद प्रमुख है।
➣ सीदी सैय्यद मस्जिद (1572–73 ई.) इसका निर्माण सीदी सैय्यद ने करवाया था, जो गुजरात सल्तनत के अंतिम सुल्तान शम्स-उद-दीन मुजफ्फर शाह III की सेना में सेनापति थे।
➣ इंडो-इस्लामिक कला का यह अनूठा उदाहरण अपनी स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है। इसकी अलंकृत जाली का काम, आपस में जुड़े पेड़ों और पत्तों की जटिल नक्काशी और अर्ध-गोलाकार मेहराबदार खिड़कियों में की गई ताड़ की आकृति इस मस्जिद की पहचान है।
➣ अन्य प्रमुख इमारतें पाटन में शेख फरीद का मकबरा, अहमदाबाद में सैय्यद आलम की मस्जिद, कुतुबुद्दीन शाह की मस्जिद, रानी रूपवती की मस्जिद, सीदी सैय्यद मस्जिद, सैय्यद उस्मान का रोजा तथा मुहम्मद गौस की मस्जिद आदि गुजरात स्थापत्य कला के अन्य महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।
➣ बावड़ियाँ (वाव) अहमदाबाद में बाई हरीर नी वाव, अदलज बावड़ी और पाटन में रानी की वाव शानदार बावड़ियों के उदाहरण हैं। रानी की वाव आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है।
➣ महाबत मकबरा, जूनागढ़ यह इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के शानदार शिल्पकौशल का एक उदाहरण है, जो 19वीं शताब्दी के दौरान गिरनार पहाड़ियों के तल पर स्थित जूनागढ़ में बनाया गया था।
| इमारत / स्थल | शासक / निर्माता | काल (ई.) | विशेषता |
|---|---|---|---|
| बाबा फरीद का मकबरा | खिलजी काल (राज्यपाल) | 1300 ई. के बाद | गुजरात की मुस्लिम स्थापत्य शैली का सबसे पहला उदाहरण। |
| भरूच की जामी मस्जिद | खिलजी राज्यपाल | ~1300 ई. | प्रचलित पैटर्न में नई शैली की शुरुआत; मीनार का गुजरात में प्रथम प्रयोग। |
| हिलाल खान काजी की मस्जिद | खिलजी राज्यपाल | ~1325 ई. | ढोलका में स्थित; छोटी, सरल संरचना, हिन्दू-इस्लामी शैली का समन्वय। |
| टाक / टंका मस्जिद | खिलजी काल | 1361 ई. | ढोलका में खुली किस्म में निर्मित मस्जिद। |
| जामा मस्जिद, अहमदाबाद | अहमदशाह प्रथम | 1423 ई. | गुजरात वास्तुकला का सर्वोत्कृष्ट नमूना। पतले मीनार, उत्कृष्ट नक्काशी, अलंकृत कोष्ठक। जैन + हिन्दू + इस्लामी शैली का अद्भुत मेल। |
| तीन दरवाज़ा, अहमदाबाद | अहमदशाह प्रथम | 1415–23 ई. | भव्य प्रवेश द्वार; गुजराती एवं इस्लामी वास्तुकला का संयोजन। आज भी सुरक्षित। |
| अहमदशाह का मकबरा | मुहम्मदशाह (अहमदशाह के उत्तराधिकारी) | 1443 ई. के बाद | जामा मस्जिद के पूर्व में स्थित; वर्गाकार इमारत, दक्षिण प्रवेश द्वार, बड़ा गुम्बद। |
| चंपानेर की जामी मस्जिदUNESCO | महमूद बेगड़ा | 1459–1511 ई. | गुजरात इस्लामी स्थापत्य का गौरवशाली उदाहरण। पाँच गुम्बद, विशाल मीनारें, पत्थर की बारीक नक्काशी। |
| नगीना मस्जिद, चंपानेर | महमूद बेगड़ा | ~1484 ई. | सुंदर अनुपात एवं उत्कृष्ट पत्थर कारीगरी के लिए प्रसिद्ध। |
| रानीपिसारी का रौज़ा, खेड़ा | महमूद बेगड़ा | 1459–1511 ई. | खेड़ा में निर्मित सुंदर मकबरा-परिसर। |
| रानी की वाव, पाटनUNESCO | रानी उदयमती (सोलंकी काल) | 11वीं शदी | यूनेस्को विश्व धरोहर; सात मंजिला बावड़ी, 500 से अधिक मूर्तियाँ, अप्रतिम हिन्दू शिल्पकला। |
| सीदी सैय्यद मस्जिदप्रसिद्ध जाली | सीदी सैय्यद (गुजरात सल्तनत) | 1572–73 ई. | इंडो-इस्लामी कला का अनूठा नमूना। ताड़ वृक्ष एवं पत्तियों की जटिल पत्थर जाली, 10 अलंकृत मेहराबदार खिड़कियाँ। |
| सीदी बशीर मस्जिद (झूला मीनार) | गुजरात सल्तनत | ~1452 ई. | अहमदाबाद में स्थित; हिलते मीनारों के लिए विश्वप्रसिद्ध — एक हिले तो दूसरा भी हिलता है। |
| रानी रूपवती की मस्जिद | गुजरात सल्तनत | 15वीं शदी | अहमदाबाद में स्थित; स्थापत्य में हिन्दू एवं इस्लामी शैली का उत्कृष्ट सम्मिश्रण। |
| महाबत मकबरा, जूनागढ़ | नवाब महाबत खान | 19वीं शदी | गिरनार पहाड़ियों के तल पर स्थित; इंडो-इस्लामी, गोथिक एवं यूरोपीय शैली का अनोखा मिश्रण। |
जौनपुर स्थापत्य कला
➣ जौनपुर की स्थापना फिरोजशाह तुगलक ने अपने भाई जूना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) की स्मृति में की थी।
➣ 1394 ई. में ख्वाजा जहान द्वारा स्वतंत्र शर्की वंश की स्थापना के साथ जौनपुर इस्लामी कला, स्थापत्य और शिक्षा का महान केन्द्र बन गया। इसे शीराज-ए-हिन्द (पूर्व का शीराज) कहा जाता था।
➣ शर्की सुल्तानों द्वारा निर्मित इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य कला का सुन्दर मिश्रण दिखाई पड़ता है। शर्की सुल्तानों के निर्माण कार्य अपनी बड़ी-बड़ी ढलुवाँ एवं तिरछी दीवारों, वर्गाकार स्तम्भों, छोटी गैलरियों एवं कोठरियों के कारण काफ़ी प्रसिद्ध हैं।
➣ अटाला मस्जिद में बड़ी संख्या में स्तम्भ, ब्रेकेट, लिंटेल और सपाट छतें हिन्दू स्मारकों से ली गई थीं।
➣ मीनारों का अभाव जौनपुर की इस कला की मुख्य विशेषता है। ये मस्जिदें ध्वस्त हिन्दू स्थलों पर बनायी गयी हैं। इनकी रचना शैली मुहम्मद बिन तुग़लक़ द्वारा बनवायी गयी बेगमपुरी मस्जिद (जामा मस्जिद) से बहुत अधिक प्रभावित है।
➣ शर्की स्थापत्य की सबसे विशिष्ट विशेषता विशाल प्रोपाइलॉन है – एक विराट मेहराब जो आयताकार ढाँचे में जड़ी होती है और जिसकी दीवारें स्पष्टतः ढलुवाँ होती हैं।
➣ यह प्रोपाइलॉन पीछे बने विशाल अर्धगोलाकार गुम्बद को पूरी तरह ढक लेती है। मिस्र के पिरामिडनुमा द्वारों से प्रेरित यह शैली जौनपुर शैली की ट्रेडमार्क थी।
➣ इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद ने शर्की शासकों की प्रशंसा करते हुए लिखा – जौनपुर के सम्राट कला और विद्या के महान् संरक्षक थे। उनके भवनों में हिन्दू-मुस्लिम निर्माण कला शैली के विचारों का वास्तविक एवं प्रारम्भिक समन्वय है।
➣ जौनपुर की बहुचर्चित अटाला मस्जिद (1408 ई.) की नींव फिरोजशाह तुगलक ने 1376 ई. में रखी थी, जिसका निर्माण 1408 ई. में इब्राहीम शाह शर्की के कार्यकाल में पूरा हुआ।
➣ यह अटाला देवी मंदिर के स्थान पर निर्मित है जिसे कन्नौज के राजा विजयचन्द्र ने बनवाया था। मस्जिद का प्रांगण 78.7 मीटर भुजा का वर्गाकार है जो तीन ओर से दोहरे स्तम्भों वाले बरामदे से घिरा है और पश्चिम में नमाज-कक्ष है।
➣ इसका केन्द्रीय प्रवेश द्वार लगभग 23 मीटर ऊँचा है। अटाला मस्जिद आगे बनने वाली समस्त जौनपुरी मस्जिदों का आदर्श मॉडल बनी।
➣ महिलाओं हेतु ज़नाना गैलरी शर्की स्थापत्य की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता मस्जिदों में महिलाओं के लिए बनाई गई ज़नाना गैलरी थी।
➣ अटाला, जामी और लाल दरवाजा तीनों प्रमुख मस्जिदों में महिलाओं के लिए अलग दीर्घा बनाई गई थी। ये दीर्घाएँ जालीदार दीवारों से सुसज्जित थीं।
➣ झंझोरी मस्जिद इब्राहिम शाह शर्की द्वारा 1430 ई. में निर्मित इस मस्जिद की रचना भी अटाला मस्जिद की शैली पर आधारित है। इसका नाम जाली के समान सुंदर नक्काशी के कारण पड़ा।
➣ लाल दरवाजा मस्जिद (लगभग 1450 ई.) लाल दरवाजा मस्जिद बनवाने का श्रेय सुल्तान महमूद शाह की रानी बीबी राजी को जाता है। लाल पत्थर के दरवाजे से बने होने के कारण इसे लाल दरवाजा मस्जिद कहा जाता है। इसी मस्जिद परिसर में जौनपुर का सबसे पुराना मदरसा है जहाँ शेरशाह सूरी ने शिक्षा ग्रहण की थी।
➣ जामा मस्जिद 1470 ई. में हुसैन शाह ने इसे बनवाया। यह बड़े पैमाने पर अटाला मस्जिद की विशेषताओं से प्रभावित है और पूरी वास्तुकला 16-20 फीट ऊँचे चबूतरे पर खड़ी है, जिस तक भव्य सीढ़ियों से पहुँचा जा सकता है। इस मस्जिद में 370 लकड़ी के स्तम्भ छत को सहारा देते हैं।
➣ 1479 ई. में दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने जौनपुर को जीत लिया। सिकन्दर लोदी ने जौनपुर की अधिकांश इमारतों को नष्ट करवा दिया, केवल पाँच मस्जिदें ही बच सकीं – अटाला, जामा, लाल दरवाजा, झंझोरी और खालिस मुखलिस मस्जिद।
| इमारत / स्थल | शासक / निर्माता | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|---|
| अटाला मस्जिदमंदिर स्थल | इब्राहीम शाह शर्की (पूर्ण) | जौनपुर | पूर्व में अटाला देवी का मंदिर था। हिन्दू अवशेषों पर निर्मित; हिन्दू-इस्लामी शैली का उत्कृष्ट समन्वय। मीनारों का अभाव। |
| झंझोरी मस्जिद | इब्राहीम शाह शर्की | जौनपुर | हिन्दू इमारतों के अवशेषों पर निर्मित; जौनपुर शैली की विशिष्ट रचना। बेगमपुरी मस्जिद (दिल्ली) से प्रभावित। |
| फोर्ट मस्जिद | शर्की सुल्तान | जौनपुर | किले के भीतर स्थित; हिन्दू-इस्लामी शैली का मिश्रण। मीनारों का अभाव जौनपुर शैली की खास पहचान। |
| जामी मस्जिद (जौनपुर) | हुसैन शाह शर्की | जौनपुर | विशाल एवं भव्य मस्जिद; बेगमपुरी मस्जिद (मुहम्मद बिन तुगलक, दिल्ली) की रचना शैली से प्रेरित। |
| लाल दरवाजा मस्जिद | हुसैन शाह शर्की | जौनपुर | लाल पत्थर से निर्मित प्रवेश द्वार के कारण ‘लाल दरवाजा’ नाम पड़ा। जौनपुर शैली की प्रमुख इमारत। |
| बेगमपुरी मस्जिदप्रेरणास्रोत | मुहम्मद बिन तुगलक | दिल्ली | जौनपुर की समस्त मस्जिदों की स्थापत्य शैली का मुख्य प्रेरणास्रोत। जौनपुर की रचना पद्धति इसी से अत्यधिक प्रभावित है। |
| जहाज महलसर्वश्रेष्ठ | सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी | मांडू | मांडू की सर्वश्रेष्ठ इमारत। दो तालाबों के बीच स्थित होने से जहाज जैसी दिखती है। दो मंजिला विशाल महल। |
| हिंडोला महल | हुशंग शाह | मांडू | झूले जैसी झुकी हुई दीवारों के कारण ‘हिंडोला’ (झूला) नाम। दरबार हॉल के रूप में प्रयुक्त। |
| आजी मस्जिद | हुशंग शाह | मांडू | मांडू की प्रमुख मस्जिदों में से एक; मालवा सल्तनत की स्थापत्य शैली का प्रतिनिधित्व। |
| मांडू का किला (दिल्ली दरवाजा) |
हुशंग शाह | मांडू | विशाल किला परिसर। मुख्य प्रवेश द्वार ‘दिल्ली दरवाजा’ के नाम से प्रसिद्ध। रणनीतिक पहाड़ी स्थल पर निर्मित। |
| हुशंग शाह का मकबरा | महमूद खिलजी प्रथम | मांडू | हुशंग शाह की स्मृति में निर्मित। भारत के प्रारंभिक संगमरमर मकबरों में से एक; मुगल स्थापत्य पर गहरा प्रभाव। ताज महल के निर्माण से पूर्व मुगल वास्तुकारों ने इसका अध्ययन किया था। |
दक्कन स्थापत्य कला
➣ दक्कन के बहमनी शासकों ने फारसी स्थापत्य कला के तत्त्वों को शामिल किया है, लेकिन स्थानीय शैलियों को भी अपनाया। इसकी विशेषताओं में ऊँची मीनारें, मज़बूत मेहराब, बड़े गुम्बद और विशाल प्रांगण शामिल हैं।
➣ दक्कन स्थापत्य की मुख्य विशेषताएँ: दक्कन की स्थापत्य कला में फारसी-इस्लामी रूपों का स्थानीय हिन्दू और क्षेत्रीय परम्पराओं से अनूठा समन्वय हुआ। इसमें भव्य गुम्बद, मीनारें, जटिल टाइलकारी और बेसाल्ट पत्थर का प्रयोग इसकी विशिष्टता है।
➣ दक्कन स्थापत्य की अन्य प्रमुख विशेषताएँ हैं – पंखुड़ीनुमा आधार पर बल्बनुमा गुम्बद, पतली मीनारें, बड़े मेहराब, बालकनियाँ, अनेक बुर्ज, छत्रियाँ और रंगीन टाइलों के जटिल पैटर्न। दीवारों पर कमल, शृंखला और लटकन जैसे हिन्दू अलंकरण भी मिलते हैं।
➣ बहमनी शासन का विभाजन (पाँच दक्कन सल्तनतें): 1526 तक बहमनी साम्राज्य पाँच स्वतंत्र सल्तनतों में विभक्त हो गया – अहमदनगर, बीजापुर, बरार, गोलकुण्डा और बीदर। इन्हें सामूहिक रूप से दक्कन सल्तनत कहा जाता है। प्रत्येक ने अपनी अलग स्थापत्य पहचान विकसित की।
➣ गुलबर्गा – बहमनी स्थापत्य का प्रथम केन्द्र: गुलबर्गा में बहमनी काल की जामा मस्जिद और हफ्त गुम्बज (सात गुम्बद) प्रमुख इमारतें हैं। गुलबर्गा के किले में स्थित जामा मस्जिद इस काल का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है – इसमें पूरी छत को लगभग 75 छोटे-छोटे गुम्बदों से ढका गया है जो इसे भारत में अनूठी बनाती है।
➣ बीदर में महमूद गवाँ का मदरसा बहमनी स्थापत्य की उत्कृष्ट कृति है। महमूद गवाँ बहमनी सुल्तान मुहम्मद तृतीय का शक्तिशाली वजीर था।
➣ यह मदरसा ईरानी वास्तुकला से प्रेरित है जिसमें तीन मंजिला इमारत, रंगीन टाइल का काम और केन्द्रीय प्रांगण उल्लेखनीय हैं। बीदर का रंगीन महल भी उल्लेखनीय है।
➣ क़ुतुब शाही वंश के पाँचवें शासक मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह ने 1591 ई. में गोलकुण्डा से अपनी राजधानी स्थानान्तरित कर नवनिर्मित नगर हैदराबाद की स्थापना की और इसके ऐतिहासिक केन्द्र के रूप में चार मीनार (1591 ई.) का निर्माण करवाया।
➣ चार मीनार का निर्माण हैदराबाद की नींव और इस्लामी दूसरी सहस्राब्दी (1000 हिजरी) के उपलक्ष्य में किया गया था।
➣ चार मीनार एक वर्गाकार स्मारक है जिसके प्रत्येक पार्श्व में एक विशाल मेहराब है और प्रत्येक कोने पर लगभग 56 मीटर ऊँची एक भव्य मीनार है।
➣ प्रत्येक मीनार बल्बनुमा गुम्बद से सुसज्जित है और इसमें दोहरी बालकनी है। चार मीनार के शीर्ष पर मस्जिद भी है जो 434 से अधिक वर्षों से उपयोग में है। चार मीनार की स्थापत्य शैली शिया ताजियों से प्रेरित मानी जाती है।
➣ बीजापुर सल्तनत – आदिलशाही वंश की स्थापत्य कला: बीजापुर की आदिलशाही सल्तनत में जामा मस्जिद, इब्राहिम रौजा और गोल गुम्बज – तीन अत्यन्त भव्य इमारतें बनीं।
➣ जामा मस्जिद का निर्माण आदिल शाह प्रथम (अली आदिल शाह प्रथम) के शासनकाल (1558-1580 ई.) में हुआ। यह मस्जिद अधूरी रह गई। इसके प्रार्थना कक्ष के ऊपर एक बड़ा केन्द्रीय गोलार्धीय गुम्बद है जिसके आधार पर पंखुड़ियाँ हैं और शिखर पर अर्धचन्द्र है। बाद में औरंगजेब ने इस मस्जिद में एक प्रवेश द्वार जुड़वाया।
➣ इब्राहिम रौजा का निर्माण इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय (1580-1627 ई.) ने करवाया। इसमें उसका मकबरा और एक मस्जिद एक ऊँचे साझे चबूतरे पर आमने-सामने बने हैं।
➣ मकबरे में घुमावदार छत व ऊपर गुम्बद है। मस्जिद के कोनों पर पतली मीनारें हैं और पाँच प्रवेश मेहराब हैं। इसकी महीन कारीगरी के कारण इसे दक्कन का ताज भी कहा जाता है।
➣ गोल गुम्बज, बीजापुर भारत का सबसे विशाल गुम्बद है। इसका निर्माण 1626 ई. में प्रारंभ हुआ और इसे पूर्ण होने में 30 वर्ष लगे। यह आदिलशाही वंश के सातवें शासक मुहम्मद आदिल शाह द्वितीय का मकबरा है।
➣ इसके गुम्बद का आंतरिक व्यास 124 फीट (लगभग 38 मीटर) है और यह बिना किसी केन्द्रीय आधार-स्तंभ के खड़ा है – रोम की सेंट पीटर्स बेसिलिका के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा अनुत्थित गुम्बद।
➣ गोल गुम्बज के आधार पर छठी मंजिल पर एक गोलाकार व्हिस्परिंग गैलरी (फुसफुसाहट दीर्घा) है जो अपने असाधारण ध्वनि प्रसार गुणों के लिए प्रसिद्ध है – इसमें ध्वनि 10 से 12 गुना तक प्रतिध्वनित होती है।
➣ चारों कोनों पर सात मंजिला अष्टभुजाकार मीनारें हैं जिनके भीतर घुमावदार सीढ़ियाँ हैं। गुम्बद की बाहरी दीवारों पर कमल, वृक्ष-शाखाएँ, पत्तियाँ और ज्यामितीय पैटर्न के सुन्दर प्लास्टर कार्य हैं।
➣ मकबरे के भीतर एक ऊँचे चबूतरे पर मुहम्मद आदिल शाह, उनकी पत्नियों, प्रिय दासी रम्भा, पुत्री और पौत्र के शवागार रखे हुए हैं।
➣ गोलकुण्डा दुर्ग: गोलकुण्डा क़ुतुब शाही वंश की प्रारम्भिक राजधानी थी। यह एक सुदृढ़ गढ़ है जिसमें सैन्य ढाँचे, प्राचीर, दरवाजे, बुर्ज, मस्जिदें, महल और जल-प्रणालियाँ (नहरें, फव्वारे और उद्यान) सम्मिलित हैं। गोलकुण्डा में एक अत्यन्त कुशल जल-आपूर्ति प्रणाली भी थी जिसमें मिट्टी के पाइप, जलाशय और पर्शियन चक्र शामिल थे।
➣ गोलकुण्डा के क़ुतुब शाही शासकों के मकबरे गोलकुण्डा के बाहर एक विशाल बाग में स्थित हैं। इन मकबरों की साझी विशेषताएँ हैं – वर्गाकार आधार पर प्याज के आकार का गुम्बद, समृद्ध अलंकरण सहित स्तम्भावली और फूलदार अभिप्रायों वाली छोटी मीनारें।
➣ दक्कन की इंडो-इस्लामिक विशेषताओं ने मुगल और परवर्ती सल्तनत वास्तुकला को प्रभावित किया। दक्कन की पाँचों सल्तनतों ने मिलकर 1565 ई. में विजयनगर साम्राज्य को पराजित किया (तालिकोटा का युद्ध) और 1687 ई. में औरंगजेब द्वारा विजय तक ये फलती-फूलती रहीं।
| इमारत / स्थल | शासक / निर्माता | राज्य | काल (ई.) | विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| — बहमनी सल्तनत — | ||||
| जामा मस्जिद, गुलबर्गा (सर्वश्रेष्ठ) | अलाउद्दीन बहमनशाह | बहमनी | 14वीं शदी | बहमनी सल्तनत की प्रमुख मस्जिद। फारसी वास्तुशिल्प का स्पष्ट प्रभाव; शिया परंपरा के अनुरूप रचना। |
| महमूद गवाँ का मदरसा | महमूद गवाँ (प्रधानमंत्री) | बहमनी | 1472 ई. | बीदर में स्थित; फारसी-इस्लामी शैली का उत्कृष्ट उदाहरण। तीन मंजिला इमारत, रंगीन टाइलों की नक्काशी। |
| — गोलकुण्डा सल्तनत (कुतुबशाही) — | ||||
| चार मीनार (विश्वप्रसिद्ध) | कुली कुतुबशाह | गोलकुण्डा | 1591 ई. | चार भव्य मीनारों पर टिकी हैदराबाद की पहचान। चार मेहराब, चार दिशाएँ। ऊपर एक मस्जिद भी। फारसी व दक्कनी शैली का अनुपम संगम। |
| — बीजापुर सल्तनत (आदिलशाही) — | ||||
| जामा मस्जिद, बीजापुर | आदिलशाह प्रथम | बीजापुर | 16वीं शदी | बीजापुर स्थापत्य का सर्वोत्तम नमूना। विशाल प्रांगण, सुंदर मेहराब एवं गुम्बद। फारसी व दक्कनी शैली। |
| इब्राहिम रौजा | इब्राहिम आदिल शाह प्रथम | बीजापुर | 16–17वीं शदी | मकबरा एवं मस्जिद का युगल परिसर। बारीक पत्थर नक्काशी व फूलदार अलंकरण। कुछ इतिहासकार इसे ‘दक्कन का ताज’ कहते हैं। |
| गोल गुम्बज (भारत का सबसे बड़ा गुम्बद) | मुहम्मद आदिल शाह द्वितीय | बीजापुर | 1656 ई. | भारत का सबसे विशाल गुम्बद; विश्व के दूसरे सबसे बड़े गुम्बदों में। ‘व्हिस्परिंग गैलरी’ के लिए प्रसिद्ध — एक कोने की फुसफुसाहट दूसरे कोने तक सुनाई देती है। |
| — बीदर सल्तनत (बरीदशाही) — | ||||
| बीदर का किला | बहमनी / बरीदशाही सुल्तान | बीदर | 14–16वीं शदी | बहमनी राज्य की राजधानी बीदर में स्थित विशाल किला। फारसी एवं दक्कनी स्थापत्य शैली का उदाहरण। |
मालवा स्थापत्य कला
➣ मालवा स्थापत्य शैली की महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं – नुकीले मेहराब, ढालदार दीवारें, मेहराबों में लिन्टेल व तोड़ों का प्रयोग (तुगलक परम्परा), गुम्बद और पिरामिडनुमा आकार की छत तथा ऊँची चौकियों पर निर्मित इमारतें व उनके प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए बनाई गई सीढ़ियाँ। साथ ही हिन्दू कारीगरों के प्रभाव से कमल, हिन्दू स्तम्भ और ब्रैकेट जैसे अलंकरण भी खूब मिलते हैं।
मालवा की पहली राजधानी धार में हिन्दू-जैन मंदिरों के अवशेषों से दो मस्जिदें बनाई गईं। दिलावर खाँ मस्जिद, जो माण्डू की सबसे प्रारम्भिक इण्डो-इस्लामी इमारत है, में केन्द्रीय प्रांगण, चारों ओर स्तम्भावली और पश्चिम में मिहराब है। प्रार्थना कक्ष की छत हिन्दू शैली में है और इसकी स्थापत्य कला पर हिन्दू शिल्पकारों का स्पष्ट प्रभाव है।
➣ हुशंगशाह का मकबरा (1440 ई.) – भारत की प्रथम संगमरमर की इमारत: हुशंगशाह का मकबरा माण्डू में जामी मस्जिद के पश्चिम में स्थित है। इसका निर्माण हुशंगशाह ने स्वयं आरम्भ करवाया और महमूद खिलजी ने 1440 ई. में पूर्ण कराया।
यह पूर्णतः श्वेत संगमरमर से निर्मित है तथा भारत का पहला संगमरमरी मकबरा है। इस मकबरे के गुम्बद के शिखर पर एक अर्धचन्द्र है जो मेसोपोटामिया या फारस से मँगवाया गया माना जाता है।
इसके चारों कोनों पर शंक्वाकार बुर्ज हैं। संगमरमर के आधार-चबूतरे पर हिन्दू शिल्पकारों द्वारा उत्कीर्ण अलंकरण स्पष्ट दिखाई देते हैं।
➣ ताज महल के निर्माण से पूर्व शाहजहाँ ने अपने प्रमुख वास्तुकार उस्ताद हामिद और उनकी टीम को हुशंगशाह के मकबरे की वास्तुकला और जटिलताओं का अध्ययन करने के लिए माण्डू भेजा था। अनेक इतिहासकार इसे ताज महल का अग्रदूत मानते हैं।
➣ जामी मस्जिद (1454 ई.) का निर्माण हुशंगशाह ने आरम्भ करवाया और महमूद खिलजी ने 1454 ई. में पूर्ण कराया। यह 97.4 वर्गमीटर क्षेत्रफल की विशाल इमारत है जिसके प्रांगण में 30 सीढ़ियाँ चढ़कर पहुँचा जाता है।
इसके मुखभाग में मेहराबदार बरामदा है और आंतरिक हॉल में जाली-स्क्रीन लगे हैं। माण्डू के किले की सर्वाधिक आकर्षक इमारत जामी मस्जिद और अशरफी महल हैं।
➣ मालवा शैली की वास्तुकला वाले हिण्डोला महल (लगभग 1425 ई.) की बाहरी दीवारें 77 डिग्री के कोण पर झुकी हुई हैं, जिसके कारण इसे हिण्डोला महल (झूलती जगह) कहा जाता है।
यह T आकार की योजना पर निर्मित है – मुख्य हॉल और एक अनुप्रस्थ प्रक्षेपण है। हॉल के दोनों पार्श्वों में छः-छः मेहराबदार द्वार हैं और इसकी पार्श्व-दीवारें विशाल ढलुवाँ बट्टों से दृढ़ की गई हैं। इसका उपयोग दरबार हाल के रूप में होता था।
➣ जहाज महल (15वीं शती) गयासुद्दीन खिलजी के समय में निर्मित है और कपूर तालाब और मुंज तालाब के मध्य स्थित है। तालाब के जल में यह महल जहाज की तरह दिखाई देता है।
यह जहाज महल अपनी मेहराबी दीवारों, छाये हुए मण्डपों एवं सुन्दर तालाबों के कारण माण्डू की सुन्दर इमारतों में स्थान रखता है। इस महल की लम्बाई लगभग 110 मीटर और चौड़ाई लगभग 15 मीटर है। इसमें मेहराबदार खिड़कियाँ, जालीदार दीवारें, गुम्बदनुमा छतें और छतरियाँ हैं।
➣ इतिहासकार डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने इन इमारतों की प्रशंसा में लिखा है – माण्डू के हिण्डोला महल और जहाज महल मध्ययुगीन भारतीय वास्तुकला के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। इनमें इस्लामी प्रभावजन्य संरचनात्मक भव्यता तथा हिन्दू अलंकरण की सुन्दरता, परिष्कृति और सूक्ष्मता का विवेकपूर्ण समन्वय है।
➣ हुशंगशाह ने अशरफी महल का निर्माण करवाया जो एक केन्द्रीय प्रांगण और चारों ओर कोठरियों वाला मदरसा था। इसके समीप महमूद खिलजी ने विजयनगर पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में सात मंजिला विजय स्तम्भ बनवाया था, जो कालान्तर में नष्ट हो गया।
➣ रानी रूपमती हिन्दू गायिका थीं जिन पर मालवा के अफगान सुल्तान बाज बहादुर (1556-1562 ई.) आकर्षित हो गए थे।
रानी रूपमती नर्मदा नदी के दर्शन के उपरांत ही भोजन ग्रहण करती थीं, इसलिए उनके लिए एक ऐसा महल बनवाया गया जहाँ से नर्मदा के दर्शन हो सकें। उनकी प्रेम कहानी भारतीय साहित्य और लोककथाओं में अमर है।
| इमारत / स्थल | शासक / निर्माता | विशेषता |
|---|---|---|
| — धार (पुरानी राजधानी) — | ||
| धार की मस्जिदें (दो) | मालवा सुल्तान | पुराने हिन्दू भवनों के अवशेषों से निर्मित। गुम्बद एवं स्तम्भ हिन्दू ढंग के — हिन्दू-इस्लामी शैली का प्रत्यक्ष उदाहरण। |
| — मांडू (राजधानी, हौशंगशाही काल) — | ||
| जामी मस्जिद, मांडू | हुशंगशाह | मांडू की प्रमुख मस्जिद। विशाल प्रांगण एवं भव्य गुम्बद; इस्लामी शैली का उत्कृष्ट नमूना। |
| हुशंगशाह का मकबरा (प्रथम संगमरमर) | हुशंगशाह / महमूद खिलजी | भारत की प्रथम पूर्णतः संगमरमर से बनी इमारत। मुगल स्थापत्य पर गहरा प्रभाव — ताज महल के निर्माण से पूर्व शाहजहाँ के वास्तुकारों ने इसका अध्ययन किया था। |
| हिंडोला महल | हुशंगशाह | झुकी हुई दीवारों के कारण ‘झूला महल’ नाम। दरबार हॉल के रूप में प्रयुक्त; दक्कन-मालवा शैली का सुंदर नमूना। |
| जहाज महल (सर्वश्रेष्ठ) | सुल्तान महमूद प्रथम (गयासुद्दीन) | मांडू की सर्वश्रेष्ठ इमारत। दो तालाबों के बीच स्थित होने से जहाज जैसी आकृति। दो मंजिला विशाल महल-परिसर। |
| मांडू का किला | हुशंगशाह / महमूद खिलजी | विशाल किला परिसर; प्रवेश द्वार ‘दिल्ली दरवाजा’। प्राकृतिक पहाड़ी पर रणनीतिक स्थिति। |
| विजय स्तम्भ (सात मंजिला) | महमूद खिलजी | सात मंजिलों वाला विजय स्तम्भ; युद्ध-विजय के उपलक्ष्य में निर्मित। मालवा सल्तनत की शक्ति का प्रतीक। |
| बाजबहादुर का महल | बाजबहादुर (अंतिम मालवा सुल्तान) | मालवा के अंतिम सुल्तान का महल। रानी रूपमती से प्रेम-कथा के लिए ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध। |
| रानी रूपमती का महल | बाजबहादुर / रूपमती | ऊँची पहाड़ी पर स्थित; नर्मदा नदी का मनोरम दृश्य। बाजबहादुर-रूपमती की प्रेमकथा का ऐतिहासिक साक्षी। |
| — गुजरात (महमूद बेगड़ा) — [मालवा से संबद्ध उल्लेख] | ||
| जामा मस्जिद, चंपानेर | महमूद बेगड़ा | गुजरात-मालवा सीमांत क्षेत्र में निर्मित; पाँच गुम्बद, विशाल मीनारें, पत्थर की बारीक नक्काशी। UNESCO विश्व धरोहर। |
| जामा मस्जिद, जूनागढ़ | महमूद बेगड़ा | गुजरात शैली की मस्जिद; पतले मीनार एवं उत्कृष्ट पत्थर नक्काशी। |
कश्मीर स्थापत्य कला
➣ कश्मीर की स्थापत्य कला अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक मिश्रण के कारण एक अनूठी शैली विकसित हुई जिसमें हिन्दू, बौद्ध और इस्लामिक स्थापत्य परम्पराओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
➣ कश्मीर की स्थापत्य कला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता लकड़ी का प्रमुख निर्माण सामग्री के रूप में उपयोग है।
कश्मीर की स्थापत्य कला की सबसे उल्लेखनीय विशेषता लकड़ी है, जो यहाँ की प्रमुख निर्माण सामग्री रही है। केवल पत्थर मस्जिद और हरि पर्वत की मस्जिद ही पूरी तरह पत्थर से निर्मित हैं, जो मुगल शैली के प्रभाव को दर्शाती हैं।
➣ कश्मीर की अधिकांश मस्जिदों एवं दरगाहों की संरचना एक निम्न, चतुर्भुजाकार कक्ष के रूप में होती है, जिसे पिरामिडनुमा छत से ढका जाता है और एक नुकीली शिखर से सुशोभित किया जाता है।
बड़ी मस्जिदों में एक अतिरिक्त तत्व माजिना होता है – एक खुला वर्गाकार मंडप जहाँ से मुअज्जिन अजान देता था।
➣ खानकाह-ए-मौला / शाह हमदान मस्जिद – कश्मीर की सभी मस्जिदों में मुकुट का नगीना समझी जाती है।
झेलम नदी के दाहिने तट पर फतेह कदल और जैना कदल पुलों के बीच स्थित यह मस्जिद 1395 ई. में सुल्तान सिकंदर द्वारा सूफी संत मीर सैयद अली हमदानी की स्मृति में निर्मित करवाई गई थी। यह कश्मीर घाटी की पहली खानकाह (सूफी संतों से सम्बद्ध मस्जिद) मानी जाती है।
➣ शाह हमदान मस्जिद स्वदेशी काष्ठ स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है जो बौद्ध, हिन्दू और इस्लामिक स्थापत्य से प्रेरणा लेती है।
प्रार्थना कक्ष के मध्य में लगभग 23 फीट (7 मीटर) ऊँचे चार ठोस लकड़ी के स्तंभ हैं जो छत को सहारा देते हैं। इनके शाफ्ट पर मत्स्य-अस्थि पैटर्न में रंगीन लकड़ी के टुकड़े सजाए गए हैं, आधार पर कमल की नक्काशी है और 16 भुजाओं वाले शीर्ष पर पत्ती के प्रतिरूप बने हैं।
➣ मस्जिद में अंदर से प्राचीन धार्मिक उपदेश और ऐतिहासिक शिलालेख उकेरे गए हैं, और भवन पर भव्य रूप से नक्काशीयुक्त छत एवं लटकती घंटियाँ लगी हैं। इसकी दीवारें पपीयर-माशे के सुंदर कार्य से सुसज्जित हैं।
➣ 1480 ई. में इस मस्जिद को आग से नष्ट कर दिया गया जिसके बाद सुल्तान हसन शाह ने इसका विस्तार कर पुनर्निर्माण कराया। 1731 ई. में पुनः आग लगने पर मुगल गवर्नर अबुल बरकत खान ने इसे दोबारा बनवाया। इस प्रकार यह मस्जिद तीन बार नष्ट होकर पुनर्निर्मित हो चुकी है।
➣ जामिया मस्जिद, श्रीनगर 1402 ई. में सुल्तान सिकंदर द्वारा निर्मित इस मस्जिद में एक समय में 30,000 से अधिक लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं। इस मस्जिद में 370 लकड़ी के स्तंभ छत को थामे हुए हैं और इसकी शिखरनुमा मीनारें मध्य एशियाई और स्थानीय निर्माण शैली के मिश्रण की परिचायक हैं। यह मस्जिद भी 1479, 1620 (जहाँगीर के काल में) और 1674 (औरंगजेब के काल में) तीन बार पुनर्निर्मित हो चुकी है।
➣ कश्मीर की पारम्परिक निर्माण प्रणाली में धजी-देवारी (ईंट भरी लकड़ी की फ्रेम जो भूकम्परोधी होती है), तक प्रणाली (लकड़ी की कड़ियों से मजबूत की गई पत्थर की दीवारें) और खातमबंद छत (बिना कील के जोड़ी गई जटिल लकड़ी की छत) प्रमुख हैं।
➣ मुगल काल में कश्मीर में सुंदर बागों का निर्माण हुआ जैसे शालीमार बाग, निशात बाग और चश्मे शाही। ये बाग सोपानबद्ध विन्यास, मंडपों, जलमार्गों और अलंकरणों के कारण स्थानीय परिदृश्य के साथ सुंदर तालमेल बिठाते हैं।
➣ मीर सैयद अली हमदानी न केवल इस्लाम के प्रचारक थे, बल्कि उन्होंने कश्मीर में शॉल बुनाई, कालीन निर्माण और पपीयर-माशे जैसे कुटीर उद्योग भी आरंभ किए, जो आज भी कश्मीर की पहचान हैं।
| इमारत / स्थल | शासक / निर्माता | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|---|
| – कश्मीर सल्तनत – | |||
| शाह हमदान मस्जिद (मुकुट का नगीना) | सुल्तान कुतुबुद्दीन / शाह हमदान | श्रीनगर | झेलम नदी के किनारे स्थित; कश्मीर की समस्त मस्जिदों में सर्वश्रेष्ठ। लकड़ी की अत्यंत बारीक नक्काशी, पेपर-माशे अलंकरण। कश्मीरी शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण। |
| जामा मस्जिद, श्रीनगर | सुल्तान सिकंदर / जैनुल आबिदीन | श्रीनगर | देवदार के विशाल स्तम्भों पर टिकी विशाल मस्जिद। ईंट एवं लकड़ी की कश्मीरी स्थापत्य शैली का प्रमुख उदाहरण। |
| शाह हमदान की दरगाह (खानकाह) | सुल्तान कुतुबुद्दीन | श्रीनगर | 14वीं शताब्दी में निर्मित; सूफी संत अमीर-ए-कबीर शाह हमदान की स्मृति में। कश्मीरी लकड़ी-कला का दुर्लभ नमूना। |
| मार्तण्ड मंदिर (खंडहर) | ललितादित्य मुक्तापीड (हिन्दू) | अनंतनाग | 8वीं शती का प्राचीन सूर्य मंदिर; कश्मीर की हिन्दू स्थापत्य परंपरा का प्रतीक। सुल्तान सिकंदर द्वारा ध्वस्त। |
| जैनुल आबिदीन का मकबरा | जैनुल आबिदीन (बड़शाह) | श्रीनगर | कश्मीर के सबसे उदार सुल्तान का मकबरा। हिन्दू-मुस्लिम शैली का समन्वय; ईंट एवं टाइल-कार्य प्रसिद्ध। |
| – कश्मीर स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ – | |||
| लकड़ी की नक्काशी शैली | कश्मीरी कारीगर | समस्त कश्मीर | कश्मीर की अपनी अलग पहचान – देवदार की लकड़ी पर उत्कृष्ट नक्काशी। मस्जिदों, खानकाहों में लकड़ी के छज्जे, कलशनुमा शिखर एवं पेपर-माशे सज्जा। |
| हिन्दू-मुस्लिम शैली समन्वय | – | कश्मीर | अधिकांश इमारतें हिन्दू भवनों के अवशेषों पर निर्मित। इसलिए स्तम्भ, गुम्बद एवं अलंकरण में हिन्दू-मुस्लिम शैली का अच्छा सम्मिश्रण है। |
मेवाड़ स्थापत्य कला
➣ कुम्भा के काल को स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।
वीर विनोद के लेखक श्यामलदास के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्ग महाराणा कुम्भा ने बनवाए, इसीलिए उन्हें राजस्थानी स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है। इनमें कुम्भलगढ़ (राजसमन्द), अचलगढ़ (सिरोही), बसन्तगढ़ (सिरोही), बैराठ (भीलवाड़ा) और भोमट दुर्ग (बाड़मेर) प्रमुख हैं।
➣ कुम्भलगढ़ दुर्ग (1448-58 ई.) राजसमन्द जिले में अरावली की पहाड़ियों पर स्थित है। यह चित्तौड़गढ़ के बाद राजस्थान का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण दुर्ग है। इसके मुख्य शिल्पी मण्डन थे जिन्होंने अपनी शैली को राजवल्लभ ग्रंथ में लिपिबद्ध किया।
इस दुर्ग में सबसे ऊँचाई पर बना लघु दुर्ग कटारगढ़ को मेवाड़ की आँख कहा जाता है जो कुम्भा का निवास था। अबुल फज़ल के अनुसार यह दुर्ग इतनी बुलन्दी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।
➣ कुम्भलगढ़ की दीवार विश्व की दूसरी सबसे लम्बी दीवार है। 1,100 मीटर (लगभग 3,600 फीट) की ऊँचाई पर निर्मित कुम्भलगढ़ की परिधि दीवार 36 किलोमीटर लम्बी है जो चीन की दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लम्बी दीवार है।
इस दीवार की चौड़ाई 15 से 25 फीट तक है – इतनी चौड़ी कि आठ घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं। दीवार में मज़बूत बुर्ज और तीरंदाजों के लिए विशेष झरोखे बनाए गए हैं। दुर्ग में सात सुदृढ़ प्रवेश द्वार (पोल) हैं – ओरठपोल, हल्लापोल, हनुमानपोल, विजयपोल व रामपोल प्रमुख हैं।
➣ कुम्भलगढ़ दुर्ग की चारदीवारी के भीतर 360 से अधिक मन्दिर हैं जिनमें से लगभग 300 प्राचीन जैन मन्दिर और शेष हिन्दू मन्दिर हैं। 2013 में इसे राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों के अंतर्गत UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। यह दुर्ग महाराणा प्रताप का जन्मस्थान भी है।
➣ रणकपुर का जैन मन्दिर (चतुर्मुख धरणविहार): राणा कुम्भा के संरक्षण में जैन व्यापारी धरणक शाह (धन्ना शाह) ने 15वीं शती में एक दिव्य स्वप्न – नलिनी-गुल्म विमान (आकाशगामी रथ) – के आधार पर इस मन्दिर का निर्माण आरम्भ करवाया। मन्दिर का मुख्य शिल्पी दीपा (देपा) था। इसका नाम राणा कुम्भा के नाम पर रणकपुर पड़ा।
➣ रणकपुर मन्दिर माउ-गुर्जर स्थापत्य शैली में श्वेत संगमरमर से निर्मित है और 48,000 वर्गफुट में फैला है। इसमें 1444 संगमरमर के स्तम्भ हैं जिनमें से कोई भी दो एक जैसे नहीं हैं, 29 परस्पर जुड़े हॉल और 80 गुम्बद हैं।
इसे चौमुखा मन्दिर कहा जाता है क्योंकि इसमें चार दिशाओं में प्रवेश द्वार हैं और अदिनाथ की 6 फुट ऊँची चतुर्मुखी प्रतिमा चारों दिशाओं में मुख किए हुए है। मन्दिर में 84 भूमिगत कक्ष (भोंयरा) भी हैं जो मुगल आक्रमण के समय मूर्तियों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए थे।
➣ राणा कुम्भा ने मालवा के शासक हुशंगशाह को परास्त करने के उपलक्ष्य में 1448 ई. में चित्तौड़ में कीर्तिस्तम्भ की स्थापना की थी।
यह नौ मंजिला विजय-स्तम्भ है जो विष्णु को समर्पित है और इसके प्रत्येक तल पर हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश भी कहा जाता है।
➣ राणा कुम्भा ने चित्तौड़गढ़ के किले में कुम्भश्याम का मन्दिर बनवाया जिसे बाद में मीरा मन्दिर के नाम से जाना गया – क्योंकि भक्त कवयित्री मीराबाई ने इसी मन्दिर में भगवान कृष्ण की उपासना की थी। यह इंडो-आर्यन शैली में निर्मित है।
➣ शृंगार चंवरी मन्दिर: चित्तौड़गढ़ किले में स्थित यह जैन मन्दिर कुम्भा काल की बारीक नक्काशी और शिल्पकारी का उत्कृष्ट नमूना है। इसे शान्तिनाथ जैन मन्दिर भी कहा जाता है।
➣ कुम्भा ने बदनौर (भीलवाड़ा) में कुशालमाता का मन्दिर और कैलाशपुरी का विष्णु मन्दिर भी बनवाया। इनके अतिरिक्त अचलगढ़ (सिरोही) में अचलेश्वर महादेव मन्दिर का जीर्णोद्धार भी कुम्भा ने करवाया।
➣ चित्तौड़ के किले में रानी पद्मिनी का महल जलाशय के मध्य स्थित है जो राजपूत स्थापत्य की अनूठी मिसाल है। जयमल और फत्ता की हवेलियाँ 1568 ई. में अकबर के आक्रमण के विरुद्ध वीरगति पाने वाले दोनों वीरों की स्मृति से जुड़ी हैं।
➣ राणा कुम्भा केवल शिल्पप्रेमी ही नहीं, अपितु एक विद्वान भी थे। उन्होंने संगीत राज, संगीत मीमांसा, सूड प्रबन्ध और चण्डी शतक जैसे ग्रंथों की रचना की। उनके दरबार में मण्डन, नाथा, कुम्भा जैसे प्रख्यात शिल्पाचार्यों ने वास्तुशास्त्र के ग्रंथ भी लिखे।
| इमारत / स्थल | शासक / निर्माता | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|---|
| — दुर्ग / किले — | |||
| कुम्भलगढ़ दुर्ग (मेवाड़ की आँख) | राणा कुम्भा | राजसमंद | 1458 ई. में निर्मित। चित्तौड़ के बाद मेवाड़ का दूसरा सबसे बड़ा दुर्ग। चीन की दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लम्बी दीवार। 84 किलों में से 32 राणा कुम्भा द्वारा निर्मित। |
| चित्तौड़गढ़ का किला (सबसे बड़ा) | मेवाड़ के राणा | चित्तौड़गढ़ | मेवाड़ का सबसे बड़ा एवं सबसे प्रसिद्ध दुर्ग। रानी पद्मिनी का महल, जयमल-फत्ता की हवेली, कीर्तिस्तम्भ आदि अनेक ऐतिहासिक इमारतें इसी के भीतर हैं। |
| — मंदिर (राणा कुम्भा काल) — | |||
| रणकपुर का जैन मंदिर (UNESCO) | धरणक शाह (जैन व्यापारी) | रणकपुर, पाली | 1439 ई. में निर्मित। 1444 स्तम्भों वाला अद्वितीय मंदिर — कोई दो स्तम्भ एक समान नहीं। राणा कुम्भा के समय में निर्मित; सफेद संगमरमर की अप्रतिम नक्काशी। |
| कुम्भश्याम मंदिर (मीरा मंदिर) | राणा कुम्भा | चित्तौड़गढ़ | चित्तौड़गढ़ किले के भीतर स्थित। भगवान विष्णु को समर्पित; मीराबाई से जुड़ाव के कारण ‘मीरा मंदिर’ नाम से भी प्रसिद्ध। |
| शृंगार चंवरी मंदिर | राणा कुम्भा काल | चित्तौड़गढ़ | चित्तौड़गढ़ किले के भीतर स्थित जैन मंदिर। बारीक पत्थर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध। |
| कुशाल माता का मंदिर | राणा कुम्भा | बदनौर, भीलवाड़ा | देवी कुशाल माता को समर्पित; राजपूत मंदिर स्थापत्य का उदाहरण। |
| विष्णु मंदिर, कैलाश पुरी | राणा कुम्भा | कैलाश पुरी | भगवान विष्णु को समर्पित; राणा कुम्भा की धार्मिक निर्माण परंपरा का हिस्सा। |
| — स्तम्भ व महल (चित्तौड़गढ़ किला परिसर) — | |||
| कीर्तिस्तम्भ (विजय स्तम्भ) | राणा कुम्भा | चित्तौड़गढ़ | मालवा और गुजरात पर विजय के उपलक्ष्य में निर्मित। नौ मंजिला भव्य स्तम्भ; हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों से अलंकृत। ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’ कहा जाता है। |
| रानी पद्मिनी का महल | मेवाड़ के राणा | चित्तौड़गढ़ | तालाब के मध्य स्थित तीन मंजिला महल। रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी की ऐतिहासिक घटना से जुड़ा। |
| जयमल व फत्ता की हवेली | मेवाड़ के सामंत | चित्तौड़गढ़ | 1568 ई. के अकबर के आक्रमण में वीरगति पाने वाले दो राजपूत वीरों की स्मृति में। राजपूत हवेली स्थापत्य का उदाहरण। |
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