खेड़ा सत्याग्रह : परिचय
➣ खेड़ा सत्याग्रह (1918) गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों द्वारा भूमि-राजस्व में राहत की मांग को लेकर चलाया गया एक महत्वपूर्ण किसान आंदोलन था।
➣ इसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया और इसमें वल्लभभाई पटेल तथा गुजरात के कई स्थानीय कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ आंदोलन का मुख्य प्रश्न यह था कि खराब फसल के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब होने के बावजूद उनसे पूरा भूमि-राजस्व क्यों वसूला जाए।
पृष्ठभूमि
➣ खेड़ा सत्याग्रह की पृष्ठभूमि 1917–18 के दौरान बनी। इस समय खेड़ा जिले में फसल को भारी नुकसान हुआ। खराब मौसम, फसल की कम पैदावार और प्लेग जैसी बीमारियों के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी बुरा प्रभाव पड़ा।
➣ किसानों की आय घट गई, लेकिन भूमि-राजस्व की मांग में पर्याप्त राहत नहीं दी गई। इससे किसानों के सामने आर्थिक संकट और गहरा हो गया।
फसल की खराब स्थिति और किसानों का संकट
➣ 1917–18 में खेड़ा क्षेत्र में फसल की पैदावार सामान्य से काफी कम रही। अनेक किसानों का कहना था कि उत्पादन इतना कम हुआ है कि वे सामान्य दर से भूमि-राजस्व देने की स्थिति में नहीं हैं।
➣ खेती पर निर्भर परिवारों के लिए यह समस्या केवल एक वर्ष की आय में कमी नहीं थी। उन्हें बीज, भोजन, पशुओं और अगले कृषि मौसम के खर्च की भी चिंता थी।
➣ इसी दौरान प्लेग ने भी ग्रामीण क्षेत्रों को प्रभावित किया। बीमारी के कारण लोगों को गाँव छोड़कर अन्य स्थानों पर जाना पड़ा और कृषि तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
➣ इस प्रकार खराब फसल और बीमारी दोनों ने किसानों की भुगतान क्षमता को कमजोर कर दिया।
राजस्व में राहत की मांग
➣ उस समय बंबई प्रेसीडेंसी के राजस्व नियमों में फसल की पैदावार बहुत कम होने पर भूमि-राजस्व में राहत या स्थगन देने का प्रावधान था।
➣ किसानों और उनके समर्थकों का तर्क था कि खेड़ा की वास्तविक फसल स्थिति ऐसी थी कि उन्हें उस वर्ष राजस्व में राहत मिलनी चाहिए।
➣ किसानों की मांग यह नहीं थी कि वे स्थायी रूप से भूमि-राजस्व समाप्त करना चाहते हैं। उनकी मुख्य मांग थी कि जिस वर्ष फसल बहुत कम हुई है, उस वर्ष राजस्व वसूली को नियमों के अनुसार रोका या स्थगित किया जाए। यही प्रश्न आगे चलकर खेड़ा सत्याग्रह का मुख्य आधार बना।
स्थानीय स्तर पर शिकायतों की शुरुआत
➣ खराब फसल के कारण किसानों की कठिनाइयों की जानकारी स्थानीय नेताओं और सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को मिलने लगी।
➣ मोहनलाल पंड्या, शंकरलाल पारीख, नरहरि पारीख और अन्य स्थानीय कार्यकर्ताओं ने किसानों की स्थिति को समझने और उनकी शिकायतों को अधिकारियों तक पहुँचाने का प्रयास किया।
➣ गुजरात में किसानों की स्थिति पहले से ही सार्वजनिक चर्चा का विषय बन रही थी। गुजरात सभा किसानों की समस्याओं को सरकार के सामने रखने वाला एक महत्वपूर्ण मंच थी।
➣ खेड़ा की स्थिति सामने आने के बाद इसी मंच के माध्यम से राजस्व में राहत की मांग को अधिक संगठित रूप दिया गया।
➣ फरवरी 1918 तक यह प्रश्न इतना गंभीर हो गया कि महात्मा गांधी ने खेड़ा जिले की स्थिति पर ध्यान देना शुरू किया।
4 फरवरी 1918 को उन्होंने बंबई में व्यापारियों की एक सभा में खेड़ा के किसानों की कठिनाइयों का उल्लेख किया। इसके बाद उन्होंने बंबई सरकार के अधिकारियों और राजस्व विभाग के अधिकारियों से भी इस विषय पर बातचीत की।गांधी का हस्तक्षेप और स्थिति की जाँच
➣ 6 फरवरी 1918 को गांधी अहमदाबाद पहुँचे और खेड़ा की स्थिति से संबंधित कलेक्टर एवं मामलतदार द्वारा जारी नोटिसों का अध्ययन किया। अगले दिनों में उन्होंने अधिकारियों से लगातार बातचीत की और भूमि-राजस्व की वसूली को स्थगित करने की मांग रखी।
➣ 15 फरवरी 1918 को गांधी ने गुजरात सभा की कार्यकारिणी की बैठक की अध्यक्षता की और खेड़ा की स्थिति की जाँच पूरी होने तक भूमि-राजस्व की वसूली रोकने की मांग की। इसके बाद वे स्थानीय नेताओं के साथ खेड़ा जिले के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर किसानों की स्थिति समझने लगे।
➣ 16 फरवरी 1918 को गांधी ने गोकुलदास कहानदास पारेख और विठ्ठलभाई पटेल के साथ खेड़ा जिले की स्थिति का अध्ययन किया।
➣ इस दौरान उन्होंने स्थानीय किसानों और अधिकारियों से संबंधित जानकारी जुटाई। इससे उन्हें यह विश्वास हुआ कि किसानों की राजस्व संबंधी शिकायतों को गंभीरता से उठाने की आवश्यकता है।
➣ इस चरण में गांधी का प्रयास पहले सरकारी बातचीत और राजस्व वसूली को स्थगित कराने का था। लेकिन जब सरकार की ओर से किसानों को अपेक्षित राहत नहीं मिली, तब आंदोलन को सत्याग्रह के रूप में आगे बढ़ाने की स्थिति बनी।
सत्याग्रह का प्रारंभ(मार्च 1918)
➣ किसानों की ओर से राजस्व वसूली स्थगित करने के लिए सरकार से कई बार अनुरोध किया जा चुका था, लेकिन कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकला। परिणामस्वरूप 21 मार्च 1918 को गुजरात सभा की बैठक में खेड़ा में सत्याग्रह शुरू करने का निर्णय लिया गया।
➣ इस निर्णय के बाद महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में किसानों को संगठित करने का काम तेज किया गया। खेड़ा के विभिन्न गाँवों में किसानों से संपर्क किया गया और उन्हें समझाया गया कि यदि वे एकजुट होकर शांतिपूर्ण तरीके से राजस्व का भुगतान रोकेंगे, तो सरकार पर उनकी मांग स्वीकार करने का दबाव बढ़ेगा।
➣ नडियाद को सत्याग्रह की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाया गया। गांधी और उनके सहयोगियों ने यहीं से किसानों के बीच संपर्क और संगठन का काम आगे बढ़ाया।
➣ सत्याग्रह के लिए नडियाद अनाथालय को मुख्यालय बनाया गया, जहाँ गांधी, वल्लभभाई पटेल और अन्य कार्यकर्ता आंदोलन की गतिविधियों को व्यवस्थित करते थे।
➣ 22 मार्च 1918 को नडियाद में एक बड़ी किसान सभा आयोजित हुई। इसमें लगभग 5,000 किसान शामिल हुए। गांधी ने किसानों को संबोधित करते हुए खराब फसल की स्थिति और राजस्व वसूली के प्रश्न पर अपना पक्ष रखा तथा उन्हें सत्याग्रह के लिए तैयार किया।
➣ इसी सभा में उन्होंने उन किसानों को, जिनकी फसल 25 प्रतिशत से कम थी, भूमि-राजस्व का भुगतान न करने की सलाह दी।
किसानों की सत्याग्रह प्रतिज्ञा
➣ सत्याग्रह को व्यक्तिगत विरोध के बजाय सामूहिक संघर्ष बनाने के लिए किसानों से एक लिखित प्रतिज्ञा ली गई। इसमें किसानों ने घोषणा की कि उनकी फसल चार आने या उससे कम होने के कारण वे पहले ही सरकार से राजस्व वसूली स्थगित करने का अनुरोध कर चुके हैं, लेकिन मांग स्वीकार नहीं की गई। इसलिए वे अपनी इच्छा से वर्ष का पूरा या शेष भूमि-राजस्व अदा नहीं करेंगे।
➣ किसानों ने यह भी स्वीकार किया कि यदि सरकार उनकी संपत्ति जब्त करती है या उनके विरुद्ध अन्य कानूनी कार्रवाई करती है, तो वे उसका सामना करने के लिए तैयार रहेंगे।
➣ उन्होंने अपनी जमीन तक खोने की स्थिति में पीछे न हटने और स्वाभिमान बनाए रखने का संकल्प लिया। इस प्रकार राजस्व का भुगतान रोकना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि सत्याग्रह और आत्मसम्मान से जुड़ा सामूहिक संकल्प बन गया।
➣ इसमें एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी थी कि जो किसान आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे भी उस समय तक भुगतान रोकेंगे जब तक गरीब किसानों के लिए राजस्व की वसूली स्थगित नहीं की जाती।
➣ इसका उद्देश्य यह था कि संपन्न किसान अलग से भुगतान करके आंदोलन को कमजोर न करें और गरीब किसान दबाव में आकर पशु या संपत्ति बेचकर अथवा कर्ज लेकर राजस्व चुकाने को मजबूर न हों।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| 21 मार्च 1918 | गुजरात सभा की बैठक में खेड़ा में सत्याग्रह शुरू करने का निर्णय |
| 22 मार्च 1918 | नडियाद में गांधी ने लगभग 5,000 किसानों को संबोधित किया |
| फसल की सीमा | 25% से कम / चार आने या उससे कम |
| मुख्य मांग | भूमि-राजस्व की वसूली स्थगित करना |
| मुख्य नेता | महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल |
| सत्याग्रह का आधार | अहिंसा, एकता और सरकारी दमन का शांतिपूर्ण सामना |
| विशेष शर्त | संपन्न किसान भी गरीब किसानों के हित में भुगतान रोकें |
| मुख्यालय | नडियाद अनाथालय |
वल्लभभाई पटेल और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका
➣ खेड़ा सत्याग्रह में महात्मा गांधी के साथ वल्लभभाई पटेल की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी। पटेल ने अपने सफल वकालत के काम को छोड़कर किसानों के बीच संगठन का कार्य किया।
➣ किसानों को गाँव-गाँव जाकर संगठित करना, उन्हें अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रखना और सरकारी दबाव के बीच उनका मनोबल बनाए रखना मुख्यतः पटेल और स्थानीय कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी थी।
➣ खेड़ा सत्याग्रह के अनुभव ने वल्लभभाई पटेल के राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और किसानों के बीच उनके नेतृत्व को मजबूत किया।
➣ आगे चलकर 1928 के बारडोली सत्याग्रह में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया, जिससे वे गुजरात के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी एक प्रमुख किसान नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए।
➣ नरहरि पारिख खेड़ा सत्याग्रह के प्रमुख स्थानीय कार्यकर्ताओं में थे। उन्होंने गाँवों में जाकर किसानों से संपर्क किया, उनकी स्थिति की जानकारी जुटाई और आंदोलन की बात लोगों तक पहुँचाई। संगठन के इस जमीनी काम ने सत्याग्रह को केवल नडियाद या कुछ प्रमुख नेताओं तक सीमित नहीं रहने दिया।
➣ इंदुलाल याज्ञिक ने भी किसानों को संगठित करने और आंदोलन के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे सभाओं और जनसंपर्क के माध्यम से किसानों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करते थे तथा उन्हें सामूहिक रूप से संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते थे। बाद में वे गुजरात की जन-राजनीति और किसान आंदोलनों के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल हुए।
➣ मोहनलाल पंड्या भी खेड़ा सत्याग्रह के प्रमुख स्थानीय कार्यकर्ताओं में थे। उन्होंने किसानों के बीच संगठन और जनजागरण के काम में सक्रिय भूमिका निभाई।
➣ वे गाँवों में जाकर किसानों को सत्याग्रह की शर्तों और सामूहिक निर्णय के बारे में समझाते थे। आगे चलकर वे प्याज सत्याग्रह की प्रसिद्ध घटना के कारण विशेष रूप से याद किए गए।
➣ शंकरलाल पारीख सहित अनेक स्थानीय कार्यकर्ताओं ने भी आंदोलन को गाँवों तक पहुँचाने में योगदान दिया। इन कार्यकर्ताओं का महत्व इसलिए था क्योंकि वे स्थानीय किसानों और नेतृत्व के बीच सीधा संपर्क बनाए हुए थे।
➣ उनके माध्यम से किसानों की शिकायतें, सरकारी कार्रवाइयों की जानकारी और आंदोलन की स्थिति लगातार नेतृत्व तक पहुँचती रही।
➣ इस पूरे संगठनात्मक प्रयास में गुजरात सभा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधी, पटेल और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय से किसानों की शिकायतों को व्यवस्थित रूप से उठाया गया और सत्याग्रह के लिए आवश्यक प्रचार तथा जनसंपर्क किया गया।
➣ खेड़ा सत्याग्रह में स्थानीय नेतृत्व की एक बड़ी विशेषता यह थी कि आंदोलन को गाँव-गाँव तक पहुँचाने के लिए अनेक स्वयंसेवक लगातार काम कर रहे थे। वे किसानों को प्रतिज्ञा समझाते, सभाएँ आयोजित करते और यह सुनिश्चित करते कि आंदोलन अहिंसक तथा अनुशासित बना रहे।
➣ इस प्रकार महात्मा गांधी का व्यापक नेतृत्व, वल्लभभाई पटेल का जमीनी संगठन, नरहरि पारिख, इंदुलाल याज्ञिक, मोहनलाल पंड्या, शंकरलाल पारीख और अन्य कार्यकर्ताओं का गाँवों में जनसंपर्क खेड़ा सत्याग्रह की संगठनात्मक शक्ति का आधार था।
सरकारी दमन और किसानों का संघर्ष
➣ किसानों द्वारा भूमि-राजस्व का भुगतान रोकने की सामूहिक प्रतिज्ञा के बाद सरकार और राजस्व अधिकारियों ने उन पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया।
➣ किसानों को बकाया राजस्व जमा करने के लिए नोटिस दिए गए और भुगतान न करने की स्थिति में जमीन, मवेशियों तथा अन्य संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई की गई।
➣ छोटे किसानों के लिए यह दबाव विशेष रूप से गंभीर था, क्योंकि उनकी खेती और आजीविका मुख्य रूप से जमीन तथा बैलों जैसे कृषि पशुओं पर निर्भर थी।
➣ संपत्ति या पशुओं की जब्ती का अर्थ केवल तत्काल आर्थिक नुकसान नहीं था, बल्कि अगली फसल की खेती भी प्रभावित हो सकती थी। इसके बावजूद किसानों ने सामूहिक रूप से अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहने का प्रयास किया।
➣ सरकारी अधिकारियों ने कई किसानों की संपत्ति जब्त की और कुछ मामलों में मवेशियों तथा कृषि उपकरणों को भी कब्जे में लिया गया।
➣ किसानों को राजस्व चुकाने के लिए लगातार दबाव में रखा गया। लेकिन गांधी और वल्लभभाई पटेल ने किसानों से अपील की कि वे डरकर अलग-अलग समझौता न करें और सरकारी कार्रवाई का अहिंसक तरीके से सामना करें।
➣ खेड़ा सत्याग्रह में किसानों की एकता बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण था। गांधी की प्रतिज्ञा में यह बात विशेष रूप से रखी गई थी कि केवल गरीब किसान ही राजस्व न रोकें, बल्कि सक्षम किसान भी तब तक भुगतान न करें जब तक कमजोर किसानों को राहत नहीं मिलती।
➣ वल्लभभाई पटेल, मोहनलाल पंड्या, नरहरि पारीख, इंदुलाल याज्ञिक और अन्य कार्यकर्ता गाँव-गाँव जाकर किसानों का मनोबल बनाए रखते थे। वे उन्हें सरकारी नोटिस और कुर्की से न घबराने, एकजुट रहने तथा किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहने के लिए प्रेरित करते थे।
➣ किसानों ने सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध हिंसा नहीं की और न ही जब्त की गई संपत्ति को बलपूर्वक वापस लेने का प्रयास किया। वे कुर्की, जब्ती और आर्थिक नुकसान को सहते हुए भी राजस्व न देने के अपने सामूहिक निर्णय पर टिके रहे।
➣ सरकारी दमन के बावजूद आंदोलन की एकता पूरी तरह नहीं टूटी। इससे प्रशासन पर यह दबाव बढ़ा कि केवल कुर्की और जब्ती के माध्यम से समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।
➣ आगे चलकर सरकार को राजस्व वसूली के प्रश्न पर नरम रुख अपनाना पड़ा और गरीब किसानों को राहत देने की दिशा में कदम उठाए गए।
प्याज सत्याग्रह और मोहनलाल पंड्या
➣ खेड़ा सत्याग्रह के दौरान सरकार ने राजस्व वसूली के लिए किसानों की जमीन और फसलों की कुर्की शुरू कर दी थी। इसी क्रम में एक खेत में खड़ी प्याज की फसल को भी सरकारी कार्रवाई के तहत जब्त किया गया।
➣ गांधी को यह कार्रवाई अनुचित लगी, क्योंकि उनके अनुसार फसल को इस तरह जब्त करके छोड़ देना और किसान को उसका उपयोग न करने देना न्यायसंगत नहीं था।
➣ गांधी ने इस परिस्थिति को सत्याग्रह के सिद्धांतों की परीक्षा का अवसर माना। उन्होंने स्थानीय कार्यकर्ता मोहनलाल पंड्या को उस खेत की प्याज की फसल निकालने का सुझाव दिया।
➣ गांधी के अनुसार यदि सरकारी कार्रवाई नैतिक रूप से गलत थी, तो उसके विरोध में शांतिपूर्वक ऐसा कदम उठाना सत्याग्रह की भावना के अनुरूप था, भले ही उसके परिणामस्वरूप गिरफ्तारी और सजा का सामना करना पड़े।
➣ मोहनलाल पंड्या इस कार्य के लिए स्वयं आगे आए। उनके साथ लगभग सात–आठ स्वयंसेवक और शामिल हुए। उन्होंने खेत में जाकर जब्त की गई प्याज की फसल निकालना शुरू किया। यह कार्रवाई सरकार के राजस्व संबंधी आदेश का खुले रूप में उल्लंघन थी।
➣ 4 जून 1918 को मोहनलाल पंड्या के नेतृत्व में कुछ सत्याग्रहियों ने प्याज की फसल हटाई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इस मामले में पंड्या और उनके साथियों को 10 से 20 दिनों तक की सजा दी गई।
➣ मुकदमे के दौरान मोहनलाल पंड्या और उनके साथियों ने अपने कार्य को चोरी मानने से इंकार किया। गांधी ने भी बाद में कहा कि उन्हें नहीं लगता था कि जब्त फसल को खेत से निकालना भारतीय दंड संहिता के अर्थ में चोरी माना जा सकता है।
➣ फिर भी उन्होंने कानूनी अपील न करने की नीति अपनाई, क्योंकि सत्याग्रह का उद्देश्य अदालतों के माध्यम से राहत लेने के बजाय अन्यायपूर्ण कानून या आदेश का नैतिक विरोध करना था।
➣ पंड्या और उनके साथियों की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में लोग अदालत के आसपास एकत्र हुए। इसके बाद जब दोषी ठहराए गए सत्याग्रहियों को जेल ले जाया गया, तो लोगों ने जुलूस निकालकर उनका साथ दिया।
➣ इस घटना ने किसानों और स्थानीय जनता के बीच भय कम करने तथा जेल जाने को अपमान के बजाय सत्याग्रह के गौरवपूर्ण हिस्से के रूप में देखने की भावना को मजबूत किया।
➣ मोहनलाल पंड्या की इस भूमिका के कारण जनता ने उन्हें प्यार और सम्मान से डूंगली चोर(प्याज चोर) कहना शुरू किया। गुजराती में डूंगली का अर्थ प्याज होता है। यह उपाधि वास्तव में उनके खिलाफ लगाए गए चोरी के आरोप का व्यंग्यपूर्ण उलट रूप थी और बाद में उनके साथ सम्मानपूर्वक जुड़ गई।
➣ 27 जून 1918 को गांधी ने नवागाम में पंड्या और उनके साथियों के जेल से लौटने पर आयोजित स्वागत सभा में इस घटना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्याज की फसल हटाने और उसके कारण जेल जाने वाले स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह में कष्ट सहने की भावना को व्यवहार में दिखाया।
| तथ्यविवरण | |
|---|---|
| मुख्य व्यक्ति | मोहनलाल पंड्या |
| घटना | सरकारी कार्रवाई के तहत जब्त प्याज की फसल निकालना |
| साथी | लगभग 7–8 स्वयंसेवक |
| महत्वपूर्ण तिथि | 4 जून 1918 |
| सरकारी कार्रवाई | गिरफ्तारी और 10–20 दिन की सजा |
| उपाधि | डूंगली चोर |
| डूंगली का अर्थ | गुजराती में प्याज |
| महत्व | किसानों में भय कम करना और सत्याग्रह की भावना को मजबूत करना |
खेड़ा सत्याग्रह का समझौता एवं परिणाम (1918)
➣ कई महीनों तक चले सत्याग्रह, किसानों की एकता और लगातार राजस्व न देने के कारण सरकार पर दबाव बढ़ने लगा।
➣ सरकारी अधिकारियों द्वारा कुर्की और जब्ती जैसी कार्रवाइयों के बावजूद बड़ी संख्या में किसान अपनी मांग पर कायम रहे। इससे सरकार को राजस्व वसूली के प्रश्न पर अपने रुख में बदलाव करना पड़ा।
➣ अंततः सरकार ने ऐसा रास्ता अपनाया जिसमें गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर किसानों से उस वर्ष भूमि-राजस्व की तत्काल वसूली न करने की व्यवस्था की गई।
➣ अपेक्षाकृत सक्षम किसानों से राजस्व वसूला जा सकता था, लेकिन कमजोर किसानों को राहत दी गई। यही व्यवस्था खेड़ा सत्याग्रह की मुख्य व्यावहारिक उपलब्धि बनी।
➣ 6 जून 1918 को खेड़ा के कलेक्टर ने एक आदेश जारी किया, जिसमें राजस्व वसूली के संबंध में राहत का प्रावधान किया गया।
➣ इसके बाद महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल ने किसानों को समझाया कि सरकार द्वारा गरीब किसानों को दी गई राहत सत्याग्रह की मुख्य मांग की पूर्ति है और अब आंदोलन को समाप्त किया जा सकता है।
➣ इस प्रकार जून 1918 में खेड़ा सत्याग्रह समाप्त कर दिया गया। आंदोलन का अंत किसी औपचारिक लिखित समझौते या व्यापक राजनीतिक संधि के रूप में नहीं हुआ, बल्कि सरकार द्वारा कमजोर किसानों से राजस्व वसूली में राहत दिए जाने के बाद सत्याग्रह को वापस लेने के निर्णय से हुआ।
खेड़ा सत्याग्रह की वास्तविक उपलब्धि
➣ खेड़ा सत्याग्रह की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि किसानों की उस मांग को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया जिसमें खराब फसल के कारण भूमि-राजस्व की वसूली स्थगित करने की बात कही गई थी।
➣ आंदोलन की दूसरी बड़ी उपलब्धि किसानों की सामूहिक एकता और आत्मविश्वास थी। किसानों ने सरकारी नोटिस, कुर्की और संपत्ति की जब्ती जैसी कार्रवाइयों के बावजूद लंबे समय तक एकजुट रहकर सत्याग्रह किया।
➣ इससे ग्रामीण समाज में यह भावना मजबूत हुई कि संगठित और अहिंसक तरीके से सरकारी नीतियों को चुनौती दी जा सकती है।
➣ खेड़ा सत्याग्रह ने वल्लभभाई पटेल के राजनीतिक जीवन को भी नई दिशा दी। किसानों के बीच उनके संगठनात्मक कार्य और नेतृत्व के कारण उनकी पहचान गुजरात के एक प्रभावशाली जननेता के रूप में मजबूत हुई। आगे चलकर किसान आंदोलनों में उनका नेतृत्व और अधिक महत्वपूर्ण हुआ।
➣ इस आंदोलन ने महात्मा गांधी के लिए भी महत्वपूर्ण अनुभव प्रदान किया। चंपारण (1917), अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) और खेड़ा (1918) के आंदोलनों के माध्यम से गांधी ने भारत में सत्याग्रह की अलग-अलग परिस्थितियों में प्रयोग की पद्धति विकसित की। खेड़ा में उन्होंने ग्रामीण किसानों, स्थानीय नेतृत्व और अहिंसक सामूहिक प्रतिरोध को एक साथ संगठित किया।
➣ खेड़ा सत्याग्रह का महत्व इसलिए भी था कि इसने किसानों की समस्या को केवल स्थानीय राजस्व विवाद न रहने देकर न्यायपूर्ण प्रशासन और किसान अधिकार के प्रश्न से जोड़ दिया। इससे गुजरात में आगे के किसान और जनआंदोलनों के लिए भी राजनीतिक अनुभव और नेतृत्व तैयार हुआ।
➣ हालांकि सरकार ने सभी किसानों का लगान पूरी तरह माफ नहीं किया, फिर भी सत्याग्रह ने अपनी मुख्य मांग- फसल खराबी से प्रभावित गरीब किसानों को तत्काल राजस्व भुगतान के दबाव से राहत– को काफी हद तक हासिल किया। इसलिए खेड़ा सत्याग्रह को आंशिक लेकिन महत्वपूर्ण किसान सफलता के रूप में देखा जाता है।
| तथ्यविवरण | |
|---|---|
| मुख्य मांग | खराब फसल वाले किसानों से भूमि-राजस्व की वसूली स्थगित करना |
| सरकारी राहत | गरीब एवं कमजोर किसानों को राजस्व भुगतान में राहत |
| 6 जून 1918 | खेड़ा कलेक्टर का राहत संबंधी आदेश |
| समापन | जून 1918 |
| मुख्य नेता | महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल |
| वास्तविक परिणाम | पूर्ण कर-माफी नहीं, बल्कि आंशिक राहत/वसूली स्थगन |
| राजनीतिक महत्व | किसानों में संगठन और आत्मविश्वास का विकास। पटेल का जननेता के रूप में उभार |
चंपारण बनाम खेड़ा बनाम अहमदाबाद
➣ चंपारण में समस्या नील की जबरन खेती थी, खेड़ा में खराब फसल के बावजूद भूमि-राजस्व और अहमदाबाद में मजदूरी/वेतन का विवाद। तीनों आंदोलनों में गांधी ने स्थानीय नेतृत्व के साथ मिलकर अहिंसा, संगठन और सत्याग्रह का प्रयोग किया।
| पहलू | चंपारण सत्याग्रह | खेड़ा सत्याग्रह | अहमदाबाद मिल हड़ताल |
|---|---|---|---|
| वर्ष | 1917 | 1918 | 1918 |
| स्थान | चंपारण, बिहार | खेड़ा, गुजरात | अहमदाबाद, गुजरात |
| मुख्य वर्ग | नील किसान | किसान | कपड़ा मिल के मजदूर |
| मुख्य समस्या | तीनकठिया प्रथा और नील की जबरन खेती। किसानों पर नीलहे बागान मालिकों का दबाव। | खराब फसल के बावजूद भूमि-राजस्व की वसूली। | मजदूरों की वेतन वृद्धि और प्लेग बोनस समाप्त किए जाने का विवाद। |
| मुख्य मांग | तीनकठिया प्रथा का अंत और किसानों को नील की जबरन खेती से राहत। | भूमि-राजस्व की वसूली स्थगित करना तथा गरीब किसानों को राहत देना। | मजदूरों के वेतन में 50% वृद्धि की मांग। बाद में 35% वृद्धि पर समझौता। |
| गांधी को आंदोलन में लाने वाला प्रमुख व्यक्ति | राजकुमार शुक्ल | स्थानीय किसान नेताओं एवं गुजरात सभा की पहल। गांधी ने स्वयं स्थिति की जाँच की। | अनसूयाबेन साराभाई और मजदूर नेताओं का आग्रह। |
| स्थानीय प्रमुख नेता | राजकुमार शुक्ल, ब्रजकिशोर प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद, जे. बी. कृपलानी आदि। | वल्लभभाई पटेल, मोहनलाल पंड्या, नरहरि पारीख, इंदुलाल याज्ञिक आदि। | अनसूयाबेन साराभाई, शंकरलाल बैंकर आदि। |
| मुख्य प्रतिरोध का तरीका | जाँच, जनसंगठन, किसानों का शांतिपूर्ण विरोध और प्रशासनिक दबाव का अहिंसक सामना। | सामूहिक रूप से भूमि-राजस्व का भुगतान रोकना। | हड़ताल और मजदूरों का सामूहिक वेतन संघर्ष। |
| गांधी की विशेष रणनीति | किसानों की स्थिति की प्रत्यक्ष जाँच और प्रशासन के साथ संवाद। | किसानों से सामूहिक प्रतिज्ञा और दमन के सामने अहिंसक दृढ़ता। | उपवास के माध्यम से मजदूरों का मनोबल बनाए रखना और मिल मालिकों पर नैतिक दबाव डालना। |
| विशेष घटना | गांधी के खिलाफ प्रशासनिक आदेश और बाद में किसानों की शिकायतों की जाँच। | मोहनलाल पंड्या का प्याज सत्याग्रह और “डूंगली चोर” की उपाधि। | गांधी का 21 दिन तक मजदूरों के लिए उपवास करने की प्रतिज्ञा और 35% वेतन वृद्धि का समझौता। |
| सरकार/प्रशासन की प्रतिक्रिया | जाँच के बाद किसानों की शिकायतों को स्वीकार किया गया और सुधार के लिए समिति बनाई गई। | कुर्की, संपत्ति और मवेशियों की जब्ती के बाद गरीब किसानों को राजस्व में राहत दी गई। | मिल मालिकों और मजदूरों के बीच विवाद में अंततः समझौता हुआ। |
| परिणाम | तीनकठिया प्रथा समाप्त करने और किसानों को राहत देने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता। | गरीब किसानों के लिए राजस्व वसूली में राहत/स्थगन। पूर्ण कर-माफी नहीं। | मजदूरों की 35% वेतन वृद्धि की मांग स्वीकार हुई। |
| आंदोलन का स्वरूप | किसान आंदोलन | किसान आंदोलन | औद्योगिक श्रमिक आंदोलन |
| ऐतिहासिक महत्व | भारत में गांधी के पहले प्रमुख सत्याग्रह के रूप में महत्वपूर्ण। | गांधी और पटेल के नेतृत्व में किसानों के संगठित अहिंसक प्रतिरोध का महत्वपूर्ण उदाहरण। | गांधी द्वारा औद्योगिक श्रमिक विवाद में सत्याग्रह और उपवास के प्रयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण। |
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ खेड़ा सत्याग्रह वर्ष 1918 में गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों द्वारा खराब फसल के बावजूद भूमि-राजस्व की वसूली के विरोध में चलाया गया किसान आंदोलन था।p>
➣ किसानों की मुख्य मांग थी कि फसल खराब होने के कारण भूमि-राजस्व की वसूली स्थगित की जाए और आर्थिक रूप से कमजोर किसानों को उस वर्ष राहत दी जाए।
➣ मोहनलाल पंड्या, नरहरि पारीख, शंकरलाल पारीख और इंदुलाल याज्ञिक जैसे स्थानीय कार्यकर्ताओं ने किसानों के बीच जनसंपर्क और संगठन का काम किया।
➣ फरवरी 1918 में महात्मा गांधी ने खेड़ा की स्थिति पर सक्रिय रूप से ध्यान दिया और किसानों की राजस्व संबंधी समस्या को लेकर सरकारी अधिकारियों से बातचीत की।
➣ 15 फरवरी 1918 को गांधी ने गुजरात सभा की कार्यकारिणी की बैठक की अध्यक्षता की और खेड़ा के किसानों की स्थिति की जाँच पूरी होने तक राजस्व वसूली रोकने की मांग की।
➣ 16 फरवरी 1918 को गांधी ने गोकुलदास कहानदास पारेख और विठ्ठलभाई पटेल के साथ खेड़ा जिले की स्थिति का अध्ययन किया।
➣ 21 मार्च 1918 को गुजरात सभा की बैठक में खेड़ा में सत्याग्रह शुरू करने का निर्णय लिया गया।
➣ 22 मार्च 1918 को नडियाद में गांधी ने लगभग 5,000 किसानों को संबोधित किया और सत्याग्रह का औपचारिक प्रारंभ हुआ।
➣ किसानों के लिए फसल की महत्वपूर्ण सीमा 25 प्रतिशत या उससे कम थी। गांधी के अनुसार ऐसी स्थिति में प्रभावित किसानों से भूमि-राजस्व की वसूली स्थगित की जानी चाहिए।
➣ सत्याग्रह में किसानों ने भूमि-राजस्व न देने की सामूहिक प्रतिज्ञा की और सरकारी दबाव तथा संभावित कुर्की का अहिंसक तरीके से सामना करने का संकल्प लिया।
➣ सत्याग्रह की प्रतिज्ञा में अपेक्षाकृत सक्षम किसानों से भी यह अपेक्षा की गई कि वे गरीब किसानों की राहत होने तक सामूहिक रूप से राजस्व का भुगतान न करें।
➣ खेड़ा सत्याग्रह में वल्लभभाई पटेल ने गाँव-गाँव जाकर किसानों को संगठित किया और आंदोलन को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ आंदोलन के दौरान सरकार ने किसानों को राजस्व नोटिस दिए और भुगतान न करने पर जमीन, मवेशियों तथा अन्य संपत्तियों की कुर्की जैसी कार्रवाइयाँ कीं।
➣ प्याज सत्याग्रह में मोहनलाल पंड्या ने जब्त की गई प्याज की फसल खेत से निकालकर सत्याग्रह की भावना में कार्रवाई की। इस कारण उन्हें गिरफ्तार कर सजा दी गई।
➣ मोहनलाल पंड्या को जनता ने व्यंग्य और सम्मान के भाव से डूंगली चोर कहा। गुजराती में डूंगली का अर्थ प्याज होता है।
➣ 4 जून 1918 को मोहनलाल पंड्या और उनके साथियों द्वारा जब्त प्याज की फसल हटाने की घटना हुई, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया और सजा दी गई।
➣ 6 जून 1918 को खेड़ा के कलेक्टर ने राजस्व वसूली के संबंध में ऐसा आदेश जारी किया जिससे आर्थिक रूप से कमजोर किसानों को राहत मिली।
➣ सरकार ने सभी किसानों का भूमि-राजस्व पूरी तरह माफ नहीं किया था। इसलिए खेड़ा सत्याग्रह की उपलब्धि को पूर्ण कर-माफी नहीं, बल्कि गरीब किसानों के लिए राजस्व वसूली में राहत/स्थगन के रूप में समझना चाहिए।
➣ जून 1918 में किसानों को मिली राहत के बाद खेड़ा सत्याग्रह को समाप्त कर दिया गया।
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