खानदेश : परिचय
| शासक | शासनकाल | प्रमुख जानकारी / महत्वपूर्ण घटनाएँ |
|---|---|---|
| मलिक राजा फारूकी | 1382–1399 ई. | फ़ारूकी वंश का संस्थापक। फिरोजशाह तुगलक के समय खानदेश का सूबेदार था। तुगलक सत्ता के कमजोर होने पर स्वतंत्र होकर खानदेश सल्तनत की स्थापना की। |
| नासिर खाँ | 1399–1437 ई. | राज्य का विस्तार किया। बुरहानपुर नगर की स्थापना की तथा उसे राजधानी बनाया। असीरगढ़ दुर्ग को भी मजबूत किया। |
| मीरान आदिल खाँ प्रथम | 1437–1441 ई. | मालवा एवं गुजरात से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे तथा राज्य की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया। |
| मुबारक खाँ प्रथम | 1441–1457 ई. | प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया तथा पड़ोसी राज्यों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे। |
| आदिल खाँ द्वितीय | 1457–1501 ई. | फ़ारूकी वंश का शक्तिशाली शासक। उसके शासनकाल में खानदेश समृद्ध हुआ तथा व्यापार एवं कृषि का विकास हुआ। |
| दाऊद खाँ | 1501–1508 ई. | अल्पकालीन शासन। आंतरिक संघर्षों के कारण राज्य की शक्ति कमजोर होने लगी। |
| गजनी खाँ | 1508 ई. | बहुत अल्पकालीन शासक। शीघ्र ही सत्ता परिवर्तन हो गया। |
| आदिल खाँ तृतीय | 1508–1520 ई. | राज्य में स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया तथा पड़ोसी राज्यों से संबंध बनाए रखे। |
| मीरान मुहम्मद शाह प्रथम | 1520–1537 ई. | गुजरात के बहादुर शाह का समकालीन था। गुजरात एवं मालवा की राजनीति से प्रभावित रहा। |
| मीरान मुबारक शाह द्वितीय | 1537–1566 ई. | मुगलों और दक्कन के राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया। |
| मीरान मुहम्मद शाह द्वितीय | 1566–1576 ई. | उसके शासनकाल में मुगल प्रभाव बढ़ने लगा तथा राज्य की स्वतंत्रता कमजोर हुई। |
| राजा अली खाँ | 1576–1597 ई. | फ़ारूकी वंश का सबसे प्रसिद्ध उत्तरकालीन शासक। अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा मुगलों की ओर से दक्कन अभियानों में भाग लिया। |
| बहादुर शाह फारूकी | 1597–1601 ई. | फ़ारूकी वंश का अंतिम शासक। 1601 ई. में अकबर ने असीरगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर खानदेश को मुगल साम्राज्य में मिला लिया। |
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थिति | ताप्ती नदी घाटी दक्षिण का प्रवेश द्वार |
| संस्थापक | मलिक रजा फारूकी |
| स्वतंत्रता की स्थापना | 1382 ई. |
| राज्यपाल नियुक्ति | 1370 ई. |
| मलिक रजा की मृत्यु | 29 अप्रैल, 1399 ई. |
| राजधानी | बुरहानपुर |
| प्रमुख किला / सैन्य अड्डा | असीरगढ़ दक्कन की कुंजी |
| वंश का नाम | फारूकी वंश |
| शासकों की उपाधि | खान |
| नासिर खान का शासन | 1399–1437 ई. |
| आदिल खान प्रथम | 1438–1441 ई. |
| मुबारक खान प्रथम | 1441–1457 ई. |
| सर्वश्रेष्ठ शासक | आदिल खान द्वितीय |
| अकबर का अंतिम युद्ध | असीरगढ़ की लड़ाई (1601 ई.) |
| मुगल साम्राज्य में विलय | 1601 ई. (अकबर द्वारा) |
| मुगल काल में नया नाम | दानदेश (दनियाल के नाम पर) |
| मराठों का अधिकार | 1760 ई. |
| ब्रिटिश नियंत्रण | 1818 ई. |
खानदेश : दक्कन की कुंजी
➣ खानदेश महाराष्ट्र के दक्षिणी पठार के उत्तरी-पश्चिमी कोने पर स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक क्षेत्र था। यह ताप्ती नदी की घाटी में फैला हुआ था।
➣ खानदेश को दक्षिण का प्रवेश द्वार और दक्कन की कुंजी कहा जाता था, क्योंकि उत्तर से दक्षिण जाने का मुख्य मार्ग इसी क्षेत्र से होकर गुजरता था।
➣ 1295 ई. में खानदेश, असीरगढ़ के चौहान शासक के अधीन था, जब दिल्ली के अलाउद्दीन खिलजी ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। अगली शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के विभिन्न राजवंशों ने खानदेश पर अपना नियंत्रण बनाए रखा।
➣ खानदेश पहले मुहम्मद बिन तुगलक के साम्राज्य का एक छोटा इक्ता (प्रशासनिक इकाई) था। एक स्वतंत्र राज्य के रूप में खानदेश की नींव मलिक राजा फारूकी ने रखी थी।
➣ फिरोज शाह तुगलक ने प्रारंभ में मलिक राजा फारूकी को खानदेश क्षेत्र का सेनापति नियुक्त किया था, लेकिन फिरोज शाह तुगलक की मृत्यु के बाद उसने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया और 1399 ई. तक शासन किया।
➣ फारूकी वंश के सभी शासकों ने खान की उपाधि धारण की, इसलिए इस क्षेत्र का नाम खानदेश (खानों का देश) पड़ा।
➣ असीरगढ़ का किला खानदेश की सैन्य शक्ति का प्रमुख केंद्र था। यह इतना महत्वपूर्ण था कि कहा जाता था— “जो असीरगढ़ को जीत ले, वही दक्षिण भारत का स्वामी है।” यही कारण था कि बाद में अकबर ने भी इस किले को जीतने के लिए विशेष अभियान चलाया।
असीरगढ़ की लड़ाई (1601 ई.)
➣ असीरगढ़ का किला मध्य भारत की सतपुड़ा पर्वतमाला की ऊँची चोटी पर बना हुआ था। इस किले का निर्माण आशा अहीर नामक स्थानीय शासक ने करवाया था, और उन्हीं के नाम पर यह “असीरगढ़” कहलाया। अपनी दुर्गम स्थिति के कारण यह किला अभेद्य दुर्गों में गिना जाता था।
➣ किले की भौगोलिक ऊँचाई इतनी अधिक थी कि उत्तर भारत के अनेक शासकों ने इस पर चढ़ाई की, महीनों तक घेराबंदी जारी रखी और तोपखाने का उपयोग किया — फिर भी कोई सफलता हाथ न लगी।
➣ अंततः मलिक फारूकी ने धोखे और चालाकी के बल पर यह किला आशा अहीर से हथिया लिया। उसने पहले सीधे हमला किया, लेकिन मुँह की खाई। वापस जाते समय उसने क्षमा माँगी और उपहार भेंट किए।
➣ कुछ समय बाद वह फिर लौटा और यह कहकर शरण माँगी कि उसके परिवार की स्त्रियाँ खतरे में हैं। उदारचेता आशा अहीर को दया आ गई और उन्होंने किले के फाटक खोल दिए।
➣ मलिक ने पालकियाँ (डोले) भेजीं, जिनमें महिलाओं की जगह हथियारबंद सैनिक छिपे हुए थे। जैसे ही पालकियाँ किले के भीतर पहुँचीं, सैनिक बाहर निकले और आशा अहीर समेत उनके पुत्रों की हत्या कर दी। इस प्रकार फारूकी वंश ने कपट से असीरगढ़ पर अपना अधिकार जमा लिया।
अकबर का दक्षिण अभियान (1600 ई.)
➣ सन् 1600 ई. में मुगल बादशाह अकबर ने दक्षिण की ओर कूच किया। उसकी सेना ने सबसे पहले बुरहानपुर को अपने अधीन किया। इसके बाद अबुल फजल — जो अकबर के प्रमुख दरबारी और इतिहासकार थे — को खानदेश का सूबेदार बनाया गया।
➣ फिर अकबर ने असीरगढ़ के किले को चारों ओर से घेर लिया। यह उस समय दक्षिण भारत का सबसे मजबूत और अटूट दुर्ग माना जाता था। करीब छह महीने तक घेराबंदी चलती रही — तोपें दागी गईं — लेकिन किले के भीतर पर्याप्त रसद-पानी था और बहादुर शाह फारूकी डटा रहा।
➣ जब युद्धबल से किला जीतना नामुमकिन लगा, तो अकबर ने कूटनीतिक चाल चली। उसने बहादुर शाह को मित्रता का संदेश भिजवाया और अपने शिविर में दावत पर बुलाया।
➣ 17 जनवरी, 1601 को बहादुर शाह दोपहर में अकबर के पड़ाव पर पहुँचा। दोनों के बीच भोजन हुआ, बातें हुईं — और उसके बाद उसे कैद कर लिया गया। बिना किसी खुले युद्ध के किला मुगलों के अधीन हो गया। यह अकबर का आखिरी सैन्य अभियान था।
➣ इस विजय के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है। अबुल फजल का मत है कि किले के अंदर महामारी फैल जाने से रक्षक कमजोर पड़ गए, जबकि जेसुइट मिशनरी जेवियर — जो उस समय अकबर के दरबार में उपस्थित था – के अनुसार अकबर ने धन का लालच देकर किले पर कब्जा किया। यह किला 1760 ई. तक मुगलों के पास रहा, जब मराठा शक्ति ने इसे जीत लिया।
➣ असीरगढ़ की विजय के साथ ही खानदेश पूरी तरह मुगल साम्राज्य में समाहित हो गया। अकबर के पुत्र शहजादे दनियाल की स्मृति में कुछ काल के लिए इस क्षेत्र का नाम बदलकर दानदेश रखा गया।
➣ सामरिक दृष्टिकोण से असीरगढ़ मुगलों के लिए दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार और केंद्रीय ठिकाना बन गया, जिसने आने वाले दशकों में दक्कन में मुगल विस्तार की राह और अधिक सुगम कर दी।
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