दिल्ली सल्तनत के शासक
| गुलाम वंश (1206 ई. – 1290 ई.) | 84 वर्ष, 11 शासक |
| कुतुबी राजवंश | 2 शासक |
| 1. कुतुबुद्दीन ऐबक | 1206-1210 |
| 2. आरामशाह | 1210-11 |
| शम्सी राजवंश | 5 शासक |
| 3. इल्तुतमिश | 1211-1236 |
| 4. रुक्नुद्दीन फिरोजशाह | 1236-1236 |
| 5. रजिया सुल्तान | 1236-1240 |
| 6. मुइजुद्दीन बहरामशाह | 1240-1242 |
| 7. अलाउद्दीन मसूदशाह | 1242-1246 |
| 8. नासिरुद्दीन महमूद | 1246-1266 |
| बलबनी राजवंश | 3 शासक |
| 9. गयासुद्दीन बलबन | 1266-1287 |
| 10. कैकूबाद | 1287-1290 |
| 11. शम्सुद्दीन क्यूमर्स | 1290-90 |
| खिलजी वंश (1290 -1320 ई0) | 84 वर्ष, 5 शासक |
| 1. जलालुद्दीन फिरोज खिलजी | 1290-96 |
| 2. अलाउद्दीन खिलजी | 1296-1316 |
| 3. शहाबुद्दीन उमर | 1316-16 |
| 4. क़ुतुबुद्दीनमुबारकशाह खिलजी | 1316-20 |
| 5. खुसरो खां | 1320 (7-15 अप्रैल) |
| तुगलक वंश (1320-1412 ई.) | 94 वर्ष, 9 शासक |
| 1. गयासुद्दीन तुगलक | 1320-25 |
| 2. मुहम्मद बिन तुगलक | 1325-51 |
| 3. फिरोजशाह तुगलक | 1351-88 |
| 4. गयासुद्दीन तुगलक शाह (द्वितीय) | 1388-89 |
| 5. अबू बक्र | 1389-89 |
| 6. नासिरुद्दीन मुहम्मदशाह | 1390-94 |
| 7. अलाउद्दीन सिकंदरशाह | लगभग 6 सप्ताह |
| 8. नासिरुद्दीन महमूद | 1394-1412 |
| सैयद वंश (1414-1451 ई.) | 37 वर्ष, 4 शासक |
| 1. खिज्र खां | 1414-1421 |
| 2. मुबारकशाह | 1421-1434 |
| 3. मुहम्मदशाह | 1434-1443 |
| 4. अलाउद्दीन आलमशाह | 1443-1451 |
| लोदी वंश (1451-1526 ई०) | 76 वर्ष, 3 शासक |
| 1. बहलोल लोदी | 1451-1489 |
| 2.सिकंदर लोदी | 1489-1517 |
| 3. इब्राहीम लोदी | 1517-1526 |
➣ भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक- मुहम्मद गौरी।
➣ तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक- इल्तुतमिश।
➣ भारत में अफगान वंश का संस्थापक- बहलोल लोदी।
न्यायप्रिय शासक : इल्तुतमिश
➣ इल्तुतमिश एक न्यायप्रिय शासक था इब्नबतूता के अनुसार उसने अपने महल के सामने संगमरमर की 2 शेरों की मूर्तियाँ स्थापित करायी थीं। जिनके गले में घंटियाँ लटकी हुई थीं जिनको बजाकर कोई भी व्यक्ति न्याय माँग सकता था।
➣ रणथम्भौर जीतने वाला प्रथम शासक इल्तुतमिश था। शुद्ध अरबी सिक्के चलाने वाला प्रथम तुर्क सुल्तान इल्तुतमिश था।
➣ इल्तुतमिश ने सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखने की परम्परा प्रारम्भ किया था। ग्वालियर विजय के बाद इल्तुतमिश ने सिक्कों पर रजिया का नाम भी लिखवाया था।
➣ इल्तुतमिश ने मोहम्मद गोरी की स्मृति में मदरसा ए-मुइज्जी व अपने पुत्र की स्मृति में नासिरी मदरसा बनवाया था।
➣ सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण समकालीन साहित्य में दिल्ली को हजराते दिल्ली कहा गया।
कुतुब मीनार
➣ कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 ई. में प्रारम्भ कराया था।
➣ इसका निर्माण प्रसिद्ध सूफी सन्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की स्मृति में या उनके सम्मान में करवाया गया माना जाता है, हालांकि इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद है।
➣ कुतुबुद्दीन ऐबक ने मीनार की केवल पहली मंजिल ही बनवाई थी। इसके निर्माण को आगे उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने जारी रखा और इसमें तीन और मंजिलें जोड़ी गईं।
➣ बाद में फिरोजशाह तुगलक ने आकाशीय बिजली (तड़ित) से क्षतिग्रस्त ऊपरी मंजिल की मरम्मत करायी तथा दो अतिरिक्त मंजिलें जोड़ी, जिनमें श्वेत संगमरमर एवं बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया।
➣ कुतुब मीनार की कुल ऊंचाई लगभग 73 मीटर (240 फीट) है, जो इसे विश्व की सबसे ऊँची ईंट-निर्मित मीनारों में से एक बनाती है। इसमें कुल 5 मंजिलें एवं 379 सीढ़ियाँ हैं।
➣ इस मीनार के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का प्रयोग किया गया है तथा इसकी दीवारों पर कुरान की आयतें एवं ज्यामितीय व पुष्प अलंकरण उत्कीर्ण हैं, जो इण्डो-इस्लामिक स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
➣ कुतुब मीनार परिसर में ही कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद भी स्थित है, जो भारत में निर्मित प्रथम मस्जिद मानी जाती है।
➣ इसी परिसर में प्रसिद्ध लौह स्तम्भ भी स्थित है, जो गुप्तकालीन सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय का बताया जाता है और अपनी जंगरोधी धात्विक संरचना के कारण विश्वप्रसिद्ध है।
➣ 1981 ई. में मीनार में हुई एक दुर्घटना के पश्चात आम जनता के मीनार के भीतर प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, जो आज भी प्रभावी है।
➣ यूनेस्को ने 1993 ई. में कुतुब मीनार एवं उसके स्मारक परिसर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। यह दिल्ली सल्तनत के स्थापत्य कौशल, धार्मिक आस्था एवं ऐतिहासिक महत्व का एक जीवन्त प्रतीक है।
दिल्ली सल्तनत की राजधानी
➣ सल्तनतकालीन शासकों में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर रखी थी, क्योंकि उस समय दिल्ली पर पूर्ण रूप से नियंत्रण स्थापित नहीं हो पाया था।
➣ कुछ समय के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली की जगह देवगिरी (दौलताबाद) को अपनी राजधानी बनाया था, जिसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण भारत पर बेहतर नियंत्रण स्थापित करना था, परन्तु यह प्रयोग असफल रहा और पुनः दिल्ली को राजधानी बनाया गया।
➣ सिकन्दर लोदी से पूर्व सभी शासकों ने दिल्ली को सल्तनत की राजधानी बनाया। सिकन्दर लोदी ने अपनी राजधानी आगरा को बनाया, जिसका मुख्य कारण आगरा की केन्द्रीय भौगोलिक स्थिति एवं सामरिक महत्व था, जिससे राज्य के सुदूर क्षेत्रों पर नियंत्रण रखना सरल हो गया।
➣ बाबर के समय में आगरा मुगल साम्राज्य की राजधानी रही, जहां उन्होंने पानीपत के प्रथम युद्ध (1526 ई.) में विजय के पश्चात अधिकार स्थापित किया था। हुमायूँ ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया, हालांकि उनके शासनकाल में राजनीतिक अस्थिरता एवं संघर्षों के कारण राजधानी में बार-बार परिवर्तन होता रहा।
➣ मुगल सम्राट अकबर ने सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए 1571 ई. में फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी बनाया, जहां उन्होंने भव्य भवनों एवं स्मारकों का निर्माण कराया। परन्तु जल की कमी के कारण 1585 ई. में पुनः दिल्ली को राजधानी बनाया गया, और इसके पश्चात फतेहपुर सीकरी धीरे-धीरे वीरान हो गया।
➣ शाहजहाँ के शासनकाल से अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर तक दिल्ली मुगल साम्राज्य की राजधानी रही। शाहजहाँ ने शाहजहानाबाद (वर्तमान पुरानी दिल्ली) नामक नये नगर की स्थापना की तथा लाल किला एवं जामा मस्जिद जैसे भवनों का निर्माण कराया।
➣ 1803 ई. में लार्ड लेक के नेतृत्व में अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया, उस समय शाह आलम द्वितीय मुगल शासक था। इसके पश्चात मुगल बादशाह केवल नाममात्र के शासक बनकर रह गए तथा वास्तविक सत्ता अंग्रेजों के हाथों में आ गई।
➣ 1912 ई. में दिल्ली के पुनः राजधानी बनने से पूर्व अंग्रेजों ने कलकत्ता को राजधानी के रूप में प्रयोग किया, जो 1772 ई. से अंग्रेजी शासन का प्रमुख केन्द्र बना हुआ था।
➣ 1911 ई. में तत्कालीन वायसराय लार्ड हार्डिंग द्वितीय ने दिल्ली दरबार आयोजित किया था, जिसमें राजधानी को पुनः दिल्ली स्थानान्तरित करने की घोषणा हुई।
➣ इसके पश्चात नई दिल्ली के निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ, जिसे वास्तुकार एडविन लुटियंस एवं हर्बर्ट बेकर ने डिजाइन किया तथा यह 1931 ई. में पूर्ण रूप से तैयार हुआ।
➣ 1947 ई. में आजादी मिलने के बाद से भारतीय गणतन्त्र की राजधानी दिल्ली (नई दिल्ली) को बनाया गया है, जो आज भी भारत की राजनीतिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु है।
मध्यकालीन महिला शासिकाएं
| महिला शासक | वंश | राज्य | शासनकाल |
|---|---|---|---|
| रजिया सुल्तान | गुलाम वंश | दिल्ली | 1236 – 1240 ई. |
| रानी रुद्रम्मा | काकतीय वंश | द्वारसमुद्र | 1260 – 1291 ई. |
| मखदूमजहां | बहमनी वंश | दक्षिण (बहमनी) | 1461-1469 ई. |
| रानी दुर्गावती | गोंड वंश | गढ़ कटंगा | 1550 – 1564 ई. |
| चांदबीबी सुल्ताना | अहमदशाही | अहमदनगर | 1595 – 1596 ई. |
| बेगम बड़ी साहिबा | आदिलशाही | बीजापुर | 1656 – 1663 ई. |
| ताराबाई | भोंसले | मराठा राज्य | 1700 – 1707 ई. |
➣ रजिया सुल्तान इल्तुतमिश की पुत्री थी। उसने अपने अयोग्य पुत्र रुकुनुद्दीन फिरोजशाह को उत्तराधिकारी नियुक्त न कर पुत्री रजिया को नियुक्त किया।
➣ हालांकि रजिया को सत्ता हासिल करने के लिए तुर्क अमीरों (चहलगानी) के कड़े विरोध का सामना करते हुए संघर्ष करना पड़ा था।
➣ रजिया को दिल्ली सल्तनत की एकमात्र महिला शासिका होने का गौरव प्राप्त है। उसने पुरुषों के समान वस्त्र धारण करना तथा दरबार में बिना पर्दा उपस्थित होना प्रारम्भ किया, जिसे तत्कालीन कुलीन वर्ग ने स्वीकार नहीं किया। अन्ततः अमीरों के विरोध एवं विद्रोह के कारण रजिया की हत्या कर दी गई।
➣ रानी रुद्रम्मा काकतीय वंश की शासिका थीं, जिन्होंने द्वारसमुद्र क्षेत्र में अपने पिता गणपति देव के बाद शासन सम्भाला।
➣ पुत्र न होने के कारण उन्हें पुरुष वेश में शासन करना पड़ा तथा उन्हें “रुद्रदेव महाराज” के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने अपने राज्य की सुरक्षा हेतु कई किलों का निर्माण कराया तथा प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया।
➣ मखदूमजहां बहमनी वंश से सम्बद्ध थीं और उन्होंने अपने अल्पवयस्क पुत्र की ओर से संरक्षिका (रीजेंट) के रूप में शासन किया। उनके समय में बहमनी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में स्थिरता बनी रही।
➣ रानी दुर्गावती गोंड वंश की शासिका थीं, जिन्होंने गढ़ कटंगा (वर्तमान मध्य प्रदेश) पर शासन किया। वे अपने पति दलपत शाह की मृत्यु के बाद अपने अल्पवयस्क पुत्र की संरक्षिका बनकर शासन करने लगीं।
➣ उन्होंने मुगल सेनापति आसफ खां के आक्रमण का वीरतापूर्वक सामना किया, परन्तु पराजय की स्थिति में उन्होंने आत्महत्या कर ली। दुर्गावती को भारतीय इतिहास में वीरता एवं स्वाभिमान की प्रतीक माना जाता है।
➣ प्रसिद्ध मुस्लिम शासिका चांदबीबी ने 1580-90 ई. तक बीजापुर पर तथा 1596-99 ई. (अपवाद: 1595-1596 ई.) तक अहमदनगर पर शासन किया था।
➣ चांदबीबी का विवाह बीजापुर के अली आदिलशाह प्रथम के साथ हुआ था। वे निजामशाही वंश के शासक हुसैन निजामशाह प्रथम की पुत्री थीं।
➣ उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की सेनाओं के विरुद्ध अहमदनगर की रक्षा हेतु वीरतापूर्वक संघर्ष किया, परन्तु अन्ततः 1600 ई. में अहमदनगर पर मुगलों का अधिकार हो गया और चांदबीबी की भी मृत्यु हो गई।
➣ बेगम बड़ी साहिबा आदिलशाही वंश से सम्बद्ध थीं, जिन्होंने बीजापुर में अपने अल्पवयस्क पुत्र अली आदिलशाह द्वितीय की संरक्षिका के रूप में 1656-1663 ई. तक प्रशासन का सञ्चालन किया। उनके शासनकाल में बीजापुर को मुगलों एवं मराठों दोनों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
➣ ताराबाई मराठा साम्राज्य के भोंसले वंश से सम्बद्ध थीं तथा छत्रपति राजाराम की पत्नी थीं।
➣ अपने पति की मृत्यु के पश्चात उन्होंने अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय की ओर से 1700-1707 ई. तक संरक्षिका के रूप में शासन किया तथा औरंगजेब के विरुद्ध मराठा संघर्ष का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। उन्हें मराठा इतिहास में एक कुशल प्रशासिका एवं रणनीतिकार के रूप में जाना जाता है।
➣ इन सभी महिला शासिकाओं ने मध्यकालीन भारत के पुरुष-प्रधान राजनीतिक परिवेश में भी अपनी प्रशासनिक क्षमता, वीरता एवं कूटनीतिक कौशल का परिचय देकर इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।
इक्ता व्यवस्था
➣ इक्ता एक अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है “विभाजित करना” या “भू-भाग”।
➣ प्रारम्भ में इस प्रथा के अन्तर्गत भूमि के विशेष खंडों के राजस्व का अधिकार सैनिकों एवं अधिकारियों को उनके वेतन के बदले दिया जाता था, जिससे राज्य को नकद वेतन वितरण की समस्या से मुक्ति मिल जाती थी।
➣ इस व्यवस्था को लाने का उद्देश्य सुदूर क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाये रखना और राजस्व वसूली की प्रक्रिया को सुचारू रूप से बनाए रखना था।
➣
क्योंकि सल्तनत के विस्तार के साथ केन्द्र से अधिक दूर स्थित क्षेत्रों में जहां सीधा प्रशासन कठिन था, वहां इस व्यवस्था के माध्यम से प्रशासनिक नियंत्रण सरल हो गया। इक्ता धारक को मुक्ती या वली कहा जाता था।➣ सर्वप्रमुख मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को हाँसी का इक्ता दिया था, जो भारत में इक्ता व्यवस्था का प्रारम्भिक उदाहरण माना जाता है।
➣ इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत में सर्वप्रथम इस व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से प्रारम्भ किया तथा अपने तुर्की अमीरों (चहलगानी/चालीसा दल) को इक्तों का वितरण किया।
➣ छोटी इक्ता को वेतन इक्ता भी कहा जाता था, जो मुख्यतः सैनिकों को उनके वेतन के स्थान पर दी जाती थी। इल्तुतमिश के समय ही बड़ी इक्ता प्रणाली भी प्रारम्भ हुई, जो प्रान्तीय शासकों एवं प्रमुख अमीरों को दी जाती थी।
➣ बलबन ने ख्वाजा नामक अधिकारी की नियुक्ति की, जिसका कार्य इक्ता से होने वाली आय का सही आकलन ज्ञात करना था। बलबन ने इक्तादारों पर नियंत्रण बढ़ाने हेतु कई कठोर कदम उठाए, जिसमें वृद्ध एवं अयोग्य इक्तादारों से इक्ता वापस लेना भी सम्मिलित था।
➣
➣ अलाउद्दीन खिलजी के समय छोटी इक्ता को समाप्त कर दिया गया तथा भूमि की पैमाइश एवं उत्पादन के आधार पर राजस्व निर्धारण की नई व्यवस्था लागू की गई। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में न केवल छोटे इक्तों को, बल्कि अनेक भूमि अनुदानों (इनाम, वक्फ आदि) को भी रद्द कर दिया गया, जिससे राज्य की केन्द्रीय राजस्व व्यवस्था अधिक सुदृढ़ हुई।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक के समय इक्ता व्यवस्था में पुनः कुछ परिवर्तन किए गए तथा फिरोजशाह तुगलक के समय इक्ता को वंशानुगत (आनुवंशिक) बना दिया गया, जिससे यह व्यवस्था धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगी।
➣ इस प्रकार इक्ता व्यवस्था दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, जिसके माध्यम से केन्द्रीय सत्ता और प्रान्तीय प्रशासन के बीच सन्तुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया।
मंगोल आक्रमण
| इल्तुतमिश | मंगोल नेता, चंगेज खां का भारत सीमा पर आया किन्तु सिन्धु नदी से वापस लौट गया। |
| बहराम शाह | मंगोल नेता, तैर बहादुर का आक्रमण व लाहौर को पूरी तरह नष्ट कर दिये। |
| नसरुद्दीन शाह | 1246-47 ई. में मुल्तान पर हमला। मंगोल नेता तैर बहादुर (सली बहादुर) द्वारा मुल्तान पर कब्जा। |
| बलबन | 1286 ई. में बलबन का बड़ा पुत्र मुहम्मद अचानक एक बड़ी मंगोल सेना से घिर जाने के कारण युद्ध करते हुए मारा गया।
प्रथम बार दिल्ली सल्तनत पर गंभीर आक्रमण मंगोलों द्वारा हुआ था। |
| फिरोज खिलजी | 1292 ई. में मंगोल नेता हलाकू (हलामू) के पौत्र अब्दुल्ला का आक्रमण हुआ। फिरोज ने सिंधु नदी के किनारे अब्दुल्ला को पराजित किया। चंगेज वंश का उलूग खां के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया।
उलूग के 4000 समर्थकों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया तथा नवीन मुस्लिम के रूप में विख्यात हुए व दिल्ली के मुगलपुर में बस गये। वर्तमान में यह स्थल मंगोलपुरी के नाम प्रसिद्ध हुआ। |
| अल्लाउद्दीन खिलजी | कादर खॉ (1297 ई.) का आक्रमण को उलूग खा एवं जफर खां के द्वारा विफ़ल कर दिया गया।
कुतलुग ख्वाजा (1299) के द्वारा प्रथम बार दिल्ली में घेरा डाला गया एवं इसी हमले में जफर खां मारा गया। तारगी के नेतृत्व में 1303 ई. में मंगोलों का हमला। इसी हमले के दौरान अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ अभियान को बीच में ही छोड़कर दिल्ली लौट आया था। अलीबेक व तारतक का हमला जिसे मलिक काफूर एवं गाजी मलिक के द्वारा विफल कर दिया गया। कबक व इकबालबंद के नेतृत्व में अलाउद्दीन खिलजी के समय में मंगोलों का अंतिम हमला। इसे भी मलिक काफूर व गाजी मलिक के द्वारा विफल कर दिया गया। |
| गयासुद्दीन तुगलक | 1325 ई. में शिर मुगल के नेतृत्व में मंगोल सेना ने सिंधु को पार किया, लेकिन समाना के सूबेदार मलिक शादी ने उन्हें परास्त कर दिया। |
| मुहम्मद बिन तुगलक | तरमाशरीन के नेतृत्व में मंगोल हमला यह मंगोलों के द्वारा दिल्ली सल्तनत पर अंतिम हमला था। |
अमीर खुसरो : तोता-ए-हिन्द
➣ खुसरो का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पटियाली नामक स्थान पर 1253 ई. में हुआ। अमीर खुसरो को पूरा नाम अबुल हसन यामीन-उद-दीन खुसरो था।
➣ इनके पिता अमीर सैफुद्दीन महमूद तुर्किस्तान के लाचीन कबीले से सम्बन्ध रखते थे और बल्ख से भारत आकर दिल्ली सल्तनत में सेवा करने लगे थे।
➣ माता हजरत बीबी दौलत नाज एक भारतीय मुसलमान परिवार से थीं, जिससे खुसरो में तुर्की और भारतीय दोनों संस्कृतियों का मिश्रण देखने को मिलता है।
➣ उसने बलवन, कैकुबाद, क्यूमर्स, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, मुबारक खिलजी, खुसरव शाह और गयासुद्दीन तुगलक तक कुल आठ सुल्तानों का काल देखा एवं इनमें से कई के दरबार में रहकर कार्य किया, जिससे उसे विभिन्न शासकों की नीतियों और घटनाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त हुआ।
➣ अमीर खुसरो दिल्ली सल्तनत का पहला प्रमुख इतिहासकार था, जिसका जन्म भारत में हुआ। उसके बाद भारत में जन्मा दूसरा प्रमुख इतिहासकार बरनी था। खुसरो को भारतीय फारसी साहित्य का जनक भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने फारसी भाषा को भारतीय परिवेश में नया रूप दिया।
➣ प्रारम्भ में खुसरो मंगोलों द्वारा बन्दी बना लिए गए जिसका उल्लेख उन्होंने आशिका में किया है। खुसरो ने कहा- हिंदवी देश की सम्पर्क भाषा है एवं संस्कृत शास्त्रीय भाषा है।
➣ उन्होंने भारत की भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की और भारतीय भाषाओं, संगीत एवं परम्पराओं को अपनी रचनाओं में महत्व दिया।
➣ अमीर खुसरो प्रसिद्ध सूफी सन्त निजामुद्दीन औलिया का प्रिय शिष्य था। दोनों के बीच का सम्बन्ध इतना गहरा था कि खुसरो स्वयं को निजामुद्दीन औलिया का कुत्ता (सेवक) कहकर सम्बोधित करते थे।
➣ अमीर खुसरो को जब निजामुद्दीन औलिया की 1325 ई. में मृत्यु की सूचना मिली तो उसी दिन शोक में उनकी भी मृत्यु हो गई। दोनों को दिल्ली में पास-पास ही दफनाया गया, जो आज भी श्रद्धा का केन्द्र है।
➣ अमीर खुसरो को तोता-ए-हिन्द एवं तुर्कल्लाह भी कहा जाता है। तुर्कल्लाह की उपाधि अमीर खुसरो को निजामुद्दीन औलिया ने दी।
➣ खुसरो को संगीत के क्षेत्र में भी अग्रणी माना जाता है — उन्हें सितार और तबला वाद्ययंत्रों के आविष्कार तथा कव्वाली गायन शैली के विकास का श्रेय भी दिया जाता है, हालांकि इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद है।
➣ सर्वप्रथम अलाउद्दीन खिलजी ने खुसरो को राजकवि का पद दिया था और दरबार में उच्च सम्मान दिया।
➣ जबान ए हिन्दवी (उर्दू/रेख्ता) में सर्वप्रथम रचना खुसरो ने की थी, जिसके कारण उन्हें उर्दू का जनक भी कहा जाता है।
➣ अमीर खुसरो ने फारसी की एक नई शैली सबक ए हिन्दी (हिन्दुस्तानी शैली) विकसित की, जिसमें फारसी भाषा में भारतीय शब्दों, मुहावरों एवं विषयों का समावेश किया गया।
➣ खुसरो ने पहेलियां, दो-सुखने (दोहरे अर्थ वाली कहावतें) और लोकगीतों की रचना भी की, जो आज भी उत्तर भारत में लोकप्रिय हैं।
प्रमुख रचनाएं
| रचना | विवरण |
|---|---|
| किरान-उस-सादेन (1289 ई.) | इसमें बुगरा खाँ और कैकुबाद के मिलन का वर्णन है। |
| खजाइन-उल-फुतूह अथवा तारीख-ए-अलाई | इसमें अलाउद्दीन खिलजी की विजयों एवं उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। |
| आशिका (देवलरानी–खिज्रखाँ) | यह खिज्रखाँ और देवलरानी की प्रेम कहानी पर आधारित रचना है। |
| नूह सिपेहर (नौ आकाश) | इसमें भारत की प्रशंसा के साथ नौ अध्यायों में विभिन्न विषयों का वर्णन किया गया है। |
| तुगलकनामा | अमीर खुसरो की अंतिम रचना, जिसमें गयासुद्दीन तुगलक के सत्ता में आने का वर्णन है। |
| मतला-उल-अनवार | यह अमीर खुसरो की प्रारम्भिक रचनाओं में से एक मानी जाती है। |
| हश्त बहिश्त (आठ स्वर्ग) | इसमें कैकुबाद के समय की घटनाओं का उल्लेख मिलता है। |
| कुल्लियात-ए-खुसरो | इसे अमीर खुसरो की समस्त काव्य रचनाओं का संग्रह माना जाता है। |
➣ नूह सिपेहर में भारत की धरती का स्वर्ग कहा है। इस ग्रन्थ में हिन्दुस्तान की प्रशंसा के कारण ही अमीर खुसरो को तुतिए हिन्द (हिन्द का तोता) कहा जाता है। इसमें खुसरो ने भारत की भाषाओं, विद्वानों, संगीत प्रणालियों एवं प्राकृतिक सम्पदा की भी विस्तार से चर्चा की है, जो उनके गहरे भारत-प्रेम को दर्शाता है।
इब्नबतूता
➣ रेहला का रचयिता अबु अब्दुल्ला मुहम्मद उर्फ इब्न बतूता था। इसका जन्म 1304 ई. में तंजियर (मोरक्को) अफ्रीका में हुआ।
➣ वह एक बरबर मुस्लिम परिवार से सम्बन्ध रखता था तथा कानून की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उसने विश्व-यात्रा प्रारम्भ की। वह 1333 ई. में भारत आया तथा 14 वर्ष तक रहा।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने इब्नबतूता को 1334 ई. में 1200 टंका वार्षिक वेतन पर दिल्ली का काजी बनाया जिस पद पर उसने आठ वर्ष कार्य किया।
➣ इस दौरान उसे सुल्तान के दरबार की कार्यप्रणाली एवं प्रशासनिक व्यवस्था को निकट से देखने का अवसर मिला, जिसका वर्णन उसने अपनी रचना में विस्तार से किया है।
➣ 1341 ई. में सुल्तान ने इब्नबतूता को राजदूत बनाकर चीनी सम्राट तोगन तिमूर के दरबार में भेजा, किन्तु वह बीच में ही वापस लौट आया।
➣ इस यात्रा के दौरान उसका जलयान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसके कारण उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वह 1353 ई. में मोरक्को लौटा।
➣ उसने अपने जीवन के अन्तिम 25 वर्ष मोरक्को के सुल्तान अबू इनान की सेवा में व्यतीत किये तथा उसी के आदेश पर अपना यात्रा विवरण लिखा जो रेहला (सफरनामा) के नाम से प्रकाशित हुआ। इसे लिखने में विद्वान इब्न जुजई ने उसकी सहायता की थी।
➣ रेहला अरबी भाषा में है। इसका अंग्रेजी अनुवाद ली एवं गिब्स ने किया है। यह रचना 14वीं शताब्दी के भारत, मध्य-पूर्व, मध्य एशिया एवं अफ्रीका के सामाजिक-आर्थिक जीवन को समझने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत मानी जाती है।
➣ इब्नबतूता ने ढोल की आवाज के साथ महिला के सती होने का उल्लेख करता है तथा इस प्रथा को विस्तार से वर्णित किया है, जिसमें उसने तत्कालीन समाज में प्रचलित इस परम्परा के प्रति आश्चर्य भी व्यक्त किया है।
➣ इब्नबतूता मदुरा (मलाबार क्षेत्र) भी गया था। वह विभिन्न फसलों, फूलों तथा पान का उल्लेख करता है। उसने भारत के नारियल एवं अन्य उष्णकटिबन्धीय फलों का भी विस्तृत वर्णन किया है, जो उसके लिए नवीन एवं आकर्षक थे।
➣ इब्नबतूता ने दिल्ली को इस्लामी दुनिया के पूर्वी हिस्से का सबसे बड़ा नगर एवं संसार की सबसे बड़ी व्यापारिक मण्डी कहा है। उसने दिल्ली की सड़कों, बाजारों एवं भवन-निर्माण कला की भी प्रशंसा की तथा इसे तत्कालीन विश्व के सबसे समृद्ध एवं वैभवशाली नगरों में से एक बताया।
➣ इब्नबतूता की रचना रेहला भारतीय इतिहास के लिए इस कारण भी महत्वपूर्ण है कि इसमें उसने तुगलक वंश की प्रशासनिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों का एक विदेशी यात्री की दृष्टि से प्रत्यक्षदर्शी विवरण प्रस्तुत किया है, जो स्वदेशी स्रोतों से भिन्न एवं पूरक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
जियाउद्दीन बरनी (1285-1357 ई.)
➣ जियाउद्दीन बरनी सल्तनत काल का सबसे महान् इतिहासकार था। उसका जन्म एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था और वह मुहम्मद बिन तुगलक तथा फिरोजशाह तुगलक के दरबार से जुड़ा रहा।
➣ वह सल्तनत का पहला इतिहासकार था जिसने अलाउद्दीन की बाजार व्यवस्था व मुहम्मद बिन तुगलक की प्रशासनिक व्यवस्थाओं का विस्तृत उल्लेख किया है।
➣ बरनी लगभग 17 वर्षों तक मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार से सम्बद्ध रहा और उसका घनिष्ठ साथी माना जाता था।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने बरनी को जिंदादिल साथी या नदीम की उपाधि दी थी, जो दर्शाता है कि बरनी सुल्तान के अत्यन्त निकट एवं विश्वसनीय व्यक्ति था।
➣ फिरोजशाह तुगलक के समय में बरनी को राजकीय संरक्षण समाप्त होने के कारण आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिसका उल्लेख उसकी रचनाओं में मिलता है।
➣ बरनी का दृष्टिकोण मूलतः उच्च वर्गीय एवं धर्म-केन्द्रित था, और उसने शासन में उलेमा वर्ग के महत्व पर विशेष बल दिया।
➣ बरनी की रचनाओं को सल्तनत काल के राजनीतिक, प्रशासनिक एवं सामाजिक इतिहास को समझने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है, यद्यपि उसके विवरणों में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह एवं अतिशयोक्ति भी पायी जाती है।
➣ बरनी की मृत्यु लगभग 1357 ई. में हुई। उसकी रचनाएं आज भी दिल्ली सल्तनत के इतिहास, प्रशासन एवं समाज को समझने हेतु इतिहासकारों के लिए प्राथमिक स्रोत का दर्जा रखती हैं।
प्रमुख रचनायें-
➣ तारीख-ए-फिरोजशाही — यह बरनी की सबसे प्रसिद्ध रचना है, जिसमें 1192 ई. से 1357 ई. तक की घटनाओं का वर्णन है। इसमें बलवन से फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल तक का इतिहास सम्मिलित है तथा अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नियंत्रण नीति का विस्तृत विवरण मिलता है।
➣ फतवा-ए-जहाँदारी — इस ग्रन्थ में बरनी ने राजनीतिक सिद्धान्तों एवं आदर्श शासन व्यवस्था की चर्चा की है। इसमें उसने सुल्तान के कर्तव्यों, न्याय व्यवस्था एवं धर्म तथा राज्य के सम्बन्धों पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
➣ शाना-ए-मोहम्मदी/सहीफ ए नाट मुहम्मद — यह रचना धार्मिक एवं नैतिक विषयों से सम्बन्धित मानी जाती है।
➣ हसरतनामा — यह बरनी की उन रचनाओं में से एक है जिसमें उसके निजी जीवन की पीड़ा, पश्चाताप एवं वृद्धावस्था की कठिनाइयों का चित्रण मिलता है।
ताज उल मासिर
➣ ताज उल मासिर पुस्तक/ग्रन्थ दिल्ली सल्तनत का प्रथम राजकीय इतिहास है एवं इसके लेखक हसन निजामी को प्रथम इतिहासकार माना जाता है।
➣ हसन निजामी मूलतः निशापुर (ईरान) के निवासी थे और बाद में भारत आकर दिल्ली सल्तनत के दरबार से सम्बद्ध हो गए। इस पुस्तक को अंशतः इतिहास तथा अंशतः उपन्यास का दर्जा प्राप्त है, क्योंकि इसमें अलंकारिक एवं काव्यात्मक भाषा का प्रयोग अधिक मात्रा में किया गया है।
➣ हसन निजामी द्वारा फारसी भाषा में लिखे इस ग्रन्थ में भारत में हुई 1191-1217 ई. तक की घटनाओं का वर्णन है। इसकी भाषा अत्यन्त अलंकृत एवं जटिल मानी जाती है, जिसके कारण कई इतिहासकार इसे ऐतिहासिक तथ्यों से अधिक साहित्यिक रचना के रूप में देखते हैं।
➣ यह मुख्यतः कुतुबुद्दीन ऐबक के समय की घटनाओं का वर्णन करता है, लेकिन कुछ जानकारी मोहम्मद गौरी व इल्तुतमिश की भी मिलती है। इसमें भारत में तुर्क सत्ता की स्थापना, प्रारम्भिक विजयों एवं प्रशासनिक व्यवस्था का भी उल्लेख प्राप्त होता है।
➣ हसन निजामी के अनुसार दिरहम और दीनार नामक सिक्के कुतुबुद्दीन ऐबक ने चलाये, परन्तु अन्य स्रोतों से यह प्रमाणित नहीं होता।
➣ इतिहासकार इस विवरण को लेकर मतभेद रखते हैं और इसे हसन निजामी की अतिशयोक्तिपूर्ण लेखन शैली का परिणाम मानते हैं।
➣ इसके अतिरिक्त, ताज उल मासिर में कुतुबुद्दीन ऐबक के निर्माण कार्यों, जैसे कुतुब मीनार एवं कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के निर्माण की पृष्ठभूमि से जुड़ी जानकारी का भी उल्लेख मिलता है, जो प्रारम्भिक दिल्ली सल्तनत की वास्तुकला को समझने में सहायक है।
➣ अपनी सीमाओं के बावजूद, ताज उल मासिर को दिल्ली सल्तनत के प्रारम्भिक काल के इतिहास-लेखन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है, क्योंकि यह उस काल की एकमात्र समकालीन राजकीय रचनाओं में से एक है।
तबकाते नासिरी
➣ तबकाते नासिरी दिल्ली सल्तनत का प्रथम क्रमबद्ध इतिहास है। इसमें कुल 23 अध्याय/तबके हैं, जिनमें विश्व इतिहास के साथ-साथ भारत के इस्लामी इतिहास का भी क्रमबद्ध वर्णन प्राप्त होता है।
➣ मिन्हाजुद्दीन सिराज द्वारा फारसी भाषा में इसकी रचना हुई। मिन्हाजुद्दीन सिराज मूलतः अफगानिस्तान के निवासी थे, परन्तु मंगोल आक्रमणों के कारण भारत आकर दिल्ली सल्तनत के दरबार से जुड़ गए। H.G. रेवर्टी ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिससे यह ग्रन्थ आधुनिक इतिहासकारों के लिए भी सुलभ हो सका।
➣ इसमें सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के समय 1260 ई. तक का इतिहास वर्णित है। इस ग्रन्थ का नामकरण भी सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के नाम पर ही किया गया, जिनके दरबार से मिन्हाजुद्दीन सिराज सम्बद्ध थे।
➣ तबकाते नासिरी में मंगोल आक्रमणों, विशेष रूप से चंगेज खाँ के आक्रमण का प्रत्यक्षदर्शी वर्णन मिलता है, क्योंकि लेखक स्वयं इन घटनाओं का साक्षी रहा था। यह ग्रन्थ इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसमें गुलाम वंश के प्रारम्भिक शासकों का विस्तृत एवं प्रामाणिक विवरण उपलब्ध होता है।
➣ इस ग्रन्थ में रजिया सुल्तान के शासनकाल का भी उल्लेख मिलता है, और मिन्हाजुद्दीन सिराज ने उनके प्रशासनिक गुणों की प्रशंसा करते हुए उन्हें एक योग्य शासक के रूप में चित्रित किया है, जो उस काल के अन्य इतिहासकारों की तुलना में एक भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
➣ तबकाते नासिरी को दिल्ली सल्तनत के प्रारम्भिक एवं मध्यकालीन इतिहास को समझने हेतु एक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय स्रोत माना जाता है, क्योंकि इसमें लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों एवं समकालीन घटनाओं का प्रत्यक्ष वर्णन सम्मिलित है।
ख्वाजा अबू-वक्र-इसामी
➣ मलिक इसामी अन्य प्रमुख सल्तनत कालीन इतिहासकार थे। इनका जन्म दिल्ली में हुआ था।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक के समय जब राजधानी दिल्ली से दौलताबाद स्थानान्तरित की गई, तब इसामी का परिवार भी दक्षिण भारत चला गया, जिसके कारण इसामी का सम्पर्क बहमनी राज्य से स्थापित हुआ।
➣ इसामी ने फिरोज तुगलक के समय फुतूह-उस-सलातीन (1350 ई.) की रचना की, जिसे बहमनी शासक अलाउद्दीन हसन बहमनशाह को समर्पित किया गया।
➣ यह ग्रन्थ पद्य (काव्य) शैली में लिखा गया है और इसमें दिल्ली सल्तनत के प्रारम्भ से लेकर मुहम्मद बिन तुगलक के काल तक की घटनाओं का वर्णन मिलता है। प्रान्तीय राजवंश के विषय में यह पहली रचना मानी जाती है, जिससे इसामी को दक्षिण भारत के प्रथम फारसी इतिहासकार होने का गौरव भी प्राप्त है।
➣ इसामी की रचना में मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियों की कटु आलोचना मिलती है, विशेष रूप से राजधानी परिवर्तन तथा कर व्यवस्था के सम्बन्ध में, जिससे स्पष्ट होता है कि इसामी तुगलक शासन से असन्तुष्ट था।
➣ इनके अतिरिक्त सल्तनत कालीन इतिहास-लेखन में निम्न रचनाएं भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं:
| लेखक | ग्रंथ | विवरण |
|---|---|---|
| वैहाकी | तारीख-ए-वैहाकी | इसमें गजनवी शासकों, विशेषतः मसूद गजनवी के शासनकाल की घटनाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। |
| अबुल फ़ज़ल मुहम्मद हुसैन अल-बैहाकी | तारीख-ए-मसूदी | यह गजनवी काल से संबंधित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है। |
| हमदुल्ला मुस्तौफ़ी क़ज़वीनी | तारीख-ए-गुज़ीदा | इसमें सामान्य इस्लामी इतिहास का संक्षिप्त विवरण मिलता है। |
| फख्र-ए-मुदब्बिर | अदाब-उल-हर्ब | यह रचना प्रशासनिक, सैन्य एवं नैतिक विषयों से संबंधित मानी जाती है। |
➣ इन सभी रचनाओं के अध्ययन से दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को समझने में सहायता मिलती है तथा यह स्पष्ट होता है कि सल्तनत काल में इतिहास-लेखन की एक समृद्ध परम्परा विद्यमान थी।
➣ मलफूजात-ए-तिमूरी तैमूर लंग की आत्मकथा है जो तैमूर ने तुर्की भाषा में लिखवाई। इसमें तैमूर के जीवन, उसके सैन्य अभियानों तथा भारत पर 1398 ई. के आक्रमण का वर्णन मिलता है।
➣ अबू तालिब हुसैनी ने सर्वप्रथम इसका फारसी अनुवाद किया, जिससे यह रचना फारसी जानने वाले इतिहासकारों के लिए भी सुलभ हो गई।
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