प्रस्तावना
➣ 19वीं शताब्दी का भारत धार्मिक रूढ़ियों, सामाजिक कुरीतियों तथा औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से जूझ रहा था। समाज में सती प्रथा, बाल विवाह, कन्या हत्या, विधवा विवाह निषेध, जाति-भेद, अस्पृश्यता, पर्दा प्रथा जैसी अनेक कुप्रथाएँ प्रचलित थीं।
➣ दूसरी ओर अंग्रेजी शासन के कारण पाश्चात्य शिक्षा, आधुनिक विज्ञान, तर्कवाद, मुद्रण प्रेस तथा समाचार-पत्रों का प्रसार हुआ, जिससे भारतीय समाज में नई चेतना का विकास होने लगा। इसी नवचेतना के परिणामस्वरूप भारत में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों का उदय हुआ।
➣ इन आंदोलनों का उद्देश्य समाज को अंधविश्वास, रूढ़िवादिता तथा सामाजिक कुरीतियों से मुक्त कर आधुनिक, प्रगतिशील एवं मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण करना था।
➣ इन सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज में नई सोच विकसित की तथा आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भी वैचारिक आधार तैयार किया।
भारतीय पुनर्जागरण
➣ भारतीय पुनर्जागरण से आशय 19वीं शताब्दी में भारत में उत्पन्न उस नवजागरण से है, जिसने सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा बौद्धिक जीवन में व्यापक परिवर्तन की शुरुआत की।
➣ इस नवजागरण ने भारतीयों में तर्कशीलता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक समानता, मानवतावाद तथा आत्मसम्मान की भावना को विकसित किया।
➣ भारतीय पुनर्जागरण के प्रमुख प्रेरक राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, ज्योतिराव फुले, महादेव गोविन्द रानाडे, एनी बेसेन्ट तथा सर सैयद अहमद खान जैसे महान समाज सुधारक थे। इन्होंने विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों के माध्यम से समाज सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए।
भारतीय इतिहास में 19वीं शताब्दी के इस नवजागरण को ही भारतीय पुनर्जागरण कहा जाता है, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण की आधारशिला रखी।
19वीं शताब्दी की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति
➣ 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय समाज अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं से ग्रस्त था। धर्म के नाम पर अंधविश्वास, कर्मकाण्ड, मूर्तिपूजा की रूढ़ियाँ तथा पुरोहितवाद का प्रभाव बढ़ गया था।
➣ वहीं सामाजिक जीवन में सती प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह, कन्या हत्या, विधवा विवाह निषेध, पर्दा प्रथा, जाति व्यवस्था तथा अस्पृश्यता जैसी कुप्रथाएँ व्यापक रूप से प्रचलित थीं।
➣ महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें शिक्षा, संपत्ति, सामाजिक स्वतंत्रता एवं सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से लगभग वंचित रखा जाता था। दूसरी ओर निम्न जातियों एवं दलित वर्गों के साथ सामाजिक भेदभाव किया जाता था तथा उन्हें अनेक धार्मिक एवं सामाजिक अधिकारों से वंचित रखा गया था।
➣ ऐसी परिस्थितियों में समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने महसूस किया कि भारतीय समाज के सर्वांगीण विकास के लिए धार्मिक एवं सामाजिक सुधार अत्यंत आवश्यक हैं।
धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों की आवश्यकता
➣ 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों ने समाज की प्रगति को बाधित कर दिया था।
➣ महिलाओं, निम्न जातियों तथा वंचित वर्गों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। ऐसी परिस्थितियों में समाज को आधुनिक, शिक्षित एवं समानतापूर्ण बनाने के लिए व्यापक सुधार आंदोलनों की आवश्यकता महसूस हुई।
➣ इन आंदोलनों का उद्देश्य धर्म को उसके मूल स्वरूप में स्थापित करना, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करना, स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना, जातिगत भेदभाव समाप्त करना तथा भारतीय समाज में आधुनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना था।
धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों के प्रमुख कारण
- सामाजिक कुरीतियाँ — सती प्रथा, बाल विवाह, कन्या हत्या, बहुविवाह, विधवा विवाह निषेध, पर्दा प्रथा एवं अस्पृश्यता जैसी कुप्रथाओं का प्रचलन।
- धार्मिक रूढ़िवादिता — कर्मकाण्ड, अंधविश्वास, मूर्तिपूजा की रूढ़ियाँ तथा पुरोहितवाद का बढ़ता प्रभाव।
- पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार — अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भारतीयों को उदारवाद, समानता, स्वतंत्रता तथा वैज्ञानिक चिंतन जैसे आधुनिक विचारों का परिचय मिला।
- मुद्रण प्रेस एवं समाचार-पत्र — पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों के माध्यम से नए विचारों का तीव्र प्रसार हुआ और जनजागरण को बल मिला।
- ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ — मिशनरियों द्वारा भारतीय समाज की कुरीतियों की आलोचना से भारतीय सुधारकों ने आत्ममंथन प्रारम्भ किया।
- आधुनिक विज्ञान एवं तर्कवाद — वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार से अंधविश्वास एवं रूढ़ियों को चुनौती मिली।
- शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय — अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नए शिक्षित वर्ग ने सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों का नेतृत्व किया।
- राष्ट्रीय चेतना का विकास — सुधारकों का विश्वास था कि सामाजिक सुधार के बिना राष्ट्रीय उन्नति एवं स्वतंत्रता संभव नहीं है।
प्रमुख हिन्दू धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन
➣ 19वीं शताब्दी में हिन्दू समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों को समाप्त करने के उद्देश्य से अनेक धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों का उदय हुआ।
➣ इन आंदोलनों ने एकेश्वरवाद, स्त्री शिक्षा, सामाजिक समानता, जाति-भेद के विरोध तथा आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देकर भारतीय नवजागरण को नई दिशा प्रदान की।
| आंदोलन | स्थापना | संस्थापक | मुख्य उद्देश्य / विशेषता |
|---|---|---|---|
| ब्रह्म समाज | 1828 ई. कलकत्ता |
राजा राममोहन राय | एकेश्वरवाद का प्रचार, सती प्रथा, जाति-भेद एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों का विरोध। |
| प्रार्थना समाज | 1867 ई. बम्बई |
डॉ. आत्माराम पांडुरंग | एकेश्वरवाद, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह एवं सामाजिक सुधार को प्रोत्साहन। |
| आर्य समाज | 1875 ई. बम्बई |
स्वामी दयानन्द सरस्वती | “वेदों की ओर लौटो” का संदेश, वैदिक धर्म का पुनरुत्थान एवं सामाजिक सुधार। |
| रामकृष्ण मिशन | 1897 ई. बेलूर (कलकत्ता) |
स्वामी विवेकानन्द | “मानव सेवा ही ईश्वर सेवा” के सिद्धांत पर शिक्षा, सेवा एवं आध्यात्मिक उत्थान। |
| थियोसोफिकल सोसाइटी | 1875 ई. न्यूयॉर्क (भारत में मुख्यालय : अडयार, मद्रास) |
मैडम एच. पी. ब्लावात्स्की एवं कर्नल एच. एस. ऑलकॉट | विश्व बंधुत्व, प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं तुलनात्मक धर्म का प्रचार। |
| यंग बंगाल आंदोलन | 1828 ई. कलकत्ता |
हेनरी विवियन डेरोजियो | तर्कवाद, स्वतंत्र चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं सामाजिक जागरण को बढ़ावा। |
| राधास्वामी सत्संग | 1861 ई. आगरा |
शिवदयाल साहब | आध्यात्मिक साधना, नैतिक जीवन एवं सभी धर्मों की समानता पर बल। |
| देव समाज | 1887 ई. लाहौर |
शिवनारायण अग्निहोत्री | नैतिक जीवन, चरित्र निर्माण एवं सामाजिक सुधार का समर्थन। |
| मानव धर्म सभा | 1844 ई. सूरत |
मेहताजी दुर्गाराम | जाति-भेद, अंधविश्वास एवं सामाजिक कुरीतियों का विरोध तथा नैतिक जीवन पर बल। |
प्रमुख मुस्लिम धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन
➣ 19वीं शताब्दी में भारतीय मुस्लिम समाज भी शैक्षिक पिछड़ेपन, धार्मिक रूढ़ियों तथा सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। 1857 के विद्रोह के बाद मुस्लिम समाज की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो गई।
➣ ऐसी परिस्थितियों में अनेक मुस्लिम विद्वानों एवं सुधारकों ने शिक्षा, धार्मिक सुधार तथा सामाजिक जागरण के उद्देश्य से विभिन्न आंदोलनों एवं संस्थाओं की स्थापना की।
➣ इन आंदोलनों का उद्देश्य आधुनिक शिक्षा का प्रसार, इस्लामी शिक्षाओं का पुनरुत्थान, धार्मिक सुधार तथा मुस्लिम समाज में नई चेतना का विकास करना था। यद्यपि इन आंदोलनों की विचारधारा एवं कार्यप्रणाली अलग-अलग थी, फिर भी इनका भारतीय मुस्लिम समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा।
| आंदोलन | स्थापना | संस्थापक / प्रमुख नेता | मुख्य उद्देश्य / विशेषता |
|---|---|---|---|
| अलीगढ़ आंदोलन | 1875 ई. अलीगढ़ |
सर सैयद अहमद ख़ाँ | आधुनिक एवं पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार तथा मुस्लिम समाज का शैक्षिक एवं सामाजिक उत्थान। |
| वहाबी आंदोलन | 19वीं शताब्दी का प्रारम्भ | भारत में : सैयद अहमद बरेलवी | इस्लाम को उसकी मूल शिक्षाओं के अनुरूप स्थापित करना तथा धार्मिक शुद्धता पर बल देना। |
| देवबंद आंदोलन | 1866 ई. देवबंद (सहारनपुर) |
मौलाना मुहम्मद क़ासिम नानौतवी एवं रशीद अहमद गंगोही | पारंपरिक इस्लामी शिक्षा का संरक्षण तथा धार्मिक शिक्षा का प्रसार। |
| अहमदिया आंदोलन | 1889 ई. कादियाँ (पंजाब) |
मिर्ज़ा गुलाम अहमद | इस्लाम के शांतिपूर्ण प्रचार एवं धार्मिक सुधार पर बल। |
| नदवातुल उलेमा | 1894 ई. लखनऊ |
मौलाना मुहम्मद अली मोंगेरी | पारंपरिक एवं आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर बल। |
| अहल-ए-हदीस आंदोलन | 19वीं शताब्दी | सैयद नज़ीर हुसैन (प्रमुख नेता) | कुरान एवं हदीस पर आधारित इस्लामी जीवन का समर्थन तथा धार्मिक नवाचारों का विरोध। |
| अहल-ए-कुरान आंदोलन | 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध | अब्दुल्ला चकरालवी (प्रमुख नेता) | केवल कुरान को धार्मिक मार्गदर्शन का सर्वोच्च स्रोत मानना। |
अलीगढ़ आंदोलन आधुनिक शिक्षा से, देवबंद आंदोलन पारंपरिक इस्लामी शिक्षा से तथा वहाबी आंदोलन धार्मिक शुद्धता से संबंधित प्रमुख मुस्लिम सुधार आंदोलन माना जाता है।
प्रमुख सिख धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में सिख समाज में धार्मिक परम्पराओं के संरक्षण, गुरुद्वारों के प्रबंधन में सुधार तथा सिख पहचान को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक सुधार आंदोलनों का उदय हुआ।
➣ इन आंदोलनों ने सिख धर्म के मूल सिद्धांतों के पुनरुत्थान, धार्मिक संस्थाओं के सुधार तथा सामाजिक जागरूकता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
| आंदोलन | स्थापना | प्रमुख नेता / संस्थापक | मुख्य उद्देश्य / विशेषता |
|---|---|---|---|
| सिंह सभा आंदोलन | 1873 ई. अमृतसर |
बाबा खेम सिंह बेदी तथा अन्य सिख विद्वान | सिख धर्म के मूल सिद्धांतों का पुनरुत्थान, धार्मिक शिक्षा का प्रसार तथा ईसाई मिशनरियों एवं आर्य समाज के प्रभाव का उत्तर देना। |
| अकाली आंदोलन | 1920 ई. | शिरोमणि अकाली दल के नेतृत्व में | गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों के नियंत्रण से मुक्त कर लोकतांत्रिक प्रबंधन स्थापित करना। |
| गुरुद्वारा सुधार आंदोलन | 1920–1925 ई. | शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) एवं अकाली स्वयंसेवक | गुरुद्वारों का प्रबंधन सिख समुदाय को सौंपना तथा धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता एवं सुधार स्थापित करना। |
सिंह सभा आंदोलन ने सिख धर्म के पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त किया, जबकि अकाली आंदोलन एवं गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 पारित हुआ और गुरुद्वारों का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) को सौंपा गया।
पारसी धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन
➣ 19वीं शताब्दी में पारसी समाज में आधुनिक शिक्षा, सामाजिक सुधार तथा धार्मिक पुनर्जागरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रहनुमाई मजदयसन सभा की स्थापना की गई।
➣ इस संस्था ने पारसी समाज में आधुनिक विचारों का प्रसार किया तथा धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए।
| संस्था / आंदोलन | स्थापना | संस्थापक | मुख्य उद्देश्य / विशेषता |
|---|---|---|---|
| रहनुमाई मजदयसन सभा | 1851 ई. बम्बई |
नौरोजी फरदूनजी, दादाभाई नौरोजी, एस. एस. बंगाली एवं अन्य पारसी सुधारक | पारसी धर्म का पुनर्जागरण, आधुनिक शिक्षा का प्रसार, महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन, सामाजिक कुरीतियों का विरोध तथा पारसी समाज में आधुनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास। |
दलित एवं पिछड़ा वर्ग सुधार आंदोलन
➣ 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में भारतीय समाज में व्याप्त जाति-भेद, अस्पृश्यता तथा सामाजिक असमानता को समाप्त करने के उद्देश्य से अनेक सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों का उदय हुआ। इन आंदोलनों ने दलितों, पिछड़े वर्गों एवं वंचित समुदायों के सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक तथा राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
➣ इन सुधार आंदोलनों के परिणामस्वरूप शिक्षा का प्रसार, मंदिर प्रवेश आंदोलन, सामाजिक समानता, आत्मसम्मान, अस्पृश्यता उन्मूलन तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे विषय राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बने और आगे चलकर भारतीय संविधान में समानता एवं सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को भी बल मिला।
| आंदोलन / संस्था | स्थापना | संस्थापक / प्रमुख नेता | मुख्य उद्देश्य / विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| सत्यशोधक समाज | 1873 ई. पुणे (महाराष्ट्र) |
महात्मा ज्योतिराव फुले | ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था, जाति-भेद एवं धार्मिक आडम्बरों का विरोध तथा दलितों, शूद्रों एवं महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा को बढ़ावा देना। इसके समर्थकों ने बहुजन समाज के हितों की बात की। 1920–30 के दशक में केशवराव जेधे एवं दिनकरराव जवलकर इसके प्रमुख नेताओं में रहे। |
| श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (SNDP) | 1903 ई. केरल |
श्री नारायण गुरु, डॉ. पल्पू एवं कुमारन आसन | केरल के एझवा (इड़वा) समुदाय के सामाजिक उत्थान के लिए स्थापित। इसका मूल संदेश था “एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर”। टी.के. माधवन सहित अनेक नेताओं ने मंदिर प्रवेश एवं छुआछूत विरोधी आंदोलनों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| डिप्रेस्ड क्लास मिशन सोसायटी ऑफ इंडिया | 1906 ई. बम्बई |
विठ्ठल रामजी शिंदे (वी.आर. शिंदे) प्रथम अध्यक्ष – न्यायमूर्ति एन.जी. चन्द्रावरकर |
दलित वर्गों की शिक्षा, सामाजिक सुधार एवं आर्थिक उत्थान के लिए स्थापित। मार्च 1918 ई. में प्रथम अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन आयोजित किया गया। 1931 ई. के कराची अधिवेशन में समान नागरिक अधिकारों एवं सार्वजनिक सुविधाओं के समान उपयोग पर बल दिया गया। |
| बहिष्कृत हितकारिणी सभा | 1924 ई. बम्बई |
डॉ. भीमराव अम्बेडकर | दलितों के सामाजिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक उत्थान के लिए स्थापित। डॉ. अम्बेडकर ने समाज समता संघ के माध्यम से सामाजिक समानता का प्रचार किया। 1927 ई. में बहिष्कृत भारत पत्र का प्रकाशन तथा 1942 ई. में अनुसूचित जाति परिसंघ (Scheduled Castes Federation) की स्थापना की। |
| वायकोम सत्याग्रह | 1924–25 ई. त्रावणकोर (केरल) |
के.पी. केशव मेनन एवं ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ | मंदिर मार्गों एवं मंदिर प्रवेश के अधिकार के लिए चलाया गया ऐतिहासिक आंदोलन। पेरियार के नेतृत्व के कारण इसे व्यापक पहचान मिली तथा दक्षिण भारत में छुआछूत विरोधी आंदोलन को नई दिशा मिली। |
| आत्मसम्मान आंदोलन | 1925 ई. तमिलनाडु |
ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’ | जाति-भेद, ब्राह्मणवादी वर्चस्व एवं सामाजिक असमानता का विरोध। आत्मसम्मान, तर्कवाद, महिला अधिकारों एवं सामाजिक समानता को बढ़ावा देना। इस आंदोलन ने दक्षिण भारत के गैर-ब्राह्मण आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। |
| अखिल भारतीय अस्पृश्यता निवारण संघ (हरिजन सेवक संघ) |
1932 ई. | महात्मा गांधी की प्रेरणा से | अस्पृश्यता उन्मूलन तथा हरिजनों के सामाजिक उत्थान के लिए स्थापित। 1933 ई. में इसका नाम हरिजन सेवक संघ रखा गया। इसी वर्ष महात्मा गांधी ने साप्ताहिक हरिजन का प्रकाशन प्रारम्भ किया तथा मंदिर प्रवेश एवं समान अधिकारों के लिए अभियान चलाया। |
| जस्टिस पार्टी आंदोलन | 1916 ई. मद्रास |
सी.एन. मुदालियार, टी.एम. नायर एवं पी. त्यागराजा चेट्टी | दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण आंदोलन का नेतृत्व किया तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व एवं समान अवसरों की मांग उठाई। 1944 ई. के सलेम सम्मेलन में इसका नाम द्रविड़र कड़गम रखा गया, जिसके प्रमुख नेता बाद में ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ बने। |
धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों की सामान्य विशेषताएँ
➣ यद्यपि 19वीं एवं 20वीं शताब्दी के धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों की विचारधारा, कार्यप्रणाली तथा उद्देश्य एक-दूसरे से भिन्न थे, फिर भी इनमें अनेक सामान्य विशेषताएँ समान रूप से दिखाई देती हैं।
➣ इन आंदोलनों ने भारतीय समाज में धार्मिक सहिष्णुता, सामाजिक समानता, आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा मानवतावादी मूल्यों को प्रोत्साहित किया और आधुनिक भारत के निर्माण की आधारशिला रखी।
| सामान्य विशेषता | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| एकेश्वरवाद | अनेक आंदोलनों ने बहुदेववाद एवं अंधविश्वास का विरोध कर एक ईश्वर की अवधारणा पर बल दिया। |
| तर्कवाद एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण | धर्म एवं समाज से जुड़ी रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं कर्मकाण्डों की तर्क एवं विवेक के आधार पर समीक्षा की गई। |
| स्त्री शिक्षा का समर्थन | महिलाओं की शिक्षा को सामाजिक प्रगति का आधार मानते हुए बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया गया। |
| जाति-प्रथा एवं अस्पृश्यता का विरोध | जातिगत भेदभाव, ऊँच-नीच एवं अस्पृश्यता को समाप्त कर सामाजिक समानता स्थापित करने का प्रयास किया गया। |
| बाल विवाह का विरोध | कम आयु में विवाह की प्रथा को समाज के विकास में बाधक मानते हुए इसका विरोध किया गया। |
| विधवा विवाह का समर्थन | विधवाओं को सम्मानजनक जीवन देने तथा विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया। |
| आधुनिक शिक्षा का प्रसार | विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थाओं की स्थापना कर आधुनिक एवं वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा दिया गया। |
| सामाजिक समानता एवं मानवतावाद | धर्म, जाति एवं लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव का विरोध करते हुए समान अधिकार एवं मानव गरिमा पर बल दिया गया। |
| धार्मिक सुधार | धर्म को उसकी मूल शिक्षाओं के अनुरूप प्रस्तुत करने तथा अनावश्यक कर्मकाण्डों का विरोध किया गया। |
| राष्ट्रीय चेतना का विकास | इन आंदोलनों ने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास एवं राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ किया, जिसने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया। |
➣ लगभग सभी धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों का लक्ष्य सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन, आधुनिक शिक्षा का प्रसार, स्त्री उत्थान, जाति-भेद का विरोध, धार्मिक सुधार तथा राष्ट्रीय चेतना का विकास था। यही इन आंदोलनों की प्रमुख सामान्य विशेषताएँ मानी जाती हैं।
धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों की सीमाएँ
➣ यद्यपि 19वीं एवं 20वीं शताब्दी के धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज में व्यापक परिवर्तन लाने का प्रयास किया, फिर भी इनकी कुछ सीमाएँ एवं कमियाँ थीं। अधिकांश आंदोलनों का प्रभाव समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँच सका और कई सुधार प्रयास सीमित दायरे तक ही रह गए।
| सीमा | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| शहरी क्षेत्रों तक सीमित प्रभाव | अधिकांश सुधार आंदोलनों का प्रभाव मुख्यतः शहरों एवं शिक्षित वर्ग तक ही सीमित रहा। |
| ग्रामीण समाज पर सीमित प्रभाव | ग्रामीण क्षेत्रों में रूढ़िवादिता, अशिक्षा एवं सामाजिक परम्पराओं के कारण इन आंदोलनों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा। |
| निम्न वर्गों तक सीमित पहुँच | अनेक सुधार आंदोलनों का नेतृत्व शिक्षित एवं उच्च वर्ग के लोगों ने किया, जिससे दलितों, किसानों एवं श्रमिकों तक इनका प्रभाव सीमित रहा। |
| धार्मिक एवं रूढ़िवादी विरोध | रूढ़िवादी धार्मिक नेताओं एवं परम्परावादी समूहों ने कई सुधारों का तीव्र विरोध किया, जिससे सुधारों की गति धीमी रही। |
| संगठित राष्ट्रीय कार्यक्रम का अभाव | अधिकांश आंदोलन अपने-अपने धर्म, क्षेत्र अथवा समुदाय तक सीमित रहे और उनमें व्यापक समन्वय का अभाव था। |
| आर्थिक समस्याओं की उपेक्षा | इन आंदोलनों का मुख्य ध्यान सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों पर रहा, जबकि गरीबी, भूमि व्यवस्था एवं आर्थिक शोषण जैसे मुद्दों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। |
| सामाजिक परिवर्तन की धीमी गति | सती प्रथा, बाल विवाह, जाति-भेद एवं अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों को समाप्त करने में लंबा समय लगा और कई समस्याएँ लंबे समय तक बनी रहीं। |
प्रमुख धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों की तुलनात्मक सारणी
➣ नीचे दी गई सारणी में 19वीं एवं 20वीं शताब्दी के प्रमुख धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों, उनके संस्थापक, स्थापना वर्ष तथा प्रमुख उद्देश्य का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।
| आंदोलन / संस्था | संस्थापक / प्रमुख नेता | वर्ष | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| ब्रह्म समाज | राजा राममोहन राय | 1828 ई. | एकेश्वरवाद एवं सामाजिक-धार्मिक सुधार |
| प्रार्थना समाज | डॉ. आत्माराम पांडुरंग | 1867 ई. | सामाजिक सुधार एवं स्त्री शिक्षा |
| आर्य समाज | स्वामी दयानन्द सरस्वती | 1875 ई. | वेदों की ओर लौटो एवं वैदिक धर्म का पुनरुत्थान |
| रामकृष्ण मिशन | स्वामी विवेकानन्द | 1897 ई. | मानव सेवा, शिक्षा एवं आध्यात्मिक उत्थान |
| थियोसोफिकल सोसाइटी | एच. पी. ब्लावात्स्की एवं एच. एस. ऑलकॉट | 1875 ई. | विश्व बंधुत्व एवं भारतीय संस्कृति का प्रचार |
| यंग बंगाल आंदोलन | हेनरी विवियन डेरोजियो | 1828 ई. | तर्कवाद एवं स्वतंत्र चिंतन |
| राधास्वामी सत्संग | शिवदयाल साहब | 1861 ई. | आध्यात्मिक एवं नैतिक जीवन |
| देव समाज | शिवनारायण अग्निहोत्री | 1887 ई. | नैतिक एवं सामाजिक सुधार |
| मानव धर्म सभा | मेहताजी दुर्गाराम | 1844 ई. | सामाजिक समानता एवं नैतिक सुधार |
| अलीगढ़ आंदोलन | सर सैयद अहमद ख़ाँ | 1875 ई. | आधुनिक शिक्षा एवं मुस्लिम समाज का उत्थान |
| वहाबी आंदोलन | सैयद अहमद बरेलवी | 19वीं शताब्दी | धार्मिक शुद्धता एवं इस्लामी सुधार |
| देवबंद आंदोलन | मुहम्मद क़ासिम नानौतवी | 1866 ई. | पारंपरिक इस्लामी शिक्षा का संरक्षण |
| अहमदिया आंदोलन | मिर्ज़ा गुलाम अहमद | 1889 ई. | धार्मिक सुधार एवं इस्लाम का शांतिपूर्ण प्रचार |
| नदवातुल उलेमा | मुहम्मद अली मोंगेरी | 1894 ई. | आधुनिक एवं पारंपरिक शिक्षा का समन्वय |
| अहल-ए-हदीस | सैयद नज़ीर हुसैन | 19वीं शताब्दी | कुरान एवं हदीस आधारित धार्मिक जीवन |
| अहल-ए-कुरान | अब्दुल्ला चकरालवी | 19वीं शताब्दी | केवल कुरान को सर्वोच्च धार्मिक आधार मानना |
| सिंह सभा आंदोलन | बाबा खेम सिंह बेदी | 1873 ई. | सिख धर्म का पुनर्जागरण |
| अकाली (गुरुद्वारा सुधार) आंदोलन | शिरोमणि अकाली दल | 1920 ई. | गुरुद्वारों का सुधार एवं प्रबंधन |
| रहनुमाई मजदयसन सभा | नौरोजी फरदूनजी | 1851 ई. | पारसी समाज एवं धर्म में सुधार |
| सत्यशोधक समाज | महात्मा ज्योतिराव फुले | 1873 ई. | जाति-भेद का विरोध एवं सामाजिक समानता |
| श्री नारायण धर्म परिपालन योगम | श्री नारायण गुरु | 1903 ई. | पिछड़े वर्गों का सामाजिक उत्थान |
| आत्मसम्मान आंदोलन | ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’ | 1925 ई. | जाति-विरोध एवं आत्मसम्मान |
| हरिजन आंदोलन | महात्मा गांधी | 1932 ई. के बाद | अस्पृश्यता उन्मूलन एवं सामाजिक समानता |
| डिप्रेस्ड क्लास मिशन | विठ्ठल रामजी शिंदे | 1906 ई. | दलित वर्गों की शिक्षा एवं सामाजिक उत्थान |
प्रमुख सामाजिक-धार्मिक संगठन एवं संस्थाएँ
19वीं एवं 20वीं शताब्दी में भारत में अनेक सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक एवं सुधारवादी संगठनों की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण, आधुनिक शिक्षा, राष्ट्रीय चेतना तथा वंचित वर्गों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
| स्थापना वर्ष | संगठन / संस्था | स्थान | संस्थापक / प्रमुख व्यक्ति |
|---|---|---|---|
| 1815 ई. | आत्मीय सभा | कलकत्ता | राजा राममोहन राय |
| 1825 ई. | वेदान्त कॉलेज | कलकत्ता | राजा राममोहन राय |
| 1828 ई. | ब्रह्म समाज | कलकत्ता | राजा राममोहन राय |
| 1828 ई. | यंग बंगाल आंदोलन | कलकत्ता | हेनरी लुईस विवियन डेरोजियो |
| 1828 ई. | वहाबी आंदोलन | रायबरेली एवं पटना | सैयद अहमद बरेलवी |
| 1839 ई. | तत्त्वबोधिनी सभा | कलकत्ता | देवेन्द्रनाथ टैगोर |
| 1844 ई. | मानव धर्म सभा | सूरत | मेहताजी दुर्गाराम मंशाराम |
| 1849 ई. | परमहंस सभा | महाराष्ट्र | दादोबा पांडुरंग |
| 1851 ई. | रहनुमाई मजदयसन सभा | बम्बई | नौरोजी फरदूनजी, दादाभाई नौरोजी एवं एस.एस. बंगाली |
| 1861 ई. | राधास्वामी सत्संग | आगरा | शिवदयाल साहब |
| 1864 ई. | साइंटिफिक सोसायटी | अलीगढ़ | सर सैयद अहमद ख़ाँ |
| 1866 ई. | आदि ब्रह्म समाज | कलकत्ता | देवेन्द्रनाथ टैगोर |
| 1866 ई. | दारुल उलूम देवबंद | देवबंद (सहारनपुर) | मुहम्मद क़ासिम नानौतवी एवं रशीद अहमद गंगोही |
| 1866 ई. | भारतवर्षीय ब्रह्म समाज | कलकत्ता | केशवचन्द्र सेन |
| 1867 ई. | प्रार्थना समाज | बम्बई | डॉ. आत्माराम पांडुरंग (बाद में महादेव गोविन्द रानाडे) |
| 1870 ई. | पूना सार्वजनिक सभा | पुणे | महादेव गोविन्द रानाडे, गणेश वासुदेव जोशी एवं एस.एच. चिपलूणकर |
| 1871 ई. | ब्रह्म समाज ऑफ साउथ इंडिया | मद्रास | श्रीधरालु नायडू |
| 1873 ई. | सत्यशोधक समाज | पुणे | महात्मा ज्योतिराव फुले |
| 1875 ई. | अलीगढ़ आंदोलन | अलीगढ़ | सर सैयद अहमद ख़ाँ |
| 1875 ई. | आर्य समाज | बम्बई | स्वामी दयानन्द सरस्वती |
| 1875 ई. | थियोसोफिकल सोसाइटी | न्यूयॉर्क (बाद में अड्यार, मद्रास) | एच.पी. ब्लावात्स्की एवं एच.एस. ऑलकॉट |
| 1877 ई. | साधारण ब्रह्म समाज | कलकत्ता | आनन्द मोहन बोस एवं शिवनाथ शास्त्री |
| 1878 ई. | राजमुंदरी समाज सुधार संघ | राजमुंदरी | कंदुकुरी वीरेशलिंगम पंतुलु |
| 1882 ई. | गौ रक्षिणी सभा | पंजाब | स्वामी दयानन्द सरस्वती |
| 1884 ई. | मद्रास महाजन सभा | मद्रास | एम. वीराराघवाचारी, जी. सुब्रह्मण्य अय्यर एवं पी. आनंद चार्लू |
| 1884 ई. | दीनबंधु सार्वजनिक सभा | महाराष्ट्र | महात्मा ज्योतिराव फुले |
| 1884 ई. | दक्कन एजुकेशन सोसाइटी | पुणे | बाल गंगाधर तिलक, गोपाल गणेश आगरकर एवं सहयोगी |
| 1886 ई. | रामकृष्ण मठ | बेलूर | स्वामी विवेकानन्द |
| 1887 ई. | देव समाज | लाहौर | शिवनारायण अग्निहोत्री |
| 1887 ई. | राष्ट्रीय समाज सुधार समिति | बम्बई | महादेव गोविन्द रानाडे |
| 1889 ई. | अहमदिया आंदोलन | कादियाँ (गुरदासपुर) | मिर्ज़ा गुलाम अहमद |
| 1897 ई. | रामकृष्ण मिशन | बेलूर (हावड़ा) | स्वामी विवेकानन्द |
| 1903 ई. | श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (SNDP) | केरल | श्री नारायण गुरु, डॉ. पल्पू एवं कुमारन आसन |
| 1915 ई. | हिन्दू महासभा | हरिद्वार | मदन मोहन मालवीय (प्रमुख प्रेरक) |
| 1915 ई. | साबरमती आश्रम (सत्याग्रह आश्रम) | अहमदाबाद | महात्मा गांधी |
| 1916 ई. | जस्टिस पार्टी | मद्रास | सी.एन. मुदालियार, टी.एम. नायर एवं पी. त्यागराजा चेट्टी |
| 1921 ई. | विश्व भारती | शांतिनिकेतन | रवीन्द्रनाथ टैगोर |
| 1924 ई. | बहिष्कृत हितकारिणी सभा | बम्बई | डॉ. भीमराव अम्बेडकर |
| 1932 ई. | हरिजन सेवक संघ | दिल्ली | महात्मा गांधी |
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