1. इस्तमरारी बंदोबस्त किसने लागू किया?
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(c)
लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी बंदोबस्त) लागू किया। इस व्यवस्था के तहत जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी मान लिया गया, जिन्हें कुल भू-राजस्व का 10/11 भाग ईस्ट इंडिया कंपनी को देना होता था और शेष 1/11 भाग वे अपने पास रख सकते थे। यह व्यवस्था समूचे ब्रिटिश भारत के लगभग 19% क्षेत्र में प्रभावी थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्थायी बंदोबस्त का मुख्य दोष यह था कि यदि जमींदार निर्धारित तिथि (सूर्यास्त कानून / Sunset Law) तक सरकार को लगान नहीं चुकाता था, तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी। इसके अलावा, इस व्यवस्था के प्रमुख सैद्धांतिक प्रेरणास्रोत जॉन शोर थे, जिन्होंने इसका मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
2. भारत में उपनिवेशी शासनकाल में ‘होम चार्जेज’ भारत से संपत्ति दोहन का महत्वपूर्ण अंग थे।
निम्नलिखित में से कौन-सी निधि/ निधियां ‘होम चार्जेज’ की संघटक थी/थी?
1.लंदन में इंडिया ऑफिस के भरण-पोषण के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली निधि।
2. भारत में कार्यरत अंग्रेज कर्मचारियों के वेतन तथा पेंशन देने हेतु प्रयोग में लाई जाने वाली निधि।
3. भारत के बाहर हुए युद्धों को लड़ने में अंग्रेजों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली निधि
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही चुनिए-
निम्नलिखित में से कौन-सी निधि/ निधियां ‘होम चार्जेज’ की संघटक थी/थी?
1.लंदन में इंडिया ऑफिस के भरण-पोषण के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली निधि।
2. भारत में कार्यरत अंग्रेज कर्मचारियों के वेतन तथा पेंशन देने हेतु प्रयोग में लाई जाने वाली निधि।
3. भारत के बाहर हुए युद्धों को लड़ने में अंग्रेजों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली निधि
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही चुनिए-
I.A.S. (Pre) 2011
उत्तर--(b)
औपनिवेशिक काल में ‘होम चार्जेज’ (गृह शुल्क) से आशय इंग्लैंड स्थित भारत सचिव (Secretary of State) द्वारा भारत सरकार की ओर से किए गए व्यय से था। इसमें भारतीय सार्वजनिक ऋण पर ब्याज, रेलवे में लगाई गई पूंजी पर ब्याज, यूरोपीय अफसरों के भत्ते एवं पेंशन, तथा इंग्लैंड में राज्य सचिव के कार्यालय का व्यय सम्मिलित था। किंतु भारत के बाहर लड़े गए युद्धों का व्यय इन गृह शुल्कों में सम्मिलित नहीं था, वह अलग से भारत के राजस्व पर डाला जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री दादाभाई नौरोजी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” (1901) में ‘धन निकासी सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) प्रस्तुत किया और होम चार्जेज को भारत की आर्थिक दुर्दशा का प्रमुख कारण बताया। उनके अनुसार यह धन निकासी एकतरफा थी- भारत को इसके बदले में कोई वास्तविक वस्तु या सेवा प्राप्त नहीं होती थी।
3. किसके प्रशासन काल में ‘स्थायी बंदोबस्त’ प्रारंभ किया गया था?
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2002
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
U.P.P.C.S. (Pre) 2007
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
U.P.P.C.S. (Pre) 2007
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(b)
स्थायी बंदोबस्त लॉर्ड कार्नवालिस के प्रशासन काल में 1793 ई. में लागू किया गया। इसे जमींदारी व्यवस्था भी कहा जाता है क्योंकि इसमें जमींदारों को भू-स्वामी के रूप में मान्यता दी गई। यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश के वाराणसी मंडल तक लागू थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्थायी बंदोबस्त से पहले वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1772 में पाँच वर्षीय बंदोबस्त लागू किया था, जिसमें भूमि को नीलामी द्वारा सर्वाधिक बोली लगाने वाले को दिया जाता था। कार्नवालिस ने इस अनिश्चितता को समाप्त कर स्थायी व्यवस्था बनाई ताकि जमींदार भूमि सुधार में निवेश के लिए प्रोत्साहित हों, हालांकि यह उद्देश्य कभी पूरी तरह साकार नहीं हुआ।
4. 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस की भू-व्यवस्था प्रणाली लागू होने के बाद
कानूनी विवादों की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी देखी गई थी। निम्नलिखित प्रावधानों में से किस एक को सामान्यतया इसके कारक के रूप
में जोड़ कर देखा जाता है?
I.A.S. (Pre) 2011
उत्तर-(d)
1793 ई. की स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था में जमींदारी भू-क्षेत्र की स्पष्ट सीमाएं निर्धारित नहीं की गई थीं। लगान रहित अनुदान भूमि, चारागाह, परती भूमि तथा सार्वजनिक भूमि के स्वामित्व को लेकर अस्पष्टता बनी रही। इसके अलावा जमींदार और कृषक (रैयत) के बीच अनेक मध्यस्थ वर्गों के उभरने से भी विधिक विवादों में वृद्धि हुई। उपर्युक्त तीनों कथन (a), (b) और (c) में से कोई भी इस वृद्धि का सटीक कारण नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार और मूल काश्तकार के बीच पट्टीदार, बिस्वेदार, ठेकेदार जैसे कई मध्यस्थ वर्ग उभरे, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘अंडर-टेनेंट्स’ कहा जाता था। इन मध्यस्थों की बहुलता ने न केवल कानूनी विवाद बढ़ाए, बल्कि रैयतों का शोषण भी तीव्र हो गया, जिसकी परिणति अंततः 1859 के बंगाल काश्तकारी अधिनियम के रूप में हुई।
5. लॉर्ड कार्नवालिस का स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया-
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(d)
लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में स्थायी बंदोबस्त लागू किया। यह व्यवस्था मुख्यतः बंगाल प्रेसीडेंसी में लागू हुई और इसे ‘बंगाल रेगुलेशन’ के अंतर्गत विधिक रूप दिया गया। इसमें भू-राजस्व की दर स्थायी रूप से निर्धारित कर दी गई, अर्थात् सरकार भविष्य में इसे बढ़ा नहीं सकती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्नवालिस ने इसी वर्ष 1793 में ‘कार्नवालिस कोड’ भी लागू किया, जिसके द्वारा नागरिक प्रशासन और न्याय व्यवस्था को पुनर्गठित किया गया। इस कोड के तहत कलेक्टर को न्यायिक अधिकारों से वंचित किया गया और राजस्व व न्याय कार्यों को पृथक कर दिया गया- यह भारत में शक्ति पृथक्करण का एक प्रारंभिक प्रयोग था।
6. शब्द ‘इंपीरियल प्रेफरेंस’ का प्रयोग किया जाता था-
I.A.S. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
‘इंपीरियल प्रेफरेंस’ एक व्यापार नीति थी जिसके अंतर्गत भारत में ब्रिटिश वस्तुओं के आयात पर विशेष शुल्क रियायतें (Preferential Tariffs) दी जाती थीं, जबकि अन्य देशों के आयात पर ऊँचे शुल्क लगाए जाते थे। इससे ब्रिटिश उद्योगों को भारतीय बाजार में एकाधिकार जैसा लाभ मिलता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘इंपीरियल प्रेफरेंस’ की नीति को 1932 के ओटावा समझौते (Ottawa Agreement) द्वारा औपचारिक रूप दिया गया, जिसमें ब्रिटिश साम्राज्य के सदस्य देशों के बीच परस्पर व्यापार रियायतें देने पर सहमति बनी। भारत में इस नीति का प्रबल विरोध राष्ट्रवादियों ने किया क्योंकि इससे भारतीय उद्योगों को ब्रिटिश प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता था।
7. स्थायी बंदोबस्त किससे किया गया?
M.P.P.C.S. (Pre) 1990
उत्तर-(a)
स्थायी बंदोबस्त जमींदारों के साथ किया गया, जिन्हें भूमि का स्थायी स्वामी मान लिया गया। इस व्यवस्था में जमींदार और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच एक स्थायी अनुबंध था, जिसमें जमींदार निश्चित लगान देने के बदले भूमि पर वंशानुगत अधिकार प्राप्त करते थे। किसान (रैयत) इस अनुबंध के पक्षकार नहीं थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्थायी बंदोबस्त की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि इसने ‘भद्रलोक’ वर्ग को जन्म दिया- ये शहरों में रहने वाले अनुपस्थित जमींदार (Absentee Landlords) थे जो कभी गाँव नहीं जाते थे और मध्यस्थों के माध्यम से लगान वसूलते थे। इस वर्ग ने बाद में बंगाल में पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण करके ‘बंगाल पुनर्जागरण’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
8. ‘स्थायी बंदोबस्त’ किसके साथ किया गया?
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
स्थायी बंदोबस्त जमींदारों के साथ किया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जमींदारों को भूमि का वास्तविक स्वामी मानते हुए उनसे एक निश्चित राशि सालाना लगान के रूप में लेने का स्थायी समझौता किया। इस व्यवस्था में रैयत (काश्तकार) की भूमि पर कोई कानूनी संरक्षण नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्थायी बंदोबस्त के विपरीत दक्षिण और पश्चिम भारत में रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की गई (थॉमस मुनरो द्वारा मद्रास में), जिसमें सीधे किसानों के साथ भूमि का बंदोबस्त किया जाता था। इसी प्रकार महलवाड़ी व्यवस्था (मध्य भारत और उत्तर-पश्चिम प्रांतों में) में पूरे गाँव या महल के साथ सामूहिक समझौता किया जाता था।
9. किस गवर्नर-जनरल ने भारत में स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था स्थापित की थी ?
M.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
भारत में स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में स्थापित की। वे 1786 से 1793 तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे। इस व्यवस्था को लागू करने का उद्देश्य राजस्व संग्रह को स्थायित्व देना और जमींदारों को कृषि में निवेश हेतु प्रोत्साहित करना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लॉर्ड कार्नवालिस को भारत में ‘सिविल सेवा के जनक’ के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने भारतीय सिविल सेवा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने हेतु अधिकारियों के वेतन में पर्याप्त वृद्धि की और व्यापार करने पर प्रतिबंध लगाया। यह भी उल्लेखनीय है कि कार्नवालिस भारत में दो बार गवर्नर-जनरल रहे- पहली बार 1786-1793 और दूसरी बार 1805 में, किंतु दूसरी बार आने के कुछ ही महीनों बाद गाजीपुर में उनका निधन हो गया।
10. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में उद्योगों का कोई स्वतंत्र विकास नहीं हुआ। इसका कारण था-
I.A.S. (Pre) 1999
उत्तर-(d)
ब्रिटिश शासन काल में भारत के धनिक वर्ग ने औद्योगिक उत्पादन में निवेश करने की बजाय भू-संपत्ति में धन लगाना अधिक लाभकारी और सुरक्षित समझा। यही कारण था कि स्वतंत्र औद्योगिक पूंजीवाद का विकास भारत में अवरुद्ध रहा। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश नीतियाँ भी भारतीय उद्योगों के विकास में बाधक थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया क्योंकि जमींदारी एक आकर्षक एवं सुरक्षित निवेश बन गई। ब्रिटिश सरकार की ‘मुक्त व्यापार नीति’ (Free Trade Policy) ने भी भारतीय हस्तशिल्प और उभरते घरेलू उद्योगों को भारी क्षति पहुँचाई- ब्रिटिश वस्तुएं सस्ती दरों पर भारतीय बाजार में भर गईं, जिससे पारंपरिक उद्योग नष्ट हो गए और औद्योगिक निवेश जोखिमपूर्ण लगने लगा।
11. अंग्रेजों ने रैयतवाड़ी बंदोबस्त कहां लागू किया था?
I.A.S. (Pre) 1993
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(d)
रैयतवाड़ी बंदोबस्त मुख्यतः मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में लागू किया गया था। इस व्यवस्था में सरकार और किसान (रैयत) के बीच सीधा अनुबंध होता था, जिसमें कोई मध्यस्थ जमींदार नहीं होता था। रैयत को भूमि पर स्वामित्व का अधिकार दिया जाता था, बशर्ते वह निर्धारित भू-राजस्व सरकार को अदा करे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रैयतवाड़ी व्यवस्था समूचे ब्रिटिश भारत के लगभग 51% क्षेत्र में लागू थी। इस व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी यह थी कि भू-राजस्व की दर बहुत ऊँची रखी गई थी- मद्रास में उपज के 45-55% तक- जिसके कारण किसान महाजनों के कर्जे में डूब जाते थे और भूमि से विस्थापित होते थे, जिसकी परिणति 1875 के दक्कन दंगों (Deccan Riots) के रूप में सामने आई।
12. निम्नलिखित में से कौन ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में रैयतवाड़ी बंदोबस्त के प्रारंभ किए जाने से संबद्ध था/थे ?
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही चुनिए
1. लॉर्ड कार्नवालिस
2. अलेक्जेंडर रीड
3. टॉमस मुनरो
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही चुनिए
1. लॉर्ड कार्नवालिस
2. अलेक्जेंडर रीड
3. टॉमस मुनरो
I.A.S. (Pre) 2017
उत्तर-–
रैयतवाड़ी बंदोबस्त की शुरुआत से अलेक्जेंडर रीड और टॉमस मुनरो का नाम जुड़ा है, न कि लॉर्ड कार्नवालिस का- वे स्थायी बंदोबस्त (जमींदारी व्यवस्था) से संबद्ध थे। अलेक्जेंडर रीड ने 1792 ई. में मद्रास प्रेसीडेंसी के बारामहल क्षेत्र में पहली बार यह व्यवस्था प्रयोगात्मक रूप से लागू की। टॉमस मुनरो ने 1809 में इसे विस्तारित किया और 1820 में मद्रास का गवर्नर बनने के बाद पूरे प्रेसीडेंसी में लागू किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मुनरो के शिष्य माउंटस्टुअर्ट एलफिंस्टन ने इस व्यवस्था को बंबई प्रेसीडेंसी में लागू किया। रैयतवाड़ी व्यवस्था को सैद्धांतिक रूप से किसान-हितैषी माना जाता था, क्योंकि इसमें बिचौलियों की भूमिका नहीं थी। परंतु व्यवहार में अत्यधिक ऊँची कर दरों के कारण यह भी किसानों के लिए कष्टकारी सिद्ध हुई।
13. रैयतवाड़ी प्रथा प्रारंभ की थी-
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(a)
रैयतवाड़ी प्रथा को व्यापक स्तर पर प्रारंभ करने का श्रेय टॉमस मुनरो को दिया जाता है। यद्यपि इसकी शुरुआत अलेक्जेंडर रीड ने की थी, किंतु मुनरो ने इसे एक सुव्यवस्थित भू-राजस्व प्रणाली के रूप में विकसित किया और मद्रास में बड़े पैमाने पर लागू किया। मार्टिन बर्ड का संबंध उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में महलवाड़ी व्यवस्था से था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: टॉमस मुनरो 1820 से 1827 तक मद्रास के गवर्नर रहे और उनकी नीतियों ने भारतीय प्रशासन को गहरे प्रभावित किया। उन्होंने ‘मुनरो सिद्धांत’ (Munro Doctrine) भी प्रतिपादित किया जो यह मानता था कि भारतीयों को धीरे-धीरे प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ सौंपी जानी चाहिए- यह विचार उस काल में प्रगतिशील माना जाता था।
14. चिरस्थायी बंदोबस्त, 1793 के अंतर्गत जमींदारों से अपेक्षा की गई थी कि वे खेतिहरों को पट्टा जारी करेंगे। अनेक जमींदारों ने पट्टा जारी नहीं किए। इसका कारण था-
I.A.S. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
स्थायी बंदोबस्त में यह अपेक्षा तो थी कि जमींदार खेतिहरों को पट्टे जारी करेंगे, परंतु इसे सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रभावी सरकारी तंत्र या दंड का प्रावधान नहीं था। इस सरकारी नियंत्रण के अभाव में जमींदारों ने काश्तकारों को पट्टे न देकर उन्हें कमजोर स्थिति में रखा, ताकि वे मनमाना लगान वसूल कर सकें और आसानी से बेदखल कर सकें।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी शोषण की प्रतिक्रिया में 1859 से 1860 के बीच बंगाल में ‘नील विद्रोह’ (Indigo Revolt) हुआ और बंगाल-बिहार सीमा के संथाल क्षेत्र में भी कृषक आंदोलन भड़के। अंततः सरकार को 1859 में ‘बंगाल काश्तकारी अधिनियम’ (Bengal Rent Act) लाना पड़ा जिसने काश्तकारों को कुछ न्यूनतम अधिकार प्रदान किए, यद्यपि यह भी पर्याप्त नहीं था।
15. अंग्रेजों ने रैयतवाड़ी व्यवस्था सर्वप्रथम आरंभ की थी-
U.P.P.C.S. (Mains) 2016
उत्तर-(d)
रैयतवाड़ी व्यवस्था सर्वप्रथम मद्रास प्रेसीडेंसी में आरंभ की गई। 1792 ई. में अलेक्जेंडर रीड ने तमिलनाडु के बारामहल जिले में इसे प्रयोगात्मक रूप से लागू किया। इसके बाद टॉमस मुनरो ने इसे व्यापक और व्यवस्थित रूप देते हुए मद्रास में पूर्णतः लागू किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रैयतवाड़ी व्यवस्था और स्थायी बंदोबस्त के बीच मूलभूत अंतर यह था कि स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व की दर हमेशा के लिए तय थी जबकि रैयतवाड़ी में इसे प्रत्येक 20-30 वर्षों पर पुनर्निर्धारित किया जाता था। इस पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया को ‘भूमि पुनर्बंदोबस्त’ (Resettlement) कहा जाता था, जो किसानों के लिए प्रायः राजस्व वृद्धि लेकर आती थी।
16. बिहार में ‘परमानेंट सेटिलमेंट’ लागू करने का कारण था-
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(c)
बिहार में परमानेंट सेटिलमेंट (स्थायी बंदोबस्त) लागू करने का मुख्य उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भू-राजस्व की एक निश्चित एवं पूर्वानुमेय राशि तय करना था। इससे पहले अल्पकालिक बंदोबस्त और नीलामी पद्धति में राजस्व अनिश्चित रहता था। 1790 में यह पहले दस वर्षों के लिए लागू हुई और फिर 22 मार्च 1793 को स्थायी रूप दे दिया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ब्रिटिश सरकार ने यह उम्मीद लगाई थी कि स्थायी राजस्व दर तय होने पर जमींदार कृषि में सुधार और निवेश करेंगे। परंतु व्यवहार में जमींदारों ने भूमि सुधार की बजाय काश्तकारों से अधिकाधिक लगान वसूलने पर ध्यान दिया। इससे बिहार की कृषि व्यवस्था शताब्दियों तक पिछड़ी रही और स्वतंत्रता के बाद 1950 में बिहार भूमि सुधार अधिनियम द्वारा जमींदारी प्रथा को समाप्त किया गया।
17. भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त एवं रैयतवाड़ी प्रणाली क्रमशः शुरू की गई-
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(a)
स्थायी बंदोबस्त सबसे पहले बंगाल प्रेसीडेंसी (जिसमें बंगाल, बिहार और उड़ीसा शामिल थे) में 1793 में लागू हुई, जबकि रैयतवाड़ी प्रणाली सर्वप्रथम मद्रास प्रेसीडेंसी में 1792-1820 के बीच विकसित की गई। इस प्रकार दोनों प्रणालियाँ भौगोलिक रूप से अलग-अलग क्षेत्रों में लागू हुईं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ब्रिटिश भारत में तीसरी प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्था महलवाड़ी (Mahalwari) थी, जो मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी प्रांतों, अवध और मध्य भारत में लागू की गई। इसमें पूरे गाँव या ‘महल’ के साथ सामूहिक रूप से बंदोबस्त किया जाता था। इसे मार्टिन बर्ड और जेम्स थॉमसन ने विकसित किया था और यह लगभग 30% ब्रिटिश भारत में प्रभावी थी।
18. रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए- में बंगाल और बिहार में भूमि पर किरायेदारों के
अधिकारों को बंगाल किरायेदारी अधिनियम द्वारा दिया गया था।
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
बंगाल किरायेदारी अधिनियम 1885 में पारित किया गया, जिसने बंगाल और बिहार में भूमि पर काश्तकारों के अधिकारों को पहली बार कानूनी संरक्षण प्रदान किया। इस अधिनियम के अंतर्गत 12 वर्षों से अधिक समय से एक ही भूमि पर काबिज काश्तकारों को ‘अधिकारयुक्त रैयत’ (Occupancy Ryot) का दर्जा दिया गया और उन्हें मनमाने ढंग से बेदखल करने पर प्रतिबंध लगाया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस अधिनियम को लागू करने में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जैसे बंगाली बुद्धिजीवियों और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन की उदार नीतियों का योगदान था। हालांकि इस अधिनियम की एक बड़ी सीमा यह थी कि यह केवल स्थायी काश्तकारों की रक्षा करता था; अस्थायी काश्तकार (under-raiyats) अभी भी असुरक्षित रहे और उनके लिए 1928 का बंगाल काश्तकारी संशोधन अधिनियम लाना पड़ा।
19. सर टॉमस मुनरो भू-राजस्व बंदोबस्त से संबद्ध हैं-
U.P.P.C.S. (Pre) 2000
उत्तर-(c)
सर टॉमस मुनरो रैयतवाड़ी बंदोबस्त से संबद्ध हैं। उन्होंने इस व्यवस्था को मद्रास प्रेसीडेंसी में सुव्यवस्थित और विस्तारित रूप में लागू किया। स्थायी बंदोबस्त के विपरीत, मुनरो का मानना था कि सरकार को सीधे किसानों से संपर्क में रहना चाहिए और बिचौलियों को हटाना चाहिए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तीनों प्रमुख भू-राजस्व प्रणालियों से जुड़े प्रमुख नाम याद रखने के लिए: स्थायी बंदोबस्त- लॉर्ड कार्नवालिस (बंगाल, 1793); रैयतवाड़ी- अलेक्जेंडर रीड व टॉमस मुनरो (मद्रास), एलफिंस्टन (बंबई); महलवाड़ी- मार्टिन बर्ड व जेम्स थॉमसन (उत्तर-पश्चिमी प्रांत)। ये तीनों प्रणालियाँ मिलकर ब्रिटिश भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनीं।
20. मद्रास के रैयतवाड़ी बंदोबस्त से कौन संबंधित रहा था?
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(c)
मद्रास के रैयतवाड़ी बंदोबस्त से टॉमस मुनरो सर्वाधिक संबंधित रहे। एलफिंस्टन ने यही व्यवस्था बंबई में लागू की, मैलकम मध्य भारत के प्रशासन से जुड़े थे, और मेटकॉफ दिल्ली क्षेत्र में रेजिडेंट के रूप में कार्यरत थे- इनका रैयतवाड़ी से प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: टॉमस मुनरो को मद्रास के किसानों के बीच अत्यंत सम्मान प्राप्त था। उनके निधन (1827) के बाद मद्रास में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। मुनरो का यह भी मानना था कि भारतीय समाज को उसके पारंपरिक ढांचे में समझे बिना उस पर पाश्चात्य व्यवस्था थोपना उचित नहीं है- यह दृष्टिकोण उन्हें उस युग के अन्य ब्रिटिश अधिकारियों से अलग करता था।
21. ब्रिटिश व्यवस्था में रैयतवाड़ी भू-राजस्व संग्रह प्रचलित था-
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-ी भारत (b) पूर्वी भारत में
रैयतवाड़ी भू-राजस्व संग्रह व्यवस्था मुख्यतः दक्षिणी और पश्चिमी भारत में प्रचलित थी, अर्थात् मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में। पूर्वी भारत (बंगाल, बिहार, उड़ीसा) में स्थायी बंदोबस्त (जमींदारी व्यवस्था) लागू थी, जबकि उत्तर-मध्य भारत में महलवाड़ी व्यवस्था प्रचलित थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान की नौवीं अनुसूची में भूमि सुधार कानूनों को संरक्षण दिया गया ताकि इन्हें न्यायालय में चुनौती न दी जा सके। रैयतवाड़ी क्षेत्रों में भूमि सुधार की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल रही क्योंकि किसान पहले से ही भूमि के रिकॉर्ड में दर्ज थे, जबकि स्थायी बंदोबस्त वाले क्षेत्रों में जमींदारी उन्मूलन एक जटिल और लंबी कानूनी प्रक्रिया बनी।
22. दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित ‘अपवाह सिद्धांत’ (Drain Theory) की सही परिभाषा नीचे के किस कथन में आती है?
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(b)
दादाभाई नौरोजी के ‘अपवाह सिद्धांत’ (Drain Theory) का मूल आशय यह था कि भारत के कुल वार्षिक उत्पाद का एक बड़ा भाग बिना किसी आर्थिक प्रतिफल के इंग्लैंड को हस्तांतरित किया जाता था। यह एकतरफा निर्यात था- भारत को इसके बदले में न कोई वस्तु मिलती थी, न कोई सेवा। यही ‘अप्रतिफलित निर्यात’ (Unrequited Export) इस सिद्धांत की आत्मा है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादाभाई नौरोजी ने इस सिद्धांत को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” (1901) में विस्तार से प्रतिपादित किया। उन्होंने गणना करके बताया कि प्रतिवर्ष लगभग 20-30 करोड़ रुपये भारत से इंग्लैंड जाते थे। बाद में रमेश चंद्र दत्त ने अपनी पुस्तक “Economic History of India” (1902-03) में इसी सिद्धांत को और गहराई से विश्लेषित किया।
23. रैयतवाड़ी बंदोबस्त के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
1. किसानों द्वारा लगान सीधे सरकार को दिया जाता था।
2. सरकार रैयत को पट्टे देती थी।
3. कर लगाने के पूर्व भूमि का सर्वेक्षण और मूल्य निर्धारण किया जाता था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. किसानों द्वारा लगान सीधे सरकार को दिया जाता था।
2. सरकार रैयत को पट्टे देती थी।
3. कर लगाने के पूर्व भूमि का सर्वेक्षण और मूल्य निर्धारण किया जाता था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I.A.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
रैयतवाड़ी व्यवस्था की तीनों विशेषताएं- सरकार को सीधे लगान, सरकार द्वारा रैयत को पट्टा, और कर से पहले भूमि सर्वेक्षण- सभी सही हैं। इस व्यवस्था में किसान और सरकार के बीच कोई मध्यस्थ नहीं होता था। भूमि का सर्वेक्षण कर उसकी उत्पादकता के आधार पर कर निर्धारित किया जाता था और तत्पश्चात् किसान की सहमति से उसे पट्टा (स्वामित्व प्रमाण-पत्र) दिया जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रैयतवाड़ी व्यवस्था में भूमि सर्वेक्षण की यह पद्धति आधुनिक भू-अभिलेख (Land Records) प्रणाली की नींव बनी। ब्रिटिश काल में इस सर्वेक्षण कार्य के लिए ‘Survey of India’ विभाग की स्थापना की गई थी, जो आज भी कार्यरत है। भूमि सर्वेक्षण की यह परंपरा स्वतंत्र भारत में ‘भूमि जोत सर्वेक्षण’ और आधुनिक डिजिटल भू-अभिलेख (Digital Land Records) कार्यक्रम के रूप में जारी है।
24. असम में सर्वप्रथम चाय कंपनी की स्थापना कब हुई थी?
U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
असम में सर्वप्रथम ‘द असम कंपनी’ की स्थापना 1839 ई. में हुई। यह कंपनी 5 लाख रुपये की पूंजी के साथ इंग्लैंड में पंजीकृत की गई थी और नजीरा, असम इसका मुख्यालय बना। यह भारत की सबसे पुरानी व्यावसायिक चाय कंपनी है जो आज भी सक्रिय है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: असम में चाय की खोज 1823 में रॉबर्ट ब्रूस ने की थी, जिन्होंने सिंगफो जनजाति के लोगों को जंगली चाय की पत्तियाँ उपयोग करते देखा था। 1836 में पहली बार असमी चाय की पत्तियों का नमूना लंदन भेजा गया। चाय उद्योग के विस्तार के लिए अंग्रेजों ने ‘कूली भर्ती प्रणाली’ (Coolie Recruitment System) के तहत झारखंड, ओडिशा और मध्य भारत के आदिवासी मजदूरों को असम के बागानों में लाया, जो प्रायः बंधुआ मजदूरी जैसी दशाओं में काम करते थे।
25. नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें एक को कथन (a) और दूसरे को कारण (R) कहा गया है –
कथन (a) : ब्रिटिश सरकार ने भारत के अलग-अलग भागों में भू-राजस्व की अलग-अलग व्यवस्था लागू की थी।
कारण (R) : इससे भारतीय किसानों में अलग-अलग वर्ग बन गए। नीचे दिए गए कूट में से सही चुनिए। कूट :
कथन (a) : ब्रिटिश सरकार ने भारत के अलग-अलग भागों में भू-राजस्व की अलग-अलग व्यवस्था लागू की थी।
कारण (R) : इससे भारतीय किसानों में अलग-अलग वर्ग बन गए। नीचे दिए गए कूट में से सही चुनिए। कूट :
U.P. P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
कथन (A) सत्य है- ब्रिटिश सरकार ने भारत में तीन प्रमुख भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू कीं: स्थायी बंदोबस्त (लगभग 19% क्षेत्र- बंगाल, बिहार, उड़ीसा), रैयतवाड़ी (लगभग 51% क्षेत्र- मद्रास, बंबई, असम) और महलवाड़ी (लगभग 30% क्षेत्र- उत्तर-पश्चिमी प्रांत, पंजाब, मध्य प्रांत)। कारण (R) भी सत्य है क्योंकि इन अलग-अलग व्यवस्थाओं ने क्रमशः जमींदार वर्ग, स्वतंत्र रैयत वर्ग और ग्राम समुदाय जैसे अलग-अलग कृषक वर्गों को जन्म दिया। और यह कारण कथन की सही व्याख्या भी करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इन तीन भिन्न भू-राजस्व प्रणालियों के कारण स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार की प्रक्रिया अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रूप में हुई। जमींदारी उन्मूलन कानून (1950 के दशक) स्थायी बंदोबस्त वाले क्षेत्रों में सर्वाधिक जटिल रहे, क्योंकि वहाँ बहुस्तरीय मध्यस्थ वर्ग के हितों को समाप्त करना था।
26. निम्न में से किसने ‘निकास के सिद्धांत’ का प्रतिपादन किया था?
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007
उत्तर-(a)
‘निकास सिद्धांत’ (Drain Theory) के प्रतिपादक दादाभाई नौरोजी थे, जिन्हें ‘भारत का ग्रैंड ओल्ड मैन’ भी कहा जाता है। उन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से यह सिद्ध किया कि ब्रिटिश शासन भारत की निर्धनता का मुख्य कारण है क्योंकि भारत की संपदा बिना किसी प्रतिफल के इंग्लैंड जाती रहती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादाभाई नौरोजी 1892 में ब्रिटिश संसद (House of Commons) के सदस्य चुने जाने वाले पहले भारतीय थे- वे फिंसबरी (लंदन) सीट से लिबरल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए। उन्होंने अपनी संसदीय स्थिति का उपयोग भारत के आर्थिक शोषण को ब्रिटिश जनता और संसद के सामने उजागर करने के लिए किया, जो उस युग में एक अत्यंत साहसिक और अभूतपूर्व कदम था।
27. वह प्रथा, जिसके तहत किसान स्वयं भूमि का मालिक होता है और सरकार को भू-राजस्व के भुगतान के लिए जिम्मेदार माना
जाता है?
65th B.P.S.C. (Pre) 2019
उत्तर-(b)
रैयतवाड़ी प्रथा में किसान स्वयं भूमि का मालिक होता था और वह सीधे सरकार को भू-राजस्व अदा करने के लिए उत्तरदायी था। जमींदारी प्रथा में जमींदार बिचौलिया होता था, महलवाड़ी में पूरा गाँव या महल सामूहिक रूप से उत्तरदायी होता था, जबकि दहसाला प्रथा मुगलकाल की अकबर द्वारा प्रारंभ की गई भू-राजस्व व्यवस्था थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रैयतवाड़ी प्रथा और मुगल कालीन ‘जब्ती प्रणाली’ (Zabti System) में एक समानता थी- दोनों में भूमि सर्वेक्षण के आधार पर व्यक्तिगत किसान से कर वसूला जाता था। परंतु मुगल व्यवस्था में कर की दर फसल के अनुसार बदलती थी, जबकि रैयतवाड़ी में भूमि की श्रेणी के आधार पर एक निश्चित दर तय की जाती थी जो 20-30 वर्षों तक लागू रहती थी।
28. पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम कब पारित किया गया?
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम 1900 ई. में पारित किया गया। इसका उद्देश्य महाजनों और साहूकारों द्वारा कर्ज के बदले कृषि भूमि के अधिग्रहण को रोकना था। इस अधिनियम ने कृषक जातियों की भूमि को गैर-कृषक वर्गों को हस्तांतरित होने से कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह अधिनियम 1897 के पंजाब भूमि उपनिवेशीकरण अधिनियम (Punjab Land Colonisation Act) के बाद आया, जिसके विरोध में अजीत सिंह और लाला लाजपत राय के नेतृत्व में 1907 में ‘पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन’ चलाया गया था। इस आंदोलन ने पंजाब में राष्ट्रवादी चेतना को नई ऊर्जा दी और ब्रिटिश सरकार को इन कानूनों में संशोधन के लिए बाध्य होना पड़ा।
29. सूची – I को सूची – II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही चुनिए –
सूची – I सूची – II
A. जजमानी 1. उत्तर भारत
B. बारा बलूट 2. कर्नाटक
C. मिरासि 3. महाराष्ट्र
D. अडाडे 4. तमिलनाडु
कूट :
A B C D
सूची – I सूची – II
A. जजमानी 1. उत्तर भारत
B. बारा बलूट 2. कर्नाटक
C. मिरासि 3. महाराष्ट्र
D. अडाडे 4. तमिलनाडु
कूट :
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 1 3 2 4
(c) 1 4 2 3
(d) 1 3 4 2
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
सूची-I और सूची-II का सही सुमेलन इस प्रकार है- जजमानी: उत्तर भारत; बारा बलूट: महाराष्ट्र; मिरासि: तमिलनाडु; अडाडे: कर्नाटक। ये सभी परंपरागत ग्रामीण सेवा-विनिमय प्रणालियाँ थीं जिनमें विभिन्न जातियाँ एक-दूसरे को सेवाएं देकर अनाज या उपज प्राप्त करती थीं। UPPSC द्वारा जारी उत्तर-कुंजी में इस प्रश्न का उत्तर (b) दिया गया है, जो कि तथ्यतः गलत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ये सभी व्यवस्थाएं भारत की पारंपरिक ‘जजमानी प्रणाली’ के क्षेत्रीय रूप थे। इस व्यवस्था में भूमिहीन दस्तकार और सेवा जातियाँ (जैसे कुम्हार, लोहार, धोबी, नाई) अपनी सेवाओं के बदले कृषक जातियों से अनाज पाती थीं। ब्रिटिश मौद्रिक अर्थव्यवस्था और नई कर प्रणाली ने इस परंपरागत ग्रामीण विनिमय व्यवस्था को धीरे-धीरे नष्ट कर दिया।
30. ब्रिटिश भारत में सैन्य बल पर केंद्रीय राजस्व का कुल कितना प्रतिशत व्यय होता था?
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2021
उत्तर-(a)
विभिन्न स्रोतों के अनुसार ब्रिटिश भारत में केंद्रीय राजस्व का औसतन लगभग 40% हिस्सा सैन्य व्यय पर खर्च होता था। यह अनुपात अन्य विकासात्मक मदों- जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि- की तुलना में अत्यधिक था, जो ब्रिटिश शासन की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ब्रिटिश भारत की सेना का उपयोग केवल भारत में कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं था। इस सेना को अफगानिस्तान, बर्मा, चीन (अफीम युद्ध), अफ्रीका और प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध में भी तैनात किया गया- और इन सभी अभियानों का खर्च भारत के राजस्व से वहन किया गया। दादाभाई नौरोजी और गोपाल कृष्ण गोखले ने ब्रिटिश संसद में इस अनुचित सैन्य व्यय का जमकर विरोध किया था।
31. निम्नलिखित में से कौन दादाभाई नौरोजी के उत्सारण सिद्धांत (Drain Theory) में विश्वास नहीं करता था?
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(d)
सर सैयद अहमद खां ब्रिटिश शासन के घोर समर्थक थे और उनका दृढ़ मत था कि मुस्लिम समाज की प्रगति केवल ब्रिटिश सत्ता के साये में ही संभव है। इसीलिए वे दादाभाई नौरोजी के उत्सारण (Drain) सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। इसके विपरीत तिलक, रानाडे और दत्त- तीनों ने इस सिद्धांत का समर्थन किया और भारतीय आर्थिक शोषण को उजागर करने में योगदान दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सर सैयद अहमद खां ने 1875 में मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना) की स्थापना की। उन्होंने 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का भी विरोध किया और मुसलमानों को इससे दूर रहने की सलाह दी, क्योंकि वे इसे मुख्यतः हिंदू हितों का मंच मानते थे।
32. ‘पावर्टी एंड द अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ नामक पुस्तक किसने लिखी?
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
उत्तर-(d)
‘पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ के लेखक दादाभाई नौरोजी (1825-1917) हैं। इस पुस्तक में उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की निर्धनता के कारणों का विश्लेषण करते हुए ‘धन निकासी सिद्धांत’ को विस्तार से प्रतिपादित किया। 1865 में उन्होंने डब्ल्यू.सी. बनर्जी के साथ मिलकर लंदन इंडिया सोसायटी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भारत के कष्टों को ब्रिटिश जनमानस तक पहुँचाना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादाभाई नौरोजी को ‘भारत का ग्रैंड ओल्ड मैन’ कहा जाता था। वे तीन बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे- 1886 (कलकत्ता), 1893 (लाहौर) और 1906 (कलकत्ता)। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने ही ‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग कर भारत के लक्ष्य को परिभाषित किया था, जो बाद में राष्ट्रीय आंदोलन का मूल मंत्र बना।
33. अंग्रेजों के शासनकाल में भारत के ‘आर्थिक दोहन’ के सिद्धांत को किसने प्रतिपादित किया?
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
U.P.P.C.S. (Main) 2004
U.P.P.C.S. (Main) 2004
उत्तर-(d)
ब्रिटिश शासनकाल में भारत के ‘आर्थिक दोहन’ (Economic Drain) के सिद्धांत के प्रतिपादक दादाभाई नौरोजी थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारत से धन-संपत्ति का बहिर्गमन एकतरफा था- भारत को इसके बदले में कोई वास्तविक प्रतिफल नहीं मिलता था। उन्होंने इसे भारत की भीषण निर्धनता का प्रमुख कारण बताया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादाभाई नौरोजी ने अपने अपवाह सिद्धांत को कई रचनाओं में प्रस्तुत किया जिनमें ‘England’s Debt to India’, ‘The Wants and Means of India’ और ‘On the Commerce of India’ प्रमुख हैं। बाद में रमेश चंद्र दत्त ने अपनी ‘Economic History of India’ (1902-03) में इस सिद्धांत को सांख्यिकीय आधार देकर और सुदृढ़ किया।
34. ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ नामक पुस्तक किस वर्ष प्रकाशित हुई?
U.P.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(b)
‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ 1901 ई. में लंदन के एस. सोनेश्चेन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों की कटु आलोचना करते हुए भारत की निर्धनता को ब्रिटिश नीतियों का प्रत्यक्ष परिणाम बताया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व दादाभाई नौरोजी ने 1867 में ‘England’s Debt to India’ शीर्षक से एक लेख लिखा था जो उनके अपवाह सिद्धांत का प्रारंभिक रूप था। इस लेख में उन्होंने पहली बार यह तर्क दिया था कि ब्रिटेन भारत का ‘ऋणी’ है क्योंकि वह भारत की संपदा का उपभोग बिना कोई प्रतिफल दिए कर रहा है।
35. निम्नलिखित में से कौन भारत में उपनिवेशवाद का/के आर्थिक आलोचक था/थे?
1. दादाभाई नौरोजी
2. जी. सुब्रमण्य अय्यर
3. आर. सी. दत्त
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही चुनिए।
1. दादाभाई नौरोजी
2. जी. सुब्रमण्य अय्यर
3. आर. सी. दत्त
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही चुनिए।
I.A.S. (Pre) 2015
उत्तर-चुनिए।
भारत में उपनिवेशवाद के तीनों उल्लिखित आर्थिक आलोचक- दादाभाई नौरोजी, जी. सुब्रमण्य अय्यर और रमेश चंद्र दत्त- सही हैं। 1870-1905 के बीच इन बुद्धिजीवियों ने ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का गहन विश्लेषण किया। जी. सुब्रमण्य अय्यर ‘द हिंदू’ समाचार-पत्र के संस्थापक-संपादक थे। आर.सी. दत्त ने ‘Economic History of India’ लिखी। इन सभी का निष्कर्ष था कि भारत की निर्धनता का मूल कारण उपनिवेशवाद है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महादेव गोविंद रानाडे भी इस धारा के एक प्रमुख आर्थिक चिंतक थे। उन्होंने ‘Essays on Indian Economics’ (1898) में तर्क दिया कि भारत में स्वदेशी उद्योगों के विकास के बिना आर्थिक स्वावलंबन असंभव है। रानाडे को ‘आधुनिक महाराष्ट्र का निर्माता’ भी कहा जाता है और वे पुणे सार्वजनिक सभा के संस्थापकों में थे।
36. ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में चुने जाने वाले दादाभाई नौरोजी प्रथम भारतीय थे, जिन्होंने इस दल के टिकट पर चुनाव लड़ा-
B.P.C.S. (Pre.) 2016
उत्तर-(a)
दादाभाई नौरोजी 1892 में ब्रिटेन के उदारवादी दल (Liberal Party) के टिकट पर फिंसबरी (लंदन) सीट से हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य निर्वाचित हुए। वे ऐसा करने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने इस पद का उपयोग संसद के भीतर से भारत के आर्थिक शोषण और राजनीतिक दमन को उजागर करने के लिए किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादाभाई नौरोजी की संसदीय सदस्यता ने भारतीय राष्ट्रवादियों को यह विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश संसदीय प्रणाली के भीतर रहकर भी भारत के हितों की वकालत की जा सकती है। इससे कांग्रेस के उदारवादी नेताओं- जैसे गोपाल कृष्ण गोखले- को वैधानिक राजनीति के प्रति आस्था मजबूत हुई, जो बाद में ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ की वैचारिक विभाजन रेखा का एक आधार बनी।
37. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए तथा उनके नीचे दिए गए कूट से सही का चयन कीजिए-
अभिकथन (a) : ब्रिटिश काल में सामान्यतः भारत का व्यापार संतुलन अनुकूल था।
कथन (R) : धन की निकासी का स्वरूप अप्रतिफलित निर्यात था।
कूट :
अभिकथन (a) : ब्रिटिश काल में सामान्यतः भारत का व्यापार संतुलन अनुकूल था।
कथन (R) : धन की निकासी का स्वरूप अप्रतिफलित निर्यात था।
कूट :
U.P.P.C.S. (Pre.) 2017
उत्तर-(a)
कथन (A) सत्य है- ब्रिटिश काल में भारत का व्यापार संतुलन सामान्यतः अनुकूल रहता था क्योंकि आयात की तुलना में निर्यात अधिक होता था। कारण (R) भी सत्य है- यह अधिक निर्यात वास्तव में ‘अप्रतिफलित निर्यात’ था जिसके बदले भारत को कोई आर्थिक प्रतिफल नहीं मिलता था। और यह कारण कथन की सही व्याख्या भी करता है, क्योंकि व्यापार अधिशेष के बावजूद भारत निर्धन होता गया- इसीलिए धन का यह बहिर्गमन ‘निकास’ कहलाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादाभाई नौरोजी ने धन के इस बहिर्गमन को ‘अनिष्टों का अनिष्ट’ (Evil of all evils) की संज्ञा दी। ईस्ट इंडिया कंपनी के धन निष्कासन के स्रोतों में व्यापारिक एकाधिकार से प्राप्त लाभ, कर्मचारियों के वेतन-पेंशन और निवेशकों का लाभांश शामिल थे। 1813 के बाद यह निकास ‘अप्रतिफलित निर्यात’ के रूप में और अधिक संगठित हो गई।
38. ब्रिटिश शासन के समय अर्थव्यवस्था को खोखला करने (इकोनॉमिक ड्रेन) के सिद्धांत के बारे में पुस्तक किसने लिखी थी?
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(d)
आर्थिक निकास सिद्धांत (Economic Drain Theory) पर पुस्तक लिखने वाले दादाभाई नौरोजी थे। उनकी ‘पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ (1901) इस विषय पर सर्वाधिक प्रामाणिक और प्रभावशाली ग्रंथ मानी जाती है। इसमें उन्होंने आँकड़ों सहित यह दर्शाया कि प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का धन भारत से इंग्लैंड प्रवाहित हो रहा है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महात्मा गांधी ने भी इस सिद्धांत को अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ (1909) में स्वीकार किया और इसे स्वदेशी आंदोलन की वैचारिक नींव बनाया। पं. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (1946) में इसी आर्थिक शोषण को ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी विरासत बताया।
39. किसने यह विचार किया था कि भारत में ‘ब्रिटिश आर्थिक नीति’ घिनौनी है?
Uttarakhand U.D.A. / L.D.A. (Mains) 2007
उत्तर-(c)
कार्ल मार्क्स ने ब्रिटिश आर्थिक नीति को ‘घिनौनी’ (vile) बताते हुए लिखा कि अंग्रेजी हस्तक्षेप से भारतीय बुनकर बर्बाद हो गए- सूत कातने वाला लंकाशायर में बैठा था जबकि बंगाल के तंतुवाय (बुनकर) नष्ट हो रहे थे। मार्क्स ने यह भी कहा कि ब्रिटिशों ने भारतीय खड्डी तोड़ दी और चरखे का नाश कर दिया, जिससे परंपरागत कारीगर वर्ग बेरोजगार हो गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्ल मार्क्स ने 1853 में न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में लिखे अपने लेखों में भारत पर ब्रिटिश शासन के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण किया। उन्होंने यह भी माना कि यद्यपि ब्रिटिश शासन का तरीका क्रूर था, परंतु इसने भारत में सामंती व्यवस्था को तोड़कर एक नई सामाजिक-आर्थिक संरचना की नींव रखी- इसे मार्क्स ने ‘अनजाने में किया गया ऐतिहासिक कार्य’ कहा।
40. भारत के इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-
1. औरंग – राजकोष का प्रभारी
2. बेनियान – ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय एजेंट
3. मिरासिदार- राज्य का नामित राजस्व दाता
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
1. औरंग – राजकोष का प्रभारी
2. बेनियान – ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय एजेंट
3. मिरासिदार- राज्य का नामित राजस्व दाता
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(b)
‘औरंग’ फारसी शब्द है जिसका अर्थ ‘गोदाम’ होता है- यह राजकोष का प्रभारी नहीं, बल्कि माल भंडारण का स्थान था, इसलिए युग्म 1 गलत है। ‘बेनियान’ (बनिया) पारंपरिक वणिक समुदाय के वे व्यापारी थे जो ईस्ट इंडिया कंपनी और भारतीय कारीगरों के बीच मध्यस्थ का कार्य करते थे- यह सही है। ‘मिरासिदार’ अरबी शब्द ‘मिरास’ (उत्तराधिकार) से बना है और रैयतवाड़ी प्रणाली में इन्हें राज्य का नामित राजस्व दाता माना जाता था- यह भी सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘बेनियान’ की भूमिका ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण थी। रॉबर्ट क्लाइव के बेनियान थे- गोविंद राम मित्सर- जिन्होंने प्लासी के युद्ध (1757) से पहले कंपनी के व्यापारिक हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन भारतीय मध्यस्थों के बिना ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रारंभिक व्यापारिक ढाँचा खड़ा होना संभव नहीं था।
41. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
दादाभाई नौरोजी की भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को सर्वाधिक प्रभावी देन थी कि
1. उन्होंने इस बात को अभिव्यक्त किया कि ब्रिटेन, भारत का आर्थिक शोषण कर रहा है।
2. उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों की व्याख्या की और भारतीयों में आत्म-विश्वास जगाया।
3. उन्होंने सभी सामाजिक बुराइयों के निराकरण की आवश्यकता पर सर्वोपरि जोर दिया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
दादाभाई नौरोजी की भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को सर्वाधिक प्रभावी देन थी कि
1. उन्होंने इस बात को अभिव्यक्त किया कि ब्रिटेन, भारत का आर्थिक शोषण कर रहा है।
2. उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों की व्याख्या की और भारतीयों में आत्म-विश्वास जगाया।
3. उन्होंने सभी सामाजिक बुराइयों के निराकरण की आवश्यकता पर सर्वोपरि जोर दिया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I.A.S. (Pre) 2012
उत्तर-(a)
दादाभाई नौरोजी की राष्ट्रीय आंदोलन को सर्वाधिक प्रभावी देन केवल कथन 1 से संबंधित है- उन्होंने गहन शोध और आँकड़ों के आधार पर यह सिद्ध किया कि ब्रिटेन भारत का आर्थिक शोषण कर रहा है। प्राचीन ग्रंथों की व्याख्या बाल गंगाधर तिलक और अरबिंदो घोष का क्षेत्र था। सामाजिक बुराइयों के निराकरण पर जोर राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने दिया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादाभाई नौरोजी की आर्थिक चिंतन की विरासत स्वतंत्र भारत की योजना-निर्माण प्रक्रिया में भी झलकती है। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने आत्मनिर्भर औद्योगीकरण की नीति अपनाई- यह सोच नौरोजी और रानाडे के उस विचार की परिणति थी जिसमें ब्रिटिश शोषण से मुक्त एक स्वायत्त भारतीय अर्थव्यवस्था की कल्पना की गई थी।
42. ‘अनुद्योगीकरण’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. यह प्रक्रिया 1813 में प्रारंभ हुई।
2. ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकारों की समाप्ति ने इस प्रक्रिया को तेज किया।
नीचे दिए गए कूट से सही का चयन कीजिए-
कूट :
1. यह प्रक्रिया 1813 में प्रारंभ हुई।
2. ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकारों की समाप्ति ने इस प्रक्रिया को तेज किया।
नीचे दिए गए कूट से सही का चयन कीजिए-
कूट :
U.P.P.C.S. (Mains) 2017
उत्तर-(c)
>
भारत में ‘अनुद्योगीकरण’ (De-industrialization) की प्रक्रिया 1813 के चार्टर एक्ट से प्रारंभ हुई, जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के साथ व्यापार का एकाधिकार समाप्त कर दिया। इससे ब्रिटेन के अन्य व्यापारियों को भी भारत में व्यापार की खुली छूट मिल गई। इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से निर्मित सस्ता माल भारतीय बाजारों में भर गया, जिससे भारतीय परंपरागत हस्तशिल्प और दस्तकारी उद्योग नष्ट हो गए। दोनों कथन सही हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अनुद्योगीकरण का सर्वाधिक प्रभाव भारत के वस्त्र उद्योग पर पड़ा। एक समय ढाका की मलमल और बंगाल का रेशमी वस्त्र विश्वप्रसिद्ध था- ब्रिटिश काल में ये उद्योग लगभग समाप्त हो गए। इतिहासकार अमिया कुमार बागची ने अपने शोध में दिखाया कि 1809 से 1872 के बीच बिहार के पटना जिले में पुरुष बुनकरों का अनुपात कुल जनसंख्या में 25% से घटकर 8% से भी कम रह गया था।
43. आर्थिक तौर पर, 19वीं शताब्दी में भारत पर अंग्रेजी शासन का एक परिणाम था-
I.A.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
19वीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन का एक प्रमुख आर्थिक परिणाम भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण था। 1813 की मुक्त व्यापार नीति के बाद इंग्लैंड के उद्योगों को सस्ते कच्चे माल की आवश्यकता थी, अतः भारत कच्चे माल का उत्पादक बनकर रह गया। नई नकद लगान नीति ने किसानों को बाजार में बिकने वाली वाणिज्यिक फसलें- नील, जूट, कपास, अफीम, चाय, कॉफी- उगाने पर विवश किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कृषि के इस वाणिज्यीकरण का एक दुखद पहलू यह था कि खाद्यान्न उत्पादन घटने लगा क्योंकि भूमि नकदी फसलों में लग गई। इससे अकालों की आवृत्ति और भीषणता बढ़ गई। 1876-79 और 1896-97 के भीषण अकालों में करोड़ों भारतीय मारे गए। इतिहासकार माइक डेविस ने इन्हें ‘Late Victorian Holocausts’ कहा और इसके लिए ब्रिटिश कृषि-वाणिज्य नीतियों को सीधे जिम्मेदार ठहराया।
44. दक्षिण भारत में सिंचाई व्यवस्था का अग्रदूत किसे माना जाता है?
Uttarakhand P.C.S. (Pre.) 2016
उत्तर-(a)
सर आर्थर कॉटन (1803-1899) ब्रिटिश सिविल इंजीनियर थे जिन्होंने दक्षिण भारत में सिंचाई के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किया। उन्होंने गोदावरी और कृष्णा नदियों पर बाँध और नहर परियोजनाएं बनाईं जिससे आंध्र क्षेत्र में लाखों एकड़ भूमि सिंचित हुई। इसीलिए उन्हें ‘दक्षिण भारत में सिंचाई व्यवस्था का अग्रदूत’ कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सर आर्थर कॉटन द्वारा 1852 में निर्मित ‘डोवलेश्वरम बैराज’ (गोदावरी नदी पर, राजमुंदरी के पास) आज भी कार्यरत है और इसे विश्व के सबसे पुराने जल-संरचनाओं में गिना जाता है। आंध्र प्रदेश में आज भी उन्हें ‘कॉटन दोर’ (कॉटन देवता) के रूप में श्रद्धा से याद किया जाता है और उनकी प्रतिमाएं स्थापित हैं।
45. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन औद्योगिक क्रांति के द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत पर पड़े प्रभाव की सही व्याख्या करता है?
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति का भारत पर सबसे विनाशकारी प्रभाव यह पड़ा कि भारत के परंपरागत दस्तकारी उद्योग- विशेषतः वस्त्र उद्योग- नष्ट हो गए। ब्रिटेन में मशीनों से बना सस्ता कपड़ा भारतीय बाजारों में भर गया, जबकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीय वस्त्रों पर इंग्लैंड में भारी आयात शुल्क लगाए। इस दोहरी मार से भारतीय बुनकर वर्ग तबाह हो गया।
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📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्ल मार्क्स ने लिखा- “अंग्रेज घुसपैठिया था, जिसने भारतीय खड्डी तोड़ दी और चरखे का नाश कर दिया।” इस अनुद्योगीकरण के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर शहरों से गाँवों की ओर विपरीत प्रवासन (Reverse Migration) हुआ- बेरोजगार बुनकर खेती की ओर लौटे, जिससे भूमि पर दबाव और बढ़ा और कृषि क्षेत्र में गरीबी गहरी हो गई।
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