पृष्ठभूमि
➣ 19वीं शताब्दी के भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति अनेक प्रकार की सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक रूढ़ियों से प्रभावित थी।
➣ बाल विवाह, विधवाओं की दयनीय स्थिति, महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध, पर्दा प्रथा तथा समाज में महिलाओं की सीमित सार्वजनिक भूमिका जैसे प्रश्न गंभीर सामाजिक समस्याओं के रूप में सामने आ रहे थे।
➣ इस परिस्थिति में भारतीय समाज के भीतर से उठे सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों ने महिला प्रश्न को व्यापक सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनाया।
➣ प्रारंभिक सुधार प्रयासों में महिला शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया। समाज सुधारकों, शिक्षाविदों और कुछ मिशनरी संस्थाओं के प्रयासों से बालिकाओं के लिए विद्यालयों की स्थापना होने लगी तथा धीरे-धीरे महिलाओं की शिक्षा के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन आया।
➣ हालांकि इस शिक्षा का विस्तार प्रारंभ में सीमित था और इसका लाभ मुख्यतः शहरी तथा अपेक्षाकृत संपन्न परिवारों की महिलाओं तक अधिक पहुँचा, फिर भी इस प्रक्रिया ने एक ऐसी शिक्षित महिला पीढ़ी के विकास का मार्ग प्रशस्त किया जो आगे चलकर सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने लगी।
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक महिला प्रश्न केवल पुरुष समाज सुधारकों के प्रयासों तक सीमित नहीं रहा। शिक्षित महिलाओं ने स्वयं अपने अनुभवों, समस्याओं और अधिकारों के प्रश्नों को सामने रखना प्रारंभ किया।
➣ महिलाओं की शिक्षा के विस्तार ने उनमें आत्मचेतना और सार्वजनिक जीवन के प्रति रुचि विकसित की। धीरे-धीरे यह विचार मजबूत हुआ कि महिलाओं की स्थिति में स्थायी परिवर्तन केवल उनके लिए सुधार करने से नहीं, बल्कि उन्हें स्वयं संगठित करके और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ाकर ही संभव है।
➣ 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में यह परिवर्तन अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा। अब महिलाओं ने स्वयं के स्वतंत्र संगठन और सामूहिक मंच बनाने शुरू किए।
➣ इन संगठनों का उद्देश्य केवल महिलाओं की शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक कुरीतियों का विरोध, महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार, नागरिक अधिकारों की माँग तथा सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देना भी था।
➣ इस प्रकार महिला आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे सुधारवादी प्रयासों से संगठित महिला अधिकार आंदोलन की दिशा में विकसित होने लगा।
➣ इस दौर में महिला शिक्षा और महिला संगठन एक-दूसरे के पूरक बन गए। शिक्षित महिलाओं ने विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं, पत्र-पत्रिकाओं और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से महिला प्रश्नों को उठाया।
➣ दूसरी ओर, महिला संगठनों ने शिक्षा के विस्तार को अपने प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल किया। इन प्रयासों से महिलाओं के बीच सामाजिक जागरूकता के साथ-साथ संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व का भी विकास हुआ।
➣ बाद के वर्षों में इन संगठनों का आधार केवल उच्च वर्ग तक सीमित न रहकर धीरे-धीरे अधिक व्यापक सामाजिक समूहों तक फैलने लगा।
➣ महिला आंदोलन के विकास के साथ महिलाओं के मुद्दों का स्वरूप भी व्यापक होता गया। प्रारंभ में जहाँ शिक्षा और सामाजिक सुधार प्रमुख विषय थे, वहीं आगे चलकर महिलाओं के समान अधिकार, मताधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानूनों में सुधार जैसे प्रश्न भी आंदोलन के महत्वपूर्ण हिस्से बन गए।
➣ इस परिवर्तन ने महिला आंदोलन को सामाजिक सुधार के क्षेत्र से निकालकर राजनीतिक अधिकारों और नागरिकता के व्यापक प्रश्नों से जोड़ दिया।
➣ इसी समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विस्तार ने भी महिला जागरण को नई दिशा दी। राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के कारण महिला प्रश्न और राष्ट्रीय प्रश्न के बीच संबंध मजबूत हुआ।
➣ महिलाओं ने सामाजिक सुधार के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी अपनी भूमिका तलाशनी शुरू की। परिणामस्वरूप महिला संगठनों ने आगे चलकर महिलाओं की राजनीतिक चेतना विकसित करने और उन्हें राष्ट्रीय जीवन में अधिक सक्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारत स्त्री महामंडल (1910)
➣ भारत स्त्री महामंडल का प्रारंभिक गठन नवंबर 1910 में लाहौर में एक निजी बैठक में हुआ। इस बैठक में सरला देवी चौधरानी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्हें संगठन का महासचिव बनाया गया।
➣ इसके बाद संगठन की उद्घाटन सभा दिसंबर 1910 में इलाहाबाद में आयोजित की गई, जहाँ विभिन्न क्षेत्रों से महिलाओं के एकत्र होने की योजना बनाई गई थी।
➣ संगठन की स्थापना का उद्देश्य महिलाओं को केवल किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित न रखकर उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर संगठित करना था।
➣ इसके गठन में यह विचार प्रमुख था कि भारत की महिलाएँ अपने नैतिक और भौतिक विकास के लिए आपसी सहयोग के आधार पर एक साथ कार्य करें।
➣ संगठन ने महिलाओं की समस्याओं को महिलाओं के अपने संगठनात्मक मंच के माध्यम से उठाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।
सरला देवी चौधरानी
➣ सरला देवी चौधरानी (1872–1945) भारत की प्रारंभिक महिला शिक्षाविदों, समाज सुधारकों और राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं में प्रमुख थीं। वे प्रसिद्ध टैगोर परिवार से संबंधित थीं।
➣ उनकी माता स्वर्णकुमारी देवी प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं। सरला देवी ने बेथ्यून स्कूल और बेथ्यून कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की तथा आगे चलकर शिक्षा और महिला जागरण को अपने सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण क्षेत्र बनाया।
➣ शिक्षा पूरी करने के बाद सरला देवी ने मैसूर के महारानी गर्ल्स स्कूल में अध्यापन भी किया। वे साहित्य और पत्रकारिता से भी जुड़ी थीं तथा परिवार की पत्रिका भारती के संपादन में सक्रिय रहीं।
➣ इस प्रकार उनका कार्यक्षेत्र केवल महिला संगठन तक सीमित नहीं था, बल्कि शिक्षा, साहित्य, राष्ट्रवाद और सामाजिक सुधार तक विस्तृत था।
सरला देवी के प्रारंभिक महिला-जागरण संबंधी कार्य
➣ भारत स्त्री महामंडल की स्थापना से पहले ही सरला देवी महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कार्य कर रही थीं।
1904 में उन्होंने लक्ष्मी भंडार नामक स्वदेशी दुकान की स्थापना की, जिसका उद्देश्य महिलाओं द्वारा निर्मित स्वदेशी वस्तुओं और हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करना था। स्वदेशी गतिविधियों के कारण उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से स्वर्ण पदक भी प्रदान किया गया।➣ सरला देवी महिलाओं में शारीरिक शिक्षा और आत्मविश्वास के विकास की भी समर्थक थीं। उन्होंने वीराष्टमी उत्सव जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं और युवाओं में शारीरिक क्षमता तथा वीरता की भावना विकसित करने का प्रयास किया।
➣ उनके लिए महिला जागरण केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास भी उसका हिस्सा था।
भारत स्त्री महामंडल के उद्देश्य
- भारत की विभिन्न जातियों, धर्मों, वर्गों और राजनीतिक विचारधाराओं की महिलाओं को एक साझा मंच पर संगठित करना।
- महिला शिक्षा का प्रसार करना और महिलाओं की बौद्धिक उन्नति को बढ़ावा देना।
- पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक बाधाओं को दूर करके महिलाओं को शिक्षा और सार्वजनिक जीवन से जोड़ना।
- महिलाओं के नैतिक एवं भौतिक विकास के लिए सामूहिक प्रयास करना।
- महिलाओं में आत्मनिर्भरता, संगठनात्मक चेतना और नेतृत्व क्षमता का विकास करना।
- महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार तथा उनके सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
महिला शिक्षा और पर्दा प्रथा के विरुद्ध प्रयास
➣ भारत स्त्री महामंडल के कार्यक्रमों में महिला शिक्षा को केंद्रीय स्थान प्राप्त था। उस समय पर्दा प्रथा के कारण बड़ी संख्या में महिलाएँ विद्यालयों तक नहीं पहुँच पाती थीं।
➣ इसलिए संगठन ने ऐसी महिलाओं तक शिक्षा पहुँचाने के लिए घरेलू शिक्षा व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया। प्रशिक्षित महिला शिक्षिकाओं को महिलाओं के घरों या जनाना/ज़नाना क्षेत्रों में भेजकर शिक्षा देने की योजना बनाई गई।
➣ इस दृष्टिकोण का विशेष महत्व इसलिए था क्योंकि संगठन ने यह समझा कि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में सभी महिलाओं को सार्वजनिक विद्यालयों तक लाना संभव नहीं था।
➣ इसलिए घर पर शिक्षा पहुँचाना पर्दानशीं महिलाओं को शिक्षा से जोड़ने का व्यावहारिक माध्यम बन सकता था। इस प्रयास ने महिला शिक्षा को सामाजिक रूढ़ियों के साथ जोड़कर देखने की एक नई दिशा प्रस्तुत की।
भारत स्त्री महामंडल का विस्तार
➣ भारत स्त्री महामंडल का उद्देश्य केवल लाहौर या इलाहाबाद तक सीमित रहना नहीं था। संगठन ने देश के विभिन्न भागों में अपनी शाखाएँ स्थापित करने का प्रयास किया।
➣ इसकी शाखाएँ लाहौर, इलाहाबाद, दिल्ली, कराची, अमृतसर, हैदराबाद, कानपुर, बांखुड़ा/बांकुड़ा, हजारीबाग, मिदनापुर और कलकत्ता आदि स्थानों में विकसित हुईं।
➣ इन शाखाओं के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को संगठन से जोड़ने और महिला शिक्षा तथा सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया। इस प्रकार संगठन ने महिला आंदोलन को क्षेत्रीय सीमाओं से निकालकर अखिल भारतीय स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।
भारत स्त्री महामंडल और महिला नेतृत्व
➣ भारत स्त्री महामंडल की एक विशेषता यह थी कि इसके संगठनात्मक कार्यों में महिलाओं की स्वयं की सक्रिय भूमिका थी। सरला देवी का मानना था कि महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए महिलाओं को स्वयं संगठित होना चाहिए।
➣ इसी कारण यह संगठन महिला आंदोलन के उस चरण का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें महिलाएँ केवल सुधार कार्यों की विषय-वस्तु न रहकर संगठनकर्ता और नेतृत्वकर्ता के रूप में सामने आईं।
➣ संगठन की प्रारंभिक सभा में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि की महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय थी।
➣ इलाहाबाद की उद्घाटन सभा की अध्यक्षता जंजीरा की बेगम साहिबा ने की तथा भोपाल की नवाब बेगम की उपस्थिति भी रही। यह तथ्य संगठन की उस व्यापक दृष्टि को दर्शाता है जिसमें विभिन्न समुदायों की महिलाओं को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया था।
सरला देवी चौधरानी और राष्ट्रीय आंदोलन
➣ सरला देवी का महिला जागरण का कार्य उनके राष्ट्रवादी विचारों से भी जुड़ा हुआ था। वे स्वदेशी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ी थीं और पंजाब में राष्ट्रवादी चेतना के प्रसार में उन्होंने भूमिका निभाई।
➣ बाद में वे महात्मा गांधी के संपर्क में आईं और 1919 के बाद गांधीजी के सत्य और अहिंसा के विचारों से प्रभावित हुईं। उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड का विरोध किया तथा आगे चलकर कांग्रेस की गतिविधियों से भी जुड़ी रहीं।
➣ इस प्रकार सरला देवी के लिए महिला जागरण और राष्ट्रीय जागरण एक-दूसरे से अलग विषय नहीं थे। महिलाओं को शिक्षित और संगठित करना उनके लिए भारतीय समाज के व्यापक पुनर्निर्माण तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास से जुड़ा हुआ था।
भारत स्त्री शिक्षा सदन
➣ सरला देवी की महिला शिक्षा संबंधी गतिविधियाँ आगे भी जारी रहीं। 1930 में उन्होंने कलकत्ता में भारत स्त्री शिक्षा सदन (Bharat Stree Shiksha Sadan) की स्थापना की।
➣ यह तथ्य भारत स्त्री महामंडल की मूल शिक्षा-केंद्रित सोच को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि सरला देवी ने महिला शिक्षा को केवल संगठन के उद्देश्य के रूप में नहीं देखा, बल्कि स्वयं शैक्षिक संस्थान स्थापित करने की दिशा में भी कार्य किया।
भारत स्त्री महामंडल का ऐतिहासिक स्थान
➣ भारत स्त्री महामंडल भारतीय महिला आंदोलन के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने महिलाओं को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित करने का प्रारंभिक प्रयास किया।
➣ इसका प्रमुख जोर महिला शिक्षा, पर्दा प्रथा के विरोध तथा महिलाओं के नैतिक और भौतिक विकास पर था। संगठन ने विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को एक-दूसरे से जोड़ने और उनके बीच संगठनात्मक चेतना विकसित करने का प्रयास किया।
➣ इसके माध्यम से महिला आंदोलन में यह विचार मजबूत हुआ कि महिलाओं की उन्नति के लिए उन्हें स्वयं संगठन बनाकर अपने साझा हितों पर कार्य करना चाहिए।
➣ आगे के दशकों में विकसित होने वाले व्यापक महिला संगठनों और महिला अधिकार आंदोलनों के लिए इस प्रकार के प्रारंभिक संगठनात्मक प्रयास एक महत्वपूर्ण आधार बने।
विमेन्स इंडियन एसोसिएशन (WIA), 1917
➣ विमेन्स इंडियन एसोसिएशन (Women’s Indian Association- WIA) का गठन 8 मई 1917 को अडयार, मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में हुआ। यह 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर में भारत में महिलाओं के लिए गठित सबसे महत्वपूर्ण संगठनों में से एक था।
➣ संगठन के गठन में एनी बेसेंट, मार्गरेट एलिजाबेथ कज़िन्स और डोरोथी जीनराजदासा की प्रमुख भूमिका थी। WIA ने महिला शिक्षा, सामाजिक सुधार और विशेष रूप से महिला मताधिकार के प्रश्न को संगठित राजनीतिक मुद्दे के रूप में सामने रखा।
पृष्ठभूमि
➣ 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक भारत में महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार को लेकर जागरूकता बढ़ रही थी, लेकिन महिलाओं के लिए ऐसा व्यापक मंच अपेक्षाकृत कम था जो शिक्षा, सामाजिक सुधार और राजनीतिक अधिकारों को एक साथ लेकर चले।
➣ इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए WIA का गठन किया गया। इसके संगठनात्मक विचार पर पहले से मौजूद तमिल माधर संगम (Tamil Mathar Sangam), 1906 के अनुभव का भी प्रभाव था।
➣ संगठन का स्वरूप आरंभ से ही अपेक्षाकृत व्यापक और अंतर-सामुदायिक रखा गया। इसका नाम ‘Women’s Indian Association’ इस उद्देश्य को व्यक्त करता था कि भारतीय और यूरोपीय दोनों महिलाएँ इसमें शामिल हो सकें तथा संगठन किसी एक जाति, वर्ग या धार्मिक संप्रदाय तक सीमित न रहे।
➣ इस कारण WIA को भारत में महिला आंदोलन को एक व्यापक संगठनात्मक आधार देने वाली संस्था माना जाता है।
एनी बेसेंट, मार्गरेट कज़िन्स और डोरोथी जीनराजदासा
➣ एनी बेसेंट WIA की प्रथम अध्यक्ष बनीं और 1917 से 1932 तक संगठन के नेतृत्व में रहीं। वे थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़ी प्रमुख नेता, शिक्षाविद्, पत्रकार और भारतीय स्वशासन की समर्थक थीं।
उनके राजनीतिक प्रभाव ने WIA को प्रारंभ से ही सामाजिक सुधार के साथ-साथ राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न से जोड़ने में सहायता की।➣ मार्गरेट एलिजाबेथ कज़िन्स आयरिश महिला अधिकार कार्यकर्ता, थियोसोफिस्ट और मताधिकारवादी थीं। उन्होंने WIA के संगठनात्मक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसकी मानद महासचिव बनीं।
महिलाओं की शिक्षा, मताधिकार और सामाजिक सुधार के प्रश्नों पर उनका सक्रिय योगदान रहा।➣ डोरोथी जीनराजदासा भी WIA के प्रारंभिक नेतृत्व की प्रमुख सदस्य थीं और संगठन की प्रथम उपाध्यक्ष बनीं। संगठन के विस्तार में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी।
उनके प्रयासों से WIA की अनेक नई शाखाएँ स्थापित हुईं और महिला संगठन को स्थानीय स्तर से व्यापक नेटवर्क में बदलने में सहायता मिली।प्रारंभिक पदाधिकारी
➣ WIA के प्रारंभिक नेतृत्व में विभिन्न क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों से जुड़े व्यक्तियों को शामिल किया गया था। इसके प्रथम पदाधिकारियों में एनी बेसेंट- अध्यक्ष, डोरोथी जीनराजदासा- उपाध्यक्ष, मार्गरेट कज़िन्स- मानद महासचिव तथा ए. महादेव शास्त्री- कोषाध्यक्ष शामिल थे।
➣ आगे चलकर सरोजिनी नायडू, हेराबाई टाटा, डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी, धनवंती राम राऊ, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, बेगम हसरत मोहानी आदि महिलाएँ भी WIA की गतिविधियों और व्यापक महिला आंदोलन से जुड़ीं। इससे संगठन का चरित्र और अधिक अखिल भारतीय हुआ।
उद्देश्य
- महिलाओं को आत्म-विकास, शिक्षा और सामाजिक सेवा के लिए संगठित करना।
- महिलाओं में उनके सामाजिक और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना।
- महिलाओं के लिए नगरपालिका तथा विधान परिषदों में मताधिकार प्राप्त करना।
- महिलाओं को नगरपालिका तथा विधान परिषदों में निर्वाचित होने का अधिकार दिलाना।
- बाल विवाह का विरोध करना तथा लड़कियों की विवाह-आयु और सहमति की आयु बढ़ाने के लिए प्रयास करना।
- लड़के और लड़कियों दोनों के लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के विस्तार की मांग करना।
- महिलाओं के सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक विकास के लिए सार्वजनिक मत तैयार करना।
महिला मताधिकार का आंदोलन
➣ WIA की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि उसने शुरुआत से ही महिला मताधिकार को अपने प्रमुख राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल किया।
➣ संगठन का मानना था कि यदि महिलाओं को स्थानीय निकायों और विधान परिषदों में पुरुषों के समान मतदान का अधिकार मिले, तो वे सार्वजनिक निर्णय-प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगी।
➣ 18 दिसंबर 1917 को WIA ने सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में एक महिला प्रतिनिधिमंडल को भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू से मिलने भेजा।
➣ प्रतिनिधिमंडल ने आगामी संवैधानिक सुधारों के अंतर्गत महिलाओं को पुरुषों के समान मताधिकार देने की मांग की। यह भारतीय महिला आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तक्षेप था।
➣ इस प्रतिनिधिमंडल में सरोजिनी नायडू, एनी बेसेंट, हेराबाई टाटा तथा अन्य महिला कार्यकर्ता शामिल थीं। भारतीय महिलाओं ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि वे केवल सामाजिक सुधारों की लाभार्थी नहीं, बल्कि देश की नागरिक और राजनीतिक अधिकारों वाली जनता का हिस्सा हैं।
➣ प्रारंभ में केंद्रीय स्तर पर तत्काल समान मताधिकार नहीं मिला, लेकिन इस अभियान के परिणामस्वरूप प्रांतीय विधानसभाओं को महिलाओं को मताधिकार देने के संबंध में निर्णय लेने का अवसर मिला।
➣ मद्रास में 1920 और बॉम्बे में 1921 से महिलाओं को सीमित रूप में मताधिकार मिलने की प्रक्रिया शुरू हुई।
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में भूमिका
➣ WIA ने महिला मताधिकार के साथ-साथ अनेक सामाजिक समस्याओं को भी अपने कार्यक्रम का हिस्सा बनाया। इनमें बाल विवाह, अशिक्षा, देवदासी प्रथा तथा महिलाओं की सामाजिक स्थिति से जुड़ी अन्य समस्याएँ शामिल थीं।
संगठन का दृष्टिकोण यह था कि राजनीतिक अधिकारों के साथ सामाजिक सुधार भी महिलाओं की वास्तविक उन्नति के लिए आवश्यक हैं।➣ WIA की गतिविधियों का एक भाग वयस्क महिलाओं की शिक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण से जुड़ा था। विभिन्न शाखाओं में साक्षरता, सिलाई, प्राथमिक चिकित्सा और अन्य उपयोगी कौशलों की कक्षाएँ चलाने को प्रोत्साहित किया गया।
➣ इससे महिला शिक्षा को केवल सैद्धांतिक विषय न रखकर आत्मनिर्भरता और सामाजिक सेवा से जोड़ने का प्रयास किया गया।
देवदासी प्रथा और बाल विवाह के विरुद्ध प्रयास
➣ WIA ने देवदासी प्रथा के उन्मूलन तथा महिलाओं की सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए अभियान चलाया। WIA से जुड़ी डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ महिला संगठनों के दबाव और व्यापक सामाजिक सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप देवदासी प्रथा के विरुद्ध विधायी प्रयासों को बल मिला।
➣ संगठन ने बाल विवाह के उन्मूलन के लिए भी लगातार अभियान चलाया। आगे चलकर बाल विवाह के विरुद्ध विधायी कार्रवाई के लिए वातावरण बनाने में WIA और अन्य महिला संगठनों की सक्रियता उपयोगी रही।
विमेन्स इंडियन एसोसिएशन और शिक्षा
➣ WIA का एक प्रमुख लक्ष्य महिलाओं और बच्चों के लिए शिक्षा के अवसरों का विस्तार करना था। संगठन ने महिलाओं के आत्म-विकास को शिक्षा से जोड़ते हुए प्राथमिक शिक्षा के विस्तार और महिलाओं के लिए व्यावहारिक तथा वयस्क शिक्षा कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया।
➣ संगठन की शाखाओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार साक्षरता, सिलाई, प्राथमिक चिकित्सा और अन्य प्रशिक्षण चलाने के लिए प्रेरित किया जाता था।
➣ इससे WIA का कार्य केवल राजनीतिक मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह महिला कल्याण और सामाजिक सेवा से भी जुड़ा रहा।
स्त्री धर्म पत्रिका
➣ WIA ने महिलाओं के विचारों और समस्याओं को व्यापक स्तर पर पहुँचाने के लिए स्त्री धर्म नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसका पहला अंक जनवरी 1918 में प्रकाशित हुआ।
➣ यह पत्रिका WIA की आधिकारिक आवाज बनी और इसके माध्यम से महिलाओं के अधिकार, मताधिकार, सामाजिक प्रश्न, कानून तथा दुनिया भर में महिलाओं की गतिविधियों से संबंधित सामग्री प्रकाशित की जाती थी।
➣ एनी बेसेंट इसके प्रारंभिक संपादकों में थीं तथा मार्गरेट कज़िन्स और डोरोथी जीनराजदासा भी इसके संपादकीय कार्य से जुड़ी रहीं।
➣ पत्रिका ने भारतीय महिलाओं के प्रश्नों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय महिला आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका प्रकाशन 1936 तक जारी रहा।
स्थानीय स्वशासन और राजनीतिक भागीदारी
➣ WIA ने महिलाओं को केवल मतदान का अधिकार देने तक सीमित मांग नहीं रखी, बल्कि उन्हें नगरपालिका, स्थानीय निकायों और विधान परिषदों में निर्वाचित होने का अधिकार देने की भी मांग की। संगठन का उद्देश्य महिलाओं को शासन की संस्थाओं में सक्रिय प्रतिनिधित्व दिलाना था।
➣ WIA की सतत राजनीतिक सक्रियता का परिणाम यह हुआ कि कुछ प्रांतों में महिलाओं को स्थानीय निकायों और विधान संस्थाओं में प्रवेश के अवसर मिलने लगे।
➣ संगठन के अनुसार उसकी गतिविधियों के परिणामस्वरूप मद्रास में महिलाओं के नगरपालिका मताधिकार और लड़कियों के लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की दिशा में भी प्रगति हुई।
महिलाओं की सामाजिक सेवा और कल्याण कार्य
➣ WIA की गतिविधियों में सामाजिक सेवा का भी महत्वपूर्ण स्थान था। इसके अंतर्गत गरीबों की सहायता, विधवाओं के लिए आश्रय, आपदा-पीड़ितों की सहायता तथा संकटग्रस्त महिलाओं के लिए प्रशिक्षण जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया गया।
➣ WIA से संबंधित Women’s Home of Service जैसी पहल का उद्देश्य संकट में पड़ी वयस्क भारतीय महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें सम्मानजनक जीवन और आजीविका के लिए सक्षम बनाना था।
➣ इस प्रकार संगठन के कार्यक्रमों में राजनीतिक अधिकारों के साथ महिला कल्याण और आत्मनिर्भरता का भी समावेश था।
राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध
➣ WIA का गठन ऐसे समय में हुआ जब होमरूल आंदोलन और भारतीय स्वशासन की मांग तेज हो रही थी। एनी बेसेंट का राजनीतिक नेतृत्व और संगठन की महिला अधिकारों संबंधी गतिविधियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं।
➣ WIA ने महिलाओं के अधिकारों को भारत के व्यापक राजनीतिक प्रश्न और स्वशासन से जोड़ने में भूमिका निभाई।
➣ महिला मताधिकार की मांग के लिए भारतीय महिला प्रतिनिधिमंडलों का संवैधानिक अधिकारियों से मिलना यह दर्शाता है कि महिला आंदोलन अब केवल सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं था।
➣ महिलाएँ अपने नागरिक अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए सीधे औपनिवेशिक शासन की संस्थाओं से बातचीत करने लगी थीं।
WIA की प्रमुख उपलब्धियाँ
➣ WIA की गतिविधियों से महिलाओं के लिए मताधिकार का प्रश्न राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बना। इसके लगातार प्रयासों और अन्य महिला संगठनों के सहयोग से विभिन्न प्रांतों में महिलाओं को धीरे-धीरे मताधिकार और राजनीतिक भागीदारी के अवसर मिले।
➣ WIA के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, आगे चलकर महिलाओं को भारत के विभिन्न प्रांतों में मताधिकार प्राप्त हुआ तथा कई स्थानीय और विधायी संस्थाओं में उनके प्रवेश का मार्ग खुला।
➣ संगठन ने महिला शिक्षा, बाल विवाह विरोध, देवदासी प्रथा के विरुद्ध अभियान, सामाजिक सेवा और महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में एक साथ काम किया।
➣ इससे भारतीय महिला आंदोलन का स्वरूप अधिक व्यापक हुआ और महिलाओं के प्रश्न सामाजिक सुधार के साथ-साथ नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न से भी जुड़ गए।
➣ WIA की एक बड़ी उपलब्धि यह भी थी कि उसने महिलाओं के बीच संगठनात्मक चेतना और राजनीतिक सक्रियता को बढ़ावा दिया। इसकी शाखाओं और पत्रिका के माध्यम से महिला प्रश्नों पर विचारों का प्रसार हुआ तथा विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं के बीच संपर्क स्थापित हुआ।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 8 मई 1917 |
| स्थान | अडयार, मद्रास (वर्तमान चेन्नई) |
| प्रमुख संस्थापक/संगठनकर्ता | एनी बेसेंट, मार्गरेट कज़िन्स और डोरोथी जीनराजदासा |
| प्रथम अध्यक्ष | एनी बेसेंट |
| प्रथम उपाध्यक्ष | डोरोथी जीनराजदासा |
| मानद महासचिव | मार्गरेट कज़िन्स |
| मुख्य मुद्दे | महिला शिक्षा, सामाजिक सुधार, महिला मताधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व |
| 1917 | सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में एडविन मॉन्टेग्यू के समक्ष महिला मताधिकार की मांग |
| 1918 | स्त्री धर्म पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ |
| 1920 | मद्रास में महिलाओं को मताधिकार मिलने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति |
| 1929 | शारदा अधिनियम के लिए महिला संगठनों के व्यापक अभियान का महत्वपूर्ण चरण |
| संबद्ध प्रमुख महिलाएँ | सरोजिनी नायडू, हेराबाई टाटा, डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी, धनवंती राम राऊ आदि |
नेशनल काउंसिल ऑफ विमेन इन इंडिया (NCWI), 1925
➣ नेशनल काउंसिल ऑफ विमेन इन इंडिया (National Council of Women in India- NCWI) औपनिवेशिक भारत में विकसित होने वाले प्रमुख महिला संगठनों में से एक था। इसे भारत के तीन प्रमुख प्रारंभिक राष्ट्रीय महिला संगठनों- WIA, NCWI और AIWC– में से एक माना जाता है।
➣ इसे सामान्यतः 1925 में गठित माना जाता है और यह International Council of Women (ICW) से संबद्ध भारत की राष्ट्रीय प्रतिनिधि संस्था बनी।
➣ NCWI का उद्देश्य भारत के विभिन्न महिला संगठनों और प्रांतीय महिला परिषदों को एक साझा मंच पर लाना तथा महिलाओं और बच्चों की सामाजिक, नागरिक, नैतिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए समन्वित प्रयास करना था।
➣ NCWI के स्थापना-वर्ष के संबंध में स्रोतों में अंतर मिलता है। NCWI की वर्तमान आधिकारिक वेबसाइट इसके गठन का वर्ष 1923 बताती है, जबकि Nehru Archive, Cambridge University Press, PMML तथा अन्य
➣ ऐतिहासिक अध्ययनों में 1925 को इसके राष्ट्रीय स्वरूप/औपचारिक गठन का वर्ष माना गया है।
➣ इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 1925 को मुख्य तथ्य के रूप में रखना अधिक उपयुक्त है।
स्थापना एवं पृष्ठभूमि
➣ NCWI का निर्माण किसी एक दिन में अचानक नहीं हुआ था, बल्कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विकसित हुए विभिन्न महिला संगठनों और सामाजिक सेवा नेटवर्क के क्रमिक समन्वय का परिणाम था।
➣ विशेष रूप से बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता की महिलाओं ने युद्धकालीन राहत एवं सामाजिक सेवा के दौरान एक-दूसरे से संपर्क विकसित किया।
➣ आगे चलकर इन क्षेत्रीय संगठनों को एक राष्ट्रीय ढाँचे में जोड़ने का प्रयास किया गया। इस विकासक्रम में Bombay Presidency Women’s Council का विशेष स्थान था।
➣ PMML के अभिलेखीय विवरण के अनुसार, बॉम्बे प्रेसिडेंसी विमेन्स काउंसिल से जुड़े नेटवर्क का विस्तार बंगाल, बिहार, उड़ीसा, दिल्ली और बर्मा तक हुआ। इस प्रकार विभिन्न प्रांतीय परिषदों के बीच बने संबंधों ने आगे चलकर राष्ट्रीय महिला परिषद के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ NCWI को International Council of Women की भारतीय शाखा के रूप में विकसित किया गया। इस प्रकार भारतीय महिला आंदोलन को पहली बार एक ऐसे राष्ट्रीय मंच से जोड़ा गया जिसकी अंतरराष्ट्रीय महिला संगठन से औपचारिक संबद्धता थी।
➣ 1925 में NCWI की ICW से संबद्धता हुई और भारतीय महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला आंदोलन के साथ संस्थागत संपर्क मिला।
➣ NCWI का एक मूल उद्देश्य विभिन्न प्रांतीय महिला परिषदों और संगठनों के बीच एक समान कार्य-ढाँचा, अनुभवों का आदान-प्रदान और संगठनात्मक सहयोग विकसित करना था।
➣ इस अर्थ में यह केवल स्वयं एक महिला संगठन नहीं था, बल्कि विभिन्न महिला संगठनों के लिए एक प्रकार की राष्ट्रीय समन्वयकारी संस्था भी था।
मेहरबाई टाटा एवं प्रमुख नेतृत्व
➣ NCWI के विकास में लेडी मेहरबाई टाटा का केंद्रीय स्थान था। वे सर दोराबजी टाटा की पत्नी थीं और बॉम्बे प्रेसिडेंसी विमेन्स काउंसिल की कार्यकारी समिति से जुड़ी हुई थीं।
➣ यूरोप की यात्रा के दौरान उन्होंने वहाँ महिलाओं द्वारा सामाजिक और नागरिक गतिविधियों में निभाई जा रही भूमिका को देखा। इससे उन्हें विश्वास हुआ कि भारतीय महिलाएँ भी संगठित होकर महिलाओं और बच्चों की समस्याओं को दूर करने में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं।
➣ मेहरबाई टाटा निष्क्रिय दान की अपेक्षा सक्रिय सामाजिक सेवा पर जोर देती थीं। वे विशेष रूप से मध्यमवर्गीय महिलाओं को गरीब बस्तियों में जाकर वास्तविक सामाजिक समस्याओं को समझने तथा सामाजिक सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित करती थीं। महिला शिक्षा और महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही को भी वे महिला उन्नति के लिए आवश्यक मानती थीं।
➣ NCWI की स्थापना में Lady Aberdeen और International Council of Women की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी।
➣ प्रारंभिक संरक्षकों में भोपाल की बेगम साहिबा, बड़ौदा की महारानी चिमनाबाई तथा लेडी मेहरबाई टाटा प्रमुख थीं। प्रारंभिक संगठनात्मक नेतृत्व से कर्नेलिया सोराबजी, ताराबाई प्रेमचंद, शफी तैयबजी तथा महारानी सुचारू देवी जैसे नाम जुड़े थे।
➣ बड़ौदा की महारानी को प्रारंभिक अध्यक्ष बनाया गया। महारानी चिमनाबाई 1925 से 1937 तक NCWI की अध्यक्ष रहीं, जबकि बाद में सेतु पार्वती बाई ने 1938 से 1944 तक अध्यक्ष पद संभाला।
उद्देश्य एवं प्रमुख कार्य
- भारत की महिलाओं में विचार, सहानुभूति और उद्देश्य की एकता विकसित करना।
- महिलाओं की कानूनी, सामाजिक और आर्थिक अक्षमताओं को दूर करने का प्रयास करना।
- महिलाओं और बच्चों के सामाजिक, नागरिक, नैतिक एवं शैक्षिक कल्याण को बढ़ावा देना।
- महिलाओं और बच्चों के पूर्ण एवं स्वतंत्र विकास और उन्नति के अवसरों का विस्तार करना।
- मौजूदा महिला परिषदों और संगठनों के कार्यों को संगठित, विकसित और समन्वित करना।
- महिला संगठनों के बीच ज्ञान, अनुभव और सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ाना।
➣ NCWI ने अपने उद्देश्यों को लागू करने के लिए कई विषयगत स्थायी समितियाँ गठित कीं। इनमें कानून, श्रम/कार्य, कला और प्रेस/मीडिया आदि से संबंधित समितियाँ शामिल थीं।
➣ इन समितियों के माध्यम से महिलाओं की सामाजिक एवं कानूनी समस्याओं का अध्ययन किया जाता था तथा सुधार के लिए सुझाव और ज्ञापन तैयार किए जाते थे।
➣ संगठन की स्थानीय शाखाएँ केवल बैठकों तक सीमित नहीं थीं। वे स्थानीय विद्यालयों, पुस्तकालयों, आश्रय गृहों, शरणालयों, कारागारों और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं के साथ संपर्क रखती थीं। इससे महिलाओं को सामाजिक सेवा और सार्वजनिक संस्थाओं के कार्यों में प्रत्यक्ष भागीदारी का अवसर मिला।
➣ NCWI का संगठनात्मक नेटवर्क भी काफी व्यापक था। PMML के अभिलेखीय विवरण के अनुसार, एक समय इसके साथ लगभग 15 परिषदें और 34 अखिल भारतीय संघ संबद्ध थे।
➣ इससे स्पष्ट होता है कि NCWI का उद्देश्य केवल एक केंद्रीय संगठन चलाना नहीं, बल्कि देशभर के महिला संगठनों को एक साथ जोड़ना था।
महिला अधिकार एवं सामाजिक सुधार
➣ NCWI ने महिलाओं के लिए सामाजिक और कानूनी सुधार को अपने प्रमुख कार्यक्षेत्रों में शामिल किया। बाल विवाह, महिला शिक्षा, महिलाओं की कार्य-स्थितियाँ, मातृत्व सुरक्षा, महिला संरक्षण और महिलाओं की कानूनी अक्षमताओं जैसे मुद्दों पर संगठन ने काम किया।
➣ इस दृष्टि से NCWI महिला आंदोलन को केवल शिक्षा के प्रश्न से आगे ले जाकर कानूनी और सामाजिक अधिकारों से जोड़ने वाला संगठन था।
➣ संगठन ने बाल विवाह के विरुद्ध चल रहे सुधार अभियान का समर्थन किया और शारदा अधिनियम, 1929 जैसे विधायी सुधारों के लिए बने व्यापक महिला-सामाजिक सुधार वातावरण में योगदान दिया।
➣ बाल विवाह को महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास में बाधा माना जाता था।
➣ NCWI ने महिलाओं की कार्य-स्थितियों और श्रम संबंधी समस्याओं पर भी ध्यान दिया। कामकाजी महिलाओं के लिए बेहतर परिस्थितियाँ, मातृत्व संबंधी सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषय इसकी समितियों तथा संबद्ध परिषदों के कार्यक्षेत्र में आए। PMML तथा अन्य ऐतिहासिक स्रोत इसे NCWI की महत्वपूर्ण गतिविधियों में शामिल करते हैं।
➣ महिलाओं की मातृत्व देखभाल, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण को महिला अधिकारों से जोड़कर देखना उस समय महिला आंदोलन के बदलते स्वरूप को दर्शाता था।
➣ इस प्रकार NCWI ने महिला प्रश्न को घरेलू जीवन से बाहर निकालकर श्रम, स्वास्थ्य और सार्वजनिक कल्याण के क्षेत्र से भी जोड़ा।
➣ संगठन ने महिला संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर भी काम किया। इसकी स्थानीय शाखाएँ आश्रय गृहों और कारागारों में महिलाओं की स्थितियों को लेकर सक्रिय थीं तथा महिलाओं के लिए मानवीय और सुरक्षित परिस्थितियों की मांग करती थीं।
➣ इसी प्रकार बॉम्बे में वेश्यावृत्ति संबंधी कानूनों और सामाजिक सुधारों का समर्थन भी संगठन की गतिविधियों का हिस्सा रहा।
➣ महिलाओं की शिक्षा और आत्मनिर्भरता भी NCWI के प्रमुख सरोकार थे। मेहरबाई टाटा का जोर इस बात पर था कि महिलाओं को ऐसा शिक्षित और सक्षम बनाया जाए जिससे वे अपने परिवार तथा समाज में अधिक स्वतंत्र और उपयोगी भूमिका निभा सकें।
➣ NCWI का कार्य इस प्रकार महिला कल्याण को शिक्षा, सामाजिक सेवा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ जोड़ता था।
➣ महिला मताधिकार का प्रश्न भी NCWI के व्यापक महिला अधिकार कार्यक्रम का हिस्सा था। इसका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत संवैधानिक और सुधारवादी था। संगठन ने महिलाओं की राजनीतिक स्थिति को सुधारने के लिए कानूनी और संस्थागत माध्यमों पर अधिक जोर दिया।
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका
➣ NCWI की सबसे विशिष्ट विशेषता उसका अंतरराष्ट्रीय संपर्क था। International Council of Women से संबद्ध होने के कारण भारतीय महिला आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय महिला संगठनों के साथ प्रत्यक्ष संस्थागत संबंध मिला। NCWI भारत का ICW में प्रतिनिधित्व करने वाला प्रारंभिक राष्ट्रीय संगठन बना।
➣ 1936 में कलकत्ता में International Council of Women तथा NCWI से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ।
➣ इससे भारतीय महिला संगठनों की अंतरराष्ट्रीय दृश्यता बढ़ी तथा भारतीय महिला प्रश्नों को वैश्विक महिला आंदोलन के संदर्भ में प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
➣ राष्ट्रीय स्तर पर NCWI का कार्य मुख्यतः संवैधानिक सुधार, सामाजिक सेवा और कानूनी परिवर्तन के माध्यम से महिलाओं की स्थिति सुधारने पर केंद्रित था।
➣ इस कारण इसका दृष्टिकोण WIA के अधिक राजनीतिक मताधिकार अभियान तथा आगे के जन-आधारित महिला आंदोलनों से कुछ भिन्न था।
➣ NCWI की एक प्रमुख सीमा इसका अभिजात चरित्र था। इसके नेतृत्व और सदस्यता में उच्च एवं संपन्न सामाजिक वर्ग की महिलाओं की प्रमुखता रही।
➣ Cambridge के अध्ययन के अनुसार, यही अभिजात चरित्र इसके व्यापक जनसंगठन बनने में बाधा बना और यह WIA या बाद में AIWC की तरह व्यापक राष्ट्रीय आंदोलनकारी संगठन के रूप में विकसित नहीं हो सका।
➣ इसी कारण NCWI की भूमिका को भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के व्यापक जनांदोलनों से अलग करके समझना चाहिए।
➣ इसका मुख्य जोर सामाजिक सुधार, कानून, महिला कल्याण, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संस्थागत प्रतिनिधित्व पर रहा, जबकि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष जन-आंदोलन इसकी प्राथमिक पहचान नहीं थी।
NCWI का भारतीय महिला आंदोलन में योगदान
➣ NCWI ने भारतीय महिला आंदोलन को एक राष्ट्रीय समन्वयकारी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिक मंच प्रदान किया। इसने विभिन्न प्रांतीय महिला परिषदों और संगठनों को एक-दूसरे से जोड़ने, उनके अनुभव साझा कराने और सामूहिक रूप से महिला प्रश्नों को उठाने का अवसर दिया।
➣ संगठन का योगदान महिला शिक्षा, सामाजिक सेवा, महिला श्रम, मातृत्व कल्याण, कानूनी सुधार, बाल विवाह विरोध, महिला संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय महिला सहयोग जैसे विविध क्षेत्रों में दिखाई देता है।
➣ इसकी गतिविधियों ने महिला प्रश्नों को प्रशासन और विधायिका के सामने संस्थागत रूप से प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को मजबूत किया।
➣ NCWI का योगदान केवल तत्कालीन सुधारों तक सीमित नहीं था। इसने भारतीय महिलाओं के लिए यह विचार मजबूत किया कि उनके सामाजिक प्रश्नों का समाधान संगठित प्रयास, सार्वजनिक प्रतिनिधित्व और विधायी सुधार के माध्यम से भी किया जा सकता है। इस दृष्टि से यह भारत में आधुनिक महिला संगठनों के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी था।
➣ NCWI का अपना प्रकाशन NCWI Bulletin भी था, जिसके माध्यम से संगठन की गतिविधियों और महिला संबंधी विषयों का प्रसार किया जाता था। इससे संगठन के विभिन्न भागों के बीच संपर्क और विचार-विनिमय को बढ़ावा मिला।
➣ इस प्रकार भारतीय महिला आंदोलन में NCWI का स्थान मुख्यतः एक ऐसे संगठन का है जिसने सामाजिक कल्याण, कानूनी सुधार, महिला अधिकार, संस्थागत प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय महिला सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाया। इसकी प्रमुख सीमा इसका अभिजात चरित्र और व्यापक जन-आधार का अपेक्षाकृत अभाव था।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| NCWI का सामान्यतः स्वीकृत स्थापना वर्ष | 1925 |
| प्रमुख प्रेरक | लेडी मेहरबाई टाटा |
| अंतरराष्ट्रीय संबद्धता | International Council of Women (ICW) |
| पहली अध्यक्ष | बड़ौदा की महारानी चिमनाबाई |
| प्रमुख प्रारंभिक नाम | मेहरबाई टाटा, कर्नेलिया सोराबजी, ताराबाई प्रेमचंद, शफी तैयबजी, महारानी सुचारू देवी |
| प्रमुख उद्देश्य | महिलाओं और बच्चों का सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक तथा नागरिक कल्याण |
| कार्य-पद्धति | परिषदों का समन्वय, समितियाँ, ज्ञापन, कानूनी सुधार और सामाजिक सेवा |
| प्रमुख विषय | महिला शिक्षा, महिला श्रम, मातृत्व कल्याण, बाल विवाह, महिला संरक्षण और महिला अधिकार |
| शारदा अधिनियम, 1929 | बाल विवाह विरोधी विधायी प्रयासों का समर्थन |
| प्रमुख प्रकाशन | NCWI Bulletin |
| मुख्य सीमा | अभिजात चरित्र और व्यापक जन-आधार का अभाव |
| ऐतिहासिक विशेषता | भारतीय महिला संगठनों को अंतरराष्ट्रीय महिला आंदोलन से जोड़ने वाली प्रमुख संस्था |
ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस (AIWC), 1927
➣ ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस (All India Women’s Conference- AIWC) की स्थापना 1927 में हुई। यह भारत के इतिहास में सबसे प्रभावशाली अखिल भारतीय महिला संगठनों में से एक बना।
➣ इसका प्रारंभिक उद्देश्य मुख्य रूप से महिला शिक्षा में सुधार करना था, लेकिन शीघ्र ही संगठन ने यह अनुभव किया कि महिलाओं की शिक्षा को सामाजिक कुरीतियों, कानूनी असमानताओं और राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न से अलग नहीं किया जा सकता।
➣ इसी कारण AIWC का कार्यक्षेत्र आगे चलकर सामाजिक सुधार, महिला अधिकार, कानूनी सुधार और राजनीतिक अधिकार तक विस्तृत हो गया।
स्थापना एवं प्रारंभिक अधिवेशन
➣ AIWC का गठन मार्गरेट एलिजाबेथ कज़िन्स की पहल पर हुआ। उन्होंने 1926 के अंत में देशभर की महिलाओं और महिला संगठनों से अपील की कि वे लड़कियों की शिक्षा से संबंधित समस्याओं पर चर्चा करने के लिए स्थानीय समितियाँ और सम्मेलन आयोजित करें।
➣ उनका उद्देश्य इन बैठकों से प्रतिनिधियों को चुनकर एक अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाना था, जो महिलाओं की शिक्षा के संबंध में एक प्रतिनिधिक ज्ञापन तैयार कर सके।
➣ इस प्रयास का परिणाम 5 से 8 जनवरी 1927 के बीच फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे (तत्कालीन पूना) में आयोजित प्रथम All India Women’s Conference on Educational Reform के रूप में सामने आया।
➣ इस प्रथम सम्मेलन की अध्यक्षता महारानी चिमनाबाई गायकवाड़ ने की। AIWC के आधिकारिक इतिहास के अनुसार सम्मेलन में लगभग 2,000 प्रतिभागी उपस्थित हुए।
➣ प्रथम अधिवेशन का मुख्य जोर प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा, वयस्क शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा से संबंधित प्रश्नों पर था।
➣ सम्मेलन के अधिकांश प्रस्ताव शिक्षा से संबंधित थे। यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि AIWC की शुरुआत सीधे राजनीतिक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि महिला शिक्षा सुधार के मंच के रूप में हुई थी।
➣ प्रथम सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण अपवाद सर हरबिलास सारदा के Age of Consent Bill के समर्थन से संबंधित प्रस्ताव था।
➣ शिक्षा पर चर्चा करते समय प्रतिनिधियों ने महसूस किया कि कम आयु में विवाह लड़कियों की शिक्षा के मार्ग में बड़ी बाधा है। यही समझ आगे चलकर AIWC को सामाजिक सुधार के व्यापक प्रश्नों की ओर ले गई।
मार्गरेट कज़िन्स एवं प्रारंभिक नेतृत्व
➣ मार्गरेट कज़िन्स AIWC के निर्माण की प्रमुख प्रेरक थीं। वे आयरलैंड की महिला मताधिकारवादी, थियोसोफिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता थीं तथा भारत में महिला शिक्षा एवं महिला अधिकारों के लिए सक्रिय रहीं।
➣ उन्होंने महिला संगठनों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय स्थापित करने और महिलाओं को अपनी समस्याओं पर स्वयं विचार करने के लिए संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ AIWC के प्रारंभिक नेतृत्व में महारानी चिमनाबाई गायकवाड़ का विशेष स्थान था। वे इसकी प्रथम अध्यक्ष (1927) बनीं। वे पहले से ही बाल विवाह विरोध, महिला शिक्षा और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रश्नों से जुड़ी हुई थीं।
➣ AIWC के आधिकारिक विवरण के अनुसार, वे पर्दा प्रथा को चुनौती देने वाली प्रगतिशील महिला थीं और महिलाओं की शिक्षा को विशेष महत्व देती थीं।
➣ आगे चलकर AIWC के नेतृत्व में बेगम जहाँ ऑफ भोपाल, सरोजिनी नायडू, डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी, हंसा मेहता, राजकुमारी अमृत कौर, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, विजयलक्ष्मी पंडित और रमेश्वरी नेहरू जैसी प्रमुख महिलाएँ आईं।
➣ इससे AIWC का संपर्क महिला शिक्षा से लेकर सामाजिक सुधार, राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन तक विभिन्न धाराओं से जुड़ा।
उद्देश्य एवं प्रमुख कार्य
- महिला शिक्षा का व्यापक प्रसार करना और लड़कियों के लिए प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक बेहतर अवसर उपलब्ध कराना।
- महिलाओं के लिए वयस्क शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा का विस्तार करना।
- महिलाओं को सामाजिक कुरीतियों और कानूनी असमानताओं से मुक्त कराने के लिए सामाजिक एवं कानूनी सुधार को बढ़ावा देना।
- बाल विवाह का विरोध करना और विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाने के लिए कानून बनाने की मांग करना।
- महिलाओं के मताधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों का समर्थन करना।
- महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार दिलाने तथा व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का समर्थन करना।
- महिलाओं और बच्चों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए संस्थागत कार्यक्रम चलाना।
➣ AIWC का प्रारंभिक कार्य मुख्यतः शिक्षा पर केंद्रित था, लेकिन संगठन ने शीघ्र ही यह स्वीकार किया कि यदि सामाजिक परिस्थितियाँ नहीं बदलेंगी तो केवल विद्यालय खोलना पर्याप्त नहीं होगा।
➣ पर्दा प्रथा, बाल विवाह और अन्य सामाजिक रूढ़ियाँ लड़कियों की शिक्षा में बाधा थीं। इसलिए AIWC ने शिक्षा और सामाजिक सुधार को परस्पर जुड़ा हुआ प्रश्न माना।
सामाजिक एवं कानूनी सुधार
➣ AIWC ने बाल विवाह की समस्या को महिला शिक्षा और महिला स्वास्थ्य से सीधे जोड़कर देखा। 1928 से संगठन ने Child Marriage Bill की प्रगति पर निगरानी रखने और राजनेताओं पर दबाव डालने के लिए विशेष प्रयास किए।
➣ इसी व्यापक अभियान का एक परिणाम बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929, जिसे सामान्यतः शारदा अधिनियम कहा जाता है, के पारित होने के रूप में सामने आया।
➣ आगे चलकर AIWC ने महिलाओं के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का प्रश्न उठाया। संगठन ने हिंदू व्यक्तिगत कानून में बहुविवाह पर नियंत्रण, महिलाओं को तलाक का अधिकार और संपत्ति/उत्तराधिकार में अधिकार देने जैसे सुधारों का समर्थन किया।
➣ इन मांगों का संबंध बाद में स्वतंत्र भारत में हुए हिंदू विधि सुधार से भी जुड़ा।
➣ AIWC ने समय के साथ देवदासी प्रथा, महिलाओं की श्रम-स्थितियाँ, मातृत्व लाभ और महिला संरक्षण से जुड़े कानूनी सुधारों का भी समर्थन किया।
➣ संगठन के आधिकारिक उपलब्धि-विवरण में Sarda Act, Hindu Code Bill, Devdasi Act, Universal Adult Franchise, Factory and Mines Act और Maternity Benefits Act को उसके विधायी योगदान से जोड़ा गया है।
महिला शिक्षा एवं संस्थागत निर्माण
➣ AIWC ने महिला शिक्षा को केवल सम्मेलन और प्रस्तावों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि शैक्षिक संस्थाओं के निर्माण की दिशा में भी काम किया। 1929 में All India Women’s Education Fund Association (AIWEFA) की स्थापना महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई।
➣ इसके आगे के प्रयासों से 1932 में दिल्ली में Lady Irwin College की स्थापना हुई, जिसे AIWC के आधिकारिक इतिहास में महिलाओं के लिए भारत का पहला Home Science College बताया गया है।
➣ यह संस्था AIWC की शिक्षा संबंधी सोच का महत्वपूर्ण उदाहरण थी। इससे महिलाओं को केवल सामान्य शिक्षा ही नहीं, बल्कि गृह-विज्ञान, पोषण, स्वास्थ्य और व्यावहारिक कौशल से जुड़ी उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। इस प्रकार
➣ AIWC ने महिला शिक्षा को परिवार, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण से जोड़ने का प्रयास किया।
➣ AIWC से जुड़े संस्थागत प्रयास आगे भी जारी रहे। संगठन ने विभिन्न क्षेत्रों में विद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र, छात्रावास, परामर्श केंद्र और सामाजिक कल्याण संस्थाएँ विकसित कीं। इससे इसका स्वरूप केवल एक सम्मेलन-आधारित संस्था का न रहकर एक व्यापक महिला-कल्याण संगठन का हो गया।
राष्ट्रीय आंदोलन एवं राजनीतिक भूमिका
➣ AIWC की शुरुआत शिक्षा सुधार के मंच के रूप में हुई थी, लेकिन 1920 और 1930 के दशक में यह महिलाओं के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की प्रमुख आवाज बन गया।
➣ महिला शिक्षा के प्रश्न से आगे बढ़ते हुए संगठन ने मताधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानून के समक्ष समानता जैसे प्रश्नों को भी उठाया।
➣ AIWC से जुड़ी अनेक महिला नेता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भी सक्रिय थीं। राजकुमारी अमृत कौर, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू, हंसा मेहता और अन्य नेताओं ने महिला आंदोलन तथा राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध को मजबूत किया।
➣ राजकुमारी अमृत कौर विशेष रूप से गांधीजी के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन और बाद में संविधान-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रहीं।
➣ AIWC की राजनीतिक भूमिका धीरे-धीरे अधिक व्यापक हुई और संगठन ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सहित महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों का समर्थन किया।
➣ स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक AIWC की गतिविधियाँ केवल महिला शिक्षा या सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रह गई थीं, बल्कि महिलाओं की समान नागरिकता के व्यापक प्रश्न से जुड़ चुकी थीं।
➣ स्वतंत्रता के समय AIWC के अध्यक्ष पद पर हंसा मेहता थीं। AIWC के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, अगस्त 1947 में उन्होंने AIWC की ओर से भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को प्रस्तुत किया। यह AIWC और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की प्रक्रिया के बीच संबंध का एक उल्लेखनीय प्रसंग है।
AIWC का भारतीय महिला आंदोलन में स्थान
➣ AIWC का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने महिला आंदोलन के एजेंडे को शिक्षा से आगे बढ़ाकर सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक अधिकारों तक विस्तृत किया।
➣ इसकी शुरुआत शिक्षा सुधार से हुई, लेकिन संगठन ने जल्द ही यह स्पष्ट कर दिया कि महिलाओं की वास्तविक मुक्ति के लिए सामाजिक कुरीतियों और कानूनी असमानताओं को भी समाप्त करना आवश्यक है।
➣ AIWC ने शारदा अधिनियम, महिला संपत्ति एवं उत्तराधिकार अधिकार, हिंदू विधि सुधार, देवदासी प्रथा उन्मूलन, श्रम एवं मातृत्व संबंधी सुधार और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार जैसे मुद्दों पर काम किया। साथ ही, इसने शिक्षा के क्षेत्र में संस्थागत निर्माण करके महिला आंदोलन को व्यावहारिक आधार भी दिया।
➣ इसलिए भारतीय महिला आंदोलन के इतिहास में AIWC को एक ऐसे संगठन के रूप में देखा जाता है जिसने महिला शिक्षा, सामाजिक सुधार, कानूनी अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय चेतना को एक व्यापक आंदोलन में जोड़ दिया।
➣ इसकी विशेषता यह थी कि यह केवल मांग उठाने वाला मंच नहीं रहा, बल्कि शिक्षा और सामाजिक कल्याण के लिए संस्थाएँ विकसित करने वाला संगठन भी बना।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1927 |
| प्रारंभिक सम्मेलन | 5–8 जनवरी 1927, फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे |
| प्रारंभिक नाम | All India Women’s Conference on Educational Reform |
| प्रमुख प्रेरक | मार्गरेट एलिजाबेथ कज़िन्स |
| प्रथम अध्यक्ष | महारानी चिमनाबाई गायकवाड़, बड़ौदा |
| प्रारंभिक मुख्य मुद्दा | महिला शिक्षा |
| प्रमुख विस्तार | शिक्षा से सामाजिक सुधार, महिला अधिकार और राजनीतिक अधिकारों तक |
| बाल विवाह विरोध | शारदा अधिनियम, 1929 के समर्थन में सक्रिय भूमिका |
| शिक्षा संबंधी संस्था | All India Women’s Education Fund Association (AIWEFA), 1929 |
| महत्वपूर्ण कॉलेज | Lady Irwin College, दिल्ली, 1932; AIWEFA द्वारा स्थापित |
| प्रमुख महिला नेता | सरोजिनी नायडू, डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी, राजकुमारी अमृत कौर, हंसा मेहता, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, विजयलक्ष्मी पंडित, रमेश्वरी नेहरू आदि |
| विधायी मुद्दे | Sarda Act, Hindu Code Bill, Devdasi Act, Factory and Mines Act, Maternity Benefits Act और Universal Adult Franchise |
| स्वतंत्रता काल का प्रसंग | 1947 में AIWC की अध्यक्ष हंसा मेहता द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को प्रस्तुत किया जाना |
| कानूनी स्थिति | 1930 में Societies Registration Act के अंतर्गत पंजीकरण |
➣ महारानी चिमनाबाई गायकवाड़ 1927 में ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस (AIWC) की प्रथम अध्यक्ष बनीं और इसके बाद 1928 से 1937 तक नेशनल काउंसिल ऑफ विमेन इन इंडिया (NCWI) की अध्यक्ष रहीं। इस प्रकार वे दोनों प्रमुख अखिल भारतीय महिला संगठनों के नेतृत्व से जुड़ी थीं।
महिला संगठनों के प्रमुख उद्देश्य एवं योगदान
| संगठन | स्थापना | मुख्य फोकस | प्रमुख कार्य/योगदान | विशेष पहचान |
|---|---|---|---|---|
| भारत स्त्री महामंडल | 1910 | महिला शिक्षा एवं संगठन | महिलाओं को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित करना, महिला शिक्षा का प्रसार, पर्दा प्रथा जैसी बाधाओं के विरुद्ध प्रयास, महिलाओं में संगठनात्मक चेतना विकसित करना। | प्रारंभिक अखिल भारतीय महिला संगठन |
| विमेन्स इंडियन एसोसिएशन (WIA) | 1917 | महिला शिक्षा, सामाजिक सुधार एवं मताधिकार | महिला मताधिकार के लिए अभियान, 1917 में मॉन्टेग्यू के समक्ष प्रतिनिधिमंडल, बाल विवाह एवं देवदासी प्रथा के विरुद्ध प्रयास, स्त्री धर्म पत्रिका के माध्यम से महिला जागरूकता। | महिला मताधिकार को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाने वाला संगठन |
| नेशनल काउंसिल ऑफ विमेन इन इंडिया (NCWI) | 1925 | सामाजिक कल्याण, कानूनी सुधार एवं संस्थागत समन्वय | विभिन्न महिला परिषदों का समन्वय, महिला एवं बाल कल्याण, श्रम एवं मातृत्व संबंधी प्रश्न, कानूनी सुधार तथा अंतरराष्ट्रीय महिला संगठनों से संपर्क। | International Council of Women से संबद्ध राष्ट्रीय महिला परिषद |
| ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस (AIWC) | 1927 | महिला शिक्षा से सामाजिक एवं राजनीतिक सुधार | महिला शिक्षा, बाल विवाह विरोध, महिला अधिकार, व्यक्तिगत कानूनों में सुधार, मताधिकार, सामाजिक कल्याण तथा महिला शिक्षा के लिए संस्थाओं की स्थापना। | शिक्षा से आगे बढ़कर व्यापक महिला अधिकार आंदोलन का प्रमुख मंच |
➣ इन सभी संगठनों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग होते हुए भी महिला शिक्षा, सामाजिक सुधार, महिला अधिकार और महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर इनके उद्देश्यों में पर्याप्त समानता थी।
➣ इनके माध्यम से भारतीय महिला आंदोलन धीरे-धीरे सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के प्रश्न तक पहुँचा।
➣ शारदा अधिनियम, 1929 को किसी एक संगठन की उपलब्धि के रूप में नहीं देखना चाहिए। WIA, NCWI और AIWC सहित अनेक महिला एवं सामाजिक सुधार संगठनों ने बाल विवाह के विरुद्ध जनमत तैयार किया और विधायी सुधार के लिए समर्थन दिया।
➣ इसके साथ हरबिलास सरदार की विधायी पहल ने इस सुधार को कानून का रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए शारदा अधिनियम को इन संगठनों के संयुक्त सामाजिक-सुधार अभियान के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
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