मीराबाई : कृष्ण-भक्त संत कवयित्रीय
➣ मीराबाई मध्यकालीन भारत की महान कृष्ण-भक्त संत कवयित्री तथा सगुण भक्ति धारा की प्रमुख प्रतिनिधि थीं। उन्होंने अपने पदों एवं भजनों के माध्यम से कृष्ण-भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया।
➣ मीराबाई का जन्म 1498 ई. में कुड़की (वर्तमान पाली जिला, राजस्थान) में हुआ। वे मेड़ता के राठौड़ वंश के रत्नसिंह राठौड़ की पुत्री थीं।
➣ बाल्यावस्था में ही उनकी माता का देहान्त हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके दादा राव दूदाजी के संरक्षण में हुआ।
➣ लोक-परम्परा के अनुसार बचपन में एक संत द्वारा प्राप्त भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति ने उनके मन में आजीवन कृष्ण-भक्ति की गहरी भावना उत्पन्न कर दी।
➣ उनका विवाह मेवाड़ के महाराणा राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही भोजराज का निधन हो गया।
➣ पति की मृत्यु के पश्चात मीराबाई ने सांसारिक जीवन से विरक्त होकर स्वयं को पूर्णतः भगवान श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल) की भक्ति में समर्पित कर दिया। उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य एवं पति मानकर आजीवन उनकी उपासना की।
➣ उनकी भक्ति माधुर्य (कान्ता) भाव पर आधारित थी, जिसमें भक्त स्वयं को भगवान का प्रिय अथवा जीवनसाथी मानकर प्रेमपूर्वक उनकी उपासना करता है।
| विषय | मीराबाई की भक्ति |
|---|---|
| आराध्य | भगवान श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल) |
| भक्ति धारा | सगुण भक्ति |
| भक्ति-भाव | माधुर्य (कान्ता) भाव |
| मोक्ष का साधन | प्रेम एवं पूर्ण समर्पण |
साहित्य एवं भक्ति
➣ मीराबाई ने राजस्थानी एवं ब्रजभाषा में अनेक भक्ति-पदों की रचना की। उनके पदों में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह, समर्पण एवं आत्मनिवेदन की भावना प्रमुख रूप से व्यक्त होती है।
➣ उनकी रचनाओं का प्रमुख संकलन मीरा की पदावली के नाम से प्रसिद्ध है। परम्परागत रूप से नरसी जी का मायरा जैसी कुछ अन्य रचनाएँ भी उनसे सम्बद्ध मानी जाती हैं, किन्तु उनकी प्रामाणिकता के विषय में विद्वानों में मतभेद है।
➣ उनकी रचनाओं की भाषा सरल, भावपूर्ण एवं संगीतात्मक है, जिसके कारण उनके भजन आज भी भक्ति-संगीत एवं लोक-परम्परा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
➣ मीराबाई के अनेक भजन आज भी उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अत्यन्त लोकप्रिय हैं। इनमें मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई तथा पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
भक्ति आन्दोलन में योगदान
➣ मीराबाई ने कृष्ण-भक्ति को सामाजिक बन्धनों से ऊपर उठाकर व्यक्तिगत प्रेम एवं पूर्ण समर्पण का स्वरूप प्रदान किया। उनके पदों ने सगुण कृष्ण-भक्ति को जनसामान्य तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ उनके जीवन एवं काव्य का भारतीय भक्ति साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे हिन्दी तथा राजस्थानी साहित्य की प्रमुख संत-कवयित्रियों में गिनी जाती हैं।
➣ मीराबाई ने स्त्री-भक्ति परम्परा को नई पहचान दी। उनके पदों ने आगे चलकर उत्तर भारत की कृष्ण-भक्ति परम्परा एवं भक्ति साहित्य को गहराई से प्रभावित किया।
मृत्यु
➣ लोक-परम्परा के अनुसार 1546 ई. के लगभग द्वारका स्थित रणछोड़जी मंदिर में भक्ति में लीन अवस्था में उनका देहावसान हुआ। एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार वे भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं, किन्तु इसका ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
➣ मीराबाई का जीवन भारतीय भक्ति आन्दोलन में नारी-भक्ति, आत्मसमर्पण तथा कृष्ण-प्रेम का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है।
• जन्म : 1498 ई., कुड़की (पाली, राजस्थान)
• पिता : रत्नसिंह राठौड़
• पति : भोजराज (राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र)
• • गुरु : परम्परा के अनुसार संत रविदास
• आराध्य : भगवान श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल)
• भक्ति धारा : सगुण कृष्ण-भक्ति
• भक्ति-भाव : माधुर्य (कान्ता) भाव
• भाषा : राजस्थानी एवं ब्रजभाषा
• प्रमुख कृति : मीरा की पदावली
• प्रसिद्ध पद : “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई”
• मृत्यु : लगभग 1546 ई. (लोक-परम्परा के अनुसार), रणछोड़जी मंदिर, द्वारका
प्रातिक्रिया दे