1. भागवत संप्रदाय के विकास में किसका देन अत्यधिक था?
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(d)
भागवत (वैष्णव) धर्म अपने शिखर पर गुप्त साम्राज्य के काल में पहुँचा। गुप्त शासक स्वयं वैष्णव थे और उन्होंने इसे राजधर्म का दर्जा दिया। अधिकांश गुप्त सम्राट ‘परमभागवत’ की उपाधि ग्रहण करते थे। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ गुप्तों का राजकीय प्रतीक चिह्न था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त काल में ही विष्णु के दशावतार की अवधारणा पूर्णतः विकसित हुई और इसे गुप्तकालीन मंदिरों व मुद्राओं पर उकेरा गया। चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने देवीचन्द्रगुप्तम् नाटक में विष्णु-भक्ति का स्पष्ट प्रतिपादन किया।
2. अर्धनारीश्वर मूर्ति में आधा शिव तथा आधा पार्वती प्रतीक है-
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
अर्धनारीश्वर की संकल्पना शिव और शक्ति (पार्वती) के अभेद को दर्शाती है — अर्थात् देव और उसकी आद्याशक्ति का अविभाज्य मिलन। यह मूर्ति-शिल्प पुरुष-तत्व (चेतना) और प्रकृति-तत्व (शक्ति) की एकता का दार्शनिक प्रतीक है। कालिदास ने अपने महाकाव्य ‘कुमारसम्भवम्’ में इसी दिव्य युगल का काव्यात्मक वर्णन किया है। गुप्तोत्तर युग में ऐसी संयुक्त मूर्तियाँ विशेष रूप से लोकप्रिय हुईं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्धनारीश्वर की सबसे प्राचीन ज्ञात प्रतिमाएँ कुषाण काल (प्रथम-द्वितीय शताब्दी ई.) की हैं जो मथुरा कला शैली में निर्मित हैं। एलोरा की गुफा संख्या 29 में उत्कीर्ण अर्धनारीश्वर की विशाल प्रतिमा राष्ट्रकूट कालीन शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।
3. निम्न में से किस ग्रंथ में सर्वप्रथम देवकी के पुत्र कृष्ण का वर्णन किया गया है?
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
देवकी-पुत्र कृष्ण का सबसे प्राचीन उल्लेख छांदोग्य उपनिषद (3.17.6) में मिलता है, जहाँ उन्हें घोर आंगिरस का शिष्य बताया गया है। यह उपनिषद सामवेद की परंपरा से संबंधित है और इसकी रचना लगभग 800-600 ई.पू. मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ (लगभग 400 ई.पू.) में ‘वासुदेवक’ शब्द का प्रयोग मिलता है, जो वासुदेव कृष्ण के उपासकों के लिए प्रयुक्त होता था — यह भी कृष्ण-पूजा की प्राचीनता का प्रमाण है। मेगस्थनीज (300 ई.पू.) ने मथुरा क्षेत्र में हेराकल्स (जिसे विद्वान वासुदेव कृष्ण से समीकृत करते हैं) की पूजा का उल्लेख अपने ‘इंडिका’ में किया है।
4. प्राचीन भारत के विश्वोत्पत्ति (Cosmogonic) विषयक धारणाओं के अनुसार, चार युगों के चक्र का क्रम इस प्रकार है-
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
हिन्दू ब्रह्माण्डविज्ञान के अनुसार काल-चक्र चार युगों में विभाजित है: कृत (सत्ययुग) → त्रेता → द्वापर → कलि। इन चारों युगों का सम्मिलित काल एक ‘महायुग’ या ‘चतुर्युग’ (43,20,000 वर्ष) कहलाता है और एक हजार महायुग मिलकर ब्रह्मा का एक दिन ‘कल्प’ बनाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रत्येक युग की अवधि क्रमशः घटती जाती है — सत्ययुग 17,28,000 वर्ष, त्रेता 12,96,000 वर्ष, द्वापर 8,64,000 वर्ष और कलियुग 4,32,000 वर्ष का होता है। इस युग-सिद्धांत का सर्वप्रथम विस्तृत विवेचन महाभारत के ‘शांतिपर्व’ और विष्णु पुराण में मिलता है।
5. निम्नलिखित में से कौन अलवार संत नहीं था?
U.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
पोयगई, पूडम (भूतम) और तिरुमंगई तमिल वैष्णव भक्ति परंपरा के 12 अलवार संतों में सम्मिलित हैं, जबकि तिरुज्ञान संबंधर शैव भक्ति परंपरा के 63 नयनार संतों में गिने जाते हैं। 12 अलवार संतों की रचनाओं का संकलन ‘नालायिर दिव्य प्रबंधम्’ कहलाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अलवार संतों में आण्डाल (कोडई) एकमात्र महिला संत थीं, जिनकी कृति ‘तिरुप्पावै’ आज भी मार्गशीर्ष माह में दक्षिण भारत के मंदिरों में गाई जाती है। नाथमुनि ने 10वीं शताब्दी में ‘नालायिर दिव्य प्रबंधम्’ को संकलित व व्यवस्थित किया और इसे ‘द्राविड वेद’ का दर्जा दिया।
6. वासुदेव कृष्ण की पूजा सर्वप्रथम किसने प्रारंभ की?
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
वैष्णव धर्म का आरंभिक स्वरूप ‘भागवत धर्म’ के रूप में प्रकट हुआ, जिसमें देवकी-पुत्र वासुदेव कृष्ण की आराधना की जाती थी। यह परंपरा संभवतः छठी शताब्दी ई.पू. से भी पहले स्थापित हो चुकी थी। पाणिनि के काल में वासुदेव के उपासक ‘वासुदेवक’ कहे जाते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हेलिओडोरस स्तंभ (विदिशा, मध्यप्रदेश, लगभग 110 ई.पू.) इस बात का पुरातात्विक प्रमाण है कि यूनानी राजदूत हेलिओडोरस स्वयं ‘भागवत’ बन गया था और उसने वासुदेव के सम्मान में यह गरुड़ध्वज स्तंभ स्थापित किया — यह स्तंभ विष्णु-भक्ति के प्रसार का सबसे पुराना अभिलेखीय साक्ष्य माना जाता है।
7. नयनार कौन थे ?
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2006
उत्तर-(a)
नयनार दक्षिण भारत के तमिल भाषी क्षेत्र में भक्तिकाल के प्रमुख शैव संत-कवि थे। इनकी कुल संख्या 63 मानी जाती है। इन्होंने ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत प्रेम और समर्पण के माध्यम से मोक्ष का मार्ग बताया। तमिल क्षेत्र में वैष्णव भक्त ‘अलवार’ और शिव-भक्त ‘नयनार’ कहलाए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नयनार संतों की रचनाओं का संकलन ‘तिरुमुरै’ (12 खंड) में हुआ है, जिसे शैव साहित्य में ‘द्राविड वेद’ की मान्यता प्राप्त है। इनमें तिरुज्ञान संबंधर, अप्पर (तिरुनावुक्करसर) और सुंदरर की रचनाएँ ‘देवारम्’ नाम से प्रसिद्ध हैं और चोल मंदिरों में नित्य गायी जाती थीं।
8. ‘नयनार’ कौन थे?
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(b)
नयनार शैव धर्मानुयायी संत-कवि थे जिन्होंने तमिल भक्ति आंदोलन में शिव-भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया। इन्होंने जाति-व्यवस्था की कठोरता का विरोध किया और ईश्वर-भक्ति को सर्वोच्च मार्ग बताया। इनके 63 संतों में सभी जातियों के लोग सम्मिलित थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नयनार परंपरा को चोल राजाओं का विशेष संरक्षण प्राप्त था। राजराज चोल प्रथम (985-1014 ई.) ने तिरुमुरै का संकलन करवाया और तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर में नयनार-मूर्तियाँ स्थापित करवाईं — यह परंपरा राज्याश्रय से भक्ति के संस्थागत रूप लेने का उत्तम उदाहरण है।
9. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राचीन भारत में शैव संप्रदाय था?
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(b)
मत्तमयूर प्राचीन भारत का एक प्रमुख शैव संप्रदाय था। यह संप्रदाय मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित था और इसके अनुयायी कश्मीर एवं मध्य भारत में विशेष रूप से सक्रिय थे। आजीवक एक स्वतंत्र श्रमण परंपरा थी, जबकि मयमत और ईशानशिवगुरुदेवपद्धति शैव आगम ग्रंथ हैं, संप्रदाय नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शैव धर्म के प्रमुख संप्रदायों में पाशुपत (सबसे प्राचीन), कापालिक, कालामुख और काश्मीर शैव दर्शन (त्रिक दर्शन) सम्मिलित हैं। पाशुपत संप्रदाय के प्रवर्तक लकुलीश माने जाते हैं और इसका उल्लेख महाभारत के ‘शांतिपर्व’ में मिलता है।
10. भागवत धर्म के प्रवर्तक थे-
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1993
उत्तर-(b)
परंपरा और इतिहास दोनों के अनुसार भागवत धर्म के मूल प्रवर्तक वृष्णि (सात्वत) कुल में जन्मे वासुदेव कृष्ण थे। वे मथुरा के निवासी थे और देवकी के पुत्र थे। छांदोग्य उपनिषद में उन्हें घोर आंगिरस का शिष्य बताया गया है, जिससे उनके दार्शनिक व्यक्तित्व की पुष्टि होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भागवत धर्म ‘पंचरात्र’ और ‘एकान्तिक धर्म’ के नाम से भी जाना जाता था। इस धर्म में चार व्यूहों — वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — की अवधारणा विशिष्ट है, जो क्रमशः चेतना, जीव, मन और अहंकार के प्रतीक माने जाते हैं।
11. भारत में आस्तिक और नास्तिक संप्रदायों में कौन-सा विमेदक लक्षण है?
ng>U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(c)
भारतीय दर्शन में संप्रदायों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है — आस्तिक और नास्तिक। इस वर्गीकरण का मुख्य और सर्वसम्मत आधार वेदों की प्रामाणिकता में विश्वास है। जो संप्रदाय वेदों को प्रमाण मानते हैं वे आस्तिक कहलाते हैं — जैसे सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत। जो वेदों को प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं — जैसे बौद्ध, जैन और चार्वाक। ध्यान देने योग्य है कि सांख्य दर्शन ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता, फिर भी वह वेद-प्रमाण्य मानने के कारण आस्तिक माना जाता है — यह तथ्य ईश्वर की सत्ता को वर्गीकरण का आधार नहीं बनने देता।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन को ‘लोकायत’ भी कहा जाता है और यह भौतिकवादी दर्शन का सबसे प्राचीन रूप है जो वेद, आत्मा, पुनर्जन्म — सभी को अस्वीकार करता है। जैन दर्शन ईश्वर की सत्ता नहीं मानता किंतु आत्मा और कर्म सिद्धांत को मानता है, इस कारण यह नास्तिक होते हुए भी नैतिकता में समृद्ध है।
12. अधोलिखित में से कौन एक गीता की मुख्य शिक्षा है?
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(d)
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो सबसे महत्वपूर्ण संदेश दिया वह निष्काम कर्मयोग है — अर्थात कर्म करो, किंतु उसके फल की कामना मत करो। यह सिद्धांत गीता के द्वितीय अध्याय में “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” श्लोक के माध्यम से व्यक्त हुआ है। निष्काम कर्मयोग में ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों का समन्वय होता है — इसीलिए यह केवल कर्मयोग से भिन्न और श्रेष्ठ है। आधुनिक काल में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ में और महात्मा गांधी ने अपनी टीका ‘अनासक्तियोग’ में इसी को गीता की केंद्रीय शिक्षा स्वीकार किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। यह महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है। गीता को ‘उपनिषदों का सार’ कहा जाता है क्योंकि इसमें प्रमुख उपनिषदों के दार्शनिक विचारों को व्यावहारिक रूप दिया गया है।
13. निम्नलिखित में से किस देवता को कला में हल लिए प्रदर्शित किया गया है?
ng>U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(b)
भारतीय मूर्तिकला और धार्मिक परंपरा में बलराम को हमेशा हल (लांगल) और मूसल धारण किए हुए दिखाया जाता है। इसी कारण उन्हें ‘हलधर’ या ‘हलायुध’ भी कहा जाता है। वे श्रीकृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग के अवतार माने जाते हैं। कृष्ण को सामान्यतः बांसुरी, चक्र या शंख के साथ दर्शाया जाता है, जबकि कार्तिकेय को भाले (शक्ति) के साथ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बलराम को वैष्णव परंपरा में विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है। मथुरा कला शैली में बलराम की प्रतिमाएँ सर्वाधिक मिलती हैं जहाँ उन्हें नीले वस्त्रों में हल और मूसल के साथ दर्शाया गया है। बौद्ध साहित्य में भी बलराम का उल्लेख ‘संकर्षण’ नाम से मिलता है।
14. विष्णु के किस अवतार को सागर से पृथ्वी का उद्धार करते हुए अंकित किया जाता है?
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
U.P. U.D.A./L.D.A. (SpL) (Mains) 2010
U.P. U.D.A./L.D.A. (SpL) (Mains) 2010
उत्तर-(c)
पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरणाक्ष ने पृथ्वी को समुद्र की गहराई में छिपा दिया था। भगवान विष्णु ने वाराह (शूकर/सूअर) का रूप धारण करके उस दैत्य का वध किया और अपने दंत-शूल पर पृथ्वी को रखकर सागर से बाहर निकाला। मूर्तिकला में वाराह अवतार को मानव शरीर और वाराह के मुख के साथ, चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हुए दर्शाया जाता है। यह विष्णु का तृतीय अवतार है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उदयगिरि (मध्य प्रदेश) की गुफाओं में गुप्तकालीन वाराह अवतार की विशाल एवं भव्य प्रतिमा उत्कीर्ण है जो भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्ट कृतियों में मानी जाती है। इसे चंद्रगुप्त द्वितीय के काल (लगभग 401-402 ई.) का माना जाता है। वाराह को ‘पृथ्वीपति’ भी कहा जाता है।
15. भागवत संप्रदाय में भक्ति के रूपों की संख्या है-
U.P. U.D.A./ L.D.A. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
भागवत संप्रदाय में ईश्वर प्राप्ति अथवा मोक्ष के लिए नवधा भक्ति का विधान है जिसमें नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन मिलता है। ये हैं — श्रवण (भगवान की कथा सुनना), कीर्तन (नाम-गुण का गायन), स्मरण (ध्यान), पाद-सेवन (चरण-वंदना), अर्चन (पूजा), वंदन (नमस्कार), दास्य (सेवाभाव), सख्य (मित्रता का भाव) और आत्मनिवेदन (सम्पूर्ण समर्पण)। श्रीमद्भागवत पुराण में प्रह्लाद ने इन्हीं नौ रूपों का वर्णन किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नवधा भक्ति का सबसे सरल और लोकप्रिय वर्णन वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में शबरी-राम संवाद में भी मिलता है। भागवत पुराण को ‘महापुराण’ की श्रेणी में रखा गया है और इसमें 12 स्कंध व 18,000 श्लोक हैं — यह वैष्णव संप्रदाय का सर्वाधिक प्रतिष्ठित ग्रंथ माना जाता है।
16. निम्नलिखित में से कौन मोक्ष के साधन के रूप में ज्ञान, कर्म तथा भक्ति को समान महत्व देता है?
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(c)
भगवद्गीता में मोक्ष के तीन प्रमुख मार्गों — ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग — को समान रूप से महत्व दिया गया है। अद्वैत वेदांत में शंकराचार्य ने ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया और माया के सिद्धांत द्वारा जगत को मिथ्या बताया। विशिष्टाद्वैत में रामानुजाचार्य ने भक्ति को मोक्ष का प्रमुख साधन माना। मीमांसा दर्शन यज्ञकर्म और वैदिक अनुष्ठानों को ही मोक्ष का मार्ग स्वीकार करता है। गीता इन तीनों को समन्वित कर एक सम्पूर्ण मार्ग प्रस्तुत करती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गीता के 18 अध्यायों को तीन भागों में बाँटा जाता है — प्रथम 6 अध्याय कर्मयोग, मध्य 6 अध्याय ज्ञानयोग और अंतिम 6 अध्याय भक्तियोग से संबंधित माने जाते हैं। रामानुजाचार्य (1017–1137 ई.) ने गीता पर ‘गीताभाष्य’ लिखा जिसमें भक्ति की प्रधानता सिद्ध की गई है।
17. हेलियोडोरस का बेसनगर अभिलेख संदर्भित है-
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(d)
बेसनगर (विदिशा, मध्य प्रदेश) का गरुड़ स्तंभ लेख भागवत धर्म का सबसे प्रारंभिक पुरातात्विक प्रमाण है। इस अभिलेख में हेलियोडोरस ने केवल वासुदेव (विष्णु) को ‘देवदेवस’ अर्थात देवताओं के देव के रूप में संदर्भित किया है। हेलियोडोरस तक्षशिला का निवासी था और यवन राजा एंटियाल्किडस का राजदूत था, जो शुंग राजा भागभद्र के दरबार में आया था। उसने भागवत धर्म स्वीकार किया और यह स्तंभ स्थापित करवाया। यह लगभग दूसरी शती ई.पू. का है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह अभिलेख इस बात का प्रमाण है कि भागवत/वैष्णव धर्म विदेशियों में भी लोकप्रिय था। इसमें तीन जीवन-सिद्धांतों का उल्लेख है — दम (संयम), त्याग और अप्रमाद — जो भागवत धर्म की नैतिक शिक्षाओं को दर्शाते हैं। यह स्तंभ अभी भी विदिशा संग्रहालय परिसर में संरक्षित है।
18. भागवत धर्म से संबंधित प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य है-
U.P.P.C.S. (SpL.) (Mains) 2008
उत्तर-(b)
भागवत धर्म से संबंधित सबसे प्राचीन अभिलेखीय साक्ष्य हेलियोडोरस का बेसनगर अभिलेख (लगभग 110 ई.पू.) है। इसमें हेलियोडोरस ने स्वयं को ‘भागवत’ घोषित किया है और वासुदेव के सम्मान में गरुड़ स्तंभ की स्थापना करवाई। समुद्रगुप्त का इलाहाबाद अभिलेख चौथी शती ई. का है, जो इससे काफी बाद का है। अतः बेसनगर अभिलेख कालक्रम में सबसे प्राचीन है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त के इलाहाबाद अभिलेख को हरिषेण ने संस्कृत में लिखा था और यह प्रयागराज के अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण है। महरौली (दिल्ली) का लौह स्तंभ लेख चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) से संबंधित है और इसमें भी विष्णु-भक्ति का स्पष्ट उल्लेख है।
19. भागवत धर्म का ज्ञात सर्वप्रथम अमिलेखीय साक्ष्य है-
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
भागवत धर्म का ज्ञात सर्वप्रथम अभिलेखीय साक्ष्य बेसनगर (विदिशा) का गरुड़ स्तंभ है जिसे हेलियोडोरस ने स्थापित करवाया था। यह स्तंभ प्रस्तर-निर्मित (पाषाण) है और इस पर उत्कीर्ण लेख में हेलियोडोरस को ‘भागवत’ और वासुदेव को ‘देवदेवस’ कहा गया है। गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख सातवाहन वंश से संबंधित है और धनदेव का अयोध्या अभिलेख कोसल के शासक से संबंधित है — ये भागवत धर्म के प्राथमिक साक्ष्य नहीं हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गरुड़ को विष्णु का वाहन माना जाता है और गरुड़ स्तंभ की स्थापना वैष्णव भक्ति का प्रतीक थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने बेसनगर को एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल घोषित किया है जहाँ उत्खनन में और भी भागवत परंपरा से जुड़े अवशेष प्राप्त हुए हैं।
20. ‘बेसनगर अमिलेख’ का हेलियोडोरस कहां का निवासी था?
U.P. U.D.A. L.D.A. (Pre) 2010
उत्तर-(b)
बेसनगर अभिलेख के अनुसार हेलियोडोरस तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान में रावलपिंडी के निकट) का निवासी था। वह यवन (यूनानी) राजा एंटियाल्किडस का राजदूत था जिसे शुंग राजा भागभद्र के दरबार में भेजा गया था। तक्षशिला उस काल में एक प्रमुख व्यापारिक और शैक्षिक केंद्र था। यवन राजदूत का भागवत धर्म को ग्रहण करना भारतीय और यूनानी संस्कृतियों के बीच गहरे सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमाण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तक्षशिला विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालय नगरों में से एक था जहाँ चाणक्य (कौटिल्य) ने शिक्षा प्राप्त की थी। पुष्कलावती (वर्तमान चारसद्दा, पाकिस्तान) गांधार क्षेत्र की एक अन्य प्रमुख यूनानी बस्ती थी, जबकि साकल (वर्तमान सियालकोट) यवन राजा मिनांडर (मिलिंद) की राजधानी थी।
21. राष्ट्रीय मानव संग्रहालय कहां पर है?
M.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
राष्ट्रीय मानव संग्रहालय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित है। इसकी स्थापना 1977 ई. में हुई थी और बाद में इसका नाम बदलकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय कर दिया गया। यह संग्रहालय भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था है तथा मानव सभ्यता, जनजातीय कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए समर्पित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:यह संग्रहालय लगभग 200 एकड़ क्षेत्र में फैला है और इसमें 36 पुनर्निर्मित आदिवासी आवास तथा 32 राज्यों की जनजातीय संस्कृति से जुड़ी वस्तुएं प्रदर्शित हैं, जो इसे एशिया के सबसे बड़े मानव विज्ञान संग्रहालयों में से एक बनाती हैं।
22. पुरी में ‘रथयात्रा’ किसके सम्मान में निकाली जाती है?
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Pre) 2007
उत्तर-(c)
ओडिशा के पुरी में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ (विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण), उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के सम्मान में भव्य रथयात्रा आयोजित की जाती है। तीनों देवताओं को अलग-अलग विशाल रथों में बैठाकर गुंडिचा मंदिर तक यात्रा कराई जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जगन्नाथ पुरी को चार धामों में से एक माना जाता है। पुरी रथयात्रा का उल्लेख स्कंद पुराण, नारद पुराण एवं ब्रह्म पुराण में भी मिलता है। इसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।
23. भारतीय पुरातत्व का जनक’ किसे कहा जाता है?
M.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
अलेक्जेंडर कनिंघम (1814–1893 ई.) को ‘भारतीय पुरातत्व का जनक’ कहा जाता है। वे ब्रिटिश सेना में बंगाल इंजीनियर्स के अधिकारी थे और भारतीय ऐतिहासिक स्थलों की खोज व अभिलेखन में अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना की और इसके पहले महानिदेशक बने।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कनिंघम ने सारनाथ, सांची, तक्षशिला और कई बौद्ध स्थलों की खुदाई करवाई। उन्होंने ‘Coins of Ancient India’ और ‘The Stupa of Bharhut’ जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ भी लिखे, जो भारतीय पुरातत्व के आधारभूत संदर्भ ग्रंथ माने जाते हैं।
24. वह प्राचीन स्थल जहां 60,000 मुनियों की सभा में संपूर्ण महाभारत- कथा का वाचन किया गया था, है –
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(d)
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिषारण्य को 60,000 ऋषि-मुनियों का निवास स्थल माना गया है। यहीं पर सूत गोस्वामी ने महर्षि सौनक एवं अन्य ऋषियों के समक्ष, जब वे दीर्घकालीन यज्ञ में रत थे, समग्र महाभारत कथा का वाचन किया था। इससे पूर्व इसी कथा का पाठ वैशम्पायन ने राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ के अवसर पर किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:नैमिषारण्य को ‘तीर्थों का राजा’ भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार यहाँ की भूमि पर ब्रह्मा का चक्र गिरा था, इसीलिए इसे ‘नैमिष’ (चक्र के गिरने का स्थान) कहा जाता है। यह स्थान वैष्णव, शैव और शाक्त तीनों परंपराओं के लिए पवित्र माना जाता है।
25. सूची-I तथा सूची-II को सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही
सूची-I सूची-II
A. जैन धर्म 1. मदीना
B. हिंदू धर्म 2. वेटिकन
C. इस्लाम धर्म 3. पावापुरी
D. ईसाई धर्म 4. वाराणसी
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए-
सूची-I सूची-II
A. जैन धर्म 1. मदीना
B. हिंदू धर्म 2. वेटिकन
C. इस्लाम धर्म 3. पावापुरी
D. ईसाई धर्म 4. वाराणसी
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए-
M.P.P.C.S. (Spl) (Pre) 2004
उत्तर-(c)
सूची-I और सूची-II का सही सुमेलन इस प्रकार है — जैन धर्म → पावापुरी; हिंदू धर्म → वाराणसी; इस्लाम धर्म → मदीना; ईसाई धर्म → वेटिकन। पावापुरी बिहार में स्थित है जहाँ 527 ई.पू. में भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया। वाराणसी गंगा तट पर स्थित हिंदुओं का प्राचीनतम तीर्थ है। मदीना इस्लाम का दूसरा पवित्रतम शहर है जहाँ पैगंबर मुहम्मद साहब की दरगाह है। वेटिकन विश्व का सबसे छोटा स्वतंत्र देश (44 हेक्टेयर) है और रोमन कैथोलिक चर्च की केंद्रीय सत्ता का आसन है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:पावापुरी में जल मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जो एक सरोवर के मध्य स्थित है और जैन परंपरा के अनुसार उसी स्थान पर निर्मित है जहाँ महावीर का अंतिम संस्कार हुआ था। वाराणसी को ‘काशी’ नाम से भी जाना जाता है और इसे विश्व के सबसे पुराने जीवित नगरों में से एक माना जाता है।
26. निम्नांकित में से कौन ‘प्रस्थानत्रयी’ में सम्मिलित नहीं है?
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
वेदांत दर्शन के तीन सर्वप्रमुख ग्रंथों को सम्मिलित रूप से ‘प्रस्थानत्रयी’ कहा जाता है — (1) उपनिषद (श्रुति प्रस्थान), (2) ब्रह्मसूत्र (न्याय प्रस्थान), और (3) भगवद्गीता (स्मृति प्रस्थान)। भागवत पुराण इस त्रयी में सम्मिलित नहीं है। वेदांत के आचार्यों — शंकर, रामानुज, मध्व आदि — ने अपने-अपने संप्रदाय की स्थापना इन्हीं तीनों पर भाष्य लिखकर की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:आदि शंकराचार्य (788–820 ई.) ने प्रस्थानत्रयी पर सबसे प्रभावशाली भाष्य लिखे और अद्वैत वेदांत की स्थापना की। उन्होंने पूरे भारत में चार मठों — शृंगेरी, द्वारका, पुरी और ज्योतिर्मठ — की स्थापना भी की जो आज भी सक्रिय हैं।
27. नासिक में कुंभ मेला निम्न में किस एक नदी के तट पर लगता है-
U.P.P.C.S. (Mains) 2003
उत्तर-(d)
नासिक में प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर गोदावरी नदी के तट पर कुंभ मेला आयोजित होता है, जिसे ‘सिंहस्थ’ भी कहा जाता है। भारत में चार स्थानों पर कुंभ मेला आयोजित होता है — (1) हरिद्वार (गंगा), (2) प्रयागराज (गंगा-यमुना-सरस्वती संगम), (3) नासिक (गोदावरी) और (4) उज्जैन (क्षिप्रा)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:2019 में प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेले में अनुमानतः 24 करोड़ से अधिक श्रद्धालु आए थे, जो इसे विश्व के सबसे बड़े शांतिपूर्ण मानव समागमों में से एक बनाता है। यूनेस्को ने 2017 में कुंभ मेले को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में शामिल किया।
28. रामायण के किस कांड में राम और हनुमान की पहली भेंट का वर्णन है?
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
उत्तर-(a)
महर्षि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रचित आदिकाव्य रामायण में कुल 7 कांड हैं। चौथा कांड किष्किन्धा कांड है, जिसमें श्रीराम और हनुमान की ऐतिहासिक प्रथम भेंट का वर्णन है। इसी कांड में बालि-वध, सुग्रीव का वानर साम्राज्य का राजा बनना और सीता की खोज हेतु वानर सेना के प्रस्थान का वर्णन भी है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:वाल्मीकि रामायण में कुल लगभग 24,000 श्लोक हैं, इसीलिए इसे ‘चतुर्विंशति सहस्री संहिता’ भी कहते हैं। सुंदर कांड को रामायण का हृदय माना जाता है क्योंकि इसमें हनुमान की लंका यात्रा और सीता की खोज का विस्तृत वर्णन है।
29. कालिका पुराण किस धर्म से संबंधित है?
M.P.P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(b)
कालिका पुराण हिंदू धर्म की शाक्त परंपरा से संबंधित है। यह देवी काली और शक्ति की उपासना पर केंद्रित ग्रंथ है। इसे ‘कलि पुराण’ भी कहा जाता है और यह मुख्यतः असम एवं पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित शाक्त परंपराओं का प्रमुख धार्मिक ग्रंथ है। इसमें देवी की पूजा-विधि, तंत्र और कामाख्या मंदिर का विस्तृत वर्णन मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कालिका पुराण में असम स्थित कामाख्या मंदिर को शक्तिपीठों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। यह पुराण अन्य पुराणों से भिन्न इसलिए है क्योंकि इसमें पशुबलि और तांत्रिक अनुष्ठानों का विस्तृत उल्लेख है, जो शाक्त संप्रदाय की विशेषता है।
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