अंतरिम सरकार (1946-47) : परिचय
➣ अंतरिम सरकार का गठन कैबिनेट मिशन योजना (1946) में दिए गए प्रावधान के आधार पर 2 सितम्बर, 1946 ई. को किया गया। इसका उद्देश्य भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना तथा भारतीय नेताओं को केंद्रीय प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपना था।
➣ इस सरकार का नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू ने किया, जिन्हें वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। व्यवहार में वे ही अंतरिम सरकार के प्रमुख थे, परंतु औपचारिक रूप से परिषद् के अध्यक्ष वायसराय ही थे।
➣ प्रारंभ में मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया, लेकिन बाद में 26 अक्टूबर, 1946 ई. को उसने भी अपने प्रतिनिधियों को सरकार में शामिल कर दिया। इसके बावजूद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लगातार मतभेद बने रहे, जिससे सरकार प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर सकी।
➣ अंतरिम सरकार का कार्यकाल 2 सितम्बर, 1946 से 15 अगस्त, 1947 तक रहा। यद्यपि यह कार्यकाल अल्पकालीन था, फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्व अत्यंत अधिक है, क्योंकि इसी सरकार ने ब्रिटिश शासन से भारतीय नेतृत्व की ओर सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखी।
अंतरिम सरकार = वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का भारतीयकरण।
अंतरिम सरकार की पृष्ठभूमि
संवैधानिक गतिरोध और सत्ता हस्तांतरण का प्रश्न
➣ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त करने और सत्ता भारतीयों को सौंपने की माँग तेज हो गई थी। लेकिन सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी।
➣ इस स्थिति में ब्रिटिश सरकार के सामने ऐसी व्यवस्था बनाने की चुनौती थी, जिससे नए संविधान के निर्माण तक देश का प्रशासन चलता रहे और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया भी आगे बढ़ सके।
➣ इसी उद्देश्य से मार्च 1946 में भारत आए कैबिनेट मिशन ने 16 मई, 1946 की योजना में नया संविधान बनने तक केंद्र में एक अंतरिम व्यवस्था का प्रस्ताव रखा।
➣ इसके अंतर्गत युद्ध विभाग सहित सभी विभाग भारतीयों को सौंपे जाने थे। इस प्रकार संविधान निर्माण और सत्ता हस्तांतरण के बीच की अवधि में भारतीयों की शासन में भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया। (विस्तार: कैबिनेट मिशन योजना अध्याय)
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच प्रतिनिधित्व का विवाद
➣ 1945–46 के चुनावों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद और स्पष्ट कर दिए। कांग्रेस ने सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में भारी सफलता प्राप्त की,
➣ जबकि मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर लगभग पूरी सफलता हासिल की। कांग्रेस स्वयं को सभी भारतीयों का प्रतिनिधि मानती थी, जबकि लीग मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा करती थी।
➣ इस मतभेद का मुख्य प्रश्न यह था कि मुस्लिम सदस्यों को नामित करने का अधिकार केवल लीग के पास होना चाहिए या कांग्रेस भी अपने हिस्से से राष्ट्रवादी मुस्लिम प्रतिनिधियों को शामिल कर सकती है।
➣ इसके अतिरिक्त, लीग कांग्रेस के बराबर प्रतिनिधित्व अर्थात् समता (Parity) चाहती थी। दोनों दलों के बीच यह असहमति केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत के भावी संवैधानिक स्वरूप को लेकर भी उनके विचार अलग थे।
➣ 25 जून, 1946 को कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन की दीर्घकालीन संवैधानिक योजना को स्वीकार किया, लेकिन 16 जून को प्रस्तुत अंतरिम व्यवस्था संबंधी प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
➣ इसके बाद 10 जुलाई, 1946 को जवाहरलाल नेहरू के वक्तव्य से योजना की व्याख्या को लेकर विवाद बढ़ा और मुस्लिम लीग ने 29 जुलाई, 1946 को योजना से अपना समर्थन वापस ले लिया। इससे सत्ता हस्तांतरण के लिए साझा राजनीतिक सहमति बनाने का प्रयास और कठिन हो गया।
अंतरिम व्यवस्था की आवश्यकता
➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते मतभेदों के साथ सांप्रदायिक तनाव भी गंभीर होता जा रहा था। 16 अगस्त, 1946 के प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के दौरान हुई हिंसा ने राजनीतिक वातावरण को और तनावपूर्ण बना दिया।
➣ ऐसे समय में संविधान बनने तक प्रशासन की निरंतरता बनाए रखना और भारतीय नेताओं को शासन की जिम्मेदारी सौंपना आवश्यक हो गया था।
➣ कांग्रेस भी सत्ता हस्तांतरण से पहले एक प्रतिनिधिक और उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार के गठन की माँग कर रही थी। वहीं, ब्रिटेन की लेबर सरकार भारत में शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण चाहती थी।
➣ वायसराय लॉर्ड वेवेल के सामने चुनौती यह थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति न होने के बावजूद सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।
➣ इस प्रकार अंतरिम सरकार का प्रस्ताव केवल प्रशासन चलाने की व्यवस्था नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन से भारतीयों के हाथों में सत्ता सौंपने और नया संविधान बनने तक की अवधि को संभालने का प्रयास भी था। हालाँकि, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच जारी राजनीतिक अविश्वास के कारण इस व्यवस्था को लेकर भी सहमति बनाना आसान नहीं हुआ।
अंतरिम सरकार का गठन
➣ कैबिनेट मिशन के भारत से लौटने के बाद वायसराय लॉर्ड वेवेल ने 12 अगस्त, 1946 को जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।
➣ इसके बाद 2 सितंबर, 1946 को नई दिल्ली स्थित वायसराय हाउस में नेहरू के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने शपथ ली। प्रारंभ में इसमें कांग्रेस तथा अन्य भारतीय समुदायों के प्रतिनिधि शामिल हुए, जबकि मुस्लिम लीग ने इसमें भाग नहीं लिया।
गठन तक का घटनाक्रम
| तिथि | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 16 जून, 1946 | मिशन का अंतरिम सरकार संबंधी प्रस्ताव | 14 सदस्य: 6 कांग्रेस (1 अनुसूचित जाति सहित), 5 मुस्लिम लीग तथा 3 अल्पसंख्यक (सिख, भारतीय ईसाई, पारसी)। |
| 25 जून, 1946 | कांग्रेस ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया | कांग्रेस के कोटे में कोई मुस्लिम प्रतिनिधि नहीं था और वह अपने कोटे में राष्ट्रवादी मुस्लिम को रखने के अधिकार पर अड़ी थी। तब तक एक अस्थायी कार्यवाहक सरकार (caretaker government) चलती रही। |
| 22 जुलाई, 1946 | वेवेल का नेहरू और जिन्ना को एक जैसा पत्र | 6 कांग्रेस (1 अनुसूचित जाति सहित) और 5 लीग के आधार पर सरकार में शामिल होने का प्रस्ताव। जिन्ना ने इसे अस्वीकार किया, क्योंकि उनके अनुसार इससे समता (parity) का सिद्धांत समाप्त होता था। |
| 23 जुलाई, 1946 | नेहरू का उत्तर | कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया; वह चाहती थी कि पहले अंतरिम सरकार की स्थिति और शक्तियाँ स्पष्ट हों। |
| 6 अगस्त, 1946 | वेवेल का नेहरू को पत्र | लीग के रुख के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष नेहरू को सरकार बनाने का प्रस्ताव। |
| 10 अगस्त, 1946 | नेहरू की स्वीकृति | कांग्रेस ने निमंत्रण स्वीकार किया। |
| 12 अगस्त, 1946 | वायसराय की सार्वजनिक घोषणा | नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने का आमंत्रण सार्वजनिक रूप से घोषित हुआ। |
| 20 अगस्त, 1946 | नेहरू ने वेवेल को सदस्यों के नाम सुझाए | 24 अगस्त को वायसराय की ओर से विज्ञप्ति जारी हुई कि परिषद् 2 सितम्बर से कार्यभार संभालेगी। |
| 2 सितम्बर, 1946 | अंतरिम सरकार का शपथ ग्रहण | नेहरू के नेतृत्व में सरकार ने कार्य प्रारंभ किया; लीग ने भाग नहीं लिया। |
कार्यकारिणी परिषद् का पुनर्गठन
➣ पुनर्गठित परिषद् में वायसराय (परिषद् के अध्यक्ष) और सेनापति (Commander-in-Chief) को छोड़कर सभी सदस्य अब भारतीय थे, और वे विभिन्न विभागों के मंत्रियों की तरह कार्य करने लगे। इस प्रकार पहले की अधिकारियों वाली व्यवस्था की जगह राजनीतिक दलों के नेताओं ने ले ली।
➣ वायसराय परिषद् के अध्यक्ष बने रहे, जबकि जवाहरलाल नेहरू को उपाध्यक्ष (Vice-President) बनाया गया। नेहरू विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल संबंध विभाग के भी प्रभारी थे।
नेहरू का उपाध्यक्ष पद और उसका वास्तविक महत्व
➣ औपचारिक रूप से नेहरू प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि वायसराय की परिषद् के उपाध्यक्ष थे। परिषद् का अध्यक्ष वायसराय था और संवैधानिक ढाँचा अब भी ब्रिटिश शासन के अधीन था।
➣ फिर भी व्यवहार में नेहरू प्रधानमंत्री जैसी भूमिका निभाते थे। कांग्रेस इस परिषद् को एक मंत्रिमंडल (Cabinet) की तरह चलाना चाहती थी, जबकि लीग का मत था कि यह केवल वायसराय की परिषद् है। इसी अंतर के कारण आगे चलकर सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रश्न उठा।
➣ राजनीतिक महत्व:- नेहरू का उपाध्यक्ष बनना कांग्रेस के लिए केंद्र की कार्यपालिका में पहला वास्तविक अवसर था। इसी कारण लीग इसे कांग्रेस के वर्चस्व के रूप में देखती थी, जबकि कांग्रेस इसे सत्ता हस्तांतरण की दिशा में निर्णायक कदम मानती थी।
प्रारंभिक मंत्रिमंडल
2 सितम्बर, 1946 की अंतरिम सरकार
| सदस्य | विभाग | प्रतिनिधित्व |
|---|---|---|
| जवाहरलाल नेहरू | उपाध्यक्ष; विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल संबंध | कांग्रेस |
| सरदार वल्लभभाई पटेल | गृह, सूचना एवं प्रसारण | कांग्रेस |
| डॉ. राजेन्द्र प्रसाद | खाद्य एवं कृषि | कांग्रेस |
| सी. राजगोपालाचारी | उद्योग एवं आपूर्ति | कांग्रेस |
| सरत चंद्र बोस | वर्क्स, माइन्स एवं पावर | कांग्रेस |
| आसफ़ अली | रेलवे एवं परिवहन (संचार) | कांग्रेस (मुस्लिम) |
| जगजीवन राम | श्रम | अनुसूचित जाति |
| सरदार बलदेव सिंह | रक्षा | सिख समुदाय |
| डॉ. जॉन मथाई | वित्त | भारतीय ईसाई |
| सी. एच. भाभा | वाणिज्य (अक्टूबर 1946 के बाद वर्क्स, माइन्स एवं पावर) | पारसी समुदाय |
| सैयद अली ज़हीर | विधि (विधायी) तथा डाक एवं वायु (अस्थायी) | गैर-लीग मुस्लिम (कांग्रेस द्वारा नामित) |
| सर शफ़ात अहमद खान | स्वास्थ्य तथा शिक्षा एवं कला (अस्थायी रूप से समूहबद्ध) | गैर-लीग मुस्लिम (कांग्रेस द्वारा नामित) |
➣ प्रारंभ में अंतरिम सरकार में कुल 12 सदस्य थे, जबकि प्रस्तावित संख्या 14 थी। शेष दो स्थान मुस्लिम लीग के लिए रिक्त रखे गए थे। इस कारण कुछ विभाग अस्थायी रूप से एक साथ समूहबद्ध किए गए थे।
➣ यह विभाजन नेहरू द्वारा तैयार की गई अस्थायी व्यवस्था थी, जिसे अनुभव के बाद बदला जा सकता था। उनके नोट के अनुसार राजगोपालाचारी, मथाई, बलदेव सिंह, शफ़ात अहमद खान और भाभा बीमारी आदि कारणों से कुछ दिन तक कार्यभार नहीं संभाल सके, इसलिए कुछ विभाग अस्थायी रूप से दूसरों को सौंपे गए।
➣ प्रारंभ में राजगोपालाचारी को वित्त देने का सुझाव था, परंतु वे इसके इच्छुक नहीं थे, इसलिए वित्त विभाग जॉन मथाई को मिला। यह विभाग 2 सितम्बर की सूची में आवंटित हुआ था, पर कुछ स्रोतों के अनुसार मथाई ने व्यवहार में लगभग 9 सितम्बर 1946 से वित्त सदस्य के रूप में कार्यभार संभाला।
➣ इसमें कांग्रेस के साथ-साथ सिख, अनुसूचित जाति, भारतीय ईसाई, पारसी तथा तीन गैर-लीग मुस्लिम (आसफ़ अली, शफ़ात अहमद खान और सैयद अली ज़हीर) को स्थान दिया गया, जबकि मुस्लिम लीग ने इसमें भाग नहीं लिया।
मुस्लिम लीग का प्रारंभिक बहिष्कार
➣ 6–7 जुलाई, 1946 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने कार्यसमिति के 25 जून के प्रस्ताव की पुष्टि की थी। इसके बाद नेहरू के 10 जुलाई के वक्तव्य से कैबिनेट मिशन योजना की व्याख्या को लेकर विवाद बढ़ा और मुस्लिम लीग ने 29 जुलाई, 1946 को योजना से अपना समर्थन वापस ले लिया। ऐसी स्थिति में अंतरिम सरकार में दोनों दलों के शामिल होने का प्रश्न और कठिन हो गया।
➣ 8 अगस्त, 1946 को कांग्रेस कार्यसमिति ने नेहरू को अंतरिम सरकार के गठन के लिए वायसराय से बातचीत करने के लिए अधिकृत किया। इसके बाद 15 अगस्त को बंबई में नेहरू और जिन्ना के बीच बातचीत हुई, लेकिन दोनों के बीच सहमति नहीं बन सकी। वायसराय ने कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनाने का रास्ता अपनाया, हालाँकि मुस्लिम लीग के लिए उसमें शामिल होने का अवसर खुला रखा।
बहिष्कार के कारण:-▪ (1) मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि का दावा: जिन्ना चाहते थे कि सरकार के सभी मुस्लिम सदस्यों को नामित करने का अधिकार केवल लीग को मिले। कांग्रेस अपने कोटे में राष्ट्रवादी मुस्लिम रखना चाहती थी, और उसने सरकार में तीन गैर-लीग मुस्लिम शामिल किए, जो लीग को स्वीकार नहीं था।
▪ (2) समता (parity): लीग सरकार में कांग्रेस के बराबर प्रतिनिधित्व की माँग करती थी।
▪ (3) कैबिनेट मिशन योजना पर मतभेद: नेहरू के 10 जुलाई के वक्तव्य के बाद लीग योजना की अपनी स्वीकृति वापस ले चुकी थी (29 जुलाई), इसलिए वह कांग्रेस की व्याख्या वाली योजना के आधार पर बनी सरकार में शामिल नहीं होना चाहती थी।
▪ (4) विश्वासघात की भावना: लीग इसे ब्रिटिश विश्वासघात मानती थी। बताया जाता है कि 6 जून को योजना स्वीकार करने से पहले उसने वेवेल से यह आश्वासन लिया था कि यदि कांग्रेस अंतरिम सरकार का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करती, तो लीग को सरकार में शामिल किया जाएगा। इसीलिए कांग्रेस को आमंत्रित किए जाने पर जिन्ना ने इसे आश्वासनों के विरुद्ध बताया।
➣ इसी राजनीतिक टकराव के बीच मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त, 1946 को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस मनाया। इसके बाद सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी और कांग्रेस तथा लीग के बीच पहले से मौजूद अविश्वास और गहरा गया। दोनों दलों के बीच सहमति न बनने के कारण अंतरिम सरकार में लीग की भागीदारी का प्रश्न अनसुलझा रहा।
➣ अंततः 2 सितम्बर, 1946 को जब कांग्रेस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने शपथ ली तब लीग ने इस दिन को ‘काला दिवस’ (Black Day) के रूप में मनाया और अपने घरों तथा दुकानों पर काले झंडे लगाए। यद्दपि कांग्रेस ने लीग के लिए दो स्थान रिक्त रखे, ताकि वह बाद में सरकार में शामिल हो सके।
➣ अंतरिम सरकार में शामिल होने के बाद कांग्रेस के भीतर उसके सदस्यों की कार्यसमिति में सदस्यता को लेकर भी चर्चा हुई। 23–24 सितम्बर, 1946 को नई दिल्ली में AICC की बैठक में इस प्रश्न पर बहस हुई कि अंतरिम सरकार में पद ग्रहण करने के कारण किसी सदस्य को कांग्रेस कार्यसमिति या अन्य संगठनात्मक निकायों की सदस्यता से वंचित किया जाना चाहिए या नहीं।
गोविन्द बल्लभ पंत का प्रस्ताव कि केवल अंतरिम सरकार में पद ग्रहण करने के कारण किसी को इन निकायों की सदस्यता से वंचित न किया जाए, 135 मतों के पक्ष और 80 मतों के विरोध में पारित हुआ। कुछ अध्ययन-सामग्री इस बैठक को सरकार बनाने के निर्णय की पुष्टि बताती है, लेकिन प्राथमिक अभिलेखों से इसकी स्पष्ट पुष्टि नहीं होती।मुस्लिम लीग का अंतरिम सरकार में प्रवेश
➣ वायसराय लॉर्ड वेवेल का मानना था कि मुस्लिम लीग के बिना अंतरिम सरकार ठीक से कार्य नहीं कर पाएगी और सांप्रदायिक स्थिति में सुधार लाना भी कठिन होगा। इसलिए उन्होंने जिन्ना से बार-बार बातचीत करके लीग को सरकार में शामिल करने का प्रयास किया।
➣ अंततः 13 अक्टूबर, 1946 ई. को जिन्ना ने वेवेल को लिखा कि लीग की अनेक आपत्तियों के बावजूद पूरी केंद्रीय सरकार को कांग्रेस के हाथ में छोड़ देना मुसलमानों और अन्य समुदायों के हित में घातक होगा। लीग के शामिल होने के कारण ये थे: (1) बाहर रहने पर केंद्र में कांग्रेस का प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता, (2) पाकिस्तानी स्रोतों के अनुसार सरकार से बाहर रहने से मुसलमानों के हितों को हानि हो रही थी, और (3) वेवेल का लगातार दबाव। कहा जाता है कि जिन्ना ने लीग के सरकार में जाने को पाकिस्तान के लक्ष्य के लिए एक आधार (foothold) बनाने के रूप में भी देखा।
➣ सरकार में प्रतिनिधित्व को लेकर कांग्रेस और लीग के बीच मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। वेवेल कांग्रेस को इस बात के लिए राज़ी नहीं कर सके कि वह अपने कोटे में राष्ट्रवादी मुस्लिम को न रखे। जिन्ना ने भी स्वीकार कर लिया कि कांग्रेस इस अधिकार को नहीं छोड़ेगी, और तभी लीग ने प्रवेश का निर्णय लिया।
➣ 26 अक्टूबर, 1946 को मुस्लिम लीग के पाँच नामित सदस्य अंतरिम सरकार में शामिल हुए। हालाँकि, लीग ने कैबिनेट मिशन योजना के प्रति अपना विरोध वापस नहीं लिया था और संविधान सभा का बहिष्कार भी जारी रखा। इस प्रकार उसने योजना पर असहमति बनाए रखते हुए अंतरिम सरकार में भाग लेना स्वीकार किया।
➣ मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं अंतरिम सरकार में शामिल नहीं हुए। लीग के मंत्रियों का नेतृत्व लियाकत अली खान ने किया। पाकिस्तानी स्रोतों के अनुसार, कांग्रेस इस बात से असंतुष्ट थी कि लीग ने नेहरू के अनुरोध के बजाय वेवेल के आग्रह पर सरकार में प्रवेश किया। जिन्ना ने यह भी स्पष्ट किया था कि लीग के मंत्री नेहरू के प्रति सीधे उत्तरदायी नहीं होंगे।
➣ लीग के पाँच सदस्यों के लिए स्थान बनाने हेतु कांग्रेस की ओर से पहले से शामिल तीन सदस्यों-सरत चंद्र बोस, सर शफ़ात अहमद खान और सैयद अली ज़हीर-ने पद छोड़ दिया, जबकि दो स्थान पहले से रिक्त थे।
➣ मंत्रिमंडल में बदलाव के दौरान सी. एच. भाभा को वाणिज्य विभाग से हटाकर वर्क्स, माइन्स एवं पावर विभाग दिया गया और वाणिज्य विभाग लीग के आई. आई. चुंद्रीगर को मिला।
➣ बाद की विभागीय व्यवस्था में जॉन मथाई को उद्योग एवं आपूर्ति तथा सी. राजगोपालाचारी को शिक्षा एवं कला विभाग सौंपा गया। (वित्त विभाग का विवरण आगे “लियाकत अली खान और वित्त विभाग” खंड में दिया गया है।)
मुस्लिम लीग के शामिल होने के बाद अंतरिम सरकार
| सदस्य | विभाग | प्रतिनिधित्व |
|---|---|---|
| लियाकत अली खान | वित्त | मुस्लिम लीग (लीग समूह के नेता) |
| आई. आई. चुंद्रीगर | वाणिज्य | मुस्लिम लीग |
| अब्दुर रब निश्तर | डाक एवं वायु | मुस्लिम लीग |
| ग़ज़नफ़र अली खान | स्वास्थ्य | मुस्लिम लीग |
| जोगेन्द्रनाथ मंडल | विधि | मुस्लिम लीग (अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि के रूप में) |
➣ इस प्रकार अंतरिम सरकार में कुल 14 सदस्य हो गए- 9 अन्य (नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, जगजीवन राम, बलदेव सिंह, मथाई, भाभा और आसफ़ अली) और लीग के 5 सदस्य। कांग्रेस और लीग का एक ही सरकार में साथ आना केंद्र में पहली बार हुई ऐसी साझेदारी थी, परंतु यह विश्वास पर आधारित नहीं थी।
लियाकत अली खान और वित्त विभाग
➣ अंतरिम सरकार में शामिल होने के बाद मुस्लिम लीग गृह, विदेश मामले या रक्षा जैसे प्रमुख विभागों में से कोई एक चाहती थी, लेकिन कांग्रेस, विशेषकर सरदार पटेल, गृह विभाग देने के लिए तैयार नहीं थे।
➣ अंततः लीग को वित्त विभाग दिया गया और लियाकत अली खान इसके प्रभारी बने। इससे पहले यह विभाग जॉन मथाई के पास था। कुछ विवरणों में इस निर्णय के पीछे रफ़ी अहमद किदवई के सुझाव का उल्लेख मिलता है, लेकिन प्राथमिक स्रोतों से इसकी पुष्टि नहीं होती।
➣ वित्त विभाग का महत्त्व केवल बजट तैयार करने तक सीमित नहीं था। अन्य विभागों के खर्च और नियुक्तियों से संबंधित वित्तीय स्वीकृतियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता था। इसलिए कांग्रेस के मंत्री अपने विभागों की योजनाओं के लिए लियाकत अली खान पर निर्भर हो गए। कहा जाता है कि वित्तीय स्वीकृति के अभाव में वे अपने विभाग में एक चपरासी की नियुक्ति भी नहीं कर पाते थे।
➣ बजट, सरकारी खर्च और नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच बार-बार मतभेद सामने आए। कांग्रेस का आरोप था कि लीग वित्तीय अधिकारों का उपयोग उसके मंत्रियों की योजनाओं को रोकने के लिए कर रही है।
➣ 1947 के बजट के समय यह टकराव विशेष रूप से उभरा। 28 फरवरी, 1947 की मंत्रिमंडल बैठक में कांग्रेस के मंत्रियों को बजट प्रस्तावों की जानकारी तो दी गई, लेकिन उन पर विस्तार से विचार नहीं हुआ।
➣ 17 मार्च, 1947 को नेहरू ने लियाकत को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि कांग्रेस के मंत्री बजट के मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए कुछ संशोधन आपसी सहमति से करना चाहते थे। दूसरी ओर, लियाकत का मत था कि प्रस्ताव सरल थे और नेहरू चाहें तो उनसे स्पष्टीकरण ले सकते थे।
लियाकत अली खान का बजट – 1947
➣ 28 फरवरी, 1947 को लियाकत अली खान ने अंतरिम सरकार के वित्त सदस्य के रूप में केंद्रीय विधानसभा में 1947–48 का बजट प्रस्तुत किया। इसे गरीब आदमी का बजट (Poor Man’s Budget) कहा गया। डॉन अख़बार के अनुसार, यह किसी भारतीय वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत पहला बजट था।
➣ बजट में सामाजिक न्याय पर जोर देते हुए नमक कर समाप्त करने और आयकर की न्यूनतम छूट सीमा 2,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये करने का प्रस्ताव रखा गया।
अधिक संपन्न वर्ग पर कर का बोझ बढ़ाने के लिए व्यवसाय और पेशों से एक लाख रुपये से अधिक की आय पर 25% विशेष कर तथा पूँजीगत लाभ पर कर लगाने का प्रस्ताव भी किया गया। इसके अतिरिक्त, संपत्ति पर कर लगाने, कर-चोरी की जाँच के लिए आयकर जाँच आयोग गठित करने तथा मूल्य-नीति के समन्वय के लिए वस्तु मूल्य बोर्ड बनाने की व्यवस्था की गई।➣ बजट के प्रावधानों का उद्योग जगत ने तीखा विरोध किया। जी. डी. बिड़ला और उद्योग संगठन फिक्की (FICCI) ने इनके विरुद्ध अभियान चलाया। बाद में बजट के कुछ प्रस्तावों को कमजोर किया गया।
➣ इस प्रक्रिया में नेहरू की भूमिका को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, नेहरू को प्रस्तावों की जानकारी पहले से थी और कांग्रेस ने उद्योगपतियों के दबाव में उनका प्रभाव कम कराया।
➣ हालाँकि, नेहरू ने 17 मार्च, 1947 को वायसराय वेवेल को लिखे पत्र में कहा कि 28 फरवरी की मंत्रिमंडल बैठक में उन्होंने बजट प्रस्तावों पर विस्तार से विचार नहीं किया था। इसलिए यह बिंदु विवादित है। बजट को लेकर हुआ इस प्रकरण ने सरकार के भीतर कांग्रेस और लीग के आपसी अविश्वास को और गहरा किया, क्योंकि लीग इसे कांग्रेस के पूँजीपति वर्ग के प्रति झुकाव के रूप में देखती थी।
कांग्रेस–मुस्लिम लीग के बीच प्रशासनिक टकराव
➣ जवाहरलाल नेहरू अंतरिम सरकार को एक मंत्रिमंडल की तरह चलाना चाहते थे और सभी महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर पूर्ण मंत्रिमंडल की बैठक में चर्चा के पक्षधर थे। दूसरी ओर, लियाकत अली खान ने 1946 के अंत में एक अमेरिकी राजनयिक से शिकायत की कि नेहरू कई विभागों से जुड़े प्रश्नों पर संबंधित मंत्रियों के बीच पहले चर्चा कराने के उनके सुझाव को स्वीकार नहीं करते थे।
➣ उन्होंने यह भी कहा कि आसफ अली को राजदूत नियुक्त करने से पहले लीग के मंत्रियों से परामर्श नहीं किया गया। इसी तरह, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधिमंडल में लीग की ओर से बेगम शाहनवाज़ और इस्पहानी को शामिल करने का प्रस्ताव नेहरू ने अस्वीकार कर दिया था।
➣ नेहरू ने 30 अक्टूबर, 1946 के अपने पत्र में प्रतिनिधिमंडल की संख्या पाँच तक सीमित होने और पहले से नामित दो सदस्यों को हटाने की कठिनाई का उल्लेख किया था। लियाकत के अनुसार, मंत्रिमंडल में अधिकांश मतदान दलीय आधार पर होते थे।
➣ प्रशासनिक मतभेदों को और बढ़ाने वाला एक कारण महत्त्वपूर्ण विभागों का अलग-अलग दलों के नियंत्रण में होना था। गृह विभाग सरदार पटेल, विदेश विभाग नेहरू और रक्षा विभाग बलदेव सिंह के पास था, जबकि वित्त विभाग लियाकत अली खान के अधीन था। इस प्रकार सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सत्ता का संतुलन बना रहा, लेकिन प्रमुख नीतिगत प्रश्नों पर सहमति बनाना कठिन होता गया।
➣ इस स्थिति में मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत व्यवहार में प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहा था। कांग्रेस अंतरिम सरकार को एक मंत्रिमंडल मानती थी, जबकि लीग इसे वायसराय की कार्यकारी परिषद के रूप में देखती थी। दोनों दलों के मंत्री साझा सरकारी उत्तरदायित्व निभाने के बजाय अपनी-अपनी पार्टी के प्रति अधिक जवाबदेह बने रहे।
➣ कहा जाता है कि लियाकत अली खान ने नेहरू को सरकार के प्रमुख के रूप में स्वीकार करने से इनकार किया और नेहरू ने भी कई बार इस्तीफ़ा देने की चेतावनी दी। इस कारण मंत्रियों के बीच साझा जिम्मेदारी की भावना विकसित नहीं हो सकी। (विस्तार: ‘नेहरू का उपाध्यक्ष पद’)
➣ प्रशासनिक टकराव के पीछे दोनों दलों के राजनीतिक उद्देश्यों का अंतर भी था। मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में शामिल होने के बावजूद पाकिस्तान की स्थापना के अपने लक्ष्य पर कायम थी, जबकि कांग्रेस एक संयुक्त भारत की संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में रही थी।
➣ इस प्रकार एक ही सरकार में शामिल दोनों प्रमुख दलों के बीच न केवल प्रशासनिक अधिकारों, बल्कि भारत के भविष्य को लेकर भी मतभेद बने रहे। (संविधान सभा के संबंध में लीग के विरोधाभासी रुख का विवरण ‘अंतरिम सरकार और संविधान सभा का संबंध’ खंड में दिया गया है।)
➣ इन मतभेदों के बीच 31 जनवरी, 1947 को मुस्लिम लीग की कार्यसमिति ने माँग की कि ब्रिटिश सरकार कैबिनेट मिशन योजना को असफल घोषित करे और संविधान सभा को भंग कर दे। इसके उत्तर में 5 फरवरी, 1947 को कांग्रेस तथा अल्पसंख्यक सदस्यों ने वायसराय से लीग के मंत्रियों से इस्तीफ़ा लेने की माँग की।
➣ यह माँग अमेरिकी राजनयिक अभिलेखों में भी दर्ज है। हालाँकि, इन विरोधों और प्रशासनिक टकराव के बावजूद मुस्लिम लीग के मंत्री अगस्त 1947 में अंतरिम सरकार के अंत तक उसमें बने रहे।
अंतरिम सरकार और संविधान सभा का संबंध
| आधार | अंतरिम सरकार | संविधान सभा |
|---|---|---|
| कार्य | देश का प्रशासन चलाना | भारत का संविधान बनाना |
| स्वरूप | वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का भारतीयकरण | कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर गठित सभा, जिसके सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए |
| नेतृत्व | अध्यक्ष: वायसराय वेवेल; उपाध्यक्ष: नेहरू | अध्यक्ष: राजेन्द्र प्रसाद (11 दिसम्बर 1946 से) |
| अधिकार का स्रोत | वायसराय की परिषद्, इसलिए ब्रिटिश अधिकार के अधीन | संविधान-निर्माण का अधिकार, जिसे स्वतंत्रता के बाद पूर्ण संप्रभुता मिली |
| अवधि | 2 सितम्बर 1946 से 15 अगस्त 1947 | 9 दिसम्बर 1946 से 26 नवम्बर 1949 (संविधान का अंगीकरण) |
| मुस्लिम लीग | 26 अक्टूबर 1946 को शामिल | बहिष्कार |
➣ दोनों की अलग-अलग भूमिकाएँ:- अंतरिम सरकार और संविधान सभा अलग-अलग संस्थाएँ थीं और दोनों समानांतर चल रही थीं। संविधान सभा नए भारत का संविधान तैयार कर रही थी, जबकि अंतरिम सरकार देश का प्रशासन संभाल रही थी। अंतरिम सरकार के पास संविधान बनाने का अधिकार नहीं था और संविधान सभा के पास शासन चलाने का।
➣ नेतृत्व की समानता:- दोनों संस्थाओं में कांग्रेस का प्रभाव प्रमुख था और अनेक नेता दोनों में सक्रिय थे। नेहरू अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ संविधान सभा के प्रमुख नेता थे, और राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष चुने जाने के साथ अंतरिम सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री भी थे। इस प्रकार वे दोनों प्रक्रियाओं के बीच कड़ी का कार्य करते थे।
➣ लीग की विरोधाभासी स्थिति:- मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में शामिल थी, परंतु संविधान सभा का बहिष्कार कर रही थी। यही विरोधाभास कांग्रेस और लीग के बीच विवाद का एक प्रमुख कारण बना और इसी के आधार पर कांग्रेस ने लीग के मंत्रियों के इस्तीफ़े की माँग की।
➣ स्वतंत्रता के बाद:- 15 अगस्त 1947 को अंतरिम सरकार का कार्यकाल समाप्त हो गया, जबकि संविधान सभा संविधान बनाने के साथ-साथ स्वतंत्र डोमिनियन की विधायिका की भूमिका भी निभाने लगी। (विस्तार संविधान सभा अध्याय में।)
वायसराय की भूमिका
➣ वेवेल की स्थिति:- लॉर्ड वेवेल वायसराय और गवर्नर-जनरल के रूप में परिषद् के अध्यक्ष बने रहे और अंतरिम सरकार के गठन में उनकी निर्णायक भूमिका थी। लीग को सरकार में लाने में भी उनकी भूमिका रही (विवरण ‘मुस्लिम लीग का अंतरिम सरकार में प्रवेश’ खंड में)। वे चाहते थे कि सरकार केवल कांग्रेस की न होकर प्रमुख दलों की संयुक्त सरकार बने।
➣ कार्यकारिणी परिषद् में वायसराय की शक्तियाँ:- संवैधानिक रूप से ब्रिटिश शासन अब भी कायम था। परिषद् भारत शासन अधिनियम, 1935 के ढाँचे में कार्य कर रही थी और केंद्रीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। वायसराय के पास वीटो जैसे विशेष अधिकार बने रहे; 1945 की वेवेल योजना में भी यही व्यवस्था थी कि वीटो रहेगा, पर उसका उपयोग न्यूनतम होगा।
➣ सेनापति की स्थिति:- सेनापति (Commander-in-Chief) सर क्लाउड ऑचिनलेक ब्रिटिश थे और पूरे कार्यकाल में बने रहे। इसलिए रक्षा मंत्री बलदेव सिंह के भारतीय होने के बावजूद सेना पर भारतीयों का पूर्ण नियंत्रण नहीं था।
➣ भारतीय मंत्रियों और वायसराय के बीच संबंध:- कांग्रेस के मंत्री अंतरिम सरकार को वास्तविक मंत्रिमंडल मानकर नीतियाँ बनाना चाहते थे, जबकि वायसराय के अधिकार सीमित करने का प्रश्न बना रहा। कांग्रेस इसी कारण सरकार में शामिल होने से पहले उसकी स्थिति स्पष्ट करने पर ज़ोर देती रही (देखें गठन का घटनाक्रम), और इससे दोनों के बीच तनाव रहता था।
➣ वेवेल का स्थान:- वेवेल ने ब्रिटिश वापसी की एक आपात योजना (Breakdown Plan) तैयार की थी, जिस पर दिसम्बर 1946 में लंदन में चर्चा हुई। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री एटली का उनमें भरोसा घट गया था, और फरवरी 1947 में उनकी जगह माउंटबेटन की नियुक्ति की घोषणा हुई (विवरण ‘अंतरिम सरकार और सत्ता हस्तांतरण’ खंड में)।
अंतरिम सरकार की प्रमुख चुनौतियाँ
➣ कांग्रेस–लीग संघर्ष:- अंतरिम सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती दो विरोधी राजनीतिक शक्तियों के बीच समन्वय की थी। दोनों दलों के लक्ष्य अलग थे (अखंड भारत बनाम पाकिस्तान), इसलिए लगभग हर विभाग और नीति पर मतभेद सामने आए। इसके उदाहरण 1947 का बजट, राजदूत की नियुक्ति और 5 फरवरी 1947 की इस्तीफ़े की माँग हैं (विवरण ऊपर के खंडों में)।
➣ सांप्रदायिक हिंसा:- कलकत्ता, नोआखाली और बिहार जैसे क्षेत्रों में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बीच सरकार को कानून-व्यवस्था संभालनी पड़ी। कानून-व्यवस्था मुख्यतः प्रांतीय विषय था, इसलिए केंद्र की अंतरिम सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण सीमित था; बंगाल में लीग की और बिहार जैसे प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें थीं। इस हिंसा ने कांग्रेस और लीग के आपसी अविश्वास को और बढ़ा दिया और सरकार के कामकाज को प्रभावित किया।
➣ प्रशासनिक गतिरोध:- वित्त विभाग पर लीग के नियंत्रण, सामूहिक उत्तरदायित्व के अभाव और निर्णयों पर असहमति के कारण प्रशासन में बार-बार गतिरोध उत्पन्न हुआ। सरकार की स्वायत्तता की सीमाओं का विवरण ‘वायसराय की भूमिका’ खंड में है।
➣ सत्ता हस्तांतरण की अनिश्चितता:- अंतरिम सरकार को यह स्पष्ट नहीं था कि सत्ता का हस्तांतरण कब और किस रूप में होगा। जब तक ब्रिटिश सरकार की ओर से निश्चित समय-सीमा नहीं आई, तब तक सरकार का भविष्य अनिश्चित बना रहा। पहली बार समय-सीमा 20 फरवरी, 1947 की एटली की घोषणा (जून 1948 तक) से तय हुई।
➣ विभाजन का बढ़ता प्रश्न:- सरकार के भीतर चल रहे टकराव ने यह धारणा मज़बूत की कि कांग्रेस और लीग का साथ चलना कठिन है। लीग सरकार में रहकर भी पाकिस्तान के लक्ष्य पर अडिग रही। इसी कारण कांग्रेस के भीतर विभाजन के प्रति दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदलने लगा, जिसकी परिणति माउंटबेटन योजना में हुई (उसका विवरण आगे के अध्याय में है)।
अंतरिम सरकार और सत्ता हस्तांतरण
➣ 1947 की शुरुआत तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच जारी गतिरोध के कारण यह स्पष्ट होने लगा था कि अंतरिम सरकार के लिए संयुक्त रूप से प्रभावी ढंग से कार्य करना कठिन है।
➣ इसी बीच 20 फरवरी, 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा और लॉर्ड वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन की नियुक्ति की घोषणा की। माउंटबेटन ने 24 मार्च, 1947 को वायसराय का पद संभाला। (विस्तार: माउंटबेटन योजना का अध्याय)
➣ पदभार संभालने के बाद माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पर भारतीय नेताओं से सीधे विचार-विमर्श किया। जून 1947 की शुरुआती बैठकों में जवाहरलाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान जैसे प्रमुख नेता भी उनके साथ शामिल हुए। (स्रोत: नेहरू अभिलेखागार)
➣ विभाजन से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करने में अंतरिम सरकार के मंत्रियों ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 12 जून, 1947 को माउंटबेटन की अध्यक्षता में विभाजन समिति गठित हुई, जिसमें कांग्रेस की ओर से सरदार वल्लभभाई
➣ पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा मुस्लिम लीग की ओर से लियाकत अली खान और अब्दुर रब निश्तर सदस्य थे। ये चारों अंतरिम सरकार के मंत्री भी थे।
➣ बाद में, 27 जून, 1947 को विभाजन समिति के स्थान पर विभाजन परिषद (Partition Council) बनी, जिसमें जिन्ना ने अब्दुर रब निश्तर का स्थान लिया। (विस्तार: विभाजन की प्रक्रिया वाला अध्याय)
➣ इस प्रकार अंतरिम सरकार ने भारतीय नेताओं को केंद्रीय प्रशासन चलाने का व्यावहारिक अनुभव दिया और सत्ता हस्तांतरण के दौरान प्रशासनिक कार्यों को जारी रखने में भूमिका निभाई।
15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत में इसी सरकार का भारतीय पक्ष स्वतंत्र भारत की अंतरिम केंद्रीय सरकार के रूप में कार्य करने लगा, जबकि पाकिस्तान में अलग सरकार स्थापित हुई।अंतरिम सरकार के प्रमुख कार्य
➣ विदेश नीति की घोषणा:- 7 सितम्बर, 1946 ई. को अपने पहले रेडियो प्रसारण में नेहरू ने कहा कि भारत यथासंभव आपस में प्रतिद्वंद्वी शक्ति-समूहों की राजनीति से दूर रहेगा और उपनिवेशों तथा आश्रित देशों की मुक्ति में विशेष रुचि रखेगा। इसे गुटनिरपेक्षता की नीति का आधार माना जाता है।
➣ कूटनीतिक संबंध:- ब्रिटिश संप्रभुता में रहते हुए भी अंतरिम सरकार ने अन्य देशों, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करने शुरू किए। आसफ़ अली को अमेरिका में राजदूत नियुक्त किया गया, और विजयलक्ष्मी पंडित को जून 1947 में सोवियत संघ में भारत का पहला राजदूत।
➣ एशियाई संबंध सम्मेलन:- 23 मार्च से 2 अप्रैल, 1947 तक नई दिल्ली में (पुराना किला) एशियाई संबंध सम्मेलन हुआ, जिसकी पहल नेहरू ने की थी (आयोजन भारतीय विश्व मामलों की परिषद् ICWA के तत्वावधान में हुआ) और जिसमें लगभग 28-31 देशों/प्रतिनिधिमंडलों के प्रतिनिधि शामिल हुए (स्रोतों में संख्या अलग-अलग मिलती है)। इसकी अध्यक्षता सरोजिनी नायडू ने की।
अंतरिम सरकार का अंत / स्वतंत्रता की ओर संक्रमण
➣ भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947:- ब्रिटिश संसद द्वारा पारित इस अधिनियम (शाही स्वीकृति 18 जुलाई 1947) के अनुसार 15 अगस्त, 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बने और ब्रिटिश संप्रभुता समाप्त हुई। इसी के साथ अंतरिम सरकार का कार्यकाल समाप्त हो गया। (अधिनियम के प्रावधानों का विवरण उसके अपने अध्याय में है।)
➣ अस्थायी संविधान:- स्वतंत्रता के बाद भारत ने नया संविधान बनने तक भारत शासन अधिनियम, 1935 को आवश्यक परिवर्तनों के साथ अस्थायी संविधान के रूप में अपनाया, जबकि संविधान सभा संविधान बनाती रही।
➣ 15 अगस्त 1947 के बाद नई व्यवस्था:- वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् के स्थान पर भारत में मंत्रिमंडल की व्यवस्था लागू हुई। माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने, नेहरू पहले प्रधानमंत्री और सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री।
| अंतरिम सरकार (1946-47) | स्वतंत्र भारत की सरकार (15 अगस्त 1947) |
|---|---|
| नेहरू: कार्यकारिणी परिषद् के उपाध्यक्ष | नेहरू: प्रधानमंत्री |
| वायसराय: परिषद् के अध्यक्ष | माउंटबेटन: गवर्नर-जनरल (संवैधानिक प्रमुख) |
| सेनापति: ब्रिटिश (ऑचिनलेक) | भारतीय सेना: ब्रिटिश अधिकारी बने रहे, पर सेनापति बदला (जनरल रॉब लॉकहार्ट) |
| कांग्रेस और लीग की साझा सरकार | लीग के मंत्री पाकिस्तान चले गए; लियाकत अली खान पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और जोगेन्द्रनाथ मंडल पहले विधि (तथा श्रम) मंत्री बने |
| पटेल, बलदेव सिंह, मथाई, भाभा आदि अंतरिम सरकार के मंत्री | इनमें से अनेक स्वतंत्र भारत के मंत्रिमंडल में भी रहे (बलदेव सिंह रक्षा; मथाई रेलवे; भाभा वाणिज्य) |
➣ निरंतरता और परिवर्तन:- अंतरिम सरकार के अनेक मंत्री (नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, जगजीवन राम, बलदेव सिंह, मथाई, भाभा आदि) स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में भी रहे, जिससे प्रशासनिक निरंतरता बनी रही। लीग के मंत्री पाकिस्तान चले गए, और मंत्रिमंडल में डॉ. बी. आर. अंबेडकर (विधि) और आर. के. षणमुखम चेट्टी (वित्त) जैसे नए मंत्री शामिल हुए।
अंतरिम सरकार का ऐतिहासिक महत्व
➣ भारतीय नेताओं का केंद्रीय प्रशासन में वास्तविक अनुभव:- पहली बार प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता केंद्र की कार्यपालिका के सभी विभागों के प्रभारी बने, जिनमें गृह, रक्षा और विदेश मामले जैसे विभाग भी थे। इससे स्वतंत्रता के बाद शासन चलाने के लिए आवश्यक अनुभव तैयार हुआ।
➣ सत्ता हस्तांतरण की व्यावहारिक तैयारी:- अंतरिम सरकार ने ब्रिटिश शासन से भारतीय नेतृत्व की ओर सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप दिया। (विभाजन समिति आदि में मंत्रियों की भूमिका ‘अंतरिम सरकार और सत्ता हस्तांतरण’ खंड में है।)
➣ स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक निरंतरता:- अंतरिम सरकार के अनेक मंत्री स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में भी रहे, जिससे प्रशासनिक निरंतरता बनी रही।
➣ विदेश नीति की नींव:- नेहरू के 7 सितम्बर 1946 के प्रसारण और एशियाई संबंध सम्मेलन (1947) ने स्वतंत्र भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और एशियाई एकजुटता की दिशा तय की। (विवरण ‘अंतरिम सरकार के प्रमुख कार्य’ खंड में।)
➣ संविधान सभा और स्वतंत्र सरकार के बीच संक्रमण की कड़ी:- संविधान सभा संविधान बना रही थी और अंतरिम सरकार प्रशासन चला रही थी। दोनों की समानांतर प्रक्रिया ने संक्रमण को सुगम बनाया।
➣ नेहरू का नेतृत्व:- अंतरिम सरकार में नेहरू व्यवहार में प्रधानमंत्री जैसी भूमिका निभाते थे, इसलिए 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री के रूप में उनका पदभार संभालना नेतृत्व के निर्बाध हस्तांतरण जैसा था।
➣ सीमाएँ:- लीग के असहयोग और वायसराय तथा ब्रिटिश सेनापति की स्थिति (देखें ‘वायसराय की भूमिका’) के कारण यह सरकार पूर्ण स्वायत्त नहीं थी। साथ ही कांग्रेस–लीग टकराव ने यह दिखा दिया कि संयुक्त सरकार का प्रयोग असफल रहा और विभाजन की अनिवार्यता का तर्क मज़बूत हुआ।
अंतरिम सरकार ने भारतीय नेताओं को केंद्रीय प्रशासन का वास्तविक अनुभव दिया, परंतु कांग्रेस–लीग टकराव ने विभाजन की ओर बढ़ती परिस्थितियों को भी स्पष्ट कर दिया।
महत्वपूर्ण तथ्य / Quick Revision
➣ अंतरिम सरकार का गठन 2 सितंबर, 1946 को हुआ और यह सत्ता हस्तांतरण तक, अर्थात् 15 अगस्त, 1947 तक कार्यरत रही। इसका गठन कैबिनेट मिशन की संवैधानिक योजना की पृष्ठभूमि में वायसराय लॉर्ड वेवेल ने किया था। यह वायसराय की पुनर्गठित कार्यकारिणी परिषद थी और केंद्रीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी संसदीय मंत्रिमंडल नहीं थी।
➣ जवाहरलाल नेहरू कार्यकारिणी परिषद के उपाध्यक्ष तथा विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल संबंध विभाग के प्रभारी थे। वे औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नहीं थे। उस समय वायसराय परिषद का प्रमुख बना हुआ था।
➣ 20 फरवरी, 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा और वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन की नियुक्ति की घोषणा की। माउंटबेटन ने 24 मार्च, 1947 को वायसराय का पद संभाला।
➣ 16 जून, 1946 के प्रस्ताव में 14 भारतीय सदस्यों वाली अंतरिम कार्यकारिणी का प्रावधान था-कांग्रेस के 6 सदस्य, जिनमें एक अनुसूचित जाति का प्रतिनिधि शामिल था; मुस्लिम लीग के 5 सदस्य तथा 3 अल्पसंख्यक प्रतिनिधि-सिख, भारतीय ईसाई और पारसी। कांग्रेस ने 25 जून, 1946 को इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। प्रमुख विवादों में कांग्रेस के अपने कोटे से राष्ट्रवादी मुस्लिम सदस्य नामित करने का अधिकार भी शामिल था।
➣ अंतरिम सरकार के गठन के लिए 22 जुलाई, 1946 को वेवेल ने नेहरू और जिन्ना को प्रस्ताव भेजा, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनी। इसके बाद वेवेल ने 6 अगस्त को नेहरू को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।
➣ नेहरू ने 10 अगस्त को अपनी स्वीकृति दी, 12 अगस्त को आमंत्रण की सार्वजनिक घोषणा हुई और 20 अगस्त को नेहरू ने संभावित सदस्यों के नाम भेजे। अंततः 2 सितंबर, 1946 को सरकार ने शपथ ली।
➣ प्रारंभिक सरकार में प्रस्तावित 14 स्थानों में से 12 सदस्य शामिल हुए और दो स्थान मुस्लिम लीग के लिए रिक्त रखे गए। प्रारंभिक सदस्यों में तीन गैर-लीगी मुस्लिम प्रतिनिधि थे-आसफ अली, शफ़ात अहमद खान और सैयद अली ज़हीर।
➣ 2 सितंबर, 1946 को प्रमुख विभागों का प्रारंभिक आवंटन इस प्रकार था: नेहरू-विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल संबंध; पटेल-गृह, सूचना एवं प्रसारण; बलदेव सिंह-रक्षा; जॉन मथाई-वित्त; राजेंद्र प्रसाद-खाद्य एवं कृषि; जगजीवन राम-श्रम; सी. राजगोपालाचारी-उद्योग एवं आपूर्ति; सरत चंद्र बोस-वर्क्स, माइन्स एवं पावर; आसफ अली-संचार, परिवहन एवं रेलवे; शफ़ात अहमद खान-स्वास्थ्य; सैयद अली ज़हीर-विधायी कार्य, डाक एवं वायु; तथा सी. एच. भाभा-वाणिज्य। कुछ विभागों का आवंटन प्रारंभ में अस्थायी था।
➣ सरकार में विशेष प्रतिनिधित्व के प्रमुख उदाहरण थे-जगजीवन राम (अनुसूचित जाति), बलदेव सिंह (सिख), जॉन मथाई (भारतीय ईसाई) और सी. एच. भाभा (पारसी)।
➣ मुस्लिम लीग ने 2 सितंबर को सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया। उसके प्रमुख मतभेद थे-सभी मुस्लिम सदस्यों को नामित करने का अधिकार, कांग्रेस के बराबर प्रतिनिधित्व अर्थात् समता (Parity) की माँग तथा कैबिनेट मिशन योजना की व्याख्या को लेकर असहमति। 15 अगस्त, 1946 को नेहरू और जिन्ना के बीच हुई बातचीत भी विफल रही।
➣ 13 अक्टूबर, 1946 को जिन्ना ने वेवेल को पत्र लिखकर लीग के सरकार में शामिल होने का निर्णय बताया। 26 अक्टूबर, 1946 को लीग के पाँच सदस्य सरकार में शामिल हुए-लियाकत अली खान (वित्त), आई. आई. चुंद्रीगर (वाणिज्य), अब्दुर रब निश्तर (डाक एवं वायु), ग़ज़नफ़र अली खान (स्वास्थ्य) और जोगेंद्रनाथ मंडल (विधि)। जिन्ना स्वयं सरकार में शामिल नहीं हुए। लीग के मंत्रियों का नेतृत्व लियाकत अली खान ने किया।
➣ लीग के पाँच सदस्यों को स्थान देने के लिए सरत चंद्र बोस, शफ़ात अहमद खान और सैयद अली ज़हीर ने पद छोड़ दिया; दो स्थान पहले से रिक्त थे। सी. एच. भाभा को वाणिज्य से हटाकर वर्क्स, माइन्स एवं पावर विभाग दिया गया और वाणिज्य विभाग चुंद्रीगर को मिला। इसके बाद सरकार में कुल 14 भारतीय सदस्य हो गए।
➣ लीग को वित्त विभाग दिया गया, क्योंकि कांग्रेस गृह विभाग सौंपने के लिए तैयार नहीं थी। इससे पहले वित्त विभाग जॉन मथाई के पास था। लीग के शामिल होने के बाद लियाकत अली खान ने वित्त सदस्य के रूप में कार्यभार संभाला।
➣ 28 फरवरी, 1947 को लियाकत अली खान ने 1947–48 का बजट प्रस्तुत किया, जिसे ‘गरीब आदमी का बजट’ (Poor Man’s Budget) कहा गया। इसके प्रमुख प्रावधानों में नमक कर समाप्त करना, आयकर की न्यूनतम छूट सीमा 2,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये करना, एक लाख रुपये से अधिक के व्यावसायिक मुनाफे पर 25% विशेष कर तथा पूँजीगत लाभ पर कर शामिल थे। कर-चोरी और संपत्ति के संचय की जाँच के लिए आयोग बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया।
➣ 31 जनवरी, 1947 को मुस्लिम लीग की कार्यसमिति ने कैबिनेट मिशन योजना को असफल घोषित करने और संविधान सभा को भंग करने की माँग की। इसके उत्तर में 5 फरवरी, 1947 को कांग्रेस और अल्पसंख्यक सदस्यों ने वायसराय से लीग के मंत्रियों के इस्तीफे की माँग की। इसके बावजूद लीग सत्ता हस्तांतरण तक अंतरिम सरकार में बनी रही।
➣ मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में शामिल थी, लेकिन उसने संविधान सभा का बहिष्कार जारी रखा। इससे सरकार में भागीदारी और संविधान निर्माण में भागीदारी के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
➣ 7 सितंबर, 1946 को नेहरू के प्रसारण को भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के प्रारंभिक संकेतों में गिना जाता है। इसके बाद 23 मार्च से 2 अप्रैल, 1947 तक एशियाई संबंध सम्मेलन आयोजित हुआ। विजयलक्ष्मी पंडित को जून 1947 में सोवियत संघ में भारत की राजदूत नियुक्त किया गया।
➣ फील्ड मार्शल सर क्लॉड ऑचिनलेक अंतरिम सरकार के पूरे कार्यकाल में भारतीय सेनाओं के कमांडर-इन-चीफ रहे। स्वतंत्रता के बाद जनरल सर रॉब लॉकहार्ट ने भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ का पद संभाला।
➣ 12 जून, 1947 को विभाजन समितिग ठित हुई, जिसकी अध्यक्षता माउंटबेटन ने की। इसमें कांग्रेस की ओर से सरदार पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा मुस्लिम लीग की ओर से लियाकत अली खान और अब्दुर रब निश्तर शामिल थे। 27 जून, 1947 को विभाजन परिषद ने इसका स्थान लिया; इसमें जिन्ना ने निश्तर का स्थान लिया।
➣ 15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान के स्वतंत्र अधिराज्य बनने के साथ अंतरिम सरकार की व्यवस्था समाप्त हुई। भारत में माउंटबेटन प्रथम गवर्नर-जनरल, नेहरू प्रथम प्रधानमंत्री और सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री बने। पाकिस्तान में लियाकत अली खान प्रथम प्रधानमंत्री और जोगेंद्रनाथ मंडल प्रथम विधि मंत्री बने।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम बिंदु
➣ जवाहरलाल नेहरू अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के उपाध्यक्ष थे। वायसराय औपचारिक रूप से परिषद का अध्यक्ष बना हुआ था, हालाँकि व्यवहार में नेहरू सरकार के प्रमुख जैसी भूमिका निभाते थे।
➣ 2 सितंबर, 1946 को गठित अंतरिम सरकार और 15 अगस्त, 1947 के बाद की स्वतंत्र भारत की सरकार की संवैधानिक स्थिति अलग थी। स्वतंत्रता से पहले सरकार वायसराय की कार्यकारिणी परिषद पर आधारित थी, जबकि स्वतंत्रता के बाद यह भारत के स्वतंत्र अधिराज्य की सरकार के रूप में कार्य करने लगी।
➣ अंतरिम सरकार का गठन 2 सितंबर, 1946 को हुआ था, लेकिन मुस्लिम लीग इसमें 26 अक्टूबर, 1946 को शामिल हुई। इसलिए प्रारंभिक सरकार और लीग के शामिल होने के बाद की सरकार की सदस्य-संख्या तथा विभागों के आवंटन में अंतर था।
➣ मुस्लिम लीग के शामिल न होने के बावजूद प्रारंभिक सरकार में मुस्लिम सदस्य मौजूद थे। आसफ अली, शफ़ात अहमद खान और सैयद अली ज़हीर गैर-लीगी मुस्लिम प्रतिनिधि थे, जिन्हें प्रारंभिक व्यवस्था में शामिल किया गया था।
➣ 16 जून, 1946 के प्रस्तावित 14 सदस्यीय कार्यकारिणी और 2 सितंबर, 1946 को वास्तव में गठित सरकार को एक नहीं समझना चाहिए। प्रारंभिक सरकार में 12 भारतीय सदस्य थे और दो स्थान मुस्लिम लीग के लिए रिक्त रखे गए थे। लीग के पाँच सदस्यों के शामिल होने और तीन सदस्यों के हटने के बाद भारतीय सदस्यों की संख्या 14 हो गई।
➣ मुस्लिम लीग ने 29 जुलाई, 1946 को कैबिनेट मिशन योजना से अपना समर्थन वापस ले लिया था। इसके बावजूद वह अक्टूबर में अंतरिम सरकार में शामिल हुई, लेकिन संविधान सभा का बहिष्कार जारी रखा। इसलिए सरकार में शामिल होने का अर्थ योजना को दोबारा स्वीकार करना या संविधान सभा में भाग लेना नहीं था।
➣ मुस्लिम लीग के विरोध के प्रमुख कारणों में सरकार के सभी मुस्लिम सदस्यों को नामित करने का अधिकार अपने पास रखने की माँग, कांग्रेस के बराबर प्रतिनिधित्व अर्थात् समता (Parity) की माँग और कैबिनेट मिशन योजना की व्याख्या को लेकर मतभेद शामिल थे। 15 अगस्त, 1946 को नेहरू और जिन्ना के बीच हुई बातचीत भी सहमति के बिना समाप्त हुई।
➣ जिन्ना स्वयं अंतरिम सरकार में शामिल नहीं हुए। लीग के मंत्रियों का नेतृत्व लियाकत अली खान ने किया, जो बाद में पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री बने।
➣ गृह विभाग सरदार पटेल के पास ही रहा और मुस्लिम लीग को वित्त विभाग दिया गया। यह विभाग प्रारंभिक सरकार में जॉन मथाई के पास था। इसलिए वित्त विभाग को प्रारंभ से ही लीग के नियंत्रण में मानना गलत होगा।
➣ लियाकत अली खान का ‘गरीब आदमी का बजट’ 28 फरवरी, 1947 को प्रस्तुत किया गया था, 1946 में नहीं। उन्होंने यह बजट अंतरिम सरकार के वित्त सदस्य के रूप में प्रस्तुत किया था, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं। इसके प्रमुख प्रस्तावों में नमक कर समाप्त करना और आयकर की न्यूनतम छूट सीमा 2,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये करना शामिल था।
➣ लीग के मंत्रियों के शामिल होने के लिए स्थान बनाने हेतु सरत चंद्र बोस, शफ़ात अहमद खान और सैयद अली ज़हीर ने पद छोड़ा। सी. एच. भाभा का विभाग भी बदला गया-वे पहले वाणिज्य विभाग में थे और बाद में वर्क्स, माइन्स एवं पावर विभाग में चले गए। वाणिज्य विभाग लीग के आई. आई. चुंद्रीगर को मिला। आसफ अली ने इस फेरबदल के दौरान पद नहीं छोड़ा था।
➣ जोगेंद्रनाथ मंडल अनुसूचित जाति के नेता थे, लेकिन अंतरिम सरकार में वे मुस्लिम लीग के नामित सदस्य के रूप में शामिल हुए और उन्हें विधि विभाग दिया गया। इसलिए उनकी सामाजिक पहचान और सरकार में उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अलग-अलग समझना चाहिए।
➣ प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस 16 अगस्त, 1946 को मनाया गया था, अर्थात् अंतरिम सरकार के गठन से पहले। इसे 2 सितंबर को सरकार बनने के बाद की घटना नहीं समझना चाहिए।
➣ वायसराय लॉर्ड वेवेल ने नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। सरकार का गठन कैबिनेट मिशन ने सीधे नहीं किया था; मिशन की योजना के बाद वायसराय ने इसे गठित किया।
➣ अंतरिम सरकार के गठन के समय वायसराय लॉर्ड वेवेल थे, माउंटबेटन नहीं। एटली ने 20 फरवरी, 1947 को माउंटबेटन की नियुक्ति की घोषणा की और उन्होंने 24 मार्च, 1947 को पदभार संभाला। इसलिए वेवल योजना (1945), कैबिनेट मिशन योजना (1946) और माउंटबेटन योजना (1947) तीन अलग-अलग योजनाएँ थीं।
➣ रक्षा विभाग भारतीय प्रतिनिधि सरदार बलदेव सिंह के पास था, लेकिन सेना के कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल क्लॉड ऑचिनलेक ब्रिटिश अधिकारी थे। इसलिए रक्षा विभाग का भारतीय सदस्य के पास होना सेना पर पूर्ण भारतीय नियंत्रण के समान नहीं था। स्वतंत्रता के बाद जनरल सर रॉब लॉकहार्ट भारतीय सेना के प्रथम कमांडर-इन-चीफ बने।
➣ अंतरिम सरकार संविधान सभा के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। वह वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के पुनर्गठन से बनी थी, जबकि संविधान सभा का प्रमुख कार्य भारत का संविधान तैयार करना था।
➣ एशियाई संबंध सम्मेलन नई दिल्ली में 23 मार्च से 2 अप्रैल, 1947 तक आयोजित हुआ था। यह बांडुंग सम्मेलन (1955) से अलग था, जो स्वतंत्र एशियाई और अफ्रीकी देशों के सहयोग से संबंधित सम्मेलन था।
➣ कैबिनेट मिशन योजना में अंतरिम सरकार बनाने का प्रस्ताव था, लेकिन उसका वास्तविक गठन वायसराय वेवेल ने किया। इसके विपरीत, वेवल योजना (1945) कार्यकारिणी परिषद के पुनर्गठन का पहले का प्रयास था, जबकि माउंटबेटन योजना (1947) भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा से संबंधित थी।
➣ 14–15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को संविधान सभा में नेहरू ने ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny) भाषण दिया। स्वतंत्रता के बाद माउंटबेटन भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल, नेहरू प्रथम प्रधानमंत्री और सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री बने।
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