अखिल भारतीय किसान सभा (1936) : स्वामी सहजानंद, किसान आंदोलन एवं जमींदारी विरोध

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अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) : परिचय

अखिल भारतीय किसान सभा (All India Kisan Sabha – AIKS) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान किसानों को एक व्यापक राष्ट्रीय मंच पर संगठित करने वाला महत्वपूर्ण किसान संगठन था।

➣ इसकी स्थापना 1936 में हुई और इसके माध्यम से किसानों की जमींदारी शोषण, लगान, कर्ज, बेदखली और काश्तकारी अधिकार जैसी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया।

➣ किसान सभा का विकास ऐसे समय हुआ जब भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में किसान भारी लगान, जमींदारों के अत्याचार, साहूकारी कर्ज और भूमि से बेदखली जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे। पहले से चल रहे प्रांतीय किसान आंदोलनों और किसान संगठनों ने इसके गठन की पृष्ठभूमि तैयार की।

➣ प्रारंभ में किसान सभा में समाजवादी, साम्यवादी और स्वतंत्र किसान नेता एक साथ जुड़े थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगा, जयप्रकाश नारायण और इंदुलाल याज्ञिक जैसे नेताओं ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर इसका प्रभाव कई प्रांतों और किसान आंदोलनों तक फैल गया।

➣ किसान सभा ने किसानों की मांगों को केवल स्थानीय समस्याओं के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और भूमि सुधार के व्यापक प्रश्न से जोड़ा। इस कारण यह भारतीय किसान आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संगठन बन गया।

पृष्ठभूमि

➣ 19वीं शताब्दी से ही भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में किसानों ने नील की खेती, भारी लगान, जमींदारों और साहूकारों के शोषण के विरुद्ध अनेक स्थानीय विद्रोह और आंदोलन किए थे।

➣ इनमें नील विद्रोह, पाबना किसान आंदोलन, दक्कन दंगे और मोपला विद्रोह जैसी घटनाएँ शामिल थीं। हालांकि इन आंदोलनों का क्षेत्र सीमित था और इनके उद्देश्य भी अलग-अलग थे, लेकिन इन्होंने ग्रामीण समाज में औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था के प्रति असंतोष को सामने लाया।

औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था और किसानों की समस्याएँ

➣ ब्रिटिश शासन के दौरान कृषि से अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करना सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में था। अलग-अलग क्षेत्रों में जमींदारी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी भू-राजस्व व्यवस्थाएँ लागू थीं।

➣ इन व्यवस्थाओं की प्रकृति अलग होने के बावजूद किसानों पर राजस्व का बोझ, बिचौलियों का दबाव और ग्रामीण ऋण जैसी समस्याएँ व्यापक रूप से मौजूद थीं।

जमींदारी क्षेत्रों में किसानों को अक्सर जमींदारों और उनके कारिंदों के दबाव का सामना करना पड़ता था। लगान के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के अवैध वसूली और बेदखली की समस्या भी थी।

➣ दूसरी ओर, साहूकारों से लिया गया कर्ज किसानों को लंबे समय तक ऋण के बोझ में फँसाए रखता था। इस प्रकार जमींदार, साहूकार और औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था ग्रामीण शोषण की प्रमुख कड़ियाँ बन गई थीं।

➣ किसानों की समस्या केवल लगान तक सीमित नहीं थी। कई क्षेत्रों में काश्तकारी अधिकारों की असुरक्षा, जमीन से बेदखली, बकाया लगान और ऋण के कारण किसान अपनी जमीन पर स्थायी अधिकार खोने के खतरे में रहते थे।

➣ इसलिए 20वीं शताब्दी के आरंभ तक किसान प्रश्न भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक प्रश्न बनता गया।

प्रथम विश्व युद्ध, महामंदी और ग्रामीण संकट

प्रथम विश्व युद्ध (1914–18) के बाद कृषि संबंधी समस्याएँ और गंभीर हुईं। युद्धकालीन आर्थिक दबाव, कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा ग्रामीण ऋण ने किसानों की स्थिति को प्रभावित किया।

➣ इसके बाद 1929 की महामंदी ने कृषि संकट को और गहरा कर दिया। कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट के कारण किसानों की आय घटने लगी, जबकि लगान, कर्ज और अन्य देनदारियों का दबाव बना रहा।

➣ महामंदी का प्रभाव विशेष रूप से गरीब और छोटे किसानों तथा कृषि मजदूरों पर पड़ा। ग्रामीण कारीगर और दस्तकार भी कृषि संकट से प्रभावित हुए, क्योंकि उनकी पारंपरिक आजीविका कमजोर होती गई। इससे ग्रामीण समाज में असंतोष और राजनीतिक जागरूकता दोनों बढ़ने लगे।

वामपंथी और समाजवादी विचारों का प्रभाव

1930 के दशक में भारतीय राजनीति में समाजवादी और साम्यवादी विचारों का प्रभाव बढ़ रहा था। कांग्रेस के भीतर भी ऐसे कार्यकर्ता सक्रिय थे जो किसानों और मजदूरों को संगठित करने की आवश्यकता पर जोर दे रहे थे।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में किसान संगठनों को मजबूत करने में भूमिका निभाई।

➣ इसी समय स्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगा, इंदुलाल याज्ञिक जैसे किसान नेताओं के नेतृत्व में किसान संगठन मजबूत हो रहे थे।

➣ अलग-अलग वैचारिक पृष्ठभूमि के इन नेताओं के बीच एक बात समान थी-किसानों को स्वतंत्र रूप से संगठित करके उनकी आर्थिक और राजनीतिक मांगों को सामने लाना

16 जनवरी 1936 को मेरठ में किसान संगठन के प्रश्न पर विभिन्न वामपंथी और किसान नेताओं की बैठक हुई। इसमें देश के अलग-अलग प्रांतों में चल रहे किसान संगठनों को एक अखिल भारतीय मंच पर लाने की दिशा में तैयारी करने का निर्णय लिया गया। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर 11 अप्रैल 1936 के लखनऊ सम्मेलन का रास्ता तैयार किया।

प्रारंभिक किसान संगठनों का उदय

अखिल भारतीय किसान सभा के गठन से पहले भारत के अलग-अलग प्रांतों में किसानों को संगठित करने के प्रयास शुरू हो चुके थे-

वर्ष संगठन/घटना प्रमुख तथ्य
1918 U.P. Kisan Sabha गौरी शंकर मिश्र, इंद्र नारायण द्विवेदी; मदन मोहन मालवीय का समर्थन
1920 अवध किसान सभा काश्तकारी अधिकार, अवैध कर और बेगार के विरुद्ध संघर्ष
1921–22 एका आंदोलन अवध के किसानों का जमींदारी शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध
4 मार्च 1928 पश्चिम पटना किसान सभा स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में प्रारंभिक संगठन
1928 Andhra Provincial Ryots’ Association एन. जी. रंगा का महत्वपूर्ण योगदान
1929 Bihar Provincial Kisan Sabha सोनपुर; स्वामी सहजानंद अध्यक्ष
1929 Andhra Provincial Ryots Association एन. जी. रंगा प्रथम अध्यक्ष
1931 वेंकटगिरी सम्मेलन आंध्र में जमींदारी उन्मूलन की मांग प्रमुख हुई
16 जनवरी 1936 अखिल भारतीय स्तर की तैयारी मेरठ बैठक
11 अप्रैल 1936 अखिल भारतीय किसान कांग्रेस लखनऊ में अखिल भारतीय संगठन की दिशा में निर्णायक कदम

➣ इन संगठनों का प्रारंभिक उद्देश्य मुख्यतः लगान में कमी, जमींदारी शोषण का विरोध, काश्तकारी अधिकारों की रक्षा, बेदखली रोकना और किसानों की शिकायतों को सरकार तक पहुँचाना था।

➣ 1920 और 1930 के दशक में इन प्रांतीय किसान संगठनों के विस्तार ने आगे चलकर अखिल भारतीय किसान संगठन के लिए आधार तैयार किया।

उत्तर प्रदेश किसान सभा और अवध किसान सभा

➣ किसानों को संगठित करने की शुरुआती महत्वपूर्ण कोशिशों में उत्तर प्रदेश किसान सभा का स्थान प्रमुख है। फरवरी 1918 में गौरी शंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी ने इसके गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा मदन मोहन मालवीय का भी उन्हें समर्थन मिला। 1919 तक इसकी शाखाएँ तेजी से बढ़ने लगी थीं।

➣ उत्तर प्रदेश के किसानों की समस्याओं में विशेष रूप से ऊँचा लगान, बेदखली, जमींदारों की मनमानी और काश्तकारी अधिकारों की असुरक्षा शामिल थीं।

➣ हालांकि शुरुआती किसान सभा का नेतृत्व काफी हद तक कांग्रेस से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ किसान नेताओं की मांगें अधिक स्पष्ट और संघर्षशील होती गईं।

➣ इसी पृष्ठभूमि में अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा का गठन हुआ। इसमें किसानों की काश्तकारी समस्याओं के साथ अवैध कर, बेगार और जमींदारी अत्याचार जैसे मुद्दे प्रमुख थे। इस संगठन ने अवध क्षेत्र के किसानों को अधिक प्रत्यक्ष रूप से संगठित करने में भूमिका निभाई।

➣ आगे चलकर 1921–22 का एका आंदोलन भी इसी ग्रामीण असंतोष की व्यापक अभिव्यक्ति बना। हरदोई, बहराइच और सीतापुर आदि क्षेत्रों में किसानों ने ऊँचे लगान, बेदखली और जमींदारी शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध किया।

➣ इस तरह उत्तर प्रदेश में किसान संगठन और किसान आंदोलनों ने ग्रामीण प्रश्नों को राष्ट्रीय राजनीति के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बिहार प्रांतीय किसान सभा

➣ बिहार में किसान आंदोलन के संगठनात्मक विकास में स्वामी सहजानंद सरस्वती की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। उन्होंने बिहार के किसानों की समस्याओं को करीब से देखा और जमींदारों द्वारा किसानों के काश्तकारी अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध संगठन बनाने का प्रयास किया।

4 मार्च 1928 को पश्चिम पटना किसान सभा की स्थापना हुई। यह आगे चलकर बिहार के व्यापक किसान संगठन की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआती कदम बनी। 1929 में जमींदारी और काश्तकारी प्रश्नों को लेकर विभिन्न किसान नेताओं के बीच विचार-विमर्श तेज हुआ।

नवंबर 1929 में सोनपुर मेले के अवसर पर बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन हुआ और स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके अध्यक्ष बने। संगठन का प्रमुख आधार किसानों की जमींदारी शोषण, लगान और काश्तकारी अधिकारों से जुड़ी समस्याएँ थीं।

➣ बिहार प्रांतीय किसान सभा के शुरुआती कार्यकर्ताओं में यमुनाप्रसाद/यमुना करजी, जदुनंदन शर्मा, कार्यानंद शर्मा और धनराज शर्मा जैसे नेता शामिल थे। बाद के वर्षों में राहुल सांकृत्यायन तथा कांग्रेस सोशलिस्ट धारा से जुड़े कुछ नेताओं का भी इस आंदोलन से संबंध हुआ।

➣ बिहार में किसान सभा धीरे-धीरे केवल एक संगठन न रहकर व्यापक किसान आंदोलन का रूप लेने लगी। लगान में कमी, कर्ज से राहत और जमींदारी शोषण के विरुद्ध संघर्ष इसके प्रमुख मुद्दे बने। आगे चलकर बकाश्त भूमि के प्रश्न ने बिहार किसान आंदोलन को और अधिक संघर्षशील बना दिया।

आंध्र प्रांतीय रैयत संघ

➣ दक्षिण भारत में किसान संगठन के विकास में एन. जी. रंगा का विशेष योगदान था। उन्होंने आंध्र क्षेत्र के किसानों की समस्याओं को लेकर Andhra Provincial Ryots Association के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1928 में इस संगठन की स्थापना हुई और 1929 में एन. जी. रंगा इसके पहले अध्यक्ष बने।

➣ एन. जी. रंगा ने गाँवों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन किया और किसानों की कठिनाइयों का संबंध जमींदारी व्यवस्था से जोड़ा।

1931 के वेंकटगिरी सम्मेलन में आंध्र प्रांतीय रैयत संघ ने विधायी उपायों के माध्यम से जमींदारी व्यवस्था समाप्त करने को अपने प्रमुख उद्देश्यों में शामिल किया।

➣ आंध्र क्षेत्र में किसान संगठन ने केवल लगान और भूमि संबंधी प्रश्नों को ही नहीं उठाया, बल्कि सिंचाई और कृषि विकास से जुड़े मुद्दों को भी महत्व दिया। इससे किसान आंदोलन का दायरा आर्थिक और कृषि-नीति से जुड़े व्यापक प्रश्नों तक बढ़ा।

अन्य प्रांतीय किसान संगठनों का विस्तार

➣ 1930 के दशक की शुरुआत तक आंध्र, मद्रास, उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई प्रांतों में स्वतंत्र किसान संगठन सक्रिय हो चुके थे। इन संगठनों के नेताओं में विचारधारात्मक अंतर होने के बावजूद किसान प्रश्नों पर उनकी कई मांगें समान थीं-लगान में कमी, जमींदारी शोषण का विरोध, काश्तकारी अधिकार, बेदखली से सुरक्षा और ग्रामीण कर्ज से राहत

➣ इन प्रांतीय संगठनों के बढ़ते संपर्क से यह विचार मजबूत हुआ कि किसानों की समस्याओं को केवल स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि अखिल भारतीय मंच पर उठाया जाना चाहिए।

➣ कांग्रेस सोशलिस्टों, कम्युनिस्टों और कुछ स्वतंत्र किसान नेताओं ने इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई। एन. जी. रंगा और स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे नेताओं के बीच संपर्क ने अखिल भारतीय किसान संगठन के विचार को मजबूत किया।

क्षेत्र आंदोलन/संघर्ष प्रमुख मुद्दा
बिहार बकाश्त आंदोलन बेदखली और भूमि पर काश्तकार का अधिकार
उत्तर प्रदेश किसान सभा आंदोलन लगान, गन्ने की कीमत, नहर दर, बेदखली
आंध्र जमींदारी विरोधी संघर्ष लगान, अतिरिक्त वसूली, सिंचाई शुल्क
पंजाब नीलिबार एवं अन्य किसान संघर्ष किरायेदारी, लगान, सरकारी कृषि नीतियाँ
बंगाल तेभागा आंदोलन (1946) बटाईदार को फसल का 2/3 हिस्सा
महाराष्ट्र वारली किसान संघर्ष जमींदारी/श्रम शोषण और भूमि अधिकार
असम किसान अभियान किरायेदारी और भूमि संबंधी अधिकार
उड़ीसा नीलगिरि व ढेंकानाल संघर्ष जमींदारी/सामंती शोषण
मालाबार जेनमी-विरोधी संघर्ष किरायेदार किसानों के अधिकार
तेलंगाना किसान विद्रोह (1946 से) सामंती शोषण, भूमि और बेदखली

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना (1936)

➣ 1930 के दशक तक देश के कई प्रांतों में किसान संगठन सक्रिय हो चुके थे, लेकिन किसानों की समस्याओं को एक साथ उठाने वाला कोई मजबूत अखिल भारतीय संगठन नहीं था।

➣ बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र, बंगाल और अन्य क्षेत्रों के किसान नेताओं के बीच संपर्क बढ़ने के साथ यह आवश्यकता महसूस हुई कि अलग-अलग प्रांतीय किसान संगठनों को एक साझा राष्ट्रीय मंच पर लाया जाए।

➣ इस दिशा में 16 जनवरी 1936 को मेरठ में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इसमें किसान संगठन के लिए अखिल भारतीय स्तर पर सम्मेलन बुलाने की तैयारी की गई।

➣ इस प्रयास में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े नेताओं, कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र किसान नेताओं ने भूमिका निभाई। जयप्रकाश नारायण, एन. जी. रंगा और स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे नेताओं का इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान था। सम्मेलन के लिए 11 अप्रैल 1936 की तारीख तय की गई।

11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सम्मेलन आयोजित किया गया। यह सम्मेलन उसी समय हुआ जब लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन भी चल रहा था। इस कारण देश के विभिन्न हिस्सों से आए किसान नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक साथ लाने का अवसर मिला।

➣ सम्मेलन में स्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगा, इंदुलाल याज्ञिक, जयप्रकाश नारायण, सोहन सिंह जोश, के. एम. अशरफ, मोहनलाल गौतम आदि अनेक प्रमुख किसान और राष्ट्रवादी कार्यकर्ता शामिल हुए।

➣ इस सम्मेलन की अध्यक्षता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने की। वे बिहार में किसान आंदोलन को संगठित करने के कारण पहले से ही एक प्रमुख किसान नेता के रूप में प्रसिद्ध थे। सम्मेलन में उनके नेतृत्व ने किसान आंदोलन को एक स्पष्ट राष्ट्रीय पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ स्थापना सम्मेलन में संगठन को प्रारंभ में ऑल इंडिया किसान कांग्रेस कहा गया। बाद में इसका नाम ऑल इंडिया किसान सभा (AIKS) कर दिया गया। इसलिए 11 अप्रैल 1936 को अखिल भारतीय किसान आंदोलन के संगठित रूप में आने की निर्णायक तिथि माना जाता है।

➣ सम्मेलन में एन. जी. रंगा को संगठन का महासचिव चुना गया। स्वामी सहजानंद सरस्वती अध्यक्ष और रंगा महासचिव के रूप में किसान आंदोलन के दो प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के रूप में सामने आए।

➣ इसके अलावा संगठन की केंद्रीय समिति में कांग्रेस सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट और किसान समर्थक कांग्रेस नेताओं को शामिल किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि शुरुआत से ही किसान सभा का आधार किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं था।

➣ स्थापना सम्मेलन में किसान आंदोलन की व्यापक राजनीतिक दिशा भी स्पष्ट की गई। किसान कांग्रेस ने किसानों को आर्थिक शोषण से मुक्त कराने और किसानों, मजदूरों तथा अन्य शोषित वर्गों को आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति दिलाने को अपने आंदोलन का व्यापक लक्ष्य माना। साथ ही किसानों की तत्कालीन आर्थिक और राजनीतिक मांगों के लिए उन्हें संगठित करना मुख्य कार्य माना गया।

➣ लखनऊ सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि किसान संगठन ने अपने को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग नहीं किया, बल्कि किसानों की स्वतंत्र वर्गीय आवाज को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ने की दिशा अपनाई। यही कारण था कि शुरुआत से ही किसान सभा में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के लोग साथ आए।

➣ स्थापना सम्मेलन के बाद किसान सभा ने अलग-अलग प्रांतों में मौजूद किसान संगठनों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास तेज किया। इस प्रकार पहले से मौजूद प्रांतीय किसान सभाएँ और स्थानीय किसान संघर्ष धीरे-धीरे एक अखिल भारतीय संगठन से जुड़ने लगे। इससे किसान आंदोलन को पहली बार एक स्थायी राष्ट्रीय संगठनात्मक ढाँचा मिला।

तथ्य विवरण
16 जनवरी 1936 मेरठ में अखिल भारतीय किसान संगठन की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण बैठक
11 अप्रैल 1936 लखनऊ में स्थापना सम्मेलन
प्रारंभिक नाम All India Kisan Congress
बाद का नाम All India Kisan Sabha (AIKS)
प्रथम अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती
प्रथम महासचिव एन. जी. रंगा
प्रमुख सहभागी जयप्रकाश नारायण, इंदुलाल याज्ञिक, सोहन सिंह जोश, के. एम. अशरफ आदि
राजनीतिक प्रकृति शुरुआत में कांग्रेस सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट तथा अन्य किसान समर्थक धाराओं का व्यापक मंच

स्थापना के समय संगठन को ऑल इंडिया किसान कांग्रेस के नाम से जाना गया। इसमें शुरुआत से ही कांग्रेस सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट और स्वतंत्र किसान नेताओं की भागीदारी थी। इसलिए इसकी शुरुआती संरचना किसी एक राजनीतिक दल के अधीन नहीं थी।

किसान घोषणापत्र एवं उद्देश्य

11 अप्रैल 1936 के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान आंदोलन के उद्देश्य और तत्कालीन किसान मांगों को स्पष्ट रूप दिया गया।

➣ किसान सभा का मानना था कि किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान केवल छोटे-छोटे सुधारों से नहीं हो सकता, बल्कि आर्थिक शोषण की पूरी व्यवस्था में बदलाव आवश्यक है।

➣ किसान सभा ने अपने व्यापक उद्देश्य के रूप में किसानों और मजदूरों को आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाने तथा उन्हें आर्थिक और राजनीतिक शक्ति प्राप्त कराने की बात कही। साथ ही किसानों को उनकी तत्कालीन आर्थिक एवं राजनीतिक मांगों के लिए संगठित करना किसान आंदोलन का प्रमुख कार्य माना गया।

जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन

➣ किसान सभा की सबसे महत्वपूर्ण मांग जमींदारी और अन्य प्रकार की भू-स्वामी व्यवस्था का उन्मूलन थी। सभा का मानना था कि जो व्यक्ति वास्तव में भूमि पर खेती करता है, वही उस भूमि पर अधिकार का वास्तविक हकदार होना चाहिए। इसलिए उसने जोतने वाले को भूमि के सिद्धांत को महत्व दिया और भूमि के अधिकार काश्तकारों में निहित करने की मांग की।

➣ किसान सभा विशेष रूप से अनुपस्थित जमींदारी के विरोध में थी। उसके अनुसार ऐसी व्यवस्था में वास्तविक किसान खेती करता था, जबकि भूमि से मिलने वाले लाभ का बड़ा हिस्सा जमींदार या मध्यस्थ ले जाता था। इसलिए इस व्यवस्था को किसानों के लिए अन्यायपूर्ण और शोषणकारी माना गया।

लगान और किराए में कमी

➣ किसान सभा ने भूमि-राजस्व और लगान में पर्याप्त कमी की मांग की। उसका तर्क था कि कृषि आय और किसान की वास्तविक भुगतान क्षमता को ध्यान में रखे बिना लगाया गया भारी लगान किसान को लगातार आर्थिक संकट में डालता है।

➣ साथ ही बकाया लगान के कारण किसानों को जमीन से बेदखल करने की प्रथा का विरोध किया गया। आर्थिक कठिनाई या फसल खराब होने की स्थिति में किसान को संरक्षण देने और लगान के बोझ को कम करने की मांग की गई।

कर्ज से राहत और साहूकारी पर नियंत्रण

➣ ग्रामीण किसानों की एक बड़ी समस्या ऋणग्रस्तता थी। किसान सभा ने किसानों को पुराने कर्ज के बोझ से राहत देने और साहूकारों द्वारा अत्यधिक ब्याज वसूली पर नियंत्रण की मांग की। इसके लिए कर्ज पर स्थगन, ऋणों की समीक्षा तथा अत्यधिक ब्याज से किसानों को राहत जैसे उपायों का समर्थन किया गया।

➣ किसान सभा ने साहूकारों के लिए लाइसेंस व्यवस्था की मांग भी उठाई। इसका उद्देश्य ग्रामीण ऋण व्यवस्था में मनमानी और शोषण को कम करना था।

बेदखली और काश्तकारी अधिकारों की सुरक्षा

➣ किसान सभा ने वास्तविक काश्तकारों को भूमि पर स्थायी और सुरक्षित अधिकार देने की मांग की। किसान को केवल इसलिए जमीन से बेदखल न किया जाए कि वह लगान या किराया समय पर नहीं दे पाया है-यह मांग किसान आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल थी।

➣ किसानों को जमीन से बेदखल करने, उनकी काश्तकारी समाप्त करने और जमींदारों द्वारा मनमाने ढंग से अधिकार छीनने की प्रथा का विरोध किया गया। इस प्रकार किसान सभा ने काश्तकारों की सुरक्षा को किसान आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

बेगार और अवैध वसूली का विरोध

➣ किसान सभा ने जमींदारों द्वारा किसानों से की जाने वाली बेगार, अवैध वसूली और विभिन्न प्रकार की अतिरिक्त देनदारियों का विरोध किया। किसान से उसकी कृषि उपज और श्रम का अनुचित उपयोग करने वाली प्रथाओं को समाप्त करने की मांग की गई।

➣ इस मांग का महत्व इसलिए था क्योंकि ग्रामीण शोषण केवल लगान तक सीमित नहीं था। जमींदार और स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग कई बार किसानों से बिना उचित भुगतान के श्रम लेते थे तथा विभिन्न प्रकार की अवैध वसूली करते थे।

कृषि और किसानों की आय में सुधार

➣ किसान सभा ने कृषि व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और सिंचाई दरों को कम करने की मांग की। किसानों को बेहतर कृषि साधन और उत्पादन की उचित परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना भी इसके कार्यक्रम का हिस्सा था।

➣ किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कृषि उपज के लिए उचित और लाभकारी कीमत की मांग भी उठाई गई। विशेष रूप से गन्ने जैसी वाणिज्यिक फसलों के लिए उचित मूल्य की मांग की गई थी।

कृषि मजदूरों की स्थिति में सुधार

➣ किसान सभा का दृष्टिकोण केवल भूमिधारी किसानों तक सीमित नहीं था। उसने कृषि मजदूरों की स्थिति सुधारने की मांग भी उठाई। कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी और उनके संगठन के अधिकार की मांग किसान सभा के प्रारंभिक कार्यक्रम में शामिल थी।

भूमिहीन किसानों और गरीब किसानों के लिए भूमि

➣ किसान सभा ने जमींदारों की अतिरिक्त भूमि तथा उपलब्ध परती, बेकार और सामुदायिक भूमि के उपयोग का प्रश्न भी उठाया। उसका उद्देश्य भूमिहीन और गरीब किसानों को भूमि उपलब्ध कराना था। इस प्रकार किसान आंदोलन धीरे-धीरे केवल लगान कम करने की मांग से आगे बढ़कर भूमि के पुनर्वितरण के प्रश्न से जुड़ने लगा।

किसान आंदोलन का राजनीतिक उद्देश्य

➣ किसान सभा की दृष्टि में किसान प्रश्न केवल आर्थिक समस्या नहीं था। वह किसानों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना और उन्हें अपनी आर्थिक एवं राजनीतिक मांगों के लिए संगठित करना चाहती थी। उसके 1936 के कार्यक्रम में किसानों और मजदूरों की व्यापक राजनीतिक भागीदारी को महत्वपूर्ण माना गया था।

➣ इस प्रकार किसान सभा की राजनीति में दो स्तर स्पष्ट दिखाई देते हैं-एक ओर तत्काल मांगें जैसे लगान में कमी, ऋण राहत, बेदखली रोकना और बेगार समाप्त करना दूसरी ओर दीर्घकालीन लक्ष्य के रूप में जमींदारी व्यवस्था का अंत और किसानों को आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति दिलाना।

मांग मुख्य बात
जमींदारी उन्मूलन भूमि पर वास्तविक काश्तकार का अधिकार
लगान में कमी किसान की भुगतान क्षमता के अनुसार लगान
बेदखली पर रोक काश्तकारों के अधिकारों की सुरक्षा
कर्ज से राहत ऋण स्थगन और साहूकारी पर नियंत्रण
बेगार समाप्त करना किसानों से जबरन श्रम और अवैध वसूली पर रोक
भूमिहीनों को भूमि उपलब्ध भूमि के पुनर्वितरण की मांग
कृषि मजदूरों की सुरक्षा न्यूनतम मजदूरी
सिंचाई सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और दरों में कमी
उचित कृषि मूल्य गन्ने एवं अन्य फसलों के लिए लाभकारी कीमत
राजनीतिक उद्देश्य किसानों को संगठित करके आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति दिलाना

किसान सभा का संगठन विस्तार (1936–37)

1936 के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान संगठन बनने के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम था देश के अलग-अलग प्रांतों में पहले से सक्रिय किसान संगठनों को एक साझा मंच से जोड़ना।

➣ किसान सभा का उद्देश्य अब एक प्रांतीय किसान सभाओं, स्थानीय किसान समितियों और ग्रामीण कार्यकर्ताओं का एक व्यापक नेटवर्क तैयार करना था।

स्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगा, इंदुलाल याज्ञिक, सोहन सिंह जोश जैसे नेताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में किसान संगठन को मजबूत करने में भूमिका निभाई।

प्रांतीय किसान सभाओं को एक मंच से जोड़ना

➣ लखनऊ सम्मेलन के बाद किसान सभा ने उन प्रांतों में संगठन का विस्तार तेज किया जहाँ पहले से किसान आंदोलन चल रहे थे। बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र, मद्रास, बंगाल और पंजाब जैसे क्षेत्रों में प्रांतीय किसान संगठनों को अखिल भारतीय किसान सभा से जोड़ने का प्रयास किया गया। इससे स्थानीय किसान संघर्षों को राष्ट्रीय संगठन का सहारा मिलने लगा।

बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसान सभा पहले से मजबूत आधार बना चुकी थी। आंध्र में एन. जी. रंगा के नेतृत्व में रैयतों का संगठन सक्रिय था। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश और मद्रास में भी किसान संगठनों को अखिल भारतीय मंच से जोड़ा गया।

पंजाब में भी किसान संगठन बनाने की कोशिशें शुरू हुईं। 1930 में किसान सभा के संगठन का प्रयास किया गया था, लेकिन उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

➣ 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन के बाद बाबा ज्वाला सिंह के नेतृत्व में पंजाब से एक मजबूत प्रतिनिधिमंडल लखनऊ सम्मेलन में पहुँचा और इसके बाद पंजाब-PEPSU क्षेत्र में प्रांतीय किसान संगठन के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

संगठन की स्थानीय इकाइयों का विस्तार

➣ किसान सभा की ताकत केवल बड़े नेताओं या प्रांतीय समितियों तक सीमित नहीं थी। अलग-अलग क्षेत्रों में किसान समितियाँ, गाँवों की स्थानीय इकाइयाँ और स्वयंसेवक समूह बनाए जाने लगे। इन इकाइयों के माध्यम से किसानों की स्थानीय समस्याओं को किसान सभा के बड़े संगठन से जोड़ा गया।

➣ इससे किसान आंदोलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया। पहले कई किसान संघर्ष किसी विशेष गाँव, जमींदारी क्षेत्र या जिले तक सीमित रहते थे। अब किसान सभा के माध्यम से उन्हें प्रांतीय और अखिल भारतीय किसान आंदोलन के व्यापक ढाँचे से जोड़ने की कोशिश होने लगी।

➣ संगठन विस्तार के साथ किसान सभा ने किसानों को केवल शिकायत करने के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से संगठित होकर अपनी मांगें रखने के लिए तैयार किया। इस प्रक्रिया ने किसान आंदोलन को अधिक स्थायी और संगठित रूप देने में मदद की।

1937 में संगठन की स्वतंत्र पहचान

➣ स्थापना के बाद कुछ समय तक संगठन का नाम ऑल इंडिया किसान कांग्रेस रहा। लेकिन धीरे-धीरे यह महसूस किया जाने लगा कि किसानों के अपने संगठन की एक स्पष्ट और स्वतंत्र पहचान होनी चाहिए। विभिन्न प्रांतों में किसान आंदोलनों के अनुभवों ने भी इस आवश्यकता को मजबूत किया।

जुलाई 1937 की नियामतपुर बैठक में संगठन के नाम को ऑल इंडिया किसान सभा (AIKS) के रूप में स्वीकार करने का निर्णय लिया गया। इसी बैठक में संगठन के झंडे के प्रश्न पर भी महत्वपूर्ण निर्णय हुआ।

➣ इस परिवर्तन का महत्व केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं था। इससे किसान सभा की स्वतंत्र किसान संगठन के रूप में पहचान अधिक स्पष्ट हुई। किसान सभा अपने आपको किसानों के वर्गीय हितों से जुड़े संगठन के रूप में प्रस्तुत करने लगी।

जुलाई 1937 में नियामतपुर में अखिल भारतीय किसान समिति की बैठक के दौरान लाल झंडे को किसान सभा के झंडे के रूप में स्वीकार किया गया। बाद में अक्टूबर 1937 में कलकत्ता में हुई केंद्रीय बैठक में भी इसे संगठन के झंडे के रूप में दोहराया गया।

➣ लाल झंडे का चुनाव किसान सभा की बढ़ती वर्ग-चेतना और किसान-मजदूर एकता की राजनीति का प्रतीक था। हालांकि उस समय किसान सभा में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के नेता मौजूद थे, लेकिन संगठन का जोर किसानों और खेतिहर मजदूरों को संगठित करने तथा आर्थिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष पर बढ़ता गया।

➣ इस निर्णय से किसान सभा और व्यापक वामपंथी राजनीति के बीच निकटता भी बढ़ी, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि किसान सभा उस समय केवल कम्युनिस्ट संगठन नहीं थी। उसके नेतृत्व में स्वामी सहजानंद, एन. जी. रंगा और जयप्रकाश नारायण जैसे गैर-कम्युनिस्ट नेता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।

संगठन का राष्ट्रीय आधार मजबूत होना

1936–37 के दौरान किसान सभा का संगठन कई प्रांतों तक फैल गया। अलग-अलग प्रांतीय किसान सभाओं के जुड़ने से यह संगठन केवल कुछ नेताओं का मंच न रहकर विभिन्न क्षेत्रों के किसानों का राष्ट्रीय संगठन बनने लगा। किसान सभा की अपनी केंद्रीय समिति और प्रांतीय इकाइयों के बीच समन्वय विकसित हुआ।

➣ इस विस्तार ने किसानों के स्थानीय संघर्षों को एक-दूसरे से जोड़ने की संभावना पैदा की। बिहार के जमींदारी-विरोधी संघर्ष, आंध्र के रैयत प्रश्न, उत्तर प्रदेश के लगान और काश्तकारी संबंधी मुद्दे तथा पंजाब के किसान प्रश्न अब व्यापक किसान राजनीति के हिस्से के रूप में देखे जाने लगे।

➣ 1937 के अंत तक किसान सभा की संगठनात्मक दिशा काफी स्पष्ट हो चुकी थी। अब इसके सामने अगला महत्वपूर्ण प्रश्न था कि राष्ट्रीय आंदोलन, विशेषकर कांग्रेस के साथ उसका संबंध किस प्रकार रखा जाए और किसानों की मांगों को राष्ट्रीय राजनीति में कितना प्रभावी बनाया जाए। यही प्रश्न आगे कांग्रेस से संबंध एवं फैजपुर अधिवेशन (1936–37) के दौरान अधिक स्पष्ट हुआ।

वर्ष/तिथि घटना
11 अप्रैल 1936 लखनऊ में अखिल भारतीय किसान संगठन का स्थापना सम्मेलन
प्रारंभिक नाम All India Kisan Congress
1936–37 बिहार, आंध्र, उत्तर प्रदेश, मद्रास, बंगाल, पंजाब आदि में संगठन विस्तार
जुलाई 1937 नियामतपुर बैठक में All India Kisan Sabha नाम अपनाने का निर्णय
जुलाई 1937 लाल झंडा किसान सभा के झंडे के रूप में स्वीकार
अक्टूबर 1937 कलकत्ता की केंद्रीय बैठक में लाल झंडे के निर्णय की पुष्टि

कांग्रेस से संबंध एवं फैजपुर अधिवेशन (1936–37)

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के बाद उसके सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ उसके संबंध किस प्रकार हों।

➣ किसान सभा के अनेक नेता कांग्रेस से जुड़े हुए थे और स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते थे, लेकिन वे यह भी चाहते थे कि किसानों की समस्याओं के लिए एक स्वतंत्र किसान संगठन बना रहे।

➣ किसान सभा का संबंध कांग्रेस से इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि कांग्रेस का ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक संगठन था और बड़ी संख्या में किसान राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हुए थे।

➣ दूसरी ओर किसान सभा का मानना था कि केवल राष्ट्रीय स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; किसानों की आर्थिक समस्याओं-जमींदारी, लगान, कर्ज और बेदखली-का समाधान भी स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए।

किसान सभा और कांग्रेस के बीच प्रारंभिक सहयोग

1936 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान ही अखिल भारतीय किसान सभा का स्थापना सम्मेलन हुआ था। इससे दोनों संगठनों के बीच प्रारंभिक निकटता दिखाई देती है।

➣ कांग्रेस के कई समाजवादी और वामपंथी नेता किसान सभा की गतिविधियों से जुड़े हुए थे। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, इंदुलाल याज्ञिक और एन. जी. रंगा जैसे नेताओं का किसान राजनीति से संबंध था।

➣ कांग्रेस के भीतर भी यह महसूस किया जा रहा था कि भारत का राष्ट्रीय आंदोलन यदि ग्रामीण जनता को व्यापक रूप से अपने साथ जोड़ना चाहता है, तो किसान प्रश्न को अधिक महत्व देना होगा।

1936 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में कृषि संबंधी कार्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता को स्वीकार किया गया और प्रांतीय कांग्रेस समितियों से इस संबंध में सुझाव माँगे गए।

➣ इस प्रकार किसान सभा और कांग्रेस के बीच प्रारंभिक संबंध सहयोग और समान राजनीतिक उद्देश्य पर आधारित थे, लेकिन किसान सभा अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहती थी।

➣ यही कारण था कि वह किसानों की विशेष आर्थिक मांगों को कांग्रेस के सामान्य राष्ट्रीय कार्यक्रम के भीतर अलग से प्रमुखता देने का प्रयास करती रही।

किसान घोषणापत्र और कांग्रेस पर प्रभाव

➣ लखनऊ में किसान सभा के गठन के बाद एक किसान घोषणापत्र तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसमें जमींदारी उन्मूलन, लगान और किराए में कमी, ग्रामीण ऋण से राहत, बेगार की समाप्ति, काश्तकारों के अधिकार तथा कृषि मजदूरों के लिए बेहतर स्थिति जैसी मांगों को प्रमुखता दी गई।

➣ किसान सभा चाहती थी कि कांग्रेस अपने आगामी चुनावी और राजनीतिक कार्यक्रम में किसानों की इन मांगों को शामिल करे। इस प्रकार किसान सभा ने केवल अपना स्वतंत्र कार्यक्रम नहीं बनाया, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर किसान प्रश्न का दबाव भी बढ़ाया।

➣ 1936 के कांग्रेस चुनावी घोषणापत्र में कृषि संबंधी राहत के कई बिंदु शामिल किए गए। इनमें लगान और राजस्व में कमी, आर्थिक रूप से कमजोर जोतों को राहत, सिंचाई दरों में कमी, सामंती करों और बेगार पर रोक, काश्तकारों के अधिकारों की सुरक्षा, ग्रामीण ऋण के बोझ को कम करना आदि मांगें शामिल थीं। इन मांगों पर किसान सभा के कार्यक्रम का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।

फैजपुर अधिवेशन (दिसंबर 1936)

दिसंबर 1936 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन फैजपुर में आयोजित किया गया। यह कांग्रेस के इतिहास में विशेष महत्व रखता था क्योंकि पहली बार उसका वार्षिक अधिवेशन किसी बड़े शहर की बजाय ग्रामीण क्षेत्र में आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य कांग्रेस को ग्रामीण जनता और विशेष रूप से किसानों के अधिक निकट लाना भी था। जवाहरलाल नेहरू इसके अध्यक्ष थे।

➣ उसी समय और उसी क्षेत्र में अखिल भारतीय किसान सभा का दूसरा अधिवेशन भी आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता एन. जी. रंगा ने की। इस कारण फैजपुर उस समय भारतीय किसान राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति दोनों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

➣ किसान सभा के कार्यकर्ता और किसान जत्थे दूर-दूर के क्षेत्रों से फैजपुर पहुँचे। लगभग 500 किसान मार्चरों ने सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके अधिवेशन में भाग लिया। इसने किसान सभा के बढ़ते जनाधार और किसानों को राजनीतिक रूप से संगठित करने की उसकी क्षमता को प्रदर्शित किया।

फैजपुर में किसान प्रश्न का राष्ट्रीय महत्व

➣ फैजपुर अधिवेशन का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह था कि किसान प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया। कांग्रेस नेतृत्व ने भी माना कि भारत की बड़ी आबादी किसानों की है और राष्ट्रीय आंदोलन को उनकी आर्थिक समस्याओं को संबोधित करना होगा।

जवाहरलाल नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कृषि संकट, ग्रामीण ऋण, लगान और जमींदारी जैसी मध्यस्थ व्यवस्थाओं की समस्या पर विशेष जोर दिया।

➣ किसान सभा लगातार जमींदारी उन्मूलन, लगान और किराए में कमी, ग्रामीण ऋण से राहत तथा काश्तकारी अधिकारों की मांग कर रही थी। फैजपुर के समय इन मांगों ने कांग्रेस के कृषि कार्यक्रम को प्रभावित किया।

➣ कांग्रेस ने कृषि प्रश्न पर एक प्रस्ताव पारित किया, हालांकि उस समय कोई पूर्ण और विस्तृत अखिल भारतीय कृषि कार्यक्रम अंतिम रूप से तैयार नहीं हो सका था।

➣ कांग्रेस के चुनावी कार्यक्रम में भी किसान सभा की मांगों की झलक दिखाई दी। इसलिए फैजपुर अधिवेशन को किसान सभा की राजनीतिक प्रभावशीलता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है। किसान सभा के दबाव से किसानों के प्रश्न राष्ट्रीय चुनावी राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल होने लगे।

1937 के चुनाव और किसान सभा की अपेक्षाएँ

1937 के प्रांतीय चुनाव इस सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण अवसर थे। किसान सभा चाहती थी कि जिन प्रांतों में कांग्रेस सरकार बनाए, वहाँ किसान घोषणापत्र में की गई मांगों को वास्तविक नीतियों में बदला जाए।

विशेष रूप से लगान में राहत, बेदखली रोकना, काश्तकारों की सुरक्षा और ग्रामीण ऋण जैसे प्रश्नों पर किसान सभा ने कांग्रेस सरकारों से कार्रवाई की अपेक्षा की।

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन के बाद किसान सभा ने कई क्षेत्रों में किसान सम्मेलनों, जुलूसों और स्थानीय आंदोलनों के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाए रखा। इससे किसान आंदोलन को नया विस्तार मिला और 1937–39 का दौर किसान लामबंदी के एक महत्वपूर्ण चरण में बदल गया।

➣ हालांकि यहाँ से कांग्रेस और किसान सभा के संबंधों में धीरे-धीरे तनाव भी दिखाई देने लगा। किसान सभा की कई मांगें अधिक उग्र थीं, विशेष रूप से जमींदारी उन्मूलन और किसानों को भूमि का अधिकार

➣ कांग्रेस के भीतर मौजूद जमींदार और संपन्न वर्गों के प्रभाव के कारण इन मांगों को लागू करने की गति किसान नेताओं की अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही।

कांग्रेस से दूरी की शुरुआत

➣ प्रारंभ में किसान सभा और कांग्रेस के बीच सहयोग मजबूत था, लेकिन किसान सभा के विस्तार और उसकी मांगों के अधिक संघर्षशील होने के साथ दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे।

➣ किसान सभा किसानों को स्वतंत्र वर्गीय शक्ति के रूप में संगठित करना चाहती थी, जबकि कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर विभिन्न सामाजिक वर्गों को एक साथ रखना था।

➣ यही अंतर आगे चलकर अधिक स्पष्ट हुआ। किसान सभा के भीतर समाजवादी और साम्यवादी प्रभाव बढ़ते गए और संगठन कांग्रेस से अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र राजनीतिक रुख अपनाने लगा।

➣ हालांकि यह परिवर्तन तुरंत नहीं हुआ; 1936–37 का शुरुआती दौर अभी भी सहयोग, प्रभाव और धीरे-धीरे उभरते मतभेद का दौर था।

➣ फैजपुर अधिवेशन ने यह सिद्ध कर दिया कि किसान अब भारतीय राष्ट्रीय राजनीति का केवल समर्थन करने वाला वर्ग नहीं रहा था। किसान प्रश्न स्वयं राष्ट्रीय राजनीतिक कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था और अखिल भारतीय किसान सभा इस परिवर्तन की प्रमुख शक्तियों में से एक थी।

वर्ष/तिथि घटना
1936, लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के साथ अखिल भारतीय किसान सभा का गठन
1936 कांग्रेस ने कृषि कार्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता स्वीकार की
दिसंबर 1936 फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन
दिसंबर 1936 किसान सभा का दूसरा अधिवेशन; एन. जी. रंगा अध्यक्ष
फैजपुर कांग्रेस का पहला प्रमुख वार्षिक अधिवेशन ग्रामीण क्षेत्र में
1936 का कांग्रेस चुनावी कार्यक्रम लगान/राजस्व में राहत, बेगार पर रोक, काश्तकारी सुरक्षा, ग्रामीण ऋण राहत आदि
1937 कांग्रेस प्रांतीय मंत्रिमंडलों से किसान सुधारों की अपेक्षाएँ बढ़ीं
1937–39 किसान सभा और कांग्रेस सरकारों के बीच सहयोग के साथ बढ़ते दबाव एवं मतभेद

द्वितीय विश्व युद्ध, भारत छोड़ो आंदोलन और किसान सभा

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के साथ अखिल भारतीय किसान सभा के सामने एक नई राजनीतिक परिस्थिति पैदा हुई। युद्ध का प्रभाव केवल भारतीय राजनीति पर नहीं पड़ा, बल्कि कृषि, खाद्य आपूर्ति, कीमतों और किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ा।

➣ युद्धकालीन परिस्थितियों में सरकार की दमनकारी नीतियों और आर्थिक दबावों ने किसान आंदोलन के काम को कठिन बना दिया। युद्ध शुरू होने के बाद अनेक किसान नेताओं और कार्यकर्ताओं पर Defence of India Rules के तहत कार्रवाई की गई तथा कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया।

➣ इससे कई क्षेत्रों में किसान सभा की सामान्य गतिविधियाँ प्रभावित हुईं। इसके बावजूद संगठन ने किसानों के बीच अपना काम जारी रखा और युद्ध के कारण उत्पन्न आर्थिक कठिनाइयों के विरुद्ध भी आवाज उठाई।

युद्ध को लेकर किसान सभा में मतभेद

➣ द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभिक चरण में किसान सभा के भीतर युद्ध की प्रकृति और उसके प्रति भारतीय जनता की भूमिका को लेकर मतभेद सामने आए।

स्वामी सहजानंद सरस्वती और कई अन्य किसान नेता ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता के संघर्ष को प्राथमिकता देने के पक्ष में थे, जबकि कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की नीति में 1941 के बाद महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

22 जून 1941 को जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया। इसके बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने युद्ध को फासीवाद-विरोधी जनयुद्ध के रूप में देखना शुरू किया। इसका प्रभाव किसान सभा पर भी पड़ा।

➣ कम्युनिस्ट नेता अब फासीवाद की हार और मित्र राष्ट्रों के युद्ध प्रयास में भारतीय जनता की भागीदारी को महत्व देने लगे, लेकिन साथ ही वे भारत में राष्ट्रीय सरकार और स्वतंत्रता की मांग भी उठाते रहे।

➣ इस परिवर्तन से किसान सभा के भीतर समाजवादी और साम्यवादी धाराओं के मतभेद और स्पष्ट हुए। कुछ किसान नेता तत्काल ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष को प्राथमिकता देना चाहते थे, जबकि कम्युनिस्ट धारा फासीवाद को तत्काल अंतरराष्ट्रीय खतरा मानकर युद्ध के प्रति अपनी नीति बदल चुकी थी।

1942 का बिहटा अधिवेशन और अधिक अन्न उगाओ अभियान

29–31 मई 1942 को बिहार के बिहटा में अखिल भारतीय किसान सभा का छठा अधिवेशन आयोजित हुआ। इंदुलाल याज्ञिक इसके अध्यक्ष चुने गए।

➣ युद्ध के बदलते स्वरूप और भारत पर संभावित जापानी खतरे के बीच सम्मेलन ने राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय सरकार और राष्ट्रीय रक्षा को महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में सामने रखा।

➣ इस अधिवेशन में तेजी से बढ़ते खाद्य संकट को देखते हुए अधिक अन्न उगाओ अभियान को किसान सभा के प्रमुख जन-अभियानों में शामिल किया गया। किसान सभा का मानना था कि खाद्य उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों को भी आर्थिक सहायता और आवश्यक कृषि साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

➣ किसान सभा ने सरकार से मांग की कि किसानों को बीज, खाद, पशुधन, ऋण और खेती योग्य भूमि उपलब्ध कराने में सहायता दी जाए। विशेष रूप से बेकार और परती भूमि को गरीब किसानों तथा भूमिहीन कृषि मजदूरों के उपयोग में लाने की मांग की गई।

भारत छोड़ो आंदोलन और किसान सभा का रुख

8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया और 9 अगस्त 1942 से व्यापक आंदोलन शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और देश के विभिन्न हिस्सों में दमन शुरू कर दिया।

➣ इस समय अखिल भारतीय किसान सभा की स्थिति कांग्रेस से अलग थी। किसान सभा ने भारत छोड़ो आंदोलन के अगस्त कार्यक्रम को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया

➣ इसका प्रमुख कारण युद्ध की बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थिति और कम्युनिस्ट धारा की फासीवाद-विरोधी नीति थी। किसान सभा के भीतर भी इस नीति को लेकर मतभेद थे।

➣ हालांकि इसका अर्थ यह नहीं था कि किसान सभा ने ब्रिटिश शासन का समर्थन किया। किसान सभा ने राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय सरकार, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और कांग्रेस-लीग एकता की मांग उठाई।

➣ उसने यह भी कहा कि भारत की जनता की पूर्ण भागीदारी के बिना देश की रक्षा और युद्ध प्रयास प्रभावी नहीं हो सकते।

अगस्त 1942 के बाद जब सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ और दमन शुरू किया, तब किसान सभा ने दमन का विरोध किया।

➣ उसके नेतृत्व ने किसानों के बीच सांप्रदायिक एकता बनाए रखने और हिंसक तथा अराजक गतिविधियों से बचने की अपील भी की। इस प्रकार उसका रुख कांग्रेस के अगस्त आंदोलन से अलग होने के बावजूद ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के समर्थन वाला नहीं था।

युद्धकालीन आर्थिक संकट और किसान सभा

➣ युद्ध के दौरान महँगाई, खाद्य पदार्थों की कमी, जमाखोरी और कालाबाजारी जैसी समस्याएँ बढ़ने लगीं। किसान सभा ने इन समस्याओं को केवल उपभोक्ताओं का प्रश्न नहीं माना, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति से भी जोड़ा। युद्धकालीन नीतियों के कारण कृषि लागत और ग्रामीण जीवन पर बढ़ते दबाव के विरुद्ध किसान सभा ने आवाज उठाई।

1943 में खाद्य संकट और अधिक गंभीर हो गया। बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें लाखों लोगों की मृत्यु हुई। इस समय अखिल भारतीय किसान सभा और विशेष रूप से बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने राहत कार्यों में भाग लिया तथा प्रभावित लोगों तक भोजन और अन्य सहायता पहुँचाने का प्रयास किया।

अप्रैल 1943 के भकना कलां सम्मेलन में भी अधिक अन्न उगाओ अभियान को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया। किसान सभा ने मांग की कि सरकार खाली और बेकार पड़ी भूमि को गरीब किसानों तथा भूमिहीन मजदूरों में बाँटे और खेती के लिए बीज, खाद, पशु एवं ऋण उपलब्ध कराए।

युद्धकाल में किसान आंदोलनों की निरंतरता

➣ युद्ध और सरकारी दमन के बावजूद किसान सभा ने विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय संघर्षों को जारी रखा। मध्य प्रांत, बॉम्बे प्रेसीडेंसी, गुजरात और अन्य क्षेत्रों में किसानों ने लगान, बकाया देनदारी और किराए से जुड़े प्रश्नों पर आंदोलन किए। कई स्थानों पर किसान सभा ने लगान स्थगन, किराए में कमी और बेदखली से सुरक्षा की मांग उठाई।

➣ इस दौर में किसान सभा के लिए एक ओर फासीवाद और युद्ध का प्रश्न था, तो दूसरी ओर किसानों का दैनिक आर्थिक संघर्ष। संगठन ने दोनों प्रश्नों को जोड़ते हुए युद्धकालीन खाद्य संकट और ग्रामीण शोषण के विरुद्ध काम जारी रखा। इससे उसका किसान आधार कई क्षेत्रों में बना रहा।

युद्धोत्तर किसान संघर्षों पर प्रभाव

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत में किसान आंदोलनों ने अधिक संघर्षशील रूप लेना शुरू किया। तेभागा, तेलंगाना, बकाश्त, वारली, पुन्नप्रा-वायलार, कय्यूर और सुरमा घाटी जैसे विभिन्न किसान संघर्षों में अखिल भारतीय किसान सभा तथा उसकी प्रांतीय इकाइयों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बंगाल के तेभागा आंदोलन (1946) में बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने बटाईदार किसानों को संगठित किया।

तेभागा की मांग के अनुसार बर्गादारों को फसल का दो-तिहाई हिस्सा मिलना चाहिए और फसल को जमींदार या जोतदार के स्थान पर किसान के अपने खलिहान में रखा जाना चाहिए।

➣ आंदोलन तेजी से कई क्षेत्रों में फैला और किसान सभा के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसान तथा स्वयंसेवक इसमें शामिल हुए। इस संघर्ष ने किसान सभा के संगठन को ग्रामीण स्तर पर मजबूत करने तथा बटाईदारों के अधिकार को राष्ट्रीय बहस में लाने में योगदान दिया।

➣ इसी प्रकार तेलंगाना किसान संघर्ष (1946–1951) में किसान सभा से जुड़ी कम्युनिस्ट किसान राजनीति ने भूमि, बेदखली, वेट्टी और सामंती शोषण के प्रश्नों को संगठित रूप दिया।

➣ अखिल भारतीय किसान सभा के ऐतिहासिक दस्तावेज तेलंगाना को युद्धोत्तर किसान आंदोलनों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रखते हैं।

बिहार के बकाश्त संघर्ष में किसान सभा ने किसानों को बेदखली के विरुद्ध संगठित किया। इसी तरह महाराष्ट्र के वारली किसान संघर्ष, केरल के पुन्नप्रा-वायलार, असम की सुरमा घाटी और अन्य क्षेत्रों के संघर्षों में भी किसान सभा की प्रांतीय इकाइयों ने स्थानीय किसान समस्याओं को व्यापक आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।

➣ इन युद्धोत्तर संघर्षों का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह था कि किसान सभा ने स्थानीय किसान समस्याओं को अखिल भारतीय किसान आंदोलन के साझा प्रश्नों से जोड़ना जारी रखा।

➣ अलग-अलग क्षेत्रों में संघर्षों के मुद्दे भले ही अलग थे, लेकिन भूमि पर अधिकार, काश्तकारों की सुरक्षा, सामंती शोषण का विरोध और गरीब किसानों तथा कृषि मजदूरों के हित इनके बीच साझा आधार बने।

➣ इन आंदोलनों से किसान सभा को बड़ी संख्या में स्थानीय किसान कार्यकर्ता और ग्रामीण नेतृत्व भी मिला। गाँवों में किसान समितियाँ, स्वयंसेवक दल और स्थानीय संगठन मजबूत हुए।

➣ स्वतंत्रता के बाद भी इन संघर्षों का प्रभाव बना रहा। किसान आंदोलनों के दबाव के कारण जमींदारी उन्मूलन, काश्तकारी सुधार और भूमि सुधार से जुड़े प्रश्न राज्य सरकारों के सामने अधिक गंभीरता से आए।

➣ इस अर्थ में अखिल भारतीय किसान सभा की भूमिका केवल स्वतंत्रता-पूर्व किसान आंदोलनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने स्वतंत्र भारत की भूमि सुधार राजनीति की पृष्ठभूमि तैयार करने में भी योगदान दिया।

➣ इस प्रकार युद्ध के पश्चात किसान संघर्ष अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास में महत्वपूर्ण चरण बना। जहाँ तेभागा और तेलंगाना जैसे बड़े आंदोलनों ने इसके किसान संगठन की संघर्षशील क्षमता को दिखाया,

➣ वहीँ बकाश्त, वारली, पुन्नप्रा-वायलार और अन्य क्षेत्रीय संघर्षों ने इसके व्यापक संगठनात्मक आधार को मजबूत किया।

किसान आंदोलनों में अखिल भारतीय किसान सभा की भूमिका

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के बाद किसान आंदोलन को एक ऐसा राष्ट्रीय मंच मिला, जिसके माध्यम से अलग-अलग प्रांतों के किसानों की स्थानीय समस्याओं को व्यापक किसान राजनीति से जोड़ा जाने लगा।

➣ अलग-अलग क्षेत्रों में इसके आंदोलनों में गरीब किसान, मध्यम किसान, बटाईदार, काश्तकार और कृषि मजदूर भी शामिल हुए।

बिहार का बकाश्त आंदोलन

बिहार में किसान सभा का सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष बकाश्त भूमि का प्रश्न था। बकाश्त वे भूमि थीं जिन्हें जमींदार अपने प्रत्यक्ष कब्जे में लेकर स्वयं खेती करने का दावा करते थे, जबकि कई मामलों में पहले से उन पर किसानों की काश्तकारी रही थी।

➣ जमींदारों द्वारा किसानों को बेदखल करके भूमि अपने कब्जे में लेने के प्रयासों के विरुद्ध किसान सभा ने व्यापक संघर्ष संगठित किया।

स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार प्रांतीय किसान सभा ने इस संघर्ष को मजबूत किया। किसानों ने सभाएँ, सत्याग्रह और सामूहिक प्रतिरोध के माध्यम से बकाश्त भूमि पर अपने अधिकार की मांग की।

➣ कई क्षेत्रों में किसान महिलाओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। रेवाड़ा जैसे स्थानों पर बकाश्त भूमि के लिए संघर्ष में किसानों को महत्वपूर्ण सफलता मिली।

1946–47 में बकाश्त भूमि का संघर्ष और अधिक व्यापक हो गया। बड़ी संख्या में किसान और बटाईदार जमींदारों द्वारा भूमि वापस लेने के प्रयासों के विरुद्ध खड़े हुए। किसान सभा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं, लेकिन आंदोलन के दबाव के कारण अनेक किसानों को बेदखली से बचाया जा सका।

उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन

उत्तर प्रदेश में किसान सभा की स्थानीय इकाइयों ने गन्ने की कीमत बढ़ाने, लगान में कमी, नहर दरों में कमी और किसानों की बेदखली रोकने जैसे मुद्दों पर आंदोलन चलाए। इससे किसान सभा का संगठन केवल जमींदारी विरोध तक सीमित न रहकर कृषि कीमतों और सिंचाई जैसी समस्याओं से भी जुड़ा।

➣ उत्तर प्रदेश में किसान सभा की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि स्थानीय किसान समितियों के माध्यम से ग्रामीण स्तर की समस्याओं को संगठित किया गया। इससे किसान आंदोलनों को केवल किसी एक जिले या जमींदारी क्षेत्र तक सीमित रखने के बजाय व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनाने में सहायता मिली।

आंध्र में किसान सभा और जमींदारी विरोध

आंध्र क्षेत्र में एन. जी. रंगा के नेतृत्व में किसान संगठन पहले से मजबूत था। अखिल भारतीय किसान सभा से जुड़ने के बाद किसानों के आंदोलनों को व्यापक राष्ट्रीय किसान मंच मिला। आंध्र के किसान जमींदारी शोषण, अतिरिक्त वसूली, लगान और सिंचाई से जुड़े शुल्क के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे।

➣ किसानों ने अपनी मांगों को सरकार तक पहुँचाने के लिए बड़े पैमाने पर किसान मार्च और जुलूस निकाले। एक उल्लेखनीय किसान मार्च में हजारों किसान लंबी दूरी तय करके मद्रास पहुँचे और अपनी आर्थिक मांगें सरकार के सामने रखीं। मुंगला, मक्त्याला, बोब्बिली और पिथापुरम जैसे क्षेत्रों में जमींदारी शोषण के विरुद्ध भी संघर्ष हुए।

पंजाब में किसान संघर्ष

पंजाब में किसान सभा ने लगान, कर्ज और जमींदारी तथा औपनिवेशिक कृषि नीतियों से संबंधित मुद्दों पर किसानों को संगठित किया। नीली बार कॉलोनी में बड़ी संख्या में किरायेदार किसानों ने बढ़ते शोषण और अधिकारियों की मनमानी के विरुद्ध हड़ताल की। इसी प्रकार अमृतसर में नहर बस्तियों से संबंधित सरकारी नीतियों के विरोध में किसानों ने बड़ा प्रदर्शन किया।

➣ पंजाब में कई किसान आंदोलनों ने सत्याग्रह और सामूहिक गिरफ्तारी का रूप लिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि किसान सभा ने स्थानीय किसान प्रश्नों को केवल आर्थिक शिकायतों के रूप में नहीं, बल्कि संगठित राजनीतिक संघर्ष के रूप में सामने रखा।

बंगाल और तेभागा आंदोलन की पृष्ठभूमि

बंगाल में बटाईदार किसानों और जमींदार-जोतदार व्यवस्था के बीच लंबे समय से तनाव था। किसान सभा ने बर्गादारों के अधिकारों का प्रश्न उठाया।

1946 में बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने तेभागा आंदोलन का आह्वान किया। तेभागा का अर्थ था कि बटाईदार को फसल का दो-तिहाई हिस्सा मिले और जमींदार/जोतदार को एक-तिहाई।

➣ आंदोलन के दौरान बर्गादारों ने यह मांग की कि काटी गई फसल को जमींदार या जोतदार के घर ले जाने के बजाय अपनी खलिहान व्यवस्था में रखा जाए।

किसान स्वयंसेवकों और स्थानीय समितियों के माध्यम से आंदोलन को संगठित किया गया। पुलिस और जमींदारों के विरोध के बावजूद कई क्षेत्रों में किसानों ने लंबे समय तक संघर्ष जारी रखा।

➣ तेभागा आंदोलन ने किसान सभा की राजनीति में बटाईदारों और गरीब किसानों को विशेष स्थान दिया। यह केवल लगान घटाने का आंदोलन नहीं था, बल्कि फसल में किसानों के हिस्से और भूमि संबंधों में बदलाव की मांग से जुड़ा था।

महाराष्ट्र का वारली किसान संघर्ष

महाराष्ट्र के वारली क्षेत्र में आदिवासी किसानों और खेतिहर मजदूरों का संघर्ष भी किसान सभा के महत्वपूर्ण आंदोलनों में शामिल हुआ।

➣ यहाँ किसानों और मजदूरों को जमींदारों तथा अन्य स्थानीय शक्तियों के शोषण का सामना करना पड़ता था। किसान सभा ने उन्हें संगठित कर उनके अधिकारों के लिए संघर्ष को व्यापक रूप दिया।

➣ वारली आंदोलन में किसान महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। लंबे संघर्ष के बाद आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला और सरकार को किसानों की मांगों पर समझौते की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा।

असम, उड़ीसा और अन्य क्षेत्रों में गतिविधियाँ

➣ किसान सभा का प्रभाव केवल बड़े किसान आंदोलनों वाले प्रांतों तक सीमित नहीं रहा। असम में नीलाम/किरायेदारी और किराया संबंधी प्रश्नों पर किसान अभियानों का आयोजन हुआ। सुरमा घाटी में Tenancy Bill के विरोध में किसान सभा ने व्यापक अभियान चलाया।

उड़ीसा में नीलगिरि और ढेंकानाल के संघर्ष महत्वपूर्ण रहे। मालाबार में भी किसान सभा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने जेनमी-जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ किसानों को संगठित किया। इससे किसान सभा की गतिविधियों का भौगोलिक विस्तार स्पष्ट होता है।

किसान आंदोलनों को राष्ट्रीय स्वरूप देना

➣ किसान सभा की सबसे बड़ी भूमिका केवल किसी एक आंदोलन का नेतृत्व करना नहीं थी। उसने अलग-अलग क्षेत्रों के किसान प्रश्नों को एक साझा राष्ट्रीय किसान कार्यक्रम से जोड़ने का काम किया।

➣ बिहार में बकाश्त, बंगाल में तेभागा, आंध्र में जमींदारी विरोध, पंजाब में किरायेदारी और लगान के प्रश्न तथा महाराष्ट्र में वारली संघर्ष-इन सबके पीछे अलग स्थानीय परिस्थितियाँ थीं, लेकिन किसान सभा ने इनमें भूमि, लगान, काश्तकारी अधिकार और शोषण के विरुद्ध संघर्ष जैसी समान कड़ियाँ स्थापित कीं।

➣ किसान सभा ने किसान समितियों, स्वयंसेवक दलों, जुलूसों, सभाओं, सत्याग्रहों और सामूहिक कार्रवाइयों के माध्यम से ग्रामीण जनता को संगठित किया। इन आंदोलनों से अनेक स्थानीय किसान कार्यकर्ता उभरकर सामने आए, जिन्होंने आगे चलकर किसान सभा के संगठन को मजबूत किया।

➣ इस प्रकार अखिल भारतीय किसान सभा ने किसान आंदोलनों को केवल आर्थिक शिकायतों के स्तर से उठाकर संगठित किसान राजनीति का रूप देने में भूमिका निभाई।

➣ हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में आंदोलनों का स्वरूप और परिणाम अलग रहा, लेकिन सामूहिक रूप से इन संघर्षों ने किसानों में वर्ग-चेतना, संगठन और अधिकारों के लिए संघर्ष की भावना को मजबूत किया।

1937–39 के बकाश्त और अन्य किसान संघर्षों से लेकर 1946 के तेभागा तथा युद्धोत्तर तेलंगाना संघर्ष तक किसान सभा की भूमिका क्रमशः अधिक संघर्षशील होती गई। इस विकास ने किसान प्रश्न को भारतीय राजनीति के प्रमुख सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों में शामिल करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

क्षेत्र आंदोलन/संघर्ष प्रमुख मुद्दा
बिहार बकाश्त आंदोलन बेदखली और भूमि पर काश्तकार का अधिकार
उत्तर प्रदेश किसान सभा आंदोलन लगान, गन्ने की कीमत, नहर दर, बेदखली
आंध्र जमींदारी विरोधी संघर्ष लगान, अतिरिक्त वसूली, सिंचाई शुल्क
पंजाब नीलिबार एवं अन्य किसान संघर्ष किरायेदारी, लगान, सरकारी कृषि नीतियाँ
बंगाल तेभागा आंदोलन (1946) बटाईदार को फसल का 2/3 हिस्सा
महाराष्ट्र वारली किसान संघर्ष जमींदारी/श्रम शोषण और भूमि अधिकार
असम किसान अभियान किरायेदारी और भूमि संबंधी अधिकार
उड़ीसा नीलगिरि व ढेंकानाल संघर्ष जमींदारी/सामंती शोषण
मालाबार जेनमी-विरोधी संघर्ष किरायेदार किसानों के अधिकार
तेलंगाना किसान विद्रोह (1946 से) सामंती शोषण, भूमि और बेदखली

किसान सभा में समाजवादी एवं साम्यवादी प्रभाव

अखिल भारतीय किसान सभा का गठन किसी एक राजनीतिक दल के संगठन के रूप में नहीं हुआ था। इसके निर्माण में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और स्वतंत्र किसान नेता सभी शामिल थे।

➣ इसलिए शुरुआती किसान सभा का स्वरूप व्यापक और संयुक्त था। किसान सभा में शुरुआत से ही अलग-अलग विचारधाराओं के लोग एक साथ काम कर रहे थे।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का प्रभाव

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) के गठन के बाद उसके नेताओं ने किसानों और मजदूरों को राष्ट्रीय आंदोलन का महत्वपूर्ण आधार बनाने पर जोर दिया।

➣ किसान सभा के गठन की तैयारी में भी समाजवादी नेताओं की सक्रिय भूमिका रही। 16 जनवरी 1936 की मेरठ बैठक में अखिल भारतीय किसान संगठन बनाने की दिशा में जो तैयारी हुई, उसमें कांग्रेस सोशलिस्टों का महत्वपूर्ण योगदान था।

➣ समाजवादी नेताओं का जोर इस बात पर था कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक असमानता और जमींदारी शोषण को भी समाप्त किया जाए।

➣ इसलिए किसान सभा के शुरुआती कार्यक्रम में जमींदारी उन्मूलन, लगान में कमी, ऋण राहत और किसानों के राजनीतिक अधिकार जैसी मांगों को प्रमुख स्थान मिला।

➣ बिहार में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव और अन्य समाजवादी नेताओं का किसान राजनीति से संपर्क रहा। इसी तरह विभिन्न प्रांतों में स्थानीय किसान नेताओं और कांग्रेस सोशलिस्ट कार्यकर्ताओं ने किसान सभाओं के विस्तार में योगदान दिया।

कम्युनिस्टों की बढ़ती भूमिका

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन भी 1930 के दशक में मजदूर और किसान संगठनों के बीच अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने किसान सभा को ग्रामीण क्षेत्रों में वर्गीय संगठन के रूप में मजबूत करने का प्रयास किया।

➣ उनका जोर विशेष रूप से जमींदार और किसान के बीच वर्ग-संघर्ष तथा गरीब किसानों और कृषि मजदूरों की लामबंदी पर था।

➣ किसान सभा के कई स्थानीय संगठनों में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता सक्रिय रूप से काम करने लगे। उन्होंने किसान समितियों, जुलूसों, हड़तालों, सत्याग्रहों और सामूहिक कार्रवाइयों को संगठित करने में भूमिका निभाई। इससे किसान सभा का आधार कई क्षेत्रों में तेजी से बढ़ा।

➣ बिहार इसका महत्वपूर्ण उदाहरण था। बिहार प्रांतीय किसान सभा में समाजवादी और कम्युनिस्ट दोनों धाराओं के कार्यकर्ता सक्रिय थे।

➣ समय के साथ दोनों के बीच किसान आंदोलन की दिशा और राष्ट्रीय राजनीति से संबंध को लेकर मतभेद भी बढ़े। 1941 तक बिहार किसान सभा के भीतर समाजवादी और कम्युनिस्ट समर्थकों के बीच स्पष्ट संघर्ष दिखाई देने लगा था।

किसान सभा में विचारधारात्मक मतभेद

➣ समाजवादियों और कम्युनिस्टों के बीच सबसे बड़ा अंतर किसान आंदोलन की राजनीतिक दिशा को लेकर था। समाजवादी नेता किसान आंदोलन को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस की राजनीति से जोड़कर आगे बढ़ाना चाहते थे, जबकि कम्युनिस्ट अधिक स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष और किसान-मजदूर आधारित राजनीति पर जोर दे रहे थे।

➣ इसके बावजूद 1936–38 के शुरुआती वर्षों में दोनों धाराओं ने कई मुद्दों पर मिलकर काम किया। जमींदारी उन्मूलन, लगान में कमी, कर्ज से राहत, काश्तकारी अधिकार और किसान-मजदूर एकता जैसे प्रश्न दोनों के साझा कार्यक्रम का हिस्सा थे।

➣ इस संयुक्त गतिविधि का परिणाम यह हुआ कि किसान सभा का संगठन तेजी से बढ़ा और किसानों की मांगें राष्ट्रीय राजनीति में अधिक प्रभावशाली बनीं। लेकिन जैसे-जैसे वैचारिक मतभेद गहरे हुए, किसान सभा का राजनीतिक रुख भी अधिक संघर्षशील और कांग्रेस से स्वतंत्र होता गया।

लाल झंडा और वामपंथी पहचान

जुलाई 1937 की नियामतपुर बैठक में लाल झंडे को संगठन के झंडे के रूप में स्वीकार करने का निर्णय लिया गया। बाद में अक्टूबर 1937 की कलकत्ता केंद्रीय समिति की बैठक में हँसिया-हथौड़े वाले लाल झंडे को संगठन के झंडे के रूप में स्वीकार किया गया।

➣ लाल झंडा किसान सभा में बढ़ते किसान-मजदूर एकता और वामपंथी विचारों का प्रतीक बना। फिर भी इस समय किसान सभा को केवल कम्युनिस्ट संगठन मानना सही नहीं होगा। इसके कई प्रमुख अध्यक्ष और नेता कम्युनिस्ट नहीं थे और संगठन में समाजवादी तथा स्वतंत्र किसान नेता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।

➣ वामपंथी प्रभाव बढ़ने के साथ किसान सभा और कांग्रेस के संबंधों में भी तनाव बढ़ने लगा। किसान सभा चाहती थी कि कांग्रेस किसान घोषणापत्र की मांगों-विशेषकर जमींदारी उन्मूलन और किसानों को भूमि के अधिकार-पर अधिक स्पष्ट और ठोस कदम उठाए। दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर मौजूद जमींदार और संपन्न ग्रामीण वर्ग इन मांगों से पूरी तरह सहमत नहीं थे।

1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन तक किसान सभा और कांग्रेस के बीच मतभेद अधिक स्पष्ट हो चुके थे। किसान नेताओं को लगा कि कांग्रेस किसान आंदोलन को अपने व्यापक राष्ट्रीय संगठन के भीतर नियंत्रित रखना चाहती है, जबकि किसान सभा अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक पहचान बनाए रखना चाहती थी।

द्वितीय विश्व युद्ध और समाजवादी–साम्यवादी विभाजन

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद किसान सभा के भीतर समाजवादी और कम्युनिस्ट धाराओं के बीच मतभेद और बढ़ गए। युद्ध की प्रकृति और ब्रिटिश सरकार के प्रति नीति को लेकर दोनों पक्षों की रणनीति अलग-अलग होने लगी।

1941 तक इन मतभेदों का प्रभाव कई प्रांतीय किसान संगठनों में दिखाई देने लगा। बिहार में डुमराँव सम्मेलन (8–9 मार्च 1941) के दौरान समाजवादी और कम्युनिस्ट समर्थकों के बीच स्पष्ट संघर्ष हुआ। इसके बाद किसान सभा के कई हिस्सों में कम्युनिस्ट प्रभाव तेजी से बढ़ा।

जून 1941 में सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने युद्ध को फासीवाद-विरोधी जनयुद्ध के रूप में देखना शुरू किया।

➣ इसके परिणामस्वरूप कम्युनिस्टों की रणनीति कांग्रेस और भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति भी अलग हो गई। यह बदलाव किसान सभा के भीतर भी दिखाई दिया और समाजवादी तथा कम्युनिस्ट धाराओं के बीच दूरी बढ़ी।

कम्युनिस्ट प्रभाव का मजबूत होना

1942 के बाद कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का किसान सभा पर प्रभाव कई क्षेत्रों में तेजी से बढ़ा। अनेक प्रांतीय किसान सभाएँ कम्युनिस्ट नेतृत्व के अधिक निकट आ गईं।

➣ किसान सभा की गतिविधियों में गरीब किसान, बटाईदार और कृषि मजदूरों को संगठित करने तथा वर्गीय संघर्ष को अधिक महत्व दिया जाने लगा।

➣ इस बढ़ते प्रभाव का आगे के किसान आंदोलनों पर भी असर पड़ा। तेभागा, तेलंगाना, वारली और बकाश्त जैसे संघर्षों में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही और किसान सभा इन आंदोलनों से गहराई से जुड़ी।

➣ इस प्रकार किसान सभा का विकास एक व्यापक किसान मंच से ऐसे संगठन की दिशा में हुआ जिसमें समय के साथ वामपंथी और विशेष रूप से साम्यवादी प्रभाव काफी मजबूत हो गया।

➣ हालांकि इसकी मूल किसान-आधारित पहचान बनी रही और स्वामी सहजानंद तथा एन. जी. रंगा जैसे नेता लंबे समय तक इसके व्यापक किसान चरित्र के महत्वपूर्ण प्रतीक रहे।

➣ इस पूरे विकास को 1936 में व्यापक समाजवादी–कम्युनिस्ट सहयोग – 1937 में वामपंथी पहचान का मजबूत होना – 1938–39 में कांग्रेस से बढ़ती दूरी – 1941–42 में समाजवादी और कम्युनिस्ट मतभेद – 1942 के बाद कई क्षेत्रों में साम्यवादी प्रभाव का बढ़ना के रूप में समझा जा सकता है।

प्रमुख नेता किसान सभा में भूमिका / महत्व
स्वामी सहजानंद सरस्वती (समाजवादी) बिहार किसान आंदोलन के प्रमुख नेता और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष; जमींदारी-विरोधी किसान संघर्ष के प्रमुख चेहरा।
एन. जी. रंगा (समाजवादी) आंध्र के प्रमुख किसान नेता; 1936 के लखनऊ सम्मेलन में महासचिव और किसान सभा के राष्ट्रीय नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका।
जयप्रकाश नारायण (समाजवादी) कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता; अखिल भारतीय किसान संगठन के गठन और प्रारंभिक विस्तार में सहयोग।
आचार्य नरेंद्र देव (समाजवादी) कांग्रेस सोशलिस्ट धारा के प्रमुख विचारक; किसान और मजदूर आंदोलनों को समाजवादी राजनीति से जोड़ने में भूमिका।
इंदुलाल याज्ञिक (समाजवादी) गुजरात के प्रमुख किसान नेता; किसान संगठन और ग्रामीण आंदोलनों के विस्तार में सक्रिय भूमिका।
सोहन सिंह जोश (साम्यवादी) पंजाब में कम्युनिस्ट और किसान आंदोलन के प्रमुख नेता; अखिल भारतीय किसान सभा के प्रारंभिक संगठन से जुड़े।
पी. सुंदरैया (साम्यवादी) दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट किसान संगठन के प्रमुख नेता; आगे चलकर तेलंगाना किसान संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका।
बंकिम मुखर्जी (साम्यवादी) बंगाल में किसान आंदोलन और बाद के तेभागा संघर्ष से जुड़े प्रमुख कम्युनिस्ट नेता।
राहुल सांकृत्यायन (साम्यवादी) बिहार के किसान आंदोलन से जुड़े और बाद में कम्युनिस्ट राजनीति में सक्रिय रहे; किसान संगठन के विस्तार में भूमिका।
ई. एम. एस. नंबूदिरिपाद (साम्यवादी) केरल के प्रमुख कम्युनिस्ट नेता; किसान एवं जन आंदोलनों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका।

अखिल भारतीय किसान सभा की सीमाएँ

➣ किसान सभा की पहली बड़ी सीमा यह थी कि इसका संगठनात्मक विस्तार पूरे देश में समान नहीं था। कुछ क्षेत्रों-विशेषकर बिहार, बंगाल, आंध्र, पंजाब और केरल-में इसका प्रभाव मजबूत था, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह अपेक्षाकृत कमजोर रहा। इसलिए यह पूरे भारतीय किसान समाज का समान रूप से प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन नहीं बन सका।

➣ दूसरी महत्वपूर्ण सीमा वैचारिक मतभेद थे। किसान सभा में समाजवादी, कम्युनिस्ट और अन्य किसान नेता साथ आए थे, लेकिन समय के साथ इनके बीच किसान आंदोलन की दिशा और कांग्रेस के साथ संबंधों को लेकर मतभेद बढ़ते गए। इससे संगठन की एकजुटता प्रभावित हुई।

कांग्रेस से संबंध भी लगातार एक चुनौती बने रहे। किसान सभा किसानों की स्वतंत्र संगठनात्मक पहचान बनाए रखना चाहती थी, जबकि कांग्रेस का प्रयास व्यापक राष्ट्रीय संगठन के भीतर विभिन्न वर्गों को साथ रखने का था।

➣ 1937 के बाद किसान मांगों को लागू करने और जमींदारी व्यवस्था के प्रश्न पर दोनों के बीच तनाव बढ़ा।

➣ किसान आंदोलनों की एक अन्य सीमा यह थी कि हर आंदोलन को तत्काल सफलता नहीं मिली। कई जगह सरकारी दमन, जमींदारों की हिंसा, गिरफ्तारियाँ और संगठनात्मक कमजोरी के कारण आंदोलन पीछे हटे।

➣ उदाहरण के लिए तेभागा आंदोलन के बाद के मूल्यांकन में पर्याप्त तैयारी और स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण की कमी, व्यापक मजदूर समर्थन न जुटा पाना और राजनीतिक रणनीति की कुछ कमियाँ सामने आईं।

➣ किसान सभा की एक और सीमा यह थी कि किसान समुदाय स्वयं एक समान वर्ग नहीं था। भूमिहीन मजदूर, गरीब किसान, मध्यम किसान और समृद्ध किसान-सभी के हित हमेशा एक जैसे नहीं थे।

➣ बड़े किसानों और छोटे किसानों के बीच कई मुद्दों पर अंतर था। इसलिए सभी किसान समूहों को एक समान राजनीतिक कार्यक्रम के अंतर्गत लंबे समय तक एकजुट रखना कठिन रहा।

➣ इसके अतिरिक्त, किसान सभा का नेतृत्व कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत शिक्षित और राजनीतिक रूप से सक्रिय ग्रामीण वर्ग के हाथों में रहा। बड़े पैमाने पर सामान्य किसान और कृषि मजदूरों को सक्रिय नेतृत्व में लाने की प्रक्रिया हर जगह समान रूप से विकसित नहीं हो सकी।

समग्र ऐतिहासिक मूल्यांकन

➣ इन सीमाओं के बावजूद अखिल भारतीय किसान सभा भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी। इसने किसान प्रश्न को स्थानीय आंदोलन से उठाकर राष्ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न बनाया।

➣ इसका सबसे बड़ा योगदान यह था कि इसने किसानों को संगठित किया, भूमि और जमींदारी के प्रश्न को राष्ट्रीय बहस में लाया और किसान आंदोलनों को अखिल भारतीय मंच प्रदान किया। इसके नेतृत्व में हुए आंदोलनों ने ग्रामीण समाज में वर्ग-चेतना और अधिकारों की भावना को मजबूत किया।

➣ इस प्रकार किसान सभा की ऐतिहासिक यात्रा को स्थानीय किसान संघर्ष – अखिल भारतीय संगठन – किसान मांगों का राजनीतिकरण – जमींदारी-विरोधी संघर्ष – युद्धोत्तर भूमि आंदोलनों की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है।

➣ इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल कुछ तत्कालीन मांगों की पूर्ति नहीं थी, बल्कि भारतीय किसान को संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करना थी।

➣ इसलिए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों के इतिहास को समझने के लिए अखिल भारतीय किसान सभा का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

वर्ष / तिथि महत्वपूर्ण तथ्य
1918 उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन, गौरी शंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी की भूमिका, मदन मोहन मालवीय का समर्थन।
अक्टूबर 1920 अवध किसान सभा का गठन, लगान, बेगार और जमींदारी शोषण के विरुद्ध किसानों को संगठित किया गया।
1928 आंध्र प्रांतीय रैयत संघ का गठन, एन. जी. रंगा का महत्वपूर्ण योगदान।
4 मार्च 1928 पश्चिम पटना किसान सभा की स्थापना, स्वामी सहजानंद सरस्वती की सक्रिय भूमिका।
नवंबर 1929 बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन, स्वामी सहजानंद सरस्वती अध्यक्ष बने।
16 जनवरी 1936 मेरठ में अखिल भारतीय किसान संगठन के गठन की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण बैठक।
11 अप्रैल 1936 लखनऊ में अखिल भारतीय किसान संगठन का स्थापना सम्मेलन। प्रारंभिक नाम All India Kisan Congress
1936 स्वामी सहजानंद सरस्वती प्रथम अध्यक्ष तथा एन. जी. रंगा महासचिव चुने गए।
1936–37 बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र, बंगाल, पंजाब, मद्रास आदि में किसान सभा का संगठनात्मक विस्तार।
जुलाई 1937 नियामतपुर की बैठक में All India Kisan Sabha नाम अपनाने और लाल झंडे को स्वीकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय।
दिसंबर 1936 फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन, कांग्रेस का पहला प्रमुख वार्षिक अधिवेशन ग्रामीण क्षेत्र में। अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू
1936, फैजपुर अखिल भारतीय किसान सभा का दूसरा अधिवेशन, एन. जी. रंगा अध्यक्ष रहे।
प्रमुख किसान मांगें जमींदारी उन्मूलन, लगान में कमी, बेदखली पर रोक, कर्ज से राहत, बेगार समाप्ति, काश्तकारी अधिकार और भूमि का पुनर्वितरण
1937 कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन के बाद किसान सभा ने किसान मांगों को लागू करने के लिए सरकारों पर दबाव बढ़ाया।
1937–39 कई प्रांतों में किसान आंदोलनों का विस्तार, कांग्रेस और किसान सभा के संबंधों में सहयोग के साथ मतभेद भी बढ़े।
1939 द्वितीय विश्व युद्ध शुरू, किसान सभा की गतिविधियों पर सरकारी दमन बढ़ा।
22 जून 1941 जर्मनी का सोवियत संघ पर आक्रमण, भारतीय कम्युनिस्टों की युद्ध संबंधी नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन।
29–31 मई 1942 बिहटा अधिवेशन, इंदुलाल याज्ञिक अध्यक्ष। “अधिक अन्न उगाओ” अभियान पर जोर।
1942 किसान सभा ने कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन के अगस्त कार्यक्रम को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया।
1943 बंगाल अकाल के दौरान किसान सभा और उससे जुड़े संगठनों ने राहत गतिविधियों में भाग लिया।
1946 तेभागा आंदोलन का विस्तार, बटाईदारों ने फसल का 2/3 हिस्सा और अपनी खलिहान में फसल रखने की मांग की।
1946–47 बिहार बकाश्त आंदोलन में किसानों ने बेदखली और भूमि पर अधिकार के लिए संघर्ष किया।
1946 से तेलंगाना किसान संघर्ष का विस्तार, वेट्टी, सामंती शोषण, बेदखली और भूमि अधिकार प्रमुख मुद्दे।
15 अगस्त 1947 भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन तेलंगाना क्षेत्र में किसान संघर्ष जारी रहा।
सितंबर 1948 ऑपरेशन पोलो के बाद हैदराबाद भारतीय संघ में शामिल हुआ, तेलंगाना किसान संघर्ष फिर भी जारी रहा।
21 अक्टूबर 1951 तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष वापस लिया गया।

प्रमुख नेता और उनकी भूमिका

प्रमुख नेता मुख्य भूमिका
स्वामी सहजानंद सरस्वती बिहार किसान आंदोलन के प्रमुख नेता, अखिल भारतीय किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष
एन. जी. रंगा आंध्र के प्रमुख किसान नेता, प्रथम महासचिव और बाद में राष्ट्रीय किसान नेतृत्व के प्रमुख चेहरा।
इंदुलाल याज्ञिक गुजरात के किसान नेता, 1942 बिहटा अधिवेशन के अध्यक्ष
जयप्रकाश नारायण कांग्रेस सोशलिस्ट धारा के प्रमुख नेता, किसान सभा के गठन की प्रारंभिक प्रक्रिया में योगदान।
आचार्य नरेंद्र देव कांग्रेस सोशलिस्ट धारा के प्रमुख विचारक और किसान प्रश्न के समर्थक।
सोहन सिंह जोश पंजाब के प्रमुख कम्युनिस्ट और किसान नेता।
पी. सुंदरैया दक्षिण भारत के प्रमुख कम्युनिस्ट नेता, तेलंगाना किसान संघर्ष से जुड़े।
बंकिम मुखर्जी बंगाल के कम्युनिस्ट एवं किसान नेता, तेभागा आंदोलन से जुड़े।

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