संशोधन अधिनियम, 1786 : पृष्ठभूमि, प्रावधान, सीमाएँ और संवैधानिक महत्व

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एक्ट ऑफ 1786 (संशोधन अधिनियम, 1786)

➣ संशोधन अधिनियम, 1786 ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय प्रशासन में गवर्नर-जनरल की स्थिति को अधिक मजबूत करने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम था।

➣ इस अधिनियम को सामान्यतः एक्ट ऑफ 1786 या संशोधन अधिनियम, 1786 Amending Act of 1786 कहा जाता है। इसे आमतौर पर 26 Geo. 3, c. 16 के रूप में उद्धृत किया जाता है।

➣ ध्यान रहे, ये कोई चार्टर एक्ट नहीं था क्योंकि इसका उद्देश्य कंपनी के व्यापारिक चार्टर का नवीनीकरण करना नहीं था। यह अधिनियम मुख्य रूप से लॉर्ड कॉर्नवालिस की नियुक्ति और उनके द्वारा रखी गई प्रशासनिक शर्तों से जुड़ा था।

एक्ट ऑफ 1786 की पृष्ठभूमि

1773 एक्ट की खामी और हेस्टिंग्स-परिषद विवाद

➣ रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 के तहत बंगाल के गवर्नर-जनरल और उसकी 4 सदस्यीय परिषद की व्यवस्था बनाई गई थी, जिसमें गवर्नर-जनरल के पास परिषद के बाकी सदस्यों जितना ही एक वोट था। हर मामले में अंतिम निर्णय बहुमत से होता था;

➣ गवर्नर-जनरल को केवल मत बराबर होने की स्थिति में ही निर्णायक मत देने का अधिकार था। इस व्यवस्था ने गवर्नर-जनरल के अधिकार पर एक गंभीर रोक लगा दी थी।

➣ इसी खामी का व्यावहारिक असर तब दिखा जब गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स को अपनी परिषद में क्लेवरिंग, मानसन और फिलिप फ्रांसिस के बहुमत गुट के लगातार विरोध का सामना करना पड़ा।

➣ यह गुट बार-बार हेस्टिंग्स के फैसलों को पलट देता था, जिससे प्रशासन में गतिरोध, आपसी कटुता और अस्थिरता बनी रही। यह टकराव इतना गहरा हो गया कि आखिरकार हेस्टिंग्स और फ्रांसिस के बीच द्वंद्व तक की नौबत आ गई।

➣ इस पूरे प्रकरण ने यह व्यावहारिक रूप से साबित कर दिया कि दूरस्थ भारतीय क्षेत्र में बहुमत से शासन वाली यह प्रणाली गंभीर संकट के समय त्वरित और निर्णायक शासन के लिए उपयुक्त नहीं है।

➣ इसके बाद पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 ने कंपनी के प्रशासन पर नियंत्रण तो बढाया, परंतु गवर्नर-जनरल बनाम परिषद के बहुमत वाला यह मूल ढाँचागत सवाल अनसुलझा ही रह गया।

दक्कन की बदलती राजनीतिक परिस्थिति और कॉर्नवालिस की शर्त

➣ द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780–1784) की समाप्ति के बाद मंगलौर की संधि हुई, लेकिन दक्षिण भारत की राजनीतिक समस्याएँ समाप्त नहीं हुईं। टीपू सुल्तान अभी भी एक शक्तिशाली क्षेत्रीय शासक थे और 1786 में अदोनी पर उनका अधिकार उनकी सक्रियता को दर्शाता था।

➣ इसके साथ-साथ मराठा शक्ति और हैदराबाद के निजाम भी दक्कन की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। इस बदलती राजनीतिक और सैन्य परिस्थिति में मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो गई।

➣ इसी समय 1786 में लॉर्ड कॉर्नवालिस को बंगाल का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया रहा था। कॉर्नवालिस एक अनुभवी सैनिक और प्रशासक थे, और इंग्लैंड में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट से उनके व्यक्तिगत संबंध भी इस नियुक्ति में सहायक रहे।

➣ वे 1773 एक्ट की संस्थागत खामी और हेस्टिंग्स-परिषद विवाद से भली-भाँति परिचित थे, इसलिए उन्होंने पद स्वीकार करने से पहले ब्रिटिश सरकार के समक्ष दो प्रमुख शर्तें रखीं-

➣ पहली शर्त: असाधारण एवं गंभीर परिस्थितियों में गवर्नर-जनरल को अपनी परिषद के बहुमत के निर्णय को भी पलटने की स्वतंत्र शक्ति दी जाए, ताकि संकट के समय निर्णय-प्रक्रिया की गति प्रभावित न हो।

➣ दूसरी शर्त: गवर्नर-जनरल के पद के साथ-साथ उसे भारत में तैनात ब्रिटिश सेनाओं का कमांडर-इन-चीफ भी बनाया जाए, ताकि नागरिक और सैन्य नेतृत्व अलग-अलग हाथों में न बँटकर एक ही व्यक्ति के पास केंद्रित रहे।

➣ विलियम पिट ने कॉर्नवालिस की इन दोनों शर्तों को स्वीकार करते हुए हाउस ऑफ कॉमन्स से एक्ट ऑफ 1786 पारित करवाया, ताकि कॉर्नवालिस जैसे सक्षम प्रशासक को गवर्नर-जनरल पद स्वीकार करने के लिए राज़ी किया जा सके।

इसके परिणामस्वरूप कॉर्नवालिस को अपने से पहले के किसी भी गवर्नर-जनरल की तुलना में कहीं अधिक अधिकार प्राप्त हुए।

➣ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह ओवरराइडिंग शक्ति उस समय केवल कॉर्नवालिस को व्यक्तिगत रूप से दी गई थी- यह हर भावी गवर्नर-जनरल को स्वतः प्राप्त होने वाला कोई स्थायी संस्थागत अधिकार नहीं था।

➣ इसे एक स्थायी प्रावधान बनाकर सभी भावी गवर्नर-जनरल व प्रेसीडेंसी गवर्नरों तक विस्तारित करने का कार्य बाद में चार्टर एक्ट, 1793 के माध्यम से किया गया।

एक्ट ऑफ 1786 के प्रमुख प्रावधान

गवर्नर-जनरल एवं कमांडर-इन-चीफ पदों का विलय

➣ एक्ट ऑफ 1786 ने पहली बार गवर्नर-जनरल और कमांडर-इन-चीफ के पदों को एक ही व्यक्ति के हाथ में सौंपने की अनुमति दी। इस प्रकार लॉर्ड कॉर्नवालिस बंगाल के गवर्नर-जनरल के साथ-साथ भारत में ब्रिटिश सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति भी बन गया।

➣ यह प्रावधान केवल बंगाल के गवर्नर-जनरल तक सीमित नहीं था – अधिनियम ने आवश्यकता पड़ने पर मद्रास एवं बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गवर्नरों को भी अपने-अपने क्षेत्र में सैन्य कमान संभालने की अनुमति दी, ताकि नागरिक एवं सैन्य प्रशासन में समन्वय बना रहे।

➣ इस विलय से प्रशासनिक एवं सैन्य निर्णयों के बीच तालमेल की कमी दूर हुई तथा युद्ध व सुरक्षा से जुड़े मामलों में शीघ्र निर्णय लेना संभव हुआ।

लॉर्ड कॉर्नवालिस भारत का पहला ऐसा गवर्नर-जनरल बना जो एक साथ सिविल (नागरिक) एवं सैन्य – दोनों प्रकार का सर्वोच्च अधिकार रखता था। बोर्ड ऑफ कंट्रोल एवं कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की सर्वोच्चता के अधीन रहते हुए भी, कॉर्नवालिस को प्रायः ब्रिटिश भारत का पहला प्रभावी शासक कहा जाता है।

परिषद पर गवर्नर-जनरल की ओवरराइडिंग पावर

➣ एक्ट ऑफ 1786 की सबसे महत्वपूर्ण एवं क्रांतिकारी विशेषता यह थी कि इसने गवर्नर-जनरल (तथा प्रेसीडेंसी के गवर्नरों) को ऐसे असाधारण मामलों में, जो ब्रिटिश अधिकार-क्षेत्रों की सुरक्षा, शांति अथवा हितों से जुड़े हों, अपनी परिषद के बहुमत के निर्णय को भी पलटने तथा अपने स्वयं के निर्णय पर कार्य करने का अधिकार दे दिया।

➣ यह शक्ति 1784 के निर्णायक मत से कहीं अधिक व्यापक थी। निर्णायक मत केवल तभी काम आता था जब परिषद में मत बराबर होते थे, जबकि 1786 की ओवरराइडिंग पावर के अंतर्गत गवर्नर-जनरल परिषद के पूर्ण बहुमत के विरुद्ध भी अपने विवेक से निर्णय ले सकता था।

➣ इस असाधारण शक्ति के प्रयोग की एक शर्त यह थी कि गवर्नर-जनरल को अपने निर्णय के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होते थे, और परिषद के असहमत सदस्यों को भी अपनी असहमति लिखित रूप में दर्ज करने का अधिकार था।

➣ इसके साथ ही एक व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का प्रावधान भी जोड़ा गया – यदि गवर्नर-जनरल परिषद की सहमति के बिना अपने अकेले निर्णय पर कोई कार्रवाई करता, तो उस कार्रवाई के परिणामों के लिए वह स्वयं व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता, न कि पूरी परिषद।

बिंदु पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 एक्ट ऑफ 1786
परिषद पर अधिकार निर्णायक मत (मत बराबर होने पर) बहुमत के निर्णय को भी पलटने की शक्ति
सैन्य पद गवर्नर-जनरल एवं कमांडर-इन-चीफ अलग-अलग दोनों पद एक ही व्यक्ति के पास
जवाबदेही सामान्यतः सामूहिक (परिषद सहित) असाधारण निर्णयों में गवर्नर-जनरल व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी

कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की नियुक्ति-शक्ति की पुनःपुष्टि

➣ एक्ट ऑफ 1786 ने यह भी स्पष्ट किया कि गवर्नर-जनरल, कमांडर-इन-चीफ तथा परिषद के सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास ही बना रहेगा।

➣ इस प्रकार अधिनियम ने गवर्नर-जनरल को असाधारण कार्यकारी शक्तियाँ देते हुए भी उसकी नियुक्ति पर कंपनी एवं ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बरकरार रखा।

एक्ट ऑफ 1786 की सीमाएँ एवं आलोचना

➣ व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की शर्त ने व्यवहार में इस असाधारण शक्ति के प्रभाव को कुछ हद तक कमज़ोर कर दिया, क्योंकि गवर्नर-जनरल अकेले जोखिम उठाने से प्रायः हिचकिचाता था और आमतौर पर परिषद की सहमति प्राप्त करने का ही प्रयास करता था।

➣ यह अधिनियम मूलतः लॉर्ड कॉर्नवालिस-विशिष्ट प्रावधान के रूप में लाया गया था। इसे भविष्य के सभी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी अधिकार के रूप में स्पष्ट नहीं किया गया था – इसे बाद में चार्टर एक्ट, 1793 द्वारा ही सभी भावी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी रूप दिया गया।

➣ परिषद की सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया का महत्व घटा और गवर्नर-जनरल के हाथों में शक्तियों का केंद्रीकरण बढ़ गया, जिससे प्रशासन में एकतरफा प्रवृत्ति की आशंका बनी।

➣ मद्रास एवं बॉम्बे के गवर्नरों को भी समान शक्तियाँ मिलने से उन प्रेसीडेंसियों में भी सत्ता का केंद्रीकरण हुआ, यद्यपि पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के अंतर्गत बंगाल के गवर्नर-जनरल का उन पर समग्र नियंत्रण यथावत बना रहा।

एक्ट ऑफ 1786 का महत्व

➣ गवर्नर-जनरल पद की स्थिति में निर्णायक वृद्धि:- इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल को परिषद पर वास्तविक और प्रभावी नियंत्रण दिया, जिससे बंगाल में प्रशासनिक गतिरोध की उस समस्या का समाधान हुआ जो रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 के समय से चली आ रही थी।

➣ कॉर्नवालिस के सुधारों की नींव:- इसी असाधारण शक्ति के बल पर लॉर्ड कॉर्नवालिस ने बंगाल में महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं न्यायिक सुधार किए, जिनमें जिला कलेक्टर एवं जिला न्यायाधीश की नियुक्ति, मल अदालत एवं रजिस्ट्रार न्यायालयों की स्थापना, तथा आगे चलकर स्थायी बंदोबस्त (1793) तथा कॉर्नवालिस कोड (1793) जैसे दूरगामी सुधार शामिल थे।

➣ सिविल-सैन्य एकीकरण की मिसाल:- गवर्नर-जनरल एवं कमांडर-इन-चीफ पदों के विलय ने भविष्य में भी नागरिक एवं सैन्य नेतृत्व को एक साथ जोड़ने की एक मिसाल कायम की, जो आगे कई गवर्नर-जनरलों के कार्यकाल में दोहराई गई।

➣ चार्टर एक्ट, 1793 की आधारशिला:- एक्ट ऑफ 1786 के तहत कॉर्नवालिस को दी गई ओवरराइडिंग पावर को चार्टर एक्ट, 1793 ने सभी भावी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी अधिकार बना दिया, जिससे यह अधिनियम भारत में गवर्नर-जनरल की शक्तियों के क्रमिक विस्तार की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया।

सार: एक्ट ऑफ 1786 का वास्तविक महत्व इस बात में था कि इसने गवर्नर-जनरल को परिषद पर वास्तविक बहुमत-विरोधी शक्ति देकर बंगाल के प्रशासन को निर्णायक एवं स्थिर बनाया, तथा गवर्नर-जनरल की शक्तियों के भविष्य के विस्तार (चार्टर एक्ट 1793) का मार्ग प्रशस्त किया।

महत्वपूर्ण तथ्य

➣ एक्ट ऑफ 1786 लॉर्ड कॉर्नवालिस की दो शर्तों – ओवरराइडिंग पावर तथा कमांडर-इन-चीफ का पद – को पूरा करने के लिए पारित किया गया था।

➣ लॉर्ड कॉर्नवालिस – बंगाल का गवर्नर-जनरल एवं भारत में ब्रिटिश सेनाओं का कमांडर-इन-चीफ, दोनों पदों पर एक साथ रहने वाला पहला व्यक्ति।

➣ 1784 का निर्णायक मत मत बराबर होने पर ही काम आता था, जबकि 1786 की ओवरराइडिंग पावर परिषद के बहुमत को भी पलट सकती थी।

➣ ओवरराइडिंग पावर के प्रयोग हेतु गवर्नर-जनरल को लिखित कारण दर्ज करने होते थे तथा असहमत सदस्य भी अपनी असहमति लिखित रूप में दर्ज कर सकते थे।

➣ अकेले निर्णय लेने पर गवर्नर-जनरल स्वयं व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता था – इस व्यक्तिगत उत्तरदायित्व खंड ने शक्ति के व्यावहारिक प्रयोग को सीमित किया।

➣ यह शक्ति केवल कॉर्नवालिस तक सीमित थी; चार्टर एक्ट, 1793 ने इसे सभी भावी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी बनाया।

भ्रम बिंदु

➣ एक्ट ऑफ 1786 को चार्टर एक्ट, 1786 कहना गलत है। इसे सही रूप से संशोधन अधिनियम, 1786 (Amending Act of 1786) या एक्ट ऑफ 1786 कहा जाता है।

➣ 1784 का निर्णायक मत और 1786 की ओवरराइडिंग पावर एक ही चीज़ नहीं हैं। निर्णायक मत केवल मत बराबर होने पर काम आता था, जबकि ओवरराइडिंग पावर पूर्ण बहुमत के विरुद्ध भी प्रयोग की जा सकती थी।

➣ यह न समझें कि 1786 की ओवरराइडिंग पावर सभी भावी गवर्नर-जनरलों को स्थायी रूप से प्राप्त हो गई थी। यह सुविधा मूलतः केवल कॉर्नवालिस के लिए थी; इसे स्थायी रूप चार्टर एक्ट, 1793 ने दिया।

➣ गवर्नर-जनरल एवं कमांडर-इन-चीफ के पद इस अधिनियम से पहले सदैव अलग-अलग व्यक्तियों के पास होते थे। 1786 ने पहली बार इन्हें एक ही व्यक्ति (कॉर्नवालिस) के हाथ में जोड़ा।

1773(नियंत्रण की शुरुआत), 1784 (बोर्ड ऑफ कंट्रोल एवं निर्णायक मत), 1786(ओवरराइडिंग पावर एवं कमांडर-इन-चीफ (कॉर्नवालिस-विशिष्ट)), 1793 (ओवरराइडिंग पावर सभी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी)।

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