1937 के प्रांतीय चुनाव एवं कांग्रेस मंत्रिमंडल (1937–39) : गठन, नीतियाँ, सीमाएँ एवं इस्तीफा

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत 1937 के प्रांतीय चुनाव एवं कांग्रेस मंत्रिमंडल (1937–39)
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1937 के प्रांतीय चुनाव : परिचय

1937 के प्रांतीय चुनाव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थे। ये चुनाव भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत कराए गए, जिसके द्वारा प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था लागू की गई।

➣ इन चुनावों के बाद पहली बार भारतीय राजनीतिक दलों को बड़े स्तर पर प्रांतीय सरकारें चलाने का अवसर मिला।

➣ चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की और कई प्रांतों में अपनी सरकारें बनाईं।

1937 से 1939 के बीच चले इन कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने शिक्षा, कृषि, नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और सामाजिक सुधार जैसे क्षेत्रों में कई कदम उठाए।

➣ साथ ही, उन्हें गवर्नरों की विशेष शक्तियों, सीमित आर्थिक संसाधनों, किसान-मजदूर आंदोलनों और विभिन्न राजनीतिक दलों की आलोचनाओं जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ा।

➣ इस अवधि का महत्व केवल प्रांतीय शासन तक सीमित नहीं था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संबंधों में बढ़ता तनाव, अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का प्रश्न, देशी रियासतों की राजनीति तथा 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे ने आगे के राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को भी प्रभावित किया।

➣ इसलिए 1937–39 का कांग्रेस मंत्रिमंडल काल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में संवैधानिक राजनीति और जनआंदोलन के बीच संबंध को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

➣ ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था तैयार करना था जिसमें भारतीयों को प्रांतीय स्तर पर अधिक राजनीतिक जिम्मेदारी मिले, लेकिन ब्रिटिश नियंत्रण और साम्राज्यवादी हित भी सुरक्षित रहें।

➣ अधिनियम में पूरे भारत के लिए संघीय शासन की भी योजना थी, जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को शामिल किया जाना था। हालांकि यह संघीय व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं हो सकी।

➣ इसके विपरीत प्रांतीय स्वायत्तता वाली व्यवस्था 1937 में लागू हुई और उसी के आधार पर प्रांतीय चुनाव कराए गए।

कांग्रेस का चुनाव लड़ने का निर्णय

➣ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि वह 1935 के अधिनियम को स्वीकार किए बिना उसके तहत होने वाले चुनावों में भाग ले या नहीं।

➣ कांग्रेस इस अधिनियम को भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अपर्याप्त मानती थी, लेकिन उसके भीतर यह विचार भी विकसित हुआ कि चुनावों में भाग लेकर प्रांतीय शासन का उपयोग राष्ट्रीय आंदोलन के हित में किया जा सकता है।

1936 के लखनऊ अधिवेशन और बाद में 1937 के फैजपुर अधिवेशन के दौरान कांग्रेस के चुनावी कार्यक्रम और प्रांतीय राजनीति में भागीदारी से संबंधित नीति को आगे बढ़ाया गया। अंततः कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

➣ इस निर्णय के पीछे एक प्रमुख विचार यह था कि चुनावों के माध्यम से कांग्रेस को जनता के बीच अपना संगठन मजबूत करने और प्रशासन के वास्तविक अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।

➣ इस निर्णय के बाद कांग्रेस ने व्यापक चुनाव अभियान चलाया। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, मध्यवर्ग और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच संगठन को सक्रिय किया गया।

➣ चुनाव इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण थे कि कांग्रेस पहली बार बड़े पैमाने पर यह परखने जा रही थी कि उसके राष्ट्रीय आंदोलन को प्रांतीय स्तर पर कितना जनसमर्थन प्राप्त है।

1937 के प्रांतीय चुनाव : परिणाम एवं प्रांतीय सरकारें

जनवरी–फरवरी 1937 में भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत ब्रिटिश भारत के 11 प्रांतों में प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हुए। इन चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी।

➣ हालांकि सभी प्रांतों में कांग्रेस की स्थिति समान नहीं थी। कुछ प्रांतों में उसे स्पष्ट बहुमत मिला, जबकि कुछ में वह सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी बहुमत से दूर रही और कुछ प्रांतों में गैर-कांग्रेसी दलों ने सरकार बनाई।

कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन

➣ कांग्रेस ने कुल 1,585 सीटों वाली प्रांतीय विधानसभाओं में बड़ी संख्या में सीटें जीतीं और पांच प्रांतों में उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। इन प्रांतों में मद्रास, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत एवं बरार और उड़ीसा शामिल थे।

➣ प्रांतवार परिणामों से कांग्रेस की व्यापक चुनावी शक्ति स्पष्ट होती है। मद्रास में कांग्रेस ने 215 में 159 सीटें, संयुक्त प्रांत में 228 में 134, बिहार में 152 में 98, मध्य प्रांत एवं बरार में लगभग 112 में 70 तथा उड़ीसा में 60 में 36 सीटें जीतीं।

बंबई में कांग्रेस ने 175 में 86 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का स्थान प्राप्त किया। यहाँ उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, लेकिन स्वतंत्र सदस्यों के समर्थन से सरकार बनाने की स्थिति में पहुँच गई।

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में कांग्रेस ने 50 में 19 सीटें जीतीं। यहाँ भी उसे अपने बल पर बहुमत नहीं मिला, लेकिन डॉ. खान साहब के नेतृत्व में कांग्रेस को समर्थन प्राप्त हुआ और कांग्रेस मंत्रालय बना।

असम में कांग्रेस 108 में लगभग 33 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। प्रारंभ में वहाँ गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, बाद में राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और 1938 में गोपीनाथ बोरदोलोई के नेतृत्व में कांग्रेस मंत्रालय बना।

प्रांतवार चुनाव परिणाम और सरकारें

प्रांत कुल सीटें कांग्रेस की स्थिति 1937 में सरकार प्रमुख नेता
मद्रास 215 159 सीटें, स्पष्ट बहुमत कांग्रेस मंत्रालय सी. राजगोपालाचारी
बंबई 175 86 सीटें, सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस मंत्रालय बी. जी. खेर
संयुक्त प्रांत (UP) 228 134 सीटें, स्पष्ट बहुमत कांग्रेस मंत्रालय गोविंद बल्लभ पंत
बिहार 152 98 सीटें, स्पष्ट बहुमत कांग्रेस मंत्रालय श्रीकृष्ण सिंह
मध्य प्रांत एवं बरार 112 70 सीटें, स्पष्ट बहुमत कांग्रेस मंत्रालय एन. बी. खरे
उड़ीसा 60 36 सीटें, स्पष्ट बहुमत कांग्रेस मंत्रालय बिश्वनाथ दास
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत 50 19 सीटें, सबसे बड़ी पार्टी समर्थन से कांग्रेस मंत्रालय डॉ. खान साहब
असम 108 33 सीटें, सबसे बड़ी पार्टी बाद में कांग्रेस मंत्रालय गोपीनाथ बोरदोलोई
बंगाल 250 54 सीटें के आसपास गैर-कांग्रेसी मंत्रालय ए. के. फज़लुल हक
पंजाब 175 18 सीटें यूनियनिस्ट मंत्रालय सिकंदर हयात खान
सिंध 60 7 सीटें गैर-कांग्रेसी मंत्रालय अल्लाह बख्श सूमरो

➣ इस प्रकार कांग्रेस ने शुरू में छह प्रांतों– मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत एवं बरार और उड़ीसा- में अपनी सरकार बनाई।

➣ इसके बाद उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में भी कांग्रेस मंत्रालय बना और बाद में असम में कांग्रेस सरकार बनने से कांग्रेस का शासन और व्यापक हुआ। NIOS के अनुसार कांग्रेस ने अंततः 11 में से 7 प्रांतों में मंत्रालय बनाए।

गैर-कांग्रेसी प्रांतों की स्थिति

➣ सभी प्रांतों में कांग्रेस की सफलता समान नहीं थी। पंजाब में कांग्रेस केवल 18 सीटें जीत सकी और वहाँ यूनियनिस्ट पार्टी सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी।

सर सिकंदर हयात खान के नेतृत्व में यूनियनिस्ट सरकार बनी। पंजाब की राजनीति में जमींदार, कृषक और विभिन्न सामुदायिक हितों का गठजोड़ महत्वपूर्ण था, इसलिए कांग्रेस यहाँ अन्य प्रांतों की तरह बहुमत हासिल नहीं कर सकी।

बंगाल में कांग्रेस सबसे बड़ी राजनीतिक शक्तियों में से एक होने के बावजूद सरकार नहीं बना सकी। वहाँ ए. के. फज़लुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी ने अन्य समर्थकों के साथ मिलकर मंत्रालय बनाया।

➣ इस प्रकार बंगाल में प्रांतीय राजनीति कांग्रेस के नियंत्रण से बाहर रही।

सिंध में भी कांग्रेस बहुमत से बहुत दूर रही। वहाँ विभिन्न स्थानीय और प्रांतीय राजनीतिक समूहों के बीच गठबंधन से सरकार बनी और अल्लाह बख्श सूमरो आगे चलकर प्रमुख प्रांतीय नेता के रूप में उभरे।

मुस्लिम लीग का चुनावी प्रदर्शन

ऑल इंडिया मुस्लिम लीग 1937 के चुनावों में कांग्रेस की तरह व्यापक प्रांतीय शक्ति नहीं बन सकी। वह किसी भी प्रांत में अपने दम पर सरकार बनाने में सफल नहीं हुई।

➣ विशेष रूप से पंजाब और बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों में भी क्षेत्रीय मुस्लिम दलों का प्रभाव मुस्लिम लीग से अधिक था। यह स्थिति आगे चलकर मुस्लिम लीग की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण बनी।

➣ 1937 के चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद लीग ने मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपना संगठन मजबूत करने और स्वयं को भारतीय मुसलमानों की प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि संस्था के रूप में स्थापित करने का अभियान तेज किया।

➣ इस प्रक्रिया ने 1937–40 के बीच भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।

1937 के चुनावों की विशेषताएँ

➣ भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत 11 प्रांतों में चुनाव कराए गए। इन चुनावों में पहले की तुलना में मताधिकार का विस्तार किया गया था, लेकिन यह अभी भी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं था।

संपत्ति, कर, शिक्षा और अन्य निर्धारित योग्यताओं के आधार पर सीमित संख्या में लोग ही मतदान कर सकते थे। इस व्यवस्था के तहत ब्रिटिश भारत की लगभग 14 प्रतिशत आबादी को ही मतदान का अधिकार प्राप्त था।

➣ चुनावों में सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों के साथ-साथ विभिन्न सामुदायिक एवं विशेष निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था भी बनी रही।

➣ 1935 के अधिनियम में सिख, मुस्लिम, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीय और भारतीय ईसाई जैसे समुदायों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्थाएँ तथा कुछ विशेष हितों के लिए सीटों का प्रावधान था।

➣ इससे भारतीय राजनीति में सामुदायिक प्रतिनिधित्व की पहले से चली आ रही व्यवस्था आगे भी बनी रही।

1937 के चुनावों का राजनीतिक महत्व

➣ 1937 के चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि कांग्रेस एक अखिल भारतीय चुनावी शक्ति के रूप में सामने आई। उसे केवल शहरी शिक्षित वर्ग का संगठन मानना अब कठिन था, क्योंकि चुनावों में उसके संगठन ने विभिन्न सामाजिक समूहों और क्षेत्रों तक पहुँच बनाई।

➣ दूसरी ओर, चुनाव परिणामों ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की राजनीति केवल कांग्रेस बनाम ब्रिटिश सरकार तक सीमित नहीं थी।

यूनियनिस्ट पार्टी, कृषक प्रजा पार्टी, जस्टिस पार्टी तथा विभिन्न प्रांतीय और सामुदायिक दल अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली बने हुए थे।

➣ चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के सामने एक बिल्कुल नई स्थिति पैदा की- अब उसे केवल ब्रिटिश सरकार का विरोध करने वाला राष्ट्रीय आंदोलन नहीं, बल्कि प्रांतों में वास्तविक शासन चलाने वाली राजनीतिक शक्ति के रूप में भी कार्य करना था।

तथ्य/उत्तर
चुनाव का आधार भारत शासन अधिनियम, 1935
चुनाव हुए 11 प्रांतों में
स्पष्ट कांग्रेस बहुमत 5 प्रांतों में
कांग्रेस के तत्काल मंत्रालय 6 प्रांतों में
बाद में कांग्रेस मंत्रालय NWFP और असम
पंजाब सरकार यूनियनिस्ट पार्टी – सिकंदर हयात खान
बंगाल सरकार ए. के. फज़लुल हक – कृषक प्रजा पार्टी आधारित मंत्रालय
सिंध सरकार अल्लाह बख्श सूमरो के नेतृत्व वाला गैर-कांग्रेसी मंत्रालय
मद्रास सी. राजगोपालाचारी
बंबई बी. जी. खेर
संयुक्त प्रांत गोविंद बल्लभ पंत
बिहार श्रीकृष्ण सिंह
मध्य प्रांत एन. बी. खरे
उड़ीसा बिश्वनाथ दास
NWFP डॉ. खान साहब

कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन (1937)

1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस को कई प्रांतों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। लेकिन चुनाव में सफलता मिलने के बाद उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या वह भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत बनी सरकारों में शामिल होकर सत्ता स्वीकार करे या ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था का विरोध जारी रखे।

➣ यह प्रश्न कांग्रेस के भीतर कई महीनों तक चर्चा का विषय बना रहा।

मंत्रिमंडल गठन का प्रश्न और कांग्रेस की दुविधा

➣ कांग्रेस भारत शासन अधिनियम, 1935 को भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अपर्याप्त मानती थी। उसकी मुख्य आपत्ति यह थी कि प्रांतीय स्वायत्तता के बावजूद गवर्नरों को विशेष विवेकाधीन और विशेष उत्तरदायित्व वाली शक्तियाँ प्राप्त थीं।

➣ गवर्नर कुछ परिस्थितियों में निर्वाचित मंत्रियों की सलाह से अलग निर्णय ले सकते थे और कानून-व्यवस्था तथा अल्पसंख्यकों के हितों जैसे मामलों में विशेष अधिकार रखते थे।

➣ इसलिए कांग्रेस के सामने यह चिंता थी कि यदि उसके मंत्री सत्ता में आते हैं, तो क्या वे वास्तव में स्वतंत्र रूप से शासन कर पाएँगे या गवर्नर अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करके उनके निर्णयों में हस्तक्षेप करेंगे।

➣ इस कारण कार्यालय स्वीकार करने का प्रश्न केवल सरकार बनाने का प्रश्न नहीं था, बल्कि ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था के प्रति कांग्रेस की नीति से जुड़ा हुआ था।

➣ कांग्रेस के भीतर एक विचार यह था कि चुनाव जीतने के बाद मंत्रालय बनाकर जनता के लिए सुधार लागू किए जाएँ, प्रशासन का अनुभव प्राप्त किया जाए और ब्रिटिश शासन के भीतर उपलब्ध सीमित अधिकारों का उपयोग राष्ट्रीय हित में किया जाए

➣ दूसरी ओर कुछ नेताओं को आशंका थी कि सत्ता में शामिल होने से कांग्रेस का जनांदोलन कमजोर पड़ सकता है और 1935 के अधिनियम को अप्रत्यक्ष वैधता मिल सकती है।

मार्च 1937 का प्रारंभिक निर्णय

➣ चुनाव परिणाम आने के बाद मार्च 1937 में कांग्रेस ने सैद्धांतिक रूप से उन प्रांतों में मंत्रालय बनाने की अनुमति दी जहाँ उसे विधानमंडल में बहुमत प्राप्त था।

➣ लेकिन यह निर्णय एक महत्वपूर्ण शर्त के साथ था- कांग्रेस मंत्रिमंडल तभी बनेगा जब संबंधित गवर्नर यह आश्वासन दे कि वह अपनी विशेष शक्तियों का मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं करेगा और मंत्रियों के संवैधानिक कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेगा।

➣ कांग्रेस के जिन नेताओं को सरकार बनाने का निमंत्रण मिला, उन्होंने गवर्नरों से इस संबंध में स्पष्ट आश्वासन माँगा। जब ऐसा स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला, तो कांग्रेस ने तत्काल मंत्रालय बनाने से इनकार कर दिया। इससे कुछ समय के लिए प्रांतीय सरकारों का गठन टल गया।

गवर्नर की शक्तियाँ और गतिरोध

➣ कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच मुख्य विवाद यही था कि गवर्नर की संवैधानिक शक्तियों की व्याख्या किस प्रकार की जाए।

➣ कांग्रेस चाहती थी कि निर्वाचित मंत्रियों को वास्तविक प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हों, जबकि 1935 का अधिनियम गवर्नर को कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्वतंत्र निर्णय की शक्ति देता था।

➣ इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार के उच्च अधिकारियों और वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो की ओर से ऐसे वक्तव्य दिए गए जिनसे कांग्रेस को यह विश्वास हुआ कि गवर्नर अपनी विशेष शक्तियों का सामान्य राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए उपयोग नहीं करेंगे।

➣ हालांकि इन वक्तव्यों ने 1935 के अधिनियम में कानूनी रूप से गवर्नर की शक्तियाँ समाप्त नहीं कीं, लेकिन राजनीतिक गतिरोध दूर करने में इनका महत्व रहा।

7 जुलाई 1937 : कांग्रेस का कार्यालय स्वीकार करने का निर्णय

5–8 जुलाई 1937 के बीच कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक वर्धा में हुई। विचार-विमर्श के बाद 7 जुलाई 1937 को कार्यसमिति ने कांग्रेस नेताओं को प्रांतों में सरकार बनाने के लिए कार्यालय स्वीकार करने की अनुमति दे दी।

➣ कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि सत्ता स्वीकार करना उसके लिए अंतिम राजनीतिक लक्ष्य नहीं था। मंत्रिमंडलों को कांग्रेस के चुनावी कार्यक्रम और रचनात्मक कार्यक्रम को लागू करने तथा जनता के हित में प्रशासन चलाने के लिए इस्तेमाल किया जाना था।

➣ साथ ही कांग्रेस ने ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था में अपनी मूल राजनीतिक असहमति बनाए रखी।

10 जुलाई 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस की यह अनुमति मुख्यतः उन प्रांतों के लिए थी जहाँ कांग्रेस को बहुमत प्राप्त था। जहाँ कांग्रेस अल्पमत में थी, वहाँ केवल गठबंधन बनाकर मंत्रालय बनाने की अनुमति इस निर्णय में शामिल नहीं थी।

कांग्रेस के पहले मंत्रिमंडलों का गठन

➣ कार्यालय स्वीकार करने के निर्णय के बाद जुलाई 1937 में कांग्रेस ने उन छह प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाना शुरू किया जहाँ उसे अपने बल पर बहुमत प्राप्त था। ये प्रांत थे-मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत एवं बरार और उड़ीसा

प्रांत कांग्रेस मंत्रिमंडल के प्रमुख राजनीतिक स्थिति
मद्रास सी. राजगोपालाचारी कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत
बंबई बी. जी. खेर कांग्रेस सबसे बड़ी शक्ति, समर्थन से सरकार
संयुक्त प्रांत गोविंद बल्लभ पंत कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत
बिहार श्रीकृष्ण सिंह कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत
मध्य प्रांत एवं बरार एन. बी. खरे कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत
उड़ीसा बिश्वनाथ दास कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत

➣ इन छह प्रांतों में मंत्रिमंडल बनने के बाद कांग्रेस को पहली बार बड़े पैमाने पर प्रांतीय प्रशासन चलाने का प्रत्यक्ष अनुभव मिला।

➣ कांग्रेस नेताओं के लिए यह केवल सरकारी पद प्राप्त करना नहीं था, उन्हें अब शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुधार जैसे वास्तविक प्रशासनिक प्रश्नों पर निर्णय लेने थे।

अन्य प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडल

➣ कांग्रेस उन प्रांतों में तत्काल सरकार नहीं बना सकी जहाँ उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। हालांकि बाद में राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ।

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में डॉ. खान साहब के नेतृत्व में कांग्रेस मंत्रालय बना। इसके बाद असम में भी कांग्रेस ने गोपीनाथ बोरदोलोई के नेतृत्व में सरकार बनाई। इस प्रकार कांग्रेस का प्रांतीय शासन बाद में सात प्रांतों तक फैल गया।

➣ इसके विपरीत पंजाब, बंगाल और सिंध में कांग्रेस मंत्रालय नहीं बना। वहाँ क्रमशः यूनियनिस्ट पार्टी, कृषक प्रजा पार्टी आधारित गठबंधन और प्रांतीय गैर-कांग्रेसी शक्तियों का प्रभाव रहा।

➣ इससे स्पष्ट हुआ कि 1937 का चुनाव कांग्रेस की बड़ी सफलता के बावजूद पूरे भारत में उसकी समान राजनीतिक पकड़ स्थापित नहीं कर सका।

कांग्रेस मंत्रिमंडलों की विशेष राजनीतिक स्थिति

➣ 1937 में बने कांग्रेस मंत्रिमंडल सामान्य अर्थों में पूर्ण स्वतंत्र सरकारें नहीं थे। वे अभी भी ब्रिटिश क्राउन और 1935 के अधिनियम के संवैधानिक ढाँचे के भीतर काम कर रहे थे। गवर्नरों की कुछ विशेष शक्तियाँ बनी रहीं और अंतिम संवैधानिक नियंत्रण ब्रिटिश शासन के हाथों में था।

➣ इसके बावजूद इन मंत्रिमंडलों ने भारतीय नेताओं को व्यावहारिक प्रशासन और शासन का अनुभव दिया। कांग्रेस ने विधानसभाओं में अपने बहुमत का उपयोग सामाजिक और आर्थिक सुधारों के लिए करने का प्रयास किया।

➣ आगे चलकर राजनीतिक बंदियों की रिहाई, नागरिक स्वतंत्रता, शिक्षा, कृषि और सामाजिक सुधार जैसी नीतियाँ इसी शासनकाल का हिस्सा बनीं।

➣ कांग्रेस का यह सत्ता में प्रवेश भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक नए चरण की शुरुआत था। अब कांग्रेस को एक ओर औपनिवेशिक शासन का विरोध जारी रखना था,

➣ तो दूसरी ओर जिन प्रांतों में वह सत्ता में थी वहाँ जनता के लिए वास्तविक प्रशासन और सुधार भी करने थे। यही द्वंद्व 1937–39 के पूरे कांग्रेस शासन की राजनीति का आधार बना।

कांग्रेस मंत्रिमंडलों की नीतियाँ एवं प्रमुख कार्य

1937–39 के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने लगभग दो वर्षों तक विभिन्न प्रांतों में शासन किया। इन सरकारों के सामने संसाधनों की कमी और गवर्नरों की विशेष शक्तियों जैसी संवैधानिक सीमाएँ थीं, फिर भी उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान किए गए कुछ वादों को प्रशासनिक नीतियों में बदलने का प्रयास किया।

➣ इनके कार्यों का मुख्य जोर नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, शिक्षा, कृषि सुधार, श्रमिक हित और सामाजिक सुधार पर रहा।

राजनीतिक बंदियों की रिहाई

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन के बाद सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती कदमों में राजनीतिक बंदियों की रिहाई शामिल थी। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए अनेक राजनीतिक कार्यकर्ताओं को रिहा किया गया।

➣ इससे कांग्रेस ने यह संदेश दिया कि प्रांतीय सत्ता में आने के बाद भी वह अपने राष्ट्रीय आंदोलन और राजनीतिक स्वतंत्रता के उद्देश्य से अलग नहीं हुई है।

➣ राजनीतिक कैदियों की रिहाई का प्रश्न सभी प्रांतों में एक समान नहीं था। कुछ मामलों में गवर्नरों और कांग्रेस मंत्रियों के बीच मतभेद भी हुए, क्योंकि कानून-व्यवस्था और सुरक्षा से संबंधित कुछ अधिकार गवर्नरों के पास सुरक्षित थे।

➣ फिर भी कुल मिलाकर कांग्रेस सरकारों ने दमनकारी औपनिवेशिक नीतियों को नरम करने की दिशा में कदम उठाया।

नागरिक स्वतंत्रता और प्रेस पर प्रतिबंधों में कमी

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान लगाए गए कई प्रेस प्रतिबंधों और राजनीतिक नियंत्रणों को हटाने या कम करने का प्रयास किया।

➣ समाचार-पत्रों को अधिक स्वतंत्र वातावरण मिला और राजनीतिक सभा तथा संगठन की गतिविधियों पर लगी कुछ पाबंदियों में भी ढील दी गई। कांग्रेस सरकारों की प्रमुख उपलब्धियों में प्रेस पर लगे प्रतिबंधों को हटाना शामिल था।

➣ इससे प्रांतीय राजनीति में जनमत, राजनीतिक बहस और संगठनात्मक गतिविधियों के लिए अपेक्षाकृत अधिक खुला वातावरण बना। कांग्रेस ने यह दिखाने की कोशिश की कि निर्वाचित सरकारों के आने से प्रशासन अधिक उत्तरदायी बनाया जा सकता है।

कृषि एवं किसान संबंधी सुधार

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने किसानों की आर्थिक कठिनाइयों को कम करने के लिए विभिन्न प्रांतों में कृषि किराए और भूमि संबंधी बोझ को कम करने के उपाय किए। किसानों के लिए किराए में कमी कांग्रेस सरकारों की महत्वपूर्ण पहलों में शामिल थी।

➣ अलग-अलग प्रांतों में सुधारों का स्वरूप अलग था। कुछ जगह किरायेदारी सुरक्षा, भूमि-राजस्व में राहत, ऋणग्रस्त किसानों को राहत और जमींदारी प्रथाओं पर नियंत्रण से संबंधित कदम उठाए गए।

➣ इन नीतियों का उद्देश्य किसान और जमींदार के बीच मौजूद असमान शक्ति-संबंध को कुछ हद तक संतुलित करना था।

➣ किसान प्रश्न कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि 1930 के दशक में किसान आंदोलनों का विस्तार हो रहा था। इसलिए कांग्रेस मंत्रिमंडलों को राष्ट्रीय आंदोलन में किसानों से किए गए वादों और प्रशासनिक सीमाओं के बीच संतुलन बनाना पड़ा।

शिक्षा के क्षेत्र में प्रयास

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने प्राथमिक और बुनियादी शिक्षा के विस्तार पर जोर दिया। शिक्षा को केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाने तक सीमित न रखकर उसे भारतीय समाज की आवश्यकताओं और आर्थिक परिस्थितियों से जोड़ने की कोशिश की गई।

➣ इसी दौर में वर्धा शिक्षा योजना को आगे बढ़ाया गया। 1937 में वर्धा में आयोजित शिक्षा सम्मेलन के बाद बुनियादी शिक्षा की ऐसी योजना सामने आई जिसमें हस्तकला या उत्पादक कार्य को शिक्षा का केंद्र बनाने तथा मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने पर जोर दिया गया। बाद में डॉ. जाकिर हुसैन समिति ने इस योजना का विस्तृत प्रारूप तैयार किया।

➣ इस शिक्षा नीति के पीछे विचार था कि शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, सस्ती और व्यापक बनाया जाए तथा बच्चों को केवल किताबों तक सीमित न रखकर काम और जीवन से जोड़कर शिक्षित किया जाए।

मद्यनिषेध और सामाजिक सुधार

➣ कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम में मद्यनिषेध को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इसलिए कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने विभिन्न प्रांतों में शराब की बिक्री और सेवन को नियंत्रित करने तथा चरणबद्ध रूप से मद्यनिषेध लागू करने का प्रयास किया।

➣ इसके साथ हरिजन कल्याण, अस्पृश्यता-निवारण, मंदिर प्रवेश और सामाजिक सुधार से जुड़े कार्यक्रमों को भी प्रोत्साहन दिया गया। कांग्रेस सरकारों ने सामाजिक रूप से वंचित वर्गों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ प्रशासनिक और शैक्षिक उपाय किए।

➣ हालांकि इन सुधारों की सीमा थी। सामाजिक भेदभाव जैसी गहरी समस्याएँ केवल सरकारी आदेशों से समाप्त नहीं हो सकती थीं। इसलिए इन वर्षों में कांग्रेस सरकारों की सामाजिक सुधार नीतियों को क्रमिक सुधार के रूप में देखना अधिक उचित है।

श्रमिकों के हित में कदम

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों की स्थिति सुधारने की दिशा में भी कदम उठाए। काम की परिस्थितियों, मजदूरी और श्रमिक विवादों से संबंधित प्रश्नों को प्रशासनिक स्तर पर अधिक महत्व दिया गया।

➣ इस दौर में श्रमिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों की गतिविधियाँ भी बढ़ रही थीं। कांग्रेस सरकारों को एक ओर श्रमिक हितों का समर्थन करना था और दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन तथा कानून-व्यवस्था को बनाए रखना था। इस कारण श्रमिक प्रश्न पर कांग्रेस का रुख हमेशा एक समान नहीं रहा।

जनकल्याण और प्रशासन में परिवर्तन

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने स्थानीय प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में भी सुधार करने का प्रयास किया। उद्देश्य प्रशासन को अधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी बनाना था।

➣ कांग्रेस नेताओं के लिए यह शासनकाल इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उन्हें पहली बार बड़े पैमाने पर यह अवसर मिला कि वे अपने राष्ट्रीय और सामाजिक कार्यक्रमों को वास्तविक प्रशासनिक नीतियों में बदलें। इससे भविष्य के स्वतंत्र भारत के लिए प्रशासन चलाने का अनुभव भी प्राप्त हुआ।

देशी भाषाओं और भारतीय संस्कृति पर जोर

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भारतीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ाने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के प्रभाव को कम करना और शिक्षा को सामान्य जनता के अधिक निकट लाना था।

➣ इस दौर में राष्ट्रीय शिक्षा, भारतीय संस्कृति और स्वदेशी विचारों को भी सरकारी नीतियों में अधिक स्थान मिलने लगा। यह परिवर्तन कांग्रेस की उस व्यापक सोच का हिस्सा था जिसमें राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को भी महत्व दिया जाता था।

कांग्रेस मंत्रिमंडलों की सीमाएँ एवं विवाद

1937–39 के कांग्रेस मंत्रिमंडल भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रयोग थे, लेकिन वे पूर्ण स्वतंत्र सरकारें नहीं थे। उन्हें भारत शासन अधिनियम, 1935 के अधीन काम करना पड़ता था।

➣ इसके कारण उनके सामने संवैधानिक सीमाएँ, सीमित आर्थिक संसाधन और समाज के विभिन्न वर्गों की बढ़ती अपेक्षाएँ जैसी कई समस्याएँ थीं। कांग्रेस सरकारों ने कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए, लेकिन इन सुधारों से सभी वर्ग पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए।

गवर्नरों की शक्तियाँ और संवैधानिक सीमाएँ

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों की सबसे बड़ी सीमा गवर्नरों की विशेष शक्तियाँ थीं। 1935 के अधिनियम के तहत गवर्नरों को कुछ मामलों में अपने विवेक से निर्णय लेने और विशेष उत्तरदायित्व वाले क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने का अधिकार प्राप्त था।

➣ इसलिए निर्वाचित भारतीय मंत्रियों के पास शासन की जिम्मेदारी तो थी, लेकिन वे पूरी तरह स्वतंत्र होकर निर्णय नहीं ले सकते थे।

राजनीतिक बंदियों की रिहाई, कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णय और पुलिस संबंधी प्रश्नों पर कई बार कांग्रेस मंत्रियों और गवर्नरों के बीच मतभेद सामने आए।

➣ इससे कांग्रेस की उस प्रारंभिक आशंका की पुष्टि होती थी कि प्रांतीय स्वायत्तता वास्तव में पूरी स्वायत्तता नहीं थी। औपनिवेशिक शासन की अंतिम संवैधानिक पकड़ बनी हुई थी।

➣ इस प्रकार कांग्रेस मंत्रिमंडलों को एक ऐसी व्यवस्था में काम करना पड़ रहा था जिसमें जनता द्वारा चुने गए मंत्री और ब्रिटिश गवर्नर दोनों सत्ता के महत्वपूर्ण केंद्र थे। यही विरोधाभास कांग्रेस के प्रांतीय शासन की सबसे बड़ी संरचनात्मक सीमा बना रहा।

आर्थिक सीमाएँ, किसान-मजदूर प्रश्न और वामपंथी आलोचना

➣ कांग्रेस सरकारों के सामने दूसरी बड़ी समस्या सीमित वित्तीय संसाधन थे। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि सुधार, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण के लिए कांग्रेस के पास बड़ी योजनाएँ थीं, लेकिन प्रांतों के बजट सीमित थे। इसलिए चुनावों से पहले किए गए अनेक वादों को व्यापक स्तर पर लागू करना कठिन रहा।

➣ कांग्रेस ने किसानों को राहत देने के लिए कर्ज में कमी, किराए में राहत, भूमि की वापसी और किरायेदारी सुरक्षा जैसे कदम उठाए, लेकिन इनका लाभ सभी किसानों तक समान रूप से नहीं पहुँचा।

➣ विशेष रूप से गरीब और निम्न स्तर के किसानों की समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। इसके परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में किसान सभाओं और किसान नेताओं ने विरोध, सभाएँ और प्रदर्शन जारी रखे।

➣ सत्ता में आने के बाद कुछ कांग्रेस सरकारों ने ऐसे किसान आंदोलनों के विरुद्ध किसान नेताओं की गिरफ्तारी और सभाओं पर प्रतिबंध जैसे कदम भी उठाए।

➣ इससे उस समय एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आया- विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस किसान आंदोलनों से जुड़ी थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसे कानून-व्यवस्था और प्रशासन की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ी।

➣ इसी दौर में कांग्रेस के भीतर वामपंथी और समाजवादी विचारों का प्रभाव बढ़ रहा था। वामपंथी नेताओं और किसान संगठनों को लगता था कि कांग्रेस सरकारों ने किसानों के लिए पर्याप्त मूलभूत परिवर्तन नहीं किए और जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करने जैसे अधिक व्यापक कदम नहीं उठाए।

➣ 1939 में आचार्य नरेंद्र देव ने अखिल भारतीय किसान सभा के अधिवेशन में इस बात पर जोर दिया कि किसान सभा को कांग्रेस से पर्याप्त स्वतंत्रता रखनी चाहिए, ताकि वह किसानों के हित में कांग्रेस पर दबाव डाल सके।

श्रमिक प्रश्न पर भी इसी प्रकार तनाव दिखाई दिया। मजदूर संगठन और वामपंथी समूह अधिक व्यापक श्रम सुधार चाहते थे, जबकि कांग्रेस सरकारों को औद्योगिक उत्पादन, प्रशासन और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना पड़ता था।

➣ इस कारण श्रमिक आंदोलनों के प्रति कांग्रेस का रुख हमेशा उसके विपक्षी दौर जैसा नहीं रहा।

सामाजिक सुधारों की सीमाएँ और कांग्रेस की आलोचना

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने अस्पृश्यता-निवारण, हरिजन कल्याण, शिक्षा और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में कई कदम उठाए, लेकिन जातिगत भेदभाव जैसी गहरी सामाजिक समस्याओं को केवल सरकारी नीतियों से समाप्त करना संभव नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक रूढ़ियाँ और जातिगत भेदभाव काफी मजबूत बने रहे।

➣ इस कारण डॉ. बी. आर. अंबेडकर जैसे नेताओं ने कांग्रेस की सामाजिक सुधार नीति की आलोचना की। उनका मानना था कि दलितों की समस्या का समाधान केवल सामाजिक सेवा या अस्पृश्यता-विरोधी प्रचार से नहीं होगा

➣ उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कानूनी सुरक्षा और वास्तविक राजनीतिक शक्ति भी मिलनी चाहिए।

➣ कांग्रेस सरकारों की आलोचना केवल वामपंथ या दलित नेताओं तक सीमित नहीं थी। किसानों को लगता था कि सुधार पर्याप्त नहीं हैं, मजदूर अधिक अधिकार चाहते थे और कुछ राष्ट्रवादियों को चिंता थी कि संवैधानिक शासन में प्रवेश से कांग्रेस का जन-आंदोलन वाला चरित्र कमजोर हो सकता है।

➣ इस प्रकार कांग्रेस को सत्ता में आने के बाद अपने विभिन्न समर्थक वर्गों की अलग-अलग अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना पड़ा।

➣ फिर भी कांग्रेस मंत्रिमंडलों की सीमाओं का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उनके पास पूर्ण संप्रभु सत्ता नहीं थी

1935 के अधिनियम, गवर्नरों की शक्तियों, सीमित राजस्व और औपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचे ने उनकी क्षमता को सीमित किया। इसलिए उनके कार्यकाल को केवल सुधारों की विफलता के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

➣ इस प्रकार कांग्रेस मंत्रिमंडलों की मुख्य समस्याएँ थीं- गवर्नरों की विशेष शक्तियाँ, सीमित वित्तीय संसाधन, किसानों और मजदूरों की बढ़ती अपेक्षाएँ, वामपंथी दबाव तथा सामाजिक सुधारों की सीमित सफलता

➣ इन परिस्थितियों के बावजूद कांग्रेस सरकारों ने भारतीय नेताओं को शासन का व्यावहारिक अनुभव दिया और यह भी दिखाया कि औपनिवेशिक ढाँचे के भीतर भारतीय मंत्रियों के लिए वास्तविक प्रशासन चलाना कितना कठिन था।

कांग्रेस मंत्रिमंडल और मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद कांग्रेस कई प्रांतों में सरकार बनाने की स्थिति में आ गई, जबकि मुस्लिम लीग का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा।

➣ विशेष रूप से पंजाब और बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों में क्षेत्रीय मुस्लिम दलों का प्रभाव लीग से अधिक था।

➣ इससे मुहम्मद अली जिन्ना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मुस्लिम लीग को पूरे भारत के मुसलमानों की प्रमुख राजनीतिक संस्था के रूप में कैसे स्थापित किया जाए।

कांग्रेस–मुस्लिम लीग सहयोग की विफलता

➣ 1937 के चुनावों से पहले और चुनाव के दौरान कई क्षेत्रों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग की संभावनाएँ मौजूद थीं।

➣ लेकिन चुनाव के बाद संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) में मंत्रिमंडल गठन को लेकर दोनों के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हुए। लीग चाहती थी कि उसके निर्वाचित सदस्यों को कांग्रेस मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए और उसे एक स्वतंत्र राजनीतिक संगठन के रूप में मान्यता मिले।

➣ कांग्रेस नेतृत्व की ओर से मुस्लिम लीग के सदस्यों के कांग्रेस में विलय या कांग्रेस की अनुशासन व्यवस्था स्वीकार करने की अपेक्षा की गई। लीग इस शर्त को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।

➣ परिणामस्वरूप कांग्रेस–लीग गठबंधन की संभावना समाप्त हो गई और दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ने लगी।

➣ इतिहासकार विलियम गोल्ड के अनुसार संयुक्त प्रांत में यही असफल वार्ता 1937 के बाद दोनों संगठनों के बीच बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बनी।

➣ यह विवाद केवल एक प्रांत में सरकार गठन का प्रश्न नहीं रहा। मुस्लिम लीग ने इसे इस रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया कि कांग्रेस स्वयं को पूरे भारत की एकमात्र राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति मानती है और मुस्लिम लीग के स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व को पर्याप्त महत्व नहीं देना चाहती। इसी धारणा ने आगे चलकर लीग की राजनीति को अधिक आक्रामक बनाया।

कांग्रेस शासन के प्रति मुस्लिम लीग की आलोचना

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन के बाद मुस्लिम लीग ने कांग्रेस-शासित प्रांतों में मुसलमानों की स्थिति को लेकर अनेक शिकायतें उठाईं।

➣ इन शिकायतों में वंदे मातरम्, कांग्रेस के झंडे और राष्ट्रीय गीतों का प्रयोग, शिक्षा नीति, सरकारी नियुक्तियों तथा प्रशासन में कथित पक्षपात जैसे मुद्दे शामिल थे। लीग ने आरोप लगाया कि कांग्रेस की नीतियाँ बहुसंख्यक समुदाय की संस्कृति और राजनीतिक प्रभाव को बढ़ावा दे रही हैं।

➣ विशेष रूप से वर्धा की बुनियादी शिक्षा योजना को लेकर मुस्लिम लीग ने गंभीर आपत्तियाँ उठाईं।

➣ लीग से जुड़े नेताओं का आरोप था कि शिक्षा के माध्यम से कांग्रेस अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विचारधारा को विद्यार्थियों तक पहुँचाना चाहती है और इससे मुस्लिमों की अलग धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है।

➣ 1938 में लीग द्वारा गठित पिरपुर समिति ने कांग्रेस-शासित प्रांतों में मुस्लिम शिकायतों की जाँच की और अपनी रिपोर्ट में अनेक आरोप प्रस्तुत किए।

➣ यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पिरपुर रिपोर्ट में लगाए गए सभी आरोपों को इतिहासकार निर्विवाद तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं करते

➣ ये मुख्यतः मुस्लिम लीग द्वारा कांग्रेस शासन के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए राजनीतिक आरोप और शिकायतें थीं। बाद के इतिहासलेखन में इन दावों की वास्तविकता और सीमा पर अलग-अलग मत मिलते हैं। इसलिए परीक्षा में इन्हें “मुस्लिम लीग ने आरोप लगाया कि…” के रूप में लिखना अधिक सटीक है।

पिरपुर रिपोर्ट और मुस्लिम राजनीतिक असुरक्षा

1938 में राजा मुहम्मद महदी ऑफ पिरपुर की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग ने एक समिति बनाई, जिसने कांग्रेस-शासित प्रांतों में मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन किया।

➣ इसकी रिपोर्ट को पिरपुर रिपोर्ट (Pirpur Report) कहा गया। रिपोर्ट में कांग्रेस सरकारों पर मुसलमानों के साथ राजनीतिक और प्रशासनिक भेदभाव के अनेक आरोप लगाए गए।

➣ रिपोर्ट और उससे जुड़ा लीग का प्रचार एक व्यापक राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बना।

➣ लीग यह स्थापित करना चाहती थी कि यदि कांग्रेस को पूरे भारत की सत्ता मिलती है, तो मुसलमानों की राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रहेगी।

➣ इस प्रकार कांग्रेस मंत्रिमंडलों का विरोध धीरे-धीरे मुस्लिम लीग की व्यापक राजनीतिक लामबंदी का साधन बन गया।

1939 में बिहार के संबंध में शरीफ रिपोर्ट भी मुस्लिम शिकायतों के इसी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनी। इन रिपोर्टों और सार्वजनिक अभियानों ने कांग्रेस सरकारों के विरुद्ध मुस्लिम लीग के प्रचार को अधिक संगठित किया।

मुस्लिम लीग का संगठनात्मक विस्तार

➣ 1937 के चुनावों में कमजोर प्रदर्शन ने मुस्लिम लीग को अपनी संगठनात्मक रणनीति बदलने के लिए प्रेरित किया।

➣ जिन्ना और उनके सहयोगियों ने मुस्लिम लीग को केवल अभिजात वर्ग के राजनीतिक संगठन से आगे बढ़ाकर जन-आधारित मुस्लिम राजनीतिक संगठन बनाने का प्रयास किया।

➣ प्रांतीय स्तर पर मुस्लिम नेताओं, स्थानीय संगठनों और विद्यार्थियों तथा पेशेवर समूहों को लीग से जोड़ने का अभियान तेज हुआ। इतिहासकारों के अनुसार 1937 के बाद लीग का जनसंगठन और राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ा, हालांकि उसकी शक्ति हर क्षेत्र में समान नहीं थी।

अक्टूबर 1937 के लखनऊ अधिवेशन में मुस्लिम लीग के पुनर्गठन और विस्तार पर विशेष जोर दिया गया। इस चरण में जिन्ना ने लीग को मुस्लिमों के व्यापक राजनीतिक संगठन के रूप में मजबूत करने का प्रयास किया।

➣ कई प्रांतों के प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं के साथ संपर्क बढ़ाया गया और लीग की संगठनात्मक शाखाओं का विस्तार किया गया।

➣ इस प्रकार 1937 के चुनावों में कमजोर रहने वाली मुस्लिम लीग ने कांग्रेस मंत्रिमंडलों के कार्यकाल का उपयोग मुस्लिम राजनीतिक लामबंदी बढ़ाने के लिए किया।

➣ कांग्रेस सरकारों के विरुद्ध शिकायतों को केवल प्रशासनिक मुद्दों के रूप में नहीं, बल्कि मुस्लिम राजनीतिक सुरक्षा और सामुदायिक पहचान के प्रश्न से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।

कांग्रेस राज की धारणा और मुस्लिम लीग

➣ 1937–39 के दौरान मुस्लिम लीग ने कांग्रेस-शासित प्रांतों की स्थिति को व्यापक रूप से कांग्रेस राज के रूप में प्रचारित किया।

➣ लीग का तर्क था कि कांग्रेस की सरकारें स्वयं को राष्ट्रीय सरकार के रूप में प्रस्तुत करते हुए वास्तव में बहुसंख्यक समुदाय की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को बढ़ावा दे रही हैं। इस प्रचार ने मुस्लिम राजनीतिक असुरक्षा की भावना को मजबूत करने में भूमिका निभाई।

➣ दूसरी ओर, इतिहासकारों का एक महत्वपूर्ण वर्ग यह मानता है कि 1937–39 के पूरे अनुभव को केवल मुस्लिमों पर कांग्रेस के अत्याचार के रूप में समझना उचित नहीं है।

➣ कांग्रेस–मुस्लिम लीग संबंधों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, संगठनात्मक हित, प्रांतीय राजनीति और प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण था। संयुक्त प्रांत में मंत्रालय गठन की विफलता इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

कांग्रेस–लीग संबंधों पर 1937–39 का प्रभाव

➣ 1937 के चुनावों के समय मुस्लिम लीग अभी तक भारत के मुसलमानों की निर्विवाद प्रतिनिधि संस्था नहीं बनी थी। पंजाब और बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों में क्षेत्रीय मुस्लिम दलों का मजबूत प्रभाव था।

➣ लेकिन 1937–39 के कांग्रेस मंत्रिमंडल काल में लीग ने कांग्रेस के विरुद्ध राजनीतिक अभियान चलाकर मुस्लिम जनसमर्थन को अपने पक्ष में संगठित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की।

➣ इस अवधि का महत्व इसलिए भी था कि कांग्रेस–लीग संबंध अब केवल सहयोग और प्रतिनिधित्व की बातचीत का प्रश्न नहीं रह गए थे।

➣ दोनों संगठन तेजी से अलग-अलग राजनीतिक आधारों पर जनता को संगठित करने लगे। कांग्रेस अपने को राष्ट्रीय संगठन के रूप में प्रस्तुत करती रही, जबकि मुस्लिम लीग ने स्वयं को मुसलमानों के विशिष्ट राजनीतिक हितों की प्रतिनिधि संस्था के रूप में स्थापित करने का अभियान तेज किया।

कांग्रेस मंत्रिमंडल और सिख/अन्य अल्पसंख्यक प्रश्न

1937–39 के कांग्रेस मंत्रिमंडलों के सामने केवल प्रशासन चलाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक हितों को लेकर भी प्रश्न उठे।

➣ कांग्रेस स्वयं को एक व्यापक राष्ट्रीय संगठन मानती थी, इसलिए उसका दावा था कि उसकी सरकारें किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि सभी नागरिकों की सरकार हैं।

➣ दूसरी ओर कुछ अल्पसंख्यक राजनीतिक संगठनों को आशंका थी कि बहुमत प्राप्त कांग्रेस प्रांतीय प्रशासन में अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव को अधिक बढ़ा सकती है।

अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और कांग्रेस मंत्रिमंडल

भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत प्रांतीय विधानसभाओं में अलग-अलग समुदायों के लिए प्रतिनिधित्व की व्यवस्था बनी हुई थी।

➣ लेकिन विधानमंडल में प्रतिनिधित्व और मंत्रिमंडल में वास्तविक भागीदारी दो अलग प्रश्न थे। 1937 के चुनावों के बाद कांग्रेस को जिन प्रांतों में बहुमत मिला, वहाँ यह प्रश्न उठा कि मंत्रिमंडलों में अल्पसंख्यक दलों और उनके प्रतिनिधियों को किस प्रकार शामिल किया जाए।

➣ विशेष रूप से संयुक्त प्रांत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मंत्रिमंडल में भागीदारी को लेकर समझौता नहीं हो सका।

➣ कांग्रेस चाहती थी कि लीग के सदस्य कांग्रेस की राजनीतिक अनुशासन व्यवस्था स्वीकार करें, जबकि लीग अपने स्वतंत्र संगठनात्मक अस्तित्व को बनाए रखना चाहती थी। इस असहमति ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को कांग्रेस–लीग राजनीतिक विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया।

➣ कांग्रेस नेतृत्व का तर्क था कि चुने हुए सदस्य केवल सामुदायिक प्रतिनिधि न होकर व्यापक राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा हों, जबकि मुस्लिम लीग अपने संगठन को मुसलमानों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज के रूप में बनाए रखना चाहती थी। इसी मतभेद के कारण कांग्रेस-लीग सहयोग की संभावना कमजोर हुई।

सिख प्रश्न और कांग्रेस

सिखों का प्रश्न इस दौर में मुख्यतः पंजाब की राजनीति से जुड़ा था। पंजाब में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और वहाँ सर सिकंदर हयात खान के नेतृत्व में यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार बनी।

➣ इसलिए 1937–39 के कांग्रेस मंत्रिमंडलों के संदर्भ में सिखों के साथ कांग्रेस सरकार के प्रत्यक्ष प्रशासनिक संबंधों का क्षेत्र सीमित था। इसके बावजूद अखिल भारतीय स्तर पर सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न महत्वपूर्ण बना रहा।

➣ अकाली दल और अन्य सिख नेता स्वतंत्र भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था में सिखों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। इसलिए कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में सिखों की मांगों का भी ध्यान रखना पड़ता था, भले ही पंजाब में स्वयं कांग्रेस की सरकार न हो।

➣ यही कारण था कि 1930 के दशक में सिख प्रतिनिधित्व, पंजाब में राजनीतिक शक्ति-संतुलन और संवैधानिक सुरक्षा जैसे प्रश्न कांग्रेस और अकाली नेतृत्व के बीच चर्चा का हिस्सा बने रहे।

➣ हालांकि यह विवाद कांग्रेस-शासित प्रांतों के दैनिक प्रशासन से अधिक भारत के भावी संवैधानिक ढाँचे से जुड़ा था।

दलित और अन्य सामाजिक अल्पसंख्यक

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने अस्पृश्यता-निवारण, हरिजन कल्याण और शिक्षा से संबंधित कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया। लेकिन डॉ. बी. आर. अंबेडकर जैसे नेताओं का मत था कि केवल सामाजिक सुधार पर्याप्त नहीं हैं।

➣ उनके अनुसार दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी सेवाओं में अवसर और कानूनी सुरक्षा भी चाहिए। इस कारण कांग्रेस की सामाजिक सुधार नीति और अंबेडकर की राजनीतिक रणनीति में अंतर बना रहा।

➣ कांग्रेस सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता पर जोर देती थी, जबकि अंबेडकर यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि दलित समुदाय की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज भी बनी रहे।

➣ अन्य अल्पसंख्यकों- जैसे भारतीय ईसाई, पारसी और एंग्लो-इंडियन– के लिए भी प्रतिनिधित्व और शैक्षिक अधिकार महत्वपूर्ण प्रश्न थे।

➣ कांग्रेस सरकारों को इन समुदायों के हितों तथा व्यापक राष्ट्रीय नीति के बीच संतुलन बनाना पड़ता था। प्रांतीय राजनीति में इन समुदायों की स्थिति प्रांत-दर-प्रांत अलग थी, इसलिए इन्हें एक समान अनुभव के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

अल्पसंख्यक प्रश्न का व्यापक महत्व

➣ 1937–39 का अनुभव यह दिखाता है कि प्रांतीय स्वायत्तता के दौर में बहुमत की सरकार और अल्पसंख्यकों के अधिकार के बीच संतुलन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न बन चुका था।

➣ कांग्रेस का दावा था कि निर्वाचित सरकारें सभी नागरिकों के लिए काम करेंगी, जबकि विभिन्न अल्पसंख्यक राजनीतिक संगठन चाहते थे कि उनकी विशिष्ट पहचान और राजनीतिक हितों के लिए स्पष्ट सुरक्षा भी हो।

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस अनुभव ने आगे की संवैधानिक राजनीति को प्रभावित किया। मुस्लिम राजनीतिक सुरक्षा, दलित प्रतिनिधित्व, सिख safeguards और अन्य अल्पसंख्यक अधिकार

➣ आगे चलकर 1940 के दशक की संवैधानिक वार्ताओं में और अधिक महत्वपूर्ण होते गए।

कांग्रेस मंत्रिमंडल और रियासतों/राष्ट्रीय आंदोलन का संबंध

1937 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन के बाद कांग्रेस की राजनीति में एक नई स्थिति पैदा हुई।

➣ एक ओर कांग्रेस के नेता ब्रिटिश भारत के कुछ प्रांतों में सरकार चला रहे थे, वहीं दूसरी ओर देश के बड़े हिस्से में देशी रियासतें ऐसी शासन-व्यवस्था के अधीन थीं जहाँ जनता को उत्तरदायी सरकार और व्यापक राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।

➣ इसलिए कांग्रेस के सामने यह प्रश्न था कि प्रांतीय शासन और स्वतंत्रता आंदोलन को किस प्रकार साथ-साथ चलाया जाए।

➣ कांग्रेस ने प्रांतीय सत्ता में आने के बावजूद यह नहीं माना कि उसका राष्ट्रीय आंदोलन समाप्त हो गया है। उसके लिए मंत्रिमंडलों का उद्देश्य सीमित संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करके जनता के हित में काम करना था, जबकि अंतिम लक्ष्य अभी भी पूर्ण स्वतंत्रता था।

➣ जवाहरलाल नेहरू ने 1937 में भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस मंत्रिमंडल संवैधानिक ढाँचे के भीतर काम कर रहे हैं, लेकिन ऐसा समय आ सकता है जब यही संविधान उनके हाथ बाँध दे और ब्रिटिश सत्ता से संघर्ष फिर सामने आए।

प्रांतीय सत्ता और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संतुलन

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने प्रशासन संभालने के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय आंदोलन के संगठनात्मक आधार को भी बनाए रखा।

➣ कांग्रेस के मंत्री सरकार चला रहे थे, जबकि कांग्रेस संगठन के कार्यकर्ता जनता के बीच राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियाँ जारी रखे हुए थे। इस प्रकार कांग्रेस ने संवैधानिक राजनीति और जनसंगठन को पूरी तरह अलग नहीं किया।

➣ हालांकि सत्ता में आने से कांग्रेस के सामने एक व्यावहारिक समस्या भी पैदा हुई।

➣ पहले वह ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों का विरोध करने वाली राजनीतिक शक्ति थी, लेकिन अब उसके अपने मंत्रियों को कानून-व्यवस्था, प्रशासन, बजट और सरकारी कर्मचारियों के साथ काम करना पड़ रहा था।

➣ नेहरू ने 1938 में स्वीकार किया कि कांग्रेस मंत्रियों को पुराने औपनिवेशिक प्रशासनिक तंत्र और उसकी कार्यप्रणाली के कारण कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।

➣ इससे कांग्रेस के भीतर भी यह प्रश्न बना रहा कि सरकारी पदों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में अधिक उलझने से जनआंदोलन की धार कमजोर तो नहीं होगी

➣ दूसरी ओर, मंत्रिमंडलों के समर्थकों का मानना था कि प्रशासन चलाने का अनुभव स्वतंत्र भारत के लिए आवश्यक है। इस प्रकार 1937–39 के दौरान कांग्रेस ने आंदोलन और शासन- दोनों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया।

देशी रियासतों का प्रश्न

देशी रियासतें भारत शासन अधिनियम, 1935 की संघीय योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं, लेकिन उनमें से अधिकांश में जनता को ब्रिटिश भारत के प्रांतों जैसी उत्तरदायी शासन व्यवस्था प्राप्त नहीं थी।

➣ कांग्रेस के सामने इसलिए यह प्रश्न था कि स्वतंत्र भारत की उसकी कल्पना में इन रियासतों के करोड़ों लोगों की राजनीतिक स्वतंत्रता को कैसे शामिल किया जाए।

➣ कांग्रेस का मूल दृष्टिकोण यह था कि भारत की स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तक सीमित नहीं हो सकती। रियासतों की जनता को भी नागरिक और राजनीतिक अधिकार मिलने चाहिए।

फरवरी 1938 में हरिपुरा के बाद नेहरू ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस स्वतंत्र भारत की कल्पना में रियासतों को भी शामिल करती है और वहाँ के लोगों को भी वही स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकार मिलने चाहिए जो ब्रिटिश भारत के लोगों को प्राप्त होने चाहिए।

➣ हालांकि कांग्रेस ने रियासतों के आंदोलन के तरीके को ब्रिटिश भारत के प्रांतों से कुछ अलग माना। रियासतों की अपनी शासन-व्यवस्था और परिस्थितियाँ थीं, इसलिए वहाँ के संघर्ष का नेतृत्व मुख्यतः रियासतों की जनता और स्थानीय प्रजामंडलों को करना था।

➣ कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर उनका समर्थन कर सकती थी, लेकिन हर रियासत के संघर्ष को सीधे अपने संगठन के अधीन चलाने की नीति नहीं थी।

हरिपुरा कांग्रेस और रियासतों के जनआंदोलन

हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन (1938) के समय रियासतों का प्रश्न कांग्रेस की राजनीति में अधिक प्रमुख होकर सामने आया।

➣ नेहरू ने स्पष्ट किया कि रियासतों के लोगों की स्वतंत्रता भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से अलग नहीं है। उन्होंने रियासतों में चल रहे जिम्मेदार शासन और नागरिक अधिकारों के आंदोलनों को राष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा माना।

➣ इसी दौर में मैसूर जैसे राज्यों में जिम्मेदार सरकार की मांग को लेकर आंदोलन तेज हुए। कांग्रेस के भीतर रियासतों में हो रहे दमन के प्रति समर्थन बढ़ा।

➣ हालांकि महात्मा गांधी और नेहरू के बीच इस बात पर मतभेद भी दिखाई दिए कि अखिल भारतीय कांग्रेस को रियासतों के आंतरिक संघर्षों में किस सीमा तक प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करना चाहिए।

➣ इस नीति का मूल आधार यह था कि रियासतों की जनता स्वयं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करे, जबकि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर उनके संघर्ष को राजनीतिक समर्थन दे।

➣ इस प्रकार कांग्रेस ने रियासतों के प्रश्न को अपने व्यापक स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ते हुए भी स्थानीय आंदोलनों की स्वतंत्र भूमिका को बनाए रखने की कोशिश की।

कांग्रेस मंत्रिमंडलों का राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव

➣ प्रांतीय सत्ता में आने से कांग्रेस को पहली बार बड़े पैमाने पर प्रशासन चलाने का अनुभव मिला। इससे उसके नेताओं को बजट, शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक मशीनरी के व्यावहारिक पक्षों को समझने का अवसर मिला।

➣ यह अनुभव आगे चलकर स्वतंत्र भारत में शासन चलाने के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ।

➣ दूसरी ओर, कांग्रेस के भीतर यह समझ भी मजबूत हुई कि औपनिवेशिक संविधान के भीतर सीमित सत्ता से पूर्ण राष्ट्रीय परिवर्तन संभव नहीं है।

➣ नेहरू ने 1938 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों की उपलब्धियों के साथ उनकी सीमाओं की ओर भी ध्यान दिलाया और कहा कि गवर्नरों की शक्तियाँ तथा पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था बड़े बदलावों के रास्ते में बाधा बन रही थीं।

➣ इस अनुभव ने कांग्रेस को दो समानांतर रास्तों का अनुभव दिया- संवैधानिक सत्ता का उपयोग और जनआंदोलन की तैयारी। सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से जनता के बीच अपनी छवि मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न को पीछे नहीं छोड़ा।

पहलू मुख्य तथ्य
मुख्य स्थिति 1937 के बाद कांग्रेस एक साथ सरकार भी चला रही थी और स्वतंत्रता आंदोलन भी जारी रख रही थी
रियासतों के प्रति दृष्टिकोण रियासतों की जनता को भी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकार मिलने चाहिए
स्थानीय भूमिका रियासतों में संघर्ष का नेतृत्व मुख्यतः स्थानीय जनता/प्रजामंडलों द्वारा
हरिपुरा, 1938 रियासतों के प्रश्न को राष्ट्रीय स्वतंत्रता से स्पष्ट रूप से जोड़ा गया
महत्वपूर्ण उदाहरण मैसूर में जिम्मेदार शासन का आंदोलन
मुख्य चुनौती औपनिवेशिक प्रशासन और गवर्नरों की विशेष शक्तियाँ
1939 द्वितीय विश्व युद्ध के प्रश्न पर कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा
निष्कर्ष प्रांतीय सत्ता अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष का एक चरण थी

द्वितीय विश्व युद्ध और कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा (1939)

1 सितंबर 1939 को जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। 3 सितंबर 1939 को ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।

➣ उसी दिन भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने बिना भारतीय राजनीतिक नेतृत्व से परामर्श किए भारत को भी युद्धरत घोषित कर दिया।

➣ यह निर्णय कांग्रेस के लिए गंभीर राजनीतिक प्रश्न था। उस समय कांग्रेस के सात प्रांतों में मंत्रिमंडल कार्य कर रहे थे, लेकिन वायसराय ने इन निर्वाचित प्रांतीय सरकारों या भारतीय जनता के प्रतिनिधियों से युद्ध में भारत की भागीदारी के बारे में कोई पूर्व अनुमति नहीं ली

➣ कांग्रेस ने इसे इस बात का प्रमाण माना कि 1935 के अधिनियम के तहत मिली प्रांतीय स्वायत्तता वास्तव में सीमित थी।

कांग्रेस की प्रारंभिक प्रतिक्रिया

➣ कांग्रेस ने युद्ध को केवल यूरोपीय शक्ति-संघर्ष के रूप में नहीं देखा। उसका मुख्य प्रश्न यह था कि यदि ब्रिटेन स्वयं लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर युद्ध लड़ रहा है, तो भारत को उसी समय स्वतंत्रता से वंचित क्यों रखा जा रहा है।

➣ इसलिए कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से भारत के संवैधानिक भविष्य के बारे में स्पष्ट घोषणा की मांग की।

➣ कांग्रेस कार्यसमिति ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय जनता की स्वतंत्र राजनीतिक इच्छा को स्वीकार किए बिना भारत को युद्ध में झोंकना स्वीकार्य नहीं है।

➣ कांग्रेस का रुख यह था कि भारत को युद्ध में सहयोग देने का प्रश्न तभी उठ सकता है जब ब्रिटिश सरकार भारतीयों को उनके राजनीतिक भविष्य पर वास्तविक अधिकार देने के लिए तैयार हो।

➣ इस प्रकार कांग्रेस ने युद्ध में तुरंत सहयोग करने के बजाय ब्रिटिश सरकार से युद्ध के उद्देश्य, भारत की स्वतंत्रता और भावी संवैधानिक व्यवस्था पर स्पष्ट नीति बताने की मांग की।

➣ कांग्रेस नेतृत्व यह जानना चाहता था कि जिस स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए ब्रिटेन युद्ध कर रहा है, उसमें भारत को भी स्वतंत्रता कब और किस रूप में मिलेगी।

वायसराय से वार्ता और कांग्रेस की मांगें

➣ कांग्रेस और वायसराय के बीच बातचीत हुई, लेकिन कांग्रेस की मूल मांगों पर सहमति नहीं बन सकी।

➣ कांग्रेस का आग्रह था कि भारत के राजनीतिक भविष्य का निर्णय भारतीयों की सहमति से होना चाहिए तथा युद्ध के बाद किसी अस्पष्ट वादे के बजाय भारत को वास्तविक संवैधानिक अधिकार दिए जाने चाहिए।

17 अक्टूबर 1939 को लॉर्ड लिनलिथगो ने ब्रिटिश सरकार की ओर से एक वक्तव्य जारी किया। इसमें युद्ध के उद्देश्यों और भारत के संवैधानिक भविष्य के प्रश्न पर व्यापक आश्वासन दिए गए, लेकिन कांग्रेस को यह पर्याप्त नहीं लगा।

➣ वायसराय ने तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता या संविधान सभा के माध्यम से भारतीयों को अपना संविधान बनाने का स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया। इसके बजाय विभिन्न भारतीय समुदायों, राजनीतिक दलों और हित-समूहों से परामर्श की बात कही गई।

➣ कांग्रेस कार्यसमिति ने वायसराय के इस वक्तव्य को असंतोषजनक माना। जवाहरलाल नेहरू ने भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस केवल वायसराय की कार्यकारिणी में कुछ पद प्राप्त करने से संतुष्ट नहीं होगी, उसका प्रश्न भारत की वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता का था।

कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे

➣ ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस की मांगों पर संतोषजनक उत्तर न दिए जाने के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडलों को इस्तीफा देने का निर्देश दिया। इस्तीफे अक्टूबर और नवंबर 1939 के दौरान क्रमशः दिए गए।

➣ जवाहरलाल नेहरू के 3 नवंबर 1939 के पत्र में भी स्पष्ट रूप से कहा गया कि वायसराय के वक्तव्य को असंतोषजनक मानते हुए कांग्रेस मंत्रिमंडलों को इस्तीफा देने के लिए कहा गया।

मद्रास का कांग्रेस मंत्रालय सबसे पहले 27 अक्टूबर 1939 को इस्तीफा देने वालों में था। इसके बाद संयुक्त प्रांत ने 30 अक्टूबर, जबकि बंबई और बिहार ने 31 अक्टूबर को इस्तीफा दिया।

उड़ीसा का मंत्रालय 5 नवंबर और मध्य प्रांत एवं बरार का मंत्रालय 9 नवंबर को समाप्त हुआ। इस प्रकार नवंबर के प्रारंभ तक कांग्रेस के सभी सात प्रांतीय मंत्रिमंडल सत्ता से बाहर हो गए।

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे के बाद इन प्रांतों में गवर्नरों ने 1935 के अधिनियम की धारा 93 के तहत शासन अपने हाथ में ले लिया।

➣ ब्रिटिश संसद में नवंबर 1939 में स्पष्ट किया गया कि जहाँ कांग्रेस मंत्रालयों ने इस्तीफा दिया, वहाँ गवर्नरों ने अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रशासन संभाला।

इस्तीफे का राजनीतिक महत्व

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा केवल प्रांतीय सरकारों से हटने की घटना नहीं थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि कांग्रेस प्रांतीय सत्ता को अपना अंतिम राजनीतिक लक्ष्य नहीं मानती थी

➣ जब उसे लगा कि ब्रिटिश सरकार भारत को स्वतंत्रता और वास्तविक संवैधानिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं है, तो उसने प्रशासनिक पदों की अपेक्षा राष्ट्रीय राजनीतिक मांग को प्राथमिकता दी।

➣ इस घटना से 1935 के अधिनियम के तहत प्रांतीय स्वायत्तता की सीमाएँ भी उजागर हुईं। भारतीय मंत्रिमंडल चुनाव जीतकर सरकार चला सकते थे, लेकिन भारत की विदेश नीति और युद्ध में भागीदारी जैसे मूल प्रश्नों पर अंतिम अधिकार ब्रिटिश सरकार के पास ही था।

➣ इससे कांग्रेस का यह तर्क मजबूत हुआ कि सीमित प्रांतीय स्वायत्तता स्वतंत्रता का विकल्प नहीं हो सकती।

➣ दूसरी ओर, इस्तीफों ने कांग्रेस को सीधे प्रांतीय प्रशासन की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया और वह फिर से राष्ट्रीय आंदोलन तथा ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की स्थिति में आ गई।

➣ आगे चलकर युद्धकालीन राजनीति में यही परिस्थिति व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940) और फिर भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की पृष्ठभूमि से जुड़ी।

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे का मुस्लिम लीग ने अलग राजनीतिक अर्थ निकाला। कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे को मुस्लिम लीग ने अपने राजनीतिक अभियान के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा।

22 दिसंबर 1939 को मुस्लिम लीग ने Day of Deliverance (मुक्ति दिवस) मनाया। इसका उद्देश्य कांग्रेस शासन की समाप्ति को मुस्लिमों के लिए राहत के रूप में प्रस्तुत करना था। इससे कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक दूरी और स्पष्ट हो गई।

➣ इस प्रकार जहाँ कांग्रेस के लिए इस्तीफा ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति के विरोध का कदम था, वहीं मुस्लिम लीग ने इसे कांग्रेस शासन से मुक्ति के रूप में प्रचारित किया।

➣ यह राजनीतिक व्याख्या आगे चलकर कांग्रेस–मुस्लिम लीग संबंधों के और अधिक बिगड़ने तथा पाकिस्तान की मांग के उभार की पृष्ठभूमि से जुड़ी।

तिथि घटना
1 सितंबर 1939 जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया, द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत
3 सितंबर 1939 ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा, लिनलिथगो ने भारत को भी युद्धरत घोषित किया
17 अक्टूबर 1939 वायसराय का संवैधानिक/युद्ध संबंधी वक्तव्य
27 अक्टूबर 1939 मद्रास मंत्रालय का इस्तीफा
30 अक्टूबर 1939 संयुक्त प्रांत मंत्रालय का इस्तीफा
31 अक्टूबर 1939 बंबई और बिहार मंत्रालयों के इस्तीफे
5 नवंबर 1939 उड़ीसा मंत्रालय का इस्तीफा
9 नवंबर 1939 मध्य प्रांत एवं बरार मंत्रालय का इस्तीफा
नवंबर 1939 सातों कांग्रेस मंत्रिमंडल सत्ता से बाहर
22 दिसंबर 1939 मुस्लिम लीग का मुक्ति दिवस

1937 के चुनावों का व्यापक राजनीतिक महत्व

➣ 1937 के चुनाव केवल विधानसभाओं के गठन के लिए नहीं थे। इनके माध्यम से भारतीय राजनीतिक दलों की वास्तविक जन-स्वीकार्यता और संगठनात्मक शक्ति की भी परीक्षा हुई।

➣ चुनावों के बाद बनने वाली सरकारों के माध्यम से भारतीय नेताओं को पहली बार बड़े पैमाने पर प्रशासन चलाने और जनता की समस्याओं पर नीतियाँ बनाने का अवसर मिला।

➣ दूसरी ओर, चुनावों ने यह भी दिखाया कि भारतीय राजनीति एकरूप नहीं थी। कांग्रेस, मुस्लिम लीग, जस्टिस पार्टी, यूनियनिस्ट पार्टी और अनेक क्षेत्रीय एवं सामुदायिक दलों ने अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के बीच अपना प्रभाव बनाए रखा।

➣ इसलिए 1937 के चुनावों ने आगे के वर्षों में बनने वाले राजनीतिक गठबंधनों और मतभेदों की पृष्ठभूमि भी तैयार की।

➣ चुनावों का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि कांग्रेस ने 11 में से 5 प्रांतों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और बाद में अन्य कुछ प्रांतों में भी सरकार बनाने में सफल हुई। इससे कांग्रेस को पहली बार बड़े पैमाने पर प्रांतीय शासन का प्रत्यक्ष अनुभव मिला।

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