खिलाफत एवं असहयोग आंदोलन : परिचय
➣ प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के बाद भारत का राष्ट्रीय आंदोलन एक नए चरण में प्रवेश कर रहा था। इस समय एक ओर भारतीय मुसलमानों में खिलाफत प्रश्न को लेकर असंतोष बढ़ रहा था,
➣ वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के कारण भारतीयों में असंतोष और राष्ट्रीय चेतना लगातार मजबूत हो रही थी।
➣ इसी परिस्थिति में खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन एक-दूसरे से जुड़ गए। महात्मा गांधी ने खिलाफत नेताओं के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एक व्यापक जनआंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया।
➣ इस आंदोलन के माध्यम से पहली बार राष्ट्रीय आंदोलन को बड़े पैमाने पर किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, महिलाओं और आम जनता से जोड़ने का प्रयास किया गया।
➣ 1919 से 1922 के बीच की इस अवधि ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप और दिशा को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया।
➣ इस दौरान खिलाफत आंदोलन, असहयोग आंदोलन, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, सरकारी संस्थाओं एवं उपाधियों का त्याग तथा व्यापक जनभागीदारी जैसी प्रमुख घटनाएँ सामने आईं।
पृष्ठभूमि
➣ खिलाफत आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन -दोनों अलग-अलग मुद्दों से जुड़े होते हुए भी, 1919 से 1922 के मध्य एक संयुक्त तथा अहिंसक आंदोलन के रूप में उभरे, जिसने पहली बार हिंदू-मुस्लिम एकता को एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में जोड़ा।
➣ इनकी पृष्ठभूमि में अंतरराष्ट्रीय (तुर्की/खिलाफत से जुड़ी) तथा घरेलू (भारतीय राजनीतिक असंतोष से जुड़ी) – दोनों प्रकार की परिस्थितियां शामिल थीं।
प्रथम विश्व युद्ध तथा तुर्की के खिलाफत पर संकट – अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) में उस्मानी साम्राज्य (ऑटोमन साम्राज्य) ने जर्मनी का साथ दिया था, जबकि ब्रिटेन उसके विपक्ष में लड़ा था। तुर्की का सुल्तान (खलीफा) विश्व के मुसलमानों द्वारा इस्लाम का धार्मिक तथा राजनीतिक प्रमुख माना जाता था, और मक्का-मदीना जैसे पवित्र स्थल भी उसी के अधिकार-क्षेत्र में थे।
➣ प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद उसके भविष्य का प्रश्न सामने आया। मित्र राष्ट्रों की नीतियों का उद्देश्य उस्मानी साम्राज्य की शक्ति और क्षेत्रीय विस्तार को सीमित करना था। इससे खलीफा की राजनीतिक स्थिति पर संकट गहराने लगा।
➣ 1919 की पेरिस शांति वार्ता में तुर्की के भविष्य का प्रश्न महत्वपूर्ण रहा। मित्र राष्ट्रों के बीच तुर्की के क्षेत्रों के पुनर्वितरण तथा उसके साम्राज्य को कमजोर करने की योजनाओं पर विचार किया गया।
➣ मई 1920 तक तुर्की के लिए प्रस्तावित शांति-शर्तें ओर स्पष्ट हो गईं। इन शर्तों के अंतर्गत तुर्की के क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर सीमित करने और उसके साम्राज्य को गंभीर रूप से कमजोर करने का प्रावधान था।
➣ इन शर्तों को औपचारिक रूप से 10 अगस्त, 1920 को सेव्र की संधि के रूप में तुर्की पर लागू किया गया। इस संधि के अंतर्गत उस्मानी साम्राज्य के बड़े हिस्से को अलग कर दिया गया और तुर्की की राजनीतिक तथा क्षेत्रीय शक्ति को गंभीर रूप से सीमित कर दिया गया।
➣ इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार, उस्मानी साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया, खलीफा की स्थिति पर संकट और सेव्र की संधि ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खिलाफत प्रश्न को गंभीर बना दिया।
भारत में खिलाफत प्रश्न को लेकर बढ़ती चिंता
तुर्की के भविष्य और खलीफा की स्थिति को लेकर चिंता का असर भारत में भी दिखाई देने लगा। भारतीय मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के लिए खिलाफत का प्रश्न केवल तुर्की की राजनीति का मुद्दा नहीं था, बल्कि खलीफा की धार्मिक स्थिति और इस्लाम के पवित्र स्थलों से जुड़ा विषय था।
➣ ब्रिटिश सरकार की तुर्की संबंधी नीतियों से भारतीय मुसलमानों में गहरी चिंता पैदा हुई। इसका प्रमाण तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड के 31 जनवरी, 1919 के पत्र से मिलता है, जिसमें उन्होंने भारत में मुस्लिम भावना के तुर्की साम्राज्य के विघटन की आशंका से गंभीर रूप से विचलित होने का उल्लेख किया था।
➣ 1918–1919 ई. के दौरान भारतीय मुसलमानों के बीच खिलाफत प्रश्न को लेकर सभाएँ और बैठकें होने लगीं। इस प्रकार खिलाफत प्रश्न धीरे-धीरे भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया।
भारतीय राजनीतिक असंतोष – घरेलू पृष्ठभूमि
➣ खिलाफत के मुद्दे के साथ-साथ, इसी दौर में भारत में ब्रिटिश सरकार के प्रति असंतोष भी तेजी से बढ़ रहा था। रॉलेट एक्ट, पंजाब में जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसी घटनाओं ने ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीयों के असंतोष को और गहरा कर दिया।
➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार तथा भारत शासन अधिनियम, 1919 भी भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सके। सुधारों से अपेक्षित राजनीतिक अधिकार न मिलने के कारण राजनीतिक निराशा और बढ़ी।
तुर्की के भविष्य और खलीफा की स्थिति को लेकर भारतीय मुसलमानों की चिंता धीरे-धीरे एक संगठित राजनीतिक आंदोलन में बदलने लगी।
खिलाफत नेताओं ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने के लिए देशव्यापी संगठन और जनमत तैयार करने का प्रयास किया। इसी क्रम में खिलाफत समितियों का गठन हुआ और आगे चलकर यह आंदोलन एक व्यापक राजनीतिक अभियान बन गया।
खिलाफत समिति का गठन
➣ 1919 ई. में खिलाफत प्रश्न को लेकर विभिन्न स्थानों पर बैठकों और सम्मेलनों का आयोजन शुरू हुआ। इसी क्रम में ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी का गठन किया गया, जिसने खिलाफत प्रश्न को देशव्यापी स्तर पर उठाने के लिए संगठनात्मक आधार तैयार किया।
➣ खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आजाद, हकीम अजमल खाँ और हसरत मोहानी जैसे नेता शामिल थे। इन नेताओं ने खिलाफत प्रश्न को व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ नवंबर 1919 में दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि यदि ब्रिटिश सरकार खिलाफत की मांगों को स्वीकार नहीं करती है, तो उसके साथ समस्त सहयोग वापस ले लिया जाएगा। यहीं से आगे चलकर असहयोग की राजनीतिक रणनीति का बीजारोपण हुआ।
➣ इस निर्णय के माध्यम से खिलाफत नेताओं ने पहली बार ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध केवल मांग और विरोध तक सीमित न रहकर सहयोग समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत दिया।
खिलाफत आंदोलन ने असहयोग की नीति का बीज बोया था, जिसे महात्मा गांधी ने अपने नेतृत्व में एक व्यापक जनआंदोलन का रूप दे दिया। यही आगे चलकर असहयोग आंदोलन के रूप में सामने आया।
खिलाफत आंदोलन की प्रमुख मांगें
खिलाफत नेताओं की मांगों का मुख्य केंद्र तुर्की के सुल्तान की खिलाफत संबंधी स्थिति और इस्लाम के पवित्र स्थलों की सुरक्षा था। उनका मानना था कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के साथ ऐसी शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए, जिनसे खलीफा की धार्मिक एवं राजनीतिक स्थिति पूरी तरह समाप्त हो जाए।
➣ तुर्की साम्राज्य की अखंडता बनाए रखना – खिलाफत समर्थक चाहते थे कि तुर्की के क्षेत्रों को इस प्रकार विभाजित न किया जाए जिससे उस्मानी साम्राज्य पूरी तरह कमजोर हो जाए।
➣ खलीफा की प्रतिष्ठा और अधिकार बनाए रखना – तुर्की के सुल्तान की खलीफा के रूप में स्थिति को बनाए रखने तथा उसके धार्मिक अधिकारों का सम्मान करने की मांग की गई।
➣ इस्लाम के पवित्र स्थलों की सुरक्षा – मक्का, मदीना तथा अन्य पवित्र स्थलों पर खलीफा के धार्मिक अधिकार और मुस्लिम नियंत्रण को बनाए रखने की मांग की गई।
➣ तुर्की पर कठोर शांति-शर्तें न थोपना – खिलाफत नेताओं की मांग थी कि युद्ध के बाद तुर्की के साथ ऐसा व्यवहार न किया जाए जिससे उसकी राजनीतिक स्थिति और खलीफा की प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुँचे।
➣ ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए आश्वासनों का पालन – खिलाफत नेताओं का तर्क था कि युद्ध के दौरान ब्रिटिश नेताओं द्वारा तुर्की और खिलाफत के संबंध में दिए गए आश्वासनों को ध्यान में रखते हुए युद्ध के बाद तुर्की के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए।
इन मांगों के पूरा न होने पर खिलाफत नेताओं ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध राजनीतिक दबाव और असहयोग का रास्ता अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। आगे चलकर यही विचार खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन के बीच घनिष्ठ संबंध का आधार बना।
असहयोग आंदोलन का प्रारंभ
➣ प्रारंभ में महात्मा गांधी खिलाफत के मुद्दे पर अपेक्षाकृत सतर्क रुख अपनाए हुए थे, यद्यपि वे अखिल भारतीय खिलाफत समिति के नेतृत्व में सक्रिय हो चुके थे। उन्होंने इस मुद्दे में हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर देखा।
➣ फरवरी 1920 में गांधीजी ने स्पष्ट किया कि खिलाफत का प्रश्न अब पंजाब के अन्याय तथा संवैधानिक सुधारों के प्रश्नों से भी आगे बढ़कर सर्वोपरि हो गया है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि शांति-संधि की शर्तें भारतीय मुसलमानों को संतुष्ट नहीं करतीं, तो वे शीघ्र ही असहयोग आंदोलन का नेतृत्व करेंगे।
➣ अप्रैल 1920 में शौकत अली ने घोषणा की कि यदि ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो संयुक्त हिंदू-मुस्लिम असहयोग आंदोलन शुरू किया जाएगा और उसका नेतृत्व महात्मा गांधी करेंगे। गांधीजी का नेतृत्व दोनों समुदायों के लिए स्वीकार्य माना जा रहा था।
➣ सेव्र की संधि की कठोर शर्तें और हंटर कमेटी की रिपोर्ट लगभग एक ही समय में सामने आने से भारतीयों में ब्रिटिश सरकार के प्रति असंतोष और बढ़ गया। इससे गांधीजी ने खिलाफत प्रश्न को और अधिक गंभीरता से लिया और असहयोग को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
➣ इसके बाद खिलाफत नेताओं और गांधीजी ने इस प्रश्न को केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित रखने के बजाय इसे व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया। अब आवश्यकता थी कि कांग्रेस भी इस नीति को स्वीकार करे और उसे देशव्यापी राजनीतिक कार्यक्रम का रूप दिया जाए।
असहयोग आंदोलन की शुरुआत 1 अगस्त 1920 को हो चुकी थी। सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में कांग्रेस ने इसे सिद्धांत/कार्यक्रम के रूप में मंजूरी दी और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में इसे कांग्रेस के कार्यक्रम के रूप में अंतिम स्वीकृति मिली।
कलकत्ता विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920)
सितंबर 1920 में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन कलकत्ता में आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की। इस अधिवेशन में गांधीजी ने असहयोग को कांग्रेस की राजनीतिक नीति के रूप में स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा।
➣ प्रस्ताव पर कांग्रेस के भीतर तीखा मतभेद सामने आया। सी. आर. दास के अलावा विपिनचंद्र पाल और मुहम्मद अली जिन्ना ने भी असहयोग प्रस्ताव का विरोध किया।
➣ विरोध के बावजूद कांग्रेस ने गांधीजी के असहयोग प्रस्ताव को सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया। इस निर्णय के बाद आंदोलन को देशव्यापी स्तर पर आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ।
➣ असहयोग प्रस्ताव के विरोध के कारण एनी बेसेंट, मुहम्मद अली जिन्ना, विपिनचंद्र पाल, एन. चंदावरकर और शंकर नायर जैसे नेताओं ने कांग्रेस से अलग होने का निर्णय लिया।
नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920)
➣ दिसंबर 1920 में कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता सी. विजयराघवाचारी ने की। इस अधिवेशन में असहयोग की नीति को अंतिम रूप से स्वीकार कर इसे कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा बना दिया गया।
➣ उल्लेखनीय है कि सी. आर. दास, जिन्होंने कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव का विरोध किया था, नागपुर अधिवेशन में इसके समर्थक बन गए।
➣ नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस के संगठन में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। कांग्रेस की सदस्यता को व्यापक बनाया गया तथा भाषाई आधार पर प्रांतीय कांग्रेस समितियों के पुनर्गठन का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य कांग्रेस को आम जनता के बीच अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचाना था।
➣ इस प्रकार 1920 के मध्य तक खिलाफत प्रश्न, पंजाब के अन्याय और ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते असंतोष ने गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग की नीति के लिए आधार तैयार कर दिया। कलकत्ता में इसे प्रारंभिक कांग्रेस स्वीकृति मिली और नागपुर में इसे अंतिम रूप से स्वीकार कर देशव्यापी आंदोलन का रूप देने की दिशा तय हुई।
असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम
➣ असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम को मुख्य रूप से दो भागों में देखा जा सकता है – रचनात्मक कार्यक्रम और नकारात्मक कार्यक्रम। रचनात्मक कार्यक्रमों का उद्देश्य राष्ट्रीय संस्थाओं और स्वदेशी गतिविधियों को बढ़ावा देना था, जबकि नकारात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के साथ भारतीयों का सहयोग समाप्त करना था।
➣ रचनात्मक कार्यक्रम में राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना, पंचायती अदालतों की स्थापना, अस्पृश्यता का अंत, हिंदू-मुस्लिम एकता, स्वदेशी का प्रसार तथा कताई-बुनाई जैसे कार्य प्रमुख थे। चरखा और खादी को भी आत्मनिर्भरता तथा स्वदेशी भावना से जोड़ा गया।
➣ नकारात्मक कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी उपाधियों एवं प्रशस्ति-पत्रों का त्याग, सरकारी स्कूलों-कॉलेजों, अदालतों, विदेशी वस्त्रों एवं विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा सरकारी उत्सवों से दूरी बनाए रखने जैसे कार्यक्रम अपनाए गए।
➣ असहयोग आंदोलन के दौरान कई प्रतिष्ठित भारतीयों ने सरकारी सम्मान और उपाधियाँ वापस कर दीं। महात्मा गांधी ने कैसर-ए-हिंद, जूलू युद्ध पदक तथा बोअर युद्ध पदक वापस किए, जबकि जमनालाल बजाज ने रायबहादुर की उपाधि लौटा दी।
➣ सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार का प्रभाव पंजाब, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार और उड़ीसा सहित कई क्षेत्रों में दिखाई दिया। शिक्षा के क्षेत्र में बहिष्कार का प्रभाव बंगाल में सबसे अधिक और मद्रास में तुलनात्मक रूप से सबसे कम रहा।
➣ विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार असहयोग आंदोलन के सबसे प्रभावी कार्यक्रमों में रहा। कई स्थानों पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और लोगों को स्वदेशी वस्त्र तथा खादी अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। गांधीजी विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार को ब्रिटिश आर्थिक हितों को कमजोर करने का महत्वपूर्ण साधन मानते थे। दूसरी ओर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने विदेशी वस्त्रों को जलाने की प्रवृत्ति को अविवेकी और निष्ठुर बर्बादी माना।
➣ सरकारी अदालतों के बहिष्कार का भी आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान था। सी. आर. दास, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, जयकर, सैफुद्दीन किचलू, सी. राजगोपालाचारी, टी. प्रकाशम, आसफ अली, राजेंद्र प्रसाद तथा विठ्ठलभाई पटेल जैसे कई वरिष्ठ वकीलों ने वकालत छोड़कर आंदोलन में भाग लिया।
➣ सुभाष चंद्र बोस ने 1920 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया था, लेकिन ब्रिटिश शासन के अधीन सेवा करने के बजाय राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने के उद्देश्य से अप्रैल 1921 में ICS से त्यागपत्र दे दिया। भारत लौटने के बाद वे असहयोग आंदोलन से जुड़े और चित्तरंजन दास के साथ राजनीतिक कार्य करने लगे।
➣ बाल गंगाधर तिलक ने असहयोग आंदोलन का समर्थन किया था, लेकिन 1 अगस्त, 1920 को उनके निधन के कारण वे आंदोलन के आगे के विकास को नहीं देख सके। उनके निधन के बाद गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने असहयोग की नीति को आगे बढ़ाया।
➣ आंदोलन के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने के उद्देश्य से 1921 ई. में तिलक स्वराज कोष की स्थापना की गई। इसका लक्ष्य एक करोड़ रुपये एकत्र करना था और लगभग छह महीने के भीतर निर्धारित राशि जुटा ली गई। जो उस समय के हिसाब से एक बहुत बड़ी और लगभग असंभव लगने वाली राशि थी।
➣ असहयोग आंदोलन के दौरान 17 नवंबर, 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन के अवसर पर देश के अनेक हिस्सों में हड़ताल और विरोध प्रदर्शन हुए। यह आंदोलन के दौरान हुए प्रमुख अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शनों में से एक था।
➣ असहयोग आंदोलन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना भी था। खिलाफत और असहयोग आंदोलनों के साथ आने से दोनों समुदायों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी। इसी वातावरण में स्वामी श्रद्धानंद को मुसलमानों द्वारा जामा मस्जिद में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया।
➣ इसी दौर में सिख समुदाय से जुड़ी एक उल्लेखनीय घटना के रूप में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की चाबियाँ मुस्लिम नेता डॉ. सैफुद्दीन किचलू को सौंपे जाने का उल्लेख मिलता है। यह उस समय विकसित हुई हिंदू-मुस्लिम-सिख राजनीतिक एकजुटता का प्रतीक माना गया।
असहयोग आंदोलन का विस्तार
असहयोग आंदोलन शुरू होने के बाद यह धीरे-धीरे शहरों से निकलकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचने लगा। कांग्रेस के संगठनात्मक विस्तार, खिलाफत नेताओं की सक्रियता और गांधीजी के व्यापक जनसंपर्क के कारण आंदोलन को कई क्षेत्रों में अच्छा समर्थन मिला। अब राष्ट्रीय आंदोलन में केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि विद्यार्थी, वकील, व्यापारी, महिलाएँ और आम जनता भी बड़ी संख्या में शामिल होने लगी।
➣ बंगाल, पंजाब, संयुक्त प्रांत, बिहार, उड़ीसा और बंबई जैसे क्षेत्रों में आंदोलन की गतिविधियाँ तेज रहीं। सरकारी शिक्षण संस्थाओं और अदालतों के बहिष्कार के साथ विदेशी वस्तुओं के विरोध तथा स्वदेशी के प्रचार ने आंदोलन को स्थानीय स्तर तक पहुँचाया।
➣ आंदोलन के दौरान अनेक वरिष्ठ वकीलों द्वारा वकालत छोड़ना विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। सी. आर. दास, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद तथा अन्य प्रमुख वकीलों के आंदोलन में शामिल होने से इसका प्रभाव शिक्षित और पेशेवर वर्ग में भी बढ़ा।
➣ विद्यार्थियों ने भी सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार में भाग लिया। कई स्थानों पर विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़कर राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं का रुख किया। इससे राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को भी असहयोग आंदोलन के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिला।
➣ विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार ने आंदोलन को आर्थिक स्वरूप दिया। विदेशी कपड़ों की दुकानों के सामने धरने दिए गए और लोगों को विदेशी वस्त्रों के स्थान पर खादी तथा स्वदेशी वस्त्र अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। कई स्थानों पर विदेशी कपड़ों की होली भी जलाई गई।
➣ 17 नवंबर, 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन के अवसर पर देश के अनेक हिस्सों में हड़ताल और विरोध प्रदर्शन हुए। इस बहिष्कार ने यह दिखाया कि असहयोग आंदोलन अब व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर चुका था।
➣ आंदोलन ने पहली बार कांग्रेस को बड़े पैमाने पर आम जनता से जोड़ दिया। अब कांग्रेस को केवल शिक्षित और सीमित राजनीतिक वर्ग का संगठन कहना कठिन हो गया था। किसान, व्यापारी, विद्यार्थी, महिलाएँ तथा विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समूह अपने-अपने स्तर पर आंदोलन से जुड़ने लगे।
➣ हालांकि आंदोलन का प्रभाव सभी क्षेत्रों में समान नहीं था। महाराष्ट्र में यह तुलनात्मक रूप से कमजोर रहा, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के कारण आंदोलन ने अधिक व्यापक रूप लिया। इस तरह असहयोग आंदोलन का विस्तार एक समान गति से नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार हुआ।
असहयोग आंदोलन की सीमाएँ एवं समस्याएँ
➣ असहयोग आंदोलन को देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापक समर्थन मिला, लेकिन इसका प्रभाव हर क्षेत्र और हर वर्ग में समान नहीं था। अलग-अलग स्थानों पर आंदोलन के उद्देश्य और स्वरूप को लेकर भी अंतर दिखाई दिया।
➣ आंदोलन में शामिल विभिन्न वर्गों की अपनी-अपनी स्थानीय समस्याएँ थीं। कई जगह किसानों ने लगान, जमींदारी शोषण और बेदखली जैसे मुद्दों को आंदोलन से जोड़ लिया, जबकि कांग्रेस का केंद्रीय कार्यक्रम मुख्य रूप से ब्रिटिश शासन के साथ असहयोग पर केंद्रित था। इससे कुछ क्षेत्रों में आंदोलन का स्वरूप स्थानीय किसान आंदोलनों जैसा भी हो गया।
➣ गांधीजी आंदोलन को लगातार अहिंसक बनाए रखना चाहते थे, लेकिन बड़े पैमाने पर जनता के शामिल होने के कारण कई स्थानों पर आंदोलनकारियों में अनुशासन बनाए रखना कठिन होने लगा। स्थानीय शिकायतों और प्रशासन के दमन के कारण कुछ जगह तनाव और हिंसक घटनाएँ भी सामने आईं।
➣ कांग्रेस के भीतर भी असहयोग की नीति को लेकर शुरुआत से पूरी सहमति नहीं थी। सी. आर. दास, विपिनचंद्र पाल और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं ने प्रारंभ में इसका विरोध किया था। हालांकि बाद में कुछ नेताओं के रुख में परिवर्तन आया, फिर भी आंदोलन की रणनीति को लेकर मतभेद बने रहे।
➣ महाराष्ट्र जैसे कुछ क्षेत्रों में आंदोलन अपेक्षाकृत कमजोर रहा। इससे यह स्पष्ट हुआ कि गांधीजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन खड़ा होने के बावजूद देश के सभी हिस्सों में उसकी राजनीतिक पकड़ समान नहीं थी।
➣ आंदोलन की एक बड़ी चुनौती यह भी थी कि ब्रिटिश सरकार ने दमन और गिरफ्तारियों के माध्यम से इसे नियंत्रित करने का प्रयास किया। नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियों के कारण कई स्थानों पर आंदोलन की गति प्रभावित हुई।
➣ सबसे महत्वपूर्ण समस्या अहिंसा बनाए रखने की थी। गांधीजी के लिए आंदोलन की सफलता केवल ब्रिटिश संस्थाओं का बहिष्कार करने में नहीं, बल्कि अनुशासित और अहिंसक जनसंघर्ष बनाए रखने में थी। जब कुछ स्थानों पर आंदोलन हिंसक होने लगा, तो गांधीजी के सामने आंदोलन को जारी रखने और उसकी अहिंसक प्रकृति बनाए रखने के बीच कठिन स्थिति पैदा हो गई।
चौरी-चौरा कांड (5 फरवरी, 1922)
असहयोग आंदोलन के दौरान 1921 के अंत और 1922 की शुरुआत तक आंदोलन अपने व्यापक चरण में पहुँच चुका था। गांधीजी अब आंदोलन को अगले चरण में ले जाने की तैयारी कर रहे थे।
➣ फरवरी 1922 में उन्होंने वायसराय को पत्र लिखकर सरकार की दमनकारी नीतियाँ समाप्त न होने पर व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी थी। इसी समय चौरी-चौरा की घटना ने पूरे आंदोलन की दिशा बदल दी।
➣ 5 फरवरी, 1922 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में असहयोग आंदोलन से जुड़े स्वयंसेवकों का एक जुलूस निकला। जुलूस में बड़ी संख्या में लोग शामिल थे और वे स्थानीय बाजार में शराब तथा विदेशी वस्तुओं की दुकानों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।
➣ प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ गया। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज किया और बाद में भीड़ पर गोली चलाई। गोलीबारी में कुछ प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हुई, जिसके बाद भीड़ उग्र हो गई।
➣ उग्र भीड़ ने पुलिस को घेर लिया और पुलिसकर्मी थाने के अंदर चले गए। इसके बाद भीड़ ने चौरी-चौरा थाने में आग लगा दी। इस घटना में थाने के अंदर मौजूद 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई।
➣ चौरी-चौरा की हिंसक घटना ने महात्मा गांधी को गहराई से प्रभावित किया। गांधीजी का मानना था कि असहयोग आंदोलन का आधार अहिंसा और अनुशासन है और यदि आंदोलन हिंसक रूप लेता है, तो उसे जारी रखना उचित नहीं होगा।
➣ चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन को आगे बढ़ाने के बजाय उसे रोकने का निर्णय लिया। उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को समझाया कि देश अभी व्यापक स्तर पर अहिंसक जनसंघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है।
➣ इस घटना ने असहयोग आंदोलन के भीतर मौजूद सबसे बड़ी चुनौती को सामने ला दिया- इतने बड़े जनसमूह को पूरी तरह अहिंसक और अनुशासित बनाए रखना। गांधीजी के लिए यह केवल एक स्थानीय हिंसक घटना नहीं थी, बल्कि पूरे आंदोलन के मूल सिद्धांत से जुड़ा प्रश्न था।
➣ चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने को असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय घोषित किया। इस निर्णय के साथ ही कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे व्यापक असहयोग आंदोलन का तत्काल चरण समाप्त हो गया।
असहयोग आंदोलन की वापसी (12 फरवरी, 1922)
➣ चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि देश अभी ऐसे व्यापक आंदोलन के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है, जिसे लगातार अहिंसक और अनुशासित रखा जा सके।
गांधीजी के लिए आंदोलन का लक्ष्य जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही उसके साधनों का अहिंसक होना भी आवश्यक था। उनके लिए स्वतंत्रता की लड़ाई अहिंसा के सिद्धांत से अलग नहीं हो सकती थी। इसलिए चौरी-चौरा की हिंसक घटना के➣ बाद उन्होंने आंदोलन को आगे जारी रखना उचित नहीं समझा।
➣ 12 फरवरी, 1922 को बारडोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में गांधीजी के प्रस्ताव पर असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय किया गया। इसके साथ ही प्रस्तावित व्यापक सविनय अवज्ञा को भी स्थगित कर दिया गया।
➣ गांधीजी ने आंदोलन वापस लेने के साथ ही रचनात्मक कार्यों पर अधिक ध्यान देने की बात कही। उनका जोर चरखा, खादी, हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता-निवारण तथा राष्ट्रीय पुनर्निर्माण जैसे कार्यों पर रहा।
➣ आंदोलन की अचानक वापसी से कांग्रेस के भीतर सभी नेता सहमत नहीं थे। मोतीलाल नेहरू, चित्तरंजन दास और अन्य कई नेताओं को लगा कि जब आंदोलन अपने चरम पर था, तब उसे वापस लेना उचित नहीं था। दूसरी ओर गांधीजी अपने अहिंसा के सिद्धांत से समझौता करने के पक्ष में नहीं थे।
➣ आंदोलन वापस लेने के कुछ ही समय बाद ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी को 10 मार्च, 1922 को गिरफ्तार कर लिया। उन पर सरकार के विरुद्ध असंतोष फैलाने और अपने पत्र ‘यंग इंडिया’ में राजद्रोहात्मक लेख प्रकाशित करने के आरोप लगाए गए।
➣ मार्च 1922 में उन्हें छह वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई और उन्हें येरवडा जेल (पुणे) में रखा गया। हालांकि, स्वास्थ्य कारणों से उन्हें लगभग दो वर्ष बाद फरवरी 1924 में रिहा कर दिया गया।
➣ इस प्रकार चौरी-चौरा कांड असहयोग आंदोलन की वापसी का तत्काल कारण बना, लेकिन आंदोलन की वापसी के पीछे गांधीजी की अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता और व्यापक जनआंदोलन को अनुशासित रखने की चिंता भी महत्वपूर्ण थी।
अफ्रीका के समय को छोड़कर, 1922 में असहयोग आंदोलन के बाद गांधीजी की यह भारत में पहली गिरफ्तारी और पहली जेल-यात्रा थी। इस दौरान उन्हें येरवडा जेल (पुणे) में रखा गया था।
खिलाफत आंदोलन का अंत
➣ असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद खिलाफत आंदोलन भी अधिक समय तक अपने पुराने स्वरूप में नहीं चल सका। इसका मुख्य कारण यह था कि तुर्की की आंतरिक राजनीति तेजी से बदल रही थी।
➣ भारत में खिलाफत आंदोलन जिन उद्देश्यों को लेकर चलाया जा रहा था, उन्हीं उद्देश्यों का आधार तुर्की में ही कमजोर होने लगा।
➣ मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की में एक राष्ट्रवादी आंदोलन उभरा। इस आंदोलन का उद्देश्य विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप से तुर्की को मुक्त कर एक आधुनिक और स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण करना था।
➣ 1922 ई. में तुर्की की नई राष्ट्रवादी सरकार ने सुल्तानत को समाप्त कर दिया। इससे तुर्की के सुल्तान की राजनीतिक सत्ता समाप्त हो गई और खिलाफत प्रश्न का पारंपरिक आधार कमजोर पड़ गया।
➣ इसके बाद 1923 की लॉज़ेन की संधि ने तुर्की की नई राजनीतिक स्थिति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान की। इससे पहले की सेव्र की संधि की कठोर शर्तों का स्थान अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल व्यवस्था ने ले लिया।
➣ अंततः 3 मार्च, 1924 को तुर्की की ग्रैंड नेशनल असेंबली ने खिलाफत संस्था को ही समाप्त कर दिया। अब्दुल मजीद द्वितीय को अंतिम खलीफा के रूप में पद से हटा दिया गया और खिलाफत का अंत हो गया।
➣ खिलाफत संस्था के समाप्त होने के साथ भारत में खिलाफत आंदोलन का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो गया। इस प्रकार भारतीय खिलाफत आंदोलन, जो तुर्की के सुल्तान की खिलाफत संबंधी स्थिति और उसके धार्मिक अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से शुरू हुआ था, 1924 ई. में अपने आधार से ही वंचित हो गया।
➣ खिलाफत आंदोलन का अंत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भी महत्वपूर्ण था। 1919–1922 के दौरान खिलाफत और असहयोग आंदोलनों ने हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग को मजबूत किया था, लेकिन खिलाफत संस्था के समाप्त होने के बाद इस संयुक्त आंदोलन का वह आधार समाप्त हो गया।
असहयोग आंदोलन के प्रभाव एवं परिणाम
➣ असहयोग आंदोलन भले ही 1922 में वापस ले लिया गया, लेकिन इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को स्थायी रूप से बदल दिया। पहली बार कांग्रेस के नेतृत्व में इतना व्यापक आंदोलन चला, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों की बड़ी संख्या में भागीदारी हुई।
➣ इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जन-आधारित संगठन में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांग्रेस अब केवल शिक्षित और सीमित राजनीतिक वर्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि गाँवों, कस्बों और सामान्य जनता तक उसकी राजनीतिक पहुँच बढ़ी।
➣ आंदोलन ने भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति निर्भरता कम करने और अपने स्तर पर राष्ट्रीय संस्थाएँ विकसित करने की भावना को मजबूत किया। खादी, चरखा, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वावलंबन जैसे विचार राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा बनने लगे।
➣ विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार ने ब्रिटिश आर्थिक हितों को चुनौती देने की राजनीतिक क्षमता को सामने रखा। स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और खादी के प्रचार ने आर्थिक राष्ट्रवाद को अधिक व्यापक जनाधार प्रदान किया।
➣ असहयोग आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के एक महत्वपूर्ण चरण को जन्म दिया। खिलाफत और असहयोग आंदोलनों के संयुक्त रूप से चलने के कारण दोनों समुदायों की राजनीतिक भागीदारी एक साझा मंच पर आई। हालांकि यह एकता स्थायी नहीं रह सकी और खिलाफत आंदोलन के अंत के बाद इसकी सीमाएँ भी स्पष्ट हुईं।
➣ आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में विद्यार्थियों, वकीलों, महिलाओं, व्यापारियों और सामान्य जनता की राजनीतिक सक्रियता बढ़ी। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का सामाजिक आधार पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हुआ।
➣ असहयोग आंदोलन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अहिंसक जनआंदोलन को लंबे समय तक अनुशासित रखना एक बड़ी चुनौती है। चौरी-चौरा की घटना के बाद आंदोलन की वापसी ने गांधीजी के लिए अहिंसा को केवल साधन नहीं, बल्कि आंदोलन की अनिवार्य शर्त के रूप में स्थापित किया।
➣ आंदोलन की वापसी से तत्काल राजनीतिक निराशा जरूर पैदा हुई, लेकिन इससे राष्ट्रीय आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। इसके बाद कांग्रेस के भीतर परिवर्तनवादी और अपरिवर्तनवादी धाराओं के बीच नई बहस शुरू हुई और आगे चलकर स्वराज पार्टी के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
➣ सबसे महत्वपूर्ण रूप से, असहयोग आंदोलन ने भारतीय जनता को यह अनुभव कराया कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक स्तर पर संगठित होकर राजनीतिक दबाव बनाया जा सकता है। इसी जनराजनीतिक अनुभव ने आगे आने वाले सविनय अवज्ञा आंदोलन और अन्य राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ खिलाफत आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य तुर्की के सुल्तान की खलीफा के रूप में स्थिति तथा इस्लाम के पवित्र स्थलों से जुड़े अधिकारों की रक्षा करना था।
➣ महात्मा गांधी ने खिलाफत प्रश्न को हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना और खिलाफत नेताओं के साथ सक्रिय सहयोग किया।
➣ असहयोग आंदोलन को कांग्रेस की स्वीकृति दो महत्वपूर्ण अधिवेशनों में मिली – सितंबर 1920 का कलकत्ता विशेष अधिवेशन और दिसंबर 1920 का नागपुर अधिवेशन।
➣ कलकत्ता विशेष अधिवेशन (1920) की अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की, जबकि नागपुर अधिवेशन (1920) की अध्यक्षता सी. विजयराघवाचारी ने की।
➣ सी. आर. दास ने कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव का विरोध किया था, लेकिन नागपुर अधिवेशन में वे इसके समर्थक बन गए।
➣ असहयोग आंदोलन के कार्यक्रमों को सामान्यतः रचनात्मक और नकारात्मक, इन दो भागों में समझा जाता है।
➣ रचनात्मक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय शिक्षा, पंचायती अदालतें, स्वदेशी, चरखा-कताई, अस्पृश्यता-निवारण और हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया, जबकि नकारात्मक कार्यक्रमों में सरकारी संस्थाओं, उपाधियों और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को प्रमुखता दी गई।
➣ आंदोलन के दौरान अनेक प्रमुख वकीलों ने वकालत छोड़ी। इनमें सी. आर. दास, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद और विठ्ठलभाई पटेल जैसे नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
➣ महात्मा गांधी ने अपने ब्रिटिश सम्मान में से कैसर-ए-हिंद पदक, जूलू युद्ध पदक और बोअर युद्ध पदक वापस कर दिए, जबकि जमनालाल बजाज ने रायबहादुर की उपाधि लौटा दी।
➣ शिक्षा के बहिष्कार का प्रभाव बंगाल में सबसे अधिक और मद्रास में सबसे कम रहा।
➣ 17 नवंबर, 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन के अवसर पर व्यापक हड़ताल और विरोध प्रदर्शन हुए।
➣ असहयोग आंदोलन के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने के उद्देश्य से तिलक स्वराज कोष बनाया गया। इसका लक्ष्य एक करोड़ रुपये जुटाना था।
➣ बाल गंगाधर तिलक ने असहयोग आंदोलन का समर्थन किया था, लेकिन 1 अगस्त, 1920 को उनके निधन के कारण वे इसके आगे के विकास को नहीं देख सके।
➣ असहयोग आंदोलन की सबसे निर्णायक घटना चौरी-चौरा कांड (5 फरवरी, 1922) थी, जिसके बाद गांधीजी ने 12 फरवरी, 1922 को आंदोलन वापस लेने का निर्णय किया।
➣ गांधीजी को मार्च 1922 में गिरफ्तार कर छह वर्ष के कारावास की सजा दी गई, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से उन्हें 1924 में रिहा कर दिया गया।
➣ तुर्की में 1922 में सुल्तानत का अंत और 3 मार्च, 1924 को खिलाफत संस्था का उन्मूलन होने के साथ खिलाफत आंदोलन का मूल आधार समाप्त हो गया।
अक्सर होने वाले कुछ भ्रम
➣ कलकत्ता विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) और नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) को एक ही न समझें। कलकत्ता में असहयोग प्रस्ताव को सिद्धांत रूप में स्वीकृति मिली, जबकि नागपुर में इसे अंतिम रूप से कांग्रेस के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया।
➣ सी. आर. दास ने कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव का विरोध किया था, लेकिन नागपुर अधिवेशन में उन्होंने इसका समर्थन किया।
➣ 1 अगस्त 1920 को दो महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं – बाल गंगाधर तिलक का निधन और इसी दिन गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग की दिशा में औपचारिक शुरुआत। दोनों घटनाओं को अलग-अलग संदर्भ में याद रखें।
➣ चौरी-चौरा कांड 5 फरवरी 1922 को हुआ था, जबकि असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय 12 फरवरी 1922 को लिया गया। दोनों तारीखों को आपस में न मिलाएँ।
➣ असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, लेकिन दोनों के उद्देश्य समान नहीं थे। खिलाफत आंदोलन का मुख्य प्रश्न तुर्की के सुल्तान की खिलाफत संबंधी स्थिति था, जबकि असहयोग आंदोलन का व्यापक उद्देश्य ब्रिटिश शासन के साथ भारतीयों का सहयोग समाप्त करना था।
➣ 1922 में तुर्की की सुल्तानत समाप्त हुई, जबकि खिलाफत संस्था 3 मार्च 1924 को समाप्त की गई। दोनों घटनाएँ अलग-अलग हैं।
➣ सेव्र की संधि के शर्तें मई 1920 में सामने आए थे, लेकिन संधि पर औपचारिक हस्ताक्षर 10 अगस्त 1920 को हुए थे।
➣ तिलक स्वराज कोष का लक्ष्य एक करोड़ रुपये जुटाना था। इसे 1921 में स्थापित किया गया था; इसे तिलक द्वारा स्थापित संगठन न समझें।
➣ असहयोग आंदोलन को केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित न समझें। इसमें सरकारी उपाधियों, शिक्षण संस्थाओं, अदालतों और अन्य सरकारी संस्थाओं से असहयोग भी शामिल था।
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