प्रारम्भिक वैचारिक मतभेद (1890–1895)
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर नरमपंथी और उग्रपंथी नेताओं के बीच मतभेद अचानक 1905 या 1907 में उत्पन्न नहीं हुए थे। इनकी शुरुआत 1890 के दशक में ही हो चुकी थी।
➣ यद्यपि उस समय कांग्रेस पर नरमपंथी नेताओं का प्रभुत्व था, किन्तु महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में एक ऐसी राष्ट्रवादी धारा विकसित हो रही थी, जो केवल संवैधानिक याचिकाओं और प्रार्थनाओं के माध्यम से राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के पक्ष में नहीं थी।
➣ तिलक का मानना था कि जनता की सक्रिय भागीदारी, राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा संघर्षपूर्ण आंदोलन के बिना स्वशासन प्राप्त नहीं किया जा सकता। यही वैचारिक अंतर आगे चलकर कांग्रेस के विभाजन का आधार बना।
डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी से मतभेद (1890)
➣ 1884 ई. में बाल गंगाधर तिलक, गोपाल गणेश आगरकर, महादेव गोविन्द रानाडे तथा अन्य सहयोगियों ने मिलकर डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य भारतीयों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना तथा राष्ट्रीय चेतना का विकास करना था।
➣ प्रारम्भ में सभी नेता समान उद्देश्य लेकर कार्य कर रहे थे, किन्तु कुछ वर्षों बाद संस्था के संचालन, आजीवन सदस्यों के आचरण तथा सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका को लेकर मतभेद उत्पन्न होने लगे।
➣ तिलक का मत था कि शिक्षकों और सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को सादगीपूर्ण जीवन अपनाकर पूर्णतः राष्ट्रसेवा में समर्पित रहना चाहिए, जबकि अन्य नेता शिक्षा संस्थाओं के स्वतंत्र एवं व्यावहारिक संचालन के पक्षधर थे।
➣ बढ़ते मतभेदों के कारण 1890 ई. में तिलक ने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी तथा उससे जुड़े संस्थानों से अपना संबंध समाप्त कर लिया। इसे तिलक और उदारवादी नेतृत्व के बीच पहली महत्वपूर्ण वैचारिक दूरी माना जाता है।
आयु सम्मति विधेयक (1891)
➣ 1891 ई. में ब्रिटिश सरकार ने आयु सम्मति विधेयक प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार विवाहित बालिका के साथ शारीरिक संबंध की न्यूनतम आयु 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी गई।
➣ महादेव गोविन्द रानाडे, बेहरामजी मालाबारी तथा अन्य समाज-सुधारकों ने इसे महिलाओं और बालिकाओं के हित में आवश्यक सामाजिक सुधार मानते हुए समर्थन किया।
➣ इसके विपरीत बाल गंगाधर तिलक ने इस विधेयक का विरोध किया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि तिलक बाल-विवाह के समर्थक नहीं थे,
➣ बल्कि उनका मुख्य तर्क यह था कि भारतीय समाज के सामाजिक एवं धार्मिक मामलों में सुधार भारतीय समाज द्वारा ही किए जाने चाहिए, न कि विदेशी औपनिवेशिक सरकार द्वारा थोपे जाने चाहिए।
➣ इस विवाद ने कांग्रेस के भीतर एक महत्वपूर्ण वैचारिक प्रश्न खड़ा किया – क्या पहले सामाजिक सुधार किए जाएँ या पहले राष्ट्रीय एवं राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की जाए?
➣ बाद के वर्षों में यही प्रश्न नरमपंथी और उग्रपंथी विचारधाराओं के बीच प्रमुख अंतर के रूप में उभरकर सामने आया।
सार्वजनिक गणेशोत्सव (1893) एवं शिवाजी उत्सव (1895)
➣ बाल गंगाधर तिलक का विश्वास था कि राष्ट्रीय आंदोलन को केवल शिक्षित वर्ग तक सीमित रखने से सफलता नहीं मिलेगी। इसके लिए सामान्य जनता को भी राजनीतिक रूप से जागरूक और संगठित करना आवश्यक था।
➣ इसी उद्देश्य से उन्होंने 1893 ई. में सार्वजनिक गणेशोत्सव तथा 1895 ई. में शिवाजी उत्सव प्रारम्भ किए। इन आयोजनों के माध्यम से धार्मिक एवं ऐतिहासिक प्रतीकों का उपयोग कर राष्ट्रीय चेतना, स्वाभिमान और संगठन की भावना को बढ़ावा दिया गया।
➣ इन उत्सवों में सार्वजनिक सभाएँ, व्याख्यान, देशभक्ति गीत, नाटक तथा राष्ट्रीय विषयों पर भाषण आयोजित किए जाते थे, जिससे बड़ी संख्या में सामान्य जनता राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ने लगी।
➣ दूसरी ओर, कांग्रेस के अनेक नरमपंथी नेताओं का मत था कि राजनीति को धार्मिक प्रतीकों से अलग रखा जाना चाहिए तथा संवैधानिक और उदारवादी तरीकों से ही राजनीतिक सुधार प्राप्त किए जाने चाहिए।
➣ इस कारण तिलक की जन-आंदोलन आधारित राजनीति और नरमपंथियों की संवैधानिक राजनीति के बीच अंतर और स्पष्ट हो गया।
पूना सार्वजनिक सभा पर नियंत्रण (1895)
➣ पूना सार्वजनिक सभा महाराष्ट्र की एक प्रभावशाली राजनीतिक संस्था थी, जिसकी स्थापना 1870 में हुई थी। प्रारम्भिक वर्षों में इस पर महादेव गोविन्द रानाडे जैसे उदारवादी नेताओं का प्रभाव था।
➣ 1895 ई. में सभा के चुनावों के दौरान तिलक समर्थक और नरमपंथी गुट आमने-सामने आ गए। इस संघर्ष में तिलक समर्थक गुट ने संस्था पर प्रभाव स्थापित कर लिया।
➣ यह घटना केवल एक संगठनात्मक परिवर्तन नहीं थी, बल्कि इसने यह स्पष्ट कर दिया कि महाराष्ट्र में उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा तेजी से लोकप्रिय हो रही है और वह अब उदारवादी नेतृत्व को खुली चुनौती देने लगी है।
1890–1895 : वैचारिक विभाजन का स्वरूप
➣ 1890 से 1895 के बीच घटित इन घटनाओं ने कांग्रेस के भीतर दो अलग-अलग राजनीतिक धाराओं को जन्म दिया-
- नरमपंथी संवैधानिक सुधार, याचिका, प्रार्थना, क्रमिक प्रगति तथा ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे।
- उग्रपंथी स्वदेशी, राष्ट्रीय स्वाभिमान, जन-जागरण, प्रत्यक्ष संघर्ष तथा भारतीयों के आत्मबल पर अधिक विश्वास करते थे।
➣ यद्यपि उस समय कांग्रेस का औपचारिक विभाजन नहीं हुआ था, किन्तु इन घटनाओं ने दोनों विचारधाराओं के बीच गहरी वैचारिक दूरी उत्पन्न कर दी।
➣ यही दूरी आगे चलकर बंगाल विभाजन (1905), बनारस अधिवेशन (1905), कलकत्ता अधिवेशन (1906) और अधिक खुलकर सामने आई।
कांग्रेस के भीतर सार्वजनिक मतभेद (1905–1906)
➣ 1890 के दशक में प्रारम्भ हुए वैचारिक मतभेद 1905–1906 के दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय मंच पर खुलकर सामने आए। बंगाल विभाजन (1905) और उसके विरुद्ध चले स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन ने कांग्रेस के भीतर पहले से मौजूद वैचारिक मतभेदों को और तीव्र कर दिया।
➣ अब विवाद केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह प्रश्न बन गया कि ब्रिटिश शासन का विरोध किस प्रकार किया जाए और स्वराज प्राप्त करने की रणनीति क्या हो।
बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव
➣ 16 अक्टूबर 1905 को लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बंगाल विभाजन लागू किए जाने के बाद पूरे देश में व्यापक विरोध शुरू हुआ। इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी नई दिशा देने का कार्य किया।
➣ कांग्रेस के दोनों गुट बंगाल विभाजन का विरोध कर रहे थे, किन्तु विरोध के तरीकों को लेकर उनके विचार भिन्न थे।
- नरमपंथी चाहते थे कि आंदोलन संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहे तथा सरकार पर याचिकाओं, प्रस्तावों और जनमत के माध्यम से दबाव बनाया जाए।
- उग्रपंथी चाहते थे कि स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और जन-आंदोलन को पूरे भारत में व्यापक रूप से फैलाया जाए तथा जनता को प्रत्यक्ष संघर्ष के लिए तैयार किया जाए।
➣ इस प्रकार बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन ने कांग्रेस के भीतर पहले से मौजूद वैचारिक मतभेदों को सार्वजनिक और अधिक तीखा बना दिया।
बनारस अधिवेशन (1905) : मतभेद पहली बार राष्ट्रीय मंच पर
➣ दिसम्बर 1905 में कांग्रेस का 21वाँ अधिवेशन बनारस में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित हुआ।
➣ इस अधिवेशन में बंगाल विभाजन की निंदा की गई तथा स्वदेशी के सिद्धांत को स्वीकार किया गया, किन्तु बहिष्कार आंदोलन को पूरे देश में लागू करने के प्रश्न पर दोनों गुटों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए।
➣ बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा बिपिन चन्द्र पाल का मत था कि केवल प्रस्ताव पारित करने से ब्रिटिश सरकार झुकने वाली नहीं है। इसके लिए व्यापक जन-आंदोलन, स्वदेशी और बहिष्कार को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाना आवश्यक है।
➣ दूसरी ओर, गोपाल कृष्ण गोखले तथा अन्य नरमपंथी नेताओं का मानना था कि आंदोलन को नियंत्रित और संवैधानिक सीमाओं में रखना चाहिए, ताकि सरकार से संवाद और सुधार की संभावनाएँ बनी रहें।
➣ यद्यपि इस अधिवेशन में कोई औपचारिक विभाजन नहीं हुआ, किन्तु यह पहली बार था जब कांग्रेस के राष्ट्रीय मंच पर दोनों विचारधाराओं का टकराव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
कलकत्ता अधिवेशन (1906) : अस्थायी समझौता
➣ दिसम्बर 1906 में कांग्रेस का 22वाँ अधिवेशन कलकत्ता में आयोजित हुआ। दोनों गुटों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए सर्वसम्मति से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दादाभाई नौरोजी को अध्यक्ष चुना गया, ताकि संगठन की एकता बनी रहे।
➣ इस अधिवेशन में पहली बार स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया। साथ ही स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा से संबंधित चार ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किए गए।
➣ यद्यपि इन प्रस्तावों को दोनों गुटों ने स्वीकार कर लिया, किन्तु उनके क्रियान्वयन को लेकर मतभेद समाप्त नहीं हुए। उग्रपंथी चाहते थे कि इन प्रस्तावों को देशव्यापी जन-आंदोलन का आधार बनाया जाए, जबकि नरमपंथी इन्हें सीमित एवं संवैधानिक ढंग से लागू करने के पक्षधर थे।
➣ इस प्रकार कलकत्ता अधिवेशन ने तत्कालीन संकट को कुछ समय के लिए टाल तो दिया, किन्तु दोनों गुटों के बीच अविश्वास और वैचारिक दूरी बनी रही। यही कारण था कि अगले वर्ष सूरत अधिवेशन (1907) में यह मतभेद खुलकर सामने आया और अंततः कांग्रेस का ऐतिहासिक विभाजन हो गया।
सूरत अधिवेशन एवं विभाजन (1907)
➣ कांग्रेस के भीतर लगभग डेढ़ दशक से विकसित हो रहे वैचारिक मतभेद 1907 ई. में अपने चरम पर पहुँच गए। बनारस (1905) और कलकत्ता (1906) अधिवेशनों में जो मतभेद केवल नीतियों तक सीमित थे, वे अब नेतृत्व, संगठन तथा आंदोलन की दिशा को लेकर खुले संघर्ष में बदल चुके थे।
➣ परिणामस्वरूप दिसम्बर 1907 में आयोजित सूरत अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास का सबसे विवादास्पद अधिवेशन सिद्ध हुआ, जहाँ कांग्रेस औपचारिक रूप से नरमपंथी और उग्रपंथी दो गुटों में विभाजित हो गई।
सूरत में अधिवेशन आयोजित करने का निर्णय
➣ कांग्रेस का 23वाँ अधिवेशन प्रारम्भ में नागपुर में आयोजित किया जाना प्रस्तावित था।
➣ नागपुर उस समय बाल गंगाधर तिलक तथा उग्रपंथी नेताओं का प्रभाव क्षेत्र माना जाता था। नरमपंथी नेताओं को आशंका थी कि यदि अधिवेशन नागपुर में हुआ तो उग्रपंथियों का प्रभाव अधिक रहेगा और वे कांग्रेस की नीतियों तथा नेतृत्व पर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं।
➣ इसी कारण नरमपंथी नेताओं के प्रयासों से अधिवेशन का स्थान बदलकर सूरत (गुजरात) कर दिया गया। उस समय सूरत में नरमपंथी नेताओं का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक था।
➣ यद्यपि यह परिवर्तन प्रशासनिक निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया गया, किन्तु उग्रपंथियों ने इसे अपने प्रभाव को कम करने का राजनीतिक प्रयास माना। परिणामस्वरूप दोनों गुटों के बीच अविश्वास और बढ़ गया।
अध्यक्ष पद को लेकर विवाद
➣ अधिवेशन प्रारम्भ होने से पहले ही कांग्रेस के अध्यक्ष पद को लेकर दोनों गुट आमने-सामने आ गए।
➣ उग्रपंथी चाहते थे कि कांग्रेस का नेतृत्व ऐसा व्यक्ति करे जो स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज के कार्यक्रम को पूरी दृढ़ता से आगे बढ़ाए। प्रारम्भ में उन्होंने लाला लाजपत राय के नाम पर विचार किया, किन्तु उनके पीछे हटने के बाद बाल गंगाधर तिलक को आगे लाने का प्रयास किया गया।
➣ दूसरी ओर, नरमपंथियों ने डॉ. रास बिहारी घोष को अपना उम्मीदवार बनाया। उनका उद्देश्य कांग्रेस की नीति को संवैधानिक मार्ग पर बनाए रखना था।
➣ दोनों पक्ष किसी भी प्रकार के समझौते के लिए तैयार नहीं थे। अध्यक्ष पद का प्रश्न अब केवल व्यक्ति-चयन का विषय नहीं रह गया था, बल्कि यह कांग्रेस की भावी नीति और नेतृत्व की दिशा का प्रतीक बन चुका था।
कलकत्ता अधिवेशन के प्रस्तावों पर विवाद
➣ उग्रपंथी चाहते थे कि 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में पारित स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के चारों प्रस्तावों को बिना किसी परिवर्तन के पुनः स्वीकार किया जाए और उन्हें पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू किया जाए।
➣ इसके विपरीत नरमपंथी नेताओं का मत था कि आंदोलन की तीव्रता को नियंत्रित रखा जाए तथा बहिष्कार जैसी नीतियों को सीमित रूप में अपनाया जाए। वे सरकार के साथ संवैधानिक संवाद और सुधार की संभावनाओं को समाप्त नहीं करना चाहते थे।
➣ इस प्रकार अध्यक्ष पद का विवाद और नीतिगत मतभेद एक-दूसरे से जुड़ गए तथा अधिवेशन शुरू होने से पहले ही टकराव की स्थिति बन गई।
सूरत अधिवेशन में हंगामा
➣ 26 दिसम्बर 1907 को सूरत में कांग्रेस का अधिवेशन प्रारम्भ हुआ। जैसे ही डॉ. रास बिहारी घोष के अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, उग्रपंथी नेताओं ने इसका विरोध प्रारम्भ कर दिया।
➣ दोनों गुटों के बीच तीखी नारेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए। वातावरण इतना तनावपूर्ण हो गया कि सभा में अनुशासन बनाए रखना कठिन हो गया।
➣ कुछ ही समय में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। प्रतिनिधियों के बीच धक्का-मुक्की, कुर्सियाँ फेंके जाने तथा मंच पर अव्यवस्था की घटनाएँ हुईं। ऐसी स्थिति में अधिवेशन की कार्यवाही रोकनी पड़ी।
➣ अंततः अधिवेशन बिना किसी औपचारिक निर्णय के स्थगित कर दिया गया और कांग्रेस व्यावहारिक रूप से दो अलग-अलग गुटों में विभाजित हो गई।
कांग्रेस का औपचारिक विभाजन
➣ सूरत अधिवेशन के बाद कांग्रेस पर नरमपंथी नेताओं का नियंत्रण स्थापित हो गया, जबकि उग्रपंथी नेताओं को संगठन से अलग कर दिया गया।
➣ इसके परिणामस्वरूप गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता तथा अन्य नरमपंथी नेता कांग्रेस के नेतृत्व में बने रहे, जबकि बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चन्द्र पाल और उनके सहयोगियों ने कांग्रेस से बाहर रहकर राष्ट्रवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाया।
➣ इस प्रकार सूरत विभाजन (1907) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला औपचारिक विभाजन था। यद्यपि इससे कांग्रेस की एकता को गंभीर क्षति पहुँची,
➣ किन्तु इस घटना ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में दो भिन्न राजनीतिक धाराओं-संवैधानिक सुधारवादी राष्ट्रवाद और उग्र जन-आंदोलन आधारित राष्ट्रवाद-को स्पष्ट रूप से स्थापित कर दिया।
नरमपंथी एवं उग्रपंथी नेताओं की तुलना
| आधार | नरमपंथी | उग्रपंथीsts) |
|---|---|---|
| प्रमुख नेता | दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, रास बिहारी घोष | बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल, अरविन्द घोष |
| मुख्य उद्देश्य | संवैधानिक सुधारों के माध्यम से स्वशासन | जन-आंदोलन के माध्यम से शीघ्र स्वराज |
| कार्यप्रणाली | याचिका, प्रार्थना, प्रतिनिधिमंडल एवं संवैधानिक उपाय | स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, जन-आंदोलन एवं निष्क्रिय प्रतिरोध |
| ब्रिटिश शासन के प्रति दृष्टिकोण | ब्रिटिश न्यायप्रियता एवं सुधारों की संभावना में विश्वास | ब्रिटिश शासन को शोषणकारी मानते हुए संघर्ष का समर्थन |
| जनता की भूमिका | सीमित राजनीतिक भागीदारी | व्यापक जन-संगठन एवं जन-जागरण |
| प्रमुख नारा | क्रमिक सुधार एवं संवैधानिक मार्ग | “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” |
सूरत विभाजन के बाद उग्र राष्ट्रवादी धारा
➣ सूरत विभाजन (1907) के बाद कांग्रेस का नेतृत्व नरमपंथी नेताओं के हाथों में चला गया, जबकि बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा बिपिन चन्द्र पाल जैसे उग्र राष्ट्रवादी नेता कांग्रेस की मुख्यधारा से अलग हो गए।
बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा बिपिन चन्द्र पाल को संयुक्त रूप से लाल-बाल-पाल कहा जाता है।
➣ कांग्रेस से अलग होने के बावजूद लाल-बाल-पाल ने विभिन्न प्रांतों में राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार जारी रखा। तिलक महाराष्ट्र, लाला लाजपत राय पंजाब तथा बिपिन चन्द्र पाल बंगाल में जनता के बीच स्वराज, स्वदेशी और राष्ट्रीय जागरण का संदेश फैलाते रहे।
लाला लाजपत राय का निर्वासन (1907)
➣ 1907 ई. में पंजाब में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों, विशेषकर पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन, के कारण ब्रिटिश सरकार ने लाला लाजपत राय तथा सरदार अजीत सिंह को बिना मुकदमे के गिरफ्तार कर मांडले (बर्मा) निर्वासित कर दिया।
➣ दोनों को Regulation III of 1818 के तहत निर्वासित किया गया था। लाला लाजपत राय को 9 मई 1907 को गिरफ्तार किया गया, जबकि अजीत सिंह को 2 जून 1907 को गिरफ्तार किया गया।
➣ दोनों नेताओं को लगभग छह महीने तक मांडले में रखने के बाद 11 नवंबर, 1907 को रिहा कर दिया गया। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार उग्र राष्ट्रवादी नेताओं के प्रति कठोर दमन की नीति अपना चुकी थी।
बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी (1908)
➣ 1908 ई. में केसरी में प्रकाशित लेखों के आधार पर बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। यह उनका दूसरा प्रमुख राजद्रोह मुकदमा था।
➣ मुकदमे में जूरी ने 7:2 के बहुमत से उन्हें दोषी ठहराया और उन्हें छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा देकर मांडले जेल (बर्मा) भेज दिया गया।
कारावास के दौरान तिलक ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता रहस्य (गीता रहस्य) लिखा।
➣ तिलक को 17 जून 1914 को मांडले से रिहा किया गया। इसके बाद वे पुनः सक्रिय राजनीति में लौटे और आगे चलकर होमरूल आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इसी दौरान ब्रिटिश पत्रकार वेलेन्टाइन चिरोल ने अपनी पुस्तक Indian Unrest में तिलक को भारतीय अशांति का जनक (Father of Indian Unrest) कहा।
बिपिन चन्द्र पाल (1908)
➣ 1906 ई. में उन्होंने अंग्रेजी साप्ताहिक New India का प्रकाशन प्रारंभ किया, जिसके माध्यम से उन्होंने स्वदेशी, बहिष्कार और उग्र राष्ट्रवाद के विचारों का व्यापक प्रचार किया।
➣ बिपिन चन्द्र पाल ने अरविन्द घोष के साथ मिलकर निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance) तथा ब्रिटिश शासन के आर्थिक एवं प्रशासनिक बहिष्कार के विचार को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ 1908 ई. में अरविन्द घोष के विरुद्ध चलाए गए अलीपुर बम षड्यंत्र केस में बिपिन चन्द्र पाल को सरकारी गवाह बनने से इनकार करने के कारण अदालत की अवमानना के आरोप में कारावास की सजा दी गई।
➣ 1908 ई. में कारावास से रिहा होने के बाद बिपिन चन्द्र पाल अगस्त 1908 में इंग्लैंड चले गए और लगभग तीन वर्ष तक वहाँ रहे। वे नवंबर 1911 में भारत लौटे और पुनः सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए।
➣ बंग-भंग आंदोलन के दौरान जिस उग्र राष्ट्रवादी नेतृत्व का तीव्र उदय हुआ था, उसका पहला चरण कमजोर पड़ गया। यद्यपि 1907–1910 के बीच ब्रिटिश दमन, कांग्रेस के सूरत विभाजन तथा प्रमुख नेताओं के निष्क्रिय होने से उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन अस्थायी रूप से कमजोर पड़ा,
➣ फिर भी इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्वराज को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में स्थापित किया और आगे चलकर क्रांतिकारी आंदोलन के विकास की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
सूरत विभाजन का ऐतिहासिक महत्व
➣ सूरत विभाजन (1907) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी।
➣ यद्यपि इस विभाजन से राष्ट्रीय आंदोलन को तत्कालीन समय में क्षति पहुँची, फिर भी इसने भारतीय राजनीति को नई दिशा प्रदान की। इस घटना के बाद राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप, नेतृत्व और कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का पहला बड़ा वैचारिक विभाजन➣ सूरत विभाजन ने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अब केवल एक ही राजनीतिक विचारधारा नहीं रही। कांग्रेस के भीतर संवैधानिक सुधारों में विश्वास रखने वाले नरमपंथी तथा जन-आंदोलन एवं संघर्ष का समर्थन करने वाले उग्रपंथी – दोनों धाराएँ स्वतंत्र रूप से विकसित हो चुकी थीं।
कांग्रेस की सीमाएँ उजागर हुईं➣ सूरत विभाजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के भीतर बढ़ते वैचारिक मतभेदों को केवल समझौतों के माध्यम से लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रखा जा सकता। संगठनात्मक एकता बनाए रखने के लिए साझा नेतृत्व और स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम की आवश्यकता थी।
राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति में परिवर्तन➣ सूरत विभाजन के बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में केवल याचिकाओं और संवैधानिक सुधारों पर निर्भर रहने की नीति पर प्रश्न उठने लगे। स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा तथा जन-आंदोलन जैसे कार्यक्रमों ने भारतीय राजनीति में स्थायी स्थान प्राप्त किया।
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को वैचारिक आधार मिला➣ सूरत विभाजन तथा उसके बाद हुए ब्रिटिश दमन ने अनेक युवाओं को यह सोचने पर विवश किया कि केवल संवैधानिक तरीकों से स्वतंत्रता प्राप्त करना कठिन होगा। परिणामस्वरूप क्रांतिकारी संगठनों और उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा को अप्रत्यक्ष रूप से नई प्रेरणा मिली।
कांग्रेस के पुनर्गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ➣ सूरत विभाजन के अनुभव ने कांग्रेस के नेताओं को संगठनात्मक एकता के महत्व का एहसास कराया। यही कारण था कि लगभग एक दशक बाद 1916 के लखनऊ अधिवेशन में नरमपंथी और उग्रपंथी नेताओं का पुनर्मिलन संभव हो सका।
आगे के राष्ट्रीय आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार हुई➣ सूरत विभाजन के बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों ने आगे चलकर होमरूल आंदोलन, लखनऊ समझौता (1916) तथा महात्मा गांधी के नेतृत्व में जन-आंदोलनों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। इस दृष्टि से सूरत विभाजन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विकासक्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हुआ।
➣ सूरत विभाजन तत्कालीन समय में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए एक झटका अवश्य था, किन्तु इसने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी।
➣ इस घटना ने राष्ट्रीय आंदोलन में वैचारिक विविधता, जन-आंदोलन की आवश्यकता तथा संगठनात्मक एकता के महत्व को स्पष्ट किया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम के अगले चरणों की आधारशिला बने।
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