हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (1928): सॉन्डर्स हत्याकांड, भगत सिंह एवं चंद्रशेखर आज़ाद

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (1928)
📚 विषय सूची

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख क्रांतिकारी संगठन था, जिसकी स्थापना सितंबर 1928 ई. में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में आयोजित एक गुप्त बैठक में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के पुनर्गठन के माध्यम से की गई।

➣ इस संगठन का उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन को सशस्त्र क्रांति द्वारा समाप्त करना ही नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत में समाजवादी (Socialist), लोकतांत्रिक (Democratic) तथा गणतांत्रिक (Republican) व्यवस्था की स्थापना करना भी था।

➣ HSRA के प्रमुख नेताओं में चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, भगवतीचरण वोहरा, बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा, यशपाल तथा जयदेव कपूर प्रमुख थे।

➣ HSRA भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सांडर्स वध (1928), केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929), लाहौर षड्यंत्र केस तथा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

स्थापना की पृष्ठभूमि

HRA से HSRA तक की यात्रा

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना 1924 ई. में ब्रिटिश शासन को सशस्त्र क्रांति द्वारा समाप्त कर भारत में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य स्थापित करने के उद्देश्य से की गई थी।

राम प्रसाद बिस्मिल, सचिन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचंद्र चटर्जी तथा उनके साथियों ने उत्तर भारत के क्रांतिकारी संगठनों को पहली बार एक राष्ट्रीय मंच पर संगठित किया। किन्तु 9 अगस्त 1925 ई. के काकोरी षड्यंत्र के बाद ब्रिटिश सरकार ने HRA पर व्यापक दमनचक्र चलाया।

➣ संगठन के अधिकांश वरिष्ठ नेता गिरफ्तार कर लिए गए, अनेक को आजीवन कारावास की सज़ा मिली तथा राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को फाँसी दे दी गई। इससे HRA का मूल नेतृत्व लगभग समाप्त हो गया।

➣ यद्यपि यह HRA के लिए एक बड़ा आघात था, फिर भी संगठन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। चंद्रशेखर आज़ाद गिरफ्तारी से बच निकले और उन्होंने शेष क्रांतिकारियों को पुनः संगठित करना प्रारम्भ किया।

➣ इसी समय भगत सिंह, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा तथा अन्य युवा क्रांतिकारी संगठन से सक्रिय रूप से जुड़े। इन युवाओं ने अनुभव किया कि स्वतंत्रता आंदोलन को नई विचारधारा और अधिक स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम की आवश्यकता है।

➣ इसी वैचारिक परिवर्तन और संगठनात्मक पुनर्गठन की प्रक्रिया का परिणाम 1928 ई. में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के रूप में सामने आया।

पुनर्गठन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

➣ काकोरी कांड के बाद क्रांतिकारी आंदोलन ने कई महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किए। सबसे पहली आवश्यकता संगठन को पुनः संगठित करने की थी, क्योंकि उसके अधिकांश वरिष्ठ नेता जेल में थे या शहीद हो चुके थे। नई परिस्थितियों में एक सक्षम नेतृत्व और नए संगठनात्मक ढाँचे की आवश्यकता महसूस की गई।

➣ दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता संगठन की विचारधारा को अधिक स्पष्ट बनाने की थी। HRA का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करना था, किंतु नई पीढ़ी के क्रांतिकारियों का विचार था कि स्वतंत्रता के बाद भारत कैसा होगा, इसका भी स्पष्ट उत्तर होना चाहिए।

➣ वे ऐसी व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे जिसमें केवल विदेशी शासन का अंत ही न हो, बल्कि आर्थिक शोषण, सामाजिक असमानता और वर्गभेद भी समाप्त हों।

➣ भगत सिंह तथा उनके सहयोगियों पर समाजवादी विचारधारा, रूसी क्रांति (1917) तथा विश्व के अन्य क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रभाव था।

➣ उनका मानना था कि यदि केवल सत्ता अंग्रेजों से भारतीयों के हाथों में आ जाए और शोषण की व्यवस्था बनी रहे, तो स्वतंत्रता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। इसलिए संगठन की विचारधारा में Socialist शब्द जोड़ने का निर्णय लिया गया।

➣ इसके अतिरिक्त नई पीढ़ी यह भी चाहती थी कि क्रांतिकारी कार्रवाइयाँ केवल प्रतिशोध तक सीमित न रहें, बल्कि उनके माध्यम से जनता तक एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश पहुँचे। यही सोच आगे चलकर सांडर्स वध तथा केंद्रीय विधानसभा बम कांड जैसी घटनाओं में दिखाई देती है।

फिरोजशाह कोटला की ऐतिहासिक बैठक (1928)

8–9 सितंबर 1928 ई. को दिल्ली के ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में विभिन्न प्रांतों के प्रमुख क्रांतिकारियों की एक अत्यंत गोपनीय बैठक आयोजित की गई।

➣ इस बैठक का उद्देश्य काकोरी कांड के बाद बिखरे हुए क्रांतिकारी आंदोलन को पुनः संगठित करना तथा उसकी भावी दिशा निर्धारित करना था।

➣ बैठक में चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा, शिव वर्मा, यशपाल, जयदेव कपूर, विजय कुमार सिन्हा तथा अन्य युवा क्रांतिकारियों ने भाग लिया। लंबी चर्चा के बाद यह निर्णय लिया गया कि HRA का पुनर्गठन कर उसे नई विचारधारा और नए नाम के साथ आगे बढ़ाया जाए।

➣ इस बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि भविष्य में संगठन की प्रत्येक कार्रवाई का उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन को चुनौती देना ही नहीं होगा, बल्कि भारतीय जनता में क्रांतिकारी चेतना और राजनीतिक जागरूकता फैलाना भी होगा।

➣ इसी कारण यह बैठक भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है।

HSRA की स्थापना

➣ फिरोजशाह कोटला बैठक में सर्वसम्मति से हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का पुनर्गठन कर उसका नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) रखा गया।

➣ यह परिवर्तन केवल संगठन के नाम का नहीं था, बल्कि उसकी विचारधारा और कार्यनीति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक था।

➣ पुनर्गठन के बाद चंद्रशेखर आज़ाद संगठन के सर्वोच्च सैन्य नेता बने, जबकि भगत सिंह ने संगठन की वैचारिक दिशा और राजनीतिक कार्यक्रमों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ HSRA ने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि उसका उद्देश्य केवल विदेशी शासन को समाप्त करना नहीं है, बल्कि ऐसा समाज स्थापित करना है जिसमें शोषण, असमानता और अन्याय के लिए कोई स्थान न हो।

➣ यही कारण है कि HSRA को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे परिपक्व और वैचारिक रूप से विकसित क्रांतिकारी संगठन माना जाता है।

प्रमुख संस्थापक एवं सदस्य

क्रांतिकारी भूमिका
चंद्रशेखर आज़ाद HSRA के सर्वोच्च सैन्य नेता एवं संगठन के पुनर्गठन के प्रमुख सूत्रधार।
भगत सिंह प्रमुख वैचारिक नेता; समाजवादी विचारधारा को संगठन की नीति में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका।
सुखदेव पंजाब में संगठन के प्रमुख संगठक तथा भगत सिंह के निकट सहयोगी।
राजगुरु संगठन के साहसी क्रांतिकारी; सांडर्स वध में सक्रिय भूमिका।
भगवतीचरण वोहरा HSRA के प्रमुख विचारक, लेखक तथा संगठन की रणनीति निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान।
बटुकेश्वर दत्त केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929) में भगत सिंह के साथ सहभागी।
शिव वर्मा HSRA के सक्रिय सदस्य एवं संगठन विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका।
यशपाल क्रांतिकारी गतिविधियों एवं संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय योगदान।
जयदेव कपूर संगठन के विश्वसनीय कार्यकर्ता; विभिन्न क्रांतिकारी योजनाओं के संचालन में सहयोग।

नाम का अर्थ

Hindustan Socialist Republican Association नाम संगठन की विचारधारा और उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है।

  • Hindustan (हिन्दुस्तान)सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करता है।
  • Socialist (सोशलिस्ट) – ऐसी समाजवादी व्यवस्था की स्थापना, जिसमें आर्थिक और सामाजिक शोषण समाप्त हो तथा सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त हों।
  • Republican (रिपब्लिकन)वंशानुगत शासन के स्थान पर जनता द्वारा संचालित लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना।
  • Association (एसोसिएशन)समान उद्देश्य रखने वाले क्रांतिकारियों का संगठित राष्ट्रीय संगठन।

➣ इस प्रकार HSRA का उद्देश्य केवल भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना नहीं था, बल्कि एक ऐसे भारत का निर्माण करना था जहाँ राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता भी सुनिश्चित हो।

उद्देश्य

  • ब्रिटिश शासन को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से समाप्त करना।
  • भारत में समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य (Socialist Democratic Republic) की स्थापना करना।
  • आर्थिक एवं सामाजिक शोषण पर आधारित व्यवस्था का अंत करना।
  • किसानों, मजदूरों तथा सामान्य जनता के अधिकारों की रक्षा करना।
  • युवाओं में राष्ट्रभक्ति, वैज्ञानिक सोच तथा क्रांतिकारी चेतना का विकास करना।
  • जनता को स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय रूप से जोड़ना तथा राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करना।
  • सभी धर्मों, जातियों एवं क्षेत्रों के लोगों को समान राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए संगठित करना।

➣ इस प्रकार HSRA का लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक न्यायपूर्ण, समानतामूलक और लोकतांत्रिक भारत का निर्माण करना था।

HSRA का वैचारिक विकास

➣ 1928 में HRA के पुनर्गठन के बाद समाजवाद को क्रांतिकारी आंदोलन के वैचारिक आधार के रूप में अधिक स्पष्ट स्थान मिला। HSRA के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल ब्रिटिश शासन का अंत नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक शोषण का अंत भी था अर्थात राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक स्वतंत्रता को भी आवश्यक माना गया।

➣ क्योंकि विदेशी शासन समाप्त होने के बाद भी यदि शोषण और असमानता बनी रहती है तो आम जनता के लिए स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। इस दृष्टिकोण ने HSRA को पहले के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की अपेक्षा अधिक स्पष्ट सामाजिक-आर्थिक आधार प्रदान किया।

समाजवादी विचारधारा

➣ HSRA की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी समाजवादी विचारधारा थी। HRA के समय संगठन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन का अंत कर गणराज्य की स्थापना करना था, किंतु HSRA ने इस विचार को और आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्र भारत में आर्थिक और सामाजिक समानता भी आवश्यक है।

भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा तथा उनके सहयोगियों पर रूसी क्रांति (1917), यूरोपीय समाजवादी विचारधारा तथा विश्व के अन्य राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का प्रभाव था।

➣ उनका मानना था कि यदि केवल अंग्रेजों के स्थान पर भारतीय शासक आ जाएँ और शोषण की व्यवस्था बनी रहे, तो यह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं होगी।

➣ इसी कारण संगठन के नाम में Socialist शब्द जोड़ा गया। इसका अर्थ किसी एक वर्ग का प्रभुत्व स्थापित करना नहीं था, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना था जिसमें सभी नागरिकों को समान अवसर, सामाजिक न्याय और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो।

➣ HSRA का समाजवाद भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप था। संगठन किसानों और मजदूरों की स्थिति में सुधार, पूँजीवादी शोषण के विरोध तथा समान अवसरों पर आधारित समाज की स्थापना का समर्थक था। यही विचार आगे चलकर भगत सिंह के लेखों और वक्तव्यों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

क्रांति की अवधारणा

➣ HSRA के अनुसार क्रांति का अर्थ केवल हिंसात्मक कार्रवाई का प्रयोग नहीं था। संगठन का विश्वास था कि क्रांति का वास्तविक उद्देश्य अन्यायपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को बदलकर एक नई न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करना है।

➣ भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 1929 के अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया कि क्रांति को केवल बम और पिस्तौल का पंथ मानना गलत है। उनके अनुसार क्रांतिकारी कार्रवाई व्यापक राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक माध्यम हो सकती है, लेकिन क्रांति का वास्तविक अर्थ कहीं अधिक व्यापक है।

➣ भगत सिंह का प्रसिद्ध कथन है कि क्रांति की तलवार में धार वैचारिक पत्थर पर रगड़ने से ही आती है। इस विचार से स्पष्ट होता है कि HSRA के लिए

विचार, शिक्षा और राजनीतिक चेतना

उतने ही महत्वपूर्ण थे जितनी क्रांतिकारी कार्रवाई।

➣ इसी कारण HSRA की अनेक क्रांतिकारी कार्रवाइयाँ केवल प्रतिशोध या हिंसा के उद्देश्य से नहीं की गईं, बल्कि उनके माध्यम से जनता तक एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश पहुँचाने का प्रयास किया गया।

➣ संगठन का विश्वास था कि ऐसी प्रतीकात्मक कार्रवाइयाँ ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों को उजागर करेंगी और जनता में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करेंगी।

➣ इस विचार का सबसे प्रमुख उदाहरण केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929) है, जिसमें भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम ऐसे स्थान पर फेंका जहाँ किसी व्यक्ति की मृत्यु न हो। इसके बाद दोनों भागने के बजाय स्वेच्छा से गिरफ्तार हो गए, ताकि न्यायालय को अपने विचार पूरे देश तक पहुँचाने का मंच बनाया जा सके।

➣ इस प्रकार HSRA ने क्रांति को केवल सशस्त्र संघर्ष तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे राजनीतिक जागरण, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का व्यापक माध्यम माना। यही विचारधारा उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अन्य क्रांतिकारी संगठनों से अलग और अधिक परिपक्व बनाती है।

भगत सिंह की वैचारिक भूमिका

भगत सिंह केवल एक साहसी क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि HSRA के प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने संगठन को आधुनिक राजनीतिक सोच, समाजवादी दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक चिंतन से समृद्ध किया।

➣ उनके नेतृत्व में HSRA केवल सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक स्पष्ट वैचारिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।

➣ भगत सिंह का अध्ययन अत्यंत व्यापक था। उन्होंने कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, व्लादिमीर लेनिन, ज्यूसेपे मैज़िनी, थॉमस पेन तथा अनेक भारतीय और विदेशी विचारकों के साहित्य का गहन अध्ययन किया। इन विचारों का प्रभाव उनकी राजनीतिक सोच तथा HSRA की नीतियों में स्पष्ट दिखाई देता है।

➣ उन्होंने संगठन के भीतर अध्ययन, तर्कशीलता और वैचारिक प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया। उनका विश्वास था कि एक क्रांतिकारी केवल साहसी ही नहीं, बल्कि बौद्धिक रूप से भी परिपक्व होना चाहिए।

➣ इसी कारण वे अपने साथियों को नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ने, समसामयिक घटनाओं का अध्ययन करने तथा राजनीतिक विषयों पर चर्चा करने के लिए प्रेरित करते थे।

➣ भगत सिंह ने युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कशीलता, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने का प्रयास किया। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत का निर्माण शिक्षित, जागरूक और विचारशील युवाओं के नेतृत्व में ही संभव है।

➣ जेल में रहते हुए भी उन्होंने अनेक लेख और पत्र लिखे, जिनमें मैं नास्तिक क्यों हूँ, युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र तथा अन्य लेख विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन रचनाओं ने भारतीय युवाओं को वैचारिक रूप से प्रभावित किया और HSRA की समाजवादी एवं क्रांतिकारी विचारधारा को व्यापक पहचान दिलाई।

➣ इस प्रकार भगत सिंह ने HSRA को केवल एक क्रांतिकारी संगठन न रहने देकर उसे एक सशक्त वैचारिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। उनके विचारों का प्रभाव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन पर भी गहराई से पड़ा।

HSRA की कार्यप्रणाली

➣ HSRA की कार्यप्रणाली में संगठनात्मक अनुशासन, सामूहिक नेतृत्व और योजनाबद्ध कार्रवाई को महत्व दिया गया। 1928 के पुनर्गठन के समय संगठन ने व्यक्तिगत वीरतापूर्ण कार्रवाइयों से आगे बढ़कर अधिक संगठित और सामूहिक राजनीतिक कार्य की दिशा अपनाने का निर्णय किया।

➣ संगठन में सामूहिक नेतृत्व को स्थान दिया गया और चंद्रशेखर आजाद को सैन्य पक्ष का नेतृत्व सौंपा गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य क्रांतिकारी गतिविधियों को अधिक समन्वित बनाना और विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे सदस्यों के बीच संगठनात्मक संपर्क बनाए रखना था।

➣ HSRA के कार्यकर्ताओं से संगठन के प्रति पूर्ण समर्पण और अनुशासन की अपेक्षा की जाती थी। कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत जीवन और पारिवारिक संबंधों से दूरी बनाकर संगठन के कार्य को पूर्ण समय देने की अपेक्षा की थी। धार्मिक साम्प्रदायिकता और कर्मकांड को भी संगठन के अनुशासित जीवन में स्थान नहीं दिया गया।

➣ HSRA की कार्यप्रणाली में व्यक्तिगत कार्रवाई से सामूहिक कार्रवाई की ओर संक्रमण एक महत्वपूर्ण विशेषता थी। संगठन का नेतृत्व बड़े पैमाने पर राजनीतिक संघर्ष और सामूहिक आधार वाले क्रांतिकारी आंदोलन की ओर बढ़ रहा था, हालांकि परिस्थितियों के कारण व्यक्तिगत प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयों से पूरी तरह अलग होना संभव नहीं हुआ।

प्रचार के साधन

➣ संगठन ने अपने विचारों के प्रचार और जनता में राजनीतिक जागरूकता फैलाने के लिए अनेक प्रभावी साधनों का उपयोग किया। HSRA ने अनेक प्रभावशाली नारों के माध्यम से जनता में उत्साह और राष्ट्रवादी भावना का संचार किया। इनमें सबसे प्रसिद्ध नारे थे-

  • इंकलाब ज़िंदाबाद – जिसे भगत सिंह और उनके साथियों ने राष्ट्रीय क्रांतिकारी नारे के रूप में लोकप्रिय बनाया।
  • साम्राज्यवाद का नाश हो – ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध का उद्घोष।

➣ ये नारे केवल उत्साहवर्धक शब्द नहीं थे, बल्कि संगठन की राजनीतिक विचारधारा और स्वतंत्रता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रतीक थे।

HSRA की प्रमुख क्रांतिकारी गतिविधियाँ

➣ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना के बाद संगठन ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपनी गतिविधियों को अधिक संगठित एवं योजनाबद्ध रूप दिया।

➣ HRA की तुलना में HSRA की कार्रवाइयाँ केवल सशस्त्र प्रतिरोध तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उनका उद्देश्य जनता तक स्पष्ट राजनीतिक संदेश पहुँचाना और ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों का विरोध करना भी था।

1928 ई. में भारत में साइमन कमीशन के आगमन ने पूरे देश में असंतोष की नई लहर उत्पन्न कर दी। इसी विरोध के दौरान हुई घटनाओं ने HSRA की पहली बड़ी कार्रवाई- सांडर्स वध– की पृष्ठभूमि तैयार की।

साइमन कमीशन का विरोध

ब्रिटिश सरकार ने भारत शासन अधिनियम, 1919 के कार्यान्वयन की समीक्षा करने के लिए 1927 ई. में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में साइमन कमीशन नियुक्त किया।

➣ इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। इसके विरोध में लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने आयोग का बहिष्कार किया और 3 फरवरी 1928 ई. को भारत आगमन पर देशभर में व्यापक प्रदर्शन हुए।

➣ HSRA के युवा क्रांतिकारी भी इन प्रदर्शनों में शामिल हुए। उनका मानना था कि बिना भारतीय प्रतिनिधित्व वाला आयोग भारतीय जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने भी जनता के साथ मिलकर साइमन कमीशन के विरोध को अपना समर्थन दिया।

➣ यद्यपि इस समय HSRA का मुख्य उद्देश्य संगठन को सुदृढ़ करना और अपनी गतिविधियों का विस्तार करना था, फिर भी साइमन कमीशन के विरोध ने उसके सदस्यों को पहली बार व्यापक जन-आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप से जोड़ दिया।

विशेष रूप से लाहौर में हुए विरोध प्रदर्शन और उसके दौरान हुए पुलिस लाठीचार्ज ने HSRA की भावी गतिविधियों की पृष्ठभूमि तैयार की। यही घटनाक्रम आगे चलकर लाला लाजपत राय की मृत्यु तथा सांडर्स वध (1928) का कारण बना।

लाला लाजपत राय की मृत्यु

30 अक्टूबर 1928 ई. को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में एक विशाल जुलूस निकाला गया, जिसका नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। प्रदर्शन पूर्णतः शांतिपूर्ण था, किंतु पुलिस ने उसे बलपूर्वक रोकने का प्रयास किया।

➣ लाहौर के पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट के आदेश पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर निर्मम लाठीचार्ज किया। इस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल अवस्था में उन्होंने प्रसिद्ध घोषणा की-

मेरे शरीर पर पड़ी प्रत्येक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की एक-एक कील सिद्ध होगी।

➣ लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य-स्थिति के कारण 17 नवंबर 1928 ई. को लाला लाजपत राय का निधन हो गया। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने उनकी मृत्यु और लाठीचार्ज के बीच संबंध स्वीकार नहीं किया, किंतु भारतीय जनता और क्रांतिकारियों का विश्वास था कि उनकी मृत्यु पुलिस की बर्बरता का प्रत्यक्ष परिणाम थी।

➣ लाला लाजपत राय की मृत्यु ने पूरे देश में तीव्र आक्रोश उत्पन्न कर दिया। विशेष रूप से HSRA के युवा क्रांतिकारियों ने इसे राष्ट्रीय अपमान माना और दोषी अधिकारियों को दंडित करने का निर्णय लिया।

सांडर्स वध (1928)

➣ लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए HSRA के नेताओं ने जेम्स ए. स्कॉट को दंडित करने की योजना बनाई, क्योंकि वही लाठीचार्ज के लिए उत्तरदायी माना जाता था।

➣ इस योजना का नेतृत्व चंद्रशेखर आज़ाद कर रहे थे, जबकि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव तथा अन्य क्रांतिकारी इसमें शामिल थे।

17 दिसंबर 1928 ई. को लाहौर में योजना के अनुसार कार्रवाई की गई, किंतु पहचान की भूल के कारण स्कॉट के स्थान पर सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सांडर्स लक्ष्य बन गया। राजगुरु ने सबसे पहली गोली चलाई और उसके बाद भगत सिंह ने भी गोली चलाकर कार्रवाई पूरी की।

➣ घटना के बाद क्रांतिकारी पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार वहाँ से निकल गए। उनका पीछा कर रहे हेड कांस्टेबल चन्नन सिंह को चंद्रशेखर आज़ाद ने गोली मार दी, जिससे साथियों का सुरक्षित बच निकलना संभव हो सका।

➣ कार्रवाई के बाद HSRA ने पर्चों के माध्यम से स्पष्ट किया कि यह किसी व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं था, बल्कि लाला लाजपत राय की मृत्यु के उत्तरदायी ब्रिटिश दमन के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध की कार्रवाई थी। संगठन ने यह भी घोषणा की कि भारत के युवाओं में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस जीवित है।

➣ सांडर्स वध ने पूरे देश में व्यापक चर्चा उत्पन्न की। एक ओर ब्रिटिश सरकार ने इसे गंभीर अपराध घोषित कर व्यापक खोज अभियान प्रारम्भ किया, वहीं दूसरी ओर अनेक भारतीय युवाओं ने इसे राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए की गई साहसिक कार्रवाई के रूप में देखा।

➣ यह घटना HSRA के इतिहास की पहली बड़ी क्रांतिकारी कार्रवाई थी, जिसने संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर दिया और आगे चलकर केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929) जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की भूमिका तैयार की।

केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929)

1929 ई. में ब्रिटिश सरकार ने पब्लिक सेफ्टी बिल तथा ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल जैसे दमनकारी विधेयक प्रस्तुत किए। इन विधेयकों का उद्देश्य क्रांतिकारी गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करना तथा मजदूर आंदोलनों और राजनीतिक विरोध को सीमित करना था। HSRA ने इन विधेयकों को भारतीय जनता की नागरिक स्वतंत्रताओं पर सीधा आघात माना।

➣ संगठन ने निर्णय लिया कि इन कानूनों के विरोध में ऐसी कार्रवाई की जाए, जिससे किसी की जान न जाए, किंतु ब्रिटिश सरकार और पूरे देश का ध्यान इस अन्याय की ओर आकर्षित हो। इस योजना के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का चयन किया गया।

8 अप्रैल 1929 ई. को दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा में दोनों क्रांतिकारियों ने दर्शक दीर्घा से कम तीव्रता वाले दो बम फेंके। बम ऐसे स्थान पर फेंके गए जहाँ किसी सदस्य की मृत्यु न हो। विस्फोट के बाद सभा कक्ष में धुआँ फैल गया और कार्यवाही कुछ समय के लिए बाधित हो गई, किंतु किसी की मृत्यु नहीं हुई।

➣ इसके तुरंत बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इंकलाब ज़िंदाबाद तथा साम्राज्यवाद का नाश हो के नारे लगाए और सभा कक्ष में पर्चे फेंके। इन पर्चों में स्पष्ट लिखा था कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति की हत्या करना नहीं, बल्कि बहरों को सुनाना है।

➣ इस वाक्य के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि जब सरकार जनता की शांतिपूर्ण आवाज़ नहीं सुनती, तब उसे झकझोरने के लिए प्रतीकात्मक प्रतिरोध आवश्यक हो जाता है।

➣ यह कार्रवाई HSRA की विचारधारा का प्रत्यक्ष उदाहरण थी। संगठन ने यह सिद्ध किया कि उसकी क्रांतिकारी गतिविधियाँ अंधाधुंध हिंसा पर आधारित नहीं थीं, बल्कि प्रत्येक कार्रवाई के पीछे स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य और वैचारिक संदेश निहित था।

गिरफ्तारी एवं मुकदमा

➣ विधानसभा बम कांड के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त आसानी से वहाँ से निकल सकते थे, किंतु उन्होंने जानबूझकर भागने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया, क्योंकि उनका उद्देश्य न्यायालय को अपने विचारों के प्रचार का मंच बनाना था।

➣ गिरफ्तारी के बाद दोनों पर केंद्रीय विधानसभा बम कांड का मुकदमा चलाया गया। न्यायालय में उन्होंने अपने कृत्य को स्वीकार किया, किंतु स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य हत्या करना नहीं था।

➣ उन्होंने कहा कि यदि वे चाहते, तो अधिक शक्तिशाली बमों का प्रयोग कर सकते थे, किंतु उनकी कार्रवाई केवल ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध राजनीतिक चेतावनी थी।

➣ मुकदमे के दौरान भगत सिंह ने अपने वक्तव्यों और लिखित बयानों के माध्यम से साम्राज्यवाद, शोषण तथा औपनिवेशिक शासन की तीखी आलोचना की।

परिणामस्वरूप न्यायालय की कार्यवाही केवल कानूनी प्रक्रिया न रहकर पूरे देश में राजनीतिक बहस का विषय बन गई। समाचार-पत्रों ने इन घटनाओं को व्यापक रूप से प्रकाशित किया, जिससे HSRA की विचारधारा लाखों भारतीयों तक पहुँची।

➣ जाँच के दौरान पुलिस को सांडर्स वध तथा अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य भी प्राप्त हुए। इसके आधार पर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु तथा उनके अनेक साथियों के विरुद्ध व्यापक मुकदमा चलाया गया, जिसे आगे चलकर लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से जाना गया।

➣ इस प्रकार केंद्रीय विधानसभा बम कांड और उसके बाद हुई स्वैच्छिक गिरफ्तारी ने HSRA के संघर्ष को एक नए चरण में पहुँचा दिया।

➣ अब क्रांतिकारी आंदोलन का केंद्र गुप्त कार्रवाइयों से आगे बढ़कर न्यायालयों, जेलों और जनमत के माध्यम से वैचारिक संघर्ष की ओर स्थानांतरित हो गया, जिसने आगे चलकर भूख हड़ताल, जतिन दास के बलिदान तथा लाहौर षड्यंत्र केस जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की भूमिका तैयार की।

HSRA का जेल आंदोलन

➣ केंद्रीय विधानसभा बम कांड (8 अप्रैल 1929) के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी के साथ HSRA के संघर्ष का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ।

➣ अब क्रांतिकारियों का उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गुप्त कार्रवाइयाँ करना नहीं था, बल्कि जेलों के भीतर भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना था।

➣ ब्रिटिश सरकार भारतीय क्रांतिकारियों को सामान्य अपराधियों की तरह व्यवहार करती थी। उन्हें निम्न स्तर का भोजन दिया जाता था, बेड़ियाँ पहनाई जाती थीं, जबरन श्रम कराया जाता था तथा पढ़ने-लिखने जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी सीमित थीं।

➣ HSRA के नेताओं ने इसे राजनीतिक बंदियों के सम्मान के विरुद्ध माना और इसके विरोध में संगठित आंदोलन प्रारम्भ किया।

भूख हड़ताल

➣ जेल में अमानवीय व्यवहार के विरोध में भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, जतिन दास, शिव वर्मा, अजय घोष तथा अन्य क्रांतिकारियों ने 1929 ई. में ऐतिहासिक भूख हड़ताल प्रारम्भ की।।

➣ क्रांतिकारियों की प्रमुख माँगें थीं-

  • राजनीतिक बंदियों के साथ सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार न किया जाए।
  • पौष्टिक एवं पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराया जाए।
  • पढ़ने-लिखने के लिए पुस्तकें, समाचार-पत्र और लेखन सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
  • जबरन श्रम से मुक्त रखा जाए।
  • स्वच्छ वस्त्र, बिस्तर तथा स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।
  • भारतीय और यूरोपीय बंदियों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त किया जाए।

➣ ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भ में इन माँगों को अस्वीकार कर दिया और भूख हड़ताल समाप्त कराने के लिए अनेक कठोर उपाय अपनाए। कई बंदियों को बलपूर्वक भोजन कराने का प्रयास किया गया, जिससे उनकी स्वास्थ्य-स्थिति और अधिक बिगड़ गई।

➣ यद्यपि सरकार का उद्देश्य इस आंदोलन को दबाना था, किंतु इसका परिणाम इसके विपरीत हुआ। समाचार-पत्रों में भूख हड़ताल की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होने लगीं और पूरे देश में जनता की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ जुड़ने लगी।

➣ अनेक राष्ट्रीय नेताओं, विद्यार्थियों तथा सार्वजनिक संगठनों ने भी उनकी माँगों का समर्थन किया। इस प्रकार जेल के भीतर प्रारम्भ हुआ यह संघर्ष शीघ्र ही एक राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन गया।

जतिन दास का बलिदान

जतिन दास (जतीन्द्रनाथ दास) HSRA के समर्पित क्रांतिकारी थे, जिन्होंने राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए चल रही भूख हड़ताल में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी अपनी माँगों से समझौता करने से इंकार कर दिया और लगातार उपवास जारी रखा।

➣ लगभग 63 दिनों तक चली ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 ई. को लाहौर जेल में जतिन दास का निधन हो गया। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए दिए गए सबसे महान बलिदानों में से एक माना जाता है।

➣ जतिन दास की मृत्यु का समाचार पूरे देश में फैलते ही व्यापक शोक और आक्रोश की लहर दौड़ गई। उनका पार्थिव शरीर रेल द्वारा लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया। मार्ग में अनेक स्थानों पर हजारों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

कलकत्ता में उनके अंतिम संस्कार में विशाल जनसमूह उपस्थित हुआ, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि उनका बलिदान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के आत्मसम्मान का प्रतीक बन चुका था।

➣ जतिन दास के बलिदान ने ब्रिटिश सरकार की जेल व्यवस्था की कठोरता को पूरे देश के सामने उजागर कर दिया। इससे भारतीय जनता की सहानुभूति और अधिक मात्रा में HSRA तथा क्रांतिकारियों के पक्ष में हो गई।

➣ साथ ही, इस घटना ने भगत सिंह और उनके साथियों को राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता दिलाई तथा स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।

➣ इस प्रकार जेल आंदोलन और जतिन दास के बलिदान ने यह सिद्ध कर दिया कि HSRA का संघर्ष केवल हथियारों तक सीमित नहीं था। संगठन ने जेलों के भीतर भी अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा तथा राजनीतिक बंदियों के अधिकारों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।

➣ यही आंदोलन आगे चलकर लाहौर षड्यंत्र केस की कार्यवाही के दौरान और अधिक व्यापक राजनीतिक महत्व प्राप्त करता गया।

लाहौर षड्यंत्र केस

➣ केंद्रीय विधानसभा बम कांड तथा सांडर्स वध की जाँच के दौरान ब्रिटिश सरकार को HSRA की गतिविधियों से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हुए। इसके आधार पर सरकार ने संगठन के प्रमुख सदस्यों के विरुद्ध एक व्यापक मुकदमा चलाने का निर्णय लिया। यह मुकदमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

➣ इस मुकदमे में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, किशोरी लाल, महावीर सिंह, गया प्रसाद, कमलनाथ तिवारी, डॉ. गया प्रसाद कटियार तथा अन्य अनेक क्रांतिकारियों को अभियुक्त बनाया गया।

➣ मुकदमे के दौरान भगत सिंह और उनके साथियों ने न्यायालय को केवल कानूनी प्रक्रिया का मंच नहीं माना, बल्कि उसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपने विचार व्यक्त करने का माध्यम बनाया।

➣ उन्होंने अपने बयानों और व्यवहार के माध्यम से स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन और शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध है।

➣ न्यायालय की प्रत्येक कार्यवाही राष्ट्रीय समाचार-पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित होने लगी। इससे लाखों भारतीयों तक HSRA की विचारधारा पहुँची और भगत सिंह सहित अन्य क्रांतिकारी राष्ट्रीय नायकों के रूप में स्थापित होने लगे।

विशेष न्यायाधिकरण

➣ लाहौर षड्यंत्र केस की सामान्य न्यायिक प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी गति से चल रही थी। ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि सामान्य न्यायालयों में मुकदमा लंबा चलेगा और अभियुक्तों को अपने विचार रखने का अधिक अवसर मिलेगा।

➣ इसलिए 1 मई 1930 ई. को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने Lahore Conspiracy Case Ordinance, 1930 जारी कर एक विशेष न्यायाधिकरण की स्थापना की।

➣ प्रारम्भिक न्यायाधिकरण में तीन न्यायाधीश नियुक्त किए गए-

  • जस्टिस जे. कोल्डस्ट्रीम – अध्यक्ष
  • जस्टिस आगा हैदर
  • जस्टिस जी. सी. हिल्टन

➣ कार्यवाही के दौरान जब न्यायाधिकरण के व्यवहार की व्यापक आलोचना हुई तथा जस्टिस आगा हैदर ने कुछ मामलों में सरकार के रवैये पर असहमति व्यक्त की, तब न्यायाधिकरण का पुनर्गठन किया गया।।

➣ पुनर्गठन के बाद जस्टिस जे. कोल्डस्ट्रीम तथा जस्टिस आगा हैदर को हटा दिया गया और उनके स्थान पर जस्टिस जे. के. टैप तथा जस्टिस अब्दुल कादिर को नियुक्त किया गया, जबकि जी. सी. हिल्टन न्यायाधिकरण में बने रहे।

➣ इस विशेष न्यायाधिकरण को सामान्य न्यायालयों की अपेक्षा असाधारण अधिकार प्राप्त थे, जैसे-

  • अभियुक्तों की अनुपस्थिति में भी मुकदमे की सुनवाई करना।
  • गवाहों से जिरह (Cross Examination) के अधिकार को सीमित करना।
  • साक्ष्यों को स्वीकार करने में सामान्य न्यायालयों की तुलना में अधिक विवेकाधिकार रखना।
  • मुकदमे की कार्यवाही को तीव्र गति से संचालित करना तथा सामान्य न्यायिक प्रक्रियाओं का पूर्णतः पालन न करना।
  • न्यायाधिकरण के निर्णय के विरुद्ध सामान्य अपील का अधिकार उपलब्ध न होना।

➣ इन असाधारण अधिकारों के कारण अनेक भारतीय नेताओं और विधि विशेषज्ञों ने इस न्यायाधिकरण को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया।

➣ HSRA के क्रांतिकारियों ने न्यायालय की कार्यवाही का साहसपूर्वक सामना किया। वे न्यायालय में इंकलाब ज़िंदाबाद तथा साम्राज्यवाद का नाश हो जैसे नारे लगाते थे और अपने राजनीतिक विचार निर्भीकता से प्रस्तुत करते थे।

सरकारी गवाह

➣ ब्रिटिश सरकार ने मुकदमे को मजबूत बनाने के लिए संगठन के कुछ सदस्यों को सरकारी गवाह बनाया। इनमें जयगोपाल तथा हंसराज वोहरा सबसे प्रमुख थे।

➣ इन दोनों ने पुलिस को HSRA की गतिविधियों, संगठनात्मक संरचना तथा सांडर्स वध से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। विशेष रूप से हंसराज वोहरा की गवाही ने अभियोजन पक्ष को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ दूसरी ओर, क्रांतिकारी संगठन ने इन दोनों को विश्वासघात का प्रतीक माना। इसलिए भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में इनका उल्लेख प्रायः सरकारी गवाह के रूप में किया जाता है।

भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फाँसी

7 अक्टूबर 1930 ई. को विशेष न्यायाधिकरण ने भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को सांडर्स वध के आरोप में मृत्युदंड सुनाया। अन्य कई क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास तथा विभिन्न अवधियों के कठोर कारावास की सज़ा दी गई।

➣ फाँसी के निर्णय के विरुद्ध देशभर में व्यापक जन-आंदोलन प्रारम्भ हो गया। अनेक राष्ट्रीय नेताओं, विद्यार्थियों, श्रमिक संगठनों तथा सामाजिक संस्थाओं ने मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने की माँग की।

पंडित मदन मोहन मालवीय सहित अनेक नेताओं ने दया-याचिका प्रस्तुत की, जबकि देशभर में सभाएँ, जुलूस और हस्ताक्षर अभियान आयोजित किए गए। किंतु ब्रिटिश सरकार ने सभी अपीलों को अस्वीकार कर दिया।

➣ निर्धारित तिथि 24 मार्च 1931 ई. से एक दिन पूर्व, 23 मार्च 1931 ई. की शाम लगभग 7:30 बजे लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को गुप्त रूप से फाँसी दे दी गई।

➣ ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि निर्धारित तिथि पर व्यापक जन-आक्रोश उत्पन्न हो सकता है, इसलिए फाँसी समय से पहले दी गई।

➣ फाँसी के बाद तीनों के शवों को गुप्त रूप से फिरोजपुर के निकट हुसैनीवाला (सतलुज नदी के तट) ले जाकर शीघ्रता से जलाने का प्रयास किया गया। जब स्थानीय लोगों को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने उनके अवशेषों को सम्मानपूर्वक एकत्र कर अंतिम संस्कार किया। आज हुसैनीवाला में तीनों शहीदों का राष्ट्रीय स्मारक स्थित है।

➣ भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान ने पूरे देश में अभूतपूर्व शोक और आक्रोश उत्पन्न कर दिया। लाखों भारतीयों ने उन्हें राष्ट्रीय शहीद के रूप में श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके बलिदान ने ब्रिटिश शासन के प्रति जन-विरोध को और अधिक तीव्र कर दिया।

➣ इस प्रकार लाहौर षड्यंत्र केस केवल एक न्यायिक मुकदमा नहीं था, बल्कि वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद और भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के बीच वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बन गया।

➣ इस मुकदमे ने HSRA की विचारधारा को पूरे देश में व्यापक पहचान दिलाई तथा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को भारतीय इतिहास के अमर शहीदों के रूप में स्थापित कर दिया।

चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने साथियों को बचाने तथा HSRA की गतिविधियों को पुनर्गठित करने के अनेक प्रयास किए।

➣ इस समय तक अधिकांश प्रमुख क्रांतिकारी या तो गिरफ्तार हो चुके थे अथवा पुलिस की कड़ी निगरानी में थे, इसलिए संगठन का पूरा दायित्व लगभग अकेले आज़ाद के कंधों पर आ गया था।

➣ इस बीच ब्रिटिश सरकार ने चंद्रशेखर आज़ाद को पकड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया। उनकी गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया गया तथा क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) और स्थानीय पुलिस को विशेष निर्देश दिए गए।

➣ अंततः 27 फरवरी 1931 ई. को मुखबिरी के आधार पर पुलिस को उनके इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) स्थित अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना मिल गई।

➣ पुलिस अधीक्षक जे. आर. एच. नॉट-बावर के नेतृत्व में पुलिस ने पार्क को चारों ओर से घेर लिया। उस समय आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ वहाँ उपस्थित थे।

➣ पुलिस द्वारा घेर लिए जाने पर उन्होंने अपने साथी को सुरक्षित निकल जाने का आदेश दिया और स्वयं अकेले पुलिस का सामना करने का निर्णय लिया।

काफी समय तक चली मुठभेड़ में चंद्रशेखर आज़ाद ने अद्भुत साहस और धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने अकेले ही पुलिस पर लगातार गोलियाँ चलाईं, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए और पुलिस को आगे बढ़ने में कठिनाई हुई।

➣ किंतु धीरे-धीरे उनकी गोलियाँ समाप्त होने लगीं। अंत में जब उनके पास केवल एक गोली बची, तब उन्होंने यह निश्चय किया कि वे जीवित ब्रिटिश पुलिस के हाथों गिरफ्तार नहीं होंगे।

➣ चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी अंतिम गोली स्वयं पर चलाकर अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इस प्रकार उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा- दुश्मन के हाथों कभी जीवित नहीं पकड़ा जाऊँगा– को अंतिम क्षण तक निभाया।

➣ इसी कारण वे भारतीय इतिहास में “आज़ाद” नाम के अनुरूप जीवन भर स्वतंत्र रहे और स्वतंत्र रहते हुए ही वीरगति को प्राप्त हुए।

➣ आज़ाद की मृत्यु का समाचार पूरे देश में फैलते ही गहरा शोक और व्यापक आक्रोश फैल गया। ब्रिटिश प्रशासन ने उनके अंतिम संस्कार को भी नियंत्रित करने का प्रयास किया, किंतु बड़ी संख्या में लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुँचे।

➣ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क रखा गया, जो आज भी उनके बलिदान की स्मृति का प्रमुख राष्ट्रीय स्थल है।

➣ जब 27 फरवरी 1931 ई. को चंद्रशेखर आज़ाद वीरगति को प्राप्त हुए, उस समय भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अभी फाँसी नहीं दी गई थी। वे लाहौर सेंट्रल जेल में बंद थे और अपने मुकदमे तथा दया-याचिकाओं से संबंधित घटनाक्रम का सामना कर रहे थे।

➣ चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। उनके निधन के साथ ही HSRA अपने सबसे अनुभवी सैन्य नेता से वंचित हो गया। यद्यपि संगठन की वैचारिक प्रेरणा जीवित रही, परंतु उसके केंद्रीय नेतृत्व को अपूरणीय क्षति पहुँची, जिसने आगे चलकर HSRA के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।

HSRA का पतन

➣ चंद्रशेखर आज़ाद के बलिदान के बाद हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का केंद्रीय नेतृत्व लगभग समाप्त हो गया। इससे पहले 28 मई 1930 ई. को भगवतीचरण वोहरा की रावी नदी के तट पर बम परीक्षण के दौरान मृत्यु हो चुकी थी।

➣ इसके बाद 23 मार्च 1931 ई. को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई। इन घटनाओं के परिणामस्वरूप संगठन अपने प्रमुख वैचारिक, सैन्य और संगठनात्मक नेतृत्व से लगभग पूर्णतः वंचित हो गया।

➣ दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी आंदोलन को समाप्त करने के लिए व्यापक दमन अभियान चलाया। अनेक क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए, कई को आजीवन कारावास अथवा लंबी अवधि के कारावास की सज़ा मिली और कुछ भूमिगत जीवन जीने के लिए विवश हो गए। क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) की कड़ी निगरानी तथा सरकारी मुखबिरों के कारण संगठन के लिए गुप्त रूप से कार्य करना भी अत्यंत कठिन हो गया।

➣ HSRA की एक अन्य चुनौती यह थी कि उसके पास व्यापक जनाधार और पर्याप्त आर्थिक संसाधनों का अभाव था। संगठन मुख्यतः शिक्षित युवाओं एवं सीमित क्रांतिकारी समूहों तक ही केंद्रित रहा।

➣ इसके विपरीत, उसी समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे जन-आंदोलनों ने देश के करोड़ों लोगों को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ दिया। परिणामस्वरूप सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन का प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित होता गया।

➣ यद्यपि 1930 के दशक में HSRA एक संगठित क्रांतिकारी संस्था के रूप में धीरे-धीरे निष्क्रिय हो गया, फिर भी उसकी वैचारिक विरासत समाप्त नहीं हुई।

संगठन के अनेक जीवित सदस्य आगे चलकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट आंदोलन तथा अन्य समाजवादी राजनीतिक धाराओं से जुड़े और स्वतंत्र भारत में भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे।

➣ इस प्रकार HSRA का संगठनात्मक अस्तित्व भले ही समाप्त हो गया, किंतु उसके द्वारा प्रतिपादित राष्ट्रवाद, समाजवाद, वैज्ञानिक चिंतन तथा शोषणमुक्त समाज की अवधारणा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्थायी वैचारिक धरोहर बन गई।

➣ यही कारण है कि इतिहास में HSRA को केवल एक क्रांतिकारी संगठन के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के राजनीतिक और वैचारिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आंदोलन के रूप में स्मरण किया जाता है।

कांग्रेस एवं अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया

➣ HSRA की गतिविधियों के प्रति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा अन्य राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिक्रिया मिश्रित रही। महात्मा गांधी और कांग्रेस का आधिकारिक दृष्टिकोण अहिंसा पर आधारित था, इसलिए उन्होंने हिंसात्मक क्रांतिकारी कार्रवाइयों का समर्थन नहीं किया। फिर भी वे भगत सिंह और उनके साथियों की देशभक्ति, त्याग और साहस का सम्मान करते थे।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिए जाने के बाद कांग्रेस के अनेक नेताओं ने उनकी सज़ा कम करने का प्रयास किया।

पंडित मदन मोहन मालवीय, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस तथा अन्य नेताओं ने विभिन्न अवसरों पर उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त की और दया-याचिका अथवा सार्वजनिक अपीलों का समर्थन किया।

➣ दूसरी ओर, सुभाषचंद्र बोस तथा अनेक समाजवादी और युवा राष्ट्रवादी नेताओं ने HSRA के त्याग और बलिदान की खुले रूप से प्रशंसा की। उनका मानना था कि इन क्रांतिकारियों ने भारतीय युवाओं में आत्मविश्वास, राष्ट्रभक्ति और बलिदान की भावना का अभूतपूर्व संचार किया।

➣ इस प्रकार, यद्यपि कांग्रेस और HSRA के संघर्ष के तरीके अलग-अलग थे, फिर भी दोनों का अंतिम लक्ष्य भारत की स्वतंत्रता ही था। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दोनों धाराओं को एक-दूसरे का पूरक माना जाता है।

उपलब्धियाँ

  • भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को एक स्पष्ट समाजवादी एवं गणतांत्रिक विचारधारा प्रदान की।
  • स्वतंत्रता संघर्ष को केवल राजनीतिक आज़ादी तक सीमित न रखकर सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता तथा शोषणमुक्त समाज की अवधारणा से जोड़ा।
  • भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव, राजगुरु तथा अन्य क्रांतिकारियों के माध्यम से भारतीय युवाओं में राष्ट्रभक्ति, साहस और बलिदान की भावना का व्यापक प्रसार किया।
  • न्यायालय, जेल तथा क्रांतिकारी साहित्य को वैचारिक प्रचार के प्रभावी माध्यम के रूप में उपयोग कर राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
  • ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया।
  • स्वतंत्रता आंदोलन में समाजवादी विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसका प्रभाव आगे चलकर अनेक समाजवादी एवं वामपंथी राजनीतिक धाराओं पर भी पड़ा।

सीमाएँ

  • संगठन का जनाधार सीमित था और इसकी अधिकांश गतिविधियाँ शिक्षित युवाओं एवं गुप्त क्रांतिकारी समूहों तक केंद्रित रहीं।
  • पर्याप्त आर्थिक संसाधनों तथा आधुनिक हथियारों के अभाव में संगठन अपनी योजनाओं का व्यापक विस्तार नहीं कर सका।
  • ब्रिटिश सरकार की कठोर दमनकारी नीति, व्यापक गिरफ्तारियों तथा मुखबिरों (Approvers) के कारण संगठन को गंभीर क्षति पहुँची।
  • सशस्त्र क्रांति की रणनीति को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त नहीं हो सका, क्योंकि उसी समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसात्मक जन-आंदोलन अधिक प्रभावी हो रहे थे।
  • 1931 ई. में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी तथा 1931 ई. में ही चंद्रशेखर आज़ाद के बलिदान के बाद संगठन का केंद्रीय नेतृत्व लगभग समाप्त हो गया।

प्रमुख व्यक्तित्व

व्यक्तित्व भूमिका / योगदान
चंद्रशेखर आज़ाद HSRA के प्रमुख नेता एवं कमांडर, संगठन के पुनर्गठन में महत्वपूर्ण भूमिका, सांडर्स वध की योजना के प्रमुख संचालक, 1931 ई. में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में वीरगति।
भगत सिंह HSRA के प्रमुख वैचारिक नेता, सांडर्स वध, केंद्रीय विधानसभा बम कांड तथा लाहौर षड्यंत्र केस के मुख्य अभियुक्त, समाजवादी विचारधारा के समर्थक।
सुखदेव थापर HSRA के पंजाब संगठन के प्रमुख, सांडर्स वध की योजना में महत्वपूर्ण भूमिका, 23 मार्च 1931 को भगत सिंह एवं राजगुरु के साथ फाँसी।
शिवराम हरि राजगुरु सांडर्स वध में पहली गोली चलाने वाले क्रांतिकारी, 23 मार्च 1931 को भगत सिंह एवं सुखदेव के साथ शहीद।
बटुकेश्वर दत्त भगत सिंह के साथ केंद्रीय विधानसभा बम कांड (8 अप्रैल 1929) में सहभागी, आजीवन कारावास की सज़ा।
भगवतीचरण वोहरा HSRA के प्रमुख वैचारिक नेता, संगठन के प्रचार-प्रसार एवं साहित्य निर्माण में योगदान, The Philosophy of the Bomb के लेखक, 1930 में बम परीक्षण के दौरान निधन।
जतिन दास (जतीन्द्रनाथ दास) लाहौर जेल में 63 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को बलिदान, राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के प्रतीक बने।
जयदेव कपूर केंद्रीय विधानसभा बम कांड की योजना बनाने तथा क्रांतिकारियों की सहायता करने में महत्वपूर्ण भूमिका।
शिव वर्मा HSRA के सक्रिय सदस्य, लाहौर षड्यंत्र केस के अभियुक्त, स्वतंत्रता के बाद क्रांतिकारी आंदोलन के संस्मरण लिखे।
महावीर सिंह HSRA के सक्रिय सदस्य, जेल में भूख हड़ताल के दौरान बलपूर्वक भोजन कराए जाने से स्वास्थ्य बिगड़ा, बाद में अंडमान की सेल्युलर जेल में निधन।

समयरेखा

वर्ष / तिथि घटना
8–9 सितंबर 1928 दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में बैठक; HRA का पुनर्गठन कर HSRA की स्थापना।
30 अक्टूबर 1928 लाहौर में साइमन कमीशन विरोध प्रदर्शन पर लाठीचार्ज; लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल।
17 नवंबर 1928 लाला लाजपत राय का निधन।
17 दिसंबर 1928 लाहौर में जे. पी. सांडर्स की हत्या (सांडर्स वध)।
8 अप्रैल 1929 दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम फेंका गया।
1929 लाहौर जेल में राजनीतिक बंदियों के अधिकारों हेतु ऐतिहासिक भूख हड़ताल।
13 सितंबर 1929 जतिन दास का 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद बलिदान।
1 मई 1930 लॉर्ड इरविन द्वारा Lahore Conspiracy Case Ordinance जारी; विशेष न्यायाधिकरण की स्थापना।
7 अक्टूबर 1930 भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को मृत्युदंड सुनाया गया।
27 फरवरी 1931 चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में वीरगति को प्राप्त हुए।
23 मार्च 1931 भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दी गई।

कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु

HRA और HSRA को एक ही संगठन नहीं माना जाना चाहिए। HRA की स्थापना 1924 में हुई थी, जबकि HSRA इसका 1928 में पुनर्गठित समाजवादी स्वरूप था।

HSRA के संस्थापक केवल भगत सिंह नहीं थे। 1928 में संगठन का पुनर्गठन सामूहिक रूप से हुआ, जिसमें चंद्रशेखर आज़ाद प्रमुख नेता बने और भगत सिंह इसके प्रमुख वैचारिक नेताओं में उभरे।

जे. पी. सांडर्स ने लाठीचार्ज का आदेश नहीं दिया था। आदेश जेम्स ए. स्कॉट ने दिया था, लेकिन पहचान की भूल के कारण सांडर्स की हत्या कर दी गई।

केंद्रीय विधानसभा बम कांड का उद्देश्य हत्या करना नहीं था। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ऐसा बम इस्तेमाल किया जिसका उद्देश्य अधिकतम राजनीतिक प्रभाव पैदा करना था और इसे बहरों को सुनाने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त विधानसभा बम कांड के बाद भागे नहीं थे। दोनों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी और अदालत को अपने राजनीतिक विचारों के प्रचार के मंच के रूप में इस्तेमाल किया।

लाहौर षड्यंत्र केस केवल केंद्रीय विधानसभा बम कांड तक सीमित नहीं था। इसमें सांडर्स वध तथा HSRA की अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े आरोप भी शामिल थे।

जतिन दास की मृत्यु फाँसी से नहीं हुई थी। जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को उनका निधन हुआ।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फाँसी नहीं दी गई थी। उन्हें निर्धारित तिथि से एक दिन पहले 23 मार्च 1931 की शाम फाँसी दी गई थी।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram